बुधवार, 6 जून 2018

यादों का झरोखा - २६ स्व.पंडित गजानंद 'सखा'



स्व. पंडित गजानंद ‘सखा’ (तिवारी) लाखेरी के इतिहास में एक अमर व्यक्ति हैं. वे ब्रह्मपुरी में निवास करते थे और एसीसी कालोनी के लगभग सभी हिन्दू घरों में उनकी आवक थी. वे सत्यनारायण भगवान् की पूजा+कथा एक विशिष्ठ शैली (राधेश्यामी तर्ज) में  हारमोनियम+ढोलक+मंजीरों की संगीतमय मनमोहक अंदाज में किया करते थे.

जैसा कि सत्यनारायण की कथा के सन्दर्भ में कहा गया है कि एकादशी, पूर्णिमा, अमावास या कोई मनभावन दिन ब्रत रख कर पूजन किया जा सकता है. विशेष रूप से बेटा-बेटी के व्याह के बाद इनकी पूजा पारंपरिक अनुष्ठान की तरह की जाती है. कथा वाचक तो और भी थे पर सखा जी की बात अलग ही थी. उनकी रसीली बुलंद आवाज आज भी श्रोताओं के दिलों में बसी हुयी है.

सखा जी को स्वर्गवासी हुए दो साल से अधिक समय हो चुका है. मैं सन २०१४ में आख़िरी बार उनसे मिलने उनके घर पर अपने साथी श्री रामस्वरूप गोचर के साथ गया था तब ये सोचा भी नहीं था कि मुलाक़ात आख़री होगी. मैं उनकी वाणी में रिकार्डेड सत्यनारायण भगवान् की कथा का टेप लेने के ख़ास उद्देश्य से गया था जो उनके बताये अनुसार नगरपालिका भवन के सामने एक दूकान पर मात्र ३५ रूपये कीमत पर मिल भी गया. इस अमूल्य टेप को मैं अपने घर पर आज भी गाहे-बगाहे सुनकर आनंदित होता हूँ.

सखा जी से मेरी मित्रता सन १९६० में ही हो गयी थी तब वे बाटम रेलवे फाटक के पास एक पक्के खोमचे में पान की छोटी सी दूकान चलाया करते थे. यहीं से उनकी पंडिताई भी चलती थी. बाद के बर्षों में कंपनी ने इसे अपना रिजर्व एरिया बता कर खाली करवा लिया था. अब यहाँ फल-फ्रूट, सब्जी का बाजार सजता है.

सखा जी एक साफ़-सुथरी संस्कारी व्यक्ति थे मैंने उनसे ये कभी नहीं पूछा कि राधेश्यामी तर्ज पर कथा+पूजा करना कब और कहाँ सीखा था? मुझे किसी ने अपुष्ट तौर पर बताया था कि कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों में उनको जेल जाना पडा था, जहां उनको कोई गुरु मिला, जिसने उनको ये विद्या दी थी. ये कितना सच है मैं कह नहीं सकता हूँ.

राधेश्यामी तर्ज के बारे में भी मैं अपने पाठकों को बताना चाहता हूँ कि बरेली, उत्तर प्रदेश में एक महान संगीतकार + नाटककार पंडित राधेश्याम शर्मा (१८९०-१९६३) हुए हैं जिन्होंने अल्फ्रेड कंपनी से जुड़कर वीर अभिमन्यु, भक्त प्रहलाद, श्रीकृष्णावतार आदि दर्जनों संगीतमय नाटक/रचनाएँ लिखी और उनके सफल मंचन भी हुए. पर राधेश्याम जी को ज्यादे प्रसिद्धि मिली उनके द्वारा पद्यबद्ध संगीत वाले ‘रामायण’ से. आज भी समस्त उत्तर भारत में में जो रामलीलाएं खेली जाती हैं उनमें राधेश्यामी तर्ज पर दोहे व चौपाइयां गाई जाती हैं.     

सखा जी के कोई पुत्र नहीं था, तीन विवाहित बेटियाँ थी/हैं. बाद के बर्षों में उन्होंने अपना एकाकीपन ईश्वर को समर्पित  करके ब्रह्मपुरी के आगे लाकडेश्वर महादेव नाम से एक छोटा किन्तु भव्य मंदिर बना कर पूरा किया.

उनके भजन के श्वर : “लेते जाओ रे हरी का नाम थोड़ा थोड़ा; दौड़ा जाए समय का घोड़ा......” आज भी वातावरण में गूँज रहे हैं.

हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ.

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शनिवार, 2 जून 2018

न्यूनता का अहसास (एक बोध कथा)


अश्वमेध यज्ञ करने के पशचात भी राजा धमाल को लगता था कि उसके चक्रवर्ती होने में अभी भी कुछ कमी रह गयी. उसके राज्य की सीमा में एक दुरूह शिखर था, जिस पर अपने नाम का शिलापट्ट सुशोभित करने का विचार मन में आया तो अपने दरबारी नवरत्नों को लेकर पैदल ही शिखर पर चढने लगा. बहुत संकीर्ण पथरीले मार्ग से कष्टपूर्वक जब वह चोटी पर पहुचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वहा उपलब्ध समस्त शिलाखंडों पर पहले से ही अनेक विभूतियों के नाम खुदे पड़े थे. जिस मुकाम पर वह आज पहुचा था वहाँ हजारों हजारों साल पहले से ही उन महामानवों के कीर्ति में शिलाखंड विराजमान थे.

उसका अभिमानी मन तड़प उठा, उसने कारिंदों को आदेश दिया कि “सबसे बड़े शिलापट्ट को मिटाकर तथा नए ढंग से तराश कर अपना नाम लिख दिया जाय.”

नवरत्नों में से एक भविष्यदर्शी – बुद्धिमान मंत्री ने रोकते हुए कहा “आप जो करने जा रहे हैं वह एक घातक परम्परा होगी क्योंकि भविष्य में भी कोई चक्रवर्ती राजा अवश्य पैदा होगा जो आपके नाम के शिलापट्ट को तराश कर अपना नाम लिखवाकर खुश होगा. इसलिए आप अनुचित परम्परा मत डालिए.”

राजा धमाल को तुरंत अपनी न्यूनता का अहसास हो गया.

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शनिवार, 19 मई 2018

यादों का झरोखा २४ स्व. डी.आर.वर्मा अकाउंटस क्लर्क



मैनेजमेंट को कोयला तथा अन्य रॉमैटीरियल अनलोड करने व सीमेंट डिस्पैच करने के लिए रेलवे स्टाफ से बहुत मतलब पड़ता है, क्योंकि नियमों के अंतर्गत डेमरेज का प्रावधान बहुत भारी पड़ता है. मालबाबूओं से लेकर स्टेसन पर तैनात स्टाफ को सुविधा शुल्क देकर खुश रखना होता है.

स्व.हरिभाई देसाई रेलवे से डीलिंग अथवा छीजत की क्लेमिंग में माहिर थे वे बर्षों से ये काम करते आ रहे थे. उनके रिटायरमेंट के बाद जो वैक्यूम हुआ उसे भरने के लिए शिवालिया (गुजरात) प्लांट के मार्फ़त एक रेलवे मैंन  को ही VRS दिलवाकर नई नियुक्ति दी गयी, वह थे स्व. दीप्तिप्रसाद वर्मा जो रेलवे के नियम कायदों से वाकिफ थे और डेमरेज से बचने के तरीकों के जानकार थे.

मेरा उनसे शरुआती परिचय अपनी लैबोरेटरी में एक डाईबिटिक के रूप में हुआ था. वे हरिद्वार के गायत्री मिशन से जुड़े हुए थे सन १९८२ या ८३ में लाखेरी में ही गायत्री परिवार का एक कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें उपस्थित लोगों से कहा गया कि ‘अपनी कोई बुरी आदत छोड़ने का संकल्प करें.’ मैं तब कभी कभी धूम्रपान किया करता था, मंच के आह्वान पर मैंने तब उस बुरी आदत को छोड़ने का संकल्प किया और आज तक उस पर कायम हूँ. प्रोत्साहित करने के लिए मैं वर्मा जी का आभार मानता हूँ.

सन १९९० में जब मुझे G-23 क्वाटर अलाट हुआ तो पड़ोसी के रूप में वर्मा जी का परिवार मिला. लगभग आठ साल तक हम अगल बगल रहे, जब तक कि वे रिटायर नहीं  हुए.

वर्मा जी सामाजिक व्यक्ति थे बाटम कालोनी में जो शिव मंदिर बना उसमें उनका भी अथक प्रयास शामिल है.

वे हमारे होलिकोत्सव में में भी रूचि लेते थे, मुझे याद है कि एक बार हमने उनको सम्मेलन की अध्यक्षता से भी नवाजा था. एक समय वे कमेटी के सक्रिय सदस्य रहे पर एक छोटी सी बात पर उन्होंने उसे छोड़ दिया था. हुआ यों कि हम लोग जिनमें प्रमुख शिवदत्त शर्मा जी, वी.एन.शर्मा जी, केशवदत्त अनंत जी, फेरुसिंह रूहेला जी, वर्मा जी और एक मैं, होली के कार्यक्रम को जायकेदार बनाने के लिए महीने भर पहले से मीटिंग किया करते थे, मीटिंग बारी बारी से सबके घर पर होती थी जहां खिलाई-पिलाई के अलावा हँसी-ठठ्ठा व गण्यमान्य लोगों के लिए उपाधियों का चयन होता था. हम लोग खुद पर भी हँसने का मसाला तैयार करते थे. जब वर्मा जी के क्वाटर पर मीटिंग हुई तो श्रीमती वर्मा ने कद्दू के पकोड़े सर्व किये. पकोड़े स्वादिष्ट थे तो उस साल वर्मा जी को ‘कद्दू का पकोड़ा’ की उपाधि से नवाजा गया. बहुत हल्की फुल्की मजाक थी; पर इस पर श्रीमती वर्मा की नाराजी के चलते वर्मा जी अगले बर्षों के कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुए.

इससे पूर्व उनके परिवार के साथ एक दुखद हादसा घटित हुआ कि स्कूल बस छोटे बच्चों को लेकर कहीं बाहर गयी थी जो पलट गयी और तीन या चार बच्चे नीचे दब गए थे उनमें वर्मा जी का भी मझला बेटा था. जिसकी  शोकपूर्ण दर्द परिवार के साथ रहा, स्वाभाविक है. कहते हैं कि पुत्रशोक सबसे बड़ा शोक होता है.

वर्मा जी की बेटी दुर्गेश वनस्थली विद्यापीठ में पढ़ कर अध्यापिका हो गयी थी अभी शायद अपने परिवार के साथ कोटा में सैटिल्ड है. बड़ा बेटा प्रिय हरीश MCA करके बहुत अच्छे पॅकेज में कार्यरत हो गया था, छोटा प्रिय लालू उर्फ़ प्रवीण भी IT में ग्रेजुएसन करके अच्छे नौकरी में है, दोनों भाई आजकल हैदराबाद में कार्यरत हैं. अपने परिवारों के साथ  संपन्न हैं, गत बर्ष फेसबुक पर दोनों भाई मेरे संपर्क में आये तो कुशल क्षेम पूछी थी. श्रीमती वर्मा अपने बच्चों के साथ ही हैं.

वर्मा जी ने रिटायरमेंट के बाद कोटा में महावीर नगर एक्सटेंसन में एक बना बनाया घर खरीद लिया था, रिटायरमेंट के बाद मैं भी करीब डेढ़ साल कोटा में अपने बेटे पार्थ के साथ रहा था, तब लाखेरी के सभी मित्रों, सुहृदों से मिलता रहता था, मैं वर्मा जी के घर भी गया, वहीं पास में ब्रजमोहन घमंडी जी और महेंद्र शर्मा का भी घर था, २००१ की एक मनहूश सुबह महेंद्र शर्मा जी का फोन आया कि “वर्मा जी का हार्ट अटैक से देहावसान हो गया है”. इस प्रकार उनके पार्थिव शरीर को कंधा देकर भी मैंने अपनी श्रधांजलि दी.

वर्मा जी के ससुर (नाम मै भूल रहा हूँ) सरनेम शायद  कश्यप था आगरा के रहने वाले थे, रेलवे में टी.टी. थे, रिटायरमेंट के पश्चात अकसर लाखेरी आया करते थे, बहुत संवेदनशील व्यक्ति थे, वर्मा जी के अंतिम संस्कार में भी वे उपस्थित थे. उन्होंने इस परिवार को दुःख की घड़ी में बहुत सम्हाला था.

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गुरुवार, 17 मई 2018

यादों का झरोखा - २३ स्व. पंडित रामकिशोर शर्मा (पैकिंग हाऊस)



पंडित रामकिशोर शर्मा पैकिंग हाऊस में फिटर हुआ करते थे, माथे पर तिलक-रोली-चन्दन व रामनामी अंगोछा उनकी पहचान होती थी, डिपार्टमेंट में शुभ मुहूर्त की पूजा, दीपावली पर लक्ष्मी पूजा या विश्वकर्मा की पूजा उनके ही  हाथों कराई जाती थी. वे गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे अपनी ड्यूटी निष्ठा पूर्वक किया करते थे इसलिए उनके अधिकारियों के प्रिय भी थे.

मेरा उनसे ज्यादा संवाद नहीं था पर प्रारम्भ में कोआपरेटिव सोसाइटी  व बाद के बर्षों में युनियन के कार्यकलापों में बहुधा सामना हो जाया करता था. सन १९७० से पहले हम एक त्रैमासिक पत्रिका ‘लाखेरी सन्देश’ निकाला करते थे उसमें स्थानीय रचनाकारों की कृतियाँ, समाचार व मनोरंजक जानकारियाँ हुआ करती थी. पंडित रामकिशोर जी ने एक लम्बी तुकबंदी वाली कविता ‘राजा और रानी’ शीर्षक से लिखी, मुझे दी थी जो किसी अंक में छपी भी थी वह रचना अब मुझे याद तो नहीं रही पर उसकी एक पंक्ति अक्सर मेरे जुबान पर रहती है:
‘खांसी सब रोगों की रानी, हांसी सब झगड़ों की रानी.’
ये बात अब इतने बर्षों के बाद याद यों आई है कि उनकी एक पौत्री सौभाग्यवती सीमा जोशी ने मैसेंजर पर मुझसे संपर्क किया और पूछा “ मेरे दादा रामकिशोर शर्मा और मेरे नाना उच्छवलाल शर्मा जी के बारे में भी आपकी स्मृति में कोई यादगार बात है?” लाखेरी की मेज नदी में तब से अब तक लाखों नहीं करोड़ों टन पानी बह चुका है और मैं भी अपने हंसी-खुशी, झंझावातों के चलते अब अस्सीवे बर्ष में प्रवेश कर चुका हूँ, ऐसे में उन दोनों मूर्तियों का अपनी आँखें बंद करके साक्षात्कार करने लगा तो पैकिंग प्लांट में ही कार्यरत स्व. उच्छ्वलाल शर्मा की मुस्कुराती हुयी चित्रावली सामने आ गयी, उनकी विशिष्ठ पहचान थी कि उनके होंठों पर ल्यूकोडर्मा के निसान थे, मैंने सीमा को बताया कि बाकी उनके जीवन चरित्र के बारे में मेरे पास कोई जानकारी नहीं है सिवाय इसके कि वे लाखेरी ब्रह्मपुरी के निवासी थे. पंडित रामकिशोर शर्मा भी पहले पुरानी बसावट में रहते थे, बाद में उन्होंने गांधीपुरा में तेजा जी मंदिर के सामने अपना आशियाना बनाया था. तीन साल पहले सर्दियों में अपने कोटा प्रवास के दौरान में अपने पुत्र डा. पार्थ के साथ सिर्फ मिलने जुलने के लिए जब दिनादिनी लाखेरी गया था तो फैक्ट्री व बाजार होते हुए लाखेरी के रास्ते में गांधीपुरा प्रिय देवेन्द्र झा के घर पंहुचा  तो सयोग से वहां पूजा पाठ चल रही थी और पुरोहित थे झा के पहले पड़ोसी पंडित रामकिशोर जी. उन्होंने मुझसे एक दिन रुकने का आग्रह किया पर मुझे उसी दिन वापस आना था, तब ये मालूम नहीं था कि उनसे वह आख़िरी मुलाक़ात थी. कुछ महीनो/ बर्ष के अंतराल में उनका देहावसान हो गया था जिसकी सूचना किसी मित्र ने फेसबुक के माध्यान से मुझे दी और मैंने इसी स्तम्भ में उनको अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी.

रामकिशोर जी के एक पुत्र श्री कृष्णकुमार शर्मा लाखेरी की नगरपालिका में कार्यरत थे जो अब रिटायर हो चुके हैं, सीमा जोशी इनकी ही सुपुत्री है. दूसरे पुत्र श्री जी.के.शर्मा मेरे फेसबुक मित्रों की सूची में हैं, वे राजस्थान के मुख्यमंत्री कार्यालय में OSD-help line tech. & communication  के पद पर कार्यरत हैं.

श्रीमती (अब स्वर्गीय) रामकिशोर शर्मा कई बार अस्वस्थता की वजह से हमारे अस्पताल में आती थी, यों मेरा सभी माता-बहनों से परिचय भी हो जाता था. इस नश्वर संसार की रीत यही है कि सभी पेड़ों पर एक एक करके सभी पुराने पत्ते गिरते रहते हैं और नए पत्ते आते रहते हैं. सही कहा गया है कि ‘ये जिन्दगी के मेले कभी ख़तम ना होंगे....’

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रविवार, 13 मई 2018

यादों का झरोखा - २२ स्व. एन.एम्.जोबनपुत्रा



रोजगार की तलाश में आदमी कहाँ से कहाँ पहुच जाते हैं, स्व. नीतिचंद्र मणिलाल जोबनपुत्रा गुजरात के रहने वाले ग्वालियर की जे.बी.मंघाराम बिस्कुट फैक्ट्री में मुलाजिम थे और किसी नजदीकी सूत्र के माध्यम से १९५४ में अपनी पत्नी व बालक दिलीप को साथ लेकर लाखेरी एसीसी में बतौर क्लर्क नियुक्त हो गए थे. लगभग २२ बर्ष तक काम करने के बाद सिंदरी कारखाने के लिए उनको प्रमोशन देकर असिस्टेंट स्टोर कीपर का आफर दिया गया; मैं तब यानि १९७६ में कामगार संघ का जनरल सेक्रेटरी था वे बहुत पशोपेश में थे अंत में सिन्दरी जाने का निश्चय उन्होंने कर ही लिया.

उन दिनों क्लेरिकल स्टाफ के लिए जो नामिक्लेचार लागू था उनमें चौथे ग्रेड के बाद कोई ओपनिंग उनके लिए नहीं थी आगे चलकर सन १९७९ में नए अर्बिट्रेसन अवार्ड तैयार करते समय  नामेंक्लेचर में भी बदलाव के लिए श्री जी.एल.गोविल और फेडरेसन के जनरल सेक्रेटरी स्व. मोईनुद्दीन (डालमियाँपुरम के लीडर) की कमेटी बनी थी संयोग से फाईनल के दिन मैं और भाई इब्राहीम हनीफी वहां पहुच गए थे और हमने अपने हाथों से तैयारसुदा कागजों में सुधार करवाया था जिसके अनुसार क्लेरिकल स्टाफ के लिए सातवीं ग्रेड तक ओपनिग दी गयी.

लाखेरी अकाउन्ट्स आफिस में पुराने धुरंधर लोगों की जमात थी जिनमें केशवदत्त अनंत, हरिभाई देसाई, सुवालाल व्यास, लखनलाल वर्मा, पाठक बंधु नंदकिशोर और मदनगोपाल, लाला भगवतीप्रसाद कुलश्रेष्ठ, शरदकुमार तिवारी व जोबनपुत्रा थे. स्व.जे.पी गुप्ता अकाउंटेंट थे. स्व.   
शिवप्रशाद शर्मा तब CTK थे, वी.एन शर्मा और अमीन पठान टाईमकीपर हुआ करते थे. बहुतों के नाम में अब शायद भूल भी रहा हूँ. जोबनपुत्रा ‘cost cabin ’ में बैठते थे उसे गोपनीय टेबुल माना जाता था.   

इकहरे बदन के जोबनपुत्रा हमेशा खुशमिजाज नजर आते थे यारबाज भी थे स्व.पी.बी.दीक्षित (तब कैमिस्ट), जोबनपुत्रा, अमृतराय. रक्षपाल शर्मा, मथुराप्रशाद बर्नर, शरदकुमार तिवारी आदि की एक हमप्याला मित्र मंडली भी चर्चित थी. जी टाईप के सामने श्रीपत चौक पर जो बड़ा पीपल का पेड़ है उसके सामने वाले एल टाईप क्वाटर में उनका आशियाना हुआ करता था.

लाखेरी से सिंदरी जाते समय उनके दो बेटे व तीन बेटियों का परिवार विस्तार हो चुका था.बड़ा बेटा दिलीप व अतुल दोनों ने कैमोर इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट से ट्रेनिग करके क्रमश: द्वारका व पोरबंदर कारखानों में नियुक्ति पाई ये उन कारखानों के बिकने/ बंद होने तक वहाँ रोजगार में भी रहे, बेटियाँ तीनों विवाहित हैं, सबसे छोटी ममता जिसने एलन गोंसाल्विस (पुत्र स्व. फ्रांसिस गोंसाल्विस फोरमैन MVD  लाखेरी ) से प्रेम विवाह किया और वे दोनों ही फेस बुक पर हमारी मित्रों की लिस्ट में हैं. एलन भी कैमोर ट्रेंड है, एसीसी के कई कारखानों में काम करते हुए गुजरात से खाडी देश में कहीं काम करके वापस अहमदाबाद में सैटिल हैं, इनके बच्चे शिक्षा पाकर अच्छे जॉब में लगे हुए हैं. ऐसा ममता से संवाद करने पर मालूम हुआ है.

नीतिचंद्र जोबनपुत्रा लाखेरी से जाने के तीन साल बाद ही स्वर्ग सिधार गए थे लाखेरी में तब ये दुखद समाचार आया था कि शराब ही उनकी आकस्मिक मौत का कारण बनी थी. सुन्दर देहयष्टि वाली श्रीमती जोबनपुत्रा ने बच्चों को पति की अनुपस्थिति में बड़ी मेहनत से पाला पोसा है. अब तो दिलीप भी सेवानिवृत्त हो चुके हैं. सन २०१२ में श्रीमती जोबनपुत्रा का भी स्वर्गवास हो गया, इन लोगों को लाखेरी छोड़े हुए ४२ वर्ष हो गए हैं पर लगता है कि कल की सी बात है. समय जरूर अपने निसान पीछे छोड़ जाता है.

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