शनिवार, 16 सितंबर 2017

पेट्रोल - डीजल में लूट-खसोट

पेट्रोल – डीजल की लागत मूल्यों और इनके रीटेल में बिक रही कीमतों का अंतर सरकारी मुनाफाखोरी के कारण इतना बड़ा हो गया है कि अब चमचा चैनल्स भी वास्तविक आंकड़े बताने लग गए हैं.

मेरे इसी स्तम्भ में लिखे गए लेखों में पहले भी कई बार इस विषय पर ध्यान आकर्षित किया गया है. आज भी, जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें निचले स्तर पर चल रही हैं, सरकारी और गैरसरकारी तेल कंपनियां धड़ल्ले से मुनाफ़ा कमाकर उपभोक्ताओं का शोषण कर रही हैं. अफसोस इस बात का है कि सरकार के उच्च पदों पर आसीन अफसर व मंत्री बेशर्मी से अपना मुंह छुपाये हुए हैं. आज एक केन्द्रीय मंत्री अलफांसो महाशय ने तो हद कर दी यह कह कर कि “पेट्रोल उपभोक्ता भूखे नहीं मर रहे हैं.”

इस गैर जिम्मेदाराना व संवेदनहीन वक्तव्य की जितनी नंदा की जाए कम है.

पेट्रोल-डीजल के भाव बाजार के तमाम उपभोक्ता सामानों के भाव, ट्रासपोर्ट की लागत, और कृषि उपज पर सीधे सीधे प्रभाव डालते हैं. हमारे पड़ोसी देशों से तुलना की जाए तो पाकिस्तान जैसे पिछड़े देश में पेट्रोल का बाजार मूल्य केवल 21 रुपये चल रहा है जबकि हमारे यहाँ पेट्रोल का भाव लगभग 34 रूपये + 36 रूपये सरकारी टेक्स मिलकर 70 रूपये हो रहा है.

एक आंकड़ा बता रहा है कि सरकार का विदेशी मुद्राकोष सर्वोच्च चल रहा है, जो साबित करता है कि ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं है कि तेल को जी.एस. टी. के बाहर रख कर इस तरह से खुली लूट की जाय.

आज के सत्तानशीं नेता एक समय तेल पर केवल 2 रुपया की बढ़ोत्तरी होने पर सड़क पर उतर कर आन्दोलन किया करते थे, पर आज बेशर्मी के साथ चुप हैं, और सच्चाई से मुंह छुपा रहे हैं.
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सोमवार, 28 अगस्त 2017

विद्रूप चेहरे

अनादि काल से ही स्त्री-पुरुष के संबंधों की मर्यादा पर प्रश्नचिन्ह लगते आये हैं. हालाँकि जिम्मेदार वयस्क स्त्री व पुरुषों को निजी संबंधों की पूरी आज़ादी होनी चाहिए, किसी भी तरह की जोर/जबरदस्ती, धमकी, लालच, या हिंसा का प्रयोग करने वाले को कानूनी कार्यवाही के बाद उपयुक्त सजा मिलनी चाहिए. कई साधारण नागरिकों के साथ साथ राजनीति व धार्मिक सगठनों के प्रभावशाली व्यक्तियों के खिलाफ कई ऐसे आरोप चर्चा में या सुर्ख़ियों में आते है, और अनगिनत मामले भय व भावनाओं की वजह से गर्त में चले जाते हैं. बाहुबल तथा धनबल हमेशा ही ऐसे मामलों में प्रभावी रहा है.

‘सच्चा सौदा’ के सभी आस्थावान व्यक्तियों/परिवारों से हमारी हमदर्दी होनी चाहिए कि उन्होंने जिस मनुष्य में ‘देवता’ का स्वरुप जाना था वह एक वहशी जानवर से कम नहीं है. जिस तरह की बातें बाहर निकल कर आ रही हैं, उनसे सिद्ध होता है कि हमारे समाज में अशिक्षा और अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी पेठ बनाए हुयी हैं. अब सजायाफ्ता राम रहीम सिंह की मुहबोली बेटी/प्रेयसी हनीप्रीत ने यह बयान दिया है कि “हमारे साथ धोखा हुआ है, पिछले चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी से एक गुप्त डील हुयी थी कि ‘समर्थन’ के बदले वह ‘बाबा’ पर चल रहे केस समाप्त करवा देंगे.” अगर ये सच है तो अफसोस होता है कि इससे निकृष्ट/घटिया राजनीति क्या हो सकती है? 

ऊपर से चमकीले धार्मिक रंगों से लिपे-पुते सत्तानसीनों के चेहरे भी कितने विद्रूप हैं ? इसका आकलन किया जाना चाहिए.
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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

राष्ट्रभक्ति

राष्ट्रभक्ति के नाम पर काली कमाई करने वाले बेहिसाब लोग हैं, पर कुछ ऐसे भी दृष्टांत जानकारी में आते हैं, जहाँ आभावों में पलने वाले कई लोगों का देशप्रेम का ज़ज्बा अमीर लोगों की सोच से बहुत ऊपर होता है. ऐसे ही एक वृत्तांत में एक झोपड़पट्टी में पलने वाला 10 वर्षीय बालक व्यस्त शहर की एक लाल बत्ती पर अपने पुराने से वाइपर पर पोचे का गीला कपड़ा बाँध कर खड़ी कारों के शीशों को बिना पूछे ही साफ़ करने लगता है. कुछ दयावान लोग उसे छुट्टे सिक्के दे भी जाते हैं. एक बड़े सेठ जी को अपनी लक्ज़री कार के शीशे पर उसका ये पोचा लगाना हमेशा नागवार गुजरता है. बालक ‘जो दे उसका भी भला, जो ना दे उसका भी भला' के सिद्धांत पर अपना काम करता जाता है.

आज स्वतन्त्रता दिवस है, और जब सेठ जी की गाड़ी लाल बत्ती पर रुकी तो वही बालक आज पोचे के बजाय एक छोटा सा तिरंगा लगाने को दौड़ा आया. सेठ जी ने शीशा गिराते हुए बड़े बेमन से उससे पूछा, “इसके कितने पैसा लेगा?”

बालक ने भोलेपन से उत्तर दिया, “साहब, मैं इसको बेचता नहीं हूँ.”  ऐसा कह कर वह अगली गाड़ी पर झंडा लगाने को चल देता है.

सेठ जी अपने मन की सारी कडुवाहट थूक के साथ निगल गए और श्रद्धाभाव से उस बालक के बारे में सोचते रह गए.
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गुरुवार, 20 जुलाई 2017

यादों का झरोखा - डॉ. कैप्टन के.एस. सोढ़ी

पटेल चेस्ट इन्स्टीट्यूट (दिल्ली विश्वविद्यालय) से ट्रेनिंग लेकर मुझे दिल्ली नगर निगम के कालका जी कॉलोनी हॉस्पीटल में सर्विस मिल गयी थी. उन दिनों मैं अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए The  Hindustan Times अखबार लिया करता था. अंग्रेजी तो ज्यादा नहीं सुधरी, पर 7 अप्रेल 1960 के पेपर में मुझे ए.सी.सी. का एक ऐड जरूर मिल गया, जो मेरे जीवन का एक टर्निनिंग पॉइंट बना. 

मुझे बतौर मेडीकल लेबोरेटरी टैक्नीशियन ए.सी.सी. में नियुक्ति मिल गयी. लाखेरी पहली दृष्टि में मुझे यों भी भा गयी; चारों तरफ नैसर्गिक छटा बिखेरते हुई पहाडियां और लबालब भरे बड़े तालाब, बरसात के दिनों की हरियाली, और सबसे विशिष्ट बात कि पितातुल्य स्नेही बॉस डॉ. कृपालसिंह सोढ़ी.

डॉ. सोढ़ी भव्य व्यक्तित्व के धनी थे -- श्वेत दाढ़ी, कबरी आँखें, श्वेत ही पगड़ी और श्वेताम्बर. स्वभाव से कड़क व अक्खड़. मैंने तो केवल आठ ही महीने उनके नेतृत्व में काम किया, और उसके बाद वे रिटायर हो गए थे. पुराने लोग बताते थे कि उनका डाईग्नोसिस बहुत सटीक व सही हुआ करता था. जिसको भी उन्होंने टी.बी. का रोग बताया, वे बाद में सही साबित हुए. यद्यपि एक वक्त लोग इसे उनका दिमागी फितूर कहा करते थे. झूठ-मूठ का ‘सिक’ बनाने वालों को वे पकड़ लेते थे. उनके सामने बहाने नहीं चलते थे. वैसे वह ज़माना अपनेपन का था. किसी की तबीयत बिगड़ने की खबर सुन कर कर बिना बुलाये ही वे उनके घर पहुँच जाया करते थे.

कारखाने के कैंटीन हॉल में जब उनकी विदाई पार्टी हुयी तो बहुत से कामगारों की आँखें सजल हो आई थी. उस मौके पर मैंने भी अपनी एक हस्तलिखित कहानी संग्रह "विष के बीज" उनको भेट की थी. दुर्भाग्य से मेरी प्रारम्भिक 11 कहानियों का यह संग्रह मेरे पास नहीं रहा. उसकी मूल पांडुलिपि किसी साथी ने पढ़ने के लिए माँगी थी और लौटाई नहीं.

डॉ. सोढ़ी जी के एक पुत्र लेबर ऑफिसर बन कर दो बार लाखेरी कारखाने में थोड़े थोड़े समय के लिए रहे. वे बाद में पोरबंदर/शिवालिया को स्थानांतरित हो गए थे. साथी लोग बताते थे कि पिता की प्रतिमूर्ति डॉ. सोढ़ी जी का एक बड़ा बेटा भी था, जिसकी किसी दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी. पुत्रशोक से बड़ा शोक और कोई नहीं होता है, ऐसा कहा जाता है. संभवतः डॉ. सोढ़ी इसी कारण बहुधा अपसेट रहा करते थे. पर मुझसे तो वे सदा पितृस्वरुप में ही मिला करते थे.

सुनहरे दिनों के वे चांदी के से लोग अब स्मृतिशेष हैं.

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शुक्रवार, 30 जून 2017

उजाड़खंड की व्यथा-गाथा

हिमालय की गोद में बसा हुआ हमारा छोटा सा उत्तराखंड राज्य अनेक प्राकृतिक संपदाओं से हरा भरा रहा है. इसी को देवभूमि नाम भी दिया गया है. राज्य के दो मुख्य संभाग हैं; पश्चिम की तरफ गढ़वाल व पूर्वीय संभाग कुमाऊँ है. दोनों संभागों में हिन्दी की अपभ्रंश बोलियों में थोड़ा सा अंतर भी है, परन्तु सामाजिक व वैचारिक धरातल पर अनेक साम्यतायें हैं. गढ़वाल के दूर-दराज पहाड़ी गांवों की वर्तमान स्थिति भी लगभग वैसी ही होनी चाहिए जैसी हमारी कुमाऊँ क्षेत्र में है.

पिछले 50-60 वर्षों से रोजगार व आधुनिक सुख-सुविधाओं की तलाश में गावों के समर्थ लोग बड़ी संख्या में तराई/भाबर (मैदानी क्षेत्र) की तरफ बसने लगे थे. नौकरी-पेशा लोग बड़े शहरों की रोशनी में गुम होते चले गए. सरकारों ने अनेक लोकलुभावन घोषणाएँ या कार्यक्रम पलायन रोकने के जरूर किये हैं, पर हवा ऐसी चली कि आज गावों में केवल बूढ़े और अशक्त लोग बचे हैं, क्योंकि वे असमर्थ हैं. प्रेस की रिपोर्टों के अनुसार हमारे ये हजारों गाँव जो कभी स्वावलंबी हुआ करते थे, गुलजार थे, अब खंडहरों में तब्दील हो गए हैं. नौकरी-पेशा लोग कोटद्वार, हल्द्वानी, रामनगर, टनकपुर का रुख किया करते हैं, या कहीं रोड साइड पर बसने की जुगत करते हैं. इसी तुफैल में बागेश्वर जैसे शहर के चारों तरफ की कृषि वाली सेरे की पूरी जमीन मकानों की भेंट चढ़ चुकी है.

अब बचे-खुचे गावों में भी लोगों ने खेती करना छोड़ दिया है. उसके पीछे कारण ये बताये जाते हैं कि बंदरों, बाघों, व सूअरों का आतंक इतना बढ़ गया है कि खेती करना दुष्कर हो गया है. हाली-ग्वाल अब पहाड़ों में उपलब्ध नहीं है. सरकार सस्ते में अनाज दे रही है (अधिसंख्य लोग बी.पी.एल. कैटेगरी में हैं). फिर खेती की हाड़तोड़ मेहनत की जहमत क्यों की जाए? लोग अब गाय-भैस भी नहीं पालते हैं. पैकेट का दूध आसपास दूकानों में मिल जाता है.

कुल मिलाकर हालात ये हैं कि ये दूर दराज के गाँव अब बंजर हो गए हैं. हाँ, यहाँ से पलायन किये हुए बुजुर्ग लोग अपने पुराने दिनों को अवश्य याद किया करते हैं. यद्यपि उनके अपने अंधविश्वास आज भी ज़िंदा हैं. वे अपने गाँव से अपने देवी देवताओं के प्रारूप प्रस्तर साथ में लेकर आये हैं और नई बसावट में घन्याली-जागर कराते रहते हैं.
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