बुधवार, 6 नवंबर 2019

ना काहू से दोस्ती ....




पुलिस और वकील एक ही परिवार के दो सदस्य से होते हैं, दोनों के लक्ष समाज को क़ानून सम्मत नियंत्रित करने के होते हैं, पर दिल्ली में जो हुआ या हो रहा है उसकी जितनी निंदा की जाए कम होगी. मैं अपने नजदीकी लोगों के उन परिवारों को जानता हूँ जिसमें एक भाई पुलिस में तथा दूसरा एडवोकेट के बतौर कार्यरत हैं. पुलिस में प्राय: छोटे पदों पर कम पढ़े लिखे लोग नियुक्त रहते हैं जबकि सभी  वकील कानूनदां ग्रेज्युएट होते हैं .

सच तो ये है कि आज भी पुलिस की मानसिकता व कार्यप्रणाली ब्रिटिस कालीन चल रही है, इसके सुधार की कई बार बड़ी बड़ी बातें सरकारें करती रही है लेकिन  धरातल पर आज भी पुलिसवाला अपने को हाकिम समझता है और उसी लहजे में बात व्यवहार किया करता है.

वकीलों की बात करें तो कुछ गुणवन्तों को छोड़कर अधिकतर ने इस आदरणीय पद की गरिमा का अवमूल्यन कर रखा है. सच को झूठ तथा झूठ को सच साबित करना ही बड़ी कला रह गयी है. क़ानून की सही व्याख्या करने के बजाय क़ानून में पोल ढूढना वकालत कहलाने लगी है.

मेरे जैसे साधारण नागरिक को ये जानकार बहुत दुःख हुआ कि हाईकोर्ट परिसर में वकीलों की गुस्साई भीड़ ने सरकारी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया. मैं वकीलों के संगठनों  के मुखियाओं से कहना चाहूंगा कि ये नादानियां बिलकुल बंद करवाई जानी चाहिए.

पुलिस में हो या वकालत में दोनों को संयम के पाठ पढाये जाने चाहिए, जिन लोगों ने माहौल बिगड़ने में जोर लगाया है उनको जरूर दण्डित किया जाना चाहिए.

हो क्या रहा है कि पुलिस महकमे (सी.बी.आई./ गुप्तचर विभाग से लेकर पुलिस चौकी तक ) का राजनीतिकरण हो गया है. नतीजन हर फैसले में अन्याय की बू आने लगी है.
वकीलों में भी जो लोग सत्ता के करीबी हैं वे खुद को न्यायाधिकरण से ऊपर समझने लगे हैं.

प्रबुद्ध लोग कुछ कहने में डरने लगे हैं क्योकि सत्ता से असहमति का अर्थ राष्ट्र्द्रोह कहा जाने लगा है. कर्णधारों को इस पूरी समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा.
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शनिवार, 19 अक्तूबर 2019

सिंदरी से - ५ धन- धान्यवाद - धनबाद


एक समय था जब खदानों के बारे में पढाई सिर्फ धनबाद में ही हुआ करती थी, एसीसी की खदानों में कार्यरत इंजीनियर्स सभी धनबाद रिटर्न हुआ करते थे.

धनबाद शहर झारखण्ड का रांची के बाद सबसे बड़ा शहर है. इस शहर की बनावट भी आम भारतीय कस्बों की तरह ही विक्सित हुई है. सन १९५६ से पहले ये इलाका बंगाल  प्रांत के मनभूम का हिस्सा था, इसे बाद में जिला की पहचान दी गयी औए ये बिहार का हिस्सा बन गया.

इतिहास में दर्ज है कि इसे सन १९१८ में ‘धान बाईद’ से संशोधित करके धनबाद नाम दिया गया था. कोयलांचल के इस उपजाऊ धरती पर एक विशिष्ट धान (चावल) ‘बाईद’ पैदा होता था/ है.

यहाँ के सभी प्राइवेट कोल माईन्स का राष्ट्रीयकरण स्व.प्रधान मंत्री इंदिरा गाधी के समय में हुआ था. कोल इंडिया का मुख्यालय धनबाद में ही है. इतिहास में दर्ज है कि सन १७६४ में अंग्रेजों ने बक्सर के युद्ध में मुग़ल शासक को पराजित करके एक संधि कर ली जिसे (‘इलाहाबाद संधि’ के नाम से जाना जाता है) इस इलाके को अपने अधीन कर लिया था.

अंग्रेजों के कब्जे के बाद आदिवासी लोग बेदखल किये जाने लगे तथा उनकी महिलाओं पर अत्याचार होने लगे थे तो एक क्रांतिकारी नौजवान ‘बिरसा मुंडा’ ने हथियार उठाकर अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. अपने इस महानायक को आदिवासी लोगों ने भगवान् का दर्जा दिया हुआ है. बाद में प्रशासन ने अनेक स्कूल-कालेज, पार्क व संस्थानों को बिरसा मुंडा नाम से जोड़कर अमर किया हुआ है. बिरसा मुंडा इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी तथा रांची स्थित बिरसा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी इसके बड़े उदाहरण हैं.

हावड़ा के मुख्य रेल मार्ग से जुड़ा हुआ धनबाद, सिंदरी से महज २८ किलोमीटर दूर है. समृद्ध बाजार व मॉल देखकर लगता नहीं है कि ये खनिज अ वन संपदा वाला इलाका कभी ‘बीमारू राज्य’ का हिस्सा रहा होगा.
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शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

सिन्दरी से - ४



पुरानी यादों को ताजा करने के लिए संस्मरण लिखे जाते हैं, कड़वी, मीठी या अंतर्मन को गुदगुदानेवाली यादें अक्सर स्वांत:सुखाय होती हैं तथा अन्य पात्रों को चुभ भी सकती हैं . मेरे एक मित्र एडवोकेट रविशंकर पाण्डेय जी ने लिखा है कि “इसीलिये अब संस्मरणों के बजाय उपन्यास लिखे जाते हैं.”

यहाँ सिन्दरी नगर में मैंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और कुछ विवरण अपने ब्लॉग / फेसबुक पर लिख डाले तो सिंदरी से सम्बंधित रहे अनेक मित्रों के सन्देश मुझे मिल रहे हैं. ये बहुत स्वाभाविक है कि हम जिन जगहों पर रहते हों या जिन लोगों के सानिध्य में रहे हों उनसे लगाव हो ही जाता है.

कोयम्बटूर से श्री रामकृष्णन सुंदराअय्यर लिखते हैं कि वे सिंदरी प्लांट में १९६७ से ७३ तक चीफ बर्नर के बतौर  कार्यरत रहे थे, तब एम्.एल.नरूला जी (retired as M.D.) यहाँ पर असिस्टेंट इंजीनियर हुआ करते थे. रामकृष्णन जी ने अपने समय की प्रोडकसन संबंधी उपलब्धियों का भी जिक्र किया है.

श्री आशीष शुक्ला लिखते हैं कि उनके बचपन के कुछ साल यहां पर बीते थे, यहाँ का विवरण पढ़कर उनको बहुत अच्छा लगा है. उनके पिताश्री यहाँ पर कैमिस्ट रहे थे.

श्रीमती अल्पना जोशी सुपुत्री स्व. मदन प्रकाश भारद्वाज (स्व. वेद प्रकाश भारद्वाज जी के अनुज) की बचपन की अनेक स्मृतिया ताजी हो आई हैं.मदन प्रकाश जी लाखेरी से प्रमोट होकर यहाँ लम्बे समय तक चीफ बर्नर/ मास्टर बर्नर रहे थे.

श्रीमती ममता जोबंपुत्रा गोंसाल्वेज को भी सिन्दरी में बिताये अपने बचपन के दिन याद आये हैं, उनके पिता स्व. जोबंपुत्रा जी लाखेरी से प्रमोट होकर यहाँ अकाउन्ट्स आफीसर बने थे और यही उनका देहावसान हुआ था.

सिन्दरी है ही बड़ी सुन्दर जगह, मैं पिछले दस दिनों में यहाँ की भव्यता / दुर्गा पूजा समारोहों/ दर्शनीय स्थलों को देख रहा हूँ आवासीय कालोनी में लगता है कि मैं लाखेरी/ शाहाबाद में ही विचरण कर रहा हूँ.

इस नई जगह में मेरे रिश्तेदारों के अलावा मुझे कोई  जानने वाला-पहचानने वाला नहीं होना चाहिए, पर दुर्गापूजा के पांडाल में यहाँ के कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारी मुझे  घूरते नजर आये, उनको लग रहा था की उन्होंने मुझे कहीं देखा जरूर है. इनसे मुम्बई में सीमेंट वर्कर्स फैडरेसन की मीटिंग्स में अवश्य मुलाक़ात हुई रही होगी. सच है कि आपका बीता हुआ कल आपका आजीवन पीछा करता रहता है. बहरहाल मैं खुशनसीब हूँ कि उम्र के इस पडाव पर मैं ट्रेड यूनियन एक्टिविटीज के प्रति उदासीन हो गया हूँ तथा देश की दलीय राजनीति में भी सन्यासी बन गया हूँ. हाँ लिखना मेरा शुगल जारी है.
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बुधवार, 9 अक्तूबर 2019

सिन्दरी (झारखण्ड) से -३



धनबाद जिले का ये क्षेत्र प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध है इसलिए चूना-पत्थर,कोयला, लौह अयस्क व अन्य खनिजों के उत्पादों के लिए अनेक बड़े उद्योगों की स्थापना देश की आजादी के बाद यहाँ हुई है, तदनुसार ही प्रशिक्षित तकनीकी विशेषज्ञों की आवश्यकता हुई तो बिरसा मुंडा प्राद्योगिक संस्थान व अन्य इंजीनियरिंग कालेजों की स्थापना हुई. यह बात विशेष है कि इन्ही उद्योगों की वजह से सिन्दरी एक मैट्रोपोलीटीयन सिटी बन गयी. जिसमें कला, साहित्य और संगीत का भी स्वाभाविक विकास हुआ है; पर यहाँ आज भी आदिवासी ‘मुंदरी’ भाषा के मनमोहक गीत व भजन सुने जा सकते हैं.

FCIL खाद का कारखाना – यों तो एक ब्रिटिस कैमिकल कम्पनी ने १९४४ में ही यहाँ अमोनियम सल्फेट + जिप्सम से उर्वरक बनाना शुरू कर दिया था पर उर्वरक को रफतार तब मिली जब देश आजाद हुआ १९५१ में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल नेहरू ने खाद कारखाने का उदघाटन करते हुए कहा था कि “ आधुनिक भारत के मंदिर का उदघाटन कर रहा हूँ.” बाद में १९५९ व १९६१ में देश के अन्य उर्वरक उद्योगों का विलय करके इसे एक निगम बना दिया गया जिसे FCIL  नाम दिया गया. अमोनियम सल्फेट , यूरिया व अमोनियम नाइट्रेट यहाँ के मुख्य उत्पाद थे. २० हजार से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्द्ध था पर धीरे धीरे उत्पाद की लागत बढ़ने, नवीनीकरण न होने से तथा मिस मैनेजमेंट के चलते (सरकारी उद्यमों की बीमारी रही है) ये कारखाना लगातार घाटे में चलने लगा था और घिसटते हुए सन २००२ में बंद हो गया ; थी उसी तरह जैसे लाखेरी के पड़ोस में सवाईमाधोपुर का डालमिया सीमेंट उद्योग बंद हुआ था. इस पर भी बहुत राजनीति हुई पर उद्योग से जुड़े लोगों ने बड़ी त्रासदी झेली है.

इन कारखाने को पुनर्जीवित करने सं २००७ से ही सार्थक प्रयास हुए पर अब छोटे स्तर पर जीवित करने को २०१९ जनवरी में बेसिक कार्य शुरू हुआ है. इस नए प्रोजेक्ट में इनपुट के लिए हल्दिया से गैस पाईप लाइन डालकर गैस का इस्तेमाल किया जाना है.

इस बीच पुराने कारखाने के बदहाल खंडहरों व मशीनों को तथा आवासीय कालोनी से अवैध कब्जों को हटाने की प्रक्रिया चल रही है. लोग १६ साल बाद फिर से खुशियों के इन्तजार में है.
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सिन्दरी (झारखण्ड ) से



एसीसी सीमेंट प्लांट सिन्दरी की स्थापना सन १९५४ की है, १९९५ के बाद इसे केवल ग्राइंडिंग प्लांट में तब्दील कर दिया गया, अपने दुसरे प्लांट से मंगवाए गए क्लिंकर में आयरन स्लैग व जिप्सम मिलाकर पैक किया जाता है. टाटा स्टील कंपनी से स्लैग की अच्छी उप्लब्धता है. इसकी प्रतिदिन उत्पादन क्षमता ९००० टन बताई गयी है.

प्लांट हेड के कार्यालय में एक बोर्ड पर अब तक के सभी २७ प्लांट हेड्स के नाम हैं. इनमें से दस से अधिक महानुभावों को मैं भी व्यक्तिगत रूप में जानता हूँ क्योंकि ये लोग लाखेरी प्लांट में भी महत्वपूर्ण पदों पर थे.

स्व. पी.वी.धर्माधिकारी १९६० में मेरे इण्टरव्यू लेनेवालों के पैनल में थे, तब वे चीफ कैमिस्ट के पद पर थे दस साल बाद वे शाहाबाद कारखाने में भी मिले, मृदुभाषी, हँसमुख, और हितैषी धर्माधिकारी जी का नाम प्लांट हेड की लिस्ट में देखकर उनका सानिध्य याद आ गया.

मि. एम्.डी.साने सन साठ में प्लांट इंजीनियर थे उनकी धर्मपत्नी श्रीमती साने एसीसी स्कूल में टीचर हुआ करती थी. सर्व श्री एस. आर अय्यर , बी.के. गंगवार ,बी.डब्व्लू. कुवेलकर सभी अपने समय में लाखेरी के चीफ इंजीनियर रहे थे. स्व. पी.बी. दीक्षित १९८५-८६ में प्लांट हेड रहे , पर वे उससे पहले यहां काफी से तक चीफ कैमिस्ट भी रहे थे.  यों बोर्ड पर उन अपनों को देखकर आनादानुभूति हुई है. वर्तमान में श्री सुरेश चन्द्र दुबे यहाँ डाइरेक्टर प्लांट हैं.

स्पोर्ट्स क्लब में घूमते हुए मैंने एक सज्जन से ‘सिन्दरी’ शब्द की व्यत्युत्पत्ति के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बड़ी मजेदार बात बताई कि “यहाँ की मिट्टी लाल (सिंदूरी) है, सिंदूरी का अपभ्रंश सिंदरी है, इसमें कितना तथ्य है मैं कह नहीं सकता हूँ. इन्ही दिनों यहाँ के एक हिन्दी अखबार में समाचार छापा है कि एक बड़े नेता जी ने सिन्दरी को ‘सुन्दरी’ कहा तो श्रोताओं ने खूब आनंद लिया. इसी तरह प्रदेश के झारखंड नाम पर भी लोगों की व्याख्या सुन कर अच्छा लगा की झार या झाड़ का अर्थ पेड़ होता है और ये पूरा राज्य लगभग झाड़ाच्छादित है.

सिंदरी के एसीसी कालोनी में भी इतने घने पेड़ हैं कि ‘वर्षावन’ का अहसास होने लगता है.
क्रमश:
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शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

सबकी माँगू खैर


मेरे २००० से अधिक फेसबुक मित्रों में आदरणीय आर.के.सूरी जी अनन्य हैं, वे एसीसी के बड़े अधिकारी रहे हैं इसलिए मेरा एक ‘फॉर्मल बोंड’ उनके साथ है. वे अकसर अपनी वॉल पर ज्ञानवर्द्धक/ समसामयिक लेख प्रकाशित करते रहते हैं जिसे उत्सुकतापूर्वक पढ़ा जाता है; पर कभी ऐसा भी होता है कि ‘अच्छी किताब व अच्छे इंसान को पहचानने के लिए काफी समय तक पढ़ना पड़ता है.

सूरी साहब ने कुछ साल पहले इसी तरह फेसबुक पर उद्योगपति विजय माल्या की सुबुद्धिमता की बड़ी तारीफ़ की थी. एक दृष्टान्त देकर उन्होंने लिखा कि एक बार अमेरिका से यूरोप की यात्रा के समय माल्या ने अपनी कीमती कार महज  ५०० डॉलर में बैक को गिरवी रखी थी. वापसी पर बैक के अधिकारी ने जब उससे पूछा तो कहा कि कार की सुरक्षित पार्किंग के साथ ५०० डॉलर का व्याज इतना मामूली देना पडा अन्यथा बाहर कार की पार्किंग शुल्क बड़ी रकम के रूप में चुकानी पड़ती. माल्या की व्यावसायिक कुटिलता की राष्ट्र्धातक कहानियां बाद में निरंतर उजागर हुई हैं.

इसी तर्ज पर बलात्कार के आरोपी नामनिहाल सन्त आसूमल उर्फ़ आशाराम की एक वीडिओ क्लिपिंग में मैंने देखा कि स्व.अटल जी, अडवानी जी, नरेंद्र मोदी जी, राजनाथसिंह जी व दिग्विजयसिंह जी जैसे माननीय जन नत मस्तक होकर उनका आशीर्वाद ले रहे थे. आसूमल के पापों का घडा देर से भरा और अंधभक्तों की समझ में उसका असली रूप  बहुत बाद में आया है.

आजकल राजनीति के परिपेक्ष में कीमती धातुओं की मूर्तियाँ बनाने का काम जोरों पर चल रहा है, मायावती जी ने अपने जीतेजी अपनी और स्व. कांसीराम की मूर्तियाँ खडी कर दी , जो इन दिनों लावारिश सी नजर आने लगी हैं.

नेहरू जी व गांधी परिवार ने लम्बे समय तक राज किया इसलिए उनके असंख्य स्मारक देश में हैं लेकिन इसमें उनका अपना कोई दोष नहीं है क्योंकि उनके स्वर्गवास के बाद फालोवर्स ने ये काम किया है. लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद नये रहनुमाओं को ये चुभ रहे हैं. मोदी जी ने गुजरात में ‘सरदार सरोवर’ के स्थल पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की एक बड़ी मूर्ती की स्थापना हाल में की है जो दुनियाँ में सबसे ऊंची बताई गयी है. ‘सरदार सरोवर’ जवाहरलाल नेहरू ने पटेल साहब की स्मृति में बनवाया था. पर ये मूर्ती की स्थापना में कुछ इस तरह की भावना व्यक्त की जाती रही कि नेहरू के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को कमतर आंका जाए. एक समय कांग्रेसी गृहमंत्री सरदार पटेल ने गांधी हत्याकांड के बाद आर.एस.एस.पर प्रतिबन्ध लगाया था, पटेल साहब जब १९४९ में स्वर्गवासी हुए तो आर.एस.एस. ने उनकी अंतिम यात्रा का बहिष्कार किया था, इसलिए ये कहा जा रहा है कि राजनैतिक हित साधना के लिय विशुद्ध रूप से ये प्रेम जागा है. इन बरसों में हमने देखा है कि नरेंद्र मोदी जी नेहरू को गरियाने का कोई मौक़ा नहीं चूकते हैं.  बहरहाल अब ये विराट मूर्ती देश के लिए एक ऐतिहासिक सौगात है, इसके खर्चे-पर्चे व उद्देश्यों पर ना जाकर नकारात्मक ना सोचा जाए तो ही अच्छा है.

मुम्बई में शिव सेना स्व.बाल ठाकरे जी की तथा केंद्र सरकार हिन्द महासागर में शिवा जी की बड़ी मूर्ती लगाने का आह्वान कर चुके हैं.

कल के अखबारों में एक खबर छपी है की मेरठ के एक भक्त नरेंद्र मोदी जी की एक बड़ी मूर्ती लगाने की तैयारी कर रहा है. ये सिलसिला अवश्य अंतहीन है लेकिन विकासशील देश की सद्य प्राथमिकताएं  और भी बहुत हैं.

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बुधवार, 24 अक्तूबर 2018

ये हो क्या रहा है?



एक सज्जन दवा की दूकान से कीड़े मारने की दवा खरीद कर लाये, घर आकर जब उस डिब्बे की खोला तो पाया कि उसमें असंख्य कीड़े कुलबुला रहे थे.

इस दृष्टान्त को आज हम साक्षात देख रहे हैं कि भारत सरकार की निगरानी तंत्र वाली सर्वोच्च संस्था सी.बी.आई. के उच्चाधिकारी आपस में खुलेआम भारी भरकम रिश्वत लेने के आरोप लगा रहे हैं; इनमें से कुछ पर सत्ताधारियों की नजदीकियां जग जाहिर हैं.

इसमें दो राय नहीं हैं कि देश का पूरा पुलिस तंत्र इस सापेक्ष में हमेशा बदनाम रहा है और सत्ता पर काबिज राजनेता इनका भरपूर उपयोग अपने हितों में करते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एक से अधिक बार सी.बी.आई. को सरकारी तोता तक कहा है.

यह भी सही है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौरान जिस पत्थर को पलटो उसके नीचे भ्रष्टाचार के कीड़े नजर आने लगे थे, पिछले २०१४ के आम चुनावों में ये मुख्य मुद्दा बना था और लोगों ने भारी बहुमत से नई सरकार को जिम्मेदारी सौंपी थी. हमारे प्रधानमंत्री जी ने देश व विदेश में कई मौकों पर कहा कि अब उनके राज में कोई घोटाला नहीं हो रहा है उन्होंने एक बड़ा जुमला भी फैंका था कि ‘ना खाऊँ, ना खाने दूगा’ पर हकीकत में ये महज चुनावी गालियाँ बनकर रह गयी. बड़े बड़े बैंक घोटाले उजागर हुए हैं, जिन पर ज्यादातर गुजराती तड़का लगा हुआ है.

नजदीकी लोगों को बेशुमार फायदा पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री जी का नाम राफेल जैसे विवादास्पद विमान सौदे में लिया जा रहा है, सरकार द्वारा इसकी असलियत नहीं बताये जाने से आम लोगों के मन में गंभीर संशय पैदा होना स्वाभाविक है.

जोर-शोर से कोई बात बोल देने से झूठ सच नहीं हो सकता है तथा एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते है, ये पुरानी कहावत है.

आज प्रिंट मीडिया व इलैक्ट्रोनिक मीडिया अकसर सत्य से परे विरुदावली गा रहे हैं ऐसे में कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि ये हो क्या रहा है?

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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

आरक्षण - जिंदाबाद / मुर्दाबाद.



हिन्दू समाज में पौराणिक काल में जो वर्ण व्यवस्था तय की गयी थी वह २० वीं सदी तक आते आते विकृत होकर कोढ़ बन गयी थी. इसीलिये समाज को बांटने वाली इस परम्परा के विरुद्ध समाज सुधारकों, अग्रगण्य लोगों व कानूनविदों ने आवाज उठाई. देश आजाद हुआ और अपना संविधान बना तो उसमें सभी बर्गों के लोगों की समानता के लिए अनेक कानूनों की व्याख्या दी गयी. दलित व पिछड़ी जातियों के लोगों को ऊपर लाने के लिए कई तरह से सुविधाओं में आरक्षण दस बर्षों के लिए घोषित किये गए, जिनके अनुसार इन वर्गों के समस्त लोगों को पढाई में कम अंकों में उतीर्ण करने, स्कूल फीस में भारी छूट, अनेक वजीफे, तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अलावा सभी संवैधानिक व लोकतांत्रिक संस्थाओं के पदों में अनुपातिक आरक्षण दिया गया और इसके बहुत अच्छे सकारात्मक परिणाम आये भी. इन पिछड़े वर्गों प्रबुद्ध पढ़े लिखे लोग बराबरी या बराबरी से भी ऊपर निकलते रहे. पिछली सरकारों ने इस आरक्षण व्यवस्था को कई बाए फिर फिर बढाया भी. कुछ राज्य सरकारों ने दलित व अनुसूचित जन जातियों के अपने कर्मचारियों को प्रमोशन में भी प्राथमिकता का नियम बनाया. फलत: इस वर्ग में एक ‘क्रीमी लेयर’ अलग से बन गयी. ये भी सच है कि एक बहुत बड़ा तबका अज्ञानता की वजह से आज भी वहीं है जहां आजादी के समय था. जाग्रति जरूर आई लेकिन दुर्भाग्य ये रहा कि इन दलित जातियों व आदिवासियों के अपने अन्दर से ठेकेदार उभरकर सामने आये, नतीजन आरक्षण का भरपूर लाभ कुछ ही लोगों तक सीमित रहा है

इधर नामनिहाल गरीब सवर्णों में व अन्य धर्मावलम्बी गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से असंतोष घर करता रहा है. दलितों के मुकाबले तमाम सुविधाओं में निरंतर उपेक्षा किये जाने के कारण हार्ट बर्निंग  व  आपसी टकराव होते रहे हैं. इसी के परिणाम स्वरुप  राजस्थान में ‘गुर्जर आन्दोलन’ , हरियाणा में ‘जाट आन्दोलन’, गुजरात में ‘पटेल आन्दोलन’ जैसे घमासान हुए हैं और आज भी उनकी आग ठंडी नहीं हुई है.

आरक्षण के बरदान स्वरुप दलित व पिछड़ी जातियों की जो पीढियां सम्रद्धि व पद पाकर ऊपर आ चुके हैं वे अब इसे जन्मजात हक़ समझकर छोड़ना नहीं चाहते हैं, सभी राज नैतिक दलों में इनकी लाबियाँ प्रबल हैं इसलिए चाहते हुए भी कोई दल रिस्क नहीं लेना चाहता है कि ये वोट बैक उनसे टूटे.

आज जब देश के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, अनेक राज्यपाल, अनेक मंत्रीगण व नौकरशाह आराक्षित वर्गों के ही  विराजमान हैं तो ये उम्मीद करना कि ये आरक्षण में कोई  परवर्तन लाने की दिशा में सोचेंगे या कार्य करेंगे एक दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं होगा.

ये भी सच है की इस तरह की आरक्षण व्यवस्था दुनिया के किसी देश में नहीं है तथा आरक्षण के फलस्वरूप योग्य व्यक्तियों के पिछड़ने से एक बड़ी सामाजिक कुंठा पैदा हो रही है जो नए वर्ग संघर्ष का रूप ले सकता है. ऐसे में देश के सर्बोच्च न्यायालय ने इस जातिगत आरक्षण पर अपने फैसले में कुछ आवश्यक सुधार किये थे ; जैसे कि जाति सूचक आक्षेप पर बिना जांच पड़ताल के गैर जमानती  गिरफ्तारी ना की जाए, क्योंकि पिछला इतिहास बताता है ऐसे ७० से ८० प्रतिशत मामले झूठे निकले हैं.(हाल में नोयडा में एक दलित एस.डी.एम्. द्वारा बुजुर्ग कर्नल को अपमानित करने के लिए इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया जिसकी कलई बाद में खुल गयी है.) प्रमोशनों में योग्यता/ बरिष्ठता को आधार माना जाए नाकि जातिगत योग्यता. इस पर हो-हल्ला व सडकों पर आन्दोलन होने लगे तो वर्तमान सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके सर्बोच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करने की जो गलती की है उसका दुष्परिणाम लम्बे समय तक देश को भुगतना पडेगा.

अब सवर्णों में जबरदस्त उबाल है, जो लोग कल तक मोदी जी के अंधभक्त थे उनमें से कई ने अपने जहरीले उदगार व्यक्त किये हैं. एक पंडित जी ने फेसबुक पर यहाँ तक लिखा है कि “बीजेपी के लिए वोट का बटन दबाने में मुझे अब ऐसा लगेगा की मैं अपने बच्चों का टेंटू दबा रहा हूँ.” नाराज लोग ‘नोटा’ की सलाह भी दे रहे हैं, पर ये समस्या का कोई हल नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निरस्त करने का कलंक मोदी सरकार पर रहेगा, निश्चय ही इसका नुकसान उनकी पार्टी को उठाना पडेगा.

सबसे अच्छा ये होता कि आरक्षण पूरी तरह आर्थिक विपिन्नता तथा व्यक्तियों की विकलांगता को आधार मान कर तय किया जाता. ये लक्षण भी अच्छा है कि प्रबुद्ध लोग इस विषय को गंभीरता से ले रहे हैं और बहस जारी है.

आज मेरे इस लेख के समापन से पूर्व एक खबर ये भी एक टी.वी. चेनल द्वारा प्रसारित की है कि गुजरात हाईकोर्ट ने सभी जातिगत आरक्षण समाप्त करने पर एक महत्पूर्ण निर्णय दिया है. इसकी पड़ताल अभी बाकी है.

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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

आदरणीय अटल जी के नाम :



आप भी उस देश चले गए हैं जहां से ना कोई चिट्ठी ना कोंई सन्देश आते हैं. आपने अपनी एक रचना में लिखा है कि “मैं फिर से आऊँगा....” पर मैंने तो आपके मोक्ष की कामना की है ताकि आप जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाओ. वैसे अब ये धरती आप जैसे धर्मसहिष्णु व सर्वजन हिताय भावना के चाहने वालों के लायक रही भी नहीं है.

मैं अनुभव कर रहा हूँ की आपके अवसान के बाद लोग आपकी मौत को अपने पक्ष में भुनाने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं. तमाशों व हँसी ठठ्ठों के बीच आपकी राख को उन जगहों पर नदी-नालों में विसर्जित किया जा रहा है जहां डालने का कोई महत्व नहीं है. हमारे उत्तरांचल में अवशेष उन्ही जगहों पर विसर्जित किये जाते हैं जहां का जल गंगा नदी तक पहुचता है. अन्यथा सीधे गंगा में अर्पित किये जाते हैं.

कोटा के एक वकील स्वनामधन्य श्री दिनेश द्विवेदी जी (मेरे फेसबुक मित्र) ने चम्बल के श्मशान घाट में अस्थिविसर्जन पर सही अंगुली उठाई है. उन्होंने आपकी मृत्युपरांत फेसबुक पर एक लतीफा मुल्ला नसरुद्दीन ( a wise man) के बारे में डाला था , मुझे उसका गूढ़ अर्थ बार बार हाँट करता आ रहा है. उस लतीफे को मैं पुन: अपने शब्दों में लिख रहा हूँ लेकिन मैं निवेदन भी करना चाहता हूँ कि इसे सीधे सीधे अपने सम्बन्ध में बिलकुल ना लें. लतीफा इस प्रकार है:

एक थे फन्नेखां लम्बरदार, वे तब की सियासत के बड़े लम्बरदार थे, उनके गाँव के लोगों ने मिलकर उनको लंबरदारी से हटवा दिया था क्योंकि उसकी फकत लफ्फाजी से व उनकी औलादों/ कारिंदों के अत्याचारों से सब दुखी थे. एक दिन लम्बरदार जी खुदा को प्यारे हो गए तो दफनाने के लिए खानदानी कबरिस्तान में ले जाये गए. धार्मिक नियम के अनुसार उनको जमींदोज करने से पहले उनके बारे में कुछ अच्छे शब्द बोले जाने थे पर लोग थे कि सबके मुंह में दही जम गया. मौलवी साहब ने वक्त की नजाकत देखते हुए पड़ोसी गाँव से मुल्ला नसुरुद्दीन  को बुला भेजा, मुल्ला नसुरुद्दीन सारा माजरा समझ गए और कार्यक्रम को आगे बढाते हुए बोले “ लम्बरदार साहब अपनी औलादों के मुकाबले ‘बहुत अच्छे’ थे”. ऐसा कहते ही कब्र पर मिट्टी डालनी शुरू हो गयी. पता नहीं लम्बरदार जी को जन्नत नसीब हुयी या नहीं पर उनकी औलादें जश्न मनाने में व्यस्त ही गयी क्योंकि रोकाने-टोकने वाला कोई  ना रहा था.

ज़माना सब देख रहा है, समझ रहा है पर आपके जाने का गम / भय उन लोगों को ज्यादा सता रहा है जो मानते थे कि ‘एक सही आदमी गलत पार्टी में’ था. (आपके लोकसभा में दिए गए एक भाषण से साभार).

आपने ये भी लिखा है कि ‘मर्जी से जिऊँ और मन से मरूं’ लेकिन आपकी मृत्यु पर एक वारिस का कहना है कि “अटल जी ने जाने का गलत टाईम चुना, उनको अगले साल उत्तरायण तक भीष्म पितामह की तरह सर शय्या पर रहना चाहिए था तब उनकी अंतिम यात्रा और कलश यात्राएं ज्यादा भव्य होती.” उसने अफसोस जाहिर किया कि अपने देश की अधिसंख्य जनता की याददाश्त महज पंद्रह दिन होने से उनके चपाटों को सम्पैथी वोट लोकसभा के चुनावों में शयद ही मिल पायेगा.

अंत में, जो ये कहते हुए सुने गए थे “मैं आपको ‘बड़ा’ इसलिए दीख रहा हूँ कि अपने बुजुर्गों के कन्धों पर सवार हूँ,” वे आपके अवसान के बाद जमीन पर आ गए हैं. खुदा खैर करे.
मैं हूँ आपका एक प्रशंसक.


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रविवार, 12 अगस्त 2018

हेल्थ टिप - (७)



दवाईयाँ – हमारी ये दुनिया अनेक विविधताओं से बनी है, देश, काल व परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग जगहों पर मानव संस्कृतियों का विकास हुआ तदनुसार ही चिकित्सा पद्धतियों का जन्म भी होता रहा है. १९ वीं २० वीं सदी तक आते आते विज्ञान के प्रादुर्भाव का असर भी सभी पद्धतियों पर पडा है.

हमारे देश भारत में आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा के रूप में विकसित हुआ जिसमें हर्बल यानि वानस्पतिक जडी-बूटियों व धातुओं की भस्मों को दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है; इसी प्रकार यूनानी चिकित्सा पद्धति  की अपनी पुरानी पहचान है, चीन – जापान की इसी तरह की अपनी दवाएं होती हैं. कुछ सदी पहले जर्मनी में होम्योपैथिक पद्धति ने जन्म लिया जिस पर दुनिया के अनेक लोग विश्वास किया करते हैं. पर दुनिया भर में आज सबसे विश्वसनीय एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति मानी जाती है क्योंकि इसका विकास शुद्ध वैज्ञानिक शोधों पर आधारित है इसमें कैमिकल औषधियों द्वारा प्रतिरोधात्मक शक्तियों को इलाज के लिए प्रेरित किया जाता है तथा सर्जरी द्वारा इसमें क्रान्ति लाई गयी. एक्स रे व लेजर टेकनीक से अब असीमित संभावनाएं इस पद्धति में विकसित हो गयी हैं. ये शोध निरंतर जारी हैं.

यद्यपि मरे हुए को ज़िंदा करना यानि अमरता की परिकल्पना अभी वैज्ञानिक उपलब्धि से बहुत दूर है पर अब लोगों की समझ में आ गया है की टोनों- टोटकों या झाड फूक का ज़माना अब नहीं रहा है. हाँ अभी भी बहुत से अंधरे कोने बचे हैं जहां अभी तक प्रकाश की किरणें नहीं पहुच पाई हैं.

वैसे प्रकृति ने हमारे शरीरों में रोग प्रतिरोधात्मक शक्तियां स्वयं प्रदान की हुयी हैं, एक विचारक ने लिखा है कि ९५% बीमारियाँ हवा पानी औए इम्युनिटी से ठीक हो जाती हैं, शेष ५% को इलाज की जरूरत होती है उनमें भी केवल ३% ठीक हो पाते हैं बाकी असाध्य ही रहते हैं या यमराज की भेट चढ़ जाया करते हैं.

कैमिकल औषधियां तुरत-दान असर तो करती हैं पर इनके साईड इफेक्टस बहुत रहते हैं, इसलिए इनके उपयोग के लिए अनेक क़ानून बनाए गए हैं विशेषकर जो शेड्यूल्ड ड्रग्स हैं उनका उपयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए, योग्य चिकित्साधिकारी की सलाह पर ही लेनी चाहिए. एक जरूरी बात सभी पाठकों को कहना चाहूंगा कि अपने शरीर को कम से कम मेडीकेट किया जाए तो ही अच्छा है. मजबूरी में ही दवा खानी चाहिए.

एक समय था जब मेडीकल प्रोफेसन को सेवा का प्रोफेसन कहा जाता था, आज इसका बाजारीकरण हो गया है, पैसा बड़ा फैक्टर हो गया है चाहे मरीज की जान चली जाए. एक सर्वे के अनुसार ये भी बताया गया है कि लोग बीमारियों से कम, दवाओं के गलत प्रयोग से ज्यादा मर रहे हैं. इस सन्दर्भ में एक बुजुर्ग का बयान मजेदार है : पत्रकार ने उनसे उनके स्वस्थ लम्बे जीवन का राज पूछा “क्या आप डाक्टर के पास जाते हैं?” उन्होंने कहा “हाँ भाई, डाक्टर की तो हमेशा जरूरत रहती है इसलिए उसके पास जाना ही पड़ता है.” पत्रकार “फिर क्या करते हैं?” उत्तर “ फिर फार्मासिस्ट के पास जाता हूँ, उसको भी तो ज़िंदा रखना है.” पत्रकार फिर “बहुत सारी टैबलेट व कैप्स्यूल देता है जिनको लेकर घर आ जाता हूँ.” पत्रकार “आप सारी दवाएं खा लेते हो?” उत्तर “ नहीं भाई, मैं उन सभी गोली कैप्स्यूल्स को डस्टबिन में डाल देता हूँ क्योंकि मुझे भी तो ज़िंदा रहना है.”

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गुरुवार, 9 अगस्त 2018

हेल्थ टिप - (६)



खांसी – मुझे आज से लगभग ५५ साल पहले लाखेरी सीमेंट कारखाने में कार्यरत स्व. पंo रामकिशोर शर्मा द्वारा एक लम्बी रचना ‘राजा और रानी’ शीर्षक से लिखकर हमारी गृह पत्रिका ;लाखेरी सन्देश’ में छपने को दी थी, जो छपी भी थी. मेरे पास अब वह रचना तो मौजूद नहीं है पर उसकी एक पंक्ति मुझे याद है :
हांसी सब झगड़ों की रानी, खांसी सब रोगों की रानी.
अर्थात खांसी मामूली बीमारी नहीं होती है. वैसे खांसना व छींकना हमारे शरीर की डीफेंस सिस्टम के पर्याय होते हैं; पर यहाँ जिस खांसी की चर्चा की जा रही है उसका आशय ‘क्रोनिक खांसी’ से है. यों सर्दी-जुकाम के बाद, मौसम परिवर्तन के समय गले में एलर्जी होने पर खांसी की शिकायत आम होती है पर यदि खांसी लम्बे समय से परेशान कर रही हो तो चिंता की बात होती है.

हमारी श्वास नली (ब्रोंकल पाइप) में बलगम / कफ चिपकने से खांसी होने लगती है खतरनाक तब हो जाती है जब उसमें कोई बैक्टीरियल संक्रमण हो जाए और अन्दर फेफड़ों यक पंहुच जाए. इस हालत में उसे हल्के नहीं लेना चाहिए.

डस्ट में काम करने वाले लोगों के श्वसन में डस्ट सीधे फेफड़ों तक जा सकता है इसलिय अच्छे किस्म के मास्क पहनने चाहिए.

खांसी में बलगम की बहुतायत होने पर तथा साथ में बुखार की शिकायत होने पर (विशेषकर दोपहर बाद बुखार चढ़ता हो) तो खून की जांच व एक्स रे करवाकर मालूम किया जाना चाहिए कि कहीं टी.बी. प्लूरासी या ट्यूमर तो उसका कारण नहीं है? आजकल इन बीमारियों का ईलाज बिलकुल संभव हो गया है बशर्ते की सही डाईग्नोसिस हो गया हो और दवाओं की पूरी डोज ली जाए.

छोटे बच्चों में हूफिग कफ (कूकर खांसी) एक वायरस द्वारा फैलता है, आवश्यक परहेज तथा दवा से कंट्रोल में आ जाता है.

एक जरूरी बात मैं खांसी के रोगियों को कहना चाहता हूँ कि खांसते वक्त रूमाल अवश्य इस्तेमाल करें तथा अपने बलगम को जहां तहां ना थूकें . राख या मिटटी के डिब्बे में थूकें जिसे बाद मिट्टी में दबा दें.

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बुधवार, 8 अगस्त 2018

हेल्थ टिप - (५)



पेशाब में जलन – हमारे शरीर में अनेक रासायनिक संयोग हैं, प्रमुखतया इनको दो भागों में बांटा जा सकता है (१)  ऐसिडिक यानि अम्लीय (२) अल्क्लाईन यानी क्षारीय. जब भी हमारे खान-पान में इनका बैलेंस बिगड़ता है हम बीमार पड जाते हैं. पेशाब हमारे शरीर का तरल वेस्ट होता है जिसे गुर्दे (किडनी) खून में से छान कर बाहर का रास्ता बताते हैं. पेशाब में जलन के तीन मुख्य कारण होते हैं :

(१)         ऐसिडिक पेशाब में यूरिक ऐसिड क्रिस्टल्स , कैल्शियम आक्ज्लेट्स आदि बारीक कण ट्रेक पर चुभते हुए, छीलते हुए निकलते हैं तो जलन महसूस होती है; गरम मसाले, लाल मिर्च, पेन किलर् दवाएं, अल्कोहौलिक ड्रिंक्स सभी ऐसिडिक होने से कारक होते हैं. डिहाईड्रेसन यानि शरीर में पानी की कमी होने पर भी ऐसिडिटी बढ़ जाती है. इसलिए पर्याप्त पानी पीते रहना चाहिए. खीरा-ककडी, तरबूज जैसे फल सेवन करने चाहिए. अचार या इस तरह के खट्टे तेजाबी पदार्थों से परहेज करना चाहिए. मेडीकल स्टोर्स पर रेडीमेड अल्क्लाईंन योगिक वाली दवाइयाँ अलग अलग नामों से उपलब्ध रहती हैं जिनको पानी में मिलाकर पीने से तुरंत राहत मिलती है. नीम्बू पानी, खाने का सोडा, फ्रूट साल्ट का उपयोग भी आराम दे देता है.
(२)         गुर्दों में पथरी से घाव हो जाने पर, चोट लगने पर, या अन्य कारणों से संक्रमण हो जाता है,जो पूरे मूत्रमार्ग में फ़ैल जाता है; एलोपैथी में इसे नेफ्राईटिस / UTI  कहा जाता. पथरी की लाक्षणिक चिकित्सा (दवाओं से या सर्जरी द्वारा) करने के साथ ही एंटीबायोटिक्स द्वारा ईलाज किया जाता है. पर ये सब सक्षम चिकित्साधिकारी द्वारा ही संभव होता है. आजकल इस विषय के विशेषज्ञ urologist  लगभग सभी शहरों में उपलब्ध होते हैं उनकी सेवाओं का लाभ लिया जाना चाहिए.
(३)         असुरक्षित यौन संबंधों के कारण VD  यानि गन्होरिया-सिफलिस आदि खरनाक यौन रोग यूरिनरी ट्रेक तथा टिस्यूज को सक्रमित करते हैं जिसका कोई घरेलू ईलाज भी नहीं है. स्वच्छंद यौनाचारी/बैश्यागामी लोग इस भयंकर बीमारी की अपने घर-परिवार तक खुद ही पहुचाते हैं. इसका उपचार लंबा होता है, क्वालीफाईड डाक्टरों से ही  कराना चाहिए.

पेशाब में जलन के लिए उक्त तीनों कारकों के अलावा भी अन्य कारण हो सकते हैं, यदि दुर्भाग्य से ऐसी कोई शिकायत हो जाए तो छुपानी नहीं चाहिए और इलाज में कोताही नहीं बरतनी चाहिए. अब मेडीकल साइंस बहुत एडवांस हो चुका है कोई भी बीमारी लाइलाज नहीं है.

नोट: मेरे ये हेल्थ टिप सीरीज केवल अपने पाठकों की जानकारी हेतु शुरू की गयी है, ये कोई चिकित्सकीय परामर्श नहीं है. आपकी प्रतिक्रया का स्वागत होगा.

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मंगलवार, 7 अगस्त 2018

हेल्थ टिप - (४)



बहुमूत्र – ये बहुधा बुढापे का रोग है पर किसी को किसी भी उम्र में हो सकता है. इसका मुख्य कारण गुर्दों का अतिशय सक्रिय रहना है. मधुमेह (डाईविटीज) के रोगियों के पेशाब में शर्करा ज्यादे मात्रा में निस्तारित होती है जिससे पेशाब का वजन (ग्रेविटी) बढ़ जाता है जिसे मूत्राशय बर्दाश्त नहीं कर पाता है, थोड़ा सा भी जमा होने पर पेशाब की हाजत होने लगती है. पुरुषों में इसका एक विशेष कारण प्रोस्टेट ग्रंथि के एनलार्ज होना है पूरा पेशाब एक बार में बाहर नहीं आ पाता है इसलिए बार बार बाथरूम जाना पड़ता है. विशेष कर रात में कई बार उठना पड़ता है.

प्रोस्टेट की तकलीफ में योग्य चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए. दवाओं से या सर्जरी (आजकल लेजर टेक्नोलाजी से आपरेशन किये जाते हैं, जिसमें मरीज को कष्ट बहुत कम होता है) से इलाज संभव है. प्रोस्टेट में कभी कभी कैंसर का खतरा भी होता है इसके लिए आजकल पहले ही खून की  जांच  P.S.A. (प्रोस्टेट स्पेसल एंटीजन) किया जाता है. पहले  समय में कैंसर की जांच आप्रेसन के बाद बायोप्सी से होती थी जो पोजीटिव होने पर बाद में लाईलाज हो जाता था. अभी दवाओं पर जोरशोर से रिसर्च भी जारी है. घबराने जैसी कोई बात नहीं है पर दुर्भाग्य से ऐसी शिकायत हो गयी हो तो नीम हकीमी इलाज नहीं कराना चाहिए.

आयुर्वेद में बहुमूत्र के लिए कुछ विशिष्ट दवाएं प्रयोग में लाई जाती हैं, इस सम्बन्ध मैं हाल में इंटरनेट पर पढ़ रहा था तो ‘बहुमूत्र’ सर्च करने पर यु ट्यूब पर आचार्य बालकृष्ण जी की वार्ता आ रही थी जिसमें उन्होंने बहुमूत्र के लिए गोक्षुरादिगुग्गुल व गुड+काला तिल का प्रयोग गुणकारी औषधि के रूप में बताई है. इंटरनेट पर इस बारे में और भी बहुत सी जानकारियाँ हासिल की जा सकती हैं.

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सोमवार, 6 अगस्त 2018

हेल्थ टिप - (३)



व्यायाम – परमात्मा ने मनुष्य शरीर की मशीनरी को इस तरह से रचा है कि जीवित अवस्था में सारे पुर्जे आटोमेटिकली काम करते रहते हैं.जहाँ जरूरी हुआ वहाँ स्पेयर पार्ट भी दे रखे हैं और टूट फूट होने पर स्वत: पुन:र्निर्माण की व्यवस्था भी की गयी है. यदि आलस्यबस  शरीर को निष्क्रिय छोड़ दिया जाए तो अन्दर जंग लगाने लगता है और जाम हो जाता है और उम्र घट जाती है.

जो लोग शारीरिक श्रम नहीं करते हैं उनके लिए व्यायाम करना आवश्यक है, व्यायाम यानि कसरत (शारीरिक + मानसिक व्यायाम को योगाभ्यास कहा जाता है) व्यायाम शरीर के अंदरुनी अवयवों, जोड़ों, व इन्द्रियों को सक्रिय रखने में मदद करता है. इसका उद्देश्य ये है कि जब तक जिओ स्वस्थ/सुखी रहो.

उम्रदराज लोगों के लिए सबसे सहज व्यायाम घूमना फिरना बताया गया है. एक सुन्दर सा दृष्टांत मैं अपने पाठकों को सुनाना चाहता हूँ कि एक ९५ वर्षीय स्वस्थ व्यक्ति से जब किसी ने पूछा की उनके उत्तम स्वास्थ्य का क्या राज है? तो उन्होंने बताया “मैं अपनी शादी के समय पत्नी से एक शर्त हार गया था, शर्त के अनुसार मुझे रोजाना ५ किलोमीटर पैदल चलना था ; सो पिछले ७० बर्षों से मैं उस शर्त पर बंधा हुआ हूँ. यही मेरे फिटनेस का राज है.” उनसे जब पूछा गया कि”आपकी ९० बर्षीय पत्नी भी स्मार्ट लगती है?” तो उन्होंने हंसते हुए कहा “ अरे, वह नित्य मेरे पीछे पीछे ये चेक करने के लिए चलती रहती है कि मैं ५ किलोमीटर चलने की शर्त निभाने में बेईमानी तो नहीं करता हूँ”.

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रविवार, 5 अगस्त 2018

हेल्थ टिप - (२)



स्किन इन्फेक्सन – बरसात के दिनों में गंदे पानी, कीचड या गोबर के संपर्क में पैरों के आ जाने से अनेक लोगों के पैरों की अँगुलियों के बीच दुखदाई खुजली हो जाया करती है, ये इस हद तक बढ़ सकती है कि वहाँ पर की चमड़ी गलने लगती है. जो लोग नंगे पैर रहते हैं अथवा गंदी चप्पलों का इस्तेमाल करते हैं उनको ये तकलीफ ज्यादा हुआ करती है. (सावधाने के लिए दूसरे लोगों की चप्पल गलती से भी नहीं पहननी चाहिए.)

मैं समझता हूँ कि हमारे देश में शहरी लोगों से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों को इस बीमारी का खतरा रहता है. थोड़ी सी जागरूकता व सावधानी बरतने पर इस से बचा जा सकता है. पैरों की अँगुलियों के बीच कोई भी तेल या वैसलीन लगाई जा सकती है, मेडीकल स्टोर्स पर एंटी फंगल पावडर या क्रीम उपलब्ध रहते हैं पैरों की ठीक से सफाई करके इनका उपयोग किया जाना चाहिए. हल्के डीटाल के घोल से अथवा फर्श साफ़ करने वाले फिनायल के पानी मिले घोल से धो लेने पर तुरंत लाभ मिल जाता है. बोरोप्लस, बैट्नोवेट्-सी, इच गार्ड  जैसे मरहम भी लाभकारी होते हैं.

अगर दुर्भाग्य से नाखूनों के अन्दर तक फंगल का असर हो जाए तो अवश्य किसी डरमाटोलाजिस्ट (चर्मरोग विशेषज्ञ) की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि ये आसानी से ठीक नहीं होता है.
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शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

हेल्थ टिप (१)



मुँह में बदबू - अगर आप को भी इस बीमारी की शिकायत है तो कृपया इसे ध्यान से पढ़िए. शरीर सुन्दर दीखता हो, श्रगारिक और आकर्षक हो लेकिन अगर आपके मुंह  से सड़ी बदबू आती हो तो सामने वाले को कैसा लगत़ा होगा कल्पना कीजिये.

जो लोग कुछ भी खाने के बाद मुंह की ठीक से सफाई नहीं करते है उनको ये भयानक बीमारी हो जाती है. अन्नकण सड़ने पर दांतों के इर्दगिर्द बैक्टीरिया को जन्म देते हैं जो कोमल मसूड़ों पर हमला करके नुक्सान पहुचाते रहते हैं. बचपन से ही बच्चों को इस बारे में सीख दी जानी चाहिए क्योंकि एक बार जब मसूड़े सडने-गलने लगते हैं तो दुबारा नार्मल स्थिति में मुश्किल से आ पाते हैं. दन्तक्षय के अलावा इसका सीधा प्रभाव पाचनक्रिया पर भी पड़ता है. पायरिया या इसी प्रकार के मसूड़ों के रोगियों को हार्ट संबंधी समस्या होने के खतरे भी बढ़ जाते हैं.

पहले जमाने में प्रबुद्ध लोग नींम, बबूल ,तिमूर या दातून से मुंह साफ़ किया करते थे, आजकल बाजार में सैकड़ों किस्म के टूथपेस्ट अथवा मंजन उपलब्ध रहते हैं, फिटकिरी युक्त लाल दन्त मंजन घर पर बनाए भी जा सकते हैं. कैमिकल से तैयार माउथवाश हर मेडीकल स्टोर पर मिल जाते हैं. अगर जागरूकता हो तो कोई भी व्यक्ति अपने मुंह की बदबू से निजात पा सकता है.

कुछ भी खाईये पर तुरंत मुंह साफ़ जरूर कीजिये. खाली ब्रश फिराईये तो भी आपको मदद मिलेगी. एक बार अगर बीमारी लग गई हो और आप कोशिश करके भी निजात नहीं पा रहे हों तो किसी फिजीशियन को बताने  में बिलकुल संकोच ना करे. इसे गंभीरता से लेना चाहिए.

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शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

सावधानी रखिये



अभी हाल में अखबार में एक समाचार छापा था कि गुरुग्राम (हरियाणा) में एक परिवार के दो छोटे बच्चे रात को दूध पीकर सोये थे जो सुबह मृत पाए गए. अनजान  कारण की खोज करने पर पाया गया कि फ्रिज में रखे हुए दूध के बर्तन में एक जहरीले सांप का मरा हुआ बच्चा था, ये सांप का बच्चा कहाँ से आया होगा?  इस बारे में तफसील से जांच करने के बाद ये मालूम हुआ कि उसी फ्रिज में हरी पत्तियों वाली सब्जी भी रखी गयी थी, जिसके साथ सांप का बच्चा भी आ गया होगा और रेंगते हुए दूध के बर्तन में जा गिरा होगा. ये असावधानी पीड़ित परिवार के लिए बड़ी त्रासदी बन कर रह गयी.

बरसात के दिनों में ऐसे बहुत से विषैले कीट हरी सब्जियों में छुपे रहते हैं, इसीलिये इन दिनों में हरी पत्ती वाली सब्जियों को खाना बर्जित कहा गया है. थोड़ी सी असावधानी बड़े दुःख का कारण बन सकता है. खाने-पीने की वस्तुओं में बाहरी प्रदूषण तो हानिकारक होए ही हैं पर जहरीले कीट व नालियों में छुपे हुए काक्रोच भी बीमारियों के कारक हुआ करते हैं. रसोई में अकसर घरेलू छिपकली घुस आती है, इन्ही दिनों वह ओने-कोनों में अंडे-बच्चे भी दिया करती है. कहते हैं कि छिपकली द्वारा काटे जाने पर जहर नहीं लगता है लेकिन इसकी त्वचा में जहरीला पदार्थ होता है. इस कारण भी अनेक दुर्धटनाएं हुआ करती हैं. अत: भोज्य पदार्थों को हमेशा ढककर रखना चाहिए.

अगर आप अपने जूते घर के बाहर बरामदे रखा करते हैं तो उनको पहनने से पहले सावधानीपूर्वक चेक कर लें कि उनके अन्दर जहरीली मकडी, बिच्छू, मिलीपैड, सांप या अन्य कोई खतरनाक कीड़ा ना छुपा हो.

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मंगलवार, 10 जुलाई 2018

यादों का झरोखा -२९ स्व. कांतिप्रसाद गौड़. (अध्यापक)



सन १९६१-६२ में लाखेरी एसीसी मिडिल स्कूल में करीब एक दर्जन जूनियर टीचर्स भरती किये गए थे, तब ये स्कूल हेडमास्टर स्व. गणेशबल भारद्वाज जी के नेतृत्व में अपने चरमोत्कर्ष पर था लगभग ३५ अध्यापक व ३२०० विद्यार्थी इससे सम्बद्ध थे. बूंदी जिले का ही नहीं पूरे राजस्थान प्रांत में ये एक उत्कृष्ट प्रतिष्ठान के रूप में जाना जाता था. इन एक दर्जन टीचर्स में शम्भूप्रसाद वर्मा, देवकिशन वर्मा, अत्तरसिंह, उदयसिंह जग्गी, शमशुद्दीन व कांतिप्रसाद गौड़ आदि थे.

स्व. कांतिप्रसाद के जीजा स्व, दयाकिशन शर्मा माइंस में सुपरवाइजर हुआ करते थे, दयाकिशन जी के बड़े भाई स्व. नंदकिशोर भारतीया भी तब क्वारी में क्लर्क के पद पर थे, बाद में विभागीय परिक्षा पास करके फोरमैन बने थे; रिटायरमेंट के समय वे कैमला माइंस में कार्यरत थे. ८० के दसक में दयाकिशन शर्मा रिजाइन करके ऊंचे पद+वेतन पर मिर्जापुर चले गए थे. अपने इन्ही रिश्तेदारों के स्रोत से कान्तिप्रसाद लाखेरी आये थे.

स्व. कांतिप्रसाद से मेरी नजदीकी तब हुयी जब वे सन १९७५ में यूनियन के चुनावों में अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में चुन कर आये थे और उनको संगठन का ट्रेजरार बनाया गया था और उन्होंने इसे बखूबी निभाया भी. वे बहुत दिलेर व स्पष्टवादी व्यक्ति थे, आपातकाल/ संकटकाल में उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया. बाद में जब कंपनी द्वारा स्कूल का पराभव किया जाने लगा तो उन्होंने भी VRS  ले लिया और अपने गाँव (जिला बुलंद शहर) चले गए. उनके तीन बेटे थे सबसे बड़े संतोष उर्फ़ धीरेन्द्र कौशिक (अब स्वर्गीय) कैमोर इन्जीनियरिंग इंस्टीच्यूट से टेकनीशियन कोर्स करके गागल फैक्ट्री में पोस्टिंग में आ चुका था. सर्विस में रहते हुए ही उसका विवाह भी कर दिया था, बारात सवाईमाधोपुर रेलवे कालोनी में गयी थी, मैं भी उसमें शामिल था.

समय अपनी गति से भागता रहता है और हम लोग गुजर गए लोगों को धीरे धीरे भूलते चले जाते हैं. सं १९९७ में धीरेन्द्र ने खुद प्रयास करके लाखेरी स्थानातरण करवा लिया वह अपनी पत्नी तथा दो बच्चों के साथ सामान सहित सीधे मेरे क्वाटर G-23 में आ धमाका था क्योकि मैनेजमेंट ने इसी शर्त पर उसका स्थानान्तरण स्वीकार किया था कि क्वाटर नहीं दिया जाएगा (नए कारखाने के निर्माण के लिए बाहर से आये बहुत लोग लाखेरी में थे).

मैं तब यूनियन प्रेसिडेंट था, एक तरफ उसके पिता से पुराने रिश्ते थे और दूसरी तरफ धीरेन्द्र की होशियारी कि ‘अंकल के ही घर रहेंगे, वही व्यवस्था करेंगे.’  तब प्लांट हेड श्री पी.के.काकू थे मैंने उनको अपनी व्यथा बताई तो उन्होंने एक अबैनडेंट लेबर क्वाटर की रिपेयर करवाकर उसे अलाट कर दिया था.

सन २०१६ को जब मेरा लाखेरी जाना हुआ तो धीरेन्द्र मिला था वह तब कालोनी में किसी एल टाइप में रह रहा था ऐसा उसने बताया था. परसों जब लाखेरी से सूचना आई कि धीरेन्द्र कौशिक का रेलवे स्टेसन पर एकसीडेंट में निधन हो गया है  तो फेसबुक पर मित्रों को सूचित करने के लिए मुझे शोक में शब्द नहीं मिल रहे थे.

मृत्यु एक शाश्वत सत्य है पर अकाल मृत्यु पर अपार दुःख होता है लाखों के लाखेरियंस ग्रुप के सभी सवेदनशील लोगों ने उसके आकस्मिक निधन पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं. उसके बच्चे अब सयाने हो गए हैं पर पिता की कमी तो हमेशा रहेगी ही. इस दुःख की घड़ी में उनको हिम्मत रहे ये भगवान् से प्रार्थना करता हूँ.

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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

यादों का झरोखा - २८ श्री सुरेन्द्र कुमार शर्मा (सिन्दु मास्साब)



लाखेरी में मेरे शुरुआती दिनों में अर्थात सन १९६० में जिन बुजुर्ग लोगों का हाथ मुझे आशीर्वाद देने के लिए उठाता था उनमें स्व. आर.डी.शर्मा (पावर हाउस में शिफ्ट इंजीनियर) भी एक थे. वे तब जी टाईप क्वाटर नंबर ८ या ९ में रहते थे, पड़ोस में पंडित शिवनारायण तिवारी (कंपाउंडर) थे शायद इसी नाते मेरा भी उनसे परिचय हुआ था. शर्मा जी बहुत ही मीठा बोलते थे पर मुझे बाद में उनके बड़े सुपुत्र स्व. गौरी शंकर शर्मा (मेरा घनिष्ट होने पर) ने मुझे बताया था कि बाबू जी घर में हिटलरी अंदाज में रहा करते थे. वे तब उनके रिटायरमेंट के करीब थे. उनके चार पुत्र गौरी शंकर, सुरेंद्र कुमार, त्रिलोकीनाथ और राजकुमार थे और सभी से मेरा मिलना जुलना था. भाई गौरी से मेरी विशिष्ट मित्रता यो भी हुई कि वे भी शेरो-शायरी व तुकबंदी किया करते थे. उन्होंने  इलेक्ट्रिसिटी पर एक छोटी किताब भी अपने नाम से प्रकाशित की थी जिसकी एक प्रति मुझे भी भेंट की थी जोकि आज भी मेरे बुकसेल्फ़ में मौजूद है.

स्व. गौरी शंकर को उत्तर पूर्वी रेलवे के इलाहाबाद जोन में क्लर्क की नौकरी मिल गयी थी. दुर्भाग्यबस कुछ समय बाद वे स्नायु संबंधी एक रोग से ग्रस्त हो गए थे उसमें पूरा शरीर कम्पन में आता था, वे लिखने के काम में असमर्थ हो चले थे पर रेलवे के उनके सहकर्मियों ने उनको तब तक निभाया, जब तक उनके लडके सयाने नहीं हुए. मेरी जानकारी में है कि उनका एक सुपुत्र अभी भी रेलवे के इलाहाबाद रेंज में सीनियर टी.टी.ई के पद पर कार्यरत है.

श्री सुरेन्द्र मास्साब को लाखेरी हायर सेकेंडरी स्कूल से निकले सभी स्टूडेंट्स ‘सिन्दु मास्साब’ के नाम से जानते हैं लम्बे समय तक फीजिकल ट्रेनिंग/ स्पोर्ट्स/ एन.सी.सी टीचर अथवा लेक्चरार के रूप में वे लाखेरी हायर सेकेंडरी में रहे. मैं सुनता था की वे अध्यापकों व छात्रों की राजनीति में हमेशा सक्रिय रहा करते थे. मेरा उनसे कोई सीधा कार्य-व्यवहार नहीं था पर वे मुझे हमेशा ‘भाई साहब’ के रिश्ते से संबोधित किया करते थे. वे कुछ साल पहले रिटायर हो चुके हैं, लाखेरी रेलवे स्टेसन के सामने कोटा रोड पर उन्होंने बहुत पहले ही अपना आशियाना बना लिया था. अब वे अपने जीवन के तीसरे प्रहार में परिवार के मुखिया की भूमिका में होंगे. पर मुझे बताया गया है कि वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका अदा किया करते हैं. पिछले बर्षों में एक दुःखदाई घटना जरूर उनके परिवार में हुई कि उनका एक पुत्र असमय स्वर्गवासी हो गया. जीवन मृत्यु ऊपर वाला तय करता है, संसार का नियम है कि एक दिन सब को जाना होता है. हमारी संवेदना है.

अभी पिछले महीने गाजियाबाद से उनके छोटे भाई श्री त्रिलोकीनाथ का मैसेज अप्रत्याशित रूप से फोन पर मुझे मिला, उनकी कुशलक्षेम जानकार खुशी हुयी. त्रिलोकीनाथ यु.पी. में नरोरा परमाणु संस्थान में मुलाजिम थे अब रिटायर होकर अपने बच्चों के साथ सैटिल हो गए हैं, उन्होंने ह्वाट्स अप पर मुझे अपनी ताजी तश्वीर भेजी तो मुझे उनका वह किशोर रूप नजर आया जो कि एसीसी मिडिल स्कूल में पढ़ते समय था. त्रिलोकीनाथ से संपर्क करने में कोटा से उनके सहपाठी? श्री अनिल कुलश्रेष्ठ के सूत्र काम आये हैं.

फेसबुक पर बिछुड़े हुए लाखेरियंस को आपस में जोड़ने का माध्यम मुकुल वर्मा (हाल चांदा में कार्यरत) द्वारा बनाए ग्रुप ‘लाखों के लाखेरियन’ का बड़ा योगदान रहा है.

सिन्दु मास्साब को ‘जीवेत शरत: शतम’ की शुभकामनाओं के साथ इन यादों के झरोखे के इपिसोड बंद कर रहा हूँ; पर सभी मित्रों से अनुरोध करना चाहता हूँ की अपने अनुभव व कमेंट्स लिखने में कंजूसी ना करें. अपने निजी फोटो व सन्देश भी हम सबसे साझा किया करें.

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बुधवार, 6 जून 2018

यादों का झरोखा - २६ स्व.पंडित गजानंद 'सखा'



स्व. पंडित गजानंद ‘सखा’ (तिवारी) लाखेरी के इतिहास में एक अमर व्यक्ति हैं. वे ब्रह्मपुरी में निवास करते थे और एसीसी कालोनी के लगभग सभी हिन्दू घरों में उनकी आवक थी. वे सत्यनारायण भगवान् की पूजा+कथा एक विशिष्ठ शैली (राधेश्यामी तर्ज) में  हारमोनियम+ढोलक+मंजीरों की संगीतमय मनमोहक अंदाज में किया करते थे.

जैसा कि सत्यनारायण की कथा के सन्दर्भ में कहा गया है कि एकादशी, पूर्णिमा, अमावास या कोई मनभावन दिन ब्रत रख कर पूजन किया जा सकता है. विशेष रूप से बेटा-बेटी के व्याह के बाद इनकी पूजा पारंपरिक अनुष्ठान की तरह की जाती है. कथा वाचक तो और भी थे पर सखा जी की बात अलग ही थी. उनकी रसीली बुलंद आवाज आज भी श्रोताओं के दिलों में बसी हुयी है.

सखा जी को स्वर्गवासी हुए दो साल से अधिक समय हो चुका है. मैं सन २०१४ में आख़िरी बार उनसे मिलने उनके घर पर अपने साथी श्री रामस्वरूप गोचर के साथ गया था तब ये सोचा भी नहीं था कि मुलाक़ात आख़री होगी. मैं उनकी वाणी में रिकार्डेड सत्यनारायण भगवान् की कथा का टेप लेने के ख़ास उद्देश्य से गया था जो उनके बताये अनुसार नगरपालिका भवन के सामने एक दूकान पर मात्र ३५ रूपये कीमत पर मिल भी गया. इस अमूल्य टेप को मैं अपने घर पर आज भी गाहे-बगाहे सुनकर आनंदित होता हूँ.

सखा जी से मेरी मित्रता सन १९६० में ही हो गयी थी तब वे बाटम रेलवे फाटक के पास एक पक्के खोमचे में पान की छोटी सी दूकान चलाया करते थे. यहीं से उनकी पंडिताई भी चलती थी. बाद के बर्षों में कंपनी ने इसे अपना रिजर्व एरिया बता कर खाली करवा लिया था. अब यहाँ फल-फ्रूट, सब्जी का बाजार सजता है.

सखा जी एक साफ़-सुथरी संस्कारी व्यक्ति थे मैंने उनसे ये कभी नहीं पूछा कि राधेश्यामी तर्ज पर कथा+पूजा करना कब और कहाँ सीखा था? मुझे किसी ने अपुष्ट तौर पर बताया था कि कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों में उनको जेल जाना पडा था, जहां उनको कोई गुरु मिला, जिसने उनको ये विद्या दी थी. ये कितना सच है मैं कह नहीं सकता हूँ.

राधेश्यामी तर्ज के बारे में भी मैं अपने पाठकों को बताना चाहता हूँ कि बरेली, उत्तर प्रदेश में एक महान संगीतकार + नाटककार पंडित राधेश्याम शर्मा (१८९०-१९६३) हुए हैं जिन्होंने अल्फ्रेड कंपनी से जुड़कर वीर अभिमन्यु, भक्त प्रहलाद, श्रीकृष्णावतार आदि दर्जनों संगीतमय नाटक/रचनाएँ लिखी और उनके सफल मंचन भी हुए. पर राधेश्याम जी को ज्यादे प्रसिद्धि मिली उनके द्वारा पद्यबद्ध संगीत वाले ‘रामायण’ से. आज भी समस्त उत्तर भारत में में जो रामलीलाएं खेली जाती हैं उनमें राधेश्यामी तर्ज पर दोहे व चौपाइयां गाई जाती हैं.     

सखा जी के कोई पुत्र नहीं था, तीन विवाहित बेटियाँ थी/हैं. बाद के बर्षों में उन्होंने अपना एकाकीपन ईश्वर को समर्पित  करके ब्रह्मपुरी के आगे लाकडेश्वर महादेव नाम से एक छोटा किन्तु भव्य मंदिर बना कर पूरा किया.

उनके भजन के श्वर : “लेते जाओ रे हरी का नाम थोड़ा थोड़ा; दौड़ा जाए समय का घोड़ा......” आज भी वातावरण में गूँज रहे हैं.

हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ.

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