गुरुवार, 20 जुलाई 2017

यादों का झरोखा - डा. (कैप्टन के. एस. सोढी)

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पटेल चेस्ट इन्स्टीट्यूट (दिल्ली विश्वविद्यालय)से ट्रेनिग लेकर मुझे दिल्ली नगर निगम के कालका जी कालोनी हास्पीटल में सर्विस मिल गयी थी. उन दिनों मैं अपनी अंगरेजी सुधारने के लिए THE HINDUSTAN TIMES अखबार लिया करता था, अंगरेजी तो ज्यादा नहीं सुधरी पर ७ अप्रेल १९६० के पेपर में मुझे ए.सी.सी. का एक ऐड जरूर मिल गया जो मेरे जीवन का एक टर्निनिंग पॉइंट बना.

मुझे बतौर मेडीकल लेबोरेटरी टैक्नीशियन ए.सी.सी. में नियुक्ति मिल गयी. लाखेरी पहली दृष्टि में मुझे यों भी भा गयी कि बरसात के दिनों की हरियाली, चारों तरफ नैसर्गिक छटा बिखेरते हुए पहाडियां और लबालब भरे बड़े तालाब और सबसे विशिष्ट बात कि पितातुल्य स्नेही बॉस डा. कृपालसिंह सोढी.

डा. सोढी भव्य व्यक्तित्व के धनी थे, श्वेत दाढी, कबरी आँखें, श्वेत ही पगड़ी और श्वेताम्बर. स्वभाव से कड़क व अक्खड़, मैंने तो केवल आठ ही महीने उनके नेतृत्व में काम किया उसके बाद वे रिटायर हो गए थे. पुराने लोग बताते थे कि उनका डाईग्नोसिंग बहुत सटीक व सही हुआ करता था जिसको भी उन्होंने टी.बी.का रोग बताया वे बाद में सही साबित हुए यद्यपि एक वक्त लोग इसे उनका दिमागी फितूर कहा करते थे. झूठ-मूठ का ‘सिक’ बनाने वालों को वे पकड़ लेते थे, उनके सामने बहाने नहीं चलते थे. वैसे वह ज़माना अपनेपन का था  किसी की तबीयत बिगडने की खबर सुन कर कर बिना बुलाये ही वे उनके घर पहुँच जाया करते थे.

कारखाने के कैंटीन हॉल में जब उनकी बिदाई पार्टी हुयी तो बहुत से कामगारों की आँखें सजल हो आई थी. उस मौके पर मैंने भी अपनी एक हस्तलिखित कहानी संग्रह .बिष के बीज’ उनको भेट की थी, दुर्भाग्य से मेरी प्रारम्भिक ११ कहानियों का ये संग्रह मेरे पास नहीं रहा है, उसकी मूल पांडुलिपि किसी साथी ने पढ़ने को माँगी थी पर लौटाई नहीं.

डा. सोढी जी के एक पुत्र लेबर आफीसर बन कर दो बार लाखेरी कारखाने में थोड़े थोड़े समय के लिए रहे वे पोरबंदर/शिवालिया को स्थानांतरित हो गए थे. साथी लोग बताते थे कि पिता की प्रतिमूर्ति एक बड़ा बेटा भी डा. सोढी जी का था जिसकी किसी दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी. पुत्रशोक से बड़ा शोक और कोई नहीं होता है, ऐसा कहा जाता है; वे इसी कारण बहुधा अपसेट रहा करते थे. पर मुझसे तो वे सदा पितृस्वरुप में ही मिला करते थे.

सुनहरे दिनों में वे चांदी के से लोग अब स्मृतिशेष हैं.

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शुक्रवार, 30 जून 2017

उजाड़खंड की व्यथा-गाथा

हिमालय की गोद में बसा हुआ हमारा छोटा सा उत्तराखंड राज्य अनेक प्राकृतिक संपदाओं से हरा भरा रहा है. इसी को देवभूमि नाम भी दिया गया है. राज्य के दो मुख्य संभाग हैं; पश्चिम की तरफ गढ़वाल व पूर्वीय संभाग कुमाऊँ है. दोनों संभागों में हिन्दी की अपभ्रंश बोलियों में थोड़ा सा अंतर भी है, परन्तु सामाजिक व वैचारिक धरातल पर अनेक साम्यतायें हैं. गढ़वाल के दूर-दराज पहाड़ी गांवों की वर्तमान स्थिति भी लगभग वैसी ही होनी चाहिए जैसी हमारी कुमाऊँ क्षेत्र में है.

पिछले 50-60 वर्षों से रोजगार व आधुनिक सुख-सुविधाओं की तलाश में गावों के समर्थ लोग बड़ी संख्या में तराई/भाबर (मैदानी क्षेत्र) की तरफ बसने लगे थे. नौकरी-पेशा लोग बड़े शहरों की रोशनी में गुम होते चले गए. सरकारों ने अनेक लोकलुभावन घोषणाएँ या कार्यक्रम पलायन रोकने के जरूर किये हैं, पर हवा ऐसी चली कि आज गावों में केवल बूढ़े और अशक्त लोग बचे हैं, क्योंकि वे असमर्थ हैं. प्रेस की रिपोर्टों के अनुसार हमारे ये हजारों गाँव जो कभी स्वावलंबी हुआ करते थे, गुलजार थे, अब खंडहरों में तब्दील हो गए हैं. नौकरी-पेशा लोग कोटद्वार, हल्द्वानी, रामनगर, टनकपुर का रुख किया करते हैं, या कहीं रोड साइड पर बसने की जुगत करते हैं. इसी तुफैल में बागेश्वर जैसे शहर के चारों तरफ की कृषि वाली सेरे की पूरी जमीन मकानों की भेंट चढ़ चुकी है.

अब बचे-खुचे गावों में भी लोगों ने खेती करना छोड़ दिया है. उसके पीछे कारण ये बताये जाते हैं कि बंदरों, बाघों, व सूअरों का आतंक इतना बढ़ गया है कि खेती करना दुष्कर हो गया है. हाली-ग्वाल अब पहाड़ों में उपलब्ध नहीं है. सरकार सस्ते में अनाज दे रही है (अधिसंख्य लोग बी.पी.एल. कैटेगरी में हैं). फिर खेती की हाड़तोड़ मेहनत की जहमत क्यों की जाए? लोग अब गाय-भैस भी नहीं पालते हैं. पैकेट का दूध आसपास दूकानों में मिल जाता है.

कुल मिलाकर हालात ये हैं कि ये दूर दराज के गाँव अब बंजर हो गए हैं. हाँ, यहाँ से पलायन किये हुए बुजुर्ग लोग अपने पुराने दिनों को अवश्य याद किया करते हैं. यद्यपि उनके अपने अंधविश्वास आज भी ज़िंदा हैं. वे अपने गाँव से अपने देवी देवताओं के प्रारूप प्रस्तर साथ में लेकर आये हैं और नई बसावट में घन्याली-जागर कराते रहते हैं.
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सोमवार, 1 मई 2017

मेरा जन्मदिन

अपनी खुशियों को न्यौता देने के लिए बहुत से मनमौजी लोग क्या क्या नहीं करते रहते हैं? मेरे एक प्यारे दोस्त हैं जो हर महीने अपना जन्मदिन मनाते हैं, केक काटते हैं, और परिवार के साथ मस्ती करते हैं. लेकिन मेरा जन्मदिन तो फिक्स्ड है – एक मई. यों जीवन के प्रारंभिक वर्षों में, अल्मोड़ा जिले के दूर दराज उस पिछड़े-पहाड़ी गाँव में तब कोई पारंपरिक रिवाज जन्मदिन मनाने का नहीं था. बहुत बाद में मुझे मालूम हुआ कि एक मई की ये तिथि यूरोप व एशिया में श्रमिक जागरण की याद में ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है (अमेरिका में मजदूर दिवस वहाँ के ऐतिहासिक कारणों से १७ जुलाई को नियत है). यह संयोग ही रहा है कि मैं अपनी एसीसी सीमेंट कंपनी में अपनी सर्विस के दौरान एक ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में स्थापित हुआ और उसी जूनून को मैं लम्बे समय तक पालते आ रहा हूँ.

इस संसार के श्रृष्टा ने तमाम प्राणियों का जीवन कई अदृश्य डोरों से बांधा हुआ है. सभी के जीवनकाल (स्पैन) अलग अलग कोष्टकों में डले हुए हैं. काल के सिद्धांत, पृथ्वी द्वारा सूर्य की 365 दिनों की परिक्रमा के हिसाब से गणितज्ञों / खगोलशास्त्रियों (astronomers) ने सटीक ढंग से अनादि काल से स्थापित किये हुए हैं.

इस युग के वे बच्चे बहुत भाग्यशाली हैं, जिनके माता-पिता सभ्य, प्रबुद्ध, और संपन्न हैं. ये अपने बच्चों की खुशियों के लिए जन्मदिनों को यादगार बनाने के लिए समारोहपूर्वक मनाया करते हैं, अन्यथा हमारे समाज में ऐसे भी बच्चे हैं जिनको जन्मदिन से कोई  सरोकार नहीं रहता है. कारण अज्ञानता व गरीबी होती है. जहाँ कुपोषण हो, रोटी तक ठीक से मयस्सर ना हो, वहाँ केक काटने की बात करना भी पाप है.

मेरे एक रिश्तेदार अपने बच्चों के जन्मदिन पर ‘मार्कन्डेय पुराण’ का पाठन व अन्य स्वस्ति वाचन करवाते हैं. मुझे अपने बचपन की जो यादें हैं, उनमें शायद ही कभी सामान्य पूजा-पाठ कराई गयी थी. मैंने भी अपने बच्चों के जन्मदिन समारोहपूर्वक नहीं मनाये. अब जब मेरे ये बच्चे सयाने व संपन्न हैं तो अपने अपने व अपने बच्चों के जन्मदिनों को बढ़िया ढंग से मनाते हैं, तथा हम माता-पिता को भी हमारे जन्मदिन याद दिलाकर जन्मदिन की खुशियाँ देते हैं. यों कोई मित्र या परिचित भी इस अवसर पर ‘बधाई’ दे तो अच्छा लगना स्वाभाविक होता है.

सोशल साईट्स पर सक्रिय रहने पर, खासकर, फेसबुक पर मित्रों के जन्मदिन उजागर होते रहते हैं. इसलिए लगभग सभी सुहृद मित्रगण शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति करके धन्य होते हैं. ये एक शुगल सा भी हो चला है. क्योंकि आज हम लोग इंटरनेट के जमाने में जी रहे है, एक दूजे के बहुत करीब आ गये हैं. ये हमारा सौभाग्य है कि हम मित्रों व रिश्तेदारों से दूर होते हुए भी उनसे संवाद कर सकते हैं.

कहावत है कि “जन्मदिन एक ऐसा दिन होता है, जब हम रोते हैं और हमारी माँ हमारे रोने पर खुश होती है.” आज इस अवसर पर मैं भी अपनी स्वर्गीय माँ को श्रद्धापूर्वक याद करता हूँ, जिसने मेरी खातिर अनेक वेदनाएं खुशी खुशी सही होंगी. साथ ही अपने स्वर्गीय पिता के गरिमामय स्वरुप को अपने अंत:करण में महसूस कर रहा हूँ. 

अंत में, मैं अपनी सहधर्मिणी, अपने सभी भाई-बहनों, पुत्र-पुत्रवधुओं, बेटी-दामाद, पौत्र - पौत्रियों, नातिनी, भतीजे-भतीजियों और इष्ट-मित्रों को उनके स्नेह और शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ, तथा सभी के सुख-सौभाग्य की कामना करता हूँ.
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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

सरकारी बेशर्मी

जस्टिस काटजू अपनी बेबाक व तल्ख़ टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं, फलस्वरूप वे सरकार और स्वयं न्यायपालिका को खटकते हैं.

शराब की दूकानें नेशनल हाईवेज से 500 मीटर दूर करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश इसलिए सामने आया कि आसानी से सडकों पर शराब मिलने पर गाड़ीवान/ड्राईवर//गैरजिम्मेदार लोग सड़क चलते नागरिकों की नशे में जान ले लेते हैं या उनको चोट पहुंचाया करते हैं. कोर्ट का उद्देश्य बहुत साफ तथा लोकहितकारी था. जस्टिस काटजू ने जो कहा वह भी 200% सही है कि “क़ानून बनाने का काम विधायिका का है ना कि न्यायपालिका का.” लेकिन सता पर काबिज सरकारें / उनके नेता/ माफिया/ दलाल सब शराब की अंधाधुंध कमाई से पोषित रहे हैं, इसलिए इस गंभीर समस्या पर उत्तराखंड की नव निर्वाचित सरकार ने जो चोर रास्ता निकाला है वह सुप्रीम कोर्ट पर थूकने जैसा है.

एक तरफ पूरे उत्तराखंड में शराब बंदी की मांग को लेकर आम जन विशेषकर महिलायें संधर्षरत हैं, दूसरी तरफ सरकार द्वारा रातोंरात लगभग सभी हाईवेज का नया नक्शा बनाकर अपनी ‘शराबी नीति’ को उजागर कर दिया है, ताकि ये शराब की दूकानें पूर्ववत सडकों पर बनी रहे. ये बेशर्मी की पराकाष्ठा है.

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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

मीन मेख

आजाद देश के आजाद कलमकार लोग कोई भी,कहीं भी, किसी भी मुद्दे पर मीन मेख निकालते रहते हैं; अब उत्तर प्रदेश की नई योगी सरकार के कृषक-ऋण माफी के मामले को ही लीजिये आलोचक कह रहे हैं कि “ये वोटों पर डाका डालने का एक जुमला था जो ‘हाथी की पाद’ साबित हुई है.” क्योंकि इसके साथ जो शर्तें बताई गयी हैं वे उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती हैं जिसमें अन्नदाता किसान को वास्तविक राहत मिले.

किसानों ने कर्जा जिन उद्देश्यों से भी  लिया उनमें गाय, बैल, भैस या बकरी खरीद के लिया होगा वे सब कृषि कार्यों के सहयोगी आचार से बाहर नहीं थे. स्वजनों के दुःख-बीमारी या बच्चों की पढाई अथवा मकान बनवाने में लिया गया कर्ज पारिवारिक जीवन के लिए अतिशय जरूरी होता है. सहकारी बैंकों या सूचीबद्ध बैंकों की ऋण वितरण की प्रक्रिया में जो अल्पशिक्षित /अनपढ़ काश्तकार पारंगत ना हो और दलालों/कमीशनखोरों के चंगुल से मुक्त ना हो, तो मजबूरन सूदखोर शाहुकारों की शरण में आ पड़ता है, और सरलता से जमीन या जेवर गिरवी रख कर धन पा लेता है, लेकिन मूल से ज्यादा ब्याज चुकाने में जिन्दगी बिता देता है. बहरहाल, मुद्दा कुलमीजान ‘कर्जे’ का है. जिसके कारण वह त्रस्त रहता है. आत्महत्या कोई भी खुशी से नहीं करता है. राजनैतिक दल चुनाव जीतने के लिए गरीब की दुखती नस पर अंगुली रखते हैं. यह देश का दुर्भाग्य है.

ये और भी बुरी परम्परा बनती जा रही है कि चुनावों के समय पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए साड़ियाँ, मोबाईल, लैपटॉप, घी+शक्कर, साइकिल आदि वस्तुएँ बाँटती हैं, या चुनाव के बाद ये सब देने का सच्चा या झूठा वायदा करती हैं. इस बार देश के कर्णधार, सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी जी, ने अपनी रैलियों में खुले आम वायदा किया था कि “किसानों के कर्जे माफ़ करूंगा." अब जब प्रचंड बहुमत मिल गया है तो इस वायदे को पूरा करने के बजाय इसमें शर्तें लगाकर गलियां निकाल दी गयी हैं.

ऋण का जो अल्पांश माफ़ हो रहा है, उसे सही दिशा में एक कदम की संज्ञा दी जा सकती है, पर वायदे की ईमानदारी नहीं कहा जा सकता है. जहां तक धनराशि के आंकड़े हैं, ये बड़े जरूर लग रहे हैं, लेकिन इसी केन्द्रीय सरकार ने पड़ोसी मुल्क नेपाल व बांगला देश को कई गुना धन दिल खोलकर मदद के रूप में दिया है, इसके अलावा तैमूरलंग के देश मंगोलिया जाकर अरबों रूपये देकर वाहवाही लूटी है.

ऐसे में सारे किसान खुद को ठगा सा महसूस करेंगे और कर्ज माफी का मामला उन राज्यों में भी शर्तों के साथ उठेगा, जिनमें काश्तकारों की हालत उत्तर प्रदेश से बेहतर नहीं है.

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