रविवार, 27 दिसंबर 2015

चुहुल - ७६

(१)
एक शराबी सड़क पर झूमते हुए जा रहा था. उसके पीछे थोड़ी दूरी पर दो लड़कियां भी चली आ रही थी, जिनको उसकी हालत देखकर मजाक सूझा. एक बोली, तुझे ये ही पति मिलता तो अच्छा होता.
दूसरी बोली, चल हट, तू ही इससे शादी रचा ले.
शराबी उन दोनों की वार्ता सुन कर रुक गया. बोला, तुम लोग जल्दी से फैसला कर लो, वरना मैं यहाँ से चला जाऊंगा.
(२)
मरीज  डॉक्टर साहब, कोई ऐसी दवा दीजिये जिससे मुझे कब्ज हो जाए.
डॉक्टर लोग तो कब्जियत दूर करने की दवा चाहते हैं, पर तुम उल्टा बोल रहे हो.
मरीज  बात यों है डाक साब कि २०० रूपये किलो की दाल खाई है, जिसे में जल्दी निकालना नहीं चाहता हूँ.

(३)
सब्जी में नमक नहीं था. पति ने पूछा, नमक क्यों नहीं डाला? 
पत्नी बोली, सब्जी थोड़ी जल गयी थी. आप जानते हैं मेरी आदत जले में नमक डालने की कभी नहीं रही है.

(४)
बदमिजाज पत्नी ने कहा, मैं तुम्हारे बर्थडे पर एक गिफ्ट देना चाहती हूँ बोलो क्या लोगे?
पति बोला, तुम मेरी थोड़ी बहुत इज्जत कर लिया करो, ढंग से बोल लिया करो, मैं इसे ही अपना गिफ्ट समझ लूंगा.
पत्नी तेवर बदल कर बोली, मैं तो अलग से गिफ्ट देकर रहूँगी. मुझे तुम्हारी बकवास नहीं सुननी है.

(५)
कॉलेज के लड़कों का एक ग्रुप तीर्थ यात्रा पर गया. गाईड ने समझाया, सुबह जल्दी निकलना होगा, आप लोग नहा-धो कर तैयार हो जाना. राह में कुण्डों में स्त्रियाँ स्नान करती होंगी. उधर ध्यान न देकर हरिओम कहते हुए आगे निकल जाना.
अगली सुबह जब वे चले तो एक लड़के ने राह में शरारतन जोर से हरिओम बोला तो बाकी सब पूछने लगे किधर है?

शनिवार, 19 दिसंबर 2015

गपशप

ए.सी.सी. को 2006 में स्विस कंपनी होलसिम ने अधिग्रहित कर लिया था. उससे पहले अम्बुजा सीमेंट कंपनी को भी खरीद लिया था और अब फ्रैंच कंपनी लाफार्ज ने होलसिम को खरीद लिया है. अब ये लाफार्ज होलसिम हो गयी है. इन बड़ी विदेशी कंपनियों का भारत में व्यापार करने का उद्देश्य मात्र मुनाफ़ा कमाना होता है. वैसे भी पाश्चात्य देशों के कल्चर में लोग आज के लिए जीते हैं. अत: कल परसों यानि भविष्य को केवल व्यापारिक नजरिये से सोचते हैं. जबकि हम लोग सोचा करते हैं, ये मेरी अपनी/ पुश्तैनी कंपनी है, इससे मेरी पहचान है, या ये हमारी कंपनी माता है.

समय हमेशा परिवर्तनशील होता है. इतिहास में कई बार अनपेक्षित घटनाएं घटती रहती हैं. मैंने हाल में अपने लाखेरी (बूंदी,राजस्थान) सीमेंट कारखाने के पिछले लगभग १०० वर्षों का देखा-सुना इतिहास फेसबुक पर LAKHON K LAKHERIAN ग्रुप में शब्दबद्ध किया है. बहुत सी बातें मेरे लेखन में छूट भी गयी होंगी, पर पूरे प्रकरण में एक ईमानदार भावनात्मक अपनापन है इसलिए पाठकों व सम्बंधित मित्रों ने इसकी बहुत सराहना की है. मेरे एक मित्र ने लिखा है कि पिछले पन्ने व इसके परिशिष्ट पढ़कर ऐसा लगा जैसे नानी-दादी ने दंतकथाएं सुनाई हैं.

अब जब मैं आज की स्थिति का विश्लेषण कर रहा हूँ तो पा रहा हूँ कि कंपनी की ऊपर की व्यवस्था में भारतीयता वाला संस्कार जिसे चैरिटेबल थिंकिंग नाम दिया जा सकता है, लगभग गायब सा होता जा रहा है. कंपनी के विदेशी मालिकों को अब शायद सीमेंट हाउस की भी दरकार नहीं होगी. अम्बुजा का कॉर्पोरेट ऑफिस जो मुम्बई में अंधेरी में है, उनका मुख्यालय हो जाएगा. भूपेंद्रा की जमीन जायदाद तीन सौ करोड़ में किसी बिल्डर को बेची जा चुकी है. दिल्ली में ओखला वाली जमीन जायदाद भी बेच कर टके कर लिए हैं. मुम्बई-थाणे स्थित रिसर्च इंस्टीच्यूट व सम्बंधित कार्यालय का भविष्य/आवश्यकता अधर में है. वहां ए.सी.सी. द्वारा बसी-बसाई कॉलोनी डिमोलिश करके बहुमंजिला इमारतें बनाये जाने की चर्चाएँ जोरों पर है. और भी बहुत सी बातें हैं, जिन पर फैसले नए मालिक अपने प्रॉफिट वाले चश्मे से लेने वाले हैं. आगे आगे देखिये होता है क्या!  पर निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये दुनिया ऐसे ही चलती आई है, चलती रहेगी.
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सोमवार, 14 दिसंबर 2015

सलाम शाहाबाद - २

हमारे देश में कई कस्बों व शहरों का नाम शाहाबाद है. मैं जिस शाहाबाद के बारे में लिखने जा रहा हूँ वह कर्नाटक राज्य के उत्तरी जिले गुलबर्गा में स्थित है. ये पत्थरों का शहर है, जिसमें अंदरुनी सड़कों का पटांन पत्थरों का है. पुराने सभी मकान पत्थरों से बने हैं. पहले इन सभी की छतें भी पतले पत्थरों की स्लेटों से ही ढकी रहती थी. अब नए भवन जरूर सीमेंट-आर.सी.सी. के बने नजर आते हैं. मैं पूरे ४१ साल बाद यहाँ आया हूँ. हमारा एसीसी सीमेंट प्लांट २५ साल पहले किसी अन्य पार्टी को बेच दिया गया था फिर इसके कई मालिक बदलते रहे हैं. वर्तमान में इस पर जे.पी. सीमेंट का बोर्ड लगा हुआ है.

मेरे साथ मेरी पत्नी भी थी. उसकी तीव्र इच्छा थी कि कॉलोनी के उस घर को देखा जाए जिसमें सन १९७० से १९७४ तक चार साल हमने अपने सुनहरे दिन बिताये थे. लेकिन यहाँ की हालत देखकर बड़ा सदमा सा लगा. ये सुन्दर कॉलोनी देखरेख के अभाव में पूरी तरह उजड़ गयी है. बहुत से क्वार्टर्स ध्वस्त हो गए हैं. सर्वत्र कटीली झाड़ियाँ उग आई हैं. हमारे उस क्वार्टर के पास जो कैथोलिक चर्च की बिल्डिंग है, वह उदास खड़ी है. उसका बड़ा सा घंटा जरूर आज भी बजने का इन्तजार कर रहा है. अब जब क्रिसमस के मात्र दस दिन शेष हैं, यहाँ कोई चहल पहल नहीं है. कॉलोनी के बिजली पानी के कनेक्शन बरसों पहले कट चुके हैं. सर्वत्र उदासी है.

नए मालिकों ने अपनी आवश्यकता के अनुसार फैक्ट्री की नई चहारदीवारी बना ली है. उसके बाहर कुछ पुराने पीपल, नीम या जामुन के पेड़ जरूर हमें पहचान रहे होंगे, पर नि:शब्द थे. बीच में राम मंदिर है. अब शायद ही वहां आरती होती होगी. मडडी की तरफ जो मस्जिद है, उसमें जरूर ताजा रंग-रोगन दीख रहा था. जो इक्के दुक्के लोग मिले, वे सभी अपरिचित थे. मैंने अपने उस क्वार्टर के सामने फोटो ली. चर्च का फोटो यादगार के लिए खींची ताकि हमारे बच्चे भी अपने बचपन के दिनों को इस बहाने याद कर सकें. यद्यपि इस नज़ारे को देख कर मन भर आया क्योंकि एक जीवंत बस्ती का पराभव हो चुका है.

एक दिन पहले, मैं घूमते हुए वाडी सीमेंट फैक्ट्री की कॉलोनी के गेट पर स्थित कर्मचारी यूनियन (एटक) के कार्यालय में गया, जहाँ स्व. श्रीनिवास गुडी जी की आदमकद फोटो लगी थी. मुझे लगा कि वे एकटक मुझे देख रहे हैं और कुछ कहना चाहते हैं. वे एक समर्पित किसान नेता तथा मजदूर हितैषी गांधीवादी कम्युनिस्ट नेता थे. मैं दो साल तक शाहाबाद में उनका जनरल सेक्रेटरी रहा था. वे मेरे लाखेरी लौटने के बाद एक बार लाखेरी भी पधारे थे. वे एक महान आत्मा थे. कार्यालय में बैठे एक बुजुर्ग ने बताया कि पूर्व नेता आईजय्या भी स्वर्ग सिधार चुके हैं, जिनकी मूर्ति वाडी के लोगों ने कालोनी के बाहर स्थापित कर रखी है.

शाहाबाद में मेरे साथ यूनियन में जोईंट सेक्रेटरी रहे श्री गुरुनाथ बाद में विधायक और स्टेट लेबर मिनिस्टर रहे, उनका फोन नंबर पाकर मैंने उनसे संपर्क साधा, वे आजकल विधान परिषद् के चुनाव में गुलबर्गा/बीदर में व्यस्त हैं इसलिए अभी तक मुलाक़ात नहीं हो पाई है.

इस पूरे क्षेत्र में कई महीनों से वर्षा नहीं हुई है. सर्वत्र सूखा है. खेतों में कपास व ज्वार की फसल खराब हो रही है. लोग कहते हैं कि अकाल की स्थिति बनती जा रही है. यहाँ कगीना नदी (भीमा नदी की ट्रिब्युटरी) अब सूखने लगी है. जगह जगह पानी रोक कर खींचा जा रहा है. वाडी फैक्ट्री का प्रबंधन पानी की कमी से चिंतित है, ऐसा मैंने सुना है.

हैदराबाद से वाडी तक नेशनल हाईवे बहुत शानदार है, पर वाडी और शाहाबाद के बीच हाईवे बहुत खराब स्थिति में है, बदहाल है, हर गाड़ी के पीछे कच्ची सड़क का सा धूल का बवंडर दिखाई देता है. सड़क के दोनों तरफ पट्टी-पत्थर निकालने की अनेक खदानें हैं, जिनमें आज भी मैनुअली कार्य होता है. इस पूरे इलाके में थोड़ी थोड़ी दूरी पर अनेक सीमेंट के बड़े कारखाने उद्योगपतियों ने लगा लिए हैं, पर इस क्षेत्र का सबसे पुराना शाहाबाद का कारखाना अपनी बर्बादी को रोता हुआ नजर आता है.
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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

बैठे ठाले - १५

मित्रो!
दिल पर हाथ रख कर बोलिए, क्या आज देश में धार्मिक असहिष्णुता फ़ैली हुई नहीं है? सत्तानशीं लोग कहते हैं कि ये काग्रेसियों की साजिश मात्र है, बदनाम करने की मुहिम है, पर यह पूरा सच नहीं है.

मैं हल्द्वानी शहर से सटे हुए एक आधुनिक गाँव में निवास कर रहा हूँ, जहाँ 99.9% आबादी हिन्दू है. अधिकाँश बुजुर्ग सरकारी या गैरसरकारी सेवाओं से रिटायर्ड हैं, जहां कहीं भी उठते बैठते या साथ घूमते हैं तो देश की सियासत पर चर्चा होने लगती है. समाचार चैनल्स की ख़बरों पर तप्सरा होने लगता है. केंद्र की पिछली सरकार में हुए घोटालों को भाजपा ने अपने लोकसभा चुनावों में खूब भुनाया अत: अधिकांश लोग परिवर्तन चाहते थे, और आज भी मोदी’, मोदी की आवाजों से खुश नजर आते हैं. परन्तु मैं अनुभव कर रहा हूँ कि लोग दूसरे धर्मों, विशेषकर मुस्लिम धर्म के प्रति गैर जरूरी रूप से असहिष्णु हो रहे हैं. उनको ये हिन्दुस्तानी मानने को तैयार नहीं है. मैं समझता हूँ की ये ध्रुवीकरण बरास्ता असहिष्णुता ही है.

प्रधानमंत्री जी ने आज जिन शब्दों में संविधान दिवस पर लोकसभा में भाषण दिया वे बहुत पावन नज़र आ रहे थे, पर खाली बोल देने से क्या होता है? सच्चे मन से उन पर अमल भी होना चाहिए. उनके अनुयायियों को मनमाना बोलने की छूट है, और नसीहत की बात तब होती है, जब सारा जहर फ़ैल चुका होता है. कई मामलों में प्रधानमंत्री जी की लम्बी चुप्पी संदेह के घेरे में रही है. और आलोचाना का कारण भी बनी है. छिद्रान्वेषी जन कहते हैं कि राजनीति में कई मुखौटे होते हैं.

आज राज्य सभा में विरोध पक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद जी का भाषण मैंने आद्योपांत सुना, उसमें उन्होंने सही कहा कि संविधान बनाने की भूमिका में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को नकारने जैसी प्रक्रिया सदन और सदन के बाहर हो रही है. इससे बड़ी असहिष्णुता क्या हो सकती है. जिन्होंने आजादी के आगे-पीछे नेहरू जी के त्याग और देशभक्ति का इतिहास नहीं पढ़ा सुना है, वे उनकी कुछ व्यक्तिगत कमजोरियों को मुद्दा बनाकर उछाल रहे हैं, ये शर्मनाक असहिष्णुता ही है.

हो ये रहा है की जहां कहीं असहमति या विरोध के स्वर उठते हैं, सत्ता पक्ष द्वारा तीखी प्रक्रिया देकर दुत्कारने के अनेक प्रमाण सामने आ जाते हैं. इसी को असहिष्णुता कहा जा रहा है, जो सत्य है.

जब कुछ मान्य कलाकार, साहित्यकार, व बुद्धिजीवी देश के वातावरण में असहिष्णुता की गंध महसूस करके अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं, तो उनका मजाक बनाने या उनको गालियां देने के बजाय इस समस्या को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
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सोमवार, 23 नवंबर 2015

बाहर का नजारा

ये मर्मस्पर्शी कहानी किस लेखनी से निकली मुझे भी नहीं मालूम, पर इसे पढ़कर ये  अहसास हुआ कि कुछ लोग दूसरों की ख़ुशी के लिए किस तरह जिया करते हैं.

एक अस्पताल के बूढ़े-बीमार लोगों के अलग से वार्ड में खिड़की की तरफ पलंग पर एक अति बीमार व्यक्ति था. उसके बगल वाली पलंग पर उससे भी ज्यादा कमजोर व्यक्ति था, जो उठ-बैठ भी नहीं सकता था. खिड़की की तरफ वाला वृद्ध उसकी मजबूरी और मनोदशा को खूब समझने लगा था इसलिए रोज सुबह उठ कर उसे खिड़की के बाहर का नजारा बोल बोल कर सुनाता था, सामने सुन्दर पार्क है जिसमें तरह तरह के रंग बिरंगे फूल खिले हुए हैं.... बच्चे हरी दूब पर खेल रहे हैं.... कुछ लोग फुटपाथ पर जॉगिंग कर रहे हैं.... दो तीन महिलायें अपने छोटे बच्चों को स्ट्रॉलर में बिठा कर घुमा रही हैं.... एक तरफ लाफिंग क्लब के सदस्य तालियां बजा कर जोर जोर ठहाका लगा रहे हैं.... पार्क के बगल में जो सड़क है, उसमें अनेक कारें दौड़ रही हैं.... कुछ साइकिल-सवार भी किनारे किनारे चल रहे हैं. यों बहुत सी बातें आँखों देखाहाल में सुनाया करता था और सुना कर खुद भी तृप्त और संतुष्ट हो लेता था. क्योंकि सुनने वाला हल्की आवाज में वाह बोल दिया करता था. उसको अपने पुराने दिन याद आ जाते थे.

एक सुबह खिड़की की तरफ वाला वृद्ध सोता ही रह गया. नर्स ने आकर टटोला तो पाया वह इस संसार से विदा हो चुका था. उसके मृत शरीर को वहाँ से हटा दिया गया. असक्त वृद्ध बेचैन और भावविह्वल हुए जा रहा था. खुद को बहलाने के लिए खिड़की से बाहर देखना चाहता था. बड़ी मशक्कत के बाद वह जैसे तैसे खिड़की के पास गया तो उसने पाया की खिड़की के सामने तो बड़ी सी दीवार थी. उसने नर्स से पूछा, सिस्टर, ये दीवार खिड़की के सामने कैसे आ गयी?

नर्स से उसे बताया कि वह दीवार तो वहां पर बहुत पहले से थी. ये जानकार कि मरने वाला सिर्फ उसकी खुशी के लिए बाहर के नज़ारे की कहानी गढ़ा करता था, उसकी सूखी आँखों की कोटरें डबाडब भर आई.
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शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

उन्हीं की ज़ुबानी

गृह-प्रवेश का एक सुन्दर व आकर्षक निमंत्रण-पत्र कूरियर के हाथों मुझे मेरे घर पर मिला तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि भेजने वाले सज्जन, गोविन्द जोहारी, को मैं बिलकुल नहीं जानता था. ना इस नाम के किसी व्यक्ति से दूर दूर तक कोई रिश्ता था. कुमायूं में जोहारी उपनाम धुर उत्तर में जोहार ( हिमालयी क्षेत्र ) के आदिवासी जनजाति के लोग लगाया करते हैं.

श्री गोविन्द जोहारी ने अपने पते में नाम के आगे आई.ए.एस. लिखा था, तथा अपने दो मोबाईल नंबर दे रखे थे. गृह-प्रवेश अल्मोड़ा शहर के आउट स्कर्ट में बिनसर मार्ग पर काफी ऊँचाई वाले स्थान पर नए बनाए भवन में होना था. मैं समझ नहीं पाया कि दूर के शहर में रहने वाले मुझ अपरिचित को बुलावा क्यों भेजा गया होगा? कहीं पता लिखने वाले ने गलती से तो मेरा पता लिख दिया? शंकातुर होकर मैंने उनसे फोन से सम्पर्क करके पूछना उचित समझा. फोन पर उनकी आवाज एक बूढ़े आदमी की सी भारी और बोझिल लग रही थी. उन्होंने कहा कि मुझे निमंत्रण कुछ ख़ास प्रयोजन से भेजा गया है. उन्होंने मेरी लिखी किताबें और बहुत से लेख पढ़े थे, और उनकी अपेक्षा थी कि मैं उनकी आत्मकथा लिखूं. बातों बातों में उन्होंने यह भी कह डाला कि वे मुझे मेरा लेखकीय पारिश्रमिक मुंहमांगा देंगे. बहुत सोचविचार करने के बाद मैंने निश्चय किया की उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया जाए. इस प्रकार मैं गृह-प्रवेश से एक दिन पहले ही सड़क मार्ग से उनके परिसर में पहुँच गया.

अल्मोड़ा शहर की ढलानों के ऊपर पूरब दिशा की और से बल खाती हुयी सड़क से जाते हुए मेरी गाड़ी उनके परिसर में पहुँच गयी. जहाँ एकांत में टीला काटकर सुन्दर दुमंजिला महलनुमा घर बनाया गया था. अहाते को मौसमी फूलों से सजाया हुआ था. चारदीवारी को ताजा ताजा रंगबिरंगे बिजली की रोशनियों से संवारा जा रहा था. कुछ कारिंदे अन्दर बाहर जा रहे थे. घर के निकट पहुँचते ही खुद जोहारी जी बाहर निकल कर आ गए. उनके बारे में जैसी मेरी कल्पना थी, वे उतने  भी ज्यादा बूढ़े नहीं थे. उम्र करीब सत्तर वर्ष होगी पर उनकी आवाज और हाथों में कम्पन मुझे स्पष्ट मालूम हो रहा था. उन्होंने मेरे ड्राईवर और अपने एक कारिंदे को मेरे ठहरने की व्यवस्था के बारे में समझाया और बड़ी आत्मीयता से मेरा हाथ थाम कर अपनी बैठक में ले गए. उन्होंने बताया कि गृह-प्रवेश तो उन्होंने महीने भर पहले ही कर लिया था, पर बरसात के चलते विधिवत पूजा अगले दिन के लिए टाल दी गयी थी. उन्होंने मुझ से कहा, आप यहाँ घूमिये, फिरिए, इन वादियों का आनंद लीजिये; पूजा के बाद आपके साथ बैठक करूंगा.

अपने घर से चलते समय तो मैं इसे सिर्फ एक बिजनिस ट्रिप मान कर चला था, पर यहाँ का नैसर्गिक सौन्दर्य और अक्टूबर माह की पुष्पित, सुगन्धित छटा को देखकर भावविभोर हो गया. दूर तक पर्वत श्रंखलाओं का घेरा और बीच में नीचे गहराई में कोसी नदी का सर्पीला मार्ग, सामने की पहाड़ियों पर हंसती हुई दन्तपंक्ति सी श्वेत बस्तियां; कोई प्रदूषण नहीं, शीतल मंद पवन के झोंके, कुल मिला कर एक अद्भुत अनुभूति हो रही थी. जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

जोहारी साहब ने  देवदार की लकड़ी के बहुत महंगे फर्नीचर बनवा रखे थे, जिनकी भीनी भीनी खुशबू हर तरफ महक रही थी. रात काफी ठंडी थी, पर गुदगुदे नरम बिस्तर पर सोते हुए मैं दूसरी दुनिया के सपनों में खोकर सो गया. अगली सुहानी सुबह को तरोताजा होकर अपनी कल्पनाओं को लेखनी से उकेरना शुरू कर दिया. दिन में पूजा पाठ हुआ. उनके आमंत्रित अनेक गणमान्य मेहमान आये, भोज में शामिल हुए. मैंने देखा कि कार्यक्रम में वैभव तथा व्यवस्था की कोई कमी नहीं थी. जब सब कार्यक्रम शालीनता पूर्वक सम्पूर्ण हो गया, तब जोहारी जी ने अपनी रामकहानी सुनाने के लिए मुझे अपने विशेष कमरे में बुलाया. मैं पेन, पेपर, और एक टेप-रेकॉर्डर लेकर पूरी तैयारी के साथ गया. कमरे में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती खेमा (क्षमा) देवी मौजूद थी. उनके चेहरे पर भी बुजुर्गी की सैकड़ों झुर्रियां थी.  नैन-नक्श  बिलकुल पहाड़ी/नेपाली थे. खुद जोहारी जी का चेहरा भी तिब्बतियन सा लग रहा था. मैंने उनकी पृष्ठभूमि पर उनसे पूछना चाहता था, पर वे अपनी निजी जीवन की परतें खुद ही खोलते चले गए.

मेरा नाम गोविन्द जोहारी है. ये मेरी अर्धांगिनी खेमा है. हमारा एक ध्रुव नाम का बेटा है, जो नेदरलैंड में रहता है. हमारा मूल स्थान मुनस्यारी के पास जोहार दारमा में है, जो हिन्दुस्तान व तिब्बत की सीमा पर है. मेरे पिता के पास एक सौ भेड़ें (मेंढे) हुआ करती थी. वे अपने अन्य गांववालों की तरह ही भेड़ों पर नमक, आलू, ऊन, और पहाड़ी मसाले जम्बू-गंध्रायण आदि लाद कर, पैदल मार्गों से हल्द्वानी, नैनीताल के आढ़तियों तक पहुँचाते थे और वहाँ से गुड़, चावल तथा कुछ अन्य खाद्य सामग्री तिब्बत के व्यापारियों तक लेकर जाते थे. बचपन में मैं भी दो बार उनके काफिले के साथ पैदल धारचूला से हल्द्वानी तक आया गया था. जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ तो हमारी भोटिया जनजाति को आदिवासी के रूप में अनुसूचित जनजाति की सूची में रखकर आरक्षण व विशेष सुविधाएं दी गयी. इसके लिए हम लोग स्व.गोविन्द बल्लभ पन्त और पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के शुक्रगुजार हैं.

मुझे पढ़ाई के लिए नैनीताल छात्रावास में रहने का अवसर मिला, जहां मैंने औसत विद्यार्थी की तरह पढ़ाई करके बी.ए. पास किया. सभी आदिवासी छात्रों के लिए मुफ्त भोजन व छात्रवृत्ति की व्यवस्था थी. सच पूछो तो ये हमारे लिए एक क्रान्ति के समान था. सभी लड़कों में पढ़ने और नौकरी करने की होड़ थी.

मैं सन १९७१  में पाकिस्तान  से हुई  लड़ाई के समय शार्ट सर्विस कमीशन के तहत सेना में भरती हो गया था. पांच साल बाद ही एक कैप्टन के बतौर पैंशन लेकर निवृत्त हो गया. सरकार ने मुझे फिर से सिविल में नौकरी दे दी. मैं जल बोर्ड का एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर बन गया. मैं पी.सी.एस. की परीक्षा में सफल रहा तो मुझे राजस्व विभाग का सेक्रेटरी बनाया गया. मैंने आर्मी में की गयी अपनी सेवा को जुड़वाने का आवेदन किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया. वरिष्ठता के हिसाब से कुछ सालों के बाद मुझे आई.ए.एस. का प्रमोशन मिल गया. हर जगह मुझे अनुसूचित जनजाति होने का लाभ भी मिलता रहा. मैं महाराष्ट्र के एक जिले में जिलाधीश के रूप में नियुक्त हुआ, तत्पश्चात अनेक जिलों में स्थांनातरण होता भी रहा. उसी दौरान पूना में मैंने अपना एक घर बनवाया. जिसकी लागत तब करीब पचास लाख रूपये आयी थी. हम लोग उस घर को अपना स्थाई निवास समझने लगे थे. वहीं हमारे बेटे का जन्म भी हुआ. पूना में ही ध्रुव की पढ़ाई-लिखाई हुई. उसने एम.सी.ए. करके एक इन्टरनेशनल कंपनी में नौकरी कर ली. आजकल उसकी नियुक्ति नेदरलेंड में है. मैं तो चाहता था की वह भी भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे, पर उसकी मर्जी नहीं थी."

ऐसा कहते हुए वे बहुत उदास हो गए थे और बहुत देर तक उनके बोल नहीं निकले. खेमा देवी चुपचाप उनका वक्तव्य सुन रही थी. मैं बीच बीच में उनके चेहरे के बदलते भावों को भी देख लेता था. वार्ता के बीच उन्होंने चाय भी मंगवाई। उन दोनों ने फीकी चाय पी क्योंकि दोनों ही मधुमेह से ग्रस्त थे. उन्होंने आगे कहना शुरू किया, ध्रुव ने अपनी इच्छा से अपने साथ काम करने वाली एक यूरोपीय लड़की से शादी कर ली, और अब उनके दो बच्चे हैं. ये लोग हिदुस्तान आने में कई तरह की परेशानियां बता कर टालमटोल करते आये हैं. हम ही कई बार वहां जाकर आये हैं. अब भी जाने को मन तो होता है, पर अब हवाई यात्रा में दिक्कत महसूस करने लगे हैं.

सरकार ने मुझे सेवा के अंतिम वर्षों में प्रांतीय चुनाव आयोग का कमिश्नर बना दिया था. अब मुझे रिटायर हुए भी दस साल हो चुके हैं. पूना में इतने वर्ष बिताने पर भी हम वहाँ परदेस जैसा ही अनुभव कर रहे थे इसलिए यहाँ अपने मूल जिले में रहने का ठिकाना बनाया. यद्यपि हमने ये निर्णय बहुत देर से लिया है. अब तो अल्मोड़ा जिले के  चार टुकड़े हो गए हैं, पर अल्मोड़ा शहर कई मायनों में हमारे लिए सुरक्षित और सुविधाजनक है. मैंने पूना वाला घर तीन करोड़ रुपयों में फर्नीचर व सामान सहित बेच दिया है, और यहाँ अल्मोड़ा में सवा करोड़ में आप देख रहे हैं, ठीक-ठाक घर बन गया है. बड़ी बात ये है कि इस मिट्टी की खुशबू में अपनेपन का एहसास होता है, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर हम दोनों ही थक से गए हैं. बेटा बार बार कहता है कि नेदरलैंड में उनके साथ रहने को आ जाओ पर अब इन पुराने दरख्तों को कब तक नई नई जगह रोपते रहेंगे. ये कहते हुए उनका गला फिर से भर आया. खेमा देवी की आँखें भी छलछला आई.

वे थोड़ा रुकने के बाद बोले, मुझे अस्सी हजार रूपये पैंशन मिलती है. एक लाख से ज्यादा रूपये मेरी जमापूंजी के ब्याज व शेयर्स का रिटर्न आता रहता है. आप देख रहे हैं हम दोनों डाईबिटीज वाले हैं, सब कुछ होते हुए भी खा नहीं सकते हैं. अब ऊपर वाले से शिकायत भी नहीं कर सकते हैं; उसने हमको अपनी तरफ से सब कुछ दिया है.

मैंने इंटरनेट पर आपके ब्लॉग व सारगर्भित प्रसंग पढ़े हैं. आपकी लेखनी द्वारा चुने हुए शब्द विन्यास बहुत प्रिय लगते हैं इसीलिये मैंने आपको बुलाया और आपने भी मेरा मान रखा है. आप मेरी कथा को शब्दबद्ध कर दीजिये. मैं अपनी वसीयत के साथ इस कहानी को भी बांटना चाहता हूँ ताकि मेरे नजदीकी रिश्तेदार, जो अब मेरी जायदाद पर टकटकी लगाये हुए हैं, उनका आपस में कोई विवाद ना हो.  ऐसा कहते हुए वे सोफे पर निढाल हो गए. संध्या समय में मैंने उन्हें आत्मकथा के छूटे हुए अंशों को उजागर करने वाले उनकी निजी जिन्दगी से सम्बंधित अन्य पहलुओं पर एक लम्बी प्रश्नावली बनाकर दी. जिसका जवाब उन्होंने तैयार करके, मेरे द्वारा चाहे गए पारिवारिक चित्रों, तथा बैंक के एक हस्ताक्षरित ब्लैंक चेक सहित उसके अगले दिन मुझे सौंप दिये. मैं अपने घर लौट आया हूँ. अब भी मैं जरूरत महसूस करने पर उनसे फ़ोन पर वार्ता करके उनके जीवन के अनछुए वृत्तांत पूछता रहता हूँ. एक बार पुनः मिलने जाऊंगा. मुझे गोविन्द जोहारी जी की ये आत्मकथा अगले दो माह में सम्पूर्ण करनी है.
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शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल लाखेरी, बूंदी, राजस्थान

डी.ए.वी. का फुल फॉर्म है, ‘दयानंद एंग्लो वैदिक.’ स्वामी दयानंद सरस्वती (१८२४-१८८३) एक महान समाज सुधारक, चिन्तक, देशभक्त सन्यासी हुए हैं. उन्होंने अंध विश्वासों और समाज में फैले पाखंडों के विरुद्ध जन जागरण किया. आर्यसमाज की स्थापना की और सर्वप्रथम स्वराज का सन्देश दिया. हरिद्वार में गुरुकुल कागडी की स्थापना उन्होंने ही की. उनकी मृत्यु अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा एक जघन्य षडयंत्र के तहत जहर देकर कराई गयी थी. मृत्युपरांत उनके अनुयाईयों में एक लाला हंसराज ने सन १८८६ में सर्वप्रथम ‘एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना लाहौर में की  उन्ही दिनों जालंधर (पंजाब) में डी.ए.वी. विश्वविद्यालय की स्थापना भी हुयी थी इसे आधुनिक भारत का नालदा कहा गया है. धीरे धीरे डी.ए.वी. स्कूलों की श्रंखला पूरे देश में फैलती चली गयी. २०१० में जब इसकी १२५ वीं जयन्ती मनाई गयी थी, तो उस वक्त के आंकड़े के अनुसार ५६० पब्लिक स्कूल व ८५ सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल थे. इसके अलावा ७० सस्थान ऐसे हैं जिनमें आर्ट, साईंस, क़ानून, कृषि, आयुर्वेद, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, नर्सिंग, डेंटल, फीजियोथेरेपी, और वैदिक रिसर्च का अध्ययन एवं अध्यापन किया जाता है.

लाखेरी में सन १९७० तक कोई अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं था. उन दिनों उत्तर भारत के सभी शहरों में बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने प्रचलन शुरू हुआ था. यह एक तरह से आवश्यकता भी हो गयी थी क्योंकि बंगाल एवं दक्षिण भारत के बच्चे अंग्रेजी की वजह से प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर रहे थे. नेता लोग जरूर अंग्रेजी का विरोध सार्वजनिक स्तर पर कर रहे थे, पर अपने खुद के बच्चों को इंग्लिस मीडियम स्कूलों में पढ़ाते थे.

शिक्षा के क्षेत्र में क्रिश्चियन मिशनरीज ने बहुत काम किया है. हालाँकि कट्टरपंथी लोग इसे ईसाई धर्म प्रचार का एक तरीका मानते रहे हैं. देश भर में ईसाई नन्स द्वारा यह पुनीत कार्य बहुत गौरवशाली ढंग से अनवरत किया जाता रहा है. चूंकि पब्लिक स्कूल खोलना व चलाना अब एक कमाऊ व्यवसाय भी बन गया है इसलिए आज देश भर में गली-गली, मोहल्ला-मोहल्ला में पब्लिक स्कूल के बोर्ड लगे हुए दिखाई देते हैं.

हमारी लाखेरी में १९७० के आसपास जब कोटा से इमैनुअल मिशनरी स्कूल वाले एसीसी मैनेजमेंट से अपना स्कूल खोलने के सम्बन्ध में मिले तो मैनेजमेंट ने सहर्ष ईश्वर नगर में क्लब के पीछे वाले नए जेएसक्यू (जूनियर स्टाफ क्वार्टर) उनको दे दिया. ये कुछ सालों तक चला, लेकिन आमदनी कम और खर्चा ज्यादा होने से गाड़ी आगे रुक गयी. मैनेजमेंट ने अजमेर के एक रिटायर्ड प्रिंसिपल श्रीवास्तव जी से संपर्क करके नई व्यवस्था ‘प्रोग्रेसिव इंग्लिश मीडियम स्कूल’ खुलवाया, जो सन १९८० तक चला. कंपनी ने उनके स्कूल को आर्थिक सहायता के साथ एक रिहायसी टीआरटी क्वार्टर भी आवंटित किया. इस समय तक एसीसी के कई अन्य कारखानों में पहले से ही डी.ए.वी द्वारा स्कूल संचालित हो रहे थे. दिल्ली मुख्यालय से लिखा-पढ़ी करके यहाँ भी पब्लिक स्कूल की शुरुआत की. छात्रों की संख्या बढ़ने पर एक और जेएसक्यू दिया गया. यहाँ के पहले प्रिंसिपल श्री जे.एन. ऋषि थे. धीरे धीरे स्कूल को अच्छी मान्यता मिलती गयी. छात्र संख्या बढ़ती रही तो कंपनी ने नीचे जींद की बावडी के पास बिल्डिंग बनाकर दी. इसको बनाने में आर्थिक योगदान डी.ए.वी. मैनेजमेंट का भी था या नहीं, मुझे मालूम नहीं है. बाद में नया स्टाफ व नए प्रिंसिपल आते रहे, लेकिन विस्तार का कार्य मुख्यत: मोहनलाल गोयल जी ने किया. उनकी एसीसी मैनेजमेंट से अच्छे सम्बन्ध थे. वे बाद में जयपुर में रीजनल डाईरेक्टर बने.

डी.ए.वी. में भी तब सारा टीचिंग स्टाफ अच्छा नहीं था. पैसा बचाने के लिए ग्रीष्मावकाश के बाद नए चेहरे (अनट्रेंड भी) रखे जाते थे. मैंने एक बार श्री गोयल जी से इस बाबत जब चर्चा की तो वे बोले “आमदनी से खर्चा बड़ा है, ३००० रुपयों में तो ‘GIRL गिर्ल’ ही मिल सकती है.” पर बाद में ये स्थिति नहीं रही थी. आज श्री ए.के. लाल यहाँ प्रिंसिपल हैं. पुराने अध्यापकों में सर्वश्री आर.के. यादव, आर.एस.एल.शर्मा, गिरिराज जायसवाल, व आर.के. गोचर मौजूद हैं. स्टाफ पूरा प्रशिक्षित है. अच्छा स्कूल होना लाखेरीवासियों का सौभाग्य है. यहाँ से पढ़ कर निकले हुए बच्चे अपने जीवन की ऊंचाईयों को राष्ट्रीय स्तर पर छू रहे हैं. इस स्कूल का नाम बूंदी जिले में ही नहीं, पूरे राजस्थान प्रदेश के अग्रिम पब्लिक स्कूलों में गिना जाता है. यहाँ से पढ़ कर निकले हुए बच्चे विदेशों में भी परचम लहरा रहे हैं. स्कूल को इस ऊँचाई तक पहुँचाने का श्रेय जरूर स्कूल प्रबंधन को है, पर एसीसी मैनेजमेंट ने भी भरपूर सहयोग दिया है, विशेषकर पूर्व जनरल मैनेजर श्री पी.के.काकू की व्यक्तिगत शुभचिन्ता नहीं भुलाई जा सकती है. मैं समझता हूँ कि कंपनी अपने कर्मचारियों के बच्चों के अनुपात में आज भी आर्थिक सहायता स्कूल को देती होगी. स्कूल प्रबंधन बताता है कि अब दूर दराज के इलाकों से भी बच्चे यहाँ पढ़ने आने लगे हैं.

अंत में, जैसा कि डी.ए.वी, के नाम से ही जाहिर है, इसमें अंग्रेजी के अलावा संस्कृत व हिन्दी में भी बच्चों को ज्ञान दिया जाता है. उनके चरित्र निर्माण पर विशेष ध्यान रखा जाता है. जय हो.
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शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

बापू हम शर्मिन्दा हैं

बापू, हम शर्मिन्दा हैं!
नाथूराम गोडसे किसी व्यक्ति का नाम नहीं रहा है. यह एक विचारधारा है, जिसने हमारी सहिष्णुता की चूलें हिला दी हैं. जिस हिंसा और घृणा के विरुद्ध आपने अपनी जान गँवाई थी, आज उसका मखौल बनाया जा रहा है. आपकी जय गाने वाले सभी राजनेता सिर्फ सत्ता सुख चाहते हैं. किस किस का नाम लूं, सबने कई कई मुखोटे पहन रखे हैं.

शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर एक नामधारी स्टेज कवि ने चटखारेदार अकविता सुनाई जो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुयी कि :

अच्छा हुआ करेंसी नोट पर तुम्हारा फोटो नहीं छपा
तुम बच गए बाबू
वरना तुम भी गांघी की तरह ही-
वेश्याओं के कोठों पर बेचे जाते.

हम तो बचपन से सुनते आये हैं, पोरबंदर गुजरात देश में एक ऋषि ने जन्म लिया..., दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल. लेकिन आज आपके गुजरात में सताधारी लोगों के खिलाफ आवाज उठाने वालों की बोलती बंद कर दी गयी है. मूल मन्त्र वही है, आजादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’, केवल उसके मायने बदल गए हैं.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की फाईलें खोलने वाले खुले आम आरोप लगा रहे हैं कि उनके अदृश्य होने में आपका और आपके चेले नेहरू का हाथ था. अग्रगण्य लोग आसमान की तरफ थूक रहे हैं, और आम आदमी ताली बजा रहा है. देश के अधिकांश अखबार और टी.वी. चेनल्स पूरी तरह व्यवसायिक हो गए हैं / बिक चुके हैं. सभी को पद्मश्री, पद्मभूषण की दरकार लगती है. मैंने भी ये दुर्दशा देखकर एक तुक्तक लिखा है. अग्रिम क्षमा भी चाहता हूँ.


गांधी को गुजरे अब बरस हो गए
देश में अनेक गांधी हो गए हैं
नॅशनल पार्क में मैं देख रहा हूँ गांधी को कैद
एक चील आकर उनपर सवार हो गयी.
कहते थे गांधी ने जमाने को बीट कर दिया
मैं देख रहा हूँ चील ने गांधी पर बीट कर दिया.
गांधी से चील बड़ी है
तभी तो माथे पर खडी है.
अब गांधी के ताबूत को हटा दो
इसकी जगह चील का ताबूत जड़ा दो.

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शनिवार, 26 सितंबर 2015

एक कड़वी याद

गर्मियों का मौसम था (सन 1994 या 95). रात को करीब डेढ़ बजे फैक्ट्री के जनरल मैनेजर श्री पी. के. काकू का मेरे आवास पर फोन आया कि “टाप क्रशर पर एक आदमी कंपनी के डम्फर के टायर के नीचे दब गया है. वहां हंगामा हो रहा है. आप प्लीज मदद कीजिये. मॉब को समझाइये. लाश को वहां से पोस्टमॉर्टम के लिए अस्पताल शिफ्ट करना होगा.”

उन्होंने ये बात सहज में कह दी, पर उनकी आवाज में घबराहट जरूर थी. वैसे तो उग्र भीड़ के बीच जाना खतरे से खाली नहीं होता है, पर ऐसे मामलों में मैं हमेशा दुस्साहसी रहा हूँ. मैं युनियन अध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारी समझ कर घर से चल पड़ा. 15 मिनट में धटनास्थल पर पहुँच गया. वहां लोगों का जमावड़ा था. मृतक नजदीक में गरमपुरा का रहने वाला था इसलिए भी भीड़ होती जा रही थी. तरह तरह की बातें हो रही थी जैसे “लाश तभी उठेगी जब मुआवजा तय हो जाएगा,” “कंपनी को इसके बच्चे को नौकरी देनी पड़ेगी”. उस भीड़ में मेरे भी मित्र मौजूद थे. उन्होंने मुझे घेर लिया और घटना की पूरी जानकारी दी कि मृतक रूपलाल पारेता (नाम अब मुझे शायद सही याद ना भी हो) ड्राईवर था. एक प्राईवेट पार्टी के पत्थर ढोता था. डम्फर के नीचे सोया हुआ था. डम्फर का ड्राईवर श्री गुलाबचंद भी पारेता बिरादरी का था इसलिए ‘मारो-पीटो’ वाली बात नहीं थी. लेकिन कोई भी यह कहने को तैयार नहीं था कि ‘गलती रूपलाल की थी.’ मैंने वक्त की नजाकत देखते हुए कहा कि "लाश उठाने व मुआवजे में कोई सम्बन्ध नहीं है. मुआवजा कानूनन कंपनी को देना होगा. उसके लिए पोस्टमोरटम रिपोर्ट तो जरूरी है. हम परिवार की जितनी मदद हो सकेगी करेंगे. लोगों की समझ में बात आ गयी. रोते हुए परिवार के लोगों को घर भेजा गया और लाश को मुर्दाघर शिफ्ट किया गया. अगले दिन पुलिस भी बुला ली गयी और मैनेजमेंट द्वारा विधिवत सब कार्यवाही की गयी. पुलिस ने जो रिपोर्ट बनाई उसमें मुझे भी चश्मदीद लिखा गया.

उक्त घटना ने मुझे भी झकझोर कर रख दिया था क्योंकि 17-18 साल पहले यही रूपलाल ड्राईवर नशे में धुत्त होकर अपने ट्रक से मुझे मारने के लिए पीछे पड़ा था. मामला यों था कि सन 1974 में चार साल शाहाबाद में वनवास काटकर जब में वापस लाखेरी लौटा तो यूनियन की सत्ता में काबिज भाई इब्राहीम हनीफी व शिवनारायण गोचर की टीम ने मेरी उपस्थिति पर खुशी नहीं जताई थी. मुझे चुनाव न लड़ने देने के लिए प्रस्ताव पास कर लिया. (हमारी दोस्ती बाद में हुई) चुनाव में उनकी पूरी टीम हार गयी रामा जी अध्यक्ष और मैं जनरल सेक्रेटरी नियुक्त हो गया. अगले ही वर्ष हमने सीमेंट फैडरेशन का अधिवेशन लाखेरी में आयोजित भी कर लिया. मुख्य अथिति मुख्यमंत्री हीरालाल देवपुरा जी थे. भंवरलाल शर्मा जी के अलावा अनेक गणमान्य नेता थे. पूरे देश से प्रतिनिधि आये थे. कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए अध्यक्ष एच. एन. त्रिवेदी व दूधिया जी ने बहुत खुशी जताई थी.

जब मैं कुछ बाहरी प्रतिनिधियों को रात की देहरादून एक्सप्रेस में बिठाने के लिए रेलवे स्टेशन ले जा रहा था तो एक ट्रक हमारी जीप को बार बार टक्कर मारने के लिए पीछा कर रहा था. हम बच निकले थे, पर मालूम हुआ कि मेरे खिलाफ एक बड़ी साजिश चल रही थी. इस साजिश में शराबियों की गैंग थी, जिसका सरगना कामगार संघ के पूर्व अध्यक्ष का निकट संबंधी था. उनको कामगार संघ में मेरा उदय तथा अधिवेशन की सफलता से चिढ़ हो रही थी. मालूम करने पर पता चला की रूपलाल उसका ही मुलाजिम था. पुलिस में रिपोर्ट की गयी. थानेदार जी होशियार निकले. ऍफ़.आई.आर. नहीं लिखी, पर रूपलाल को मेरे सामने बुलाकर डाटा-फटकारा और छोड़ दिया. बाद में ये मालूम हुआ कि थानेदार जी ने आरोपी पार्टी की मोटर साईकिल अपने कब्जे में ले ली थी. उसी में घूमा करते थे. इसके बाद उन लोगों ने कोई वारदात नहीं की. इधर मेरे अभिन्न साथियों ने, जिनमें स्व. सुवालाल व्यास, स्व.अब्दुल हबीब पठान व स्व. कांतिप्रसाद गौड़ थे, मेरी सुरक्षा चाक चौबंद कर रखी थी.

कुदरत के इस खेल को देखिये कि रूपलाल स्वयं टायर के नीचे आकर इस संसार से विदा हुआ और मुझे चश्मदीद बना गया.
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रविवार, 6 सितंबर 2015

चुहुल - ७५

(१)
एक नौजवान शराब के नशे में झूमता हुआ बार के बाहर बैंच पर लेटा हुआ था. एक बुढ़िया ने उसे देखा तो बोली, बेटा शराब मत पिया कर. ये तेरी सेहत के लिए बहुत बुरी चीज है.
शराबी अरे अम्मा, अपना गम गलत करने के लिए पीता हूँ.
बुढ़िया तू अच्छे घर का मालूम होता है. तुझे ऐसा क्या गम है, जिसे भुलाना चाहता है?
शराबी अम्मा तुमको भी कोई गम है क्या?
बुढ़िया अरे बेटा हर किसी को कोई ना कोई गम तो होता ही है.
शराबी तो एक पैग लगाकर देख, खुद मालूम हो जाएगा कि शराब कितनी अच्छी चीज है. लाऊँ तेरे लिए भी?
बुढ़िया ले आ फिर मैं भी देखती हूँ, पर लाना स्टील के गिलास में. लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?
शराबी लड़खड़ाते हुए काउंटर पर गया, और वेंडर से बोला, दो गिलासों में अलग अलग पैग देना. एक स्टील के गिलास में देना.
वेंडर बोला, वो शराबी बुढ़िया आज फिर आ गयी क्या?"

(२)
मुम्बई धारावी की झोपड़पट्टी में रहने वाले एक युवक की शादी की बातचीत वहीं रहने वाली एक लड़की से चल रही थी. एक दिन लड़का टाई लगा कर, स्मार्ट बन कर लड़की से मिलने उसके घर गया. अंग्रेजी का रौब मारते हुए लड़की से बोला, हेलो, इंग्लिश चलेगी क्या?
लड़की शर्माते हुए मुस्कुराई और बोली, प्याज नमकीन के साथ तो देशी भी चलेगी.

(३)
ताऊ मृत्युशय्या पर था. कोई मिलने वाला आया नजदीक जाकर धीरे से ताऊ के कान पर बोला, ताऊ, इब तू राम का नाम ले लिया कर.
ताऊ ने सुन लिया और बोला, इब तो उससे जल्दी ही मुलाक़ात होण वाली है. नाम लेके के करणा है.

(४)
एक बुढ़िया रोज एक नौजवान को एक-दो साबुत बादाम दिया करती थी. एक दिन उसने पूछ लिया, अम्मा कहाँ से लाती हो मेरे लिए ये बादाम?
अम्मा बोली, अरे बेटा ये मेरी चाकलेट में निकलते हैं. चूसती हूँ, पर चबाये नहीं जाते हैं. दात नहीं हैं ना.

(५)
कैलाश अपने पड़ोसी से बोला, भाई साहब कल आपके घर से भाभी जी की नाराजी की आवाजें जोर जोर से आ रही थी. सब खैरियत है ना?
पड़ोसी बोला, क्या बताऊँ? तुम्हारी भाभी को फेसबुक का चस्का लगा है. कल मोबाईल फोन से उसने अपनी फोटो डाली, पर गलती से OXL  में डल गयी. किसी मनचले ने उस पर कमेन्ट कर दिया कि 'इस कबाड़े को कौन ले जाएगा?' मैं उसे पढ़ कर हंस दिया तो वह हो गयी शुरू.
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बुधवार, 26 अगस्त 2015

सीमेंट

भवन निर्माण के विकास पर नजर डाली जाए तो मालूम होता है कि कभी गुफाओं में और कभी ऊंचे पेड़ों पर घर बनाने वाले मनुष्य ने पहले झोपड़ा-कच्चा मकान फिर पत्थर-ईटों वाले पक्के मकान बनाए, जिनमें लकड़ी का भी भरपूर इस्तेमाल होता था, लेकिन लकड़ी का दुश्मन कीड़ा दीमक उसको हमेशा परेशान करता रहा होगा. बाद में मिट्टी के गारे के बजाय चूने का गारा लगाया जाने लगा. उस जमाने में पोजलाना को सुर्खी नाम से भी जाना जाता था. चूने को मजबूती देने के लिए उसमें उरद की दाल, गुड़ आदि मसाले भी मिलाये जाते थे. किलेबंदी को मजबूत दीवार देने के लिए राजे-रजवाड़े ऐसी तकनीक ज्यादा प्रयोग किया करते थे. कहीं कहीं पुराने किलों की दीवारें इतनी मजबूत पाई गयी हैं कि ब्लास्टिंग से भी मुश्किल से टूट पाती हैं.

आधुनिक सीमेंट बनाने की प्रक्रिया में लाईम स्टोन (चूना पत्थर) को काली मिट्टी, बॉक्साईट और आयरन ओर को सही मात्रा में या सही अनुपात में मिलाकर, बारीक पीसकर, उच्च ताप पर पकाया जाता है, सीमेंट कारखानों के किल्न (bhatta) इसमें सक्षम होते हैं. इसको पकाने में पिसा हुआ कोयला साथ में जलाया जाता है, जिसकी सम्पूर्ण राख भी उसमें समाहित हो जाती है. (अरब देशों में जहाँ क्रूड ऑइल खूब और सस्ता भी है वहाँ उसी से पकाया जाता है).

किल्न से निकलने के बाद जो पका हुआ माल निकलता है उसे क्लिंकर नाम से जाना जता है. इसमें जिप्सम और पावर प्लांट का रिजेक्ट माल फ्लाई ऐश, राख, मिलाकर फिर से सीमेंट मिलों में पीसा जाता है. उस पाउडर को कन्वेयर बेल्ट्स या प्रेशर पंप्स के जरिये साइलोज (भण्डार) में भरा जाता है. इस तरह से पिसे हुए सीमेंट को ब्लेंडेड/कंपोजिट सीमेंट या पोजलाना सीमेंट के नाम से जाना जाता है. इस सीमेंट को स्वचालित पैकिंग मशीन द्वारा कट्टों में पैक करके अपने निश्चित वजन के बाद स्वत: आगे फिसलते हुए मार्केटिंग के लिए ट्रकों या रेल वैगंस में पहुँचाया जाता है. कारखानों में कई स्तरों पर दिन-रात क्वॉलिटी कंट्रोल की जाती है.

सीमेंट में प्रयुक्त होनेवाली कैमिकल सामग्री में कैल्शियम ऑक्साईड, एल्युमीनियम ऑक्साईड और आईरन ऑक्साइड के मिश्रण होते है. जिन पत्थरों को पीसा जाता है, उनमें 88% चूने की अपेक्षा होती है. अगर इससे घटिया पत्थर हो तो उसमें हाई ग्रेड स्वीटनर मिलाना होता है. संगमरमर का श्वेत पत्थर १००% लाईम स्टोन होता है इसलिए इसका चूरा बहुत काम आता है.

सामान्य उपयोग में आने वाला भूरा सीमेंट पोर्टलैंड सीमेंट होता है, जिसमें फ्लाई ऐश की मात्रा शून्य होती है और यह पोर्टलैंड सीमेंट, पोजलाना सीमेंट की अपेक्षा बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करता है. किसी भी प्रकार के सीमेंट को कंक्रीट में परिवर्तित करने के लिए सही अनुपात में महीन रेत, मोटी रेत तथा पानी का इस्तेमाल करना अनिवार्य होता है. ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि सीमेंट तैयार होने से पहले उसे भौतिक तथा रासायनिक प्रक्रिया से अच्छी तरह गुजारा जाता है तभी उसमें विशेष गुणवता आती है.

अलग अलग कार्यों में प्रयुक्त करने के लिए रेत का प्रतिशत तय होता है. समुद्र में आयल वेल के प्रेशर से बनने वाले पाइप्स के लिये बनाया जाने वाले सीमेंट कुछ विशिष्ट होता है, जो चन्द मिनटों में जम कर पक्का भी हो जाता है.

सामान्यतया औसत से ज्यादा रेत मिलाने से सीमेंट की गुणवत्ता कम हो जाती है नतीजन निर्माण जल्दी धराशाही हो जाते हैं. निर्माण में प्रयुक्त लोहे की छड़ों की गुणवत्ता भी बहुत मायने रखती है. सभी सीमेंट उत्पादक कम्पनियां भारत सरकार द्वारा निश्चित किये गए मापदंडों के अनुसार गुणवता बनाए रखती हैं. सीमेंट के बारे में बहुत से अच्छे जानकार लोग हैं, जो निर्माण कार्यों के लिए सही सीमेंट के चुनाव की सलाह दे सकते हैं क्योंकि हर प्रकार के सीमेंट में कुछ खासियत होती है, जिसका सम्बन्ध निर्माण के टिकाऊपन (durability) से होता है. विकास की इस दौड़ में ठेकेदारों और इंजीनियरों की ईमानदारी हमारी बुनियाद में है. ऐसा मान कर चलना चाहिए.

सीमेंट के बारे में कुछ तथ्य ये भी हैं कि हमारे जैसे विकासशील देशों में सीमेंट की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत मात्र 5 किलो बताई गयी है, जबकि विकसित देशों में 95 किलो प्रति व्यक्ति है. हमारे तमिलनाडु राज्य में अन्य प्रान्तों के मुकाबले ज्यादा सीमेंट उत्पादन किया जाता है. वर्तमान में करीब 36 कंपनियां सीमेंट उत्पादन से जुड़ी हुयी हैं. ए.सी.सी, अम्बुजा, और लाफार्ज नाम की बड़ी कंपनियों को स्विस कंपनी होलसिम ने अधिगृहित कर लिया है.
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शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

मिष्टान्न

आजकल जब दूध ही नकली बिकता है तो दूध से बनी मिठाईयों की शुद्धता की भी कोई गारंटी नहीं है. इसलिए लोग मावा (खोया) से बनी मिठाईयों से परहेज करने लगे हैं. वार-त्यौहारों पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भूले-भटके छापा मारकर नकली मावे को पकड़ कर अखबारों की सुर्ख़ियों में लाते रहते हैं, बाकी साल भर सोते रहते हैं. जो लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं, वे वसायुक्त मिठाईयों से दूर रहते हैं क्योंकि ये कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाने के मुख्य स्रोत हैं. वैसे तो मीठा हमारी रसना की पहली पसंद रहती है, और अनादि काल से हमारे देश में शुभ कार्यों में मिठाई शगुनी मानी जाती है. अभी भी हम लोग रिश्तेदारी में मिठाई के डिब्बों का आदान-प्रदान करना जरूरी व्यवहार मानते हैं. इसलिए कोशिश यह रहती है कि मिठाई विश्वसनीय हलवाईयों/स्वीट-मार्ट्स से ही खरीदी जाए. बेसन के लड्डू, पेठे की मिठाई आदि कई मिठाईयां ऐसी होती हैं, जिनमें मिलावट की संभावनाएं बहुत कम होती हैं. हमारे पड़ोस में रहने वाले गुप्ता जी तो शगुन में गुड़ की डली देना उत्तम मानते हैं.

मिठाई को मिष्टान्न भी कहा जाता है. बड़े हलवाईयों की दूकानों को जब स्वीट्स या स्वीट-मार्ट नाम नहीं थे, तब बड़े बड़े अक्षरों में मिष्टान्न भण्डार लिखा रहता था. मिष्टान्न में चीनी, दूध, मावा, मैदा, सूजी, गेहूं का रस, चावल का आटा, दालों का चूर्ण, गोंद, आरारोट, कोक, साबूदाना आदि पदार्थ मिलाये जाते हैं. खुले बाजार में उपलब्ध टॉफ़ी-चाकलेट भी बच्चों के पसंदीदा मिठाईयां होती हैं. बचपन में संतरे के स्वाद+रंग वाले चीनी से बनी ‘विलायती मिठाई की गोलियां चूसने का आनंद कैसे भूला जा सकता है. गेहूं की बोवाई के बाद गांव में जो गन्ने की पेराई होती थी और गुड़ बनता था, उसकी खुशबू व स्वाद आज तक जेहन में बसे हुए हैं.   

आज से बीस-पच्चीस साल पहले हम लोग डिटर्जेंट वाले दूध की कल्पना भी नहीं करते थे. हमारे दूध की नदियों वाले देश को बेईमान मिलावटखोरों ने दाग लगा कर बदनाम कर रखा है. लेकिन ये भी सच है कि ईमानदारी और नेकी अभी पूरी तरह मरी नहीं है. सब लोग ऐसे नहीं हैं. आगरा का बेहतरीन पेठा, मथुरा के स्वादिष्ट पेड़े, अल्मोड़ा की बाल मिठाई और सिंगोड़े, मेरठ की रस मलाई, जयपुर के घेवर, बीकानेर के रसगुल्ले, कोलकता की बंगाली मिठाईयां, मुम्बई का कराची हलवा, दिल्ली का सोहन हलवा, गुलाब जामुन+कालाजाम, हैदराबाद का मैसूर पाक, हरियाणा की कुल्फी, कलाकंद (मिल्क केक) और भी बहुतेरी देसी मिठाईयां हैं; खाने वालों का दिल हो गुलगुल वारे वारे वाह वाह.

अब हलवाई तो सिर्फ छोटे-मोटे शहर कस्बों के नुक्कड़-गलियों-बाजारों में पाए जाते हैं, जो जलेबी, बर्फी, इमरती, कचोरियों, समोसों आदि चटपटे पकवानों से लोगों को तृप्त करते रहते हैं, बाकी बड़े शहरों में एयरकंडीशन्ड शोरूम्स में स्वीट्स या 'स्वीटमार्ट बन गए हैं. जहाँ देसी-विदेशी नाम या ब्रांड के लेबल से सजी रहती हैं. खूब बिकती भी हैं. भाव पूछने की जरूरत नहीं होती है क्योंकि हर थाल पर कीमत का तमगा लगा होता है. जो चीनी बाजार में 30 से 40 रुपयों में प्रति किलो बिकती है वह मिठाई बन कर 600-700 तक की ऊंची कीमत में मिलती है. क्योंकि इसमें पिस्ते, काजू आदि मेवे यानि ड्राई फ्रूट्स का तड़का  लगा होता है. अब तो बड़ी दूकानों में "शुगर-फ्री मिठाईयां" भी मिलती हैं.  

जहां तक मुझे जानकारी है, हमारे देश में मिठाईयां, मैनुअल, यानि कारीगरों के अपने हाथों से बनायी जाती है, जबकि विकसित देशों में ये काम स्वचालित, साफ़-सुथरी मशीनों से होता है. मिठाई खाने वाले यदि हमारे कारीगरों की वर्कशाप नहीं देखें तो ज्यादा अच्छा है, ऐसा लोग कहते हैं. जो मिठाई चांदी के वर्क में थालों में सजी रहती है, उसके खाद्य रंगों व रसायनों के मिलावट के बारे में भी सजगता की आवश्यकता है.

अंत में शुभ कामना है, बनी रहे ये शहद की दुनिया, खाते रहें रबडी के मालपुवे’.  हाँ, मधुमेह वाले डॉक्टरी सलाह के बिना बदपरहेजी ना करें.
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लाखेरी नगरपालिका

अरावली पर्वतमाला की गोद में बसा हुआ लाखेरी नगर, बूंदी जिले का दूसरा बड़ा नगर है. 2011 की जनगणना के अनुसार इसकी कुल आबादी 29572 थी. पर्वतीय उपत्यकाओं के बीच हरा भरा नखलिस्तान सा लगने वाला ये नगर कैनवस पर उकेरा गया प्राकृतिक सौन्दर्य का एक विहंगम चित्र सा नजर आता है, जिसमें नीम, शीशम, आम, जामुन, पीपल, तथा बबूल के वृक्षों की भरमार है. जंगली प्लान्टेशन के फलस्वरूप सर्वत्र कांटेदार कीकर (अंगरेजी बबूल) की झाडियां फ़ैली हुई हैं.

निकाय क्षेत्र में बड़े बरसाती सरोवर व मीठे पानी के कुंवे-बावडियों की भरमार है. हर रविवार को मुख्य बाजार के आगे हाट लगता है, जो आसपास ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है. क्षेत्र में अब अनेक स्कूल, कॉलेज, अस्पताल हैं, और सीमेंट का एक कारखाना है, जो गत एक सौ वर्षों से राष्ट्र निर्माण में सहभागी है तथा इस क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि का जीवंत प्रमाण है.

सन 1976 तक गरमपुरा पंचायत क्षेत्र नगरपालिका सीमा के बाहर था. विस्तार होने पर ए.सी.सी. के लीज एरिया सहित उसका विलय नगरपालिका में कर दिया गया. विस्तार होने पर लाखेरी रेलवे स्टेशन से इंदरगढ़ रोड पर भावपुरा तक, बूंदी रोड पर शंकरपुरा+सुभाष नगर  से लेकर प्राचीन बसावट ब्रह्मपुरी व तमोलखाना तक सीमाएं फ़ैल गयी हैं. परिसीमन करके कुल 25 वार्ड्स बनाए गए हैं.

किसी स्वनामधन्य ‘लाखा गूजर के नाम पर इस गाँव का नाम लाखेरी पड़ा, ऐसा कहा जाता है. ये गाँव कब बसा, और इसमें लाल पत्थरों से बने सुन्दर मंदिर और बावडियां बूंदी के राजाओं ने या किसी और ने बनाए, इस बारे में मुझे कहीं से प्रामाणिक तथ्य नहीं मिल पाये. यों तो लाखेरी नगर निकाय का अभ्युदय सन 1937-38 से बताया जाता है. नागरिक सुविधाओं की देखरेख के लिए किन किन लोगों ने इसकी शुरुआत की इसका भी कोई विवरण नहीं मिल सका है. राजस्थान राज्य के पुनर्गठन के बाद दिनांक 5-12-1951 के सरकारी नोटिफिकेशन द्वारा लाखेरी नगरपालिका को लोकल सेल्फ गवर्नमेंट की मान्यता मिली, ऐसा विकीपीडिया के इतिहास में दर्ज है.

पिछली सदी के पांचवे दशक में ए.सी.सी. ने जब गाँव के बीच से चमावली की तरफ अपनी रेल लाइन डालनी चाही तो उसके विरुद्ध एक जन आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था, जिसका समाधान एक समझौते के तहत हुआ कि कंपनी ने गाँव में ब्रह्मपुरी के आख़िरी छोर तक पक्की सीमेंट की सड़कें बनवाई, अस्पताल की सुविधा दी, सार्वजनिक स्थलों पर निशुल्क बिजली की व्यवस्था दी. अनेक सार्वजनिक हितों में आर्थिक योगदान दिया और स्थाई रूप से हर महीने कुछ निश्चित राशि अनुदान के रूप में देना स्वीकार किया. इस आन्दोलन का नेतृत्व स्व. गजानंद जी पुरोहित और भू. पू. विधायक स्व. भंवरलाल शर्मा द्वारा किया गया था, जिनको बूंदी के वकील (बाद में अनेक विभागों के मंत्री रहे), पंडित बृजसुन्दर शर्मा का वरदहस्त प्राप्त था. विजयद्वार उसी जीत का प्रतीक माना जाता है. इस द्वार के ऊपर से रेल लाइन आज भी गुजरती है. उस आन्दोलन में स्व. हरिप्रसाद शर्मा (भू.पू.विधायक), नंदकिशोर दीक्षित (डब्लू) आदि अनेक नौजवानों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. इस आन्दोलन को लाखेरी में एक बड़ी राजनैतिक चेतना के रूप में देखा गया क्योंकि इसके बाद अनेक समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम उभर कर सामने आई थी, जिनमें प्रमुख नाम जो लेखक की जानकारी में हैं, वे हैं, सर्वश्री जडावचंद शर्मा, मानकचंद जैन, दुर्गालाल शर्मा, मदनलाल शर्मा (खेवरिया) नेमीचंद जैन, दीनानाथ शर्मा, छीतरलाल जैन, किशनचंद शर्मा, श्रीकृष्ण शर्मा, गोबरीलाल राठोर, दौलतराम शर्मा, बाबूलाल शर्मा, नरसिंहलाल शर्मा आदि. (जिन नामों को मैं स्मरण नहीं कर पाया हूँ, सुधी पाठक कृपया टिप्पणी द्वारा जोड़ने का कष्ट करें.)

प्रारम्भिक वर्षों में स्व. गजानंद जी पुरोहित इसके संरक्षक/ चेयरमैन, सब कुछ थे. उनकी टीम में कौन कौन सक्रिय थे, ये भी पुरानी बात है. हाँ, ये भी सुना था कि कारखाने में बतौर कैशियर कार्यरत स्व. केशवलाल दीक्षित भी म्युनिसपैलिटी का कार्य देखते थे. 1951 के बाद विधिवत चुने हुए चेयरमैनों की क्रमबद्ध सूची इस प्रकार है: सर्वश्री मानकचंद जैन, हरिप्रसाद शर्मा, नंदकिशोर दीक्षित, मदनलाल शर्मा, रामनारायण शर्मा, दौलतराम शर्मा, राधेश्याम शर्मा, इब्राहीम गांघी, मोडूलाल महावर, महावीर गोयल, चौथमल नागर, और राकेश सेनी.

राजनैतिक उठापटक के दौरान बीच बीच में सरकारों द्वारा बोर्ड भंग करके प्रशासक भी नियुक्त किये जाते रहे हैं. ताजा सामाचार यह है इस बार हुए चुनावों के फलस्वरूप जो नया बोर्ड आया है वह अभी अच्छा काम कर रहा है.
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रविवार, 16 अगस्त 2015

रोमांच

रोमांच में भी एक तरह की आनन्दानुभूति होती है. हमारे जीवन में कई ऐसे अवसर आते हैं, जब कुछ नया होने को होता है और हम अनेक कल्पनाओं के साथ उस क्षण की प्रतीक्षा किया करते हैं.

मेरे इस दीर्घ जीवन में भी कई क्षण रोमांचित करते रहे हैं, नवीनतम ये है कि मैंने पहली बार दिल्ली की मैट्रो रेल से यात्रा की है. मैं नियमितरुप से पुस्तकें व समाचार पत्रों का पाठक  रहा हूँ और समसामयिक विषयों पर अपनी जानकारी अपडेट करता रहता हूँ. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मदनलाल खुराना जी के समय से मैट्रो रेल का निर्माण प्रारम्भ हुआ था, और शीला दीक्षित जी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में मैट्रो रेल का ये बड़ा प्रोजेक्ट कार्यरूप में परीणित हुआ. गत वर्षों में भी बीच बीच में कई बार दिल्ली आना जाना हुआ. तब इस रेल के लिए जगह जगह सडकों की खुदाई तथा ऊंचे ऊंचे सीमेंट के स्तम्भ बनते देखे थे. सचमुच ये बहुत बड़ी परियोजना थी विशेषकर अंडरग्राउण्ड ट्रैक डालना बड़ा दुरूह कार्य था ऊपर बड़ी बड़ी इमारतें और उनके नीचे खुदाई करके रेलवे स्टेशन बनाए गए हैं.

परिवहन के लिए निजी साधन होने के कारण मेरे पुत्र प्रद्युम्न ने मुझे मैट्रो रेल में सफ़र करने का कोई मौक़ा नहीं दिया।. परन्तु इस बार मैं हल्द्वानी से ही ठान कर आया था कि मैट्रो रेल के सफ़र का अनुभव जरूर करूंगा.

ठेठ एसियाड के समय (इंदिरा गांधी का युग) से ही दिल्ली ने विकास की गति पकड़ी थी, अन्यथा उससे पहले दिल्ली के किसी सड़क या चौराहे पर सिगनल लाईटें तक नहीं लगी हुयी थी. तब दिल्ली थी भी बहुत छोटी. मैं सन 1957-58 में दिल्ली की सड़कों पर साईकिल से खूब घूमा था. सरकारी बसों में सफ़र करना भी बहुत सस्ता और सरल हुआ करता था. सन 1958-59  में एक नई स्कीम निकाली गयी थी कि छुट्टी के दिनों में महज एक रूपये का टिकट लेकर दिन भर कहीं भी घूमा जा सक़ता था. बसें भी सीमित थी. कुल 31 रूट थे. 21 नंबर यूनिवर्सिटी आती जाती थी. आख़िरी 30 नम्बर रेलवे स्टेशन से कालकाजी और 31 नंबर मालवीय नगर जाती थी. ये दोनों रिमोट रिफ्यूजी बस्तियां थी.

गत चालीस-पचास सालों में ना जाने इतनी जनता कहाँ से दिल्ली में आ जुटी है. दिल्ली के चारों तरफ दूर दूर तक बहुमंजिली इमारतों का जंगल खड़ा हो गया है. और ये अभी भी अपना क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है. तब जमुना पार कुछ भी नहीं था, गांधी नगर, शहादरा व गाजियाबाद को आने जाने के लिए केवल लालकिले के पिछवाड़े वाला यामुनापुल था, जिसमें ऊपर रेल लाइन व नीचे मोटर+पैदल मार्ग होता था. कनॉटप्लेस, जिसे अब राजीव चौक नाम दिया गया है, तब भी सुन्दर था. दोहरे चक्र में गोल खम्भों वाली एक सी धवल इमारतें अंग्रेजों के समय की बनी हुयी हैं. उनकी ही स्थापत्यकला का नमूना हैं. अब आसपास जो ऊंची बिल्डिंग्स दिखती हैं, वे तब नहीं थी. दिल्ली विश्वविद्यालय, किंग्सवे कैम्प, तीमारपुर, पुराना विधान सभा भवन, कश्मीरी गेट, दरियागंज, इंडिया गेट, रेसकोर्स.सफदरजंग, लालकिले के सामने जैन मंदिर,  गुरुद्वारा, फुव्वारा, चांदनी चौक, सदर बाजार, पहाड़ गंज, बिड़ला मंदिर, करोलबाग, झंडेवालान, सब्जीमंडी, सब सिनेमा रील की तरह घूम रहे हैं. पुरानी दिल्ली की सड़क के बीचोंबीच एक ट्राम धीमी गति से घंटी बजाते हुए चलती थी.  कुतुबमीनार को रेलवे स्टेशन से 17 नंबर बस जाती थी. रास्ते में युसूफ सराय से आगे जंगल पड़ता था. 

आयुर्विज्ञान संस्थान तब बनने लग गया था. पुराने किले की बगल में नया चिड़िया घर बनाया जा रहा था. सन 1958 में प्रगति मैदान में एक प्रदर्शनी लगी थी, जहां अमेरिकी स्टाल पर मैंने पहली बार टेलीवीजन चलता देखा था. तब मेरी समझ में इसके बारे में कुछ नहीं आया था. चूंकि मैं दूर दराज उत्तरांचल के एक अति पिछड़े गाँव से आया था, मेरे लिए दिल्ली एक दूसरी ही दुनिया थी जिसके अनुभव बहुत रोमांचित करने वाले होते थे. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पैथोलाजी की ट्रेनिंग लेकर कुछ महीने दिल्ली म्युनिसिपल चिकित्सालय में काम करने के बाद बड़ी वेतन+सुविधाओं के लालच में 10 अगस्त 1960 को दिल्ली छोड़कर लाखेरी राजस्थान चला गया.

दुनिया गोल है. आज फिर से घूम फिर कर दिल्ली आ गया हूँ. वर्तमान विहंगम दिल्ली को युग परिवर्तन की अनुभूति के साथ देख रहा हूँ. रोमांचित हूँ. मेरा पौत्र सिद्धांत बॉस्टन (अमेरिका) में फिजिक्स इंजीनियरिंग पढ़ रहा है. इन दिनों भारत आया हुआ है. मैंने उसको अपनी इच्छा बताई कि मुझे मैट्रो ट्रेन के सफ़र का अनुभव करना है तो उसने मुझको बताया कि शाम-सुबह बिजी आवर्स में तो बहुत भीड़भाड़ रहती है. दोपहर के समय जाना चाहिए. ठीक 55 साल बाद 11 अगस्त 1915 को उमस भरी दोपहरी में जब हम वैशाली मैट्रो ट्रेन में दाखिल हुए तो ए.सी. की ठंडक से बहुत राहत महसूस हुई. भीड़ तो तब भी, थी लेकिन एक नौजवान ने तुरंत सीट छोड़ कर मुझे बैठने का आमंत्रण दे दिया.  कुछ देर बाद मुझे मालूम हुआ की दरवाजे के पास वाली छोटी सीटें बुजुर्गों/विकलांगों के लिए नामांकित की गई है. ये सूचना सीट के पीछे लिखी गयी है. मैं यद्यपि अभी भी दिल से जवान हूँ, पर ये घटना मुझे बूढ़ा होने का अहसास जरूर करा गयी.

मैंने कई बार मुम्बई की लोकल ट्रेन में सफ़र किया है, जहाँ लोग धक्का मुक्की करके भागते रहते हैं. बिजी आवर्स में तो हम जैसे लोगों का चढ़ना उतरना बहुत मुश्किल काम है. अपनी विदेश यात्राओं के दौरान जर्मनी में फ्रेंकफर्ट, थाईलैंड में बैंकाक, तथा अमेरिका के अटलांटा एयरपोर्ट पर मैट्रो की ही तरह ट्रेन के डिब्बे यात्रियों को उनके निर्धारित गेट तक लाती- ले जाती है. वहां मैंने देखा कि लोग बहुत अनुशासित होते हैं. उसकी थोड़ी झलक मुझे अपनी मैट्रो में अवश्य मिली क्यू में लगने का एटिकेट दिल्ली वालों में आया है अन्यथा मैंने यहाँ बसों में चढ़ने उतरने वालों को धक्का मुक्की करते व जेबकतरों के शिकार होते हुए भी देखा है.

वैशाली से आनंद विहार, प्रीत विहार, निर्माण विहार, कड़कड़दूमा, यमुना विहार, प्रगति मैदान, इन्द्रप्रस्थ व बाराखम्भा, इसके बाद धरती के अन्दर गुफा से गुजरते हुए राजीव चौक जंक्शन पहुंचे. वहां सिद्धांत ने मुझे ब्लू लाइन, व अन्य रूट पर यलो लाइन या परपल लाइन ट्रेन के बारे में बताया. ट्रेन में हर स्टेशन आने पर यात्रियों को सूचना देते हुए सावधान किया जाता रहा. मैट्रो रेल में सस्ते में सफ़र होता है, और समय की बचत भी बहुत होती है. कुल मिलाकर राजीव चौक पहुँचने के बाद हमने अंडरग्राउंड पालिका बाजार का भी एक छोटा चक्कर लगाया और उसी रोमांच के साथ घर लौट आये. मैं मन ही मन एक पुरानी फिल्म का गाना दुहरा रहा था, "ये जिन्दगी के मेले कभी ख़तम ना होंगे, अफसोस हम ना होंगे."
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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

जिग-जैग डैम

लाखेरी सीमेंट प्लांट तथा इसकी रिहायसी कालोनी के लिए अंग्रेजों के समय में ही पानी की व्यवस्था के कई विकल्प रखे गए थे. नानादेवी का नलकूप, गाँव का बड़ा तालाब, जिसमें बरसाती पानी जमा होता है, और सखावादा में पम्पिंग स्टेशन, जो पहाड़ी के ऊपर से पाईप लाइन लेते हुए नयापुरा स्थित रिजरवॉयर में पानी लाता है, जहां पानी फ़िल्टर होता है, और उसका ट्रीटमेंट किया जाता है. पिछली सदी के चौथे दसक में चमावली की पहाड़ियों से आने वाले  बरसाती पानी को रोक कर जमा करने के लिए एक बांध बनाया गया. और उसी के पूर्व में बूंदी रोड के किनारे भरान करके एक और मजबूत डैम बनाया गया, जिसे जिग-जैग डैम या बन्दा भी लोग कहा करते हैं. इसको मजबूत सीमेंट की दीवार देकर बनाया गया है. पानी के दबाव या लहरों के जोर को रोकने के लिए डैम के किनारे को आड़े-तिरछे कोण देकर ऐसी बनावट दी गयी है कि ये बहुत सुन्दर दीखता है. खासतौर पर जब पानी ऊपर से छलकता जाता है बरसात में यहाँ एक बड़ी झील बन जाती है. चूंकि इसमें पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं है, पानी गर्मियों तक धीरे धीरे सूख जाता है. इसलिए आवश्यकतानुसार पानी जमा रखने के लिए दक्षिण में रेलवे स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर आगे नयागाँव के पास मेज नदी पर एक छोटा पम्पिंग स्टेशन बनाया गया, जहां से पाईप लाइन द्वारा सीधे जिग-जैग डैम में पानी आता था और एक पम्प द्वारा पाईप के माध्यम से फ़िल्टर प्लांट से जोड़ा गया था.

जिग-जैग डैम मानसून के दिनों में छलकने लगता है. यह स्थान बहुत रमणीक व दर्शनीय हो जाता है. कई बार गर्मियों में पानी सूखने के बाद इसमें जमा सिल्ट हटाना भी जरूरी होता था.

गौरतलब है कि कंपनी की सारी जमीन पहले बूंदी रियासत से तथा बाद में रियासतों के विलय के बाद राज्य सरकार से लीज पर ली हुयी है. बूंदी के राजा इस कंपनी के स्थानीय डाईरेक्टर हुआ करते थे.

आठवें-नवें दशक में फैक्ट्री लम्बे समय तक घाटे के दौर से गुजर रही थी. वैट प्रोसेस  तथा पुरानी टेकनोलाजी होने के कारण उत्पादन कम और लागत ज्यादा आ रही थी. तब खर्चे घटाने के क्रम में जिग-जैग डैम की उपयोगिता के बारे में भी सोचा गया होगा क्योंकि इसकी मैनटेनैंस पर बड़ा खर्चा आ रहा होगा. उसी बीच ये भी देखा गया की डैम की नींव में से बहुत पानी का रिसाव होने लगा था. डर ये भी था कि कभी अगर डैम टूट गया या फूट पड़ा तो आगे बजरंगनगर व शिवनगर की नई बसावट डूबत में आ जायेगी. ये सारी संभावनाएं हैड आफिस को भेजी गयी तो वहाँ से आदेश हुआ की डैम को जिला प्रशासन को दे दिया जाये. जांच- पड़ताल के इस प्रोसेस में कई साल लग गए. इस बीच कुछ लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा करके गेहूं तथा सरसों की खेती करना भी शुरू कर दिया था.

मुझे याद है कि जब सं १९६० में मैं लाखेरी आया था तो वह अगस्त का ही हरियाला मौसम था आगे वर्षों में इस डैम की पाल पर लोग परिवार सहित पिकनिक मनाने आते थे. बन्दा मंदिर की तरफ तालाब के किनारे नाव के लिए एक टिन शेड बना हुआ था. लोग नौकायन का आनन्द लिया करते थे. किनारे की सीढ़ियों पर नहाना-धोना भी करते थे, लेकिन ये भी सच है कि यहाँ पर जानलेवा दुर्घटनाएं भी बहुत होती थी.

अब मुझे लाखेरी छोड़े हुए लगभग सोलह साल हो गए हैं इसलिए वर्तमान व्यवस्था के बारे में मुझे पूरी जानकारी नहीं है. फेसबुक पर हमारे मित्रों द्वारों डाली गयी चित्रावली से मालूम हो रहा है कि ये स्थान आज भी गुलजार है. गुलजार रहना चाहिए. सभी मित्रों को शुभ कामनाएं.

पुन:श्च : मेरे इस लेख पर एक मित्र ने टिप्पणी करके बताया है कि जिला प्रशासन ने इस डैम को लाखेरी नगर पालिका को जीर्णोद्धार के लिए सौंप दिया था. तत्कालीन चेयरमैन स्वनामधन्य श्री महावीर गोयल ने इस कार्य योजना में व्यक्तिगत रूचि लेकर तत्कालीन  सांसद श्री रामनारायण मीणा से एक लाख रुपयों की आर्थिक अनुदान लेकर संपन्न कराया. श्री गोयल ने ये भी बताया कि तत्कालीन विधायक श्री घासीलाल मेघवाल जी ने भी इस प्रोजेक्ट में रूचि लेकर आर्थिक मदद की थी.
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मंगलवार, 11 अगस्त 2015

पैगाम - ३

हम इस देश के चौकीदार हैं, जन जन को बता दो;
न खाऊँ न खाने दूं के जुमले को अब धता बता दो.

     हमने महंगाई के आंकड़े को माइनस में दिखा दिया है,
     हमने सोने को चांदी के भाव बिकवा दिया है,
     हमने स्विस बैंक खंगाल लिए, काला कहीं नहीं मिला है,
     अब गंग-जमन में भी कहीं कोई गंदा नाला नहीं मिला है,
     फिर भी कहीं कोई गन्दगी मिलती है तो,
     जरूर बचे-खुचे कांग्रेसियों की करामात होगी.
इनको संसद के बाहर का रास्ता बता दो!
हम देश के चौकीदार हैं, जन जन को बता दो!

     हमने चीन, जापान और कुसतुन्तुनिया में झंडे गाड़ दिए हैं,
     ये दीगर बात है की हमारे कश्मीरियों ने तिरंगे फाड़ दिए हैं.
     हमारे छप्पन इंच के सीने को देखकर-
     दुनिया विश्वगुरू मानने को तैयार बैठी है,
     सीमा पर रोज मारे जा रहे हैं जवान-
     क्या करें? नाराज होकर तोपें खामोश बैठी हैं.
एक के बदले बीस ये जुमला था, सैनिकों को बता दो!
हम इस देश के चौकीदार हैं, जन जन को बता दो!

     नापाक पाक की ये हिमाकत कि लौटा दिए हमारे आम और मिठाई,
     खून का रिश्ता है, कैसे तोड़ दें एकाएक, मेरे भाई,
     ये बात इन दहशतगर्दों को बता दो,
     सजा तो अदालत देगी बीस साल बाद,
     हम अब भी खिलाएंगे बिरयानी नावेद को,
     ये उसके अब्बू और नवाज शरीफ को बता दो,
खता ये कि हमारी लोकशाही है बता दो!
हम इस देश के चौकीदार हैं जन जन को बता दो!

     हमने संसद में हुल्लड़ का नया ललित गेट खुलवा दिया,           
    हमने मध्यप्रदेश के व्यापम को व्यापक बना दिया,
     फिर भी अगर कोई नौजवान नौकरी को रोता है तो-
     उसे पच्चीस साल बाद का कोई अच्छा दिन बता दो.
उससे पहले कोई चमत्कार भी हो सकता है, उसे बता दो!
हम इस देश के चौकीदार हैं जन जन को बता दो!

     लोग खुशी खुशी सब्सिडी छोड़ रहे हैं
     हाँ, सांसद अभी भी गरीबी झेल रहे हैं
     डीजल-पेट्रोल आधे दाम पर बिक रहे हैं
     किसान अब खुश हैं कि जमीन अध्यादेश से ली जायेगी
     ये आत्महत्याएं जो इश्क की बदौलत हो रही हैं,
     उनका मातम मनाना अब  बंद करा दो.
मरने के बाद पेंशन पक्की है, ये बात किसानों को बता दो!
हम इस देश के चौकीदार हैं  जन जन को बता दो!

                    ***