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रविवार, 29 अगस्त 2021

वे सुनहरे दिन

 साठ साल पहले की बात है, मैं लाखेरी में नवांगुतक था , मुझे एसीसी कालोनी में L - १६ क्वाटर  आवंटित था, अविवाहित दिनों में मैंने अपने ही जैसे कुंवारे लोगों से जल्दी ही दोस्ती कर ली थी. इनमें स्व विष्णु बिहारी दीक्षित भी थे जो कि तब उदयपुर से MSW करके एसीसी में जॉब की तलाश में थे, उनके साथ ही एक लड़का शर्मा (नाम मुझे याद नहीं रहा) जिनके पिता उन दिनों लाखेरी स्थित  सेंट्रल एक्साइज के डिपुटी सुपरिंटेंडेंट हुआ करते थे भी उदयपुर स्कूल आफ सोसियल वर्क से ही  MSW कर के आये थे, इनके अलावा सेंट्रल एक्साइज के दो सब इंस्पेक्टर्स  सरदार गुरनामसिंह और प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव तथा जीवन बीमा के फील्ड आफीसर वोहरा भी चौकड़ी के सदस्य बन गए थे. मेरा क्वाटर बैठक का अड्डा हो गया था और दोस्ताना गतविधियां चला करती थी. कभी कभी विशेष पकवान / खाना बनाने के लिए एक मि. खन्ना को भी बुलाया जाता था वे नौशेरवाँ टाकीज के सिनेमा के एजेण्ट होते थे , ता हम लोग फ्री में सिनेमा देखने का बी मजा लेते थे हालांकि फर्स्ट क्लास का टिकट मात्र सवा रुपया ही हुआ करता था.

ये सब केवल एक ही साल चला उसके बाद सब अच्छ गच्छ गच्छामि हो गया. मैं भी शादी शुदा लोगों की लिस्ट में जुड़ गया था.

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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

मैं प्यारेलाल ही ठीक हूँ

यों तो मेरा नाम इस्लाम मोहम्मद है, धर्मपरायण मौलवी साहब और मेरे अम्मी-अब्बू ने ये नाम बहुत खुशी खुशी दिया होगा. ये नाम ऐसा है कि इसके उच्चारण से ही मालूम हो जाता है कि मैं धरम से मुसलमान हूँ. पहली झलक में ही ये नाम ट्रेडमार्क की तरह मेरी पहचान है.

मैं उत्तर प्रदेश के उस इलाके के ग्रामीण परिवेश में बड़ा हुआ हूँ, जिसे मुजफ्फर नगर-मेरठ कहा जाता था. पिछले साल मेरे परिवार ने भी हिन्दू-मुस्लिम झगड़ों/दंगों की त्रासदी झेली है. राजनैतिक रोटियाँ सेकने वालो ने इस इलाके का भाईचारा बिगाड़ कर रख दिया है, जिसके घावों को भरने में लंबा समय लग सकता है. शंकाएं, असहिष्णुता, व डर के भूत आज भी दिन रात सताते हैं.

मैं अपने वाल्देन की सात संतानों में सबसे बड़ा हूँ. मैं जब आठ साल का हुआ तो मुझे मेरी फूफी के पास मेरठ शहर में भेज दिया गया जहां मैं फूफा की छोटी सी मोटर रिपेयेरिंग वर्कशाप में काम सीखने लग गया था. मैंने कुछ ही सालों में स्कूटर, बाईक और मोटर कार रिपेयरिंग सीख लिया था तब मुझे अच्छा जेबखर्च मिलने लगा. १८ साल का होने पर मेरे फूफा ले मेरा ड्राईविंग लाईसेंस भी बनवा दिया था मेरे गाँवखेडा के चचा दिलावरखान पेपर मिल में ड्राईवरी करते हैं, जिन्होंने मेरी नौकरी वहाँ के एक मैनेजर उपाध्याय साहब के प्राईवेट ड्राईवर के बतौर ६००० रूपये माहे पर लगा दी तो मेंरी जिन्दगी की गाड़ी बढ़िया ढंग से चल पड़ी. मैंने साहब की होंडा सिटी कार चार सालों तक चलाई।  साहब पहले तो मुझे बच्चा समझ कर नौकरी देने में बहुत झिझके थे, पर बाद में पूरा भरोसा करने लगे थे. चूँकि मैं मैकेनिक भी था इसलिए वे मेरी अहमियत समझने लगे थे. मैं उनके बच्चों के साथ खूब घुलमिल भी गया था. उनके वहा काम करते हुए खुद के मुसलमान होने का या उनके हिन्दू होने का वैभिन्य भाव कभी प्रतीत नहीं हुआ. उसी बीच मेरी शादी भी गाँव में हुई तो साहब ने मेहरबानी करके अपनी कार मुझे शादी समारोह में ले जाने के लिए दे दी, जिससे मेरे परिवार नाते रिश्तेदार भी खुश हो गए थे. निकाह के वक्त खुद हाजिर होकर साहब ने मेरी शान बढ़ा दी थी. बाद में जब साहब की बदली दिल्ली को हो गई तो मैं भी उनके साथ ही दिल्ली आ गया था. मेरे रहने का इंतजाम एक डॉरमेटरी में था जहां अन्य बहुत से ड्राईवर भी रहते थे आपस में नोकारियों और तनखाह की बातें होती रहती थी. उनमें कुछ तो बड़ी तनखाह वाले भी थे. मुझे लगा कि मुझे कम तनखाह मिल रही है. एक दिन मैंने उपाध्याय साहब की नौकरी छोड़ कर एक कर्नल साहब (सरदारजी) के वहाँ दस हजार रुपयों की नौकरी पकड़ ली. कर्नल साहब की गैराज में तीन गाड़ियां थी, पर तनखाह बढ़ने के साथ ही यहाँ मेरी नौकरी चौबीसों घंटे की हो गयी थी. कर्नल साहब बड़े सख्त मिजाज के हैं. उनका गुर्राना, डांटना मुझे बहुत खलता था. मेरा चैन हराम हो गया था. जैसे तैसे एक साल काम किया फिर एक दिन जब नहीं सहा गया तो मैंने वह नोकरी भी छोड़ दी.

मैंने उपाध्याय साहब को जाकर सारी बात बताई और फिर से काम पर रखने का आग्रह किया, लेकिन उनके पास दूसरा ड्राईवर व्यवस्थित हो कर काम कर रहा था. मुझे उन्होंने भरोसा दिया कि जब भी जरूरत पड़ेगी फोन करके बुला लेंगे.

मैं पिछले आठ महीनों से बेरोजगार हूँ. गाँव में अपने परिवार के पास ही रहता हूँ. इस बीच मेरे भी दो बच्चे हो गए हैं. ये बेरोजगारी का दर्द वही समझ सकता है, जिसे ये व्यापी हो. मैंने कई जगह नौकरी के लिए संपर्क किया लेकिन बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि मेरा नाम अब मेरी नौकरी के आड़े आने लग गया है. जब से देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ा है, हिन्दू मालिक मुझ से बिदक जाते हैं. रहा सहा दुनिया में निरीह लोगों को मारने वाले आतंकवादियों ने माहौल में इस कदर जहर घोल दिया है कि कोई मुझे काम पर रखने को तैयार नहीं हो रहा है. हालाकि एक बड़े नेता ने यों भी कहा है कि “सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, पर सारे आतंकवादी मुसलमान हैं.” अब अगर दिल चीर कर दिखाया जा सकता तो मैं भी जरूर दिखा देता, परन्तु निर्दोष होने का प्रमाण पत्र कहाँ से लाऊँ. देश के बहुत से माननीय साधू संत, सन्यासी, साध्वी इस्लाम के बारे में जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं, उन पर कोई लगाम नहीं है और ना ही वोटों की राजनीति करने वाले मुसलमानों के रहनुमाओं के ‘बोलों’ पर कोई लगाम है. बहरहाल इन सबका असर मेरे जैसे गरीब मेहनतकश के चूल्हे पर पड़ रहा है.

इस बीच उपाध्याय साहब का एक फोनकाल आया कि दो तीन दिन का काम है, तो मैं दिल्ली आया. मुझे बताया गया कि उपाध्याय जी के पिता यानि ‘बाबू जी’ को किसी ख़ास रिश्तेदार के घर वृन्दावन लेकर जाना है, जहाँ पर किसी रिश्तेदार की मौत हुयी थी. बाबू जी को मैंने पहले भी देखा है वे कर्मकांडी, तिलकधारी पंडित हैं, पर मुझ से वे अपने पोते की तरह व्यवहार करते हैं. मैं बाबू जी को साहब की छोटी गाड़ी में वृंदावन लेकर गया एक बड़े से सजीले शोकाकुल बंगले पर हम पहुचे तो गाड़ी से उतरते ही बाबू जी ने मुझसे झुक कर कहा, “यहाँ तुम्हारा नाम प्यारेलाल रहेगा, समझे!” और मैं समझ गया.

मेरे रहने –ठहरने व खाने की व्यवस्था परिवार के लोगों के साथ ही थी. तीसरे दिन तेरहवीं होने के बाद जब सब विदा होने वालों को तिलक-रोली लगाकर विदा किया जा रहा था तो मुझे भी बदस्तूर दक्षिणा दी गयी.

बाबू जी वापसी के लिए जब गाड़ी में बैठे तो मुझ से बोले, “चल इस्लाम, अब चलते हैं.”
तब भावविभोर होकर मैंने बाबू जी से कहा, “बाबू जी अब मैं प्यारेलाल ही ठीक हूँ, आप इसी नाम से मुझे पुकारा कीजिये.”
***

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

उन्हीं की ज़ुबानी

गृह-प्रवेश का एक सुन्दर व आकर्षक निमंत्रण-पत्र कूरियर के हाथों मुझे मेरे घर पर मिला तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि भेजने वाले सज्जन, गोविन्द जोहारी, को मैं बिलकुल नहीं जानता था. ना इस नाम के किसी व्यक्ति से दूर दूर तक कोई रिश्ता था. कुमायूं में ‘जोहारी’ उपनाम धुर उत्तर में जोहार ( हिमालयी क्षेत्र ) के आदिवासी जनजाति के लोग लगाया करते हैं.

श्री गोविन्द जोहारी ने अपने पते में नाम के आगे आई.ए.एस. लिखा था, तथा अपने दो मोबाईल नंबर दे रखे थे. गृह-प्रवेश अल्मोड़ा शहर के आउट स्कर्ट में बिनसर मार्ग पर काफी ऊँचाई वाले स्थान पर नए बनाए भवन में होना था. मैं समझ नहीं पाया कि दूर के शहर में रहने वाले मुझ अपरिचित को बुलावा क्यों भेजा गया होगा? कहीं पता लिखने वाले ने गलती से तो मेरा पता लिख दिया? शंकातुर होकर मैंने उनसे फोन से सम्पर्क करके पूछना उचित समझा. फोन पर उनकी आवाज एक बूढ़े आदमी की सी भारी और बोझिल लग रही थी. उन्होंने कहा कि मुझे निमंत्रण कुछ ख़ास प्रयोजन से भेजा गया है. उन्होंने मेरी लिखी किताबें और बहुत से लेख पढ़े थे, और उनकी अपेक्षा थी कि मैं उनकी आत्मकथा लिखूं. बातों बातों में उन्होंने यह भी कह डाला कि वे मुझे मेरा लेखकीय पारिश्रमिक मुंहमांगा देंगे. बहुत सोचविचार करने के बाद मैंने निश्चय किया की उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया जाए. इस प्रकार मैं गृह-प्रवेश से एक दिन पहले ही सड़क मार्ग से उनके परिसर में पहुँच गया.

अल्मोड़ा शहर की ढलानों के ऊपर पूरब दिशा की और से बल खाती हुयी सड़क से जाते हुए मेरी गाड़ी उनके परिसर में पहुँच गयी. जहाँ एकांत में टीला काटकर सुन्दर दुमंजिला महलनुमा घर बनाया गया था. अहाते को मौसमी फूलों से सजाया हुआ था. चारदीवारी को ताजा ताजा रंगबिरंगे बिजली की रोशनियों से संवारा जा रहा था. कुछ कारिंदे अन्दर बाहर जा रहे थे. घर के निकट पहुँचते ही खुद जोहारी जी बाहर निकल कर आ गए. उनके बारे में जैसी मेरी कल्पना थी, वे उतने  भी ज्यादा बूढ़े नहीं थे. उम्र करीब सत्तर वर्ष होगी पर उनकी आवाज और हाथों में कम्पन मुझे स्पष्ट मालूम हो रहा था. उन्होंने मेरे ड्राईवर और अपने एक कारिंदे को मेरे ठहरने की व्यवस्था के बारे में समझाया और बड़ी आत्मीयता से मेरा हाथ थाम कर अपनी बैठक में ले गए. उन्होंने बताया कि गृह-प्रवेश तो उन्होंने महीने भर पहले ही कर लिया था, पर बरसात के चलते विधिवत पूजा अगले दिन के लिए टाल दी गयी थी. उन्होंने मुझ से कहा, “आप यहाँ घूमिये, फिरिए, इन वादियों का आनंद लीजिये; पूजा के बाद आपके साथ बैठक करूंगा.”

अपने घर से चलते समय तो मैं इसे सिर्फ एक बिजनिस ट्रिप मान कर चला था, पर यहाँ का नैसर्गिक सौन्दर्य और अक्टूबर माह की पुष्पित, सुगन्धित छटा को देखकर भावविभोर हो गया. दूर तक पर्वत श्रंखलाओं का घेरा और बीच में नीचे गहराई में कोसी नदी का सर्पीला मार्ग, सामने की पहाड़ियों पर हंसती हुई दन्तपंक्ति सी श्वेत बस्तियां; कोई प्रदूषण नहीं, शीतल मंद पवन के झोंके, कुल मिला कर एक अद्भुत अनुभूति हो रही थी. जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

जोहारी साहब ने  देवदार की लकड़ी के बहुत महंगे फर्नीचर बनवा रखे थे, जिनकी भीनी भीनी खुशबू हर तरफ महक रही थी. रात काफी ठंडी थी, पर गुदगुदे नरम बिस्तर पर सोते हुए मैं दूसरी दुनिया के सपनों में खोकर सो गया. अगली सुहानी सुबह को तरोताजा होकर अपनी कल्पनाओं को लेखनी से उकेरना शुरू कर दिया. दिन में पूजा पाठ हुआ. उनके आमंत्रित अनेक गणमान्य मेहमान आये, भोज में शामिल हुए. मैंने देखा कि कार्यक्रम में वैभव तथा व्यवस्था की कोई कमी नहीं थी. जब सब कार्यक्रम शालीनता पूर्वक सम्पूर्ण हो गया, तब जोहारी जी ने अपनी रामकहानी सुनाने के लिए मुझे अपने विशेष कमरे में बुलाया. मैं पेन, पेपर, और एक टेप-रेकॉर्डर लेकर पूरी तैयारी के साथ गया. कमरे में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती खेमा (क्षमा) देवी मौजूद थी. उनके चेहरे पर भी बुजुर्गी की सैकड़ों झुर्रियां थी.  नैन-नक्श  बिलकुल पहाड़ी/नेपाली थे. खुद जोहारी जी का चेहरा भी तिब्बतियन सा लग रहा था. मैंने उनकी पृष्ठभूमि पर उनसे पूछना चाहता था, पर वे अपनी निजी जीवन की परतें खुद ही खोलते चले गए.

“मेरा नाम गोविन्द जोहारी है. ये मेरी अर्धांगिनी खेमा है. हमारा एक ध्रुव नाम का बेटा है, जो नेदरलैंड में रहता है. हमारा मूल स्थान मुनस्यारी के पास जोहार दारमा में है, जो हिन्दुस्तान व तिब्बत की सीमा पर है. मेरे पिता के पास एक सौ भेड़ें (मेंढे) हुआ करती थी. वे अपने अन्य गांववालों की तरह ही भेड़ों पर नमक, आलू, ऊन, और पहाड़ी मसाले जम्बू-गंध्रायण आदि लाद कर, पैदल मार्गों से हल्द्वानी, नैनीताल के आढ़तियों तक पहुँचाते थे और वहाँ से गुड़, चावल तथा कुछ अन्य खाद्य सामग्री तिब्बत के व्यापारियों तक लेकर जाते थे. बचपन में मैं भी दो बार उनके काफिले के साथ पैदल धारचूला से हल्द्वानी तक आया गया था. जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ तो हमारी ‘भोटिया’ जनजाति को आदिवासी के रूप में अनुसूचित जनजाति की सूची में रखकर आरक्षण व विशेष सुविधाएं दी गयी. इसके लिए हम लोग स्व.गोविन्द बल्लभ पन्त और पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के शुक्रगुजार हैं.

मुझे पढ़ाई के लिए नैनीताल छात्रावास में रहने का अवसर मिला, जहां मैंने औसत विद्यार्थी की तरह पढ़ाई करके बी.ए. पास किया. सभी आदिवासी छात्रों के लिए मुफ्त भोजन व छात्रवृत्ति की व्यवस्था थी. सच पूछो तो ये हमारे लिए एक क्रान्ति के समान था. सभी लड़कों में पढ़ने और नौकरी करने की होड़ थी.

मैं सन १९७१  में पाकिस्तान  से हुई  लड़ाई के समय शार्ट सर्विस कमीशन के तहत सेना में भरती हो गया था. पांच साल बाद ही एक कैप्टन के बतौर पैंशन लेकर निवृत्त हो गया. सरकार ने मुझे फिर से सिविल में नौकरी दे दी. मैं जल बोर्ड का एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर बन गया. मैं पी.सी.एस. की परीक्षा में सफल रहा तो मुझे राजस्व विभाग का सेक्रेटरी बनाया गया. मैंने आर्मी में की गयी अपनी सेवा को जुड़वाने का आवेदन किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया. वरिष्ठता के हिसाब से कुछ सालों के बाद मुझे आई.ए.एस. का प्रमोशन मिल गया. हर जगह मुझे अनुसूचित जनजाति होने का लाभ भी मिलता रहा. मैं महाराष्ट्र के एक जिले में जिलाधीश के रूप में नियुक्त हुआ, तत्पश्चात अनेक जिलों में स्थांनातरण होता भी रहा. उसी दौरान पूना में मैंने अपना एक घर बनवाया. जिसकी लागत तब करीब पचास लाख रूपये आयी थी. हम लोग उस घर को अपना स्थाई निवास समझने लगे थे. वहीं हमारे बेटे का जन्म भी हुआ. पूना में ही ध्रुव की पढ़ाई-लिखाई हुई. उसने एम.सी.ए. करके एक इन्टरनेशनल कंपनी में नौकरी कर ली. आजकल उसकी नियुक्ति नेदरलेंड में है. मैं तो चाहता था की वह भी भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे, पर उसकी मर्जी नहीं थी."

ऐसा कहते हुए वे बहुत उदास हो गए थे और बहुत देर तक उनके बोल नहीं निकले. खेमा देवी चुपचाप उनका वक्तव्य सुन रही थी. मैं बीच बीच में उनके चेहरे के बदलते भावों को भी देख लेता था. वार्ता के बीच उन्होंने चाय भी मंगवाई। उन दोनों ने फीकी चाय पी क्योंकि दोनों ही मधुमेह से ग्रस्त थे. उन्होंने आगे कहना शुरू किया, “ध्रुव ने अपनी इच्छा से अपने साथ काम करने वाली एक यूरोपीय लड़की से शादी कर ली, और अब उनके दो बच्चे हैं. ये लोग हिदुस्तान आने में कई तरह की परेशानियां बता कर टालमटोल करते आये हैं. हम ही कई बार वहां जाकर आये हैं. अब भी जाने को मन तो होता है, पर अब हवाई यात्रा में दिक्कत महसूस करने लगे हैं.

सरकार ने मुझे सेवा के अंतिम वर्षों में प्रांतीय चुनाव आयोग का कमिश्नर बना दिया था. अब मुझे रिटायर हुए भी दस साल हो चुके हैं. पूना में इतने वर्ष बिताने पर भी हम वहाँ परदेस जैसा ही अनुभव कर रहे थे इसलिए यहाँ अपने मूल जिले में रहने का ठिकाना बनाया. यद्यपि हमने ये निर्णय बहुत देर से लिया है. अब तो अल्मोड़ा जिले के  चार टुकड़े हो गए हैं, पर अल्मोड़ा शहर कई मायनों में हमारे लिए सुरक्षित और सुविधाजनक है. मैंने पूना वाला घर तीन करोड़ रुपयों में फर्नीचर व सामान सहित बेच दिया है, और यहाँ अल्मोड़ा में सवा करोड़ में आप देख रहे हैं, ठीक-ठाक घर बन गया है. बड़ी बात ये है कि इस मिट्टी की खुशबू में अपनेपन का एहसास होता है, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर हम दोनों ही थक से गए हैं. बेटा बार बार कहता है कि नेदरलैंड में उनके साथ रहने को आ जाओ पर अब इन पुराने दरख्तों को कब तक नई नई जगह रोपते रहेंगे.” ये कहते हुए उनका गला फिर से भर आया. खेमा देवी की आँखें भी छलछला आई.

वे थोड़ा रुकने के बाद बोले, “मुझे अस्सी हजार रूपये पैंशन मिलती है. एक लाख से ज्यादा रूपये मेरी जमापूंजी के ब्याज व शेयर्स का रिटर्न आता रहता है. आप देख रहे हैं हम दोनों डाईबिटीज वाले हैं, सब कुछ होते हुए भी खा नहीं सकते हैं. अब ऊपर वाले से शिकायत भी नहीं कर सकते हैं; उसने हमको अपनी तरफ से सब कुछ दिया है.

मैंने इंटरनेट पर आपके ब्लॉग व सारगर्भित प्रसंग पढ़े हैं. आपकी लेखनी द्वारा चुने हुए शब्द विन्यास बहुत प्रिय लगते हैं इसीलिये मैंने आपको बुलाया और आपने भी मेरा मान रखा है. आप मेरी कथा को शब्दबद्ध कर दीजिये. मैं अपनी वसीयत के साथ इस कहानी को भी बांटना चाहता हूँ ताकि मेरे नजदीकी रिश्तेदार, जो अब मेरी जायदाद पर टकटकी लगाये हुए हैं, उनका आपस में कोई विवाद ना हो.”  ऐसा कहते हुए वे सोफे पर निढाल हो गए. संध्या समय में मैंने उन्हें आत्मकथा के छूटे हुए अंशों को उजागर करने वाले उनकी निजी जिन्दगी से सम्बंधित अन्य पहलुओं पर एक लम्बी प्रश्नावली बनाकर दी. जिसका जवाब उन्होंने तैयार करके, मेरे द्वारा चाहे गए पारिवारिक चित्रों, तथा बैंक के एक हस्ताक्षरित ब्लैंक चेक सहित उसके अगले दिन मुझे सौंप दिये. मैं अपने घर लौट आया हूँ. अब भी मैं जरूरत महसूस करने पर उनसे फ़ोन पर वार्ता करके उनके जीवन के अनछुए वृत्तांत पूछता रहता हूँ. एक बार पुनः मिलने जाऊंगा. मुझे गोविन्द जोहारी जी की ये आत्मकथा अगले दो माह में सम्पूर्ण करनी है.
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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

तारबाबू

हमारे पूरे अंचल में ‘तारबाबू’ के नाम से प्रसिद्ध हीरावल्लभ भट्ट अब अपनी उम्र के 95 बसंत देख चुके हैं. बुढ़ापा सबसे बड़ी बीमारी है, और उसमें भी अकेलापन बड़ी त्रासदी है. कभी कभी तो तारबाबू उन तमाम लोगों को गालियाँ देने लगते हैं, जो अब भी उनकी  और लम्बी उम्र की दुआ करते हैं. क्यों ना हो, जब आँखों की रौशनी बहुत घट जाये, कान जवाब देने लग जाएँ और आदमी चलने-फिरने में लाचारी महसूस करने लग जाए तो जीवन दुखदायी हो जाता है. पर क्या करें, ऊपर वाला कभी भी किसी के लिए उसकी मौत की तारीख का खुलासा नहीं करता है और माँगने से मौत भी नहीं देता है.

उनकी पैदाईश पिछली सदी के तीसरे दशक के प्रारम्भ में हुई थी. इलाहाबाद जाकर एंट्रेंस पास करने के बाद वे डाक विभाग में क्लर्क/तारबाबू बन गए थे. भगवत कृपा थी, घर में पिता के समय से ही धन-धान्य व अमन सुख था. विवाह हुआ पत्नी लाछिमा देवी एक समर्पित सदगृहणी मिली. देर से ही सही घर में वैभव और विराट दो जुड़वा पुत्रों का जन्म हुआ. कालांतर में दोनों लायक बेटों ने लखनऊ जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त की. बाद में एक बेटा अपनी पत्नी व बच्चों के साथ लन्दन जाकर बस गया. दूसरा बहुत समय तक तो स्वदेश में ही था, परन्तु अवसर पाकर अपनी पत्नी सहित आस्ट्रेलिया चला गया. बच्चे विदेश जाकर खूब कमायें, गाहे बगाहे माँ-बाप के हालचाल लेते रहें, तथा आर्थिक रूप से मदद करते रहें, तो सबको लगता है कि माता-पिता बहुत भाग्यवान हैं.

सत्तर के दशक में सरकारी नियमों के अनुसार 58 वर्ष की उम्र में वे रिटायर हो गए थे. तब वे पोस्ट एंड टेलीग्राफ में पूरे डिविजन के बड़े अधिकारी बन चुके थे. जब वे फकत तारबाबू हुआ करते थे, तब आज की तरह टेलेकम्यूनिकेशन सिस्टम एस.टी.डी., मोबाईल फोन या तीव्र संवाद प्रेषक इलैक्ट्रॉनिक साधन भारत में नहीं आये थे. टेलीग्राफ का ‘टक टक –डिस'  आवाज से संवाद सम्प्रेषण सुलभ साधन था. तारबाबू ने अपने कार्यकाल में ना जाने कितने तार भेजे या प्राप्त किये उनका लेखा-जोखा अलग से रखा जाता तो आज जरूर वह गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज होता. अब जब टेलीग्राफिंग बंद हो गयी है तो भट्ट जी को लगता है की उनके सतयुग का अंत हो गया है.

तारबाबू बहुत संवेदनशील व सहिष्णु व्यक्ति रहे हैं. जब भी दूर दराज गांवों के लोगों/ महिलाओं के नाम कोई तार आता था तो वे उन की मजबूरियों को ध्यान में रखते हुए उस सन्देश का हिन्दी अनुवाद भी साथ में लिख कर दे दिया करते थे क्योंकि ग्रामीण लोगों को तार पढ़वाने में बहुत दिक्कत होती थी. कभी कभी तो अर्थ का अनर्थ भी हो जाता था. पड़ोसी देशों से लड़ाई/युद्ध के दिनों में जब सिपाहियों के शहीद होने या गुम होने की खबर उनके पास आती थी तो वे खुद भी बहुत बेचैन हो जाया करते थे.

तारबाबू ने अपने जीवन में अनेक अनुभवों को आत्मसात करते हुए रिटायरमेंट के बाद नैनीताल जिले के रमणीक स्थान भीमताल में अपना एक सुन्दर सा घर बनवाया. पति-पत्नी दोनों प्राणी सुखपूर्वक रह रहे थे. बेटे अपने बीवी-बच्चों सहित साल-दो साल में अवश्य आकर उनका उत्साह कम नहीं होने देते थे. रिटायरमेंट पर जो विभागीय फोन उनके आवास पर लगा था वह कई सालों तक सम्पर्क स्रोत बना रहा तब मोबाईल क्रान्ति नहीं हुई थी. दुर्भाग्य ये हुआ की रिटायरमेंट के दस साल बाद सुलक्षिनी अर्धांगिनी का थोड़ी ही अस्वस्थता के बाद देहांत हो गया. बच्चे रिश्तेदार सब मातमपुर्सी के लिए आये और चले गए. तारबाबू उसके बाद नि:सहाय अकेले रह गए. बेटों ने उनसे बहुत आग्रह किया कि अब वे उनके ही साथ रहने के लिए चलें, पर उनका मन नहीं माना. जिन अरमानों के साथ अपना आशियाना बनाया था और जिसमें लछिमा देवी की छाया बसी हुयी थी उसे छोड़ना उनको बिलकुल नहीं भाया. अत: निपट अकेले रह गए. हाँ, घर का कामकाज व देखभाल के लिए बागेश्वर के दानपुर क्षेत्र का एक सेवक दरबानसिंह उनको मिल गया और तब से वही उनका पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर सब कुछ है. दरबानसिंह अपने मालिक तारबाबू को अच्छी तरह से समझने लगा है. उनकी हर जरूरत का ध्यान रखता आया है. पर लछिमा देवी की बात कुछ और ही थी, पति या पत्नी के आपस में बिछुड़ने के बाद उनकी जो कमी महसूस की जाती है उसे कोई भी वफादार सेवक पूरा नहीं कर सकता है.

छ: साल पहले जब वैभव भारत आया था तो तारबाबू ने उसको बताया कि बी.एस.एन.ल के लैंडलाइन फोन अकसर डेड हो जा रहे हैं इनकी बहुत बार शिकायत करनी पड़ रही है, तो वैभव ने पिता के लिए एक स्मार्ट फोन खरीद दिया और लैंड लाइन को हटवा दिया. उसने उनको फोन के तमाम फंक्शन समझा दिए लेकिन तारबाबू की अंगुलियां इस बेतार के टच स्क्रीन के ऐप्स पर नहीं चल पा रही थी. उनको अब बेटों से खुद फोन करके बात करने में परेशानी होने लगी थी. नजरों में कमी तो थी ही, सुनने में भी दिक्कत होने लगी थी. फोन आने पर कानों में माईक्रोफोन के तार लगा कर सुना करते थे. इस तरह काम चला रहे थे.

पिछले 20-25 दिनों से उनके फोन में कोई घंटी नहीं बजी. तारबाबू परेशान रहने लगे. दरबान तो बेचारा इस बारे में कुछ समझता नहीं है इसलिए मालिक की कोई मदद नहीं कर पा रहा था. आशंकाएं ये थी कि या तो फोन खराब हो गया है या बच्चे लापरवाह हो गए हैं. वे अब ये भी सोचने लगे कि “मुझसे तो ये सर्व साधारण लोग अच्छे हैं, जिनके बच्चे परिवार पास पास रहते हैं, दुखी-सुखी, लड़ना-झगड़ना भी तो जीवन का आनंद ही है”. कभी इस हद तक विचार करते हैं कि “मैंने पिछले जन्म में जरूर कोई ऐसा पाप किया होगा जिसका फल मुझे इस विछोह की त्रासदी के रूप में मिल रही है”. इस प्रकार अनेक मनोविकारों से ग्रस्त तारबाबू का संदेह पक्का होता जा रहा था कि “बच्चे जरूर फोन मिला रहे होंगे, और मेरे फोन में ही खराबी आ गयी है.” रात-दिन फोन में ही ध्यान रखने लगे जब प्रतीक्षा लम्बी हो गयी तो एक दिन दरबान को साथ लेकर बाजार में मोबाईल रिपेयरिंग शॉप तलाश करके मैकेनिक से फोन दुरुस्त करने को कहा. इस वक्त उनको अपने उन पुराने दिनों की याद ताजा हो आई जब लोग अपने प्रियजनों से तार द्वारा संपर्क साधने के लिए पोस्ट आफिस में  चिंतातुर हालत में उनके पास आया करते थे.

मैकेनिक ने मोबाईल फोन को जांचा-परखा और बोला, “बाबू जी, इस फोन में कोई  खराबी नहीं है.” ये सुन कर तारबाबू बहुत भावुक हो गए उनकी धंसी हुयी आँखों की कोटरे आसुंओं से भर आई. अवश्य ही बच्चों ने उनको कोई फोन नहीं किया होगा. सब लापरवाह हो गए हैं.

तारबाबू ने मैकेनिक को अपने परदेसी बेटों के फोन नंबर दिए. एक एक कर दोनों को फोन मिलाये, वे “हैलो-हैलो" करते रहे, पर तारबाबू के गले से कोई शब्द नहीं निकल पाया, गला बुरी तरह रुंधा हुआ था, आँखें नम थी.
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मंगलवार, 11 नवंबर 2014

डर

आज मौली का 35वां हैप्पी बर्थडे है. वह कई दिनों से इसे कुछ नए ढंग से मनाने की सोच रही थी, पर घर गृहस्थी के काम उसे उलझाए रहे. उसने परम्परागत ढंग से ही सुबह नहा-धोकर घर के ही मंदिर में दीप प्रज्ज्वलित कर पूजा-अर्चना की फिर पतिदेव को प्रणाम कर प्यार पाया, उल्लासित होकर रसोई में चली गयी. उसे माँ की बहुत याद आ रही थी. उसने माँ की पसंद की काजू, किशमिश, पिस्ते-बादाम वाली गाढ़ी खीर बनाई. पूड़ियाँ बनाई, बड़े बनाए और केले के मालपुए बनाए. दस वर्षीय बेटे अक्षत और पति रजनीकांत को पेटभर खिलाया. शनिवार था इसलिए अक्षत को आज स्कूल नहीं जाना था. रजनीकांत अपने निर्धारित समय पर ऑफिस को चला गया. 

पकवान खुद खाने से पहले उसने एक टिफिन डिब्बे में अलग अलग खानों में सारी चीजें माँ के लिए पैक कर रख दी. माँ के पास जाने के लिए जल्दी जल्दी तैयार हो रही थी कि इतने में उसकी स्कूलमेट भावना का फोन आ गया कि ‘वह एक घंटे बाद उसके घर विज्ञान नगर पहुँच रही है’. मौली एकदम सकते में आ गयी. वह भावना को बता नहीं सकी कि उसे डडवाडा (कोटा रेलवे स्टेशन के पास) माँ के पास जाना है. नई परिस्थिति पर सोचते हुए उसने अक्षत को पास बुलाकर पूछा, “बेटा, तू अकेला नानी के पास जा सकता है?” अक्षत ने बिना सोचे समझे आत्मविश्वास से कहा, “मैंने नानी के घर का रास्ता देखा है, टेम्पू से जाऊंगा, बजरिया में मंदिर पर उतर कर सीधे नानी के घर चला जाऊंगा.”

मौली की माँ वेदवती देवी अपने पुश्तैनी घर में अकेली रहती हैं. वह अध्यापिका थी और अब रिटायर हुए पांच साल हो चुके हैं. मौली उनकी इकलौती संतान है. वह मौली की शादी के बाद चाहती थी कि रजनीकांत घर जंवाई बन कर उनके पास ही रहें, पर रजनीकांत को ये मंजूर नहीं था. उसका कहना था, “आप आकर हमारे साथ रहो”. रजनीकांत का विज्ञान नगर में अपना बड़ा दुमंजिला मकान है, जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं हैं. उसका अपना कार्यस्थल इन्द्रप्रस्थ औद्योगिक क्षेत्र भी दूसरी दिशा में है, तथा अक्षत का स्कूल भी तलमंडी में नजदीक है. माँ का मन है, वो बेटी से कहने लगी, “मेरे बाद ये सब तुम्हारा ही है, जब तक हाथ-पाँव चल रहे हैं, मैं डडवाडा में ही रहूँगी. इसमें तुम्हारे पिता की यादें भी बसी हुयी हैं. जब अशक्त हो जाऊंगी तो तुम्हारे पास ही आना पड़ेगा.” माँ-बेटी में बहुत प्यार व समझदारी है, स्वाभाविक रूप से एक दूसरे की बहुत चिंता किया करती हैं. मौली ने बचपन में बाप की जगह भी माँ को ही पाया था, और ये भी सच है कि बेटी ही माँ को सबसे अच्छी तरह समझ सकती है. उसे याद है उसके जन्मदिन पर माँ उसे सजा-संवार कर पूजा किया करती थी, उसकी सहेलियों को घर बुलाकर ढेर सारे पकवान बना कर खिलाती थी. अब मौली हर वार-त्यौहार या शुभ दिन, माँ का आशीर्वाद लेना नहीं भूलती है.

आज ऐन वक्त पर भावना का फोन आ गया तो सोचा माँ से शाम को जाकर मिल लूंगी. माँ के पास लैंड-लाइन टेलीफोन है, पर माँ के कान जवाब दे गए हैं, बहुत कम सुनाई पड़ता है. समस्या के निराकरण के लिए ई.एन.टी. डॉक्टर से कान की जांच करवाकर सुनने की मशीन लगवा दी है, पर माँ कहती है कि ‘ये बहुत असुविधाजनक है’ इसलिए निकाल कर रख देती है, और जब जरूरत महसूस करती है तो फिट कर लेती है. मौली की शुक्रवार को माँ से बात हुयी थी. मौली ने कह दिया था कि “खाना मत बनाना, मैं लेकर आऊँगी”. अब इस असमंजस में जब अक्षत नानी के घर जाने को तैयार हो गया तो उसे राहत मिल गयी. एक थैले में टिफिन डब्बा रख कर, अच्छी तरह ले जाने को समझाकर, टेम्पो के लिए खुले रुपये देकर, अन्दर की जेब में १०० रुपयों का एक नोट भी रख दिया. अक्षर तुरंत दबे पाँव निकल गया. मौली जब तक उसे देख पाती, वह एकदम गायब हो गया. मौली पीछे पीछे झालावाड़ रोड तक भी गयी, पर अक्षत ने कमाल कर दिया इतनी जल्दी निकल गया. मौली ने कभी भी बेटे को इस तरह अकेले सड़क पर नहीं छोड़ा था. जिस तरह मुर्गी अपने चूजे को अपने पंखों के अन्दर छुपाये रखती है, उसी तरह मौली ने बेटे को कोई एक्सपोजर नहीं होने दिया था. अब सोच रही थी कि ‘सीधे सीधे टेम्पो जाते है, हजारों लोग आते-जाते रहते हैं’, लेकिन मन में बैठा चोर डरा भी रहा था कि कोई अक्षत का अपहरण न कर ले क्योंकि आजकल कोटा में ऐसी अपराधिक धटनाएं बहुत होने लगी थी. ये भी सोच रही थी कि एक दिन तो बच्चे को इस दुनिया में अकेले विचरण करना है. उसने कई बार माँ को फोन लगाया पर वह उठा नहीं रही थी. माँ जरूर मशीन हटाकर काम में लग रही होगी या सो गयी होगी.

भावना आई, खूब गले मिले, गिले शिकवे हुए. वह बर्थडे गिफ्ट लेकर आई थी. दरअसल भावना मौली का जन्मदिन हमेशा याद रखती है. दो घटों तक दोनों सहेलिया खूब बतियाती रही फिर वह चली गयी. इस बीच भी मौली के मन में बार बार अक्षत का ख़याल आ रहा था. एक बार फिर से फोन लगाया तो माँ ने उठा लिया, पर ये क्या? उसने बताया कि अक्षत वहाँ नहीं पंहुचा था. दिन के दो बजने को आये थे. बच्चे का वहां नहीं पहुंचना चिंता का विषय हो गया. उसने तुरंत पति को फोन किया और घबराहट में यथास्थिति बयान कर दी. रजनीकांत पहले तो अक्षत को इस तरह अकेले भेजने पर नाराज हुआ फिर तुरंत घर की तरफ रवाना हो गया. मौली बदहवास सी होकर पड़ोस के लोगों व बच्चों को अपनी बात बताने निकल पड़ी. सब लोग सुनकर हैरत में थे कि अक्षत खो गया.

उधर माँ भूखी थी, इस बात की भी चिंता हो रही थी. तीन बजे रजनीकांत घर पहुँच गया. पति-पत्नी दोनों ने तय किया कि एकदम पुलिस स्टेशन जाने के बजाय रेलवे स्टेशन की तरफ जाकर डडवाडा में उसे खोजना चाहिए. पड़ोस में हल्ला होने से कुछ लड़के पहले ही निकल पड़े थे. रजनीकान्त ज्यों ही मोटर-बाईक उठाने के लिए सीढ़ियों से नीचे उतरा तो उसको वहाँ कुछ खटपट की आवाज सी सुनाई पड़ी, जब झुककर देखा तो अक्षत को सिमटकर छुपा बैठा पाया.

रजनीकांत ने मौली को आवाज दी और बताया, “अक्षत तो यहाँ दुबका बैठा है!” उसे पाकर दोनों को बड़ी राहत मिली. इस अजीब स्थिति पर अक्षत ने रोना शुरू कर दिया. उसे प्यार से समझाकर अन्दर ले गए. रजनीकांत मौली से बोले, “इसे डरपोक बनाने का श्रेय तुमको जाता है.” फिर अक्षत की नानी को फोन से सूचना देकर वे तीनों टिफिन डिब्बा लेकर नानी के पास गए. वह भी बेहद डरी हुई थी.
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बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

बेटाराम

डार्विन के विकास के सिद्धांत को यों ही मान्यता नहीं मिली है. उसमें तमाम व्यवहारिक व वैज्ञानिक तथ्य हैं. ये प्राणीमात्र, ये समाज, और ये दुनिया पल पल बदलते रहे हैं. मनुष्य बन्दर से आदमी, जंगली से सभ्य मानव होते गए, यद्यपि मूलभूत गुणावगुण साथ चलते रहे हैं.

कहानी का नायक श्यामू, जो अब सम्मानीय रिटायर्ड वरिष्ठ नागरिक है, गाजियाबाद में आबाद है. पिछली शताब्दी के छठे दशक में रोजगार की तलाश में सुदूर पिथौरागढ़ के पास एक अति पिछड़े गाँव भट्टराई (तब पिथौरागढ़ अविभाजित अल्मोड़ा जिले का ही भाग था) से दिल्ली आया. दरअसल आजादी के बाद नई दिल्ली के सरकारी दफ्तरों व उनसे सम्बंधित गैर सरकारी दफ्तरों में उन दिनों नौकरियों की बहार आई थी. उसमें शीर्ष पद तो दक्षिण भारतीय या बंगाली बाबू ले उड़े क्योंकि उनको अच्छी अंग्रेजी आती थी. छोटे चपरासी, दफ्तरीयों, चौकीदारों-फराशों के लिए यू.पी., बिहार, या दिल्ली के आसपास के लड़के दरियागंज स्थित रोजगार दफ्तर के माध्यम से घुसने लगे. इन नौकरियों के प्रति आकर्षण ठीक वैसा ही था जैसा बाद में आई.टी. सैक्टर वाले लड़कों का हैदराबाद/बैंगलूरू की तरफ, और बाद में यूनाइटेड स्टेट्स की तरफ चला गया.

श्यामबल्लभ भट्टराई अपने गाँव के ही नामी चाचा प्रकाश भट्टराई के भरोसे दिल्ली युसूफ सराय पहुँच गया, जहां प्रकाश भट्टराई अपनी पत्नी व छोटी बेटियों के साथ एक झुग्गी-झोपड़े में रहता था. श्यामबल्लभ ने उसी साल थर्ड डिविजन में यू.पी बोर्ड से हाईस्कूल पास किया था. प्रकाश भट्टराई उसका सगा चाचा तो नहीं था, लेकिन गाँव में उसकी बड़ी हांम थी. वह कुछ वर्षों पहले दिल्ली आकर मालामाल हो गया था. उसे निर्माणाधीन आल इंडिया मेडीकल इंस्टिट्यूट में रात की चौकीदारी जो मिल गयी थी. रात में वह सीमेंट, लोहा-लक्कड़ का पूरा मालिक हो जाता था. चोर-कबाड़ी लोग व्यवस्था की कमजोर कड़ी ढूंढ ही लेते हैं. इस प्रकार उसने खूब रुपये कमाए. दुनिया को बताने के लिए उसने दिन में अपना एक चाय का खोमचा भी खोल रखा था. वैसे तब दौर समाजवादी आर्थिक क्रान्ति का चल रहा था, उसे तब भ्रष्टाचार नाम नहीं मिला था. कहते हैं कि पंजाब के कुछ असंतुष्ट नेताओं ने जब प्रधानमंत्री नेहरू जी से मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैरो के बारे में गंभीर शिकायतें की तो उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में लेकर कहा, "देश की दौलत देश में ही तो है.”

प्रकाश भट्टराई जब भी पहाड़ अपने गाँव जाता था तो उसके साथ बहुत मालमत्ता होता था, उसके ठाट निराले होते थे. वह शाल-दुशाले में रहता था. गाँव में वह आदरणीय तथा आदर्श बन गया. वह जरूरतमंदों को आर्थिक मदद देकर उपकृत भी करता था इसलिए चंद वर्षों में उसका असली नाम नेपथ्य में चला गया और ‘सेठजी’ के नाम से जाने जाना लगा.

श्यामू जब सेठजी के पास पहुंचा तो उन्होंने पहले तो उसे खूब अपनापन जताया. ‘बेटाराम’ संबोधन से पुकारने लगे, पर धीरे धीरे आश्रय देने के एवज में रसोई के काम में चाची का हाथ बंटाने व जूठे बर्तन साफ़ करने की आवश्यक जिम्मेदारी से भी नवाज दिया. तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है कि ‘पराधीन सपनेहु सुख नाही’ वह जो सपने संजो कर सेठजी के पास आया था, वे सब बिखर गए. सेठजी उससे काम कराने के लिए पुचकारते हुए ‘बेटाराम’ तो पुकारते थे, पर श्यामू इसे आतंक के रूप में महसूस करने लगा था. फिर भी एक काम अच्छा यह हो गया कि श्यामू ने दरियागंज स्थित एम्प्लायमेंट एक्सचेंज में अपना नाम दर्ज करवा लिया.

श्यामू का मन दिल्ली से भाग जाने को करने लगा था. जाने से पहले वह एक बार रोजगार दफ्तर की तरफ पूछताछ के लिए गया, जहाँ अचानक उसे अपने स्कूल का पूर्वपरिचित, धर्मानंद नामक लड़का, मिल गया. धर्मानंद एक सरदार जी के घरेलू नौकर के बतौर काम करता था. उससे मिलकर श्यामू को ऐसा लगा कि जैसे किसी ने अँधेरे बीहड़ में उसका हाथ थाम लिया हो. धर्मा ने सरदार जी से उसका परिचय कराया तथा कोई काम दिलाने का निवेदन भी कर डाला. सरदार जी एक बन्दर एक्सपोर्ट कंपनी चलाते था. देश के कई भागों से बन्दर पकड़ कर पिंजरों में दिल्ली लाये जाते थे फिर उनको गंतव्य की और भेजा जाता था. सरदार जी ने श्यामू को दिल्ली के रेलवे स्टेशन पर बन्दर गिनने व पिंजरे सँभालने का जिम्मा दे दिया. करीब एक साल तक बन्दर संभाल करते हुए श्यामू खुद भी बन्दर सा हो चला था, पर उसकी किस्मत ने ऐसी पलटी मारी कि उसे एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज से मेडीकल इंस्टीट्यूट में ही अटेंडेंट की नौकरी का परवाना मिल गया.

जब श्यामबल्लभ भट्टराई सरकारी नौकर हो गया तो उसने नए परिवेश में साथियों की देखादेखी अंग्रेजी टाईप-राईटिंग सीखनी शुरू दी. तीन साल बाद उसे अपनी योग्यतानुसार एल.डी.सी. टाईपिस्ट का प्रमोशन भी मिल गया. वह बाबू हो गया. जब संस्थान का विस्तार हुआ और विभागों का पुनर्गठन हुआ तो सेठजी चपरासी बन कर श्यामबल्लभ भट्टराई के विभाग में ही आ गया. अगले दस वर्षों के अंतराल में श्यामबल्लभ भट्टराई पहले सेक्शन इंचार्ज और बाद में एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफीसर बना दिया गया.
   
चोर चोरी करना छोड़ दे तो भी हेराफेरी से बाज नहीं आता है. अपने सेवाकाल के आख़िरी दिनों में प्रकाश भट्टराई ने कार्यालय के कबाड़े के साथ दो टाईपराईटर भी चोरी के साथ बेच डाले. बात पकड़ में आ गयी और ऊपर तक रिपोर्ट पहुँच गयी. वह सस्पेंड कर दिया गया. अब तो प्रकाश अपने बेटाराम को ‘साहब-साहब’ पुकारते हुए पगचम्पी की जुगत में रहने लगा, लेकिन मामला ‘बेटाराम’ के वश से बाहर हो चला था. केस लंबा चला, जैसा कि आम सरकारी कर्मचारियों के मामले में होता है. इन्क्वायरी की फाईल से कुछ जरूरी सबूत गायब हो गए. और सबूतों के अभाव में प्रकाश भट्टराई बाद में बरी कर दिया गया.करनी किसी की भी हो सकती थी पर लोग बातें करते रहे कि आखिरकार ‘बेटाराम’ ही शायद सेठजी का तारणहार रहा होगा.
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रविवार, 7 सितंबर 2014

मेरी फ़िक्र मत करना

पचासी साल की उम्र में जब मास्टर जगदीश उपाध्याय जी ने अपना नश्वर शरीर छोड़ा तो गाँव के सभी लोगों को डर था कि उनकी जीवनसंगिनी रुपसा देवी भी कहीं भावावेश में ऐसा ना कर बैठे कि गाँव-बिरादरी को दोहरा सूतक झेलना पड़े. इसमें बहुत सच्चाई है कि इस जोड़े को आपस में अगाध प्रेम रहा. इसे यों भी व्यक्त किया जा सकता है कि वे ‘एक जान दो शरीर’ थे. इनका साठ वर्षों का वैवाहिक जीवन ‘दो हंसों के जोड़े’ की तरह रहा. हालत यहाँ तक रही है कि गाँव के लोग इनके प्रेम-बंधन की कसमें खा लेते हैं.

पिछले महीने ही एक अनपेक्षित घटना इसी गाँव में घटी कि मदनलाल शर्मा के देहावसान पर उनकी अर्धांगिनी सुमित्रा रानी ने लाश उठाने से पहले ही चुपचाप सल्फास की छ: गोलियां निगल ली थी और शर्मा जी को अकेले विदा नहीं होने दिया. इस बारे में बहुत सी चर्चाएँ हुई. कोई कहता है की उनके बेटों में माता-पिता के प्रति प्रतिबद्धता नहीं थी और बहुएँ कर्कश तथा दुःखदायिनी हैं; कोई कहता है कि सुमित्रा रानी पति की जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पाई थी. इस घटना के मद्देनज़र अब जब जगदीश उपाध्याय मरणासन्न हैं तो सबकी तीखी नजरें वृद्धा रुपसा देवी पर थी. 

ग्रामप्रधान ने तुरंत कुछ जिम्मेदार लड़कों को उसकी ख़ास निगरानी पर लगा दिया ताकि वह जहर खाकर या कोसी नदी में कूदकर अपने प्रियतम के साथ ही जाने का उपक्रम न कर सके.

जगदीशचंद्र उपाध्याय पेशे से अध्यापक थे और सत्ताईस साल पहले सेवा से रिटायर हो गए थे. रुपसा देवी उम्र में उनसे केवल दो साल छोटी थी. उनके पास भगवान का दिया हुआ बहुत कुछ था, लेकिन ऊपर वाले ने उनके नाम कोई औलाद नहीं लिखी थी. जगदीशचन्द्र जी कहा करते थे जिन बच्चों को उन्होंने पढ़ाया है, वे सब उनकी संतान ही तो हैं. हाँ, प्रौढ़ होने तक पति-पत्नी दोनों ही औलाद के लिए मंदिरों में मन्नतें जरूर मांगते रहे थे पर दैविच्छा पर किसका वश है? वे ये भी सोचते विचारते हैं की जिनके आठ आठ संतानें हैं, वे कहाँ सुखी रहते हैं? उलटे बच्चों के कार्यकलापों व व्यवहार से दुखी रहते हैं.

हमारे ग्रामीण समाज में वृद्धाश्रम जैसी संस्था की कोई कल्पना नहीं है, पर ‘पुतघर’ (धर्मपुत्र) रखने की कई मिसालें हैं. मास्टर जगदीश उपाध्याय जी ने अपने एक भतीजे नवीनचंद्र को विधिवत गोद तो नहीं लिया, पर बचपन से ही अपनाया हुआ है. इसलिए उसी को अपने बुढ़ापे का सहारा समझ कर स्नेह-प्यार न्यौछावर करते रहे हैं. नवीन भी अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझता है. मदनलाल शर्मा के घर में हुई दुखांत घटना से बहुत भयभीत है. वह ताऊ जी की मृत्यु की कल्पना से सिहर उठता है कि कहीं ताई जी को हृदायाघात ना हो जाये या वह कोई घातक कदम ना उठा ले. इसलिए उसने घर का कोना कोना छान मारा है कि कहीं कोई विषैली चीज ना पड़ी हो. वह केवल ताई जी का एक ताला पड़ा हुआ संदूक नहीं खोल सका है जिसमें संदेहास्पद सामान हो सकता था.

जब से जगदीशचंद्र जी के बोल बंद हो गए थे, रुपसा देवी ने भी बोलना बंद कर दिया था. निगरानी में लगे सभी लड़के अंतिम क्षणों में चैतन्य होकर घर-बाहर घूम रहे थे. मास्टर जी ने अपने प्राण नेत्र द्वारों से त्यागे तो शरीर को नहला धुला कर मुंह में तुलसीपत्र, गंगाजल व स्वर्ण पत्रिका डाली गयी. बैतरनी पार करने के लिए बछिया की पूंछ पकड़ाई गयी, शरीर पर चन्दन का लेप किया गया, बांस और सूखी घास का बिछोना बनाकर सफ़ेद चादर से चारों कोने बांधे गए, तब मास्टर साहब को अंतिम यात्रा के लिए इस पर लिटाया गया. दर्शनार्थियों ने अंतिम दर्शन किये। रुपसा देवी को महिलाओं ने सहारा देकर सात उलटे फेरे लगवाये, और फिर वह प्रणाम की मुद्रा में पैरों के पास बैठ गयी. ऊपर से कफ़न का लाल कपड़ा डाला जाने लगा. पुष्प और गुलाल डालने की तैयारी हुई तो रुपसा देवी एकाएक उठकर घर में गयी अपना बक्सा खोला अंजुरी भर कर चांदी के सिक्के निकाले और अर्थी के पास बाहर आ गयी. अर्थी उठाने के साथ जब ‘राम नाम सत्य है’ की आवाज हुयी तो रुपसा देवी सिक्के अर्थी पर उछालते हुए जोर से बोल पड़ी, “जाओ जगदीश्वरो! खुशी, खुशी जाओ. मेरी फ़िक्र मत करना.”

उपस्थित जन समूह ग़मगीन होते हुए भी  मुस्कुरा उठा.
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रविवार, 20 जुलाई 2014

लक्की

उसका नाम लक्की ना जाने किस तुफैल में रख दिया था, अन्यथा वह तो पैदाइशी बदकिस्मत था. माँ लीलावती अपाहिज तथा मानसिक रूप से कमजोर थी. बाप का मुख देखना भी उसे नसीब नहीं हुआ. लक्की के पैदा होने से चार महीने पहले ही एक दुर्घटना का शिकार हो गया था. चाचा-ताऊ सब दकियानूसी व गैरजिम्मेदार निकले. उन्होंने लीलावती व उसके बच्चे को अपशकुनी समझते हुए अपने लिए बोझ बता कर मायके में रहने को मजबूर कर दिया.

यों लक्की अपने नाना-नानी के आश्रय में पला-बढ़ा. ननिहाल में भी लक्की के मामा-मामी ने कोई खैर-खुशी नहीं जताई. ये लोग बरेली जिले के एक दूर दराज गाँव में रहते हैं. नाना देवीदयाल गुप्ता गाँव में ही साहूकारी का धन्धा किया करते हैं, और स्वाभाविक रूप से छोटे सिक्कों को भी दांत से पकड़े रहते हैं. लक्की यहाँ पर अभावों में लावारिस बच्चे की तरह परवरिश पाता रहा. सरकारी स्कूल द्वारा परोसे जाने वाले ‘मिड-डे मील’ का लक्की को शारिरिक बढ़त देने में बड़ा हाथ रहा है.

लक्की गाँव में ही जब अच्छे नंबरों से हाईस्कूल पास कर गया तो रुद्रपुर में रहने वाली उसकी बड़ी मौसी ने आत्मीयता जताते हुए अपने घर में रहने व वहीं आगे की पढ़ाई करने का आग्रह किया तो लक्की को वहा भेज दिया गया. उसकी आगे की पढ़ाई के लिए एडमिशन भी हो गया. मौसी जो की जुबान की बहुत मीठी है, बोली, ‘मेरे तीन बच्चे हैं, ये चौथा आ गया है, बेसहारा है, पल जाएगा. आगे कोई ट्रेनिंग-वेनिंग करेगा तो अपने साथ लीलावती का जीवन भी सुधार लेगा.” पर मौसी का गुप्त एजेंडा यह भी था कि रोटी के बदले लक्की से घर के सारे काम करवाए जाएँ. बेचारा लक्की यहाँ एक नौकर की भूमिका में आ गया. लेकिन वह दीन-दुनिया की ख़बरों के साथ साथ अपनी पढ़ाई में भी बहुत मेहनत करता रहा. अच्छे नंबरों से पास होते हुए बी.काम. फाइनल तक पहुँच गया.

इस बीच जो उसने भोगा-झेला वह उसकी अंखियों से छलके हुए मोटे मोटे आंसू बयान करते रहे. मौसेरी बहनें व भाई उसके साथ भरपूर दुर्व्यवहार करते थे. मौसा-मौसी जानते सुनते भी अनजान बने रहते थे. कुटिल व स्वार्थी लोगों की दुनिया में बहुत से लक्की जैसे बेबस चुपचाप अपना समय निकालते हैं, उफ भी करने से डरते हैं. मगर प्रकृति अपना काम करती रहती है. जहाँ लक्की बी.काम. की परीक्षा में रैंकिंग स्टूडेंट रहा, वहीं उसका मौसेरा भाई लगातार तीन वर्षों से हाईस्कूल में फेल होता रहा.

खुसखबरी ये है कि स्थानीय महेश्वरी समाज ने अपनी जाति के इस होनहार लड़के के परीक्षा रिजल्ट व आर्थिक विपिन्नता की स्थिति का संज्ञान लेते हुए लक्की को बड़ी स्कॉलरशिप देने की घोषणा कर दी है. अब लक्की को मौसी के घर जूठे बर्तन साफ़ नहीं करने पड़ेंगे. वह वह लखनऊ जाकर आगे की पढ़ाई जारी रखेगा. वहीं महेश्वरी हास्टल में रहने-खाने की व्यवस्था रहेगी.

यह सच है कि प्रतिभा किसी की धरोहर नहीं होती है. लक्की के लिए अब बहुत बड़ा खुला आसमान होगा और अनन्त संभावनाएं भी.

शर्मीला भोला-भाला, बुद्धू सा दीखने वाले लक्की के बारे में अड़ोस-पड़ोस के अल्प परिचित लोगों की धारणा उसके बारे में एकदम बदल गयी है. पण्डित रमाशंकर शास्त्री जी ने उत्सुकतावश जब लक्की का आईक्यू जांचना चाहा तो वे तआज्जुब कर गए कि लक्की तमाम समसामयिक विषयों की गहरी जानकारी रखता है. देश की सामाजिक राजनैतिक व्यवस्थाओं पर अपने बेबाक विचार रखता है. चाचा-ताऊ, मामा-मामी व मौसी के परिवार के लोगों का अपने प्रति रवैये को वह परिस्थितिजन्य बताता है और किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखता है. शास्त्री जी सबको बताते फिरते हैं कि “एक दिन यह लड़का अवश्य ही समाज का आदर्श बनेगा.
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मंगलवार, 10 जून 2014

आत्मग्लानि

पुराने लोगों ने कहा है, "माया तेरे तीन नाम - परसा, परसू, परसराम," और हमने अपने जमाने में देखा-सुना है, "सत्ता तेरे तीन नाम - पनिया, पन्ना, पनीराम."

हमारे कूर्मांचल प्रदेश का सामाजिक ताना-बाना मैदानी देश से कुछ अलग ज्यादा ही वैदिक रहा है. देश की आजादी के बाद इसमें सुधार व नवचेतना जागृत हुई है. यहाँ शुरू में राजनैतिक रूप से लोग केवल काँग्रेस पार्टी को ही जानते थे. चुनावों के समय केवल रामराज्य परिषद या सोशलिस्ट/प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के झंडे-टोपी से उनका परिचय पाते थे. पूरे अविभाजित अल्मोड़ा जिले (अल्मोड़ा + बागेश्वर + पिथोरागढ़ + चंपावत) का एक सांसद होता था, और इलाका पट्टियों में विधायकी क्षेत्र होते थे. जिनके बड़े-बूढ़े स्वतंत्रता सेनानी थे या जिनको सत्ता की सीढ़ियों का ज्ञान हो गया था, वे क्षेत्रीय प्रतिनिधि बन कर राज करने लगे या यों कहना चाहिए सत्तासुख भोगने लगे. लगभग सभी नेताओं की अगली पीढियाँ शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि में ऊपर उठती चली गयी जो कई बार आपसी ईर्ष्या व प्रतिद्वन्दता का कारण भी बनता रहा है.

संवैधानिक व्यवस्था के तहत कुछ क्षेत्रों में पिछड़े वर्गों/दलितों/आदिवासियों को आरक्षण मिला तो वोट बैंक की राजनीति के साथ पुरानी सामाजिक मान्यताओं को तोड़ती हुई नई सोच पैदा हो गयी कि नौकर मालिक की तरह व्यवहार करने लगे और मालिक सेवक हो गए.

कत्यूर घाटी में छोटी गोमती नदी के किनारे बसे सुरडा गाँव में अधिकतर घर जोशी पंडितों के हैं. जिनका पुस्तैनी काम आसपास के गाँवों में जजमानी/पंडिताई करना रहा है. गाँव में कुछ ठाकुरों के घरों के अलावा लोहार, बढ़ई, ओढ़ (राज मिस्त्री) ढोली जातियों के शिल्पकारों के भी हैं. सैकड़ों वर्षों से ये गरीब शिल्पकार अपने गुसाईयों की सेवा करते रहे हैं. और आपस में अपनेपन का पारिवारिक रिश्ता रहा है. ये एक दूसरे पर पूरी तरह निर्भर भी रहते आये हैं. आजादी की रोशनी में गाँव गाँव में जब स्कूल खोल दिये गए हैं तो पंडितों, ठाकुरों के बच्चों के साथ शिल्पकारों के बच्चे भी स्कूल जाने लगे तथा बाहरी दुनिया से साक्षात्कार करने लगे.

पण्डित ईश्वरीदत्त का लड़का जीवनचन्द्र और उनके हाली बचीराम का बेटा पनीराम कौसानी से हाईस्कूल करने तक साथ साथ पढ़े. जीवनचन्द्र फार्मसिस्ट की ट्रेनिंग लेकर घाटी के सरकारी अस्पताल में कार्यरत हो गया और पनीराम तत्कालीन विधायक मोहनसिंह मेहता जी की व्यक्तिगत सेवा में लखनऊ चला गया. मेहता जी की छत्रछाया में पनीराम नौकर से कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. उसे नेतागिरी की मौजूदा कार्यप्रणालियों का अच्छा ज्ञान भी होता गया. कालान्तर में कुछ वर्षों के बाद जब ये विधान सभा क्षेत्र पिछड़ी जाति के लिए सुरक्षित घोषित हो गया तो पनीराम ने विधायक बनने की जुगत शुरू कर दी. अपने परिवार के पीढ़ियों से अन्नदाता रहे ईश्वरीदत्त जोशी के पुत्र जीवनचन्द्र की उपयोगिता का ख़याल आया. सहपाठी होने के कारण भी जीवन को पनीराम में अनेक संभावनाएं नजर आने लगी. पनीराम के आग्रह के अनुसार जीवनचन्द्र गाँव गाँव जाकर पनीराम के समर्थन में ग्राम प्रधानों, सभापतियों व अन्य जनप्रतिनिधियों से विधायकी टिकट देने की सिफारशी आवेदन लिखवाकर कांग्रेस के प्रांतीय कार्यालय लखनऊ तथा केन्द्रीय कार्यालय नई दिल्ली को डाक द्वारा मुस्तैदी से भिजवाता रहा. नतीजन पनीराम को कॉग्रेस का टिकट मिल भी गया. कांग्रेस के टिकट मिलने का मतलब जीत की गारंटी हुआ करती थी.

जीवनचन्द्र खुश था. खुद को किंगमेकर समझने लगा. बचपन का पनिया अब पनीराम आर्या राज्यमंत्री बन गया. शास्त्रों में भी लिखा है कि पद का मद चढ़ता ही है. एक बार राज्यमंत्री पनीराम  आर्या जब जीवनचन्द्र जोशी वाले अस्पताल का निरीक्षण करने आया तो जीवनचन्द्र की अपेक्षाओं के विरुद्ध उसके मिजाज बिगड़े हुए थे. उसने  स्टाफ से अनावश्यक रूप से अपशब्द कह डाले. जीवनचन्द्र बहुत आहत हो गया और पनीराम से बोला, “आपसे अकेले में कुछ बात करनी है.” कमरे में ले जाकर जीवनचन्द्र ने आव देखा ना ताव पनीराम को थप्पड़ जड़ दिया और उसके बाप दादा की औकात तक याद दिला दी.

राज्यमन्त्री महोदय अपमान का घूँट पीकर जब लखनऊ लौटे तो अस्पताल के पूरे स्टाफ का दूर दूर स्थानांतरण करवा दिया. सबसे ज्यादा सजा जीवनचन्द्र को पीलीभीत स्थानांतरित करके दी गयी. गुप्त रिपोर्ट में मन्त्री महोदय ने लिखा कि "जीवनचन्द्र उत्तराखण्ड क्रान्तिदल का खतरनाक कायकर्ता है. इसे उत्तराखण्ड की सीमा से दूर भेजा जाये."

कुछ सालों तक पीलीभीत में नौकरी करने के बाद जीवनचन्द्र अपने जुगाड़ से नैनीताल के भीमताल अस्पताल में बदली करवाकर आ गया जहाँ एक दिन अब भूतपूर्व हो गए राज्यमंत्री पनीराम ने एक आदमी के हाथों अपना मार्मिक पत्र लिख कर जीवनचन्द्र को लखनऊ बुलाया. पनीराम लीवर सिरोसिस की बीमारी से गंभीर रूप से बीमार था. पत्र इस प्रकार लिखा था:

"आदरणीय पण्डित जी,
सादर नमन. मैं बहुत बीमार हूँ. मुझे लग रहा है कि मेरी जीवन यात्रा समाप्त होने जा रही है. जाने से पूर्व मैं आपसे अपने व्यवहार के लिए दिल से क्षमा याचना करना चाहता हूँ. कृपया दर्शन देकर मुझे मुक्ति दें.
आपका ही,
पनीराम."

जीवनचन्द्र जोशी बड़े बेमन से उससे मिलने के लिए लखनऊ के लिए चल पड़े, पर उनके वहाँ पहुँचने से पहले ही पनीराम शरीर छोड़ चुका था.
***          

शनिवार, 17 मई 2014

अमिया

चतुरसिंह ठिठोला ने अपनी पत्नी मंजरी को हिकारत भरे स्वर में डांटा, “तुम्हें क्या जरूरत थी उसको अमियाँ देने की? मैंने तुमसे कई बार कहा है कि इन छोटे लोगों से व्यवहार रखने की जरूरत नहीं है, पर तुम्हें मेरी बेइज्जती करानी थी. हमारे मुँह पर थप्पड़ सा मार गया वो दो कौड़ी का हवलदार.”

मंजरी पति के स्वभाव को जानती है. बेचारी रूआंसी होकर रह गयी, आँखें सजल हो आई.

गाँव की बसावट कुछ ऐसी है कि एक पंक्ति में आठ-दस घर उत्तरमुखी हैं. इसे गाँव वाले ‘बिष्ट बाखली’ के नाम से पुकारते हैं. इस बाखली (मकानों की पंक्ति) में काश्तकार, ड्राइवर, टीचर, व रिटायर्ड फ़ौजी रहते हैं. सभी बिष्ट बिरादरी के हैं. इस बाखली के ठीक पीछे वकील साहब का पाँच बीघे का खेत है और एक पक्का मकान भी. वकील साहब को गुजरे दस साल हो गए हैं, अब इस घर में उनका बेटा चतुरसिंह ठिठोला व उसकी पत्नी मंजरी रहते है. चतुरसिंह को वकील साहब ने नैनीताल के एक नामी कान्वेंट स्कूल में पढ़ाया-लिखाया और ग्रेजुएशन के लिए लखनऊ भेजा. चतुरसिंह को बचपन से ही ये अहसास भी कराया कि वह आम ग्रामीणों से अलग है, सुपीरियर है. अत: स्वाभाविक तौर पर वह इस ग्रामीण समाज से बिलकुल कटा रहा, और अब जब वह स्थानीय दूर-संचार विभाग में एस.डी.ओ. बन गया तो उसके भाव और भी ऊँचे हो गए. उसकी पत्नी मंजरी जरूर सामाजिक रहना चाहती है, लेकिन पति के स्वभाव व मकान का अलग-थलग पड़ना उसके लिए बाधक रहा है. वह अकेलेपन के कारण बतियाने वालों की तलाश में रहती है. उसके आँगन में गोविन्दसिंह हवलदार के घर की पिछवाड़े की खिड़की खुलती है, जहाँ पर मौक़ा पाते ही वह गोविन्दसिंह की पत्नी मीनाक्षी से सुख-दुःख व ग्राम समाचार बाँटती रहती है.

चतुरसिंह की चहारदीवारी में एक आम का बहुत पुराना बड़ा पेड़ है. ये कभी किसी की फेंकी हुई गुठली से उगा होगा. इस पर फल बहुत छोटा आता है, जिसमें भी गुठली बड़ी और रेशे वाली होती हैं. हाँ, मिठास तो अवश्य रहती है. फल भी हर साल नहीं आते, पर जब आते हैं तो मंजरी मीनाक्षी को आवाज देती है और थैला भर कर पकड़ा देती है. इस प्रकार आमों से दोस्ती का रिश्ता बना रहता है.

चतुरसिंह और गोविन्दसिंह में भी रस्मी दुआ-सलाम होती है. ये भी तब, जब गोविन्दसिंह आगे होकर बोले. गोविन्दसिंह को एक बड़ी शिकायत रहती है कि पतझड़ के मौसम में आम के तमाम सूखे पत्ते उसकी छत-आँगन में भर जाते हैं, जिन्हे साफ़ करने की कवायद करनी पड़ती है. गोविन्दसिंह ने कई बार चतुरसिंह से कहा भी था कि उसकी छत की तरफ लटकी हुई बड़ी डाल को छाँट कर छोटा करवा दें, पर चतुरसिंह ने उसके आग्रह पर कोई ध्यान नहीं दिया. इस बार गोविन्दसिंह को ना जाने क्या सूझी सारे पत्ते समेट कर चतुरसिंह के आँगन में फेंक दिये.

शीतयुद्ध की शुरुआत हो गयी. पत्नियों में भी आपस में बोल-चाल बन्द हो गई. गत वर्ष जून में खूब आम पके. झड़े भी और तोड़े भी गए. गोविन्दसिंह और उसकी पत्नी पूरे आमों के मौसम में देखते रहे, पर मंजरी ने उनसे नजर तक नहीं मिलाई, बल्कि उनको चिढ़ाने-जलाने के लिए ढेर सारी पीली गुठलियाँ व छिलके उनकी खिड़की की सीध में जमा करके रख छोड़े.

वैसे इस इलाके में आम बहुतायत में पैदा होता है. बाजार में स्थानीय आम बहुत सस्ती दरों में बिकने आता है, पर ‘लिए-दिये’ की बात और होती है. अब इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि पत्ते आँगन में फेंकने से चतुरसिंह खफा हैं. हालांकि उनसे आमों की कोई अपेक्षा गोविन्दसिंह और उसकी पत्नी कर भी नहीं रहे थे. केवल अहं का सवाल था.

कुछ महीने पहले एक दिन शाम को राह में घूमते हुए मंजरी और मीनाक्षी की मुलाक़ात हो गयी. मंजरी ने मुस्कुराते हुए बातों से उसे बहुत अपनापन जताया, “आप तो दिखती ही नहीं हो”, “खिड़की भी बन्द रखती हो”, “मै तो आपसे बातें करने को तरसती हूँ”. यूँ फिर से दोनों महिलाओं में खिड़की पर आकर संपर्क साधना शुरू हो गया. महरियों के बारे में, दूध-पानी के बारे में लम्बी वार्ता होने लगी. मंजरी ने मसाला कूटने के लिए इमाम दस्ता माँगा, इस प्रकार अमिया-आम-गुठलियों-छिलकों की बात को पटाक्षेप दे दिया, उस बारे में चर्चा तक नहीं की.

अगले वर्ष फिर से पेड़ पर खूब अमिया आई, लेकिन एक दिन ऐसा अंधड़ आया कि ज्यादातर कच्चे फल जमीन पर आ गिरे. अगली सुबह एक पॉलीथीन की थैली में बहुत सी अमिया समेट कर मंजरी ने मीनाक्षी को आवाज देते हुए खिड़की के पास रख दिये. मीनाक्षी तब स्नान कर रही थी, गोविन्दसिंह ने अमिया देख कर बड़ी तल्खी आवाज में मंजरी से कहा “हटाइये, हटाइये, ये बीमारी की जड़, हमको नहीं चाहिए.”

खिसियानी सी होकर मंजरी बोली, “भाई साहब इसकी चटनी बनाइएगा.”

गोविन्दसिंह बोला, “नहीं खानी है हमको तुम्हारे आम-अमिया की चटनी. आपको ही मुबारक हो.”

मंजरी अपनी अमिया उठा कर ले गयी. मीनाक्षी ने पति से कहा, “आपको ये सब कहने की क्या जरूरत थी, रख लेते, नहीं खानी थी तो फेंक देते.”

गोविन्दसिंह बोला, “बात आम-अमिया की नहीं है, व्यवहार की है, अगर चतुरसिंह बड़ा आदमी है तो हम भी किसी से कम नहीं है. किसी का दिया नहीं खाते है. तू देखना अगले साल अपने पेड़ पर भी अमिया आ जायेंगी.
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शनिवार, 8 मार्च 2014

सड़क जाम

ये पुरानी कहावत है कि सांप पकड़ने वाले को सांप ही खाता है. जीवनसिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

जीवनसिंह के दादा अपने गाँव के कई साथियों के साथ लगभग अस्सी साल पहले पिथौरागढ़ के कम्स्यार इलाके से भाबर आये थे. ये लोग लकड़ी चिरानी का काम करते थे फिर जंगल साफ़ होने पर इन्होने वहीं अपनी बस्ती बना ली और खेती करने लगे. बस्ती बरेली को जाने वाली मुख्य सड़क (हाईवे) के अगल-बगल है. समयांतर में सरकार ने ये जमीनें उन्ही काश्तकारों के नाम कर दी थी. गाँवों के अजीब अजीब नामकरण भी हो गए, जैसे हैडा गज्जर, हाथी खाल, पदमपुर देवलिया, बच्ची धरमा, गौजाझाली आदि आदि.

समय बदला, पंचायती राज आया तो जीवनसिंह अपने गाँव के सभापति बना दिये गए. इन तीस चालीस वर्षों में जब हर व्यवस्था का राजनीतिकरण हो गया तो सभापति  (ग्राम प्रधान) के पद का महत्व बढ़ गया. प्रधान बनना बड़ी बात हो गयी. इसमें कमाई के भी अनेक स्रोत निकल आये. हालाँकि इससे गाँवों में आपसी स्पर्धा और दुश्मनियाँ भी पैदा हो गयी.

जीवनसिंह पढ़े लिखे नहीं थे, पर इस संचारयुग के संसाधनों ने अनायास ही उनको जागरूक बना दिया. उन्होंने अपने इकलौते बेटे कमलसिंह को हाईस्कूल तक पढ़ाया तथा अपने अनुभवों के राजनैतिक गुर सिखाते रहे. नजदीक के शहर हल्द्वानी की खबरें जानते सुनते हुए कमल जान गया कि सुर्ख़ियों में आने के लिए सड़क जाम करने का टोटका बड़ा कारगर है. जीवनसिंह ने भी इसे नेतागिरी का शॉर्टकट समझते हुए बेटे पर कोई लगाम नहीं लगाई. कमल आये दिन हाईवे पर छोटी छोटी समस्याओं के समाधान के लिए वाहनों को रोक कर जाम की स्थिति पैदा करने लगा. कुकिंग गैस की सप्लाई में विलम्ब हो, नलकूप पर बिजली का पम्प फुंकने का मसला हो, गाँव के किसी व्यक्ति के साथ सड़क हादसा हो जाये या राशन-चीनी की दूकान में वितरण व्यवस्था में देरी/अव्यवस्था हो तो कमल सक्रिय होकर सड़क जाम करने में देर नहीं करता था. आलम ये हो गया कि जहाँ कहीं खुराफात की बात हो कमल का उसमें फोटो निकल कर स्थानीय अखबारों में आने लगा. प्रशासन उसकी खुराफातों से बहुत परेशान रहा क्योंकि हाईवे जाम करने की बीमारी से आने जाने वाले लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ रही थी. इस बात पर बहुत आलोचनाएं छप रही थी, पर प्रशासनिक अधिकारियों की डाट डपट ज्यादा काम नहीं कर रही थी.

उधर जीवनसिंह बेटे की इस प्रगति पर खुश रहते थे और लोगों को कहते नहीं थकते थे कि “मेरा बेटा इस इलाके का विधायक बनने लायक है.”

कमल को राजनीति में फिट करने के लिए उन्होंने उसे उत्तराखण्ड राज्य बनते ही उसे भाजपा में शामिल होने की सलाह दी और फिर जब काँग्रेस की सरकार बनी तो पाला बदलने को भी कह दिया. जीवनसिंह का मानना था कि सत्तासुख भोगने के लिए सत्तानशीं पार्टी के साथ जुड़ा रहना फायदेमंद होता है.

प्रकृति अपना सामंजस्य बनाए रखती है. हर दिन एक सा भी नहीं रहता है. एक दिन अचानक जीवनसिंह को ‘ब्रेन स्ट्रोक’ हुआ और वे बेहोश हो गए. उनको हल्द्वानी के एक नामी अस्पताल में शिफ्ट किया गया, जहाँ आईसीयू में रखा गया. तीन दिनों तक हाथ-पावों में हरकत न होने पर कमल नेता अपने स्वभाव के अनुसार डॉक्टरों को हड़काने लगा तो अपनी खाल बचाने के लिए उन्होंने आनन-फानन में जीवनसिंह को बरेली के अस्पताल को रेफर कर दिया. एम्बुलेंस में चार साथियों के साथ कमल अपने बाप को ले चिंतातुर होकर चल पड़ा.

किच्छा-पुलभट्टा और बहेड़ी के बीच कोई वाहन दुर्घटना होने के कारण स्थानीय लोगों ने हुल्लड़ किया हुआ था और लम्बा जाम लगाया हुआ था कई घंटों तक फंसे रहने के दौरान कमल ने जाम खुलवाने के लिए हंगामा करने वालों व पुलिस वालों के बड़े निहोरे किये. एम्बुलेंस ऐसी जगह फंस रही थी, जहाँ से आगे या पीछे कहीं नहीं निकला जा सकता था. इस बीच दुर्भाग्य ये रहा कि एम्बुलेंस में ऑक्सीजन सिलैंडर में गैस चुक गयी. नतीजन जीवनसिंह ने वहीं दम तोड़ दिया.

कमल अपने मृत पिता की लाश पर खूब रोया. जाम लगाने वालों को गालियाँ देता रहा. आज उसकी समझ में आ गया कि सड़क जाम करना कितना बड़ा गैरजिम्मेदाराना कृत्य है.
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शनिवार, 1 मार्च 2014

एक्स वाई जेड

पण्डित धरणीधर शास्त्री नैनीताल जिले के एक महाविद्यालय में प्राध्यापक हैं. शास्त्री जी के एक साथ बहुत से विशेषण हैं. वे धैर्यवान हैं, देव-निष्ठावान, सुजान व भाग्यवान भी हैं. उनकी सुलक्षिणी अर्धांगिनी पद्मिनी देवी उनके बहुत अनुकूल है. हमेशा उनके हर कथन को आप्तोपदेश मानती रही है. ऐसा समर्पण-श्रद्धाभाव अमूमन आजकल की प्रबुद्ध नारियों में बहुत ढूंढने से ही मिल सकता है.

पहले पण्डित जी की चाहना जरूर थी कि सन्तानों में एक पुत्र भी हो, पर उनके हाथ की लकीरों में सिर्फ बेटियाँ ही लिखी थी. एक के बाद एक पाँच बेटियाँ पैदा होती रही. परमेश्वर ने रूप, गुण के अलावा सभी को विलक्षण बुद्धि भी प्रदान की. माता-पिता से सभी संस्कार पाते हुए ये बेटियाँ स्कूली शिक्षा पाकर परास्नातक तक की पढ़ाई कर रही हैं. शास्त्री जी पत्नी सहित अपनी बेटियों से पूर्ण संतुष्ट हैं. उनकी समझ में आ गया है कि इस जमाने में बेटियाँ बेटों से ज्यादा जिम्मेदार हो गयी हैं.

पितृधर्म का निर्वाह करते हुए सबसे बड़ी बेटी सरस्वती का विवाह दो वर्ष पूर्व जयपुर राजस्थान निवासी एक सजातीय युवक दिनेश वैष्णव से विधिविधान से करवा दिया था. दिनेश सिविल इंजीनियर है. बेटी नम्बर दो भैरवी ने मनोविज्ञान में एम.ए., फिर एम.फिल. कर लिया था. उसने इस साल ‘नेट’ की परिक्षा भी पास कर ली है. बहन-बहनोई के बुलावे पर वह पिता के साथ जयपुर गयी, जहाँ उसे किसी कॉलेज में प्राध्यापक के पद के लिए मैनेजमेंट के साथ साक्षात्कार करना था. कुछ अपरिहार्य कारणों से साक्षात्कार की तिथि एक महीने टाल दी गयी. दोनों पिता-पुत्री को इतने दिनों तक वहाँ ठहरना भारी लगा और दोबारा जयपुर आने का कार्यक्रम बनाकर ‘रानीखेत एक्सप्रेस’ में रिजर्वेशन करवा कर लौट पड़े.

ट्रेन से हल्द्वानी उतरना था. उतरते समय भैरवी ने देखा कि उसकी अपनी अटैची जिसमें कपड़ों के साथ सभी ओरीजिनल डिग्रियां, सर्टिफिकेट्स व जरूरी कागजात थे, गायब थी. अटैची में उसने अपनी सोने की दो चूड़ियाँ भी रखी थी. बदहवास होकर उसने पिता को अटैची चोरी होने की बात बताई तो शास्त्री जी भी परेशान हो गए. ये अनहोनी थी, जिसकी उन्होंने कोई कल्पना भी नहीं की थी. बाकी मुसाफिर अपनी अपनी राह चल  दिये. रेलगाड़ी भी अगले स्टेशन काठगोदाम को चल पड़ी. स्टेशन मास्टर और पुलिस को रिपोर्ट लिखाई, पर चोर तो पहुँच से बहुत दूर था, ना जाने पिछले किस स्टेशन पर ये वारदात करके उतर गया होगा. भारतीय रेलगाड़ियों में ऐसी घटनाएं आजकल आम हो गयी हैं. ज़रा सी नजर से बाहर होते ही सामान गायब होने का खतरा बना रहता है. चलती गाड़ियों में  खिडकियों के पास बैठे मुसाफिर विशेषकर महिलाओं का सामान-पर्स या जेवर झपट्टा मारकर लूट लिया जाता है. चोर-झपट्टामार ये नहीं देखता है कि मुसाफिर को उसकी हरकत से कितना कष्ट होता है. कई बार तो कान या गले का आभूषण खिंचने पर महिलाओं को लहूलुहान होते देखा गया है.

सभी रेलवे स्टेशनों पर ये जरूर लिखा रहता है कि ‘चोरों-जेबकतरों से सावधान’, ‘यात्री अपने सामान की रक्षा खुद करें’. रेलवे का सुरक्षा तन्त्र बहुत लापरवाह और भ्रष्ट लगता है. चोरी होने की स्थिति में यात्री ‘बेचारा’ होकर रह जाता है. जब कोई विदेशी सैलानी बेफिक्री से यहाँ के रेलों में सफर करता है और उसका पासपोर्ट-वीजा-नकदी सब चोरी चला जाता है तो उसको कैसा लगता होगा? ये हमारी राष्ट्रीय शर्मिंदगी की बात है.

बेटी को ज्यादा परेशान देखकर शास्त्री जी ने हिम्मत-दिलासा दिलाई और कहा, “जो नियति में है, उसे टाला नहीं जा सकता है, सब ठीक हो जाएगा, सर्टिफिकेटस की प्रतियां दुबारा प्राप्त की जा सकती हैं. कपडे व चूड़ियाँ फिर बन जायेंगी,” आदि आदि.

घर पहुँच कर उदासी के साथ घटनाक्रम की चर्चा हुई  सभी सदस्य इस त्रासदी से दु:खी हुए शास्त्री जी ने सबको धैर्य बंधाते हुए अंग्रेजी का ये जुमला दोहराया, "That which can not be cured, should be endured."  भैरवी को कपड़े व सोना खोने का इतना दु:ख नहीं था, जितना कि उसकी बहुमूल्य डिग्रियां व सम्बंधित कागजात जाने का था. प्रमाणपत्रों की तो उसे सद्य जरूरत भी थी.

माँ पद्मिनी ने कहा, “अगर चोर पढ़ा-लिखा समझदार होगा तो तुम्हारे प्रमाणपत्रों को देखकर अवश्य सोचेगा कि वे सब उसके काम के नहीं हैं, वह उन्हें हमारे पते पर भेज भी सकता है.”

हाँ, सचमुच एक सप्ताह बाद एक कुरियर के मार्फ़त भैरवी के समस्त कागजात-प्रमाणपत्र उसके घर के पते पर आ गए. भेजने वाले ने अपना नाम लिखा था, ‘एक्स-वाई-जेड’.  परिवार में सारी खुशियाँ लौट आई. परमेश्वर और चोर दोनों को धन्यवाद दिया गया.
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सोमवार, 30 दिसंबर 2013

क्लीन चिट

मद्दी अपराध की दुनिया का बड़ा खिलाड़ी है. इलाके में लम्बे अर्से से उसका खौफ ज़िंदा है. वह दिन दहाड़े वारदात करके निकल जाता है. यों उसके खिलाफ दर्जनों शिकायतें हैं, पर थाने या अदालत में उसके सामने उसके खिलाफ सच्चाई उगलने में आम लोग डरा करते हैं. उसको एक बड़े स्थानीय नेता का वरदहस्त प्राप्त है. पत्रकार भी उसके खिलाफ लिखने से कतराया करते हैं. राजनैतिक गलियारों में दबी जबान से चर्चाएं होती है कि वह एक पाला गया खूंखार कुत्ता है. पुलिसवाले तो उसे ‘बड़े भाई' कह कर सम्मानित कर अपनी इज्जत बचाते हैं.

इस बार जब सिटी मजिस्ट्रेट युधिष्टिर सक्सेना अपनी सरकारी गाड़ी में ठण्डी सड़क से अदालत से लौट रहे थे तो उन्होंने अपनी आँखों से खौफनाक मंजर देखा कि कातिल मद्दी के हाथ में एक रक्त रंजित रामपुरी चाकू था एक सफेदपोश धायल आदमी लहूलुहान नीचे पड़ा कराह रहा था, आसपास राह चलते लोग भयभीत होकर भागते नजर आ रहे थे. मजिस्ट्रेट साहब ने ड्राईवर गुमानसिंह को गाड़ी रोकने को कहा, लेकिन गुमानसिंह ने उनकी अनसुनी करते हुए तेजी से गाड़ी आगे बढ़ा दी और बोला, “सर जी, ये मद्दी खतरनाक गुंडा है, यहाँ रुकना ठीक नहीं है.” मजिस्ट्रेट साहब ने अपने मोबाईल से तुरन्त पुलिस एस.पी. को सूचना देकर फौरी कार्यवाही करने को कहा.

मजिस्ट्रेट साहब को अफसोस हो रहा था कि वे घायल की कोई मदद नहीं कर पाए. उनको खुद के वीआईपी होने पर भी दु:ख हो रहा था. उस रात वे सो भी नहीं सके थे.

इस जघन्य ‘अग्रवाल हत्याकांड’ को स्थानीय अखबारों ने तो कोई बड़ा समाचार नहीं बनाया, लेकिन राष्ट्रीय अखबारों व न्यूज चैनलों ने बड़े जोर शोर से उठाया. चूँकि प्रादेशिक चुनाव नजदीक थे, नेता जी ने मद्दी से सरेंडर करवाकर अपना दामन पाक बताने की पूरी कोशिश कर ली.

मद्दी जेल भेज दिया गया और उसके बचाव में नामी-गिरामी वकील झूठ बोलकर अपना ईमान बेचने लगे. ये केस युधिष्टिर सक्सेना जी के ही अदालत में आ गया. पुलिस ने बहुत कमजोर साक्ष्य जुटाए थे. अपराधी को पहचानने के लिए कोई गवाह नहीं मिल रहा था. जिन मासूम लोगों ने शुरू में अपने बयान दर्ज कराये थे, वे एक एक करके हॉस्टाइल होते गए. मजिस्ट्रेट साहब सोच कर बैठे थे कि गुंडे को ‘कैपिटल पनिशमेंट’ देकर समाज को भयमुक्त कर देंगे, पर अदालत तो गवाहों पर चलती है. केस को बिखरता देखकर सक्सेना जी ने अपने डाईवर गुमानसिंह को बुलाकर कहा कि “तुमने मेरे साथ ही मद्दी को चाकू से वार करते हुए देखा था, तुम सत्य बोल कर न्याय में भागीदार बन जाओ.”

सक्सेना जी को तब बड़ा सदमा लगा जब गुमानसिंह ने बेबाकी से कहा, ”सर जी, मुझे इसी शहर में रहना है, अपने बाल-बच्चों से प्यार है. मैं इस आग में कूद कर आत्महत्या नहीं कर सकता हूँ. आप इसका अन्जाम नहीं जानते हैं. अगर आपने इसको फाँसी का आदेश भी कर दिया तो ये अपील करके बच जाएगा. क्षमा चाहता हूँ.”

मानसिक द्वन्द के बीच रहते हुए मजिस्ट्रेट युधिष्टिर सक्सेना को भारी मन से फैसला लिखना पड़ा कि ‘साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए मद्दी को बरी किया जाता है.’ और उस रात भी युधिष्टिर सक्सेना सो नहीं सके. उनको वह रक्तरंजित दृश्य और खूंखार मद्दी का डरावना चेहरा बार बार याद आ रहा था. उनको अफसोस था कि वे न्याय नहीं कर सके थे.

अगले दिन स्थानीय अखबारों में बड़े बड़े हेडलाइंस में समाचार छपे कि अग्रवाल मर्डर केस में अदालत ने मद्दी को ‘क्लीन चिट’ दे दी है.
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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

अन्धा मोड़

सुदर्शना अपने अन्य तीन भाई-बहनों से बिलकुल अलग है. बचपन में ही उसकी प्रतिभा नजर आने लगी थी. घर-बाहर सब तरफ उसके बारे में चर्चा होती थी तो वह स्वयं भी अपने आप को १० में से ११ अंक देने लगती थी. कुशाग्रता हो और बाह्य शारीरिक सुंदरता भी हो तो स्वाभाविक तौर पर दर्प भी होना ही था.

आज शहरी मध्यवर्गीय परिवारों की सोच रहती है कि बच्चे जल्दी से पढ़-लिख जाएँ और किसी अच्छी नौकरी पर लग जाएँ. बच्चे भी समाज के अन्य लोगों की देखा देखी मानसिक रूप से खुद को इसी ढर्रे में ढाले हुए चलते हैं. अब वे दिन चले गए हैं जब माता-पिता बेटी की शादी के बारे में २५ वर्ष होने से पहले ही कोई चिंता करने लगते थे.

सुदर्शना ने पॉलिटिकल साइंस में एम.ए. किया वह साथ साथ आई.ए.एस. की भी तैयारी करती रही, लेकिन प्रिलिमिनरी पास करने के बाद मेन परीक्षा पास नहीं कर पाई. उसने बी.एड. की डिग्री हासिल कर ली और एक अच्छे पब्लिक स्कूल में अध्यापिका हो गयी. अध्यापन को नोबल प्रोफेशन समझा जाता है और अध्यापक/अध्यापिका समाज के आदर्श भी होते हैं. विवाह के बारे में यद्यपि सुदर्शना टाल-मटोल करती थी, पर माता-पिता ने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए किसी योग्य वर की तलाश शुरू कर रखी थी पर कहीं बात बन नहीं रही थी. दूर दुनिया के सब्ज-बाग बहुत सुहावने होते हैं. मानव मन तो करता ही है कि कोई मनभावन मिल जाये.

इन्टरनेट की सोशल साइट्स पर अनेक जाने-अनजाने लोगों से संपर्क होता है. अक्सर लोग मित्र बनाने में कोई संकोच या जाँच पड़ताल नहीं करते है. अधिक से अधिक मित्र बनाने की होड़ रहती है. सुदर्शना ने भी अपने मित्रों की सूची ३०० से लम्बी बना डाली. फेसबुक चेक करना अब रोजनामचे का अभिन्न अंग हो गया है. साइबर अपराधों के अलावा भी ये संपर्क बहुत से गुल खिलाने लगे हैं.

सुदर्शना के संपर्क में देवानद प्रिंस नाम का एक व्यक्ति अपने फेसबुक के माध्यम से आया, जिसने अपने प्रोफाइल पर सदाबहार स्व. फिल्म अभिनेता देवानंद की युवावस्था का फोटो लगा रखी थी. यों संयोगवश उससे मित्रता हो गयी और गाहे बगाहे चैटिंग शुरू हो गयी. देवानन्द ने अपनी लच्छेदार भाषा में अपनी ‘दिल की लगी’ लिख दी तो सुदर्शना का कोरा कागज़ सा मन प्यार के हिचकोले खाने लगा. इस प्रकार प्यार भरे शब्दों का आदान प्रदान गुपचुप तरीके से तीन-चार महीनों तक चलता रहा. स्वाभाविक था वह अपने रंगीन सपनों में विचरने लगी थी.

देवानंद प्रिंस दूसरे शहर का निवासी था, उसका एक रिश्तेदार सुदर्शना के शहर में किसी पुलिस थाने का इंचार्ज था. देवानंद ने उसके मार्फ़त चुपचाप सुदर्शना के बारे में सारी जानकारियाँ हासिल कर ली. अब उसने सुदर्शना को भी बता दिया कि ये पुलिस अफसर उसका रिश्तेदार है. आपसी मुलाक़ात के लिए घर या किसी होटल अथवा सुनसान जगह के बजाए उसके थाने में ही मिलने का सुझाव रखा तो सुदर्शना खुश हो गयी और मिलने के लिए उतावली भी थी.

सुदर्शना ने अपने छोटे भाई विजय को हमराज बनाया और अपने साथ ले गयी. पुलिस थाने में दोनों भाई-बहन पंहुचे तो इन्स्पेक्टर को परिचय देने की जरूरत नहीं पड़ी. क्योंकि उसने परदे के पीछे से सारी मालूमात की हुई थी. उसकी आत्मीयता और व्यवहार से लगा कि वह देवानंद का परम हितैषी भी है.

देवानंद अभी वहाँ पहुँचा नहीं था. इस बीच सुदर्शना का दिल व्यग्र था. जोरों से धड़क रहा था. अचानक जैसे नाटक के लिए स्टेज का पर्दा उठता है, एक पछ्पन-साठ वर्ष का पकी उम्र वाला व्यक्ति जिसका चेहरा अनाकर्षक भी था, मुस्कुराते हुए दाखिल हुआ. इन्स्पेक्टर उसका स्वागत करने के लिए गर्मजोशी के साथ खड़ा होकर कहने लगा, “आइये, आइये, देवानंद जी. आपका बेसब्री से इन्तजार हो रहा है.”

आगंतुक को अपनी गुलाबी कल्पनाओं के विपरीत प्रत्यक्ष देखकर सुदर्शना गश खाकर लुढ़क गयी. थोड़ी देर में होश में आने पर पानी पिलाया गया. वह बिना कुछ कहे, भाई के साथ ऑटो रिक्शा में घबराई सी बैठकर ग़मगीन हालत में अपने घर लौट गयी.

इस घटना के बाद सुदर्शना को यह सीख मिल गयी कि इंटरनेट की दुनिया में किसी पर अँधा विश्वास नहीं करना चाहिए. और कुछ दिनों बाद यह घटना सुदर्शना और उसके मित्रों के बीच एक मनोरंजन का विषय बन कर रह गयी.
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सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

कड़ुवा चौथ

कैंसर का रोग कोई एक दिन में पैदा नहीं होता है, और ना ही ये संक्रमण से फैलता है. इसके होने के बहुत से कारण अभी भी ठीक से मालूम नहीं हैं, पर अनेक संभावित कारण जरूर मालूम हो चुके हैं. मुँह, गला, फेफड़ा, या आमाशय के कैंसर के लिए सीधे तौर पर तम्बाकू को जिम्मेदार ठहराया जाता है. सर्वे के आँकड़े इसे सिद्ध करते हैं. इसीलिये इस विषय में दुनियाभर के सभी देश व स्वास्थ्य संगठन अपने नागरिकों को जोर देकर चेतावनी देते रहते हैं कि ‘तम्बाकू सेवन स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकर होता है.’ लेकिन जिन लोगों को तम्बाकू की लत लग जाती है, उन पर चेतावनियां तब तक बेअसर रहती हैं, जब तक वे बीमारी की जकड़ में नहीं आते हैं.

बाबूलाल यादव की अच्छी भली गृहस्थी चल रही थी. नौकरी से रिटायरमेंट भी ज्यादा दूर नहीं था. बेटा-बेटी दोनों सयाने हो गए, पढ़ाई पूरी कर ली, तथा उपयुक्त नौकरी की तलाश कर रहे थे. सुलक्षणी पत्नी विद्याधरी बच्चों की नौकरी व शादी-ब्याह के सपने संजोये हुए आम भारतीय मध्यवर्गीय गृहिणी की तरह पूरी तरह पति पर आश्रित थी.

बाबूलाल यादव तम्बाकू-खुशबूदार किमाम लगे पान खाने का शौक़ीन था. दिनभर में दो पान तो जरूरी होते थे. घर के नजदीक पनवाड़ी का खोमचा था, सो उपलब्द्धता भी आसान थी. कहते हैं कि ‘जैसी हो होतव्यता, तैसी आवै बुद्धि’. ऐसा ही हुआ. तम्बाकू सेवन के खतरनाक परिणाम जानते/सुनते हुए भी उसने चेतावनियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया. परिणामस्वरूप गला खराब रहने लगा. खारिश से शुरू हुई तकलीफ खाँसी, बुखार, गला दर्द तक जब बढ़ गया, तब डॉक्टर की शरण ली. डॉक्टर होशियार था. अलामात देखते ही बाबूलाल को ई.एन.टी. स्पेशलिस्ट के पास भेज दिया, जिसने तुरन्त बायोप्सी करवाने की सलाह दी.

बायोप्सी में मैलिंग्नैन्सी की पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर पति-पत्नी दोनों के हाथ पाँव फूल गए क्योंकि कई कैंसर से पीड़ित लोगों की हालत उन्होंने देखी थी. अब जाकर बाबूलाल को तम्बाकू के विरुद्ध चल रहे अभियान का महत्व समझ में आ रहा था. उसको ये भी मालूम हो रहा था कि अन्जाम क्या होने वाला था. जीने की उम्मीद में आदमी आख़िरी साँस तक ईलाज कराता है. उसे रुग्णावस्था में मध्यप्रदेश के ग्वालियर स्थित कैंसर अस्पताल में ले जाया गया. बड़ी सिफारिशें लगाकर वहाँ भर्ती कर दिया गया. चूँकि भोजन नली चोक होने लगी थी इसलिए नाक में एक रबर नाली डालकर सिरिंज द्वारा तरल भोजन डाला जाने लगा. कीमोथेरेपी के सेक दिये जाने लगे, जिससे सारे बाल झड़ गए तथा बेहद कमजोरी हो गयी. डॉक्टर बता रहे थे कि लिम्फ सेल और प्लेटलेट्स की मात्राएँ खतरनाक स्थिति तक पहुँची हुई हैं.

इधर नौकरी से रिटायरमेंट की तारीख आ गयी इसलिए अस्पताल से छुट्टी लेकर बीमारी हालत में ही एक दिन के लिए ड्यूटी जॉइन करके ऑफिस सम्बन्धी बहुत सी कागजी कार्यवाही पूरी करनी पड़ी. पुन: अस्पताल जाने से पहले बाबूलाल ने विद्याधरी से कहा, “देख, अब आगे ईलाज मत करवा. ये बीमारी ठीक होने से तो रही और तू खर्चा करते करते सड़क पर आ जायेगी.”

विद्याधरी के पास जवाब में आंसुओं के सिवाय कुछ भी नहीं था. वह बोली, “ईलाज कैसे बन्द कर सकते हैं. आप खर्चों की बिलकुल चिंता न करें. आपका ही कमाया हुआ रुपया है. रूपये आपकी जान से बड़े थोड़े ही हैं.” इस तरह दम दिलासा देते हुए पुन: अस्पताल की शरण में आ गए. पर बाबूलाल की हालत दिन पर दिन खराब होती गयी. उसका पूरा पाचन तन्त्र बिगड़ गया था. साँस लेने में तकलीफ होने लगी तो श्वसन नली में छेद करके गर्दन में से अलग नली लगा दी गयी. एक दिन डॉक्टर ने विद्याधरी को अलग से बुलाकर कह दिया, “तुम इसे घर ले जाकर जितनी सेवा कर सको करो. यहाँ अब कोई सुधार होने वाला नहीं है. तुम्हारा बिल यों ही बढ़ता जा रहा है.”

इस प्रकार तीन महीने अस्पताल में रख कर बाबूलाल को बुरी हालत में घर वापस लेकर आ गए. दवाओं व अस्पताल के खर्चे का भुगतान करने में उसकी ग्रेच्युटी व प्रोविडेंट फंड का सारा रुपया लग गया. घर में सब तरफ उदासी थी. मित्र तथा रिश्तेदार मातमपुर्सी के लिए आने लगे. ऐसा दिन भगवान किसी को न दिखाए, पर जीवन-मृत्यु तो इंसानों के वश में नहीं होता है. बाबूलाल की हालत बद से बदतर होती गयी. मुँह से दुर्गन्ध आने लगी. बेचारी विद्याधरी उसकी हर कराह पर जागती और शरीर को सहलाती रहती थी. शारिरिक कष्ट तो मरीज को खुद सहना पड़ता है, उसे कोई बाँट नहीं सकता.

इस बीच नवरात्र आये, दशहरा आया, विद्याधरी सभी देवी-देवताओं से अपने पति की सलामती की गुहार लगाती रही, पर उसके पति की वेदना घटने का नाम नहीं ले रही थी. वह कई बार चेतनाशून्य रहने लगा. बिस्तर खराब तो वह बहुत दिनों से करने लगा था. मरीज से ज्यादा तीमारदार की हालत खराब होती है. कभी कभी तो बाबूलाल की तड़प को देखकर वह सोचने लग गयी कि ‘परमेश्वर अब उसको मुक्ति दे दे तो अच्छा होता’.

आज करवाचौथ है. सभी सुहागिनें सजी-संवरी हाथों में मेहंदी लगाए हुए अपने अपने पतियों की लम्बी उम्र की दुआएं माँग रही हैं. गत वर्ष इस दिन विद्याधरी भी उल्लासपूर्ण थी, पर इस बार मृत्युशय्या पर पड़े पति को देखकर आँखें भर आ रही हैं. कुछ दिनों पहले जब बाबूलाल होश में था और खिसिया खिसिया कर कुछ बोल ले रहा था तो उसने विद्याधरी से कहा था, “मैं मरने लगूं तो एक तम्बाकूवाला पान जरूर मेरे मुँह में डाल देना.” पता नहीं उसने ये बात किस तुफैल में कही थी, विद्याधरी को लगा कि उसको तम्बाकू की तलब बाकी थी. अन्तिम इच्छा समझ कर वह डरी डरी सी पनवाड़ी के खोमचे तक गयी और उससे एक तम्बाकू वाला पान लगाने को कहा. पनवाड़ी को क्या मालूम था कि ये बाबूलाल की अन्तिम इच्छा. उसने तो खुश होकर तम्बाकू-किमाम का पान लगाया, और विद्याधरी से बोला, “बाबू जी को हमारी याद आ ही गयी.”

ठीक उसी समय जब बाहर चन्द्रदर्शन हो रहे थे तो विद्याधरी ने अपने पति के मुँह में पान डाल दिया और अपने फर्ज से मुक्त हो गयी.
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