मंगलवार, 28 जून 2016

अहसानमंद

हल्द्वानी महानगर के चारों तरफ उभरी हुई नई बस्तियों में कई लोग पहाड़ के अनजाने गांवों से पलायन करके या अपनी नौकरियों से रिटायर होकर बहुतायत में आ बसे हैं, जिससे एक नई सांस्कृतिक रिश्तेदारी बन गयी है. ऐसा ही है मेरा गाँव, गौजाजाली.

एक दिन संयोगवश मैं किसी व्यक्तिगत निमंत्रण पर एक एडवोकेट मित्र के पास बरेली गया था. सुबह सुबह अखबार में छपे एक समाचार ने मेरा ध्यान आकर्षित किया कि मेरे गाँव के एक मातवर व्यक्ति की कार से बरेली में एक दुर्घटना घटी, जिसमे दो लोग चोटिल हुए, नतीजन पुलिस केस बनाकर उनको जेल में डाल दिया गया. इस बात को तीन दिन हो गए थे, और उनको जमानत नहीं मिल पा रही थी.

यद्यपि मेरी उनसे घनिष्टता नहीं रही थी, फिर भी उनकी इस परेशानी की घड़ी में मदद करने का मन हुआ. मैंने उनसे मुलाक़ात की, और अपने एडवोकेट मित्र से संपर्क करके जमानत दिलवाने की तुरंत कार्यवाही करवाई. वे रिहा हो गए और शायद बाद में कुछ ले-दे करके केस रफादफा भी गया था. ये लगभग दो साल पुरानी दास्तान है. इन दो सालों में उनसे यदाकदा मुलाक़ात भी होती रही, पर मैंने उनकी आँखों में कभी भी कृतज्ञता का भाव नहीं पढ़ा. यद्यपि मैंने उनकी अनपेक्षित सहायता का कोई प्रतिदान नहीं चाहा, परन्तु उनका ‘तोताचश्म’ होना अखरता जरूर रहा.

कुछ दिनों बाद, एक ताजी घटना से कृतज्ञता भाव पर नया आयाम उभर कर आया. हुआ यों कि मैं पत्नी सहित हल्द्वानी शहर में अपने एक निकट संबंधी के घर मिलने गया था. अपनी कार मैं स्वयं ड्राइव कर रहा था. जब दोपहर बाद घर लौटा तो घर के गेट पर गली की एक उम्रदराज महिला अपनी बहू के साथ इन्तजार करती हुयी मिली. वह अस्वस्थ थी और अपना ‘ब्लड प्रेशर’ चेक करवाना चाहती थी. मेरे आसपास के लोग आवश्यकता होने पर मेरी मेडीकल चेरीटेबल सेवा का लाभ लेने में संकोच नहीं किया करते हैं.

मैं अपनी गाड़ी गैरेज में डाल कर उनकी सेवा में लग गया. उस दिन बाहर बला की गर्मी व उमस व्याप्त थी. ना जाने कब गेट खुला पाकर एक जानदार ‘रोडस्टर’ कुत्ता ठंडक पाने के लिए मेरे गैरेज में चुपचाप छुप कर बैठ गया. मरीज के जाने के बाद मैंने गैरेज का शटर नीचे खींच कर बंद कर दिया. कुता दो दिन, दो रात भूखा-प्यासा अन्दर बंद रहा. हमारे बेडरूम दूसरी दिशा में होने के कारण तथा टेलीवीजन की गीत-संगीत की आवाज होने के कारण हम कुत्ते की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से अनजान रहे. तीसरे दिन मेरी श्रीमती को शटर के अन्दर कुछ खटपट होने का आभास हुआ. मैंने जैसे ही शटर उठाया वह दुम हिलाता हुआ बाहर दौड़ा आया. उसने गौर से मुझे देखा और गेट खुलने पर तेजी से बाहर निकल गया. मैंने कुत्ते का हुलिया बयान करते हुए अपने ‘ईवनिंग वॉक’ मंडली को बताया तो मालूम हुआ कि ये उन्ही मतावर व्यक्ति का पालतू कुत्ता था, जिनका जिक्र ऊपर बरेली काण्ड में आया है.

कुत्ते की स्थिति का जायजा लेने जब हमारी टीम उनकी गली में पहुंची तो वह कुत्ता मुझे पहचानते हुए मेरे पैरों में लोटपोट हो गया. बहुत देर तक वह मेरे इर्दगिर्द घूम कर लाड़ बताता रहा. शायद इसलिए कि मैंने उसे हिरासत से बाहर निकाला था. इंसान और जानवर के अप्रतिम व्यवहार का अंतर देखकर मेरा मन भर आया.
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