शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

सबकी माँगू खैर


मेरे २००० से अधिक फेसबुक मित्रों में आदरणीय आर.के.सूरी जी अनन्य हैं, वे एसीसी के बड़े अधिकारी रहे हैं इसलिए मेरा एक ‘फॉर्मल बोंड’ उनके साथ है. वे अकसर अपनी वॉल पर ज्ञानवर्द्धक/ समसामयिक लेख प्रकाशित करते रहते हैं जिसे उत्सुकतापूर्वक पढ़ा जाता है; पर कभी ऐसा भी होता है कि ‘अच्छी किताब व अच्छे इंसान को पहचानने के लिए काफी समय तक पढ़ना पड़ता है.

सूरी साहब ने कुछ साल पहले इसी तरह फेसबुक पर उद्योगपति विजय माल्या की सुबुद्धिमता की बड़ी तारीफ़ की थी. एक दृष्टान्त देकर उन्होंने लिखा कि एक बार अमेरिका से यूरोप की यात्रा के समय माल्या ने अपनी कीमती कार महज  ५०० डॉलर में बैक को गिरवी रखी थी. वापसी पर बैक के अधिकारी ने जब उससे पूछा तो कहा कि कार की सुरक्षित पार्किंग के साथ ५०० डॉलर का व्याज इतना मामूली देना पडा अन्यथा बाहर कार की पार्किंग शुल्क बड़ी रकम के रूप में चुकानी पड़ती. माल्या की व्यावसायिक कुटिलता की राष्ट्र्धातक कहानियां बाद में निरंतर उजागर हुई हैं.

इसी तर्ज पर बलात्कार के आरोपी नामनिहाल सन्त आसूमल उर्फ़ आशाराम की एक वीडिओ क्लिपिंग में मैंने देखा कि स्व.अटल जी, अडवानी जी, नरेंद्र मोदी जी, राजनाथसिंह जी व दिग्विजयसिंह जी जैसे माननीय जन नत मस्तक होकर उनका आशीर्वाद ले रहे थे. आसूमल के पापों का घडा देर से भरा और अंधभक्तों की समझ में उसका असली रूप  बहुत बाद में आया है.

आजकल राजनीति के परिपेक्ष में कीमती धातुओं की मूर्तियाँ बनाने का काम जोरों पर चल रहा है, मायावती जी ने अपने जीतेजी अपनी और स्व. कांसीराम की मूर्तियाँ खडी कर दी , जो इन दिनों लावारिश सी नजर आने लगी हैं.

नेहरू जी व गांधी परिवार ने लम्बे समय तक राज किया इसलिए उनके असंख्य स्मारक देश में हैं लेकिन इसमें उनका अपना कोई दोष नहीं है क्योंकि उनके स्वर्गवास के बाद फालोवर्स ने ये काम किया है. लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद नये रहनुमाओं को ये चुभ रहे हैं. मोदी जी ने गुजरात में ‘सरदार सरोवर’ के स्थल पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की एक बड़ी मूर्ती की स्थापना हाल में की है जो दुनियाँ में सबसे ऊंची बताई गयी है. ‘सरदार सरोवर’ जवाहरलाल नेहरू ने पटेल साहब की स्मृति में बनवाया था. पर ये मूर्ती की स्थापना में कुछ इस तरह की भावना व्यक्त की जाती रही कि नेहरू के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को कमतर आंका जाए. एक समय कांग्रेसी गृहमंत्री सरदार पटेल ने गांधी हत्याकांड के बाद आर.एस.एस.पर प्रतिबन्ध लगाया था, पटेल साहब जब १९४९ में स्वर्गवासी हुए तो आर.एस.एस. ने उनकी अंतिम यात्रा का बहिष्कार किया था, इसलिए ये कहा जा रहा है कि राजनैतिक हित साधना के लिय विशुद्ध रूप से ये प्रेम जागा है. इन बरसों में हमने देखा है कि नरेंद्र मोदी जी नेहरू को गरियाने का कोई मौक़ा नहीं चूकते हैं.  बहरहाल अब ये विराट मूर्ती देश के लिए एक ऐतिहासिक सौगात है, इसके खर्चे-पर्चे व उद्देश्यों पर ना जाकर नकारात्मक ना सोचा जाए तो ही अच्छा है.

मुम्बई में शिव सेना स्व.बाल ठाकरे जी की तथा केंद्र सरकार हिन्द महासागर में शिवा जी की बड़ी मूर्ती लगाने का आह्वान कर चुके हैं.

कल के अखबारों में एक खबर छपी है की मेरठ के एक भक्त नरेंद्र मोदी जी की एक बड़ी मूर्ती लगाने की तैयारी कर रहा है. ये सिलसिला अवश्य अंतहीन है लेकिन विकासशील देश की सद्य प्राथमिकताएं  और भी बहुत हैं.

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बुधवार, 24 अक्तूबर 2018

ये हो क्या रहा है?



एक सज्जन दवा की दूकान से कीड़े मारने की दवा खरीद कर लाये, घर आकर जब उस डिब्बे की खोला तो पाया कि उसमें असंख्य कीड़े कुलबुला रहे थे.

इस दृष्टान्त को आज हम साक्षात देख रहे हैं कि भारत सरकार की निगरानी तंत्र वाली सर्वोच्च संस्था सी.बी.आई. के उच्चाधिकारी आपस में खुलेआम भारी भरकम रिश्वत लेने के आरोप लगा रहे हैं; इनमें से कुछ पर सत्ताधारियों की नजदीकियां जग जाहिर हैं.

इसमें दो राय नहीं हैं कि देश का पूरा पुलिस तंत्र इस सापेक्ष में हमेशा बदनाम रहा है और सत्ता पर काबिज राजनेता इनका भरपूर उपयोग अपने हितों में करते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एक से अधिक बार सी.बी.आई. को सरकारी तोता तक कहा है.

यह भी सही है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौरान जिस पत्थर को पलटो उसके नीचे भ्रष्टाचार के कीड़े नजर आने लगे थे, पिछले २०१४ के आम चुनावों में ये मुख्य मुद्दा बना था और लोगों ने भारी बहुमत से नई सरकार को जिम्मेदारी सौंपी थी. हमारे प्रधानमंत्री जी ने देश व विदेश में कई मौकों पर कहा कि अब उनके राज में कोई घोटाला नहीं हो रहा है उन्होंने एक बड़ा जुमला भी फैंका था कि ‘ना खाऊँ, ना खाने दूगा’ पर हकीकत में ये महज चुनावी गालियाँ बनकर रह गयी. बड़े बड़े बैंक घोटाले उजागर हुए हैं, जिन पर ज्यादातर गुजराती तड़का लगा हुआ है.

नजदीकी लोगों को बेशुमार फायदा पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री जी का नाम राफेल जैसे विवादास्पद विमान सौदे में लिया जा रहा है, सरकार द्वारा इसकी असलियत नहीं बताये जाने से आम लोगों के मन में गंभीर संशय पैदा होना स्वाभाविक है.

जोर-शोर से कोई बात बोल देने से झूठ सच नहीं हो सकता है तथा एक झूठ को छुपाने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते है, ये पुरानी कहावत है.

आज प्रिंट मीडिया व इलैक्ट्रोनिक मीडिया अकसर सत्य से परे विरुदावली गा रहे हैं ऐसे में कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि ये हो क्या रहा है?

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मंगलवार, 28 अगस्त 2018

आरक्षण - जिंदाबाद / मुर्दाबाद.



हिन्दू समाज में पौराणिक काल में जो वर्ण व्यवस्था तय की गयी थी वह २० वीं सदी तक आते आते विकृत होकर कोढ़ बन गयी थी. इसीलिये समाज को बांटने वाली इस परम्परा के विरुद्ध समाज सुधारकों, अग्रगण्य लोगों व कानूनविदों ने आवाज उठाई. देश आजाद हुआ और अपना संविधान बना तो उसमें सभी बर्गों के लोगों की समानता के लिए अनेक कानूनों की व्याख्या दी गयी. दलित व पिछड़ी जातियों के लोगों को ऊपर लाने के लिए कई तरह से सुविधाओं में आरक्षण दस बर्षों के लिए घोषित किये गए, जिनके अनुसार इन वर्गों के समस्त लोगों को पढाई में कम अंकों में उतीर्ण करने, स्कूल फीस में भारी छूट, अनेक वजीफे, तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के अलावा सभी संवैधानिक व लोकतांत्रिक संस्थाओं के पदों में अनुपातिक आरक्षण दिया गया और इसके बहुत अच्छे सकारात्मक परिणाम आये भी. इन पिछड़े वर्गों प्रबुद्ध पढ़े लिखे लोग बराबरी या बराबरी से भी ऊपर निकलते रहे. पिछली सरकारों ने इस आरक्षण व्यवस्था को कई बाए फिर फिर बढाया भी. कुछ राज्य सरकारों ने दलित व अनुसूचित जन जातियों के अपने कर्मचारियों को प्रमोशन में भी प्राथमिकता का नियम बनाया. फलत: इस वर्ग में एक ‘क्रीमी लेयर’ अलग से बन गयी. ये भी सच है कि एक बहुत बड़ा तबका अज्ञानता की वजह से आज भी वहीं है जहां आजादी के समय था. जाग्रति जरूर आई लेकिन दुर्भाग्य ये रहा कि इन दलित जातियों व आदिवासियों के अपने अन्दर से ठेकेदार उभरकर सामने आये, नतीजन आरक्षण का भरपूर लाभ कुछ ही लोगों तक सीमित रहा है

इधर नामनिहाल गरीब सवर्णों में व अन्य धर्मावलम्बी गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से असंतोष घर करता रहा है. दलितों के मुकाबले तमाम सुविधाओं में निरंतर उपेक्षा किये जाने के कारण हार्ट बर्निंग  व  आपसी टकराव होते रहे हैं. इसी के परिणाम स्वरुप  राजस्थान में ‘गुर्जर आन्दोलन’ , हरियाणा में ‘जाट आन्दोलन’, गुजरात में ‘पटेल आन्दोलन’ जैसे घमासान हुए हैं और आज भी उनकी आग ठंडी नहीं हुई है.

आरक्षण के बरदान स्वरुप दलित व पिछड़ी जातियों की जो पीढियां सम्रद्धि व पद पाकर ऊपर आ चुके हैं वे अब इसे जन्मजात हक़ समझकर छोड़ना नहीं चाहते हैं, सभी राज नैतिक दलों में इनकी लाबियाँ प्रबल हैं इसलिए चाहते हुए भी कोई दल रिस्क नहीं लेना चाहता है कि ये वोट बैक उनसे टूटे.

आज जब देश के राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री, अनेक राज्यपाल, अनेक मंत्रीगण व नौकरशाह आराक्षित वर्गों के ही  विराजमान हैं तो ये उम्मीद करना कि ये आरक्षण में कोई  परवर्तन लाने की दिशा में सोचेंगे या कार्य करेंगे एक दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं होगा.

ये भी सच है की इस तरह की आरक्षण व्यवस्था दुनिया के किसी देश में नहीं है तथा आरक्षण के फलस्वरूप योग्य व्यक्तियों के पिछड़ने से एक बड़ी सामाजिक कुंठा पैदा हो रही है जो नए वर्ग संघर्ष का रूप ले सकता है. ऐसे में देश के सर्बोच्च न्यायालय ने इस जातिगत आरक्षण पर अपने फैसले में कुछ आवश्यक सुधार किये थे ; जैसे कि जाति सूचक आक्षेप पर बिना जांच पड़ताल के गैर जमानती  गिरफ्तारी ना की जाए, क्योंकि पिछला इतिहास बताता है ऐसे ७० से ८० प्रतिशत मामले झूठे निकले हैं.(हाल में नोयडा में एक दलित एस.डी.एम्. द्वारा बुजुर्ग कर्नल को अपमानित करने के लिए इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया जिसकी कलई बाद में खुल गयी है.) प्रमोशनों में योग्यता/ बरिष्ठता को आधार माना जाए नाकि जातिगत योग्यता. इस पर हो-हल्ला व सडकों पर आन्दोलन होने लगे तो वर्तमान सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके सर्बोच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करने की जो गलती की है उसका दुष्परिणाम लम्बे समय तक देश को भुगतना पडेगा.

अब सवर्णों में जबरदस्त उबाल है, जो लोग कल तक मोदी जी के अंधभक्त थे उनमें से कई ने अपने जहरीले उदगार व्यक्त किये हैं. एक पंडित जी ने फेसबुक पर यहाँ तक लिखा है कि “बीजेपी के लिए वोट का बटन दबाने में मुझे अब ऐसा लगेगा की मैं अपने बच्चों का टेंटू दबा रहा हूँ.” नाराज लोग ‘नोटा’ की सलाह भी दे रहे हैं, पर ये समस्या का कोई हल नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निरस्त करने का कलंक मोदी सरकार पर रहेगा, निश्चय ही इसका नुकसान उनकी पार्टी को उठाना पडेगा.

सबसे अच्छा ये होता कि आरक्षण पूरी तरह आर्थिक विपिन्नता तथा व्यक्तियों की विकलांगता को आधार मान कर तय किया जाता. ये लक्षण भी अच्छा है कि प्रबुद्ध लोग इस विषय को गंभीरता से ले रहे हैं और बहस जारी है.

आज मेरे इस लेख के समापन से पूर्व एक खबर ये भी एक टी.वी. चेनल द्वारा प्रसारित की है कि गुजरात हाईकोर्ट ने सभी जातिगत आरक्षण समाप्त करने पर एक महत्पूर्ण निर्णय दिया है. इसकी पड़ताल अभी बाकी है.

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शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

आदरणीय अटल जी के नाम :



आप भी उस देश चले गए हैं जहां से ना कोई चिट्ठी ना कोंई सन्देश आते हैं. आपने अपनी एक रचना में लिखा है कि “मैं फिर से आऊँगा....” पर मैंने तो आपके मोक्ष की कामना की है ताकि आप जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा में विलीन हो जाओ. वैसे अब ये धरती आप जैसे धर्मसहिष्णु व सर्वजन हिताय भावना के चाहने वालों के लायक रही भी नहीं है.

मैं अनुभव कर रहा हूँ की आपके अवसान के बाद लोग आपकी मौत को अपने पक्ष में भुनाने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं. तमाशों व हँसी ठठ्ठों के बीच आपकी राख को उन जगहों पर नदी-नालों में विसर्जित किया जा रहा है जहां डालने का कोई महत्व नहीं है. हमारे उत्तरांचल में अवशेष उन्ही जगहों पर विसर्जित किये जाते हैं जहां का जल गंगा नदी तक पहुचता है. अन्यथा सीधे गंगा में अर्पित किये जाते हैं.

कोटा के एक वकील स्वनामधन्य श्री दिनेश द्विवेदी जी (मेरे फेसबुक मित्र) ने चम्बल के श्मशान घाट में अस्थिविसर्जन पर सही अंगुली उठाई है. उन्होंने आपकी मृत्युपरांत फेसबुक पर एक लतीफा मुल्ला नसरुद्दीन ( a wise man) के बारे में डाला था , मुझे उसका गूढ़ अर्थ बार बार हाँट करता आ रहा है. उस लतीफे को मैं पुन: अपने शब्दों में लिख रहा हूँ लेकिन मैं निवेदन भी करना चाहता हूँ कि इसे सीधे सीधे अपने सम्बन्ध में बिलकुल ना लें. लतीफा इस प्रकार है:

एक थे फन्नेखां लम्बरदार, वे तब की सियासत के बड़े लम्बरदार थे, उनके गाँव के लोगों ने मिलकर उनको लंबरदारी से हटवा दिया था क्योंकि उसकी फकत लफ्फाजी से व उनकी औलादों/ कारिंदों के अत्याचारों से सब दुखी थे. एक दिन लम्बरदार जी खुदा को प्यारे हो गए तो दफनाने के लिए खानदानी कबरिस्तान में ले जाये गए. धार्मिक नियम के अनुसार उनको जमींदोज करने से पहले उनके बारे में कुछ अच्छे शब्द बोले जाने थे पर लोग थे कि सबके मुंह में दही जम गया. मौलवी साहब ने वक्त की नजाकत देखते हुए पड़ोसी गाँव से मुल्ला नसुरुद्दीन  को बुला भेजा, मुल्ला नसुरुद्दीन सारा माजरा समझ गए और कार्यक्रम को आगे बढाते हुए बोले “ लम्बरदार साहब अपनी औलादों के मुकाबले ‘बहुत अच्छे’ थे”. ऐसा कहते ही कब्र पर मिट्टी डालनी शुरू हो गयी. पता नहीं लम्बरदार जी को जन्नत नसीब हुयी या नहीं पर उनकी औलादें जश्न मनाने में व्यस्त ही गयी क्योंकि रोकाने-टोकने वाला कोई  ना रहा था.

ज़माना सब देख रहा है, समझ रहा है पर आपके जाने का गम / भय उन लोगों को ज्यादा सता रहा है जो मानते थे कि ‘एक सही आदमी गलत पार्टी में’ था. (आपके लोकसभा में दिए गए एक भाषण से साभार).

आपने ये भी लिखा है कि ‘मर्जी से जिऊँ और मन से मरूं’ लेकिन आपकी मृत्यु पर एक वारिस का कहना है कि “अटल जी ने जाने का गलत टाईम चुना, उनको अगले साल उत्तरायण तक भीष्म पितामह की तरह सर शय्या पर रहना चाहिए था तब उनकी अंतिम यात्रा और कलश यात्राएं ज्यादा भव्य होती.” उसने अफसोस जाहिर किया कि अपने देश की अधिसंख्य जनता की याददाश्त महज पंद्रह दिन होने से उनके चपाटों को सम्पैथी वोट लोकसभा के चुनावों में शयद ही मिल पायेगा.

अंत में, जो ये कहते हुए सुने गए थे “मैं आपको ‘बड़ा’ इसलिए दीख रहा हूँ कि अपने बुजुर्गों के कन्धों पर सवार हूँ,” वे आपके अवसान के बाद जमीन पर आ गए हैं. खुदा खैर करे.
मैं हूँ आपका एक प्रशंसक.


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रविवार, 12 अगस्त 2018

हेल्थ टिप - (७)



दवाईयाँ – हमारी ये दुनिया अनेक विविधताओं से बनी है, देश, काल व परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग जगहों पर मानव संस्कृतियों का विकास हुआ तदनुसार ही चिकित्सा पद्धतियों का जन्म भी होता रहा है. १९ वीं २० वीं सदी तक आते आते विज्ञान के प्रादुर्भाव का असर भी सभी पद्धतियों पर पडा है.

हमारे देश भारत में आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा के रूप में विकसित हुआ जिसमें हर्बल यानि वानस्पतिक जडी-बूटियों व धातुओं की भस्मों को दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है; इसी प्रकार यूनानी चिकित्सा पद्धति  की अपनी पुरानी पहचान है, चीन – जापान की इसी तरह की अपनी दवाएं होती हैं. कुछ सदी पहले जर्मनी में होम्योपैथिक पद्धति ने जन्म लिया जिस पर दुनिया के अनेक लोग विश्वास किया करते हैं. पर दुनिया भर में आज सबसे विश्वसनीय एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति मानी जाती है क्योंकि इसका विकास शुद्ध वैज्ञानिक शोधों पर आधारित है इसमें कैमिकल औषधियों द्वारा प्रतिरोधात्मक शक्तियों को इलाज के लिए प्रेरित किया जाता है तथा सर्जरी द्वारा इसमें क्रान्ति लाई गयी. एक्स रे व लेजर टेकनीक से अब असीमित संभावनाएं इस पद्धति में विकसित हो गयी हैं. ये शोध निरंतर जारी हैं.

यद्यपि मरे हुए को ज़िंदा करना यानि अमरता की परिकल्पना अभी वैज्ञानिक उपलब्धि से बहुत दूर है पर अब लोगों की समझ में आ गया है की टोनों- टोटकों या झाड फूक का ज़माना अब नहीं रहा है. हाँ अभी भी बहुत से अंधरे कोने बचे हैं जहां अभी तक प्रकाश की किरणें नहीं पहुच पाई हैं.

वैसे प्रकृति ने हमारे शरीरों में रोग प्रतिरोधात्मक शक्तियां स्वयं प्रदान की हुयी हैं, एक विचारक ने लिखा है कि ९५% बीमारियाँ हवा पानी औए इम्युनिटी से ठीक हो जाती हैं, शेष ५% को इलाज की जरूरत होती है उनमें भी केवल ३% ठीक हो पाते हैं बाकी असाध्य ही रहते हैं या यमराज की भेट चढ़ जाया करते हैं.

कैमिकल औषधियां तुरत-दान असर तो करती हैं पर इनके साईड इफेक्टस बहुत रहते हैं, इसलिए इनके उपयोग के लिए अनेक क़ानून बनाए गए हैं विशेषकर जो शेड्यूल्ड ड्रग्स हैं उनका उपयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए, योग्य चिकित्साधिकारी की सलाह पर ही लेनी चाहिए. एक जरूरी बात सभी पाठकों को कहना चाहूंगा कि अपने शरीर को कम से कम मेडीकेट किया जाए तो ही अच्छा है. मजबूरी में ही दवा खानी चाहिए.

एक समय था जब मेडीकल प्रोफेसन को सेवा का प्रोफेसन कहा जाता था, आज इसका बाजारीकरण हो गया है, पैसा बड़ा फैक्टर हो गया है चाहे मरीज की जान चली जाए. एक सर्वे के अनुसार ये भी बताया गया है कि लोग बीमारियों से कम, दवाओं के गलत प्रयोग से ज्यादा मर रहे हैं. इस सन्दर्भ में एक बुजुर्ग का बयान मजेदार है : पत्रकार ने उनसे उनके स्वस्थ लम्बे जीवन का राज पूछा “क्या आप डाक्टर के पास जाते हैं?” उन्होंने कहा “हाँ भाई, डाक्टर की तो हमेशा जरूरत रहती है इसलिए उसके पास जाना ही पड़ता है.” पत्रकार “फिर क्या करते हैं?” उत्तर “ फिर फार्मासिस्ट के पास जाता हूँ, उसको भी तो ज़िंदा रखना है.” पत्रकार फिर “बहुत सारी टैबलेट व कैप्स्यूल देता है जिनको लेकर घर आ जाता हूँ.” पत्रकार “आप सारी दवाएं खा लेते हो?” उत्तर “ नहीं भाई, मैं उन सभी गोली कैप्स्यूल्स को डस्टबिन में डाल देता हूँ क्योंकि मुझे भी तो ज़िंदा रहना है.”

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