शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

लाखों सपनों का शहर - कोटा

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के हाड़ौती इलाके में बसा हुआ 900 वर्ष पुराना कोटा शहर पिछले 30 वर्षों के अंतराल में पुरानी राजशाही चौहद्दी से बाहर निकल कर एकाएक ‘एजुकेशन हब’ के रूप में विकसित हो गया है, और अनपेक्षित रूप से फ़ैल भी गया है. यहाँ पर बिजली, पानी, रेल व सड़क यातायात की सुविधा सब इफरात से प्राप्य है. आज एक लाख से अधिक संख्या में लड़के लड़कियां अपने भविष्य के बड़े बड़े सपने संजोकर यहाँ के छोटे-बड़े दर्जनों कोचिंग-इंस्टीट्यूट्स में सुबह-शाम अलग अलग पारियों में फिज़िक्स, कैमिस्ट्री, बायोलजी/ मैथ्स की पढ़ाई करके अपने सपने सच करने के लिए दिन रात व्यस्त रहते हैं. कुछ कोचिंग संस्थान ‘प्राईवेट लिमिटेड’ भी हो गयी हैं. बंसल, ऐलन, रेजोनेंस, मोसन, कैरिअर पोंइट्स, व्हाईब्रेंट आदि अनेक बड़े नाम हैं, जिन्होंने अनुभवी तथा ब्रिलियंट एकेडेमिक कैरियर वाले प्राध्यापक नियुक्त किये हुए हैं. पढ़ाई का स्तर निश्चित रूप से सामान्य से ऊपर होगा. परीक्षापयोगी विषय ‘कैप्स्यूल’  बना कर विद्यार्थियों को परोसे जाते हैं. सफलताओं के बड़े बड़े विज्ञापन अखबारों में व होर्डिंग्स में देखने को मिलते हैं. इसलिए देश के अन्य प्रान्तों से भी बच्चे यहाँ आने को लालायित रहते हैं, तथा बड़ी बड़ी कोचिंग फीस सहन करते हैं.

ये बात भी सही है कि इस संस्थानों का ये एक बड़ा व्यापार बन गया है. सालाना फीस एक लाख से अधिक वसूली जाती है. इनकी आलीशान बिल्डिंगें, तामझाम व आवरण देखकर ही समझ में आता है कि खर्चों से कहीं अधिक आमदनी हो रही है.  फीस पर कोई सरकारी या गैरसरकारी नियंत्रण ना होने से अवश्य मनमानी होती रही है. आलम ये भी है की अधिक कमाई के उद्देश्य से कुछ संस्थानों द्वारा अपनी ब्रांचेज (दूकानें) राजस्थान के अन्य शहरों में खोली जाने लगी हैं. इस ‘ट्यूशनराज’ के बारे में गत वर्षों में बहुत आलोचनाएँ और गंभीर चिंतन होते रहे हैं क्योंकि ग्रामीण अंचलों के विद्यार्थी या आर्थिक विपिन्नता वाले परिवारों के बच्चे इस सुविधा से वंचित रहते हैं. ये भी है कि लाखों में से कुछ प्रतिशत बच्चे अपेक्षित प्रतियोगी परीक्षाओं में बाजी मारते हैं. शेष हताशा के शिकार होते हैं. आकड़े बताते हैं कि नाउम्मीदी के तथा निराशा के कारण हर साल कुछ विद्यार्थी आत्महत्या भी करते हैं. प्रशासन व राजनीतिज्ञ इसलिए चुप हैं कि इस ‘ट्यूशन लॉबी’ का बड़ा दबाव व आर्थिक प्रभाव इन पर है.

इन संस्थानों की कुछ उच्च माध्यमिक स्कूलों से सेटिंग भी चल रही है कि बच्चे 9वीं कक्षा से ही कोचिंग फीस देकर अपने स्कूलों में ना जाकर यहाँ आते हैं और स्कूलों में हाजिरी लगती रहती है.

माता-पिता, सब, चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, सी.ए., या कलेक्टर बन जाएँ, और इसके लिए वे अपना सर्वस्व दाँव पर लगाने को तैयार रहते हैं. कुछ लोग सौभाग्यशाली अवश्य होते हैं, पर ये उपलब्धि कोचिंग के बिना भी संभव रहती थी. अब समय की सुई पीछे को नहीं घूम सकती है अत: इस सिस्टम का कोई विकल्प आम लोगों के पास नहीं है.

कोटा शहर के कुछ विशिष्ठ खण्डों में बहुमंजिली इमारतें बन गयी हैं जिनमें सैकड़ों की संख्या में हॉस्टल व भोजन-मैस का कारोबार हो रहा है. लोगों ने किराए के लालच से अपने घरों में भी छोटे पार्टीशन देकर कमरे किराए पर दे रखे हैं. हर गली/गेट पर ‘to-let’ का बोर्ड लटका हुआ नजर आता है.

फूहड़ सिनेमा-स्कोप को दोष दें या उम्र व संस्कारों का दोष मान कर चलें, यहाँ गार्जियनशिप के अभाव में कुछ लड़के लड़कियां मनमानी करते हैं. इनके माँ-बाप समझते होंगे कि ‘बच्चे पढ़ रहे होंगे’ पर ये यहाँ पार्कों में या एकांत जगहों में प्रेम-लीला में व्यस्त रहते हैं. यदि ये बच्चे अपनी ज़िंदगी को बैलेन्स करके चलें तो ठीक है. नाबालिग़ बच्चों पर प्रशासन तथा शिक्षण संस्थानों को कोई निगरानी तंत्र की तुरंत व्यवस्था करनी चाहिए, अन्यथा बच्चों के हों या माता-पिता के, सपने यों बर्बाद नहीं होने चाहिए.
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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

ऐफिशेन्सी बार

"प्रथम सीमेंट वर्कर्स वेज बोर्ड" के तहत आने वाले समस्त कर्मचारियों के लिए ‘नॉमेंक्लेचर’ व तदनुसार ‘पे-स्केल’ श्री जी.एल. गोविल (तब एसीसी के सीनियर एक्जेक्युटिव) की सदारत में तैयार किये गए थे. मंथली-पेड स्टाफ के पे-स्केल में दस साल की सर्विस के बाद E.B. यानि ऐफिशेन्सी बार का प्रावधान रखा गया था. यदि कर्मचारी अपने काम में सक्षम नहीं हो तो इस प्रावधान के तहत उसकी वेतन वृद्धि पर रोक लगाई जा सकती थी. 

नियुक्ति पत्र के अनुसार मुझे हर साल १० रुपयों की मूल वेतन वृद्धि प्राप्त होती रही. जब ९ वर्षों के बाद E.B. पर पहुंचा तो मुझे वार्षिक वेतन वृद्धि नहीं दी गयी. मैं शिकवा-शिकायत लेकर तत्कालीन पर्सनल ऑफिसर श्री वीरेंद्र सिंह जी से मिला तो उन्होंने रूखा सा जवाब दिया कि “E.B. पर कंपनी कोई कारण बताये बिना वेतन वृद्धि रोक सकती है.” उन वर्षों में मुझे अपनी ड्यूटी के सम्बन्ध में या ड्यूटी के अलावा यूनियन आदि की एक्टिविटीज (खुराफातों) के लिए कोई नोट, वार्निंग या सजा नहीं मिली थी इसलिए मैं अपनी ‘ऐफिशेन्सी’ के बारे में ज्यादा सैन्सिटिव हो गया था. मैं असिस्टेंट मैनेजर (प्रशासन में नंबर २) स्व. धोतीवाला जी से मिला. वे बड़े सरल व सुहृद पारसी जेंटलमैन थे. मुझसे उनकी पूरी हमदर्दी थी, पर ऐसा लगा कि तब मैनेजमेंट में उनकी बात को कोई तवज्जो नहीं मिला करती थी. मेरी बात सुन कर वे बोले, “Why don’t you go to the labour court?”

मैंने अपनी शिकायत एक रजिस्टर्ड पोस्ट से लेबर कोर्ट (तब जयपुर में हुआ करता था) को भेज दी. बाद में तारीख पड़ी तो मैं ढूंढते हुए वहाँ पहुंचा. मैनेजमेंट की तरफ से श्री वीरेंद्र सिंह जी के साथ एक बुजुर्ग+खुर्राट एडवोकेट स्व. माथुर (उनका पूरा नाम अब मुझे याद नहीं है) वहाँ पहुचे थे. जज भी कोई बुजुर्ग व्यक्ति थे, जो हाई कोर्ट से रिटायर्ड थे. मेरे साथ कोई बहस नहीं हुई, पर मैनेजमेंट ने अगली पेशी से पहले मुझे एरियर सहित मेरा रोका गया ऐनुअल इन्क्रीमेंट दे दिया. बाद में मुझे मालूम हुआ कि मेरे उस प्रयास से अन्य 9 कर्मचारियों को भी लाभ मिला, जिनमें श्री बालकृष्ण सेनी (तब स्टोनोग्राफर), श्री गोपाल लाल महेश्वरी ड्राफ्ट्समेन, तथा अन्य थे. सबने मुझे धन्यवाद दिया, लेकिन मैनेजमेंट को अवश्य तकलीफ हुयी होगी. उसके तुरंत बाद सन 1970 में मेरा ट्रांसफर शाहाबाद, कर्नाटक को कर दिया गया. ट्रान्सफर में कई कारक थे, परंतु उनमें इस घटना का भी संयोग रहा था.
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मंगलवार, 17 जनवरी 2017

अच्छाई के तार दूर तक जुड़े रहते हैं (संस्मरण )

मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार श्री महेश चंदोला सन 1981 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके नौकरी की तलाश में मेरे पास लाखेरी आये तो स्वाभाविक रूप से सब तरफ नौकरी की संभावनाओं की तलाश की गयी. मेरे एक पूर्व परिचित श्री पुष्पेन्द्र सिंह जी तब सवाईमाधोपुर स्थित जयपुर उद्योग (साहू जैन का सीमेंट कारखाना) की फलौदी माईन्स में मैनेजर थे. उन दिनों मोबाईल/ टेलीफोन की कोई सुविधा नहीं हुआ करती थी अत: मैंने एक पत्र साधारण डाक से इस सम्बन्ध में लिख भेजा. उन्होंने तुरंत प्रत्युत्तर में महेश जी को इंटरव्यू के लिए बुलावा भेज दिया.

श्री पुष्पेन्द्र सिंह जी सन 1964-65 में लाखेरी की हमारी माइन्स में एक जूनियर ऑफिसर (असिस्टेंट क्वारी मैनेजर) हुआ करते थे. मेरी उनसे कोई घनिष्टता नहीं थी. उन दिनों मैं लाखेरी बहुधंधी सहकारी समिति का अवैतनिक महामंत्री था और वे मात्र 10 रुपयों के एक शेयर के खाताधारक थे. परेशानियां बोल कर नहीं आती हैं. एक रात में अचानक श्रीमती सिंह को ब्रेन हैमरेज हो गया. डॉक्टर मुखर्जी और एक दो अन्य ऑफिसर्स के साथ उन्होंने मेरा दरवाजा खटखटाया. अपनी आपदा बताते हुए तुरंत 1000 रुपयों की व्यवस्था करने की बात कही. एक हजार रूपये उन दिनों बड़े मायने रखते थे. जूनियर ऑफिसर्स को मात्र 250 रूपये वेतन मिला करता था. गंभीर परिस्थिति देख कर मैंने रात को ही समिति की तिजोरी खुलवाई, और अपने नाम से 1000 रुपयों का संड्री एडवांस लेकर उनको दिया. वे श्रीमती सिंह को ईलाज के लिए जयपुर लेकर गए. भगवत कृपा से उनको जल्दी स्वास्थ्य लाभ हो गया. कुछ दिनों के बाद लाखेरी लौटकर उन्होंने ये रकम लौटा दी. "A friend in need is a friend indeed" वाली बात उनके जेहन में अवश्य रही होगी इसलिए उन्होंने तुरंत कारवाही की. मैं स्वयं श्री महेश के साथ फलौदी माईन्स पहुंचा। उन्होंने हमें अपने आवास में ले जाकर श्रीमती सिंह के हाथों से बनाया भोजन कराया. उनका ये सत्कार अविस्मरणीय था. बाद में अपनी जीप में बैठा कर सवाईमाधोपुर प्रशासनिक कार्यालय में ले गये और इंटरव्यू के बाद श्री महेश चंदोला को ड्यूटी जॉइन करने को कह दिया.

पुष्पेन्द्र जी खानदानी व्यक्ति हैं. मैंने उनसे परिचय का लाभ अपनी सहकारी समिति के विधान संशोधन के दौरान उनके ससुर श्री राजा निरंजन सिंह जी से लिया था. वे राजस्थान कोऑपरेटिव सोसाइटीज के रजिस्ट्रार हुआ करते थे.

पुष्पेन्द्र सिंह जी बाद के वर्षों में मंगलम सीमेंट में  उच्चाधिकारी हो गए थे.

महेश चंदोला जी ने फैकट्री में घूमकर बिजली की वायरिंग्स और कनेक्शन की दुर्दशा देखी तो वहां जॉइन ना करने का निश्चय किया. सचमुच सब तरह से मिसमैनेजमेंट के चलते जयपुर उद्योग का भट्टा जल्दी बैठ गया. महेश जी को उसी बीच गुजरात सरकार के जॉइंट वेंचर वाले सीमेंट उद्योग नर्मदा सीमेंट में नौकरी मिल गयी थी, और अब बिरला सीमेंट उद्योग की एक यूनिट में चीफ इलैक्ट्रिकल इंजीनियर के बतौर कार्यरत हैं. उनके संघर्ष के दिनों में पुष्पेन्द्रसिंह जी द्वारा दिखाई सह्रदयता को वे भी नहीं भूले हैं.
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शनिवार, 7 जनवरी 2017

खिचड़ी, मकसूद भाई के घर की

1980s के अंतिम वर्षों में अगस्त का एक दिन हमारे लिए चिंताओं व खुशियों से भरा रहा. उस शाम महावीर नगर तृतीय, कोटा, में रहने वाले मकसूद भाई के घर की बनी खिचड़ी का स्वाद मुझे आज भी अच्छी तरह याद है. दुःख इस बात का भी है कि खिचड़ी बनाने वाली श्रीमती मकसूद अब इस दुनिया में नहीं है. उनको कुछ साल पहले जन्नत नसीब हो गयी है. मैं जब भी कोटा अपने बड़े बेटे के पास आता हूँ, अपने मित्र मकसूद अली से मिलना नहीं भूलता हूँ. घटना कुछ यों है:

मेरी नातिनी हिना जोशी, जो अब अमेरिका में डॉक्टर है, का जन्म होना था. बेटी गिरिबाला लाखेरी आ गयी थी. दामाद श्री भुवन जोशी तब उत्तराखंड में स्थित BEL में इंजीनियर थे. लाखेरी अस्पताल में हमारी लेडी डॉक्टर श्रीमती विमला जैन ने सलाह दी कि सुरक्षित प्रसव के लिए कोटा के किसी अच्छे मैटरनिटी हॉस्पीटल में जाना चाहिए. अच्छे की परिभाषा में उन्होंने झालावाड़ रोड स्थित बाहेती अस्पताल (अब मैत्री अस्पताल) का पता बताया. कोटा मेरा आना जाना कम ही होता था. ऐरोड्रोम सर्किल के आगे मैं कभी आया गया भी नहीं था. नयापुरा गुलाबबाड़ी में मेरे एक पुराने जिगरी दोस्त स्व. अरुण उपाध्याय का घर था/है. जब गिरिबाला जे.डी.बी. कॉलेज से बी.एस.सी. कर रही थी, तब स्व. श्रीमती शकुन्तला उपाध्याय उसकी लोकल गार्जियन थी. डॉ. शकुन्तला उपाध्याय वहीं पर हिन्दी की प्रोफ़ेसर हुआ करती थी. मगर इनका घर बाहेती अस्पताल से बहुत दूर था.

बाहेती अस्पताल के संथापक डॉ. बाहेती अनुभवी सर्जन थे और श्रीमती नीला बाहेती मानी हुई गानिकोलालिस्ट थी. उन्होंने सुरक्षित प्रसव के लिए सर्जरी की सलाह दी. तदनुसार जब एक गुड़िया का जन्म हुआ तो हम लोग तनाव व चिंताओं से मुक्त हुए.

उन दिनों बाहेती अस्पताल के आसपास बियावान था. कहीं चाय का खोमचा तक नहीं था. विज्ञान नगर के अन्दर जरूर बाजार/दुकानें होंगी, पर मुझे कोई ज्ञान इस सम्बन्ध में नहीं था. विज्ञान नगर में झालावाड़ रोड साइड पर लाखेरी के मेरे एक पूर्व परिचित भगवान सिंह राठोर (हेडमास्टर हरिसिंह जी के सुपुत्र) का घर था, जो पहले हमारी माईन्स में फोरमैन / असिस्टेंट क्वारी मैनेजर थे, और तब मंगलम सीमेंट में कार्यरत थे. कुछ समय पहले जामुल कारखाने में रहते हुए उन्होंने एक व्यक्तिगत संकट में मेरी मदद चाही थी, सो अपना समझ कर पूछते पूछते मैं उनके घर पहुँच गया. मुझे आज भी इस बात का दर्द है की उन्होंने घर में होते हुए भी मिलना उचित नहीं समझा. मैं निराश लौट आया था.

एरोड्रोम चौराहा काफी दूर था. तब आने जाने के साधन भी इस रूट पर नहीं के बराबर थे. सुबह मेरे दामाद कहीं दूर जाकर नाश्ते का सामान जरूर लेकर आये थे. शाम के लिए भोजन के इंतजाम की मुझे चिंता थी. मेरी श्रीमती व दामाद जी अस्पताल में थे, और मैं शाम होने पर पैदल पैदल महावीर नगर तृतीय की तरफ किसी लाखेरी वाले की तलाश में चल पड़ा. जिस चौराहे पर आज हर वक्त मेला सा रहता है, वहाँ एक साईकल रिपेयर वाली दूकान थी. मैंने उससे पूछा “यहाँ आसपास कोई लाखेरी वाला रहता है क्या?” उसने बताया “लाखेरी वाला एक मुसलमान रहता है.” और वह मुझे उसके घर तक ले गया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि वह और कोई नहीं मकसूद अली का घर था जो शाहाबाद, कर्नाटक में 'लाखेरी बंधु सहकार’ के मेरे साथी थे. वे अब कोटा आई.एल. में आ गए थे. उन्होंने मेरी आवभगत की. मैंने उनको वहां आने का मकसद बताया तो उनकी बेगम (लाखेरी के स्व. पीरमोहम्मद कुरैशी की बेटी) ने तुरंत बढ़िया खिचड़ी बनाई और मकसूद भाई ने अस्पताल तक पहुंचाई.
मकसूद भाई के घर की खिचड़ी हमारे लिए केवल एक भोजन ही नहीं, प्यार भरा तोहफा जैसा था. 

उसके बाद मैं पत्नी सहित लाखेरी लौट गया, परंतु बेटी व दामाद जब तक अस्पताल में रहे, करीब 8-10 दिन तक, मक़सूद भाई रोज उनके लिये खाना ले जाते रहे. उनके इस सौहार्दपूर्ण व्यवहार के लिए हमारे बेटी व दामाद भी उनके शुक्रगुजार है.
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मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

एक मुलाक़ात लोहिया जी से

स्व. राम मनोहर लोहिया जी नेहरू युग के सबसे बड़े समाजवादी नेता थे. वे प्रखर वक्ता थे, और भारत के सच्चे जनवादी प्रतिनिधि थे. सत्ता पक्ष के सभी लोग भी इस विपक्षी नेता का दिल से सम्मान करते थे.

देश की आजादी के बाद आचार्य नरेंद्र देव, आचार्य कृपलानी, तथा अन्य स्वतंत्रता सैनिकों ने नीतिगत मतभेद होने के कारण राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी को छोड़ कर अलग से सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया, यद्यपि बाद में अंदरुनी मतभेदों के चलते उसका भी विभाजन प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रूप में हुआ. आजादी के बाद की ये बयार पूरे देश में नीतियों/ कुर्सियों/ व्यक्तिगत स्वार्थों के चक्कर में बड़ी तेजी से बहती रही थी और नौजवानों को प्रभावित कर रही थी. तब सोशलिस्टों की ये जमातें फ्यूडल लोगों से मुक्त थी. उधर हवा का रुख देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने भी समाजवाद शब्द का मुखौटा अपना लिया था.

मैं सन 1960 में बिना किसी राजनैतिक संस्कार के ही लाखेरी आया था. यहाँ सब तरफ कांग्रेस का वर्चस्व था. विरोध के स्वर नक्कारखाने की तूती की तरह उभरते जरूर थे, पर परिवर्तन के कोई लक्षण आम लोगों में नहीं दिखाई देते थे. क्योंकि अधिकांश लोग सुविधाभोगी होते हैं. एक छोटी सी जमात सोशलिस्टों के नाम से विद्रोही नौजवानों की जरूर थी, जिसमें ए.सी.सी. स्कूल के एक अध्यापक स्व. बद्रीप्रसाद व्यास अग्रगण्य थे. अन्य थे, स्व. मोहम्मद इस्माईल हनीफी, मो. अमीन पठान, बजरंगलाल वर्मा (मेहरा), नैनगराम बैरवा, अजीज तागेवाला, आदि. सबके नाम अब मुझे याद भी नहीं रहे हैं. बूंदी के नामी वकील स्व. बिहारीलाल गुप्ता और स्व. इलाहीबक्श (इस्माईल भाई के ससुर –पेशे से कंपाउंडर) से मार्गदर्शन मिलता था. कोटा के वकील स्व. महावीर प्रसाद शर्मा ने कारखाने की कोल गेन्ट्री के मजदूरों की अलग से सोशलिस्ट पार्टी के झंडे के तले एक हिन्द मजदूर सभा की यूनियन बनाकर फ्री सर्विस भी देते थे. इनका कार्यालय तेजाजी की टापरियों (अब गांधीपुरा) में खोला गया. ये यूनियन काफी वर्षों तक चला, पर ये सब कार्यकलाप आंधी का रूप कभी नहीं ले पाए. सोशलिस्ट पार्टी को नगरपालिका, यूनियन और विधान सभा के चुनावों में सब जगह हार मिलती रही. कार्यकर्ता बिखरते चले गए.

स्व. बद्रीप्रसाद व्यास बड़े हरफनमौला थे. बॉटम में मांगीलाल कपड़े वालों की बगल में उन्होंने एक फोटो स्टूडियो + छुटपुट सामानों की दूकान खोल रखी थी, और मेले-ठेले में पकौड़ी-जलेबी भी बनाकर बेच लेते थे. व्यास जी सोशलिस्ट पार्टी के कर्ताधर्ता थे. नए नए लोगों को अपनी मीटिंग में आमंत्रित किया करते थे. मुझे भी उनके न्योते मिले. मैं दो मीटिंगों में जरूर गया, पर उनके बड़े बड़े बोल हजम नहीं हुए. उन्हीं दिनों (सन 1963 या 64) खबर आई कि ‘सुबह देहरादून एक्सप्रेस से लोहिया जी बम्बई की तरफ जा रहे हैं, और ट्रेन पर कार्यकर्ताओं को दर्शन देंगे. कार्यकर्ताओं को फूलमालाओं सहित रेलवे प्लेटफार्म पर पहुँचने का आग्रह किया गया उत्सुकतावश मैं भी गया. कुल जमा आठ लोग थे.

फर्स्टक्लास के ए.सी. कोच के दरवाजे पर लोहिया जी खड़े मिले और मालाएं लेने नीचे भी आये. उस दिन ट्रेन 5 मिनट तक रुकी रही. व्यास जी ने एक एक करके सबका परिचय दिया. जब मेरा नंबर आया तो वे बोले, “ये हमारे नए सदस्य हैं.” उनका इस तरह से परिचय देना मुझे अखर गया क्योंकि एक तो मैंने उनकी पार्टी की सदस्यता ग्रहण नहीं की थी, दूसरा खुद को पुराना सोशलिस्ट बताने के लिए मेरा इस्तेमाल किया. मैंने बाद में व्यास जी से कहा, “नया सदस्य कहने की कहाँ जरूरत थी?” उन्होंने बात को शातिराना तरीके से टाल दिया. उसके बाद मैं उनकी सोहबत में कभी नहीं गया. पर लोहिया जी की मूरत आज तक मेरी स्मृति में है.
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