गुरुवार, 28 मई 2020

वे यादगार पल




मैंने महात्मा गाँधी जी को केवल चलचित्र या फोटोज में देखा है, यद्यपि मैं सन १९४८ में ८ साल की उम्र पा चुका था. उत्तराखंड के सुदूर हिमालयी क्षेत्र में पन्द्रहपाली गावं के डिस्ट्रिक बोर्ड के स्कूल में मेरे पिताश्री सहायक अध्यापक थे. मैं उनके साथ ही स्कूल जाया करता था.

गांधी जी के कृत्रत्व व व्यक्तित्व के बारे में तब मुझे शायद कुछ ही ज्ञात भी नहीं होगा, मुझे तो इतना भर याद है कि सभी बच्चे व अध्यापक इकट्ठे होकर उनकी मृत्यु के समाचार पर शोक प्रकट कर रहे थे. स्कूल की छत पर तिरगे झंडे को तिरछा करके झुकाया गया था, अलग से झंडे के लिए कोई पोल/मास्ट नहीं था और शायद तब अध्यापकों को भी ये मालूम न था कि झंडे को खड़े करके ही आधा नीचे करना होता है.
                (२)

जवाहरलाल नेहरू जी को मैंने सन १९५८ में पहली और आख़िरी बार बहुत नजदीक से देखा था, तब सिक्युरिटी का आज का जैसा तामझाम नहीं हुआ करता था, दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी के सभागार में कुछ आयोजन था जिसमें वे मुख्य अतिथि थे. उजास चेहरा व आभामंडित मुख मंडल अविस्मरणीय है.

२७ मई १९६४ का वह मन्हूश दिन भी मुझे खूब याद है जब नेहरू जी का स्वर्गवास हुआ था. मैं लाखेरी सीमेंट वर्कर्स की सहकारी समिति का तब जनरल सेक्रेटरी हुआ करता था. उसी सिलसिले में पिछली रात की ट्रेन पकड़ कर में जयपुर आया था. सुबह १० बजे बाद M.I.Road  पर (   सुप्रसिद्ध काफी हाउस काम्प्लेक्स में) राजिस्ट्रार के कार्यालय ने निकल कर ज्यों ही सूरजपोल  बाजार में दाखिल हुआ तो जीप से अनाउन्समेंट हो रहा था कि ‘नेहरू जी नहीं रहे’ . दूकानों के शटर गिरने लगे और  अन्धेरा सा छाने लगा था. लोगों की आँखों में आंसूं छलछला रहे थे. मैं अपने मित्र श्री सुभाष जैन, मैनेजर ई.एस.आई. के निवास ‘हल्दियों के रास्ते’ पर पहुचा तो सचमुच घर के लोग विलाप कर रहे थे. उस दिन  उनके घर में खाना भी नहीं बना.
                 ***

शुक्रवार, 1 मई 2020

जन्मदिन


जन्मदिन / मजदूर दिवस 
समय का पहिया इतनी तीब्रता से घूम रहा है कि पता ही नहीं चला कि ३६५ दिन यों ही निकल गए हैं. आज फिर से एक मई आ गया है, पर इस बार का ये एक मई राष्ट्रीय लॉकडाउन के बीच पडा है. वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी आपदाओं और घनघोर धार्मिक असहिष्णुताओं के चलते मन में कोई उत्साह नहीं है तथा मजदूर दिवस पर तमाम मेहनतकश तबके को हो रही विपदाओं के समाचारों से बेचैन भी हूँ.

मैं स्वयं ८१ वर्ष की उम्र पूरे होने पर शरीर व मन से स्वस्थ और संपन्न हूँ. ये मेरे परिजनों मित्रों – स्वजनों की शुभकामनाओं तथा सद्भावनाओं का प्रताप है कि जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर मैं व्यक्तिगत रूप से हर प्रकार संपन्न हूँ. जीवन की इस लम्बी यात्रा के अंतिम चरण में मैं गर्व से कह सकता हूँ कि मुझे ‘दाता’ ने सब तरफ से नवाजा है.

मुझे मालूम है की हर वर्ष की तरह ही मेरे असंख्य मित्रगण औपचारिक रूप से शुभकामनाएं देंगे और मैं दिल से सभी का धन्यवाद करूंगा.

मैं प्रार्थना करता हूँ की की ‘मेरे अपने’ सभी लोग अपने परिवारों सहित स्वस्थ, सुरक्षित औए सुखी रहें. विश्व भर में kovid-19 का जो विषाणु है जल्दी ही उसको नष्ट करने के प्रयास पूरी तरह सफल हों. एक नई सुबह का आगाज हो और फिर से प्रबल खुशहाली का प्रकाश हो.
                  ***

बुधवार, 6 नवंबर 2019

ना काहू से दोस्ती ....




पुलिस और वकील एक ही परिवार के दो सदस्य से होते हैं, दोनों के लक्ष समाज को क़ानून सम्मत नियंत्रित करने के होते हैं, पर दिल्ली में जो हुआ या हो रहा है उसकी जितनी निंदा की जाए कम होगी. मैं अपने नजदीकी लोगों के उन परिवारों को जानता हूँ जिसमें एक भाई पुलिस में तथा दूसरा एडवोकेट के बतौर कार्यरत हैं. पुलिस में प्राय: छोटे पदों पर कम पढ़े लिखे लोग नियुक्त रहते हैं जबकि सभी  वकील कानूनदां ग्रेज्युएट होते हैं .

सच तो ये है कि आज भी पुलिस की मानसिकता व कार्यप्रणाली ब्रिटिस कालीन चल रही है, इसके सुधार की कई बार बड़ी बड़ी बातें सरकारें करती रही है लेकिन  धरातल पर आज भी पुलिसवाला अपने को हाकिम समझता है और उसी लहजे में बात व्यवहार किया करता है.

वकीलों की बात करें तो कुछ गुणवन्तों को छोड़कर अधिकतर ने इस आदरणीय पद की गरिमा का अवमूल्यन कर रखा है. सच को झूठ तथा झूठ को सच साबित करना ही बड़ी कला रह गयी है. क़ानून की सही व्याख्या करने के बजाय क़ानून में पोल ढूढना वकालत कहलाने लगी है.

मेरे जैसे साधारण नागरिक को ये जानकार बहुत दुःख हुआ कि हाईकोर्ट परिसर में वकीलों की गुस्साई भीड़ ने सरकारी गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया. मैं वकीलों के संगठनों  के मुखियाओं से कहना चाहूंगा कि ये नादानियां बिलकुल बंद करवाई जानी चाहिए.

पुलिस में हो या वकालत में दोनों को संयम के पाठ पढाये जाने चाहिए, जिन लोगों ने माहौल बिगड़ने में जोर लगाया है उनको जरूर दण्डित किया जाना चाहिए.

हो क्या रहा है कि पुलिस महकमे (सी.बी.आई./ गुप्तचर विभाग से लेकर पुलिस चौकी तक ) का राजनीतिकरण हो गया है. नतीजन हर फैसले में अन्याय की बू आने लगी है.
वकीलों में भी जो लोग सत्ता के करीबी हैं वे खुद को न्यायाधिकरण से ऊपर समझने लगे हैं.

प्रबुद्ध लोग कुछ कहने में डरने लगे हैं क्योकि सत्ता से असहमति का अर्थ राष्ट्र्द्रोह कहा जाने लगा है. कर्णधारों को इस पूरी समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा.
                  ***

शनिवार, 19 अक्तूबर 2019

सिंदरी से - ५ धन- धान्यवाद - धनबाद


एक समय था जब खदानों के बारे में पढाई सिर्फ धनबाद में ही हुआ करती थी, एसीसी की खदानों में कार्यरत इंजीनियर्स सभी धनबाद रिटर्न हुआ करते थे.

धनबाद शहर झारखण्ड का रांची के बाद सबसे बड़ा शहर है. इस शहर की बनावट भी आम भारतीय कस्बों की तरह ही विक्सित हुई है. सन १९५६ से पहले ये इलाका बंगाल  प्रांत के मनभूम का हिस्सा था, इसे बाद में जिला की पहचान दी गयी औए ये बिहार का हिस्सा बन गया.

इतिहास में दर्ज है कि इसे सन १९१८ में ‘धान बाईद’ से संशोधित करके धनबाद नाम दिया गया था. कोयलांचल के इस उपजाऊ धरती पर एक विशिष्ट धान (चावल) ‘बाईद’ पैदा होता था/ है.

यहाँ के सभी प्राइवेट कोल माईन्स का राष्ट्रीयकरण स्व.प्रधान मंत्री इंदिरा गाधी के समय में हुआ था. कोल इंडिया का मुख्यालय धनबाद में ही है. इतिहास में दर्ज है कि सन १७६४ में अंग्रेजों ने बक्सर के युद्ध में मुग़ल शासक को पराजित करके एक संधि कर ली जिसे (‘इलाहाबाद संधि’ के नाम से जाना जाता है) इस इलाके को अपने अधीन कर लिया था.

अंग्रेजों के कब्जे के बाद आदिवासी लोग बेदखल किये जाने लगे तथा उनकी महिलाओं पर अत्याचार होने लगे थे तो एक क्रांतिकारी नौजवान ‘बिरसा मुंडा’ ने हथियार उठाकर अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे. अपने इस महानायक को आदिवासी लोगों ने भगवान् का दर्जा दिया हुआ है. बाद में प्रशासन ने अनेक स्कूल-कालेज, पार्क व संस्थानों को बिरसा मुंडा नाम से जोड़कर अमर किया हुआ है. बिरसा मुंडा इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी तथा रांची स्थित बिरसा एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी इसके बड़े उदाहरण हैं.

हावड़ा के मुख्य रेल मार्ग से जुड़ा हुआ धनबाद, सिंदरी से महज २८ किलोमीटर दूर है. समृद्ध बाजार व मॉल देखकर लगता नहीं है कि ये खनिज अ वन संपदा वाला इलाका कभी ‘बीमारू राज्य’ का हिस्सा रहा होगा.
                    ***

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2019

सिन्दरी से - ४



पुरानी यादों को ताजा करने के लिए संस्मरण लिखे जाते हैं, कड़वी, मीठी या अंतर्मन को गुदगुदानेवाली यादें अक्सर स्वांत:सुखाय होती हैं तथा अन्य पात्रों को चुभ भी सकती हैं . मेरे एक मित्र एडवोकेट रविशंकर पाण्डेय जी ने लिखा है कि “इसीलिये अब संस्मरणों के बजाय उपन्यास लिखे जाते हैं.”

यहाँ सिन्दरी नगर में मैंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और कुछ विवरण अपने ब्लॉग / फेसबुक पर लिख डाले तो सिंदरी से सम्बंधित रहे अनेक मित्रों के सन्देश मुझे मिल रहे हैं. ये बहुत स्वाभाविक है कि हम जिन जगहों पर रहते हों या जिन लोगों के सानिध्य में रहे हों उनसे लगाव हो ही जाता है.

कोयम्बटूर से श्री रामकृष्णन सुंदराअय्यर लिखते हैं कि वे सिंदरी प्लांट में १९६७ से ७३ तक चीफ बर्नर के बतौर  कार्यरत रहे थे, तब एम्.एल.नरूला जी (retired as M.D.) यहाँ पर असिस्टेंट इंजीनियर हुआ करते थे. रामकृष्णन जी ने अपने समय की प्रोडकसन संबंधी उपलब्धियों का भी जिक्र किया है.

श्री आशीष शुक्ला लिखते हैं कि उनके बचपन के कुछ साल यहां पर बीते थे, यहाँ का विवरण पढ़कर उनको बहुत अच्छा लगा है. उनके पिताश्री यहाँ पर कैमिस्ट रहे थे.

श्रीमती अल्पना जोशी सुपुत्री स्व. मदन प्रकाश भारद्वाज (स्व. वेद प्रकाश भारद्वाज जी के अनुज) की बचपन की अनेक स्मृतिया ताजी हो आई हैं.मदन प्रकाश जी लाखेरी से प्रमोट होकर यहाँ लम्बे समय तक चीफ बर्नर/ मास्टर बर्नर रहे थे.

श्रीमती ममता जोबंपुत्रा गोंसाल्वेज को भी सिन्दरी में बिताये अपने बचपन के दिन याद आये हैं, उनके पिता स्व. जोबंपुत्रा जी लाखेरी से प्रमोट होकर यहाँ अकाउन्ट्स आफीसर बने थे और यही उनका देहावसान हुआ था.

सिन्दरी है ही बड़ी सुन्दर जगह, मैं पिछले दस दिनों में यहाँ की भव्यता / दुर्गा पूजा समारोहों/ दर्शनीय स्थलों को देख रहा हूँ आवासीय कालोनी में लगता है कि मैं लाखेरी/ शाहाबाद में ही विचरण कर रहा हूँ.

इस नई जगह में मेरे रिश्तेदारों के अलावा मुझे कोई  जानने वाला-पहचानने वाला नहीं होना चाहिए, पर दुर्गापूजा के पांडाल में यहाँ के कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारी मुझे  घूरते नजर आये, उनको लग रहा था की उन्होंने मुझे कहीं देखा जरूर है. इनसे मुम्बई में सीमेंट वर्कर्स फैडरेसन की मीटिंग्स में अवश्य मुलाक़ात हुई रही होगी. सच है कि आपका बीता हुआ कल आपका आजीवन पीछा करता रहता है. बहरहाल मैं खुशनसीब हूँ कि उम्र के इस पडाव पर मैं ट्रेड यूनियन एक्टिविटीज के प्रति उदासीन हो गया हूँ तथा देश की दलीय राजनीति में भी सन्यासी बन गया हूँ. हाँ लिखना मेरा शुगल जारी है.
                ***