गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

ह्वीलचेयर (संस्मरण)

  
मैं सर्वप्रथम उन आदिम मानवों को नमन करना चाहता हूँ जिन्होंने इस धरती पर पाषाण युग के बाद (इतिहासकारों के अनुसार ताम्र युग में) ह्वील या पहिये की परिकल्पना की होगी और उसका आविष्कार किया. आज के वैज्ञानिक युग के यांत्रिक चमत्कारों से बहुत पहले ही ह्वील मानव सभ्यता के लिए वरदान बन गया था, जिसके प्रमाण पौराणिक काल के रथ वाहनों के पहियों के रूप में वर्णित हैं. विश्व के अन्य भागों में जहां भी मानव सभ्यताएं विकसित हुए, वहाँ पहिये की परिकल्पनाएं मौजूद मिली हैं. इस बात की पुष्टि लुप्त हुई माया सभ्यता के भग्नावशेषों की भित्ति चित्रों तथा मैसोपोटामिया के अवशेषों से होती है.

आज की बात की जाए तो बच्चों के सबसे छोटे लकड़ी के खिलौने लट्टू यानि ‘टाप’ से लेकर ट्राईसिकल, साईकिल, मोटर बाईक, मोटर कार, रेलगाड़ी, हवाई जहाज तक, तथा घड़ी के अन्दर के पुर्जे से लेकर बिजली के पंखे, टर्बाइन व बड़ी बड़ी मशीनों तक सभी कलपुर्जे ह्वील के आविष्कार के फलस्वरूप ही हैं, और ये सभी हमारे जीवन के आधार बने हुए हैं, और हमारी कार्यप्रणालियों में सहायक हैं. जैसे कि आवागन के लिए वाहनों में ह्वील ही आधार होता है, ह्वील युक्त चेयर, बीमारों, बूढ़ों, विशेषकर अपन्गों के लिए वरदान है; हवाई यात्राओं के समय सभी एयरपोर्ट्स पर फ्री उपलब्ध की जाती हैं. विकसित देशों में ज्यादातर टूरिस्ट जगहों पर भी व्हीलचेयर का प्रावधान होता है, और लगभग सभी बिल्डिंग्स व्हीलचेयर एक्सेसिबल होती हैं. 

इस बार २६ जनवरी को डलास (टैक्सास- अमेरिका) से नई दिल्ली लौटते समय व्हीलचेयर से सम्बंधित कुछ विशिष्ठ अनुभव हुए, जिनका मैं यहाँ वर्णन करना चाहता हूँ. यों तो अच्छे भले-चंगे बुजुर्ग लोग भी अपने हवाई टिकटों के साथ ही ह्वीलचेयर की मांग रख देते हैं, और हवाई कम्पनियां अपने ऐसे सभी यात्रियों का सम्मान करते हुए बिना कुछ इन्क्वारी के ही उनको यह सुविधा प्रदान करती हैं. सभी बड़े एयरपोर्ट्स पर दूर देशों को जाने वाले जहाजों के एंट्री गेट्स दूर दूर होते हैं, जहां पर यात्रियों को इस व्यवस्था का बड़ा लाभ मिला करता है, क्योंकि ह्वीलचेयर का पोर्टर गाइड का भी काम करता है. ह्वीलचेयर पर बैठे यात्रियों व उनके साथ चल रहे साथियों को हर चेक पॉइंट्स पर प्राथमिकता से गेट पास भी मिलता रहता है.

मेरी अर्धांगिनी जिसके कि आर्थो आर्थ्राइटिस से पीड़ित घुटने चार वर्ष पूर्व रिप्लेस (मैटलिक) किये गए हैं, अब अच्छा चल फिर लेती है, पर उम्र में डायमंड जुबली के करीब होने की वजह से ऐसी यात्राओं में ह्वीलचेयर की आवश्यकता रहती है. डलास एयरपोर्ट पर लगेज बुक कराने के बाद उनको ह्वीलचेयर पर बिठा दिया गया था और सेक्युरिटी चेकिंग होने के बाद पोर्टर हमको हमारे जर्मन एयरवेज लुफ्थांसा के वेटिंग लाउन्ज पर बिठाकर चला गया क्योंकि उड़ान में तब बहुत समय बाकी था. धीरे धीरे पूरा वेटिंग परिसर भर गया. एंट्री का समय नजदीक आने पर बड़ी लाइन लग गयी. तभी एक सुन्दर जवान महिला ने मेरी श्रीमती की साडी-बिंदी वाली भारतीय कास्ट्यूम देखकर मुस्कराहट के साथ बेलाग हिन्दी में बोला, “आप लोग ह्वीलचेयर पर आ जाओ वरना आपको भीड़ में लाइन से गुजरना पड़ेगा.” हमें उसकी यह सलाह बड़ी प्यारी लगी. वह खुद एक ह्वीलचेयर पोर्टर का काम करने वाली कार्यकर्त्री थी. मेरी श्रीमती को ह्वीलचेयर पर बिठाकर गेट के करीब ह्वीलचेयर वालों की कतार में लगा दिया और बिलकुल अपनेपन के साथ बतियाने लगी. उसने बताया कि वह काठमांडू, नेपाल की रहने वाली है. उसके पति भी वहीं किसी कंपनी का मुलाजिम था. पांच वर्ष पहले वे यहाँ आ गये थे. वह फर्राटे से लोकल इंग्लिश में अन्य पोर्टरों से बातें भी कर रही थी. हमसे भी उसने वहां आने का कारण तथा तमाम पारिवारिक जानकारियाँ पूछ डाली. उसने कहा कि उसे वतन नेपाल की बहुत याद आती है. लगभग १४,००० किलो मीटर दूर अपने माता-पिता व भाई बहन से मिलने का बहुत मन करता है. मुझे लग रहा था कि वह बहुत ‘होम सिक’ थी. जेट प्लेन के दरवाजे तक उसने ह्वीलचेयर चलाई और विदाई देते समय रूंधे गले से ‘नमस्ते’ बोल गयी.

जर्मनी के फ्रेंकफर्ट में हमें प्लेन बदलना था, जहां करीब चार घंटों का विश्राम होना था. यहाँ भी ह्वीलचेयर लेकर एक जर्मन महिला हमारी प्रतीक्षा में थी, जिसने हमको एक ऐसे कैम्पस में लेजाकर बिठाया, जहां पर सभी ह्वीलचेयर वाले अपने अपने देशों को जाने के इंतज़ार में आराम कर रहे थे. वहाँ पर चाय-कॉफ़ी की मशीन भी लगी थी, जिससे एक श्वेत दाढ़ी वाले मुस्लिम सज्जन चाय निकाल रहे थे. मैंने उनसे पेमेंट के बारे में जानकारी चाही तो उन्होंने कहा कि "यह चाय फ्री है.” मैं बाद में जब चाय लेने मशीन पर गया तो दो नकाब वाली मुस्लिम महिलायें भी चाय लेने आ गयी. मुझे लग रहा था की वे दोनों शायद सास बहू थी. मुझे मशीन से चाय निकालने में कुछ दिक्कत देखकर बहू ने मुझे सही तरीका बताया और मेरी चाय में डबल दूध व शक्कर डाल कर अपनापन घोल दिया. मैंने उनसे पूछा, “क्या आप लोग पाकिस्तान से हैं?” उसने कहा, “नहीं, हम फिजी से हैं.” फिजी नाम सुनकर मुझे ब्रिटिश राज के गुर्मिटिया मजदूरों का इतिहास याद आया कि किस प्रकार गन्ने के खेतों में काम कराने के लिए गरीब हिन्दू व मुस्लिम मजदूर वहाँ ले जाए गए थे, जो फिर वहीं के होकर रह गए. ये उन्ही के वंशज थे, जो आज भी वहाँ बिना किसी साम्प्रदायिक भेदभाव के सौहार्द्य पूर्वक रह रहे हैं; जबकि अपने देश भारत में सत्ता प्राप्ति के लिए राजनैतिक लोग आज भी दंगे कवाते रहते हैं, और असहिष्णुता का जहर इस कदर फैला रहे हैं कि इतिहास में कई नए काले अध्याय जुड़ते चले जा रहे हैं.

कुछ ही देर बाद उनका बुलावा आ गया और वे चले गए जाते जाते सास और बहू दोनों ने कनखियों से हमें देख कर मुस्कुराते हुए हाथ हिलाकर अभिवादन किया. पता नहीं क्यों हमें ऐसा लग रहा था की कोई ‘अपने ही’ हमसे बिछुड़ कर जा रहे हैं.

बाद में जब हमको अपने रवानगी गेट के लाउंज में पहुंचाया गया तो देखा कि पूरा लाउंज खचाखच भरा था. यूरोप व पश्चिमी गोलार्ध से भारत आने वाले लोग फ्लाईट की इंतजारी में थे. जब एंट्री के लिए मात्र १५ मिनट बचे थे तो एक अप्रत्याशित घटना घट गयी कि एक ३०-३५ वर्षीय व्यक्ति को इपिलेप्सी (मिर्गी) का दौरा पड़ गया. वह धड़ाम से फर्श पर आ गिरा और छटपटाने लगा. उसका बैग खुला हुआ था, जिसमें से लैपटाप आदि सामान बिखर गया. आसपास के लोग सहायता के लिए लपक पड़े. एक सिख सज्जन ने उसके मुंह में डालने के लिए अपनी पानी की बोतल खोल डाली तो मैंने उनको इसके लिए मना किया कि मिर्गी के दौरे के समय पानी देना ठीक नहीं होता है. पानी श्वास नली में जा सकता है. एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि उसे जूता सुंघाओ. मैंने उनको भी इसके लिए मना किया क्योकि यह पारंपरिक सोच सही नहीं है. मात्र दो मिनटों में ही उसे चेत आ गया वह लज्जित सा होकर मुस्कुरा दिया, बोला “मैं आज दवा खाना भूल गया था.” इस बीच एयरपोर्ट का स्टाफ भी आ गया; मेडीकल असिस्टेंट की बात करने लगे पर उसने मना कर दिया, और अपने बैग में से ही दवा ले ली. मैंने उसको कहा कि मिर्गी वाले मरीजों को अकेले सफ़र नहीं करना चाहिए तो उसने बेबसी के साथ बताया की इस बीमारी की वजह से उसकी पत्नी ने उससे डिवोर्स ले लिया है. उसका यह ह्रदय विदारक दुःख सुनकर हम सभी अफसोस करते हुए मौन रह गए. एयरपोर्ट स्टाफ उसे तुरंत ह्वीलचेयर में बिठाकर सबसे पहले बोर्डिंग के लिए ले गए.

फ्रेंकफर्ट में उस दिन (जनवरी २७, २०१८) बहुत कोहरा छाया था सात घंटों की इस दूसरी उड़ान के दौरान सीट के आगे स्क्रीन पर एक अंगरेजी फिल्म देखने को मिली, जो ब्रिटेन की पूर्व महारानी स्वर्गीय विक्टोरिया और उनके खानसामा  अब्दुल करीम की प्रेमगाथा थी. यद्यपि मुझे पूर्व में इस सन्दर्भ में कुछ सुनी सुनाई जानकारी थी, पर फिल्म में बहुत खूबसूरती से उस प्रेमलीला को दिखाया गया है. ब्रिटिश राज के लोगों ने राजवंश को बदनामी से बचाने के लिए महारानी की मृत्यु के बाद अब्दुल करीम की उपस्थिति में ही सारे प्रेमपत्र जला डाले; इस प्रकार एक दुखद अंत भी था.

जब हमारा प्लेन रात २ बजे नई दिल्ली के इंदिरागांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंचा तो यहाँ पर और भी घना कोहरा और ठण्ड का प्रकोप था. ह्वीलचेयर पर मेरी श्रीमती को बिठाकर पोर्टर ने हमको जल्दी ही ग्रीन चेनल से बाहर निकालने में फुर्ती दिखाई. लगेज के बाहर आने में जरूर आधा घंटा लगा. बाहर गेट नंबर चार पर हमारा पुत्र चि. प्रद्युम्न अपनी गाड़ी पार्किंग में खड़ी करके बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था. ह्वीलचेयर नजदीक देखकर वह हमें लेने आगे बढ़ा और प्रणाम करके पोर्टर से ह्वीलचेयर लेकर अपनी माँ से बतियाते हुए तेजी से पार्किंग की तरफ ले चला. बेहद ठंड व कोहरे के बीच हमारा यह मिलन भी आनंददायक था. ह्वीलचेयर आगे आगे थी और मैं लगेज ट्राली लेकर पीछे पीछे असीम लेखकीय विचारों को समेटता हुआ चल रहा था.
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सोमवार, 22 जनवरी 2018

बसंत पंचमी

माघ माह के शुक्ल पक्ष की पांचवी तिथि बसंत पंचमी / श्री पंचमी / बागेश्वरी पंचमी के नाम से जानी जाती है. पौराणिक गाथाओं के अनुसार यह देवी सरस्वती का जन्मदिन होता है और उनकी पूजा की जाती है. भगवती सरस्वती को ज्ञान, संगीत तथा बुद्धि की अधिष्ठाता माना गया है. सनातन विश्वासों के अनुसार इस दिन छोटे बालक/बालिकाओं को कलम पकड़ाने का अनुष्ठान किया जाता है.

हमारे उत्तराखंड में इसे कृषक त्यौहार के पारंपरिक रूप में मनाया जाता है, जौ की हरी पत्तियाँ घरों के मुख्य दरवाजों और जानवरों के गोठ/गोशाला में दोनों तरफ चिपकाए जाते हैं तथा जौ की पत्तियाँ शुभ कामनाओं के साथ माथे पर रखी जाती हैं. छोटी बालिकाएं अपना कर्णछेदन व नकछेदन बसंत पंचमी के दिन करवाती हैं. यह दिन विशेष रूप से पीले वस्त्र, पीले पकवानों, और पीले रंग के फूलों का होता है. ऋतुराज बसंत का आगमन यों भी खुशियों पूर्वक मनाया जाता है कि मौसम परिवर्तन होने से ठिठुरती ठण्ड से मुक्ति मिलती है. बसंत पंचमी को होलिकोत्सव (मदनोत्सव) का आगाज भी हो जाता है. पेड़ पौधों पर नई कोपलें व पुष्प प्रस्फुटित होने लगते हैं.

मेरे परिवार के लिए इस विशिष्ठ दिन का महत्व ये है कि आज ही के दिन सन १९९७  को मेरी पूज्य माताश्री का स्वर्गवास हुआ था. माँ, जिनकी कोई तुलनीय उपमा नहीं होती है, उनसे बिछुड़ने का दर्द इस तिथि पर अवश्य हरा होता है, परंतु इस नश्वर संसार का शाश्वत सत्य है. इसलिए हर वर्ष उनको श्रद्धा पूर्वक याद करते हैं.
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गुरुवार, 18 जनवरी 2018

Cement Man - श्री भास्कर आगटे

हिन्दी, मराठी, व अंग्रेजी के प्रकांड श्री भास्कर आगटे जी का मुझे सानिध्य तब प्राप्त हुआ जब वे ९० के दशक में लाखेरी सीमेंट कारखाने में डी.जी.एम.(टेक्निकल) के रूप में स्थानांतरित होकर आये थे. उनके पहुँचने से पहले उनके बारे में समाचार पहुँच गए थे कि वे सीमेंट टैक्नोलॉजी के पंडित हैं, और ए.सी.सी. के आधा दर्जन कारखानों में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं. सन १९७२ में फिजिकल कैमिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद वे कैमोर स्थित मूलगांवकर इंस्टीट्यूट में मैकेनिकल + इलैक्ट्रिकल + वेल्डिंग + ऑटोमोबाईल + कैमिस्ट्री की विधाओं में  विधिवत ट्रेनिंग पाकर तराशे गए थे. यह सब तब हम लाखेरीवालों की अग्रिम जरूरत भी थी क्योंकि हम कर्मचारीगण इन वर्षों में कारखाने के पराभव के बारे में सहमे हुए थे; इसलिए शुभाकाँक्षी थे कि कारखाना चलता रहे और हमारी रोजी-रोटी बनी रहे. ए. सी. सी., जो कि इस इलाके का एकमात्र बड़ा उद्योग था, लाखेरी नगर तथा आसपास के गांवों के लिए पूर्ववत ‘कंपनी माता’ के स्वरुप में ज़िंदा रहे.

"घोड़ा उड़ सकता है" यह तो एक मुहावरा है, पर हमने प्रत्यक्ष देखा है कि बहुत से सीनियर कामगारों के कष्टपूर्ण बलिदानों (V.R.S.) के परिणामस्वरुप कम लागत पर अधिक उत्पादन की सोच से घाटे में डूबते कारखाने को नवजीवन देकर ऊपर लाने की प्रक्रिया हर कोशिश में थी; ऐसे में मैं तब कामगार संघ का अध्यक्ष के रूप में अपने जनरल सेक्रेटरी श्री रविकांत शर्मा को साथ लेकर आगंतुक टेकनिकल अधिकारी के स्वागत करने उनके कार्यालय में गया था.

उम्र में मुझसे लगभग १० वर्ष छोटे श्री आगटे मिष्टभाषी  हैं. मेरे १९९९ में रिटायरमेंट के बाद भी कई वर्षों तक प्लांट हेड श्री पी.के. काकू और श्री दुर्गाप्रसाद के नेतृत्व में देखभाल करते रहे.

मैंने जब सन २०१४-१५ में अपनी लाखेरी की स्मृतियों को सीरीज के रूप में फेसबुक (ग्रुप- लाखों के लाखेरियन) में प्रकाशन किया तो श्री आगटे (इस लेखन के नियमित पाठक रहे) ने मुझे सलाह दी कि इस सीरीज को "लाखेरी – पिछले पन्ने" के रूप में पुस्तकाकार छपवाया जाये. मैंने इसकी भूमिका लिखने के लिए आगटे जी को ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति समझा और उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार भी कर मुझे अनुगृहीत किया. इस पुस्तक में एक लेख ‘सीमेंट’ भी है जिसमें मैंने अपनी अल्प जानकारी के अनुसार जो तथ्य लिखे थे उनको विस्तार देकर आगटे जी ने एक सम्पूर्ण दस्तावेज बनाकर नवाजा है.

मैंने जब आगटे जी का पूरा प्रोफाईल देखा तो पाया है कि वे एक असाधारण व्यक्ति हैं उनको अगर ‘सीमेंट मैन’ कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. उन्होंने सीमेंट विषय पर अनेक दस्तावेज/ रिसर्च पेपर्स कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत किये हैं. प्रकाशित दस्तावेजों में  "Quality  control in cement plants & quality control of  clinker" बहुचर्चित हैं. सीमेंट के क्षेत्र में उनकी उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं.

उनके रिकार्ड में मुझे एक ऐसा भी दस्तावेज देखने को मिला, जिसमें उनकी मानवीय संवेदनाओं की झलक मिलती है. एक अधीनस्थ योग्य अधिकारी को किसी बात पर जब बर्खास्त किया जाने वाला था तो श्री आगटे ने उन परिस्थितियों का अध्ययन कर उसे एक तरह से नवजीवन दिया. आज भी उनके फेसबुक पर मैं देखता हूँ कि जिन कारखानों में भी उन्होंने कार्य किया था वहाँ के अनेक मित्र, सहकर्मी, या मातहत कर्मचारी उनसे लगातार जुड़े रहते हैं. 

ए.सी.सी. से रिटायरमेंट के बाद भी उनकी कर्म के प्रति निष्ठाभाव इस बात से जाहिर होता है कि प्रोफेशनल ट्रेनिंग देने का कार्य वे निरंतर जारी रखे हुए हैं. वे कई संस्थाओं में गेस्ट विजिटिंग फैकल्टी एंड पीएच.डी. मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट पूना के थीसिस प्रूफ रीडिंग आदि रचनात्मक कार्य निरंतर कर रहे हैं.

पारिवारिक जीवन में भी वे एक सुखी व्यक्ति हैं. एक योग्य पुत्र और पुत्री के पिता होने का गौरव उनको प्राप्त है. दोनों ही देश और विदेश में सेवारत रहते हुए आनन्द पूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं. श्रीमती आगटे एक समर्पित सद्गृहणी हैं. बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्होंने बड़ी तपस्या की है. वे कारखानों के कैंपस में हुए महिला क्लब द्वारा आयोजित सभी सामाजिक कार्यों में भागीदार रहती थी. आगटे जी अब सगे सम्बन्धियों के साथ पूना में रह रहे हैं. ईश्वर उनको सपरिवार स्वस्थ और सुखी रखे, यही हमारी दुआ है.
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मंगलवार, 9 जनवरी 2018

अटलांटिक के उस पार -१२: The Sixth Floor Museum at Dealey Plaza



इस फोटोग्राफ में मैं उस जगह खड़ा हूँ, जहां पर १९६३ में सयुंक्त राज्य अमेरिका के एक राष्ट्रपति जॉन ऐफ. कैनेडी की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी. वह एक मुखर स्पष्टवक्ता राजनेता के रूप में जाने जाते थे. आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे और विश्व में शीत युद्ध की जबरदस्त छाया के दौरान शक्तिशाली लीडर के रूप में स्थापित हो चुके थे. अमेरिका के ३५ वें राष्ट्रपति कैनेडी सबसे कम उम्र वाले राष्ट्रपति थे. एक अमीर व्यापारी खानदान में जन्मे जॉन ऐफ. कैनेडी द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी नेवी में भी अपनी सेवा दे चुके थे, तथा बाद में १९४७ में प्रतिनिधि सभा में रहे, और १९५३ से १९६० तक सीनेटर रहे.

मैं जब २३-२४ साल का था, तब भी नियमित रूप से विश्व समाचार भी पढ़ा सुना करता था. मुझे अच्छी तरह याद है जब राष्ट्रपति कैनेडी की मृत्यु का समाचार ट्रांजिस्टर पर सुना था. यद्यपि तब मैं किसी राजनैतिक विचारधारा या संकल्पों से जुड़ा हुआ नहीं था, समाचार सुनकर मैं बहुत दु:खी हुआ था क्योंकि वे एक युवा आदर्श थे.

मैं अभी उस बिल्डिंग की छटी मंजिल पर जाकर उस स्मारक म्यूजियम को देख-सुन आया हूँ जिसमें बड़े बड़े चित्रों, लेखों व ऑडियो-वीडियो द्वारा जॉन ऐफ. कैनेडी को ज़िंदा रखा गया है. जब मैं टेक्सास राज्य के डलास शहर के डाउन टाउन में Sixth Floor Museum at Dealey Plaza  नामक संग्रहालय में पहुंचा तो वहां पर्यटकों की लम्बी कतार थी. सभी को व्यवस्था की तरफ से $१६ ($१४ सीनियर सिटिजन्स के लिए) एंट्री फीस लेकर एक guiding tape recorder with head phone  दिया गया, जिससे हर दृश्य का विस्तार से वर्णन सुना जा सकता था. पूरे कार्यक्रम में कैनेडी के कुछ वाक्य बार बार याद आ रहे थे जैसे, “A man may die, nation may rise and fall, but an idea lives on.”

उन्होंने अपने देशवासियों से कहा था कि, “आप ये मत सोचिये कि राष्ट्र आपको क्या दे रहा है, आप सोचिये कि आप राष्ट्र को क्या दे रहे हैं.”

उनकी एक मशहूर पुस्तक Profiles in Courage को पुलित्जर पुरूस्कार प्रदान किया गया था. कैनेडी ने विश्व में परमाणु निशस्त्रीकरण का नया अध्याय शुरू किया. सारे विश्व को प्रभावित करने वाली इस शक्शियत का इस तरह क़त्ल कर दिया जायेगा / करवा दिया जाएगा, ऐसा किसी ने सोचा भी न था. यद्यपि अमेरिकी इतिहास में वे चौथे राष्ट्रपति थे, जिनको अकाल मार दिया गया था.

संग्रहालय में उनके सुखी पारिवारिक जीवन की झांकिया भी चित्रों में दर्शाई गयी हैं, पर दुखद अंत मन में टीस पैदा करता है. यह सब देखकर महात्मा गांधी स्व. इंदिरा गांधी व उनके पुत्र स्व. राजीव गांधी के जीवन बलिदानों की याद ताज हो आई. ये सभी अब इतिहास के अमर पात्र बन गए हैं.
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शनिवार, 6 जनवरी 2018

अटलांटिक के उस पार - ११ Our New Year Eve Celebration 2018

मैं और मेरी अर्धांगिनी कुन्ती पाण्डेय टेक्सास राज्य के डलास शहर में बेटी-दामाद के आतिथ्य का गत दो महीनों से भरपूर आनंद ले रहे हैं. यह स्थान हमारे घर हल्द्वानी से लगभग १३,५०० किलोमीटर दूर है; हम पहले भी दो बार क्रमश: २००६ और २०११ में अमेरिका आ चुके हैं, पर इस बार मैं सोचता हूँ कि ये हमारे पर्यटन का आख़िरी दौर है क्योंकि अब इस उम्र में ऐसा लम्बा सफ़र बहुत दुरूह है. इस बार यहाँ आना यों भी आवश्यक हो गया था कि नातिनी हिना का गत नववंबर में विवाहोत्सव था. तीन महीनों के इस अंतराल में नववर्ष २०१८ का आगाज हो गया है. यहाँ इन बच्चों ने अपने संगी-साथियों के साथ उत्तर दिशा में ओक्लाहोमा राज्य की पर्वतीय उपत्तिकाओं में चीड़ के जंगलों के बीच ब्रोकन बो शहर में नये साल का जश्न मनाने का प्रोग्राम बनाया, जिसके लिए पहले से बुकिंग कर ली गयी थी. यह स्थान करीब २८० किलोमीटर दूरी पर है. कुल आठ भारतीय परिवार अपने नन्हे-मुन्नों के साथ अपनी अपनी गाड़ियों में सड़क मार्ग से ३१ दिसंबर दोपहर बाद वहाँ पहुंच गए थे.

वहाँ लकड़ी के बने हुए सुन्दर मकान, बाहर से खुरदुरे नजर आ रहे थे, पर घरों के अन्दर सभी अत्याधुनिक सुविधायें थी. बाहर का तापमान दिन में भी -४ डिग्री सेल्सियस हो रहा था, लेकिन घर के अन्दर बिजली का अलाव तथा पूरी बिल्डिंग एयर कंडिशन्ड थी; आरामदायक फर्नीचर, बिस्तर, फ्रिज, फर्निश्ड किचन, गैस, शुद्ध ठंडा/गरम पानी वाला स्नानघर, टी.वी., इंटरनेट, और साबुन-तौलिये सब कुछ. जंगल में थोड़ी थोड़ी दूरी पर बने ये ‘लॉग हाउस’ किराए के मतलब से ही पर्यटकों के लिए बनाए गए हैं. हाँ इनके किराए की बात मैं ना करू तो बेहतर होगा क्योंकि हमारे देश के हिसाब से ये कई कई गुना ज्यादा था, पर ये अमेरिका है, यहाँ रहने वाले रुपयों में कन्वर्ट करके नहीं देखते हैं. बहरहाल जंगल में मंगल की कल्पना साकार थी.

ग्रुप के ये सभी लोग नोकिया कंपनी में कार्यरत हैं. सभी की पत्नियां भी यहाँ जॉब करती हैं; बच्चे सभी स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले हैं. पहले से तयशुदा व्यवस्था के अनुसार बहुत सारी खाद्य सामग्री, तेल मसाले से लेकर रेडीमेड व्यंजन लेकर गए थे, तथा बहुत से व्यंजन वहीं ताजे बनाए गए, जिनमें इडली, डोसा, साम्भर, ढोकला, परांठे, पूडियां, सब्जियां, चटनी, पुलाव, मिष्टान्न, सब इन्डियन खुशबू व स्वाद वाले.

शाम होते ही बच्चों का धमाल, महिलाओं का योगा, नृत्य-संगीत आदि एक जीवंत प्रायोजित कार्यक्रम की तरह चला. यद्यपि हम प्रमाणित/ घोषित बुजुर्ग थे परंतु पूरी प्रक्रिया में शामिल रहे. ऐसा लग रहा था कि पूरा परिवार अपना ही था जबकि एक परिवार गढ़वाल (उत्तराखंड) से, एक गुजरात से, दो तमिलनाडु से, एक ओडीसा से, दो बंगाल से, एक आसाम से और हम उत्तराखंड (कुमाऊँ) से वहां थे. अनेकता में एकता के दर्शन हो रहे थे. परिस्थितिवश सभी अंगरेजी बोलने के अभ्यास में थे और बच्चे तो यहीं की पैदावार होने से शुद्ध अमरीकी लहजे में वार्तालाप कर रहे थे. इस कार्यक्रम में मेरा एक पौत्र चि. सिद्धांत भी शामिल था, वह बोस्टन में इंजीनियरिंग की चौथे साल की पढ़ाई  के बीच सर्दियों के अवकाश में हमारे पास आया है. उसने एक ग्रेजुएसन कर रहे हमउम्र बालक के साथ मिलकर पूरे आयोजन में रौनक बनाए रखी.

इस ग्रुप के एक सदस्य मुझे सन २००३ में फिलीपींस से जानते थे, जहां सामूहिक कार्यक्रमों में मैंने खूब चुटकुले सुनाकर लोगों का मनोरंजन किया था, उसने जब सबके सामने मुझसे अनुरोध किया तो मैं भी कुछ समय के लिए सींग कटवा कर बछडा बन सभी का मनोरंजन करता रहा.

आधी रात को १ जनवरी के आगाज होते ही बच्चे जवान सभी थिरकते रहे, और एक दूसरे को Happy New Year की शुभकामनाओं से सरोबार करते रहे.

एक जनवरी का पूरा दिन हँसी-खुशी में बीता. दोपहर बाद गाड़ियों का काफिला साईट सीइंग के लिए दूर नदी-तालाब व पहाड़ियों का अवलोकन करने के लिए निकला; बाहर तापमान -५ डिग्री होने पर भी बड़े और बच्चों ने काफी समय बाहर बिताया. मैं और श्रीमती घूमने का ज्यादा आनंद नहीं ले सके, और कुछ समय पश्चात सभी लोग लॉग हाउस में लौट आये.

शाम की दावत के साथ साथ नाच गाने, मनोरंजक क्विज प्रोग्राम देर रात तक चला. अगली सुबह ब्रेकफास्ट व फोटो सेशन के पश्चात सबने एक दूसरे को शुभ कामनायें दी और लौट चले. चार घंटों के सफ़र में रास्ते में बहुत से शहर आये. दो नाम जाने पहचाने थे; एक मैनचेस्टर (इंग्लेंड में मैनचेस्टर जो बढ़िया कपड़ों के मिलों के लिए प्रसिद्धथा  दूसरा पेरिस (फ्रांस की राजधानी के नाम से), जहाँ एक छोटा एफिल टावर भी बनाया गया है. दरअसल जो लोग जिस देश/शहर से आकर यहाँ बसे उन्होंने वही नाम अपनी बसावट की रख दी होगी.

फ्लावर माउंड में अपने आवास पर आने पर हमने पाया कि गत दो दिनों में यहाँ भी माइनस में तापमान होने से बैकयार्ड में स्विमिंग पूल के झरनों का पानी जमा हुआ था.

इसप्रकार सुखद भविष्य की परिकल्पनाओं के साथ नव संचारित होकर हम लोग २०१८ में पदार्पित हुए. मैं अपने पाठकों को भी नववर्ष की अनेकानेक शुभ कामनाएं प्रेषित करता हूँ.
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