शनिवार, 31 अगस्त 2013

कूचा पातीराम

इतिहास की कसौटी पर यह दृष्टांत कितना सत्य है, मैं कह नहीं सकता हूँ, पर मेरी छठी इन्द्रिय कहती है कि ये बात गलत नहीं हो सकती. मुझे ठीक से याद नहीं कि बचपन में कब और कहाँ मुझे इसका संज्ञान हुआ था.

पुरानी दिल्ली के सीताराम बाजार में एक कूचे (गली) का नाम ‘कूचा पातीराम’ है. ये पातीराम कौन थे? ये अमरता उनको कैसे प्राप्त हुई, इस बाबत कहा जाता है कि पातीराम एक वणिक व्यापारी थे. उनको बड़ी बड़ी ठोकरदार मूँछें रखने का शौक था. बात मुगलकालीन है, शायद दिल्ली के तख़्त पर तब बादशाह औरंगजेब थे.

एक दिन एक शाही दरोगा घोड़े पर सवार होकर उधर से गुजरा तो उसने देखा कि एक हिन्दू बनिया व्यापारी मूछों पर ताव देकर बैठा था. राजशाही के रौब में उसने पातीराम को मूँछ नीचे करने को कहा, पर पातीराम ने मूँछों को अपनी व्यक्तिगत सम्मान की बात कह कर उसका आदेश मानने से इनकार कर दिया.

दरोगा दूसरे दिन शाही फरमान लेकर पँहुच गया कि पातीराम को अपनी खड़ी मूँछों के लिए जजिया कर (टैक्स) की ही तरह मूँछ टैक्स देना होगा. वह निरंकुशता का ज़माना था. पातीराम ने शान के साथ टैक्स देना शुरू कर दिया. कई सालों तक वह ‘मूँछ टैक्स’ देता रहा. एक दिन उसने ये टैक्स देना बन्द कर दिया और अपनी मूँछें नीचे की ओर मोड़ दी.

भारतीय पुरुषप्रधान समाज में स्त्रियों को तब आज की तरह स्वतन्त्रता व बराबरी का दर्जा प्राप्त नहीं था. आज तो नारियाँ हर क्षेत्र में पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ी जा रही हैं. उनको वे सभी संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जो किसी पुरुष को प्राप्त हैं. जहाँ कहीं अशिक्षा, अज्ञान का अभी भी अन्धेरा है, वे अपवाद हैं. कहीं कहीं तो लड़कियाँ बुद्धिकौशल, तकनीकी सोच व प्रशासनिक योग्यता में पुरुषों से बहुत आगे निकल चुकी हैं. ये शुभ लक्षण कई पाश्चात्य देशों में काफी पहले दस्तक दे चुका था. मुगलकाल में बेटी पैदा होने पर लोग खुशियाँ नहीं मनाते थे. वे बेटियों को अपनी कमजोरी तथा दायित्व के रूप में देखा करते थे.

पातीराम ने टैक्स वसूलने वाले को बताया कि उसके घर में बेटी पैदा हो गयी है इसलिए अब वह अपनी मूँछ नीची करके ही रहेगा. यह बात जब बादशाह सलामत तक पहुँची तो उन्होंने कहा, “पातीराम की बिटिया की पूरी परवरिश शाही खजाने से होगी. पातीराम से कहो कि अपनी मूँछ ऊपर ही रखे. हम उसके ज़ज्बे और मूँछों की इज्जत करते हैं.”

इस प्रकार पातीराम को शाही इज्जत बख्शी गयी. मूँछ टैक्स वसूलना बन्द हो गया और जिस कूचे में उनकी दूकान थी, उसका नाम स्थाई रूप से ‘कूचा पातीराम’ पड़ गया.
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गुरुवार, 29 अगस्त 2013

साबूदाना

हमारे घरों में खासकर व्रत-उपवास के दिनों में साबूदाने की खीर, साबूदाने के पापड़, साबूदाने की खिचड़ी, यहाँ तक कि इसके मिक्चर में सेंधानमक डालकर स्वादिष्ट पकोड़े खाने का शौक बहुत से खाऊ लोग किया करते हैं. इसे शुद्ध फलाहार या शाकाहार के रूप में मान्यता मिली हुई है.

सच्चाई यह है कि साबूदाना एक कन्द कसावा (टेपीयोका) से बनाया जाता है, जो सागो ताड़ की तरह का पौधा होता है. मूलत: ये पूर्वी अफ्रीका में पाया जाता है. इसे पिछली सदी के चौथे दशक में तमिलनाडु व केरल में लाकर उगाया जाने लगा. और कुटीर उद्योग के रूप में साबूदाने का उत्पादन किया जाने लगा. वर्तमान में करीब एक हजार इकाइयां इस धन्धे में लगी हुई हैं.

कसावा के कंदों में भरपूर स्टार्च होता है. ये हल्के पारदर्शी भी होते हैं. इस कन्द से साबूदाना बनाने की प्रक्रिया बहुत अपवित्र होती है. क्योंकि कंदों को चार-पाँच महीनों तक सड़ाने के लिए कुंडों में डाला जाता है, स्वाभाविक रूप से इनमें मुर्दाखोर जैसे सफ़ेद लम्बे कीड़े हजारों की संख्या में पैदा हो जाते हैं. बाद में इस लुगदी को उन कीड़ों सहित पैरों से रौंदा जाता है. अब ये काम मशीनों से भी होने लग गया है. इस प्रकार ये गंदा पदार्थ छान लिया जाता है, और गरम नारियल के तेल में उसी प्रकार निकाला जाता है, जिस प्रकार बूंदी के लड्डुओं के लिए बूंदी छानी जाती है. फिर इस बूंदी को सुखाया जाता है. आकार व चमक के आधार पर अलग अलग पैकेट में पैक करके बाजार में भेजा जाता है.

इस लेख का उद्देश्य पाठकों को साबूदाने की असलियत बताने तक सीमित है. इसे खाने ना खाने का फैसला उन्हें खुद करना चाहिए, परन्तु इसे शाकाहारी पदार्थ मानना एक भ्रान्ति है.
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मंगलवार, 27 अगस्त 2013

बैठे ठाले - ७

एक आदमी अपने दोस्तों की महफ़िल में बोला, “मेरे पास बीस साल पुराना अचार रखा हुआ है.” इस पर एक दोस्त बोला, “कभी हमको भी चखाओ,” तो उसने उत्तर दिया, “ऐसे चखाते रहते तो ये बीस साल तक कैसे बचा रहता.”

मैं भी अपनी बात आपको बताना चाहता हूँ कि मेरे पास भी बीसवीं सदी का एक बाटा कम्पनी का बढ़िया जूता है जो पेरिस से खरीदा गया था. बढ़िया इसलिए है कि मैंने इसे एक ट्रॉफी की तरह संभाल कर रखा है.

हमारे देश में एक कहावत है कि ‘टाटा और बाटा को कभी भी घाटा नहीं होता.’ क्योंकि ये आम आदमी की जरूरत की चीजें बनाते हैं. ये आम आदमी भाई केजरीवाल वाला भी हो सकता है. कभी कभी आम आदमी भी खास बन जाता है.

हाँ तो मैं जूतों की बात कर रहा था... बाटा कम्पनी दुनिया के सवा सौ देशों में अपना कारोबार करती है. उसके कारखाने भी हैं और अपनी दुकानें भी. अब तो हमारे आगरा और कानपुर में बने स्थानीय जूतों पर बाटा का ठप्पा लगा माल भी तौल से मिल जाया करता है. बाटा ही क्या? अन्य नामी जूता कंपनिया भी अपना प्रोडक्ट ईनामी कूपनों के साथ बाजार में सेल लगाकर रखती हैं, जिनमें ऐक्शन, लिबर्टी, रिलैक्सो, पैरागॉन, रीबौक, लखानी ग्लाइडर्स, ला-बेला, तथा रेड चीफ जैसे महंगे व क्वालिटी जूतों का जोड़ा हर गली/बाजार में बड़े बड़े शोरूम्स से लेकर फुटपाथ तक पर विराजमान मिलता हैं. लेकिन आम आदमी की नजर से देखा जाये तो हमारे जोधपुरी-सफारी जूतों और देशी जूतियों का कोई मुकाबला नहीं है.

अगर आपने दिल्ली में लालकिले के अन्दर स्थित म्यूजियम अपनी आँखों से देखा हो तो मुगलकालीन शालीन जूते जरूर देखे होंगे. हैदराबाद के सालारजंग म्यूजियम हो अथवा मुम्बई-जयपुर के म्यूजियम हों, आपने पुराने बादशाहों के अमर जूतों के दर्शन अवश्य किये होंगे. जूतों/जूतियों के अतिरिक्त लेडीज चप्पलों सेंडलों की चर्चा ना की जाये तो जयललिता जी, मायावती बहन, तथा फिलीपीन्स की पूर्व राष्ट्रपति की पत्नी इमेल्डा मार्कोस नाराज हो सकती हैं, जिनके बगलों में आधुनिक कलात्मक पादुकाओं का संकलन हुआ करता है. वैसे किसी को क्यों बदनाम किया जाये, दस-बीस जोड़े तो आजकल आम आदमी भी समेट कर रखता ही है.

अपना देश प्राचीन सभ्यता वाले देशों में एक प्रमुख देश है. यहाँ के धार्मिक लोगों ने अभी तक मथुरा में कृष्ण भगवान के तथा अयोध्या में रामचंद्र जी की  खड़ाऊ संभाल कर रखे हैं. उनकी देखा देखी महात्मा गाँधी जी की चप्पलें तथा नेहरू जी व शास्त्री जी के प्रेरणादायक जूते-चप्पल भी भावी पीढ़ियों के लिए हिफाजत से रखे गए हैं.

अब बात आ ही गयी है तो एक प्री-पौराणिक काल की बात भी बता देता हूँ. ये मुझे अपने बचपन में ही किसी बड़े आदमी ने सुनाई थी. (अफ़सोस कि अब मैं उनका नाम पता भूल गया हूँ.) एक राजा था. वह जरूर कहीं आर्यावर्त  में ही होगा. तब सीमेंट, डामर या रबर की बनी सडकों की कल्पना भी नहीं थी. यहाँ तक कि सूती व रेशमी कपड़ों का ईजाद भी नहीं हो पाया था. जानवरों की खाल के ही आवरण पहने जाते थे. सब नंगे पैर चलते थे. फिर भी राजा तो राजा ही होता है. एक दिन रास्ते में घूमते हुए उसके नरम पैरों में कंकड़ और कांटे चुभ गए. उसने अपने दरबारियों को आदेश दे दिये कि सड़कों में सब तरफ चमड़ा बिछा दिया जाये. राजा का हुक्म बड़ा कठोर था. समस्या ये थी कि इतना सारा चमड़ा लाया कहाँ से जाये. इस बारे में बहुत सोच विचार हुआ, तो एक व्यक्ति ने हिम्मत करके सुझाव दिया कि ‘सड़कों पर चमड़ा बिछाने के बजाय राजा जी के पैरों को चमड़ा लपेट दिया जाये.’ ये क्रांतिकारी विचार राजा जी को भी पसन्द आ गया.

इस प्रकार जूते का बुनियादी आविष्कार हो गया. और आज सारी दुनिया में किस्म किस्म के जूते घरों/ बाजारों में भरे पड़े हैं. शौकीन अथवा अमीर लोगों की बात की जाये तो उनके जूतों के शौक निराले होते हैं. आम लोग भी अब अलग अलग मौकों पर अलग अलग जूते पहनने लगे हैं. शादी वाले जूते, घूमने वाले जूते, खेलने के जूते, पीटी परेड के जूते. पानी में चलने वाले जूते, नहाने के जूते, नाचने के जूते, और अगर खाने के जूतों की बात ना की जाये तो ही अच्छा रहेगा.

अब कंकर और कांटे गुजरे जमाने की चीजें हो गयी है. आम आदमी फोम वाले जूतों की चाहत रखता है. पलना के बच्चे से लेकर स्कूल टाइम तक के जूतों के डिजायनों के क्या कहने हैं. लेकिन आजकल चायना के नक्कालों ने सस्ते व अल्पायु वाले गत्ते, प्लास्टिक, रैक्सीन अथवा नकली चमड़े के जूते बाजारों में ठेल कर जूता बाजार की ऐसी की तैसी कर दी है.
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रविवार, 25 अगस्त 2013

चुहुल - ५७


(१)
मेट्रो ट्रेन में सफर के दौरान एक साहब की जेब में एक जेबकतरे ने हाथ डाल दिया. साहब को मालूम पड़ गया और उन्होंने उसका हाथ दबोच लिया; गुस्से में बोले, “चोर, बदमाश, सरेआम जेब में हाथ डाल रहा है, तुझे शर्म भी नहीं आई?”
इस पर जेबकतरा बोला, “साहब जी, शर्म तो आपको आनी चाहिए, जेब में एक रुपया भी नहीं है.”

(२)
एक मीटिंग हॉल में कई लोग बैठे थे. किसी विषय पर बहस चल रही थी. एक व्यक्ति उठकर बार बार परेशान सा टॉयलेट की तरफ जाकर आ रहा था. बगल में बैठे दूसरे व्यक्ति ने उसकी परेशानी भांपते हुए कहा, “क्या भाई साहब चैन नहीं है क्या?”
वह बोला, “चेन तो है पर खुल नहीं रही है.”

(३)
एक चुहिया अपने बच्चों के साथ घास में छुप कर धूप सेक रही थी. इतने में एक बिल्ली कहीं दूर से आती हुए मालूम हो गयी. चुहिया के एक सयाने बच्चे ने फ़ौरन कुत्ते की आवाज "भों-भों" निकालनी शुरू कर दी, जिसे सुनकर बिल्ली दुम दबाकर भाग खड़ी हुई.
तब चुहिया ने खुश होकर कहा, “एक से ज्यादा भाषा सीखने का ये फ़ायदा होता है.”

(४)
एक भला आदमी किसी सिद्ध महात्मा जी के पास जाकर बोला, “बाबा जी मेरी पत्नी बहुत बदमिजाज और गुस्सैल है. उसका कोई इलाज बताइये.”
महात्मा जी ने उसको नीचे से ऊपर तक निहारा फिर बोले, “इसका इलाज मेरे पास होता तो मैं सन्यासी क्यों बनता.”

(५)
अध्यापक – ये बताओ, बिजली कहाँ से आती है?
विद्यार्थी – मेरे मामा जी के घर से आती है.
अध्यापक – क्या मतलब मैं समझा नहीं?
विद्यार्थी –जब बिजली जाती है तो मेरे पापा बोलते हैं, "सालों ने फिर बिजली बन्द कर दी है."

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शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मकई

जिस प्रकार लाखों करोड़ों वर्षों की विकास यात्रा करते हुए हम प्राणी लोग आज की स्थिति में पहुँचे हैं, उसी प्रकार पृथ्वी पर पाई जाने वाली तमाम वनस्पतियाँ भी विकास के प्राकृतिक दौर से गुजर कर आई हैं.

मकई अथवा मक्का से आज विश्व के दो तिहाई आबादी का भोजन बनता है. इसकी अनवरत विकास यात्रा के बारे में शोधकर्ताओं ने इसके आनुवंशिक यानि जेनेटिक अध्ययनों में पाया है कि ये मूल रूप से अन्य अनाजों की ही तरह एक जंगली ग्रासमी पौधे (घास) का फल/बीज है. मनुष्य ने इसकी खेती करना सीख लिया. इसकी प्रजातियों में देश-काल, खाद-मिट्टी के अनुसार स्वाद और दानों के रंगों में थोड़ी बहुत भिन्नता होती रही है. अब वैज्ञानिक तरीकों से इसकी हाईब्रिड किस्मों की फसल उगाई जाती है.

मकई बहुत ठन्डे इलाकों को छोड़कर सभी समशीतोष्ण प्रदेशों में उगाया जाता है. दोमट मिट्टी में इसकी अच्छी पैदावार होती है. हमारे देश में मकई मुख्यत: वर्षा ऋतु शुरू होने पर बोई जाती है. बढ़िया बात ये है कि सिर्फ तीन महीनों में इसकी फसल तैयार हो जाती है. इसके पौधे में बढ़त तब होती है, जब रात और दिन का गरम तापमान एक सा रहता है. इसे खूब पानी चाहिए. मकई का पौधा ज्वार-बाजरे जैसे लम्बे पत्तों वाला चार से दस फुट ऊंचा हो सकता है. ये एकलिंगी पौधा होता है जिस पर नर-मादा दोनों ही पुष्प आते हैं. ऊपर जो बालडी निकलती है, वह नर पुष्पों का गुच्छा होता है और भुट्टे तने के बीच में पत्तों वाले जोड़ों पर निकलते हैं. जिनके सिरे पर पतले बालों के सामान बालियां निकलती हैं, जो मादा कोशिकाएं होती हैं. इन्ही से परागण होता है. ये बालियाँ बहुत संवेदनशील होती हैं. एक पौधे पर उसकी खुराक के आधार पर तीन चार भुट्टे आते हैं.

इतिहास बताता है कि सर्वप्रथम मध्य अमेरिका के मेक्सिको प्रदेश में लगभग दस हजार वर्षों से पहले से मकई की उपस्थिति थी. प्राचीन इन्का और माया सभ्यताओं के अवशेषों में भी मकई के नामोनिशान मिले हैं. ये तब भी मुख्य भोजन रहा होगा.

दुनिया में आज लगभग दो तिहाई आबादी का मुख्य भोजन मकई आधारित है, और सारी दुनिया में कुल जितना मक्का पैदा होता है उसका मात्र १.५% ही भारत में होता है. आदिवासी इलाकों में ये खूब उगाई जाती है. इसके पौधे से भुट्टा प्राप्त करने के अलावा जानवरों का चारा भी मिलता है. गाय-भैसें इसकी कुट्टी को बड़े चाव से खाते हैं. ये पोषक तत्वों से भरपूर होता है. सूखे पत्तों का कागज़/गत्ता भी बनाया जा सकता है.

पहले समय में मक्का को गरीबों का भोजन कहा जाता था, पर अब गरीब अमीर सभी इसके उत्पादों को अनेक प्रकार से उपयोग में लाते हैं. भुट्टों को आग में सेक कर स्वाद के साथ खाया जाता है. साबुत दानों को भून कर पॉपकॉर्न एवं कॉर्नफ्लेक्स बनता है. भुट्टों को नमक के पानी में उबाल कर भी खाया जाता है. मकई के आटे की रोटी, बिस्किट, कुरकुरे, दलिया, खिचड़ी, पिज्जा, केक आदि अनेक प्रकार के व्यंजन विश्व के विभिन्न देशों में वहाँ के भोजन की आदतों के अनुसार बनाये व खाए जाते हैं. बेबी-कॉर्न का सूप भी कुछ लोग पसन्द करते हैं. हमारे पंजाब में ‘मक्के दी रोटी और सरसों दा साग’ सर्वविदित स्वादिष्ट भोजन होता है.

मकई के बहुत से औद्योगिक उत्पाद भी बनाए जाते हैं जैसे ग्लूकोज, रेसिन, प्लास्टिक, शराब आदि. मक्के की खली से जानवरों के लिए पौष्टिक चारा व मुर्गियों के लिए दाना तैयार किया जाता है.

मनुष्यों के स्वास्थ्य के लिए मकई बहुत गुणकारी है. इसमें विटामिन ए और ई पाया जाता है, और लाइसीन नामक पाचक पदार्थ होता है. चूँकि ये मोटे अनाजों की श्रेणी में है, इसमें फाइबर बहुत होता है. यह आँतों में से वसा और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है, जो वहाँ जमी रहती हैं. हानिकारक कोलेस्ट्रोल को घटाता है. पिताश्मरी को मारता है. मूत्र-पथ के संक्रमण और सूजन को दूर करता है. कब्ज का निवारण करता है, और इसमें जो ग्लूटैनिक ऐसिड होता है, वह शरीर के ऊतकों की उम्र बढ़ाने में सहायक होता है.

इस प्रकार मकई हमारे लिए बहुत लाभकारी है. हाँ दांतों की हिफाजत करने के लिए सख्त दानों को चबाने से परहेज करना आवश्यक है.
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बुधवार, 21 अगस्त 2013

उत्तराखण्ड का रक्षाबंधन

उत्तराखण्ड में श्रावणी पूर्णिमा को जनेऊ पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस दिन यजुर्वेदी द्विज लोगों का उपक्रम होता है उत्सर्जन, स्नान, तर्पण और उसके बाद नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है. ये ब्राह्मणों का सर्वोपरि त्यौहार माना जाता है. पुरोहित लोग अपने यजमानों को यज्ञोपवीत देते हैं, रक्षा सूत्र (कलेवा) हाथ में बाँधते हैं और यजमानों से दक्षिणा प्राप्त करते हैं. रक्षासूत्र बाँधते समय निम्न मन्त्र पढ़ा जाता है:

येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वां प्रतिबद्धनामि, रक्षे मा चल मा चल.

इसका हिन्दी भावार्थ है, ‘जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवों के राजा बलि को बांधा गया था उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूँ. तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित मत होना.’

राखी का इतिहास भविष्य पुराण में इस प्रकार मिलता है कि एक बार असुरों के आतंक से घबरा कर देवराज इन्द्र अपने गुरू बृहस्पति के पास गए. इन्द्राणी भी उनके साथ थी. उसने उनकी वार्तालाप सुनी और बाद में खुद रेशम की डोरी को अभिमंत्रित करके अपने पति की कलाई में बाँध दिया, इससे देवराज अपने युद्ध में विजयी रहे. संयोग से वह श्रावणी पूर्णिमा का दिन था.

अन्य पौराणिक ग्रंथों में भी अनेक जगह इसी प्रकार के सन्दर्भ हैं, जहाँ रक्षा सूत्र अभिमंत्रित करके पात्रों की कलाई पर बांधा जाता था. मध्ययुगीन इतिहास में राजपूत राजा-महाराजाओं तथा रानियों के बारे इसी तरह के आख्यान हैं, जिनमें सहायता/रक्षा का भरोसा लेकर बहन बनकर राखियां बांधी/भेजी जाती थी. कुछ उदाहरण मुसलमान बादशाहों के पास भी भेजने के भी उल्लेखित हैं.

वर्तमान में इसे शुद्ध रूप से भाई-बहन के प्यार के रिश्ते के रूप में स्थापित कर दिया गया है. इसमें हमारी हिन्दी फिल्मों का विशेष योगदान है. इसी सन्दर्भ में पूरी फ़िल्में भी बनी हैं जो कि मनभावन गीत-संगीत से भाई-बहन के प्यार को जीवंत करती है.

संचार माध्यमों तथा स्कूलों में पठन-पाठन सामग्री में भी रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते पर मनाया जाने वाला उत्सव हो गया है. इसका प्रभाव उत्तराखण्ड के दूर दराज के इलाकों में भी देखने को मिलने लगा है. पिछली सरकारों से जनभावना का दोहन करने के लिए रक्षाबंधन के दिन सरकारी बसों मे महिलाओं की यात्रा नि:शुल्क कर दी थी.

इस बार अतिवृष्टि से जो त्रासदी उत्तराखण्डवासियों ने झेली है, उसके घाव लम्बे समय तक नहीं भर पायेंगे. हालाँकि दस्तूरन सब कुछ हो रहा है, पर अभी सैकड़ों घरों में दु:ख और मायूसी की छाया पसरी हुई है.

इस अवसर पर मैं भी उन सभी लोगों को हृदय से धन्यवाद और शुभकामनाएँ देना चाहता हूँ, जिन्होंने उत्तराखण्ड के पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक योगदान किया है.
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सोमवार, 19 अगस्त 2013

यादों का झरोखा - २

स्व. श्री सुवालाल व्यास के पिता का नाम श्री मूलचंद व्यास था. पुराने लोग बताते थे कि सभी उनको बोहरा जी सम्बोधित करते थे. बोहरा उनको इसलिये कहा जाता होगा कि वक्त जरूरत वे परिचितों को ब्याज पर रुपया उधार दिया करते होंगे. उनका गाँव भगवतगढ़ राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले में पश्चिम की तरफ अरावली पर्वतमाला की गोद में बसा है. कहते हैं कि पहले समय में लोगों का एक अन्धविश्वास था कि ये गाँव ‘खोड़ला’ था, और सुबह सवेरे इसका नाम ले लो तो दिन भर खाना नसीब नहीं होता था. खाना क्या पानी भी भी मुश्किल से मिल पाता था.

परन्तु ये सब अब से ८०-९०  वर्ष पुरानी बातें हैं. तब गाँव में न पक्की सड़क थी और न बिजली. लाल पत्थरों से बनी एक दो-तीन सौ वर्ष पुरानी चौकोर बावड़ी थी, जो गर्मियों में लगभग सूख जाती थी. बाहर दूर गाँव के कुओं से चरी-मटके भर कर पानी लाना पड़ता था. होने को एक बड़ा तालाब भी बुजुर्गों ने कभी खोद कर बनाया था, जिसमें बरसात का पानी फागुन-चैत के महीनों तक ही चल पाता था. इसलिए मवेशी पालना भी दुरूह हो जाता था. लेकिन अब तो गाँव का कायाकल्प हो गया है. भगवतगढ़ एक चमन है. नलकूप हैं, लहलहाते खेत है, पक्की सड़कें हैं, सुन्दर पक्के मकान हैं. आने जाने के निजी और सरकारी साधन हैं.

पहले से यहाँ गाँव में ब्राह्मण, बनिया, कोली, तेली, गूजर, कुम्हार, सुनार, चर्मकार आदि सभी जातियों के लोग रहते थे. आवश्यकताएं बहुत सीमित हुआ करती थी. दो जोड़े कपड़ों से गुजारा हो जाता था. खेत थे, पर सारी जमीन ऊसर थी. केवल बरसाती फसल हो पाती थी. जिसमें मक्का, ज्वार, बाजरा, तिल आदि मुख्य फसल होती थी. जाड़ों मे बिना पानी वाली सरसों, धनिया, अलसी की फसल ली जाती थी, पर यदि किन्ही वर्षों में इंद्र देव की कृपा नहीं हुई तो सब तरफ उदासी रहती थी. बावड़ी के पास एक शिव मन्दिर सबकी आस्था का केन्द्र रहा, वहीँ पर पीपल, कैत और धोकड़े के पेड़ भी थे. कुल मिलाकर एक सिमटी हुई अभावग्रस्त दुनिया रही होगी.

एक बार लंबे समय तक सूखा पड़ गया था. गाँव के पुरुष काम-धंधे की तलाश में सवाईमाधोपुर शहर अथवा जयपुर की तरफ निकल पड़े. बोहरा जी अपने दो तीन साथियों के साथ पड़ोसी जिले बूंदी स्थित लाखेरी ए.सी.सी. के सीमेंट कारखाने में पहुँच गए, जहाँ मजदूरों की कमी रहती थी क्योंकि लोग कारखानों में काम करने में बहुत डरा करते थे. आज सुनने में अजीब लगता है कि तब प्रतिदिन मजदूरी दो आने - चार आने हुआ करती थी.

कुछ समय बाद, एक दिन मूलचंद बोहरा कम्पनी के रेलवे यार्ड में इंजन की चपेट में आ गये और बौराणी माँगी बाई और उनके छ: साल के बेटे को अनाथ छोड़ स्वर्ग सिधार गए. तब मुआवजे के आज के जैसे कानून नहीं थे, पर मैनेजमेंट ने अपने सिविल डिपार्टमेंट में मांगी बाई को बतौर कुली-मजदूरनी नौकरी दे दी. सिविल डिपार्टमेंट में पहले से कुछ सधवा-विधवा महिलायें काम करती थी, उनमें बौराणी भी शामिल हो गयी. क्योंकि उनके पास जीविकोपार्जन का कोई विकल्प नहीं था. उसका बच्चा पूरी तरह उसी पर आश्रित था. कुछ सालों तक फैक्टी गेट पर क्रेच (शिशु सदन) में खेलता रहा. कुछ बड़ा हुआ तो उसे ऑफिस में बाबू लोगों को पानी पिलाने के काम पर लगा दिया गया. और जब वह बालिग़ हुआ तो उसे भी बतौर चपरासी पक्की नौकरी पर रख लिया गया.

माँ-बेटा दोनों नौकरी करते थे. कम्पनी द्वारा प्रदत्त छोटे से मजदूर आवास में रहते थे. इस बीच कितना सहा, कैसे वे कठिन दिन काटे, इसका हिसाब उन दोनों के दिलों में रहा है.

श्रीमती माँगी बाई कम्पनी के नियमानुसार ६० वर्ष की उम्र तक नौकरी करके रिटायर हुई. उसका बेटा एक सतगुरु के सानिध्य में रात्रि कक्षाओं में  पढ़ता भी रहा, और एक दिन मैट्रिक पास होकर उसी ऑफिस में क्लर्क बन गया, जिसमें वह छुटपन में मेजों के नीचे से घुस कर बाबू-अफसरों को पानी पिलाया करता था. उसे बाबू लोगों की कॉलोनी में बड़ा आवास मिल गया. सीमेंट कामगारों के लिए बने वेतन आयोगों का लाभ भी मिला. कार्यदक्षता व मेहनत के परिणामस्वरूप वेतन के ग्रेडों में पदोन्नत भी होता रहा. विवाह हुआ चार बेटों व दो बेटियों का पिता भी बना. सदगुरू ने उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी जोड़ दिया, जिससे उसके व्यक्तित्व में निखार आ गया. उसे आदर्शवादी व्यक्ति के रूप में पहचान मिल गयी. विशिष्ट बात ये भी थी कि वह एक समर्पित मातृभक्त पुत्र था. रुग्ण माँ की उसने बहुत सेवा की. जब से समर्थ हुआ एक गाय भी नियमित दूध के लिए पाली. इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तपस्या में उसकी धर्मपत्नी धापू बाई का भी पूरा योगदान रहा. माँ अपनी पूरी उम्र पाकर, आठवें दशक में स्वर्ग सिधार गयी. और सुवालाल व्यास जी कम्पनी में ४७ साल की नौकरी का प्रमाणपत्र लेकर रिटायर हुए.

वे एक बार ३ वर्ष के सेशन में कर्मचारी युनियन में क्लेरिकल स्टाफ का प्रतिनिधि चुनकर मेरे साथ सहायक के रूप में रहे, तब देश में आपातकाल की छाया थी. मैंने साथ रह कर देखा कि वे एक साहसी, कर्मठ व सच्चे इन्सान थे. उनकी हिन्दी और अंग्रेजी दोनों की लिखावट इतनी आकर्षक व सुन्दर होती थी कि देखते ही बनती थी.

बहुत वर्ष पहले सन १९६५ में जब अपनी कोऑपरेटिव सोसायटी का अवैतनिक जनरल सेक्रेटरी हुआ करता था, तब उनको कुछ लेजर का काम ठेके पर दे रखा था. इसी काम के सम्बन्ध में हम एक बार झगड़ पड़े थे. इसका उन्हें भी और मुझे भी बाद में वर्षों तक बहुत अफसोस रहा था.

आपातकाल के दौरान, मैनेजमेंट बहुत शक्तिशाली हो गया था. युनियन के अधिकारों पर अंकुश लगा दिये गए थे. इसलिए कई बार टकराव भी हुए. वह कहा करते थे, “मैनेजमेंट से रिश्ते इतने खराब कर लिए हैं कि अब हमारे बच्चों को इस उद्योग में प्रवेश नहीं मिलेगा,” पर उनके जीते जी उनके तीन बेटे अपनी योग्यता के बल पर इसी उद्योग में अन्यत्र सुपरवाइजर के पदों पर कार्यरत हों गए. चौथा रामू भाई व्यास फेसबुक पर मेरा मित्र बन गया है. वह अच्छा फोटोग्राफर है. अपनी खेती बाड़ी का काम संभालता है. माँ उसी के साथ रहती है. उनके  अपने घर का नाम खुद व्यास जी ने  ‘लाखेरी सदन’ रखा है, जो भगवतगढ़ का एक आकर्षण है.

मेरे मित्र सुवालाल व्यास जी जो अपने को च्यवन ऋषि के वंशज बताते थे, अब इस दुनिया में मौजूद नहीं है, पर उनकी स्मृतियां अभी भी मौजूद हैं.
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शनिवार, 17 अगस्त 2013

बात पते की

कभी बहू रानी बीमारी का बहाना बनाए, कभी सचमुच बीमार हो जाये, कभी वह बुढ़िया सास के सामने महंगाई और घर के खर्चों का रोना रोये, कभी बेटा ड्यूटी से घर आये और गंभीर मुद्रा में रहे, माँ बाप से बात ना करे, मुँह चुराए, लेकिन आपस में खुसरपुसर बातें करें, तो दिनेशचन्द्र उप्रेती को बड़ी कसक होने लगती. उनको ऐसा लगने लगा कि रिटायरमेंट के बाद बेटे के साथ रहने का उनका इरादा एक गलत निर्णय तो नहीं था. दिल की इस उलझन को किससे कहते? ले देकर साथ के लिए, उनकी इकलौती कमजोर पत्नी है, जो पूरी तरह उन्हीं पर आश्रित रहती है.

दिनेशचन्द्र उप्रेती तीन साल पहले बैंक की अपनी नौकरी से रिटायर हो गए थे. उनका बड़ा बेटा प्रवीण उत्तराखंड सरकार के विद्युत निगम में जूनियर इंजीनियर लग गया था और देहरादून में कार्यरत था. उसे अच्छा वेतन मिल रहा था. छोटा बेटा नवीन रिलायंस कम्पनी में बतौर सेल्स ऑफिसर महाराष्ट्र के पूना शहर में नौकरी कर रहा था. वे खुश थे कि दोनों बेटे उनके रिटायर होने से पहले ही व्यवस्थित हो गए हैं.

दिनेशचंद्र उप्रेती मूल रूप से बागेश्वर जिले के कपकोट के पास एक गाँव के रहने वाले हैं. अब से ४० साल पहले हाईस्कूल पास करने के बाद उनके पास अपने कैरियर के सम्बन्ध में दो तीन विकल्प थे-- फ़ौज में भर्ती हो लिया जाये, या बीटीसी/ एचटीसी ट्रेनिंग करके टीचर बना जाये, अथवा प्लेन्स की तरफ निकल कर कोई नौकरी खोजी जाये. उन दिनों नौकरियों की भरमार थी सो एक रिश्तेदार के सहारे दिल्ली होते हुए जयपुर पहुँच गए, जहाँ एक प्राइवेट बैंक में क्लर्क की नौकरी पा गए. कुछ बर्षों के बाद इस बैंक का राष्ट्रीयकरण हो गया था. जीवन की गाड़ी एक सुनिश्चित पटरी पर चल पड़ी थी. पहाड़ से शादी कर लाये. समयांतर पर दो बेटे भी हो गए. दो-तीन साल में शहर-शहर, गाँव-गाँव स्थान्तरण होता रहा, लेकिन अपने लिए घर बनाने खरीदने का कोई ख़याल नहीं आया क्योंकि वे समझते थे कि आखिर में अपने गाँव को ही लौटना है. जब तक माँ-बाप मौजूद थे, आना जाना भी होता था, लेकिन वर्ष बीतने के साथ साथ भविष्य के बारे में समीकरण बदलते रहे. बेटों को अपनी औकात से अधिक उच्च शिक्षा दिलाई. वे नौकरी पर लग गए. कुल मिलाकर पूर्ण संतुष्टि थी.

एक वैवाहिक विज्ञापन के माध्यम से प्रवीण की शादी हल्द्वानी में बसे हुए एक तिवारी परिवार में हो गयी. तिवारी जी आर्मी के रिटायर्ड कैप्टन हैं. रहने वाले तो वे भी रानीखेत इलाके के हैं, पर समय रहते उन्होंने हल्द्वानी के आउटस्कर्ट में एक बीघा जमीन खरीद ली थी, और यहीं बस गए हैं. उन्होंने अपनी इस इकलौती बेटी को खूब स्त्री-धन, दान-दहेज के साथ घर बनाने के लिए अपनी जमीन में ही एक प्लॉट दे दिया. उप्रेती जी को जैसे बिना मांगे मोती मिल गये. उस प्लाट पर उन्होंने एक साल के अन्दर मकान बनवाकर अपने बुढ़ापे की रिहायश का इन्तजाम कर लिया. मकान बनाने में अपनी सारी जमापूंजी लगा दी. फ़िक्र यों नहीं थी कि वे खुद पेंशनर थे ही, वे दोनों बेटों को अपने दो बटुवे कहा करते थे. प्रवीण ने जुगाड़ करके अपना हेडक्वार्टर हल्द्वानी ही करा लिया तो जिंदगी और भी आसान हो गयी.

दिनेशचंद्र उप्रेती का पहाड़ लौटने का अब कोई इरादा नहीं रहा क्योंकि हल्द्वानी ऐसा शहर है, जहाँ जीवनोपयोगी सभी सुविधाएँ तत्काल उपलब्ध रहती हैं. जबकि पहाड़ के गाँवों में अभाव-अभियोग बहुत हैं. अब समय भी बहुत बदल गया है. जीवन में हाईटेक आदतें हो गयी हैं. कहते हैं कि अब वहां शुद्ध हवा और पानी के अलावा कुछ भी आसानी से उपलब्ध नहीं रहा है. बंदरों और जंगली सूअरों से तंग आकर लोगों ने खेती करना भी छोड़ दिया है. अधिकाँश मेहनतकश लोग तराई-भाबर की तरफ पलायन कर गए हैं. लोगों ने दूध के लिए जानवर पालने बन्द कर दिये हैं. पाउडर का दूध मिलने लगा है. शाक-सब्जी, राशन सब हल्द्वानी से ही सप्लाई होता है. यह सब सुनने में अजीब सा लगता है, लेकिन कड़ुआ सच है कि वहाँ लोगों की जीवनशैली बदल गयी है.

उप्रेती जी को छोटे बेटे की शादी करनी है, लेकिन यहाँ घर में अन्दर ही अन्दर जो खिचड़ी पक रही है, उससे वे बहुत तनावग्रस्त रहने लगे हैं. एक दिन सहज में ही उन्होंने प्रवीण से कह डाला, “मुझे तो यहाँ टेंशन होने लगा है.”

प्रवीण ने कोई लाग-लपेट या लिहाज किये बगैर बेरुखी से जवाब दिया, “अगर यहाँ टेंशन होता है तो आपके पास और भी ठिकाने हैं. जहाँ टेंशन ना हो, वहाँ रहिये.” ये सुनकर उप्रेती जी सन्न रह गए. उनको लाड़ले बेटे से ये उम्मीद कतई नहीं थी. प्रवीण सचमुच उनका नहीं रहा. प्रमाणित घरजंवाई नहीं होते हुए भी वह ससुरालियों का हो गया था. जब तक बात ढकी हुई थी, सब चल रहा था, पर अब एकाएक बेटे के व्यवहार ने उनको अन्दर तक घायल कर दिया.

उप्रेती जी ने यथास्थिति फोन करके छोटे बेटे नवीन को बता दी. नवीन ने तुरन्त सलाह दी कि “हल्द्वानी में या रुद्रपुर में आसानी से मकान किराए पर मिल जाते हैं. आप तनावमुक्त होकर अपना अलग बसेरा कर लें. मैं जल्दी छुट्टी लेकर आता हूँ और एक फ़्लैट खरीद दूंगा.”

नवीन की बातों से उनको बहुत बल और सान्त्वना जरूर मिली, पर वे सोचने को मजबूर हो गए कि जिंदगी में गलती कहाँ हो गयी कि आज ये दिन देखना पड़ रहा है? उनको याद आ रहा है कि रिटायरमेंट पर विदाई के दिन उनके अनुभवी बॉस ने उनसे एक पते की बात कही थी, “रिश्ते कई बार बदल जाते हैं... पर रुपया बड़े काम की चीज है. सारा खर्च मत कर देना... कुछ अपनी मुट्ठी में जरूर रखना.”
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गुरुवार, 15 अगस्त 2013

मुझे आजादी चाहिए

रौशन बड़ा किस्मत वाला है. किस्मतवाले बच्चे ऐसे घरों व ऐसी जगहों में पैदा होते हैं, जहाँ उन्हें सारी नियामतें नसीब रहती हैं.

पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के संधिस्थल दिल्ली गेट के बहुत नजदीक आसिफ अली रोड पर उसके अब्बू का एक शानदार घर है. घर के बहुत से खंड हैं. निचले हिस्से में दुकानों के शोरूम हैं. सड़क के उस पार रामलीला मैदान है, जिसमें उसने शैशव से ही अनेक लीलाएं देखी हैं. अकसर बड़ी बड़ी रैलियां इस मैदान में हुआ करती हैं. पिछले कुछ वर्षों में जो भी राजनैतिक रैली हुई, उसमें भ्रष्टाचार पर बहुत लम्बे चौड़े भाषण व नारेबाजी होती रही है, पर रौशन तो अभी बच्चा है, उसकी समझ में कुछ नहीं आता है.

उसने एक बार अब्बू से पूछा था, “ये भ्रष्टाचार क्या होता है?”

अब्बू ने बस ये कहा, “बेईमानी से रुपया कमाया जाये तो उसे भ्रष्टाचार कहते हैं.”

उसने फिर से पूछा था, “बेईमानी क्या होती है?” तो अब्बू ने जवाब में कहा, “अब जब तुम बड़े हो जाओगे तो सब समझ में आ जाएगा. अभी तुम अपनी पढ़ाई में ध्यान रखो.”

रौशन के अब्बू सी.पी.डब्लू.डी. में चीफ इंजीनियर हैं. उनको अपने बेटे का इस प्रकार प्रश्न करना बिलकुल अच्छा नहीं लगा क्योंकि आज तमाम नौकरशाही और राजनीति करने वाले लोगों की बुनियाद में भ्रष्टाचार का ही गारा लगा हुआ है. वे खुद भी इससे बाहर नहीं हैं.

रौशन डी.पी.एस. में आठवीं कक्षा में पढ़ता है. उसे देश में चल रहे हल्ला-गुल्ला की थोड़ी समझ होने लग गयी है, पर वह तो सुविधाभोगी परिवार का वारिस है इसलिए अभाव क्या होते हैं वह बिलकुल नहीं जानता. तभी तो वह किस्मत वाला है.

दिल्ली देश का दिल है. दिल के बीचोंबीच वह रहता है. दिल्ली गेट कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है. आसिफ अली रोड की शुरुआत पर स्वतन्त्रता सेनानी आसिफ अली की काँस्य मूर्ति लगी हुई है. इनकी पत्नी अरुणा आसिफ अली ने सन १९४२ के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय मुम्बई के आजाद मैदान में जबरदस्ती से तिरंगा फहराया था. सामने लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल है. इसका पुराना नाम इर्विन अस्पताल था. १९७० के दशक में देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनैतिक आन्दोलन की अगुवाई करने वाले जयप्रकाश जी का नाम इसे दे दिया गया. दिल्ली का ये पूरा इलाका आजादी के बड़े सिपहसालारों की यादगारों से नामित है. पण्डित गोविन्द बल्लभ पन्त अस्पताल, मौलाना आजाद मेडीकल कॉलेज, बाबू जगजीवन का समता स्थल, चौधरी चरणसिंह का किसान घाट और आगे यमुना तट पर महात्मा गाँधी जी की स्मृति में राजघाट, जवाहर लाल नेहरू जी, लालबहादुर शास्त्री जी, इन्दिरा जी, व राजीव गांघी जी के स्मारक स्थल भी हैं. दिल्ली गेट के चारों दिशाओं में बोलता हुआ इतिहास है. ये सब रौशन के लिए बड़ी किस्मत की ही तो बात है. ऐसा हर किसी को कहाँ नसीब होता है.

एक दिन रौशन अपने अब्बू और उनके एक सहायक के साथ जामा मस्जिद के बाजारों की रौनक देखने निकला, जहाँ उसने चिड़िया बाजार में बहुत खूबसूरत एवँ प्यारी प्यारी चिडियाँ बिकती हुई देखी. उसे लाल कॉलर वाला एक हरा तोता बहुत पसन्द आ गया. उसका मन देखकर अब्बू ने वह मिट्ठू पिंजरे समेत उसके लिए खरीद दिया.

तोते को पहले से कुछ सिखाया गया था, वह जब से घर में आया एक वाक्य बार बार बोलने लगा, “मुझे आजादी चाहिए.” पहले पहले तो ये वाक्य ठीक से समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन दो दिनों के बाद साफ़ साफ़ सुनाई देने लगा, “मुझे आजादी चाहिए.”

रौशन को लगा कि पिंजड़े में बन्द होने से मिट्ठू बहुत दु:खी है इसलिए आजादी की गुहार लगा रहा है. वह सोचने लगा कि हमने भी तो अंग्रेजों से आजादी चाही थे, लम्बी लड़ाई लड़ी थी, बहुत से देशभक्त शहीद भी हुए थे. उसने अब्बू और अम्मी दोनों से कहा, “ये बेचारा कब से आजादी माँग रहा है. मेरा मन हो रहा है कि इसका पिंजड़ा खोल कर इसे आजाद कर दिया जाये.” बेटे की बात सुन कर अम्मी का मन भर आया. वह खुश हो गयी और अब्बू को भी बेटे की संवेदनशीलता अच्छे लगी. वे बोले, “ये तो बहुत अच्छी बात है.”

रोशन ने बाल्कनी में जाकर एक स्टूल पर चढ़ कर मिट्ठू के पिंजरे की खिड़की खोल दी. मिट्ठू को भी शायद इस प्रकार खुला हो जाने की आशा नहीं थी. वह पिंजरे को अपनी चोंच से पकड़ते हुए बाहर निकल आया और एक बार फिर से बोला, “मुझे आजादी चाहिए.”

मिट्ठू बाल्कनी में इधर उधर उड़ने की कोशिश करता रहा, पर उससे उड़ा नहीं जा रहा था. ऐसा लग रहा था कि वह उड़ना भूल गया था. इस बीच उसने अपना वाक्य कई बार जरूर दोहराया, “मुझे आजादी चाहिए.”

काफी देर तक यों फुदकते हुए वह घूमता रहा. घर से बाहर नहीं गया और फिर वापस अपने पिंजरे में घुस कर जोर से बोला, “मुझे आजादी चाहिए.”

मिट्ठू के इस व्यवहार से सब लोग हैरान थे. तब अब्बू ने कहा, “ये मिट्ठू ठीक हमारे आज के समाज की तरह बोली बोलता है. आजकल छोटे बड़े सभी लोग कहते हैं, "भ्रष्टाचार मिटाओ", लेकिन गौर करनेवाली बात यह है कि कोई भी भ्रष्टाचार से अछूता नहीं है और अंग्रेजों से आज़ाद होने के बाद भी रूढ़ीवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, व निजी स्वार्थ के बंधनों में बंधे हुए है. यों सिर्फ नारे लगाने से समस्या का हल नहीं होगा.”

रौशन ने फिर से पिंजरा बन्द कर दिया. मिट्ठू अभी भी आजादी माँग रहा है.
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बुधवार, 14 अगस्त 2013

चुहुल - ५६


(१)
दो मकान एक साथ बने हुए थे. उनके बीच की साझा दीवार बहुत पतली थी. एक घर की महिला अपने पति से शिकायत भरे अंदाज में बोली, “बगल वाले हमारे घर की सारी बातें सुन लेते हैं.”
पति बोला, “तो मैं इस दीवार को मोटी करवा देता हूँ.”
इस पर महिला ने कहा, “नहीं, नहीं रहने दो, फिर मैं भी उनकी बातें नहीं सुन पाऊँगी.”

(२) 
एक नेता जी हाथ जोड़ कर अपने लिए वोट माँगते हुए जा रहे थे. एक सज्जन से उन्होंने कहा, “चाचा जी, आपका वोट मुझे मिलना चाहिए.”
सज्जन बोले, “बेटा, वोट का वचन तो मैं दूसरे उम्मीदवार को दे चुका हूँ.”
इस पर नेता जी ने कहा, “चाचा जी, राजनीति में कोई वचन नहीं निभाता, आप भी उसे भूल जाइए.”
सज्जन ने हँसते हुए कहा, “तब ठीक है. मेरा वोट तुमको ही मिलेगा.”

(३) 
एक रेस्टोरेंट में एक ग्राहक ने बड़े गुस्से में मैनेजर से वेटर की शिकायत की, “आपका ये वेटर बहुत बदतमीज है. मैं कब से इसे आवाज लगा रहा हूँ, ये सुनता ही नहीं है.”
मैनेजर ने ग्राहक के सामने ही वेटर को बुलाकर झाड़ लगा दी, “गधे, बेवकूफ, नामाकूल, साहब कब से भौंक रहे हैं और तू सुनता ही नहीं. तुम्हारी सर्विस का ये ही हाल था तो कौन उल्लू का पट्ठा यहाँ दुबारा आएगा.”

(४) 
नौकर – मालिक, अब मैं आपके घर का काम नहीं कर सकता.
मालिक – क्यों क्या हो गया?
नौकर – मालकिन का व्यवहार मेरे साथ ठीक नहीं है. वे मेरे लिए भी उसी तरह के अपशब्द इस्तेमाल करती हैं जैसा आपसे अक्सर कहा करती हैं.

(५)
एक पिता गुस्से में अपने बेटे से बोले, “तूने गधा देखा है?”
बेटा – जी, हाँ.
पिता – तूने उल्लू भी देखा होगा?
बेटा – जी, हाँ.
पिता – तो सुन, तेरी शक्ल गधे की सी है और अक्ल उल्लू की सी है.
बेटा – पर माँ तो कहती है कि मैं बिलकुल आप पर गया हूँ.
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सोमवार, 12 अगस्त 2013

यादों का झरोखा


स्वर्गीय वीरेन्द्रनाथ शर्मा को सब लोग लाखेरी का अमीन सयानी कहा करते थे क्योंकि उनकी दमदार आवाज और प्रस्तुति अमीन सयानी की तरह हुआ करती थी. लाखेरी ए.सी.सी. कैम्पस में क्लब का कोई स्टेज कार्यक्रम हो या स्पोर्ट्स क्लब के खेल, उन सब में शर्मा जी अनाउन्सर हुआ करते थे. वे लॉन टेनिस और ब्रिज के बहुत अच्छे खिलाड़ी भी थे.

मैं जब सन 1960 में लाखेरी आया तो वे फैक्ट्री के टाइम ऑफिस में बतौर टाइम-कीपर कार्यरत थे. बाद में अकाउंट्स क्लर्क /अकाउंट्स ऑफिसर बने.

पाकिस्तान के अन्दर रोहड़ी और वाह में ए.सी.सी. के दो सीमेंट कारखाने हुआ करते थे. देश के बंटवारे के समय वहाँ के हिन्दू कर्मचारी भारत को भेजे गए. शर्मा जी का परिवार लाखेरी आ गया. मुझे उनके बुजुर्गों/खानदान के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है.

शर्मा जी से मेरी जल्दी ही मित्रता हो गयी. हमने सन 1962 में होली के अवसर पर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘मूर्ख सम्मलेन’ (हास्य सम्मलेन) आयोजित करना शुरू किया, जिसमें मैं मुख्य सूत्रधार होता था, पर संयोजन में शर्मा जी की बड़ी भूमिका हुआ करती थी. इस कमेटी में मेरे और शर्मा जी के अलावा स्वनामधन्य सर्वश्री पण्डित शिवदत्त शर्मा, पावर हाउस सुपरिन्टेंडेंट, जो हाल ही में 93 वर्ष की आयु प्राप्त करके स्वर्ग सिधार गए है, स्व. केशवदत्त अनन्त अकाउन्टेंट, स्व.मदनलाल दीक्षित, फेरुसिंह रूहेला हेडमास्टर जैसे विद्वान व सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे. साथ ही बेहतरीन स्थानीय कलाकारों की टीम भी जुड़ी रहती थी, जिसमें सर्वश्री अब्दुल मलिक, के.के. महेश्वरी, चंद्रशेखर टीटू, भगवानदास दलेर, सुखदेव शर्मा आदि नौजवान शामिल होते थे.

पूरे कार्यक्रम में वीरेंद्र शर्मा जी का रोल अहम हुआ करता था. स्वभाव से वे सरल और स्पष्टवक्ता थे. सन 1977 में जब मैं आपातकाल के दौरान कर्मचारियों की यूनियन का जनरल सेक्रेटरी भी था, तभी कम्पनी के मैनेजमेंट ने उनको ऑफिसर ग्रेड में असिसटेंट अकाउंट्स ऑफिसर बना कर धौलपुर, मध्यप्रदेश स्थित बामोर कारखाने को ट्रांसफर का आफर दिया. वे अनिर्णय की स्थिति में थे. तब शायद उनकी वृद्ध माता जी मौजूद थी. तीनों बेटे व बेटियाँ नाबालिग थे. मैंने उनको प्रमोशन ना छोड़ने की सलाह दी, तथा जल्दी वापस तबादला करवाने का आश्वासन भी दिया. सँयोग से वह कारखाना कम्पनी ने सन 1982 में किसी दूसरी पार्टी को बेच दिया, और अपना स्टाफ अन्यत्र एडजस्ट कर लिया. तब शर्मा जी असिसटेंट अकाउंट्स ऑफिसर बन कर वापस लाखेरी ही आ गए.

उनकी अनुपस्थिति में कार्यक्रमों के आयोजनों पर माइक थामने का काम मुझे या फेरुसिंह रूहेला जी को करना पड़ता था. बाद में रविकांत शर्मा को भी इस टीम में जोड़ लिया गया.

वीरेंद्र शर्मा जी के पास चुटकुलों का और हास्य फुलझड़ियों का खजाना होता था. उनकी एक छोटी बहन श्रीमती मनोरमा भी इस फन में माहिर थी, जो महिला क्लब की जान हुआ करती थी. उनके पति स्व. पुरुषोत्तम दास शर्मा (इलेक्ट्रिकल इंजीनियर) वीरेंद्र जी के डबल जीजा होते थे. क्योंकि मनोरमा से बड़ी बहन के स्वर्गवास के बाद ही वह उनकी धर्मपत्नी बनी थी.

जब वीरेंद्र शर्मा बामोर से वापस आये तो वे कम्पनी ग्रेड के ऑफिसर थे और उनकी चाल व पहनावे में भी ऑफिसरी झलकती थी. उस वर्ष होलिकोत्सव पर उनको हमारी कमेटी ने उपाधि दी, "साला मैं तो साहब बन गया." यह सटीक था इसलिए लोगों ने खूब ठहाके लगाए. यों हम सब होली पर खुद पर भी हँस लेते थे. हमें भी इसी प्रकार के चुभते उपाधियों से नवाजा जाता था.

वे सुनहरे दिन थे. चांदी जैसे साफ़ सुथरे चमकीले लोग होते थे. आपस में खूब मजाक कर लेते थे. अब सिर्फ यादें ही बाकी हैं. शर्मा जी के बड़े पुत्र श्री राकेश शर्मा उर्फ पण्डित राकेशकुमार सारस्वत अब जयपुर में सपरिवार रहते हैं. दो अन्य बेटे अखिलेश शर्मा और मधुसूदन शर्मा ए.सी.सी. के हिमांचल स्थित गागल फैक्ट्री में कार्यरत हैं. श्रीमती वी.एन. शर्मा का साया अभी अपने बच्चों के ऊपर है. ये सभी बच्चे तथा राकेश शर्मा का बेटा सागर और बेटी श्रीमती सुरभि फेसबुक पर मेरे मित्रों की लिस्ट में हैं.
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शनिवार, 10 अगस्त 2013

तिलचट्टा

अनादि काल से मनुष्यों के साथ उसके तीन अनचाहे दुश्मन भी चले आ रहे हैं. एक है मक्खी, दूसरा चूहा, और तीसरा है तिलचट्टा. आज यहाँ हम तिलचट्टे के बारे में ही चर्चा करेंगे.

तिलचट्टे हमारे घरों में खासकर रसोई घर में, बन्द नालियों में, गटरों में, या नमी वाली अंधेरी जगहों में निवास करते हैं. ये कीट निशाचर होते हैं. जब लाईट बन्द हो, और सुनसान वातावरण हो, तो ये बाहर निकल कर हमारे खाने-पीने की चीजों व बर्तनों को चाट कर गंदा कर जाते हैं. चूँकि इनके शरीर पर असंख्य बैक्टीरिया होते हैं, ये उनका संक्रमण कर जाते हैं.

तिलचट्टों के बारे में अध्ययन करने वालों ने अनेक मजेदार रहस्योद्घाटन किये हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं: विश्व भर में तिलचट्टों की लगभग ४००० प्रजातियां पायी जाती हैं. बड़े तिलचट्टों के लाल पँख होते हैं, खतरा होने पर ये थोड़ी दूरी तक उड़ भी सकते हैं. खाने में ये सब कुछ खा लेते हैं, मिल्क प्रोडक्ट्स, मीठा पकवान इनको बहुत प्रिय हैं. ये बीयर के बोतलों को चाटने का शौक भी रखते हैं. इनकी घ्राण शक्ति तेज होती है. तिलचट्टों के सर पर दो एंटीना होते हैं जो उसे आसपास के खतरों से बाखबर रखते हैं. तिलचट्टे चालाक भी गजब के होते हैं. इनकी टांगों में सन्धियुक्त घुटने होते हैं जिनकी सहायता से ये तीन मील प्रतिघंटा की रफ़्तार से भाग भी सकते हैं. श्रीमती तिलचट्टा एक बार गर्भ धारण करती है तो जिंदगी भर अण्डे देती ही जाती है. अपने अण्डों को वह अपने शरीर से चिपका कर सेती भी है.

तिलचट्टे का दिमाग उसके शरीर में कई कैविटीज में रहता है. यदि सर काट दिया जाये तो भी वह एक हफ्ते से ज्यादा दिनों तक ज़िंदा रहता है. बाद में भूखे रहने के कारण मरता है. तिलचट्टों को छिपकलियाँ बड़े चाव से खा जाती हैं. इस दुनिया में तिलचट्टों की कुल संख्या कितनी होगी इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता है.

चूँकि तिलचट्टे बीमारियों की जड़ हैं इसलिए इनको मारने के लिए अनेक प्रकार के कीटनाशक जहरीली दवाएं बनाई गयी हैं, जो कि हमारे अपने स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होती हैं. इन दवओं से भी इन दैत्यों का सफाया नहीं हो पाता है.

सावधानी के तौर पर रसोईघर ऐसा बनाया जाना चाहिए, जहाँ इनके छिपने की कोई गुंजाइश ना हो. पानी की मोरियों में बारीक जाली लगानी चाहिए क्योंकि ये छोटे से छिद्र में से बाहर निकल सकते हैं. खाने-पीने के सामानों को अच्छी तरह बन्द रखना चाहिए ताकि ये उसे जूठा ना कर सकें.

तिलचट्टों से पीड़ित लोगों के हितार्थ मैं एक अचूक, अनुभूत और सस्ती दवा बताना चाहता हूँ:

एक चम्मच दही, एक चम्मच चीनी, एक चम्मच गेहूं का आटा और एक चम्मच बोरिक एसिड पाउडर (ये कैमिस्ट के पास मिल जाता है) का पेस्ट बनाकर रसोईघर के उन तमाम जगहों पर अंगुली से टपका लगा दें जहाँ तिलचट्टों के आने या घूमने की संभावना रहती है. इससे छोटे बड़े सभी तरह के तिलचट्टों से रसोईघर मुक्त रहेगा, जरूर आजमाइए.
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गुरुवार, 8 अगस्त 2013

खुशी

(६ अगस्त को प्रकाशित कहानी दूरी से क्रमागत) 

मेरा नाम ‘खुशी’ मेरी दादी ने रखा था. अब तो मैं बड़ी हो गयी हूँ और मेरा पूरा नाम खुशी कांडपाल है. मैं सिद्धि एकेडेमी में दसवीं कक्षा में पढ़ती हूँ. मेरा छोटा भाई जय मुझसे दो साल छोटा है वह आठवीं में पढ़ता है. हमारी दादी बहुत प्यारी है. एकेडेमी के बच्चे उनको ‘बड़ी मैडम’ कहते हैं, पर पापा और मम्मी दोनों ही उनको माँ पुकारते हैं. दादी पहले टीचर थी और आज भी सबसे साफ़ सफाई और आनुशासन की ही बात करती रहती हैं. बच्चे उनसे डरते हैं. पर हम तो बिलकुल भी नहीं डरते क्योंकि जय और मैं तो दादी के लाड़ले हैं.

हमारे पापा इंजीनियर हैं और मम्मी प्रिंसिपल. ये दोनों हमेशा सुबह से शाम तक अपने कामों मे इतने व्यस्त रहते हैं कि केवल रविवार को ही हम साथ साथ रहते हैं. अन्यथा बाकी समय हम दादी के पल्लू से बंधे रहते हैं. गर्मियों की छुट्टियों में पापा और मम्मी हमको हर साल देशाटन कराते हैं. उस दौरान हम दादी से जब दूर रहते हैं तो उनकी बहुत याद आती है. जय तो कहता रहता है कि “हमारी दादी दुनिया की सब से अच्छी दादी है."

मेरे साथ की लड़कियां अपने ननिहाल और नानी की अकसर बातें किया करती हैं, पर मैं कभी भी अपने ननिहाल नहीं गयी. हमारे घर में ननिहाल के बारे में कोई चर्चा भी नहीं होती है. जब कोई नजदीकी रिश्तेदार हमारे घर आते हैं तो मम्मी को मैंने कई बार दबी जुबान से नानी के बारे में बातें करते हुए सुना है. ऐसा लगता है कि वह मुझसे इस बारे में कुछ छुपाना चाहती हैं. मैं समझती हूँ कि मम्मी ने जरूर वहां झगड़ा किया होगा क्योंकि वह अपनी आदत के अनुसार गुस्सैल है. वैसे मेरी मम्मी कभी भी गलत बात पर नहीं अड़ती है. इसीलिये एकेडेमी का पूरा स्टाफ उनका इतना आदर करता है. लेकिन सब लोग उनको कड़क मिजाज मानते हैं. पर मैं तो शैशव से उनके साथ रही हूँ. वह एकदम ‘स्नेहसिक्त माँ’ हैं. मैंने यद्यपि मम्मी को कभी खिलखिला कर हँसते हुए नहीं देखा, लेकिन उनकी आँखों में आंसू भी कभी नहीं देखे थे.

आज जब हम दोनों भाई-बहन घर आकर अपना अपना होमवर्क करने बैठे तो पापा ने अचानक आकर कहा, “चलो आज तुमको तुम्हारी नानी से मिलाकर लाते हैं.” ये सुन कर जय तो चहक उठा और मेरे मन में तो बहुत से प्रश्न पैदा हो गए. मैंने पापा से पूछा, “क्यों पापा, क्या बात हो गयी, आज तक तो आपने कभी हमसे नानी के बारे में कोई बात नहीं बताई है?”

पापा बोले, “बेटा, तुम्हारी नानी किसी पुरानी बात पर हमसे नाराज है. अभी बीमार पडी हैं, तो हमने सोचा है कि बीमारी का हालचाल पूछने के बहाने उनकी नाराजी दूर कर दी जाये. तुम लोग जल्दी से तैयार हो जाओ.”

पापा खुद गाड़ी ड्राइव करके ले गए. रास्ते में हम तो पिछली सीट पर बैठे थे. आगे पापा और मम्मी आपस में दबे स्वर में बतियाते रहे. मैं परी कहानियों की किसी बूढ़ी नानी की कल्पना करती हुई ना जाने क्या क्या सोचती रही थी. जय गुमसुम, लेकिन उत्कंठित होकर बैठा रहा.

लीलावती  कालोनी में नानी का अच्छा बड़ा घर है. हम लोग गाड़ी से उतर कर सीधे अन्दर चले गए. मेरे लिए तो ये पूरी तरह अनजानी जगह थी. दो तीन स्त्री-पुरुष इधर उधर आ जा रहे थे. घर में एक अजीब सी खामोशी थी. पापा और मम्मी भी सहमे सहमे से लग रहे थे. मम्मी ने एक महिला को अपना परिचय दिया. वह अन्दर गयी और थोड़ी देर मे लौट कर आई बोली, “आप लोग अन्दर चले जाओ.”

नानी अपने बड़े से बेडरूम में पलंग पर लेटी थी. उसके पास एक नर्स और एक तीमारदार मौजूद थे. एक तरफ दवाओं की बड़ी ट्रे रखी हुई थी. कमरे में दवाओं की गन्ध भी फ़ैली थी. नानी बहुत बूढ़ी हो चली थी. उसके सफ़ेद बाल, आँखें धँसी हुई, और चेहरे पर झुर्रियों की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थी. उसने लेटे लेटे ही अपना चश्मा पहना और देर तक हम सबको एकटक देखती रही. फिर जब मम्मी ने उनके पाँव छुए तो वह एकाएक उठ बैठी. उनको मानो हमारी उपस्थिति पर विश्वास ही नहीं हो रहा था. उन्होंने मम्मी को अपने आगोश में ले लिया और सजल नेत्रों से अपनी खुशी व्यक्त करती रही. उनके बोल नहीं निकल रहे थे. पापा ने उनको प्रणाम किया और हमको भी प्रणाम करने को कहा .

नानी ने मेरा व जय का हाथ अपनी ओर खींच लिया और पलंग पर अपने बगल में ही बैठने को कहा. इस बीच पापा मम्मी के लिए कुर्सियाँ आ गयी थी. पापा कुर्सी पर बैठ गए पर मम्मी तो नानी पास पलंग पर बैठ कर सिसकने लगी. मैंने मम्मी को इस तरह रोते हुए पहली बार देखा. काफी देर बाद वातावरण सामान्य हो सका. नानी रुँधे गले से बोली, “मैं कब से इन्तजार कर रही थी कि मेरे बच्चे आकर मुझसे मिलें, अच्छा किया तुम लोग आ गए मैं समधन जी से भी क्षमा चाहूंगी.”

नानी ने अपनी दोनों हथेलियाँ पहले जय के माथे व चेहरे पर फिरायी, और फिर मेरे माथे-चेहरे पर हथेली लाकर मुझसे मेरा नाम पूछा. मैंने उत्तर दिया, “खुशी.”

इस मिलन में मैंने जो खुशी देखी, मैं शब्दों में उनका वर्णन नहीं कर पा रही हूँ.
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मंगलवार, 6 अगस्त 2013

दूरी

मैं अपनी माँ से केवल ३ किलोमीटर की दूरी पर रहती हूँ, पर ये दूरी इतनी लम्बी हो गयी कि मैं पिछले २२ वर्षों से उससे नहीं मिल सकी हूँ.

मैं अपने ही द्वारा स्थापित एक शैक्षिक एकेडेमी की प्रिंसिपल हूँ. जब छात्र या छात्राओं के साथ उनकी मांएं आती हैं, और अपने बच्चों पर मेरे सामने प्यार और दुलार करती हैं तो मुझे भी अपना बचपन याद आ जाता है. मेरी माँ ने हम दोनों बहनों को बड़े नाज नखरों से रखा था. बहुत महंगे स्कूलों में पढ़ने को भेजा. उसके बड़े बड़े सपने थे, लेकिन जब मुझे के.के. (मेरे पति) से प्यार हुआ तथा मैं उनकी दीवानी हो गयी तो वह मेरी दुश्मन हो गयी. ये उसका अहँकार था या कोई कुंठा, मैं कह नहीं सकती, मगर मेरे प्यार को उसने अपनी स्वीकृति नहीं दी.

मेरे पापा स्वर्गीय गोपाल कृष्ण बेलवाल एक नामी एडवोकेट थे. क्रिमिनल केसेज में वे माहिर वकील थे. अपने मात्र १५ वर्षों की वकालत में उन्होंने इतना कमाया कि आने वाली सात पुश्तों के लिए कम नहीं पडता. उनकी अकाल मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी. माँ का विश्वास था कि किसी ने जहर खिलाकर उनकी ह्त्या की थी. तब दीदी और मैं बहुत नासमझ बच्चे थे. माँ के दुःख से दु:खी रहते थे. माँ एकांत में बैठकर बहुत रोया करती थी. पर वह जल्दी ही संभल भी गयी. पापा के जूनियर्स को ऑफिस संभलाकर खुद उनके साथ बैठने लगी और प्रलेख लेखक यानि अर्जीनवीश का काम करने लगी. कुछ ही समय में अदालत परिक्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना ली. माँ बताती थी कि उस पुरुषप्रधान क्षेत्र में उसको बहुत बार अपमान और विषमताओं का सामना करना पड़ा था. विषम परिस्थितियों से जूझते हुए वह आगे जाकर कठोर व्यक्तित्व वाली महिला बन गयी. औरों के सामने वह कभी भी दया की पात्र बन कर नहीं रही. वह ग्रेज्युएट थी और अदालत की कानूनी प्रक्रियाओं से पूरे तरह भिज्ञ भी हो चली थी.

मेरी दीदी रिद्धि बहुत कमजोर मनोबल वाली थी. वह माँ से बहुत डरती थी. उसने माँ की खींची हुई लकीर से बाहर कभी भी पैर नहीं रखा. वह आज बहुत अपने परिवार के साथ जरूर खुशहाल होगी उसके पति भारत सरकार की विदेश सेवा में हैं. सुना है कि आजकल वे फिलीपीन्स की राजधानी मनीला में दक्षिण पूर्वी एशिया के दूतावास में कार्यरत हैं. माँ की मेरे प्रति नाराजी का असर वहाँ भी है. वे लोग मेरे संपर्क में नहीं रहते हैं.

मुझे के.के. से प्यार तब हुआ जब मैं नैनीताल में कुमाऊं यूनिवर्सिटी से बी.एससी. कर रही थी, और के.के. नैनीताल पॉलीटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. मेरी सास श्रीमती पद्मावती कांडपाल तब एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थी. वह भी बहुत कम उम्र में विधवा हो गयी थी. वे बहुत सरल स्वभाव की धार्मिक प्रवृति की हैं. मैंने उनसे अपनी माँ से ज्यादा दुलार पाया है. वे पूरे परिवार के लिए एक समर्पित माँ हैं. उन्होंने अपने दोनों बेटों को रोजगारपरक शिक्षा दिलवाई. मेरे जेठ उत्तर रेलवे में सिग्नलिंग विभाग में इंजीनियर हैं. के.के. ने कहीं नौकरी नहीं की और अपना खुद का आर्किटेक्ट का काम शुरू किया और शहर मे बिल्डिंगें बनाने के ठेके लेते रहे हैं.

जब के.के. ने अपने व मेरे रिश्ते की बात अपनी माँ को बताई तो वह बहुत खुश हो गयी. कार्यक्रम बनाया कि हम दोनों की उपस्थिति में वह मेरी माँ से रिश्ते की बात करेंगी. जब निश्चित तिथि पर वह हमारे घर आई तो मेरी माँ उनका प्रस्ताव सुनकर अप्रत्याशित रूप से आगबबूला हो गयी. मैं छुपने को ही थी कि माँ ने मेरी सास को सबके सामने एक थप्पड़ जड़ दिया. वे लोग अपमानित होकर लौट गए. मेरी मनोदशा इतनी खराब थी कि मैं बयान नहीं कर सकती हूँ. माँ के व्यवहार से मैं शर्मिन्दा थी. गुस्से का उफान मेरे अन्दर भी उमड़ पड़ा. और यह कह कर बाहर आ गयी कि, “मैं आपका घर छोड़ कर जा रही हूँ.”

मैंने सुना माँ जोर जोर से कह रही थी, “जा जा, फिर लौट कर मत आना.”

मैं के.के. के घर आकर खूब रोई. उसकी माँ ने मुझे गले लगा कर कहा, “बेटी, ये सब जिंदगी में होता रहता है. अब ये बता कि आगे क्या इरादा है?”

मैंने दृढ़ता पूर्वक कहा, “अब मैं आपकी बहू बन कर रहना चाहती हूँ.”

घटनाक्रम को नया संचार मिला. जल्दी ही शुभ मुहूर्त निकाल कर हम दोनों का विवाह हो गया. शादी के बाद मैंने एम.एससी. पास की और बी.एड. की डिग्री हासिल की.

के.के. बहुत कर्मठ और उद्यमी हैं. मेरी शैक्षिक योग्यता को सार्थक बनाने के लिए उन्होंने एक नर्सरी स्कूल खोलने में भरपूर मदद की, और धीरे धीरे इस स्कूल को विस्तार देते रहे. इन पन्द्रह सालों में ये नन्हा सा पौधा अब बड़ा पेड़ बन गया है. मेरे नाम पर ही इसका नाम ‘सिद्धि एकेडेमी’ रखा गया. इसमें मेरी सासू माँ का मार्गदर्शन बहुत काम आया. वे सरकारी नौकरी में प्रधानाध्यापिका के पद से रिटायर हो चुकी हैं. के.के. एकेडेमी के सफल व्यवस्थापक हैं. दिन रात कुछ नया सोचते रहते हैं. इस वक्त कुल बच्चों की संख्या करीब आठ सौ तक पहुँच गयी है. पर्याप्त ट्रेंड स्टाफ कार्यरत है. बिल्डिंग हर साल बड़ी होती जा रही है. बच्चों के लिए प्लेग्राउंड, वाचनालय, जिम और प्रयोगशाला सब की यथोचित व्यवस्था है. मेरे अपने दोनों बच्चे (एक बेटा और एक बेटी) यहीं हाईस्कूल कक्षाओं में पढ़ रहे हैं.

मैं अपने ऑफिस के बाहर बाल्कनी में खड़ी होकर भविष्य की अनंत संभावनाओं को देख रही हूँ.

आज एक स्थानीय अखबार में खबर छपी है कि "अर्जीनवीस पार्वती बेलवाल गंभीर रूप से बीमार है." पढ़कर मेरे तनमन पर एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ पड़ी है. सोच रही हूँ कि मेरी रगों में उसी का खून दौड़ रहा है. मैं उसी का अंश हूँ, पर मैं मजबूर हूँ ‘वचनों’ से बंधी हुई हूँ. वहाँ नहीं जा सकती हूँ.

मुझे उदास व बेचैन देखकर मेरी सासू माँ मेरी मनोदशा को भांप गयी. और बोली, “अरे, माँ तो माँ होती है, ज्यादा से ज्यादा अपमान ही तो कर पायेगी. जा उनसे मिल आ. बच्चों और करन को भी साथ ले जा. अन्यथा मन में मलाल रह जाएगा.”

के.के. सुन रहे थे, बोले, “मैं गाड़ी निकाल रहा हूँ”.
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रविवार, 4 अगस्त 2013

बैठे ठाले - ६

मैं राजनीतिज्ञ नहीं हूँ और न वर्तमान में किसी राजनैतिक दल से किसी प्रकार सम्बंधित हूँ, पर जब हमारे टी.वी. चैनल्स और कुछ फेसबुक के मित्र नित्यप्रति अपनी राजनैतिक सोच को ठूँस ठूँस कर पिला रहे हैं तो मेरा मन भी वमन  करने को हो रहा है.

लोकसभा के चुनावों को अभी एक वर्ष शेष है, पर ‘कुर्सी पकड़’ की योजना में जो समीकरण बन रहे हैं, वे अभूतपूर्व हैं. कुछ मीडिया वालों ने अपने झूठे-सच्चे प्री-पोल रिजल्ट भी बता दिये हैं, जो सिर्फ एक व्यापारिक चातुर्य के अलावा कुछ नहीं हैं. ऐसे रिजल्ट तो उनसे ज्यादा अच्छी तरह हमारे भविष्यवक्ता ज्योतिषी लोग अंदाजा लगा कर पेलते रहते हैं.

मैंने भी अपने बचे-कुचे बाल यों ही धूप में सफेद नहीं किये हैं. कोई माने या ना माने,  देश की आजादी के समय से ही जो राजनैतिक खिचड़ियाँ समय समय पर पकती रही हैं मैं उनका चश्मदीद गवाह रहा हूँ इसलिए अपनी प्रतिक्रिया देकर मन हल्का कर लेना चाहता हूँ.

देश में व्यवस्था या सत्ता परिवर्तन एक शुभ लक्षण होता है. नए लोग कुछ नए ढंग से सोचते हैं, परन्तु हमारे यहाँ जो भीड़तन्त्र काम करता है उसके नतीजों का आँकलन इतना आसान नहीं होता है. सन १९७७ में मोरारजी भाई की जनता सरकार का जो हश्र हुआ था, वह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है. उस समय भी कांग्रेस हटाओ का नारा था. उद्देश्य सत्ता झपटने का और सुशासन लाने का था.

गुजरात के वर्तमान मुख्यमन्त्री नरेंद्र भाई मोदी एक धूमकेतु की तरह भारतीय राजनैतिक आकाश पर उभरे हैं. ये ध्यान में रखने वाली बात है कि धूमकेतु अल्पायु होता है. यद्यपि उनके शीर्ष पर चढ़ने के संयोग बने हैं, लेकिन भाजपा के अन्दर की लड़ाई के चक्रव्यूह से वे निकल पायेंगे, इस पर अनेक संशय हैं. यदि वे चक्रव्यूह से बाहर निकल भी गए, तो २७२ का जादुई आंकड़ा छू पायेंगे? अभी के समीकरणों से संभव नहीं लग रहा है.

आम लोगों की अपनी अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता हमेशा रही है. जहाँ तक उत्तर भारत के मतदाताओं के विषय में आंकलन किया जाता है, उत्तर प्रदेश में १५ से २० प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, जिन पर मुलायम सिंह जी की अच्छी पकड़ है. उनके प्रभाव क्षेत्र के बाहर नरेंद्र मोदी जी का नाम आने के बाद जो ध्रुवीकरण हो रहा है, वहाँ मुस्लिम मतदाता मोदी नाम के भूत से इतना सहमा हुआ है कि निश्चित रूप से विकल्प के रूप में फिर से कॉग्रेस से जुड़ने जा रहा है. देश भर में ये जो वोटों का स्विंग होगा, उससे राजनाथसिंह जी का हिंदूवादी कार्ड क्या परिणाम लाएगा, अभी अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. ये भी एक सच्चाई है कि हिन्दू वोटर कभी एकमुश्त भाजपा का समर्थन नहीं करते हैं. देश के अब २९ राज्यों में क्षेत्रीय दल अपने अपने हिस्से के वोट समेटेंगे तो कॉग्रेस को बीजेपी के मुकाबले ज्यादा फ़ायदा होगा. अत: तराजू का झुकाव किस ओर रहेगा अभी कहना ठीक नहीं होगा.

आगामी चुनावों में सत्तापक्ष द्वारा पिछले पाँच वर्षों में किया गया काम, बढ़ी हुई महंगाई का स्तर, पेट्रो-डीजल व रसोई गैस की बढ़ी कीमतों का दंश तथा बड़े बड़े घोटालों की कालिख सब सामने लाये जायेंगे, पर ऐन वक्त पर जो चुनावी टोटके किये जाते हैं, जिनसे ‘हवा’ बनती है वे सब आजमाए जायेंगे. इस काम में ये पुराने खिलाड़ी बड़े शातिर हैं. अपनी खास सीटें निकाल कर ले जायेंगे.

कॉग्रेस के बारे में ऐसा जरूर लगता है कि वह इस समय वह पिछड़ रही है क्योंकि उसके पास कोई चमकदार धाकड़ नेता नहीं है, लेकिन कॉग्रेस एक मधुमक्खियों के छत्ते की तरह है, जिसमें एक रानी मक्खी भी होती है. अभी कांग्रेस की उस शक्ति को नकारना या कम आंकना राजनैतिक बेवकूफी होगी.

जब डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाया गया था, तो उस तीर के कई उद्देश्य थे. किसी सिख को प्रधानमन्त्री बनाकर पंजाब में ‘ब्लू स्टार’ की आग को ठंडा करना था. इसके अलावा सारी दुनिया आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही थी, तो ऐसे समय में एक अर्थशास्त्री को कमान सौंपना दूरदर्शिता थी. डॉ. मनमोहन सिंह का दुर्भाग्य यह रहा कि उनके दूसरे कार्यकाल में बड़े आर्थिक घोटालों की बाढ़ सी आ गयी. ईमानदार व्यक्ति होते हुए भी सारी बदनामी उनको झेलनी पड़ी है/ पड़ रही है. एक महत्वपूर्ण बात ये भी है कि वे थोपे गए प्रधानमंत्री हैं, जिनकी डोर थोपने वालों के हाथों में रही है.

आज फेसबुक पर मेरे एक मित्र ने मुग़ल सल्तनत के आख़िरी बादशाह जफर और अंग्रेजी हुकूमत के आख़िरी वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन के साथ कॉग्रेस के आख़िरी प्रधानमन्त्री के रूप में डॉ.मनमोहन सिंह का चित्र लगाया है. मैं इस विषय में कहना चाहूंगा कि सन १९७७ में भी हम सब को ऐसा ही लग रहा था कि इंदिरा गाँधी कॉग्रेस की आख़िरी प्रधानमंत्री होंगी, लेकिन बाद में तीन चौथाई सीटें जीतकर कॉग्रेस ने लोकसभा में नया इतिहास बनाया था.

कुल मीजान तप्सरा ये है कि जनतंत्री व्यवस्था में राजनेता बदलते रहते हैं, या बदलते रहने चाहिये. मैं अपने उन सभी मित्रों को सादर सलाह देना चाहता हूँ जो कि अतिउत्साहित होकर फेसबुक पर अपने अग्राह्य नेताओं के प्रति आपत्तिजनक अपशब्द इस्तेमाल कर रहे हैं. ऐसा करने से खुद का ही मुँह गंदा होगा और कुछ हासिल नहीं होगा.

पुनश्च : कॉग्रेस और भाजपा दोनों ही बड़ी पार्टियां हैं. ये दोनों चुनावों के धर्मयुद्ध में एक दूसरे पर ‘साम्प्रदायिकता’ का लांछन लगाते रहे हैं, अन्यथा कुछ ऐतिहासिक घटनाओं के परिपेक्ष्य में चाल चरित्र अलग अलग दिशाओं की तरफ दिखने के अलावा शासन-प्रशासन के तौर तरीकों में दोनों की रीति-नीति में कोई फर्क नहीं है. इस पर एक अमरीकी सांसद ने मजेदार सलाह दी कि दोनों पार्टियों का आपस में विलय हो जाना चाहिए और पार्टी का नाम रखना चाहिए, ‘भारतीय जनता कांग्रेस’.

आप सहमत हों या ना हों वर्तमान राजनैतिक आकाश में तीसरी शक्ति वाम दल कहीं नेपथ्य में खोये से लगते हैं. निश्चित रूप से ये इनके नेतृत्व की कमजोरी है. विश्लेषण बताते हैं कि कॉग्रेस और भाजपा दोनों ही पूँजीवाद के पोषक हैं और परोक्ष रूप से अमेरिका परस्त हैं. देश के असंख्य मेहनतकश, गरीब सर्वहारा लोगों के हितों की रक्षा के लिए देश की सर्वोच्च पंचायत में इनकी उपस्थिति अपरिहार्य है. लेकिन वाम शक्तियां बुरी तरह बंटी हुई हैं. कहीं नक्सलवाद व कहीं माओवाद जैसे बदनाम उग्रवादी कार्यकलापों तक सीमित मालूम पड़ते हैं. इसके अलावा जो राजनैतिक दल अपना समाजवादी नाम रख कर ‘सोशलिज्म’ को बदनाम कर रहे हैं, ‘किंग मेकर’ बन कर मूछों में ताव देने की फिराक में हैं.

अंत में मैं यही कहना कहूँगा कि ये सोचना कि   ‘कोऊ नृप होवे हमें का हानि, चेरी छोड़ होहिं न रानी.’ बहुत गैरजिम्मेदारा होगा.
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शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

शेरदा लान्गरी

अल्मोड़ा और हल्द्वानी के बीच भवाली से पहले मोटर मार्ग पर गहरी घाटी में ‘गरम पानी’ ऐसी जगह है, जहाँ पहाड़ से आने वाले या पहाड़ को जाने वाले यात्रियों को भोजन कराने के लिए सभी कुमाऊं मोटर मालिकों की तथा रोडवेज की बसें रुका करती थी. यहाँ बहुत सारे ढाबे हुआ करते थे, जिनमें स्वादिष्ट भोजन- दाल-चावल, सब्जी-पूड़ी, मीट-रोटी, आलू-पकोड़े, रायता-चटनी साथ में भुनी हुई लाल मिर्च, सब कुछ यात्रियों की इच्छानुसार परोसे जाते थे. आज भी परोसे जाते होंगे, पर अब तो पूरे मार्ग में जगह जगह अच्छे अच्छे ढाबे खुल गए हैं. बस ड्राइवरों की जहाँ सेटिंग रहती है, वहीं पर बस रोकी जाती है. लेकिन वो पुराना स्वाद अब खाने में नहीं आता है.

शेरू उर्फ शेरसिंह का बचपन इन्ही ढाबों में काम करते हुए गुजरा. बर्तन साफ़ करने से लेकर थाली परोसने तक का सब काम वह फुर्ती से किया करता था. वह अनाथ था. किसी गाँव वाले ने उसे यहाँ की राह दिखाई थी. उसे तो अब अपने मूल गाँव की कोई याद भी नहीं रही. यहाँ उस भुखमरे बच्चे की मौज थी. बचा हुआ वेज, नानवेज, सभी तरह का खाना उसे भरपेट जो मिल जाया करता था.

माँ-बाप उसकी यादों में भी नहीं रहे. उसे डांटने-डपटने वाला भी कोई नहीं था फलत: वह बचपन से ही स्वच्छंद हो गया. मनमौजी लोग अकसर हट्टे कट्टे रहते हैं. जवान होने पर वह अपने दोस्त पानसिंह के साथ रानीखेत जाकर कुमायूँ रेजीडेंट में भर्ती हो गया. रंगरूटी करने के बाद उसे लंगर की ड्यूटी में भेज दिया गया. क्योंकि उसने अपने कमांडेंट को अपना पिछला इतिहास बता रखा था. यही से उसे ‘शेरदा लान्गरी’ पुकारा जाने लगा.

सँयोग की बात थी कि एक बार जब वह फ़ौज से छुट्टी में गरमपानी की राह पर था तो उसकी मुलाक़ात एक पुलिस दरोगा गोविन्दसिंह बिष्ट से हो गयी गोविन्दसिंह उसके व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि उसे अपना घर-जंवाई बनाने का पस्ताव दे दिया. गोविन्दसिंह की तराई में तीन एकड़ जमीन थी और केवल एक ही बेटी थी कमली. जो छुटपन से ही जिद्दी और अक्खड़ स्वाभाव की थी. दरोगा जी ने सोचा कि शेरसिंह जरूर कमली पर नकेल डाल कर रख पायेगा.

इस प्रकार शेरसिंह की शादी कमली से कर दी गयी. शेरसिंह अब गृहस्थ हो गया और हर साल छुट्टी आता जाता रहा. किसी ने कहा है, "हरदी जरदी ना तजे, खटरस तजे ना आम." उसके स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया.

पन्द्रह साल की नौकरी करके, पेन्शन पाकर, जब वह रिटायर हुआ तब उसके दो बेटे हो चुके थे.

उसका दोस्त पानसिंह भी उसके साथ ही लान्गरी रहा वह उसके सारे राज जानता था. और छुट्टी आने पर कमली से सारी चुगली कर जाता था. उसने कमली को बता दिया कि 'शेरसिंह उसके प्रति वफादार नहीं है, वह वैश्यालयों के चक्कर लगाया करता है’. भारतीय नारी सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है, पर दुश्चरित्र पति की छाया अपने घर परिवार पर कभी नहीं चाहेगी. कमली उग्र स्वभाव की थी ही, पानसिंह की चिंगारी ने उसे खूंखार बना दिया. उसके मन में आग तो सुलग ही रही थी, इस बार जब वह घर आया तो कमली ने उससे पानसिंह की कही हुई बातों पर सफाई माँग ली. शेरसिंह शराब के नशे में था. बातों ने हंगामे और मारपीट का रूप ले लिया. कमली और उसके किशोर बेटों ने उसकी धुनाई कर डाली. घर जायदाद सब कमली के नाम पर था इसलिए उसने शेरसिंह से घर से निकल जाने का फरमान जारी कर दिया. शेर शेरनी से जीत नहीं पाया इसलिए गुस्से में कसमें लेकर कह आया, “अब इस दरवाजे पर मैं कभी नहीं आऊँगा.”

शेरदा लान्गरी इस प्रकार परिवार से अलग हो गया. तल्ली हल्द्वानी में किराए से कमरा लेकर रहने लगा. उसने एक खच्चर वाली रेहड़ी खरीद ली और कृषि उपज मंडी के आढ़तियों का काम करने लगा. उसने अपनी अलग स्वच्छंद दुनिया बसा ली. खूब शराब पीता था, यार दोस्तों को भी पिलाता था. यों २५ वर्ष एकाकी रह कर काट लिए. बिछुडे परिवार से कोई सम्बन्ध नहीं रखा और न परिवार वालों ने उसकी कुशल बात पूछी.

शेरदा अब बूढ़ा हो गया है. उसके शरीर को बहुत सी बीमारियों ने आ घेरा है. रेहड़ी चलाना उसने वर्षों पहले छोड़ दिया था. उसे बार बार अपना किराए का कमरा भी बदलते रहना पड़ता है. लोगों ने किराए भी बहुत बढ़ा दिये हैं. पेन्शन का बड़ा हिस्सा मकान भाड़े में जाने लगा है. अब वह आर्मी कैंटीन से सस्ते दर पर मिलने वाली अपने हिस्से की शराब मंडी के आसपास चोरी से फुटकर में बेचा करता है. उसके नियमित ग्राहकों में एक ज्ञानवल्लभ पन्त भी हैं, जो शराब का सेवन तो करते हैं, साथ ही बाबा जी के प्रवचन सुनने भी जाते हैं. पन्त ने शेरदा को भी सत्संग में जाने की प्रेरणा दी और अब शेरदा सत्संगी हो चला है. श्रोताओं की अगली पंक्ति में बैठ कर ध्यान पूर्वक प्रवचन सुना करता है.

एक दिन बाबा जी कह रहे थे, “मनुष्य कितने ही पाप कर ले यदि उन पर उसे पश्चाताप हो और सच्चे मन से परमेश्वर से लगन लगा ले तो सांसारिक दु:खों से मुक्त हो सकता है.” प्रवचनों का ऐसा असर हुआ कि शेरदा रात भर आत्ममन्थन करने लगा. उसको अहसास होने लगा कि ‘उसने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को कभी नहीं समझा, सारी गलती उसी की थी’. वह पश्चाताप की आग में कई दिनों तक जलता रहा. एक दिन वह हिम्मत करके कमली और बेटों के घर माफी मांगने के विचार से पहुँच गया, लेकिन वहाँ किसी ने उसका स्वागत नहीं किया. बूढ़ी कमली ने कर्कश वाणी में कह दिया, “हम तुझे नहीं जानते हैं. तुम्हारे लिए यहाँ कोई जगह नहीं है.” उसके जवान बेटे, बहुएँ, पोता-पोती सब तमाशा देख रहे थे. किसी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला क्योंकि वे सब उसकी कहानियां सुन सुन कर पूर्वाग्रहों से पीड़ित थे.

शेरदा लौट पड़ा. उसे अपने पैरों का वजन इतना ज्यादा लग रहा था कि उससे उठाये नहीं जा रहा थे.
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