मंगलवार, 10 जुलाई 2018

यादों का झरोखा -२९ स्व. कांतिप्रसाद गौड़. (अध्यापक)



सन १९६१-६२ में लाखेरी एसीसी मिडिल स्कूल में करीब एक दर्जन जूनियर टीचर्स भरती किये गए थे, तब ये स्कूल हेडमास्टर स्व. गणेशबल भारद्वाज जी के नेतृत्व में अपने चरमोत्कर्ष पर था लगभग ३५ अध्यापक व ३२०० विद्यार्थी इससे सम्बद्ध थे. बूंदी जिले का ही नहीं पूरे राजस्थान प्रांत में ये एक उत्कृष्ट प्रतिष्ठान के रूप में जाना जाता था. इन एक दर्जन टीचर्स में शम्भूप्रसाद वर्मा, देवकिशन वर्मा, अत्तरसिंह, उदयसिंह जग्गी, शमशुद्दीन व कांतिप्रसाद गौड़ आदि थे.

स्व. कांतिप्रसाद के जीजा स्व, दयाकिशन शर्मा माइंस में सुपरवाइजर हुआ करते थे, दयाकिशन जी के बड़े भाई स्व. नंदकिशोर भारतीया भी तब क्वारी में क्लर्क के पद पर थे, बाद में विभागीय परिक्षा पास करके फोरमैन बने थे; रिटायरमेंट के समय वे कैमला माइंस में कार्यरत थे. ८० के दसक में दयाकिशन शर्मा रिजाइन करके ऊंचे पद+वेतन पर मिर्जापुर चले गए थे. अपने इन्ही रिश्तेदारों के स्रोत से कान्तिप्रसाद लाखेरी आये थे.

स्व. कांतिप्रसाद से मेरी नजदीकी तब हुयी जब वे सन १९७५ में यूनियन के चुनावों में अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में चुन कर आये थे और उनको संगठन का ट्रेजरार बनाया गया था और उन्होंने इसे बखूबी निभाया भी. वे बहुत दिलेर व स्पष्टवादी व्यक्ति थे, आपातकाल/ संकटकाल में उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया. बाद में जब कंपनी द्वारा स्कूल का पराभव किया जाने लगा तो उन्होंने भी VRS  ले लिया और अपने गाँव (जिला बुलंद शहर) चले गए. उनके तीन बेटे थे सबसे बड़े संतोष उर्फ़ धीरेन्द्र कौशिक (अब स्वर्गीय) कैमोर इन्जीनियरिंग इंस्टीच्यूट से टेकनीशियन कोर्स करके गागल फैक्ट्री में पोस्टिंग में आ चुका था. सर्विस में रहते हुए ही उसका विवाह भी कर दिया था, बारात सवाईमाधोपुर रेलवे कालोनी में गयी थी, मैं भी उसमें शामिल था.

समय अपनी गति से भागता रहता है और हम लोग गुजर गए लोगों को धीरे धीरे भूलते चले जाते हैं. सं १९९७ में धीरेन्द्र ने खुद प्रयास करके लाखेरी स्थानातरण करवा लिया वह अपनी पत्नी तथा दो बच्चों के साथ सामान सहित सीधे मेरे क्वाटर G-23 में आ धमाका था क्योकि मैनेजमेंट ने इसी शर्त पर उसका स्थानान्तरण स्वीकार किया था कि क्वाटर नहीं दिया जाएगा (नए कारखाने के निर्माण के लिए बाहर से आये बहुत लोग लाखेरी में थे).

मैं तब यूनियन प्रेसिडेंट था, एक तरफ उसके पिता से पुराने रिश्ते थे और दूसरी तरफ धीरेन्द्र की होशियारी कि ‘अंकल के ही घर रहेंगे, वही व्यवस्था करेंगे.’  तब प्लांट हेड श्री पी.के.काकू थे मैंने उनको अपनी व्यथा बताई तो उन्होंने एक अबैनडेंट लेबर क्वाटर की रिपेयर करवाकर उसे अलाट कर दिया था.

सन २०१६ को जब मेरा लाखेरी जाना हुआ तो धीरेन्द्र मिला था वह तब कालोनी में किसी एल टाइप में रह रहा था ऐसा उसने बताया था. परसों जब लाखेरी से सूचना आई कि धीरेन्द्र कौशिक का रेलवे स्टेसन पर एकसीडेंट में निधन हो गया है  तो फेसबुक पर मित्रों को सूचित करने के लिए मुझे शोक में शब्द नहीं मिल रहे थे.

मृत्यु एक शाश्वत सत्य है पर अकाल मृत्यु पर अपार दुःख होता है लाखों के लाखेरियंस ग्रुप के सभी सवेदनशील लोगों ने उसके आकस्मिक निधन पर अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं. उसके बच्चे अब सयाने हो गए हैं पर पिता की कमी तो हमेशा रहेगी ही. इस दुःख की घड़ी में उनको हिम्मत रहे ये भगवान् से प्रार्थना करता हूँ.

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गुरुवार, 5 जुलाई 2018

यादों का झरोखा - २८ श्री सुरेन्द्र कुमार शर्मा (सिन्दु मास्साब)



लाखेरी में मेरे शुरुआती दिनों में अर्थात सन १९६० में जिन बुजुर्ग लोगों का हाथ मुझे आशीर्वाद देने के लिए उठाता था उनमें स्व. आर.डी.शर्मा (पावर हाउस में शिफ्ट इंजीनियर) भी एक थे. वे तब जी टाईप क्वाटर नंबर ८ या ९ में रहते थे, पड़ोस में पंडित शिवनारायण तिवारी (कंपाउंडर) थे शायद इसी नाते मेरा भी उनसे परिचय हुआ था. शर्मा जी बहुत ही मीठा बोलते थे पर मुझे बाद में उनके बड़े सुपुत्र स्व. गौरी शंकर शर्मा (मेरा घनिष्ट होने पर) ने मुझे बताया था कि बाबू जी घर में हिटलरी अंदाज में रहा करते थे. वे तब उनके रिटायरमेंट के करीब थे. उनके चार पुत्र गौरी शंकर, सुरेंद्र कुमार, त्रिलोकीनाथ और राजकुमार थे और सभी से मेरा मिलना जुलना था. भाई गौरी से मेरी विशिष्ट मित्रता यो भी हुई कि वे भी शेरो-शायरी व तुकबंदी किया करते थे. उन्होंने  इलेक्ट्रिसिटी पर एक छोटी किताब भी अपने नाम से प्रकाशित की थी जिसकी एक प्रति मुझे भी भेंट की थी जोकि आज भी मेरे बुकसेल्फ़ में मौजूद है.

स्व. गौरी शंकर को उत्तर पूर्वी रेलवे के इलाहाबाद जोन में क्लर्क की नौकरी मिल गयी थी. दुर्भाग्यबस कुछ समय बाद वे स्नायु संबंधी एक रोग से ग्रस्त हो गए थे उसमें पूरा शरीर कम्पन में आता था, वे लिखने के काम में असमर्थ हो चले थे पर रेलवे के उनके सहकर्मियों ने उनको तब तक निभाया, जब तक उनके लडके सयाने नहीं हुए. मेरी जानकारी में है कि उनका एक सुपुत्र अभी भी रेलवे के इलाहाबाद रेंज में सीनियर टी.टी.ई के पद पर कार्यरत है.

श्री सुरेन्द्र मास्साब को लाखेरी हायर सेकेंडरी स्कूल से निकले सभी स्टूडेंट्स ‘सिन्दु मास्साब’ के नाम से जानते हैं लम्बे समय तक फीजिकल ट्रेनिंग/ स्पोर्ट्स/ एन.सी.सी टीचर अथवा लेक्चरार के रूप में वे लाखेरी हायर सेकेंडरी में रहे. मैं सुनता था की वे अध्यापकों व छात्रों की राजनीति में हमेशा सक्रिय रहा करते थे. मेरा उनसे कोई सीधा कार्य-व्यवहार नहीं था पर वे मुझे हमेशा ‘भाई साहब’ के रिश्ते से संबोधित किया करते थे. वे कुछ साल पहले रिटायर हो चुके हैं, लाखेरी रेलवे स्टेसन के सामने कोटा रोड पर उन्होंने बहुत पहले ही अपना आशियाना बना लिया था. अब वे अपने जीवन के तीसरे प्रहार में परिवार के मुखिया की भूमिका में होंगे. पर मुझे बताया गया है कि वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका अदा किया करते हैं. पिछले बर्षों में एक दुःखदाई घटना जरूर उनके परिवार में हुई कि उनका एक पुत्र असमय स्वर्गवासी हो गया. जीवन मृत्यु ऊपर वाला तय करता है, संसार का नियम है कि एक दिन सब को जाना होता है. हमारी संवेदना है.

अभी पिछले महीने गाजियाबाद से उनके छोटे भाई श्री त्रिलोकीनाथ का मैसेज अप्रत्याशित रूप से फोन पर मुझे मिला, उनकी कुशलक्षेम जानकार खुशी हुयी. त्रिलोकीनाथ यु.पी. में नरोरा परमाणु संस्थान में मुलाजिम थे अब रिटायर होकर अपने बच्चों के साथ सैटिल हो गए हैं, उन्होंने ह्वाट्स अप पर मुझे अपनी ताजी तश्वीर भेजी तो मुझे उनका वह किशोर रूप नजर आया जो कि एसीसी मिडिल स्कूल में पढ़ते समय था. त्रिलोकीनाथ से संपर्क करने में कोटा से उनके सहपाठी? श्री अनिल कुलश्रेष्ठ के सूत्र काम आये हैं.

फेसबुक पर बिछुड़े हुए लाखेरियंस को आपस में जोड़ने का माध्यम मुकुल वर्मा (हाल चांदा में कार्यरत) द्वारा बनाए ग्रुप ‘लाखों के लाखेरियन’ का बड़ा योगदान रहा है.

सिन्दु मास्साब को ‘जीवेत शरत: शतम’ की शुभकामनाओं के साथ इन यादों के झरोखे के इपिसोड बंद कर रहा हूँ; पर सभी मित्रों से अनुरोध करना चाहता हूँ की अपने अनुभव व कमेंट्स लिखने में कंजूसी ना करें. अपने निजी फोटो व सन्देश भी हम सबसे साझा किया करें.

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बुधवार, 6 जून 2018

यादों का झरोखा - २६ स्व.पंडित गजानंद 'सखा'



स्व. पंडित गजानंद ‘सखा’ (तिवारी) लाखेरी के इतिहास में एक अमर व्यक्ति हैं. वे ब्रह्मपुरी में निवास करते थे और एसीसी कालोनी के लगभग सभी हिन्दू घरों में उनकी आवक थी. वे सत्यनारायण भगवान् की पूजा+कथा एक विशिष्ठ शैली (राधेश्यामी तर्ज) में  हारमोनियम+ढोलक+मंजीरों की संगीतमय मनमोहक अंदाज में किया करते थे.

जैसा कि सत्यनारायण की कथा के सन्दर्भ में कहा गया है कि एकादशी, पूर्णिमा, अमावास या कोई मनभावन दिन ब्रत रख कर पूजन किया जा सकता है. विशेष रूप से बेटा-बेटी के व्याह के बाद इनकी पूजा पारंपरिक अनुष्ठान की तरह की जाती है. कथा वाचक तो और भी थे पर सखा जी की बात अलग ही थी. उनकी रसीली बुलंद आवाज आज भी श्रोताओं के दिलों में बसी हुयी है.

सखा जी को स्वर्गवासी हुए दो साल से अधिक समय हो चुका है. मैं सन २०१४ में आख़िरी बार उनसे मिलने उनके घर पर अपने साथी श्री रामस्वरूप गोचर के साथ गया था तब ये सोचा भी नहीं था कि मुलाक़ात आख़री होगी. मैं उनकी वाणी में रिकार्डेड सत्यनारायण भगवान् की कथा का टेप लेने के ख़ास उद्देश्य से गया था जो उनके बताये अनुसार नगरपालिका भवन के सामने एक दूकान पर मात्र ३५ रूपये कीमत पर मिल भी गया. इस अमूल्य टेप को मैं अपने घर पर आज भी गाहे-बगाहे सुनकर आनंदित होता हूँ.

सखा जी से मेरी मित्रता सन १९६० में ही हो गयी थी तब वे बाटम रेलवे फाटक के पास एक पक्के खोमचे में पान की छोटी सी दूकान चलाया करते थे. यहीं से उनकी पंडिताई भी चलती थी. बाद के बर्षों में कंपनी ने इसे अपना रिजर्व एरिया बता कर खाली करवा लिया था. अब यहाँ फल-फ्रूट, सब्जी का बाजार सजता है.

सखा जी एक साफ़-सुथरी संस्कारी व्यक्ति थे मैंने उनसे ये कभी नहीं पूछा कि राधेश्यामी तर्ज पर कथा+पूजा करना कब और कहाँ सीखा था? मुझे किसी ने अपुष्ट तौर पर बताया था कि कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों में उनको जेल जाना पडा था, जहां उनको कोई गुरु मिला, जिसने उनको ये विद्या दी थी. ये कितना सच है मैं कह नहीं सकता हूँ.

राधेश्यामी तर्ज के बारे में भी मैं अपने पाठकों को बताना चाहता हूँ कि बरेली, उत्तर प्रदेश में एक महान संगीतकार + नाटककार पंडित राधेश्याम शर्मा (१८९०-१९६३) हुए हैं जिन्होंने अल्फ्रेड कंपनी से जुड़कर वीर अभिमन्यु, भक्त प्रहलाद, श्रीकृष्णावतार आदि दर्जनों संगीतमय नाटक/रचनाएँ लिखी और उनके सफल मंचन भी हुए. पर राधेश्याम जी को ज्यादे प्रसिद्धि मिली उनके द्वारा पद्यबद्ध संगीत वाले ‘रामायण’ से. आज भी समस्त उत्तर भारत में में जो रामलीलाएं खेली जाती हैं उनमें राधेश्यामी तर्ज पर दोहे व चौपाइयां गाई जाती हैं.     

सखा जी के कोई पुत्र नहीं था, तीन विवाहित बेटियाँ थी/हैं. बाद के बर्षों में उन्होंने अपना एकाकीपन ईश्वर को समर्पित  करके ब्रह्मपुरी के आगे लाकडेश्वर महादेव नाम से एक छोटा किन्तु भव्य मंदिर बना कर पूरा किया.

उनके भजन के श्वर : “लेते जाओ रे हरी का नाम थोड़ा थोड़ा; दौड़ा जाए समय का घोड़ा......” आज भी वातावरण में गूँज रहे हैं.

हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ.

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शनिवार, 2 जून 2018

न्यूनता का अहसास (एक बोध कथा)


अश्वमेध यज्ञ करने के पशचात भी राजा धमाल को लगता था कि उसके चक्रवर्ती होने में अभी भी कुछ कमी रह गयी. उसके राज्य की सीमा में एक दुरूह शिखर था, जिस पर अपने नाम का शिलापट्ट सुशोभित करने का विचार मन में आया तो अपने दरबारी नवरत्नों को लेकर पैदल ही शिखर पर चढने लगा. बहुत संकीर्ण पथरीले मार्ग से कष्टपूर्वक जब वह चोटी पर पहुचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वहा उपलब्ध समस्त शिलाखंडों पर पहले से ही अनेक विभूतियों के नाम खुदे पड़े थे. जिस मुकाम पर वह आज पहुचा था वहाँ हजारों हजारों साल पहले से ही उन महामानवों के कीर्ति में शिलाखंड विराजमान थे.

उसका अभिमानी मन तड़प उठा, उसने कारिंदों को आदेश दिया कि “सबसे बड़े शिलापट्ट को मिटाकर तथा नए ढंग से तराश कर अपना नाम लिख दिया जाय.”

नवरत्नों में से एक भविष्यदर्शी – बुद्धिमान मंत्री ने रोकते हुए कहा “आप जो करने जा रहे हैं वह एक घातक परम्परा होगी क्योंकि भविष्य में भी कोई चक्रवर्ती राजा अवश्य पैदा होगा जो आपके नाम के शिलापट्ट को तराश कर अपना नाम लिखवाकर खुश होगा. इसलिए आप अनुचित परम्परा मत डालिए.”

राजा धमाल को तुरंत अपनी न्यूनता का अहसास हो गया.

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शनिवार, 19 मई 2018

यादों का झरोखा २४ स्व. डी.आर.वर्मा अकाउंटस क्लर्क



मैनेजमेंट को कोयला तथा अन्य रॉमैटीरियल अनलोड करने व सीमेंट डिस्पैच करने के लिए रेलवे स्टाफ से बहुत मतलब पड़ता है, क्योंकि नियमों के अंतर्गत डेमरेज का प्रावधान बहुत भारी पड़ता है. मालबाबूओं से लेकर स्टेसन पर तैनात स्टाफ को सुविधा शुल्क देकर खुश रखना होता है.

स्व.हरिभाई देसाई रेलवे से डीलिंग अथवा छीजत की क्लेमिंग में माहिर थे वे बर्षों से ये काम करते आ रहे थे. उनके रिटायरमेंट के बाद जो वैक्यूम हुआ उसे भरने के लिए शिवालिया (गुजरात) प्लांट के मार्फ़त एक रेलवे मैंन  को ही VRS दिलवाकर नई नियुक्ति दी गयी, वह थे स्व. दीप्तिप्रसाद वर्मा जो रेलवे के नियम कायदों से वाकिफ थे और डेमरेज से बचने के तरीकों के जानकार थे.

मेरा उनसे शरुआती परिचय अपनी लैबोरेटरी में एक डाईबिटिक के रूप में हुआ था. वे हरिद्वार के गायत्री मिशन से जुड़े हुए थे सन १९८२ या ८३ में लाखेरी में ही गायत्री परिवार का एक कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें उपस्थित लोगों से कहा गया कि ‘अपनी कोई बुरी आदत छोड़ने का संकल्प करें.’ मैं तब कभी कभी धूम्रपान किया करता था, मंच के आह्वान पर मैंने तब उस बुरी आदत को छोड़ने का संकल्प किया और आज तक उस पर कायम हूँ. प्रोत्साहित करने के लिए मैं वर्मा जी का आभार मानता हूँ.

सन १९९० में जब मुझे G-23 क्वाटर अलाट हुआ तो पड़ोसी के रूप में वर्मा जी का परिवार मिला. लगभग आठ साल तक हम अगल बगल रहे, जब तक कि वे रिटायर नहीं  हुए.

वर्मा जी सामाजिक व्यक्ति थे बाटम कालोनी में जो शिव मंदिर बना उसमें उनका भी अथक प्रयास शामिल है.

वे हमारे होलिकोत्सव में में भी रूचि लेते थे, मुझे याद है कि एक बार हमने उनको सम्मेलन की अध्यक्षता से भी नवाजा था. एक समय वे कमेटी के सक्रिय सदस्य रहे पर एक छोटी सी बात पर उन्होंने उसे छोड़ दिया था. हुआ यों कि हम लोग जिनमें प्रमुख शिवदत्त शर्मा जी, वी.एन.शर्मा जी, केशवदत्त अनंत जी, फेरुसिंह रूहेला जी, वर्मा जी और एक मैं, होली के कार्यक्रम को जायकेदार बनाने के लिए महीने भर पहले से मीटिंग किया करते थे, मीटिंग बारी बारी से सबके घर पर होती थी जहां खिलाई-पिलाई के अलावा हँसी-ठठ्ठा व गण्यमान्य लोगों के लिए उपाधियों का चयन होता था. हम लोग खुद पर भी हँसने का मसाला तैयार करते थे. जब वर्मा जी के क्वाटर पर मीटिंग हुई तो श्रीमती वर्मा ने कद्दू के पकोड़े सर्व किये. पकोड़े स्वादिष्ट थे तो उस साल वर्मा जी को ‘कद्दू का पकोड़ा’ की उपाधि से नवाजा गया. बहुत हल्की फुल्की मजाक थी; पर इस पर श्रीमती वर्मा की नाराजी के चलते वर्मा जी अगले बर्षों के कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुए.

इससे पूर्व उनके परिवार के साथ एक दुखद हादसा घटित हुआ कि स्कूल बस छोटे बच्चों को लेकर कहीं बाहर गयी थी जो पलट गयी और तीन या चार बच्चे नीचे दब गए थे उनमें वर्मा जी का भी मझला बेटा था. जिसकी  शोकपूर्ण दर्द परिवार के साथ रहा, स्वाभाविक है. कहते हैं कि पुत्रशोक सबसे बड़ा शोक होता है.

वर्मा जी की बेटी दुर्गेश वनस्थली विद्यापीठ में पढ़ कर अध्यापिका हो गयी थी अभी शायद अपने परिवार के साथ कोटा में सैटिल्ड है. बड़ा बेटा प्रिय हरीश MCA करके बहुत अच्छे पॅकेज में कार्यरत हो गया था, छोटा प्रिय लालू उर्फ़ प्रवीण भी IT में ग्रेजुएसन करके अच्छे नौकरी में है, दोनों भाई आजकल हैदराबाद में कार्यरत हैं. अपने परिवारों के साथ  संपन्न हैं, गत बर्ष फेसबुक पर दोनों भाई मेरे संपर्क में आये तो कुशल क्षेम पूछी थी. श्रीमती वर्मा अपने बच्चों के साथ ही हैं.

वर्मा जी ने रिटायरमेंट के बाद कोटा में महावीर नगर एक्सटेंसन में एक बना बनाया घर खरीद लिया था, रिटायरमेंट के बाद मैं भी करीब डेढ़ साल कोटा में अपने बेटे पार्थ के साथ रहा था, तब लाखेरी के सभी मित्रों, सुहृदों से मिलता रहता था, मैं वर्मा जी के घर भी गया, वहीं पास में ब्रजमोहन घमंडी जी और महेंद्र शर्मा का भी घर था, २००१ की एक मनहूश सुबह महेंद्र शर्मा जी का फोन आया कि “वर्मा जी का हार्ट अटैक से देहावसान हो गया है”. इस प्रकार उनके पार्थिव शरीर को कंधा देकर भी मैंने अपनी श्रधांजलि दी.

वर्मा जी के ससुर (नाम मै भूल रहा हूँ) सरनेम शायद  कश्यप था आगरा के रहने वाले थे, रेलवे में टी.टी. थे, रिटायरमेंट के पश्चात अकसर लाखेरी आया करते थे, बहुत संवेदनशील व्यक्ति थे, वर्मा जी के अंतिम संस्कार में भी वे उपस्थित थे. उन्होंने इस परिवार को दुःख की घड़ी में बहुत सम्हाला था.

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