सोमवार, 18 मार्च 2013

यथार्थ

कई बार आदमी जैसा सोचता है, वैसा हो नहीं पाता है. ये कहानी हरसहाय भाटिया और उनकी अर्धांगिनी सुनयना भाटिया की है, जिन्होंने जीवन की दौड़ जीरो से शुरु की थी और आज सात जीरो पर पहुँच गए हैं. उनके पास रेवाड़ी में एक बड़ा दुमंजिला घर है, बडी पेंशन है, बैंक खातों में बहुत रूपये है, गाड़ी है, तीन बेटे हैं. उनकी उम्र अस्सी पार होने वाली है. अपने घर के दुमंजिले पर बाल्कनी में पति-पत्नी धूप सेक रहे हैं. ऐसे बैठे हैं जैसे वे जिंदगी की जंग हार गए हैं. उनके पास सब कुछ होते हुए भी ऐसा लगता है कि कुछ भी नहीं है. घर में चारों तरफ उदासी का साम्राज्य है. पति पत्नी दोनों के चेहरों पर जैसे हंसी-खुशी गायब हो गयी है. आपस में  दवाओं पर या खाने के बारे में सांकेतिक वार्तालाप के अलावा कुछ और नहीं होता है.

बीस-बाईस साल पहले रेवाड़ी का ये इलाका बिलकुल बियावान सा था. रात-बेरात आते जाते डर लगता था, पर जमीन सस्ती थी तथा शहर के इस तरफ बढ़ने की सम्भावानें थी. दो हजार गज के बड़े प्लाट पर आर्किटेक्ट के सलाह अनुसार बढ़िया दुमंजिला घर बनवाया. तब उनके दो बेटे इंजीनियरिंग करके फरीदाबाद के कारखानों में काम करने लग गए थे, और तीसरा कॉलेज में पढ़ ही रहा था. हरसहाय भाटिया ने परिवार की अगले पचास वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तीनों के लिए दो-दो बेडरूम वाले बड़े बड़े सेट बनवाए. अपने लिए एक बड़ा कमरा तथा साथ में गेस्ट रूम व सर्वेंट रूम की व्यवस्था रखी. लडकों ने अपनी पसंद के अनुसार पूरे घर में बढ़िया वुडवर्क करवाया. सभी कमरों में सागवान का आधुनिकतम फर्नीचर डलवाया. घर के आगे पीछे जो जगह बची थी उसमें नियमित माली लगा कर लॉन व गमले सजाये गए. इस सपनों के घर मे वे रिटायरमेंट से पहले ही आ गए थे.

अच्छा समय तेजी से गुजर जाता है. बड़ा बेटा शिव शादी के कुछ सालों के बाद अपने बीवी-बच्चों के साथ आस्ट्रेलिया चला गया.

दूसरा बेटा इंद्र भी अपनी सुयोग्य पत्नी के साथ इंग्लेंड में जाकर रहने लगा. तीसरे बेटे जय ने बी.काम. करने के बाद एक फर्म में नौकरी पा ली थी और अपने साथ काम करने वाली एक पूर्वोत्तर की रहने वाली ईसाई लड़की से गन्धर्व विवाह कर लिया. यहाँ तक सब ठीक चल रहा था, तीनों बेटों की पत्नियों ने समयांतर पर दो दो बच्चों को जन्म दिया, वंश बेल बढ़ रही थी. सुख, सौभाग्य और खुशियों का सूचक था.

दादा-दादी का बड़ा सुख होता है कि पोते-पोती गोद में खेलें, चिरोरी करें और अपने सामने बढ़ते हुए देखें. शिव व इंद्र के बच्चे सात समुन्दर पार थे, कभी दो-तीन सालों में भारत आते हैं तो उनका समय और लोगों से मिलने मिलाने में, घूमने में, और खरीददारी में बीत जाता है. जय ने अपने दोनों बेटों को अच्छी शिक्षा के लिए प्राइमरी से ही बोर्डिंग स्कूल में दूर जयपुर में रख दिया. कारण यह भी था कि उसकी पत्नी भी नौकरी करती थी तथा पति पत्नी दोनों ही बच्चों को अधिक समय नहीं दे पाते थे.

दो साल पहले हरसहाय  भाटिया अपनी श्रीमती सहित आस्ट्रेलिया, बड़े बेटे के पास, भी गए थे. बहुत उत्साह और उमंग के साथ पहली बार हवाई यात्रा करके विदेश गए. बेटे-बहू ने खूब खिदमत की, बच्चों के साथ रहते हुए अवर्णनीय आनन्द मिला, पर वह सब अल्पकालिक था क्योंकि वे टूरिस्ट वीजा पर वहाँ गए थे.

बाहर वालों को कहने के लिए भाटिया दम्पति गर्व से कहते रहे हैं कि तीनों बेटों के बच्चे बहुत अच्छी शिक्षा पा रहे हैं, सब की मौज हो रही है, पर अन्दर ही अन्दर बच्चों के वियोग में घुलते भी रहे हैं. गत वर्ष एक बड़े दुर्भाग्य की छाया परिवार पर पड़ी कि जय की पत्नी को ब्रेस्ट कैंसर हो गया. सारे संभव उपाय/ईलाज के बावजूद उसे बचाया नहीं सका. पारिवारिक आपदा पर सभी रिश्तेदार इकट्ठे हुए पर ये सांत्वना स्थाई नहीं होती है. अब घर में वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. एक अधपगला सा नौकर है, मिकू, जिसकी जिम्मेदारी पर दो कुत्ते भी हैं. उसकी उपस्थिति किसी तरह अपनेपन का आभास नहीं कराती है.

फरवरी का महीना है. इस बार ठण्ड ने खूब कहर बरपाया है. रिकार्ड़तोड़ बारिस हुई है. घर बिस्तर सब गिलगिले और ठन्डे हैं. निचली मंजिल पर धूप बहुत कम आती है, ऊपर चढ़ने के लिए घुटनों पर बहुत जोर पड़ता है. श्रीमती भाटिया वैसे भी भारी बदन है, संधिवात ने जाड़ों में अपना असर दिखाया है. आज ही दवा की दूकान से पीड़ान्तक तेल मंगवाया है. श्रीमती भाटिया लम्बी उच्छ्वास लेकर सोचती है कि घर में यदि एक भी बहू होती तो अपने घुटनों की मालिश करवाती, सर के बालों में तेल लगवाकर गुन्थवाती और पैर पसार कर बहू से खूब बतियाती रहती. लेकिन ये सब भाग्य में लिखा कहाँ है?

जय समझदार बहुत है, पर पत्नी के गुजर जाने के बाद अपने ही गम में डूबा रहता है. दूसरे विवाह की बात पर उखड़ जाता है. माँ-बाप का मन है, वे बेटे की दशा पर बहुत दूर तक की बातें सोचते रहते हैं और उदासी बढ़ती जाती है.

हरसहाय भाटिया पहले योगाभ्यास किया करते थे, पर अब सब छोड़-छाड़ दिया. मन ही नहीं करता है. इनको अब एक चिंता सताया करती है कि यदि जोड़े में से एक जन बिछुड़ जाएगा तो दूसरे का क्या होगा? रात में पड़े पड़े उनकी नींद उचट जाती है और अकसर नींद लाने वाली गोलियों का सहारा लेना पड़ता है.

अब जब शरीर के तमाम अंग और इन्द्रियाँ जवाब दे रहे हैं, दिखाई कम देने लगा है, सुनाई कम देने लगा है तो हरसहाय अपने आप से प्रश्न करते हैं कि उनसे जिंदगी में कहाँ गलती हुई? अब उन गलतियों का निराकरण भी तो नहीं हो सकता है. लेकिन अगर बच्चों के परिवार वापस घर लौट कर आ जाएँ तो खुशियाँ अपने आप लौट आयेंगी. लेकिन उनको यह भी मालूम है कि घड़ी की सुइयां पीछे को नहीं घूम सकती हैं.
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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर भाव लिए सार्थक प्रस्तुति,आभार.

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  2. आधुनिकता के आक्रमण से एक भरे-पूरे परिवार को क्‍या समस्‍या होती है, उसका सटीक वर्णन।

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  3. सबका हित कभी कभी अपने सुख का मोल ले जाता है।

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  4. बहुत बढ़िया ....
    बेहद सार्थक.

    सादर
    अनु

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