बुधवार, 26 अगस्त 2015

सीमेंट

भवन निर्माण के विकास पर नजर डाली जाए तो मालूम होता है कि कभी गुफाओं में और कभी ऊंचे पेड़ों पर घर बनाने वाले मनुष्य ने पहले झोपड़ा-कच्चा मकान फिर पत्थर-ईटों वाले पक्के मकान बनाए, जिनमें लकड़ी का भी भरपूर इस्तेमाल होता था, लेकिन लकड़ी का दुश्मन कीड़ा दीमक उसको हमेशा परेशान करता रहा होगा. बाद में मिट्टी के गारे के बजाय चूने का गारा लगाया जाने लगा. उस जमाने में पोजलाना को सुर्खी नाम से भी जाना जाता था. चूने को मजबूती देने के लिए उसमें उरद की दाल, गुड़ आदि मसाले भी मिलाये जाते थे. किलेबंदी को मजबूत दीवार देने के लिए राजे-रजवाड़े ऐसी तकनीक ज्यादा प्रयोग किया करते थे. कहीं कहीं पुराने किलों की दीवारें इतनी मजबूत पाई गयी हैं कि ब्लास्टिंग से भी मुश्किल से टूट पाती हैं.

आधुनिक सीमेंट बनाने की प्रक्रिया में लाईम स्टोन (चूना पत्थर) को काली मिट्टी, बॉक्साईट और आयरन ओर को सही मात्रा में या सही अनुपात में मिलाकर, बारीक पीसकर, उच्च ताप पर पकाया जाता है, सीमेंट कारखानों के किल्न (bhatta) इसमें सक्षम होते हैं. इसको पकाने में पिसा हुआ कोयला साथ में जलाया जाता है, जिसकी सम्पूर्ण राख भी उसमें समाहित हो जाती है. (अरब देशों में जहाँ क्रूड ऑइल खूब और सस्ता भी है वहाँ उसी से पकाया जाता है).

किल्न से निकलने के बाद जो पका हुआ माल निकलता है उसे क्लिंकर नाम से जाना जता है. इसमें जिप्सम और पावर प्लांट का रिजेक्ट माल फ्लाई ऐश, राख, मिलाकर फिर से सीमेंट मिलों में पीसा जाता है. उस पाउडर को कन्वेयर बेल्ट्स या प्रेशर पंप्स के जरिये साइलोज (भण्डार) में भरा जाता है. इस तरह से पिसे हुए सीमेंट को ब्लेंडेड/कंपोजिट सीमेंट या पोजलाना सीमेंट के नाम से जाना जाता है. इस सीमेंट को स्वचालित पैकिंग मशीन द्वारा कट्टों में पैक करके अपने निश्चित वजन के बाद स्वत: आगे फिसलते हुए मार्केटिंग के लिए ट्रकों या रेल वैगंस में पहुँचाया जाता है. कारखानों में कई स्तरों पर दिन-रात क्वॉलिटी कंट्रोल की जाती है.

सीमेंट में प्रयुक्त होनेवाली कैमिकल सामग्री में कैल्शियम ऑक्साईड, एल्युमीनियम ऑक्साईड और आईरन ऑक्साइड के मिश्रण होते है. जिन पत्थरों को पीसा जाता है, उनमें 88% चूने की अपेक्षा होती है. अगर इससे घटिया पत्थर हो तो उसमें हाई ग्रेड स्वीटनर मिलाना होता है. संगमरमर का श्वेत पत्थर १००% लाईम स्टोन होता है इसलिए इसका चूरा बहुत काम आता है.

सामान्य उपयोग में आने वाला भूरा सीमेंट पोर्टलैंड सीमेंट होता है, जिसमें फ्लाई ऐश की मात्रा शून्य होती है और यह पोर्टलैंड सीमेंट, पोजलाना सीमेंट की अपेक्षा बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करता है. किसी भी प्रकार के सीमेंट को कंक्रीट में परिवर्तित करने के लिए सही अनुपात में महीन रेत, मोटी रेत तथा पानी का इस्तेमाल करना अनिवार्य होता है. ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि सीमेंट तैयार होने से पहले उसे भौतिक तथा रासायनिक प्रक्रिया से अच्छी तरह गुजारा जाता है तभी उसमें विशेष गुणवता आती है.

अलग अलग कार्यों में प्रयुक्त करने के लिए रेत का प्रतिशत तय होता है. समुद्र में आयल वेल के प्रेशर से बनने वाले पाइप्स के लिये बनाया जाने वाले सीमेंट कुछ विशिष्ट होता है, जो चन्द मिनटों में जम कर पक्का भी हो जाता है.

सामान्यतया औसत से ज्यादा रेत मिलाने से सीमेंट की गुणवत्ता कम हो जाती है नतीजन निर्माण जल्दी धराशाही हो जाते हैं. निर्माण में प्रयुक्त लोहे की छड़ों की गुणवत्ता भी बहुत मायने रखती है. सभी सीमेंट उत्पादक कम्पनियां भारत सरकार द्वारा निश्चित किये गए मापदंडों के अनुसार गुणवता बनाए रखती हैं. सीमेंट के बारे में बहुत से अच्छे जानकार लोग हैं, जो निर्माण कार्यों के लिए सही सीमेंट के चुनाव की सलाह दे सकते हैं क्योंकि हर प्रकार के सीमेंट में कुछ खासियत होती है, जिसका सम्बन्ध निर्माण के टिकाऊपन (durability) से होता है. विकास की इस दौड़ में ठेकेदारों और इंजीनियरों की ईमानदारी हमारी बुनियाद में है. ऐसा मान कर चलना चाहिए.

सीमेंट के बारे में कुछ तथ्य ये भी हैं कि हमारे जैसे विकासशील देशों में सीमेंट की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत मात्र 5 किलो बताई गयी है, जबकि विकसित देशों में 95 किलो प्रति व्यक्ति है. हमारे तमिलनाडु राज्य में अन्य प्रान्तों के मुकाबले ज्यादा सीमेंट उत्पादन किया जाता है. वर्तमान में करीब 36 कंपनियां सीमेंट उत्पादन से जुड़ी हुयी हैं. ए.सी.सी, अम्बुजा, और लाफार्ज नाम की बड़ी कंपनियों को स्विस कंपनी होलसिम ने अधिगृहित कर लिया है.
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शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

मिष्टान्न

आजकल जब दूध ही नकली बिकता है तो दूध से बनी मिठाईयों की शुद्धता की भी कोई गारंटी नहीं है. इसलिए लोग मावा (खोया) से बनी मिठाईयों से परहेज करने लगे हैं. वार-त्यौहारों पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भूले-भटके छापा मारकर नकली मावे को पकड़ कर अखबारों की सुर्ख़ियों में लाते रहते हैं, बाकी साल भर सोते रहते हैं. जो लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं, वे वसायुक्त मिठाईयों से दूर रहते हैं क्योंकि ये कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाने के मुख्य स्रोत हैं. वैसे तो मीठा हमारी रसना की पहली पसंद रहती है, और अनादि काल से हमारे देश में शुभ कार्यों में मिठाई शगुनी मानी जाती है. अभी भी हम लोग रिश्तेदारी में मिठाई के डिब्बों का आदान-प्रदान करना जरूरी व्यवहार मानते हैं. इसलिए कोशिश यह रहती है कि मिठाई विश्वसनीय हलवाईयों/स्वीट-मार्ट्स से ही खरीदी जाए. बेसन के लड्डू, पेठे की मिठाई आदि कई मिठाईयां ऐसी होती हैं, जिनमें मिलावट की संभावनाएं बहुत कम होती हैं. हमारे पड़ोस में रहने वाले गुप्ता जी तो शगुन में गुड़ की डली देना उत्तम मानते हैं.

मिठाई को मिष्टान्न भी कहा जाता है. बड़े हलवाईयों की दूकानों को जब स्वीट्स या स्वीट-मार्ट नाम नहीं थे, तब बड़े बड़े अक्षरों में मिष्टान्न भण्डार लिखा रहता था. मिष्टान्न में चीनी, दूध, मावा, मैदा, सूजी, गेहूं का रस, चावल का आटा, दालों का चूर्ण, गोंद, आरारोट, कोक, साबूदाना आदि पदार्थ मिलाये जाते हैं. खुले बाजार में उपलब्ध टॉफ़ी-चाकलेट भी बच्चों के पसंदीदा मिठाईयां होती हैं. बचपन में संतरे के स्वाद+रंग वाले चीनी से बनी ‘विलायती मिठाई की गोलियां चूसने का आनंद कैसे भूला जा सकता है. गेहूं की बोवाई के बाद गांव में जो गन्ने की पेराई होती थी और गुड़ बनता था, उसकी खुशबू व स्वाद आज तक जेहन में बसे हुए हैं.   

आज से बीस-पच्चीस साल पहले हम लोग डिटर्जेंट वाले दूध की कल्पना भी नहीं करते थे. हमारे दूध की नदियों वाले देश को बेईमान मिलावटखोरों ने दाग लगा कर बदनाम कर रखा है. लेकिन ये भी सच है कि ईमानदारी और नेकी अभी पूरी तरह मरी नहीं है. सब लोग ऐसे नहीं हैं. आगरा का बेहतरीन पेठा, मथुरा के स्वादिष्ट पेड़े, अल्मोड़ा की बाल मिठाई और सिंगोड़े, मेरठ की रस मलाई, जयपुर के घेवर, बीकानेर के रसगुल्ले, कोलकता की बंगाली मिठाईयां, मुम्बई का कराची हलवा, दिल्ली का सोहन हलवा, गुलाब जामुन+कालाजाम, हैदराबाद का मैसूर पाक, हरियाणा की कुल्फी, कलाकंद (मिल्क केक) और भी बहुतेरी देसी मिठाईयां हैं; खाने वालों का दिल हो गुलगुल वारे वारे वाह वाह.

अब हलवाई तो सिर्फ छोटे-मोटे शहर कस्बों के नुक्कड़-गलियों-बाजारों में पाए जाते हैं, जो जलेबी, बर्फी, इमरती, कचोरियों, समोसों आदि चटपटे पकवानों से लोगों को तृप्त करते रहते हैं, बाकी बड़े शहरों में एयरकंडीशन्ड शोरूम्स में स्वीट्स या 'स्वीटमार्ट बन गए हैं. जहाँ देसी-विदेशी नाम या ब्रांड के लेबल से सजी रहती हैं. खूब बिकती भी हैं. भाव पूछने की जरूरत नहीं होती है क्योंकि हर थाल पर कीमत का तमगा लगा होता है. जो चीनी बाजार में 30 से 40 रुपयों में प्रति किलो बिकती है वह मिठाई बन कर 600-700 तक की ऊंची कीमत में मिलती है. क्योंकि इसमें पिस्ते, काजू आदि मेवे यानि ड्राई फ्रूट्स का तड़का  लगा होता है. अब तो बड़ी दूकानों में "शुगर-फ्री मिठाईयां" भी मिलती हैं.  

जहां तक मुझे जानकारी है, हमारे देश में मिठाईयां, मैनुअल, यानि कारीगरों के अपने हाथों से बनायी जाती है, जबकि विकसित देशों में ये काम स्वचालित, साफ़-सुथरी मशीनों से होता है. मिठाई खाने वाले यदि हमारे कारीगरों की वर्कशाप नहीं देखें तो ज्यादा अच्छा है, ऐसा लोग कहते हैं. जो मिठाई चांदी के वर्क में थालों में सजी रहती है, उसके खाद्य रंगों व रसायनों के मिलावट के बारे में भी सजगता की आवश्यकता है.

अंत में शुभ कामना है, बनी रहे ये शहद की दुनिया, खाते रहें रबडी के मालपुवे’.  हाँ, मधुमेह वाले डॉक्टरी सलाह के बिना बदपरहेजी ना करें.
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लाखेरी नगरपालिका

अरावली पर्वतमाला की गोद में बसा हुआ लाखेरी नगर, बूंदी जिले का दूसरा बड़ा नगर है. 2011 की जनगणना के अनुसार इसकी कुल आबादी 29572 थी. पर्वतीय उपत्यकाओं के बीच हरा भरा नखलिस्तान सा लगने वाला ये नगर कैनवस पर उकेरा गया प्राकृतिक सौन्दर्य का एक विहंगम चित्र सा नजर आता है, जिसमें नीम, शीशम, आम, जामुन, पीपल, तथा बबूल के वृक्षों की भरमार है. जंगली प्लान्टेशन के फलस्वरूप सर्वत्र कांटेदार कीकर (अंगरेजी बबूल) की झाडियां फ़ैली हुई हैं.

निकाय क्षेत्र में बड़े बरसाती सरोवर व मीठे पानी के कुंवे-बावडियों की भरमार है. हर रविवार को मुख्य बाजार के आगे हाट लगता है, जो आसपास ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है. क्षेत्र में अब अनेक स्कूल, कॉलेज, अस्पताल हैं, और सीमेंट का एक कारखाना है, जो गत एक सौ वर्षों से राष्ट्र निर्माण में सहभागी है तथा इस क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि का जीवंत प्रमाण है.

सन 1976 तक गरमपुरा पंचायत क्षेत्र नगरपालिका सीमा के बाहर था. विस्तार होने पर ए.सी.सी. के लीज एरिया सहित उसका विलय नगरपालिका में कर दिया गया. विस्तार होने पर लाखेरी रेलवे स्टेशन से इंदरगढ़ रोड पर भावपुरा तक, बूंदी रोड पर शंकरपुरा+सुभाष नगर  से लेकर प्राचीन बसावट ब्रह्मपुरी व तमोलखाना तक सीमाएं फ़ैल गयी हैं. परिसीमन करके कुल 25 वार्ड्स बनाए गए हैं.

किसी स्वनामधन्य ‘लाखा गूजर के नाम पर इस गाँव का नाम लाखेरी पड़ा, ऐसा कहा जाता है. ये गाँव कब बसा, और इसमें लाल पत्थरों से बने सुन्दर मंदिर और बावडियां बूंदी के राजाओं ने या किसी और ने बनाए, इस बारे में मुझे कहीं से प्रामाणिक तथ्य नहीं मिल पाये. यों तो लाखेरी नगर निकाय का अभ्युदय सन 1937-38 से बताया जाता है. नागरिक सुविधाओं की देखरेख के लिए किन किन लोगों ने इसकी शुरुआत की इसका भी कोई विवरण नहीं मिल सका है. राजस्थान राज्य के पुनर्गठन के बाद दिनांक 5-12-1951 के सरकारी नोटिफिकेशन द्वारा लाखेरी नगरपालिका को लोकल सेल्फ गवर्नमेंट की मान्यता मिली, ऐसा विकीपीडिया के इतिहास में दर्ज है.

पिछली सदी के पांचवे दशक में ए.सी.सी. ने जब गाँव के बीच से चमावली की तरफ अपनी रेल लाइन डालनी चाही तो उसके विरुद्ध एक जन आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था, जिसका समाधान एक समझौते के तहत हुआ कि कंपनी ने गाँव में ब्रह्मपुरी के आख़िरी छोर तक पक्की सीमेंट की सड़कें बनवाई, अस्पताल की सुविधा दी, सार्वजनिक स्थलों पर निशुल्क बिजली की व्यवस्था दी. अनेक सार्वजनिक हितों में आर्थिक योगदान दिया और स्थाई रूप से हर महीने कुछ निश्चित राशि अनुदान के रूप में देना स्वीकार किया. इस आन्दोलन का नेतृत्व स्व. गजानंद जी पुरोहित और भू. पू. विधायक स्व. भंवरलाल शर्मा द्वारा किया गया था, जिनको बूंदी के वकील (बाद में अनेक विभागों के मंत्री रहे), पंडित बृजसुन्दर शर्मा का वरदहस्त प्राप्त था. विजयद्वार उसी जीत का प्रतीक माना जाता है. इस द्वार के ऊपर से रेल लाइन आज भी गुजरती है. उस आन्दोलन में स्व. हरिप्रसाद शर्मा (भू.पू.विधायक), नंदकिशोर दीक्षित (डब्लू) आदि अनेक नौजवानों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. इस आन्दोलन को लाखेरी में एक बड़ी राजनैतिक चेतना के रूप में देखा गया क्योंकि इसके बाद अनेक समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम उभर कर सामने आई थी, जिनमें प्रमुख नाम जो लेखक की जानकारी में हैं, वे हैं, सर्वश्री जडावचंद शर्मा, मानकचंद जैन, दुर्गालाल शर्मा, मदनलाल शर्मा (खेवरिया) नेमीचंद जैन, दीनानाथ शर्मा, छीतरलाल जैन, किशनचंद शर्मा, श्रीकृष्ण शर्मा, गोबरीलाल राठोर, दौलतराम शर्मा, बाबूलाल शर्मा, नरसिंहलाल शर्मा आदि. (जिन नामों को मैं स्मरण नहीं कर पाया हूँ, सुधी पाठक कृपया टिप्पणी द्वारा जोड़ने का कष्ट करें.)

प्रारम्भिक वर्षों में स्व. गजानंद जी पुरोहित इसके संरक्षक/ चेयरमैन, सब कुछ थे. उनकी टीम में कौन कौन सक्रिय थे, ये भी पुरानी बात है. हाँ, ये भी सुना था कि कारखाने में बतौर कैशियर कार्यरत स्व. केशवलाल दीक्षित भी म्युनिसपैलिटी का कार्य देखते थे. 1951 के बाद विधिवत चुने हुए चेयरमैनों की क्रमबद्ध सूची इस प्रकार है: सर्वश्री मानकचंद जैन, हरिप्रसाद शर्मा, नंदकिशोर दीक्षित, मदनलाल शर्मा, रामनारायण शर्मा, दौलतराम शर्मा, राधेश्याम शर्मा, इब्राहीम गांघी, मोडूलाल महावर, महावीर गोयल, चौथमल नागर, और राकेश सेनी.

राजनैतिक उठापटक के दौरान बीच बीच में सरकारों द्वारा बोर्ड भंग करके प्रशासक भी नियुक्त किये जाते रहे हैं. ताजा सामाचार यह है इस बार हुए चुनावों के फलस्वरूप जो नया बोर्ड आया है वह अभी अच्छा काम कर रहा है.
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रविवार, 16 अगस्त 2015

रोमांच

रोमांच में भी एक तरह की आनन्दानुभूति होती है. हमारे जीवन में कई ऐसे अवसर आते हैं, जब कुछ नया होने को होता है और हम अनेक कल्पनाओं के साथ उस क्षण की प्रतीक्षा किया करते हैं.

मेरे इस दीर्घ जीवन में भी कई क्षण रोमांचित करते रहे हैं, नवीनतम ये है कि मैंने पहली बार दिल्ली की मैट्रो रेल से यात्रा की है. मैं नियमितरुप से पुस्तकें व समाचार पत्रों का पाठक  रहा हूँ और समसामयिक विषयों पर अपनी जानकारी अपडेट करता रहता हूँ. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मदनलाल खुराना जी के समय से मैट्रो रेल का निर्माण प्रारम्भ हुआ था, और शीला दीक्षित जी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में मैट्रो रेल का ये बड़ा प्रोजेक्ट कार्यरूप में परीणित हुआ. गत वर्षों में भी बीच बीच में कई बार दिल्ली आना जाना हुआ. तब इस रेल के लिए जगह जगह सडकों की खुदाई तथा ऊंचे ऊंचे सीमेंट के स्तम्भ बनते देखे थे. सचमुच ये बहुत बड़ी परियोजना थी विशेषकर अंडरग्राउण्ड ट्रैक डालना बड़ा दुरूह कार्य था ऊपर बड़ी बड़ी इमारतें और उनके नीचे खुदाई करके रेलवे स्टेशन बनाए गए हैं.

परिवहन के लिए निजी साधन होने के कारण मेरे पुत्र प्रद्युम्न ने मुझे मैट्रो रेल में सफ़र करने का कोई मौक़ा नहीं दिया।. परन्तु इस बार मैं हल्द्वानी से ही ठान कर आया था कि मैट्रो रेल के सफ़र का अनुभव जरूर करूंगा.

ठेठ एसियाड के समय (इंदिरा गांधी का युग) से ही दिल्ली ने विकास की गति पकड़ी थी, अन्यथा उससे पहले दिल्ली के किसी सड़क या चौराहे पर सिगनल लाईटें तक नहीं लगी हुयी थी. तब दिल्ली थी भी बहुत छोटी. मैं सन 1957-58 में दिल्ली की सड़कों पर साईकिल से खूब घूमा था. सरकारी बसों में सफ़र करना भी बहुत सस्ता और सरल हुआ करता था. सन 1958-59  में एक नई स्कीम निकाली गयी थी कि छुट्टी के दिनों में महज एक रूपये का टिकट लेकर दिन भर कहीं भी घूमा जा सक़ता था. बसें भी सीमित थी. कुल 31 रूट थे. 21 नंबर यूनिवर्सिटी आती जाती थी. आख़िरी 30 नम्बर रेलवे स्टेशन से कालकाजी और 31 नंबर मालवीय नगर जाती थी. ये दोनों रिमोट रिफ्यूजी बस्तियां थी.

गत चालीस-पचास सालों में ना जाने इतनी जनता कहाँ से दिल्ली में आ जुटी है. दिल्ली के चारों तरफ दूर दूर तक बहुमंजिली इमारतों का जंगल खड़ा हो गया है. और ये अभी भी अपना क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है. तब जमुना पार कुछ भी नहीं था, गांधी नगर, शहादरा व गाजियाबाद को आने जाने के लिए केवल लालकिले के पिछवाड़े वाला यामुनापुल था, जिसमें ऊपर रेल लाइन व नीचे मोटर+पैदल मार्ग होता था. कनॉटप्लेस, जिसे अब राजीव चौक नाम दिया गया है, तब भी सुन्दर था. दोहरे चक्र में गोल खम्भों वाली एक सी धवल इमारतें अंग्रेजों के समय की बनी हुयी हैं. उनकी ही स्थापत्यकला का नमूना हैं. अब आसपास जो ऊंची बिल्डिंग्स दिखती हैं, वे तब नहीं थी. दिल्ली विश्वविद्यालय, किंग्सवे कैम्प, तीमारपुर, पुराना विधान सभा भवन, कश्मीरी गेट, दरियागंज, इंडिया गेट, रेसकोर्स.सफदरजंग, लालकिले के सामने जैन मंदिर,  गुरुद्वारा, फुव्वारा, चांदनी चौक, सदर बाजार, पहाड़ गंज, बिड़ला मंदिर, करोलबाग, झंडेवालान, सब्जीमंडी, सब सिनेमा रील की तरह घूम रहे हैं. पुरानी दिल्ली की सड़क के बीचोंबीच एक ट्राम धीमी गति से घंटी बजाते हुए चलती थी.  कुतुबमीनार को रेलवे स्टेशन से 17 नंबर बस जाती थी. रास्ते में युसूफ सराय से आगे जंगल पड़ता था. 

आयुर्विज्ञान संस्थान तब बनने लग गया था. पुराने किले की बगल में नया चिड़िया घर बनाया जा रहा था. सन 1958 में प्रगति मैदान में एक प्रदर्शनी लगी थी, जहां अमेरिकी स्टाल पर मैंने पहली बार टेलीवीजन चलता देखा था. तब मेरी समझ में इसके बारे में कुछ नहीं आया था. चूंकि मैं दूर दराज उत्तरांचल के एक अति पिछड़े गाँव से आया था, मेरे लिए दिल्ली एक दूसरी ही दुनिया थी जिसके अनुभव बहुत रोमांचित करने वाले होते थे. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पैथोलाजी की ट्रेनिंग लेकर कुछ महीने दिल्ली म्युनिसिपल चिकित्सालय में काम करने के बाद बड़ी वेतन+सुविधाओं के लालच में 10 अगस्त 1960 को दिल्ली छोड़कर लाखेरी राजस्थान चला गया.

दुनिया गोल है. आज फिर से घूम फिर कर दिल्ली आ गया हूँ. वर्तमान विहंगम दिल्ली को युग परिवर्तन की अनुभूति के साथ देख रहा हूँ. रोमांचित हूँ. मेरा पौत्र सिद्धांत बॉस्टन (अमेरिका) में फिजिक्स इंजीनियरिंग पढ़ रहा है. इन दिनों भारत आया हुआ है. मैंने उसको अपनी इच्छा बताई कि मुझे मैट्रो ट्रेन के सफ़र का अनुभव करना है तो उसने मुझको बताया कि शाम-सुबह बिजी आवर्स में तो बहुत भीड़भाड़ रहती है. दोपहर के समय जाना चाहिए. ठीक 55 साल बाद 11 अगस्त 1915 को उमस भरी दोपहरी में जब हम वैशाली मैट्रो ट्रेन में दाखिल हुए तो ए.सी. की ठंडक से बहुत राहत महसूस हुई. भीड़ तो तब भी, थी लेकिन एक नौजवान ने तुरंत सीट छोड़ कर मुझे बैठने का आमंत्रण दे दिया.  कुछ देर बाद मुझे मालूम हुआ की दरवाजे के पास वाली छोटी सीटें बुजुर्गों/विकलांगों के लिए नामांकित की गई है. ये सूचना सीट के पीछे लिखी गयी है. मैं यद्यपि अभी भी दिल से जवान हूँ, पर ये घटना मुझे बूढ़ा होने का अहसास जरूर करा गयी.

मैंने कई बार मुम्बई की लोकल ट्रेन में सफ़र किया है, जहाँ लोग धक्का मुक्की करके भागते रहते हैं. बिजी आवर्स में तो हम जैसे लोगों का चढ़ना उतरना बहुत मुश्किल काम है. अपनी विदेश यात्राओं के दौरान जर्मनी में फ्रेंकफर्ट, थाईलैंड में बैंकाक, तथा अमेरिका के अटलांटा एयरपोर्ट पर मैट्रो की ही तरह ट्रेन के डिब्बे यात्रियों को उनके निर्धारित गेट तक लाती- ले जाती है. वहां मैंने देखा कि लोग बहुत अनुशासित होते हैं. उसकी थोड़ी झलक मुझे अपनी मैट्रो में अवश्य मिली क्यू में लगने का एटिकेट दिल्ली वालों में आया है अन्यथा मैंने यहाँ बसों में चढ़ने उतरने वालों को धक्का मुक्की करते व जेबकतरों के शिकार होते हुए भी देखा है.

वैशाली से आनंद विहार, प्रीत विहार, निर्माण विहार, कड़कड़दूमा, यमुना विहार, प्रगति मैदान, इन्द्रप्रस्थ व बाराखम्भा, इसके बाद धरती के अन्दर गुफा से गुजरते हुए राजीव चौक जंक्शन पहुंचे. वहां सिद्धांत ने मुझे ब्लू लाइन, व अन्य रूट पर यलो लाइन या परपल लाइन ट्रेन के बारे में बताया. ट्रेन में हर स्टेशन आने पर यात्रियों को सूचना देते हुए सावधान किया जाता रहा. मैट्रो रेल में सस्ते में सफ़र होता है, और समय की बचत भी बहुत होती है. कुल मिलाकर राजीव चौक पहुँचने के बाद हमने अंडरग्राउंड पालिका बाजार का भी एक छोटा चक्कर लगाया और उसी रोमांच के साथ घर लौट आये. मैं मन ही मन एक पुरानी फिल्म का गाना दुहरा रहा था, "ये जिन्दगी के मेले कभी ख़तम ना होंगे, अफसोस हम ना होंगे."
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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

जिग-जैग डैम

लाखेरी सीमेंट प्लांट तथा इसकी रिहायसी कालोनी के लिए अंग्रेजों के समय में ही पानी की व्यवस्था के कई विकल्प रखे गए थे. नानादेवी का नलकूप, गाँव का बड़ा तालाब, जिसमें बरसाती पानी जमा होता है, और सखावादा में पम्पिंग स्टेशन, जो पहाड़ी के ऊपर से पाईप लाइन लेते हुए नयापुरा स्थित रिजरवॉयर में पानी लाता है, जहां पानी फ़िल्टर होता है, और उसका ट्रीटमेंट किया जाता है. पिछली सदी के चौथे दसक में चमावली की पहाड़ियों से आने वाले  बरसाती पानी को रोक कर जमा करने के लिए एक बांध बनाया गया. और उसी के पूर्व में बूंदी रोड के किनारे भरान करके एक और मजबूत डैम बनाया गया, जिसे जिग-जैग डैम या बन्दा भी लोग कहा करते हैं. इसको मजबूत सीमेंट की दीवार देकर बनाया गया है. पानी के दबाव या लहरों के जोर को रोकने के लिए डैम के किनारे को आड़े-तिरछे कोण देकर ऐसी बनावट दी गयी है कि ये बहुत सुन्दर दीखता है. खासतौर पर जब पानी ऊपर से छलकता जाता है बरसात में यहाँ एक बड़ी झील बन जाती है. चूंकि इसमें पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं है, पानी गर्मियों तक धीरे धीरे सूख जाता है. इसलिए आवश्यकतानुसार पानी जमा रखने के लिए दक्षिण में रेलवे स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर आगे नयागाँव के पास मेज नदी पर एक छोटा पम्पिंग स्टेशन बनाया गया, जहां से पाईप लाइन द्वारा सीधे जिग-जैग डैम में पानी आता था और एक पम्प द्वारा पाईप के माध्यम से फ़िल्टर प्लांट से जोड़ा गया था.

जिग-जैग डैम मानसून के दिनों में छलकने लगता है. यह स्थान बहुत रमणीक व दर्शनीय हो जाता है. कई बार गर्मियों में पानी सूखने के बाद इसमें जमा सिल्ट हटाना भी जरूरी होता था.

गौरतलब है कि कंपनी की सारी जमीन पहले बूंदी रियासत से तथा बाद में रियासतों के विलय के बाद राज्य सरकार से लीज पर ली हुयी है. बूंदी के राजा इस कंपनी के स्थानीय डाईरेक्टर हुआ करते थे.

आठवें-नवें दशक में फैक्ट्री लम्बे समय तक घाटे के दौर से गुजर रही थी. वैट प्रोसेस  तथा पुरानी टेकनोलाजी होने के कारण उत्पादन कम और लागत ज्यादा आ रही थी. तब खर्चे घटाने के क्रम में जिग-जैग डैम की उपयोगिता के बारे में भी सोचा गया होगा क्योंकि इसकी मैनटेनैंस पर बड़ा खर्चा आ रहा होगा. उसी बीच ये भी देखा गया की डैम की नींव में से बहुत पानी का रिसाव होने लगा था. डर ये भी था कि कभी अगर डैम टूट गया या फूट पड़ा तो आगे बजरंगनगर व शिवनगर की नई बसावट डूबत में आ जायेगी. ये सारी संभावनाएं हैड आफिस को भेजी गयी तो वहाँ से आदेश हुआ की डैम को जिला प्रशासन को दे दिया जाये. जांच- पड़ताल के इस प्रोसेस में कई साल लग गए. इस बीच कुछ लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा करके गेहूं तथा सरसों की खेती करना भी शुरू कर दिया था.

मुझे याद है कि जब सं १९६० में मैं लाखेरी आया था तो वह अगस्त का ही हरियाला मौसम था आगे वर्षों में इस डैम की पाल पर लोग परिवार सहित पिकनिक मनाने आते थे. बन्दा मंदिर की तरफ तालाब के किनारे नाव के लिए एक टिन शेड बना हुआ था. लोग नौकायन का आनन्द लिया करते थे. किनारे की सीढ़ियों पर नहाना-धोना भी करते थे, लेकिन ये भी सच है कि यहाँ पर जानलेवा दुर्घटनाएं भी बहुत होती थी.

अब मुझे लाखेरी छोड़े हुए लगभग सोलह साल हो गए हैं इसलिए वर्तमान व्यवस्था के बारे में मुझे पूरी जानकारी नहीं है. फेसबुक पर हमारे मित्रों द्वारों डाली गयी चित्रावली से मालूम हो रहा है कि ये स्थान आज भी गुलजार है. गुलजार रहना चाहिए. सभी मित्रों को शुभ कामनाएं.

पुन:श्च : मेरे इस लेख पर एक मित्र ने टिप्पणी करके बताया है कि जिला प्रशासन ने इस डैम को लाखेरी नगर पालिका को जीर्णोद्धार के लिए सौंप दिया था. तत्कालीन चेयरमैन स्वनामधन्य श्री महावीर गोयल ने इस कार्य योजना में व्यक्तिगत रूचि लेकर तत्कालीन  सांसद श्री रामनारायण मीणा से एक लाख रुपयों की आर्थिक अनुदान लेकर संपन्न कराया.
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मंगलवार, 11 अगस्त 2015

पैगाम - ३

हम इस देश के चौकीदार हैं, जन जन को बता दो;
न खाऊँ न खाने दूं के जुमले को अब धता बता दो.

     हमने महंगाई के आंकड़े को माइनस में दिखा दिया है,
     हमने सोने को चांदी के भाव बिकवा दिया है,
     हमने स्विस बैंक खंगाल लिए, काला कहीं नहीं मिला है,
     अब गंग-जमन में भी कहीं कोई गंदा नाला नहीं मिला है,
     फिर भी कहीं कोई गन्दगी मिलती है तो,
     जरूर बचे-खुचे कांग्रेसियों की करामात होगी.
इनको संसद के बाहर का रास्ता बता दो!
हम देश के चौकीदार हैं, जन जन को बता दो!

     हमने चीन, जापान और कुसतुन्तुनिया में झंडे गाड़ दिए हैं,
     ये दीगर बात है की हमारे कश्मीरियों ने तिरंगे फाड़ दिए हैं.
     हमारे छप्पन इंच के सीने को देखकर-
     दुनिया विश्वगुरू मानने को तैयार बैठी है,
     सीमा पर रोज मारे जा रहे हैं जवान-
     क्या करें? नाराज होकर तोपें खामोश बैठी हैं.
एक के बदले बीस ये जुमला था, सैनिकों को बता दो!
हम इस देश के चौकीदार हैं, जन जन को बता दो!

     नापाक पाक की ये हिमाकत कि लौटा दिए हमारे आम और मिठाई,
     खून का रिश्ता है, कैसे तोड़ दें एकाएक, मेरे भाई,
     ये बात इन दहशतगर्दों को बता दो,
     सजा तो अदालत देगी बीस साल बाद,
     हम अब भी खिलाएंगे बिरयानी नावेद को,
     ये उसके अब्बू और नवाज शरीफ को बता दो,
खता ये कि हमारी लोकशाही है बता दो!
हम इस देश के चौकीदार हैं जन जन को बता दो!

     हमने संसद में हुल्लड़ का नया ललित गेट खुलवा दिया,           
    हमने मध्यप्रदेश के व्यापम को व्यापक बना दिया,
     फिर भी अगर कोई नौजवान नौकरी को रोता है तो-
     उसे पच्चीस साल बाद का कोई अच्छा दिन बता दो.
उससे पहले कोई चमत्कार भी हो सकता है, उसे बता दो!
हम इस देश के चौकीदार हैं जन जन को बता दो!

     लोग खुशी खुशी सब्सिडी छोड़ रहे हैं
     हाँ, सांसद अभी भी गरीबी झेल रहे हैं
     डीजल-पेट्रोल आधे दाम पर बिक रहे हैं
     किसान अब खुश हैं कि जमीन अध्यादेश से ली जायेगी
     ये आत्महत्याएं जो इश्क की बदौलत हो रही हैं,
     उनका मातम मनाना अब  बंद करा दो.
मरने के बाद पेंशन पक्की है, ये बात किसानों को बता दो!
हम इस देश के चौकीदार हैं  जन जन को बता दो!

                    ***

रविवार, 9 अगस्त 2015

चुहुल - ७४

(१)
एक आशिकमिजाज लड़का अपने जिगरी दोस्त से बोला, यार, मुझे एक खूबसूरत लड़की से प्यार हो गया है, लेकिन परेशानी ये है कि वह शायद सुनती ठीक से नहीं है.
दोस्त ने पूछा, क्यों, कैसे पता चला?
लड़का बोला,  कल मैंने उसको आई लव यू बोला तो उसने पता नहीं क्या सुना, मुँह बिगाड़ कर कहने लगी, देख, ये सैंडल मैंने कल ही खरीदी है.

(२)
पत्नी 4G  मोबाईल फोन सामने रख कर पति से इठलाते हुए बोली, अजी, मैंने कल ह्वाट्सअप की पूजा रखी है. मेरी फ्रेंड्स कुछ ना कुछ गिफ्ट जरूर लायेंगी. मुझे रिटर्न गिफ्ट में उनको क्या देना चाहिए?
पति बोला, नए जमाने के साथ चलना चाहती हो तो उन सबको मेरा मोबाईल नम्बर दे देना। सब खुश हो जायेंगी.

(३)
एक आदमी बहुत ही धीरे धीरे पत्र लिख रहा था तो सामने बैठे व्यक्ति को अजीब लग रहा था. उसने पूछा, इतने धीरे क्यों लिख रहे हो?
वह बोला, भाई साहब, मैं अपने बेटे को लिख रहा हूँ. वह अभी बहुत छोटा है. जल्दी पढ़ नहीं सकता है इसलिए धीरे धीरे लिख रहा हूँ.

(४)
एक बन्दर पेड़ पर बैठा हुआ था. नीचे से एक मोटी बिल्ली भी चढ़ आई. बन्दर ने बिल्ली से पूछ लिया, तू पेड़ पर क्यों चढ़ी है?
बिल्ली बोली, सेव खाने के लिए.
बन्दर हंसते हुए बोला, पर ये पेड़ तो आम का है?
इस पर बिल्ली बोली, अरे बुद्धू, मैं सेव अपने साथ लेकर आई हूँ.

(५)
एक बुजुर्ग आदमी बहुत तेजी से अपनी कार चला रहा था. उसने बैक-व्यू मिरर पर देखा कि पुलिस की जीप उसका पीछा कर रही है तो उसने अपनी स्पीड १००-१२०-१४० तक बढ़ाकर भागने की कोशिश की. आगे जाकर उसने सोचा ज्यादा तेज भागने से दुर्घटना हो सकती है इसलिए कार साइड में लगाकर रोक दी. पुलिस इन्स्पेक्टर आया. उसने कार इतनी तेजी से चलाने का कारण पूछा और कहा, मुझे आपकी गाड़ी का चालान करना पड़ेगा, लेकिन अगर आप कोई वाजिब कारण बताएँगे तो मैं आपको छोड़ सकता हूँ.
बुजुर्ग बोला, सच तो ये है कि वर्षों पहले मेरी बीवी एक पुलिस वाले के साथ भाग गयी थी. मुझे लगा कि तुम उसे लौटाने के लिए आ रहे हो.
***

सोमवार, 3 अगस्त 2015

अंतरद्वंद

जिस तरह से आज हमारे देश में एक आतंकवादी की सजा-ऐ-मौत पर सर्वव्यापी वैचारिक द्वन्द उभर कर सामने आया है, उसमें राजनीति करने वाले नेताओं के निहित स्वार्थ हो सकते हैं, पर मेरे मन-मष्तिष्क में जो द्वन्द परेशान कर रहा है, वह मेरे घर के आँगन में घुस आये एक कोबरा सांप के बारे में है, जिसे कि मैंने अपने हाथों से मारा था.

मैं पहले साँपों से बहुत डरा करता था, लेकिन अपनी लम्बी सर्विस के दौरान राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित ए.सी.सी. कालोनी में अकसर साँपों से पाला पड़ता रहता था. वहां सांप घरों में भी घुस आया करते थे. उनको पकड़वाना या मार देना दो ही विकल्प होते थे. धीरे धीरे मेरा सर्पभय कम हो गया. बाद में डिस्कवरी चैनल पर कई बार साँपों/स्नेक पार्कों  के बारे में अनेक जानकारियाँ भी मिली. मुझे इन खतरनाक जंतुओं के व्यवहार जानना व देखना दिलचस्प लगता है. सारे सांप जहरीले नहीं होते हैं, सर्पों के विष से ही उसके बचाव की दवा एंटीवेनम बनाई जाती है. पर्यावरण के लिए भी सांपो का होना जरूरी है. फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले चूहों-कीटों को वे अपना भोजन बनाते रहते हैं.

संस्कृत भाषा में सर्प शब्द का शाब्दिक अर्थ तेज यानि द्रुत है. जिन लोगों ने नहुष राजा की पौराणिक कथा सुनी-पढ़ी है, उनको मालूम है कि इन्द्राणी के प्यार में पागल राजा नहुष को इन्द्राणी ने ऋषियों-मुनियों द्वारा उठाई गयी पालकी में बैठ कर आने को कहा तो उसने डोली उठा कर ले जा रहे लोगों की गति बढाने के लिए उन्हें सर्प-सर्प कह  करके दौड़ाया. परेशान होकर ऋषियों ने उसे श्राप दे दिया कि जा तू सर्प हो जा. इस तरह के अनेक गल्प हमारे प्राचीन साहित्य व धार्मिक पुस्तकों में हैं. शेषनाग की कल्पना, जिस पर धरती टिकी हुयी है, भगवान विष्णु के कमलासन के पीछे बहुमुखी सर्प का छत्र, देवों में महादेव शिव का नागेन्द्रहाराय होना, सर्पराज जन्मेजय तथा भगवतगीता में भगवान कृष्ण का कहना कि शेषनाग भी मैं ही हूँ”,  भागवत की कथा में शापित राजा परीक्षित को सर्प द्वारा काटने का सन्दर्भ, आदि बातें मेरे सनातनी मन पर पूज्य भाव रखती हैं, पर दरवाजे पर आये हुए इस कोबरा सांप को देख कर हिंसक हो जाना बिलकुल नया अनुभव था.

घटनाक्रम इस प्रकार है कि मैं वर्तमान में उत्तराखंड के भाबर क्षेत्र में स्थित  हल्द्वानी शहर के बाहरी इलाके में निवास करता हूँ. कहते हैं कि अनादिकाल से ही ये इलाका बिलकुल जंगल था. मच्छरों, शेरों व जहरीले सापों का अभयारण्य हुआ करता था. आज मच्छरों के विरुद्ध राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध जारी है, एवं शेरों को शिकारियों ने कम करके चिड़ियाघरों या पार्कों तक सीमित कर दिया है. अब बचे रह गए सांप हैं, जो अपने गहरे बिलों में छुपे रहते हैं. अभी भी घोड़ापछाड़, कोबरा, से लेकर अजगर तक यहाँ खूब पाए जाते हैं. जब बारिश का पानी इनके बिलों में भर जाता है, या गर्मी उमस बढ़ जाती है तो राहत के लिए ये बाहर निकल आते हैं. आमतौर पर अस्पतालों में जितने भी सर्पदंश के केस आते हैं, उनसे सिद्ध होता है कि टकराव की स्थिति में ही सांप डंक मारते हैं. अन्यथा वह बहुत डरपोक प्राणी होता है. कोबरा की पहचान उसके चपटे फन से होती है. ये बहुत जहरीला और लड़ाकू प्रवृति का होता है, पीछा भी करता है. यहाँ भाबर में ढाई फुट की लम्बाई वाली कोबरा सांप की प्रजाति को अढ़ाइया सांप भी कहते हैं.

अपने घर में मेरी सेवाओं में, दिन ढलने के बाद, रसोईघर के कूड़ेदान को बाहर आंगन के कोने में रखना भी शामिल है. मैंने बहार की लाईट जलाकर पीछे का दरवाजा खोला तो देखा नीचे साक्षात् सर्पराज फन उठाये हुए मेरे स्वागत के लिए तैयार बैठे थे. एक सिहरन सी बदन में उठी. मैं उसे अपनी नज़रों में रखना चाहता था इसलिए अपनी श्रीमती को आवाज देकर कोई डंडा लाने को कहा, पर मेरे घर में एक लोहे के पाईप के टुकड़े के अलावा कोई लंबा हथियार नहीं था. अत: श्रीमती ने बगल में पश्चिम की तरफ रहने वाले जोशी परिवार को आवाज दी. पंडित चंद्रबल्लभ जोशी एक पांच फुट लम्बे चार इंच चौड़े पतले पट्टे को लेकर आये. मैंने उनको वाकये से अवगत  कराकर दीवार के दूसरी तरफ जाकर प्रहार करने को कहा. वे बहादुरी के साथ गए भी, लेकिन सांप को देखकर बोले, मैंने कभी साप नहीं मारा है, मुझसे ये नहीं होगा।. (बाद में उनकी श्रीमती ने बताया की जोशी जी सापों से बहुत डरते हैं.) तब मैं स्वयं उनसे डंडा लेकर उस तरफ गया और पहले ही प्रहार में खड़े डंडे से उसकी कमर तोड़ दी, उसके बाद वह बहुत गुस्से में व्याकुल होकर अपना फन पटकता रहा. एकाएक उसका फन लकड़ी के नीचे आ गया, जिसे मैंने कुचल डाला. हल्लागुला सुनकर रात में सड़क पर घूमने वाले लोग, पड़ोसी, तमाशबीन जमा हो गए. मैंने अपनी बहादुरी को रंग देते हुए मृत सर्प को पूंछ से पकड़कर उठा लिया और सबके बीच होता हुआ सड़क मार्ग से जाकर नहर के पार फेंक आया.

मेरे ससुराल वालों के इष्ट देव धौलनाग (धवल नाग) हैं उनका भव्य मन्दिर विजयपुर,( कांडा ) में बना हुआ है. धपोलासेरा के धपोला लोग वहाँ के स्थाई पुजारी होते हैं. कूर्मांचल के इस क्षेत्र को नागभूमि के नाम से भी जाना जाता है. नागपंचमी पर समस्त क्षेत्रवासी बड़ी श्रद्धा से पूजा अर्चना भी किया करते हैं. ऐसे मैं, मेरे द्वारा एक नाग का मारा जाना वैचारिक द्वन्द पैदा कर गया कि क्या उसे मारना जरूरी था? उसका अपराध यही था कि वह गलती से या जानबूझ कर मेरे आंगन में आ गया था. भाग इसलिए नहीं पा रहा था कि चिकने फर्श पर उसकी सरपटता काम नहीं कर पा रही थी. परन्तु यह सत्य है कि अनजाने में अगर उस पर पैर पड़ जाता तो वह विषधर मेरा काम तमाम  कर सकता था. मैं पहले अकसर बिना लाईट जलाए भी भोजन के बाद रात्रि में आंगन में घूम लिया करता था, पर अब बहुत सावधान हो गया हूँ. लेकिन उसकी हत्या के अपराधबोध का अंतरद्वन्द मुझे नींद में भी परेशान कर रहा है.
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