संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 29 अगस्त 2021

वे सुनहरे दिन

 साठ साल पहले की बात है, मैं लाखेरी में नवांगुतक था , मुझे एसीसी कालोनी में L - १६ क्वाटर  आवंटित था, अविवाहित दिनों में मैंने अपने ही जैसे कुंवारे लोगों से जल्दी ही दोस्ती कर ली थी. इनमें स्व विष्णु बिहारी दीक्षित भी थे जो कि तब उदयपुर से MSW करके एसीसी में जॉब की तलाश में थे, उनके साथ ही एक लड़का शर्मा (नाम मुझे याद नहीं रहा) जिनके पिता उन दिनों लाखेरी स्थित  सेंट्रल एक्साइज के डिपुटी सुपरिंटेंडेंट हुआ करते थे भी उदयपुर स्कूल आफ सोसियल वर्क से ही  MSW कर के आये थे, इनके अलावा सेंट्रल एक्साइज के दो सब इंस्पेक्टर्स  सरदार गुरनामसिंह और प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव तथा जीवन बीमा के फील्ड आफीसर वोहरा भी चौकड़ी के सदस्य बन गए थे. मेरा क्वाटर बैठक का अड्डा हो गया था और दोस्ताना गतविधियां चला करती थी. कभी कभी विशेष पकवान / खाना बनाने के लिए एक मि. खन्ना को भी बुलाया जाता था वे नौशेरवाँ टाकीज के सिनेमा के एजेण्ट होते थे , ता हम लोग फ्री में सिनेमा देखने का बी मजा लेते थे हालांकि फर्स्ट क्लास का टिकट मात्र सवा रुपया ही हुआ करता था.

ये सब केवल एक ही साल चला उसके बाद सब अच्छ गच्छ गच्छामि हो गया. मैं भी शादी शुदा लोगों की लिस्ट में जुड़ गया था.

                                         ****

सोमवार, 19 सितंबर 2016

पुण्य स्मरण

सभी धर्मों या विश्वासों में अपने पितरों को पूजने व याद करने के तरीकों का निरूपण किया गया है. हमारे सनातन धर्म में भाद्रपद मास के पूरे कृष्ण पक्ष को पितरों को समर्पित किया गया है. मातृपक्ष व पित्रपक्ष दोनों ही के तीन तीन पीढ़ियों को पिंडदान व तर्पण करके उनके मोक्ष की कामना की जाती है. हमारे धार्मिक साहित्य में वैदिक काल से ही श्राद्ध के विषय में अनेक विधि-विधान व कथानकों का उल्लेख मिलता है. यह भी सत्य है की श्राद्धों में पोषित पुरोहित वर्ग द्वारा कर्मकांडों में अनेक पाखण्ड जोड़े जाते रहे हैं, परन्तु इससे श्राद्ध का महत्व कम नहीं होता है.

मेरे माता-पिता का श्राद्धकर्म मेरे अनुज श्री बसंत बल्लभ द्वारा हर वर्ष नियमित रूप से विधिपूर्वक किया जाता है. मैं भी सपत्नी उसमें शामिल रहता हूँ. आज हम जो कुछ भी हैं, माता-पिता के पुण्यप्रताप व उनके आशीर्वादों के फलस्वरूप ही हैं. आज के ही दिन यानि 19 सितम्बर को हमारे पिताश्री की पुण्यतिथि भी है. यद्यपि उनसे बिछुड़े 36 वर्ष बीत चुके हैं, कुछ ऐसा आत्मिक अनुबंध है कि मैं उनकी पुण्य आत्मा को आज सशरीर अपने आसपास अनुभव कर रहा हूँ. उनके आशीर्वचन का छत्र सभी स्वजनों पर बना रहे ऐसी कामना है.
***

मंगलवार, 28 जून 2016

अहसानमंद

हल्द्वानी महानगर के चारों तरफ उभरी हुई नई बस्तियों में कई लोग पहाड़ के अनजाने गांवों से पलायन करके या अपनी नौकरियों से रिटायर होकर बहुतायत में आ बसे हैं, जिससे एक नई सांस्कृतिक रिश्तेदारी बन गयी है. ऐसा ही है मेरा गाँव, गौजाजाली.

एक दिन संयोगवश मैं किसी व्यक्तिगत निमंत्रण पर एक एडवोकेट मित्र के पास बरेली गया था. सुबह सुबह अखबार में छपे एक समाचार ने मेरा ध्यान आकर्षित किया कि मेरे गाँव के एक मातवर व्यक्ति की कार से बरेली में एक दुर्घटना घटी, जिसमे दो लोग चोटिल हुए, नतीजन पुलिस केस बनाकर उनको जेल में डाल दिया गया. इस बात को तीन दिन हो गए थे, और उनको जमानत नहीं मिल पा रही थी.

यद्यपि मेरी उनसे घनिष्टता नहीं रही थी, फिर भी उनकी इस परेशानी की घड़ी में मदद करने का मन हुआ. मैंने उनसे मुलाक़ात की, और अपने एडवोकेट मित्र से संपर्क करके जमानत दिलवाने की तुरंत कार्यवाही करवाई. वे रिहा हो गए और शायद बाद में कुछ ले-दे करके केस रफादफा भी हो  गया था. ये लगभग दो साल पुरानी दास्तान है. इन दो सालों में उनसे यदाकदा मुलाक़ात भी होती रही, पर मैंने उनकी आँखों में कभी भी कृतज्ञता का भाव नहीं पढ़ा. यद्यपि मैंने उनकी अनपेक्षित सहायता का कोई प्रतिदान नहीं चाहा, परन्तु उनका ‘तोताचश्म’ होना अखरता जरूर रहा.

कुछ दिनों बाद, एक ताजी घटना से कृतज्ञता भाव पर नया आयाम उभर कर आया. हुआ यों कि मैं पत्नी सहित हल्द्वानी शहर में अपने एक निकट संबंधी के घर मिलने गया था. अपनी कार मैं स्वयं ड्राइव कर रहा था. जब दोपहर बाद घर लौटा तो घर के गेट पर गली की एक उम्रदराज महिला अपनी बहू के साथ इन्तजार करती हुयी मिली. वह अस्वस्थ थी और अपना ‘ब्लड प्रेशर’ चेक करवाना चाहती थी. मेरे आसपास के लोग आवश्यकता होने पर मेरी मेडीकल चेरीटेबल सेवा का लाभ लेने में संकोच नहीं किया करते हैं.

मैं अपनी गाड़ी गैरेज में डाल कर उनकी सेवा में लग गया. उस दिन बाहर बला की गर्मी व उमस व्याप्त थी. ना जाने कब गेट खुला पाकर एक जानदार ‘रोडस्टर’ कुत्ता ठंडक पाने के लिए मेरे गैरेज में चुपचाप छुप कर बैठ गया. मरीज के जाने के बाद मैंने गैरेज का शटर नीचे खींच कर बंद कर दिया. कुता दो दिन, दो रात भूखा-प्यासा अन्दर बंद रहा. हमारे बेडरूम दूसरी दिशा में होने के कारण तथा टेलीवीजन की गीत-संगीत की आवाज होने के कारण हम कुत्ते की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से अनजान रहे. तीसरे दिन मेरी श्रीमती को शटर के अन्दर कुछ खटपट होने का आभास हुआ. मैंने जैसे ही शटर उठाया वह दुम हिलाता हुआ बाहर दौड़ा आया. उसने गौर से मुझे देखा और गेट खुलने पर तेजी से बाहर निकल गया. मैंने कुत्ते का हुलिया बयान करते हुए अपने ‘ईवनिंग वॉक’ मंडली को बताया तो मालूम हुआ कि ये उन्ही मतावर व्यक्ति का पालतू कुत्ता था, जिनका जिक्र ऊपर बरेली काण्ड में आया है.

कुत्ते की स्थिति का जायजा लेने जब हमारी टीम उनकी गली में पहुंची तो वह कुत्ता मुझे पहचानते हुए मेरे पैरों में लोटपोट हो गया. बहुत देर तक वह मेरे इर्दगिर्द घूम कर लाड़ बताता रहा. शायद इसलिए कि मैंने उसे हिरासत से बाहर निकाला था. इंसान और जानवर के अप्रतिम व्यवहार का अंतर देखकर मेरा मन भर आया.
***  

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

एक सर्वहारा की मौत

स्व. गुरुनाथ सन १९७२ में ए.सी.सी. शाहाबाद की माईन्स में बतौर मजदूर कार्यरत थे. जब मैं शाहाबाद के कर्मचारी यूनियन का जनरल सेक्रेटरी चुना गया, गुरुनाथ को जोईंट सेक्रेटरी का पद दिया गया. प्रेसिडेंट कामरेड श्रीनिवास गुडी ने जिस पार्टी कैडर को तैयार किया था, उसमें गुरुनाथ अग्रगण्य थे. काम्रेड गुडी के स्वर्गवास के बाद जब इस पूरे इलाके में लीडरशिप का वैक्यूम हो गया था तो गुरुनाथ ने शाहाबाद व वाडी के कर्मचारी संगठनों पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया. वे मात्र हाई स्कूल तक ही पढ़े थे, लेकिन अपनी संगठन चातुर्य व दमदार आवाज के बल पर छाये रहे. उसी बीच दो बड़ी घटनाओं ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी. शाहाबाद के कारखाने को ए.सी.सी. ने नब्बे के शुरुआती दशक में अन्य पार्टी को बेच दिया. नए मालिकों की सोच केवल मुनाफ़ा कमाना था. ये गुरुनाथ के लिए संघर्ष के दिन थे. तभी कर्नाटक में विधान सभा चुनावों में सी.पी.आई. के टिकट पर वे विधायक बन गए और गठजोड़ की सरकार में स्टेट लेबर मिनिस्टर बना दिए गए.  उनका आक्रामक स्वभाव व सर्वहारा बैकग्राउंड--मड्डी-झोपडपट्टी के एक अति पिछड़े समाज के सदस्य से ऊपर उठकर बंगलूरू में स्टेट मिनिस्टर बनना--के कारण वे जल्दी विवादों में भी आते रहे. परन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि विधान सभा के अगले चुनावों में उनको पार्टी टिकट नहीं मिलने पर वे स्वतंत्र उम्मेदवार के बतौर चुनाव लड़े और हार गए. वे राजनीति में पैदल हो गए. एक अपुष्ट समाचार ये भी था कि कलबुर्गी में घर बनाते हुए उनको गढ़ा धन मिल गया था. शाहाबाद-वाडी रोड पर उन्होंने एक पेट्रोल पम्प का मालिकाना हक़ प्राप्त कर लिया. यों वे समाचारों में रहते आये थे.

स्व. गुरुनाथ मेरे करीबी रहे थे. जब शाहाबाद कारखाना बिकने की कगार पर था तो वे सन १९९१-९२ में अपनी टीम सहित लाखेरी (राजस्थान) आये थे और उनके कारखाने को बिकने से बचाने के गुर जानना चाहते थे. मैं यहाँ अध्यक्ष था, पर सब जगहों की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं  हुआ करती हैं. शाहाबाद की बर्बादी उनकी नज़रों के सामने होती रही. कई मालिक बदलते रहे पिछले वर्षों में जे.पी. ग्रुप ने इसे खरीद लिया, पर अब उसने भी इसे किसी अन्य पार्टी को बेच दिया है. मैंने अपने ब्लॉग पर सलाम शाहाबाद-२ शीर्षक से विस्तार से इस बाबत लिखा है.

मैंने गत जनवरी में वाडी प्रवास के दौरान उनसे टेलीफोन से संपर्क किया था, पर वे अपनी व्यस्तता के कारण प्रोग्राम बना कर भी मिलने नहीं आ सके. आज मुझे सन्देश मिला है कि गुरुनाथ अब इस संसार में नहीं रहे हैं. उनका आज ही बंगलूरु में स्वर्गवास हो गया है. ये उनकी नियति थी. पूरे इलाके में शोक की लहर फ़ैली होगी. मैं भी दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ.
***  

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

गागल सीमेंट वर्क्स, बिलासपुर, हिमांचल प्रदेश

सन १९८४ में मैं ए.सी.सी. के लाखेरी कारखाने में कार्यरत था. किसी कार्यवश अपने कॉर्पोरेट आफिस (सीमेंट हाउस, चर्चगेट) मुम्बई गया था. वहां प्रवेश द्वार के पास स्वागत कक्ष के सामने एक भव्य, विशाल दृश्यावली वाली तस्वीर प्रदर्शित की गयी थी. उसे देखते ही मुंह से निकल पड़ा, "वाह." दृश्य बहुत मनोहारी था. नीले अम्बर के नीचे बड़े-बड़े खड़े पहाड़, जिनके तल पर गाँव-खेत और नीचे बीचोंबीच सर्पीली नदी, और तलहटी में एक नया सीमेंट कारखाना स्थापित हुआ था, जिसे नाम दिया गया था "गागल" (वैसे गागल हिमांचल में ही धर्मशाला के पास एक अन्यत्र स्थान का नाम भी है). यहाँ पहले से बसे गाँव का नाम बरमाना है.

सन १९९७ में मुझे यूनियन प्रतिनिधि के रूप में उत्तर-पश्चिम भारत के माईन्स विभाग द्वारा आयोजित एक सिम्पोजियम में भाग लेने के लिए यहाँ आना हुआ तो मैं अति उत्साहित था क्योंकि यहाँ की सुरम्यता मेरे मन मस्तिष्क में पहले से विद्यमान थी. जब मैं यहाँ पंहुचा तो सीधे ए.सी.सी. के सतलुज गेस्ट हाउस में ले जाया गया, जहां से मंत्रमुग्ध करने वाली नैसर्गिक छटा का दर्शन सुलभ था.

सतलुज नदी, जिसे प्राचीन साहित्य में सत्द्रुत कहा गया है, अपनी लाखों वर्ष पुरानी तेज धारा को निनादित करती हुई अविरल बहती जाती है. अब तो व्यास नदी का भी जल सुरंगों के माध्यम से इसमें लाया जाता है, जो आधुनिक भारत के तीर्थ भाखड़ा डैम में जाकर मिलता है. सतलुज के किनारे पर प्राचीन कस्बा डेहर बसा हुआ है जो किसी जमाने में हिमांचल का मुख्य द्वार व व्यापार का केंद्र भी रहा होगा. उसके पृष्ट पर पर्वत मालाएं हैं, जिन पर दूर से ही देवालय-देवस्थानों के दर्शन होते हैं.

कुल्लू-मनाली मार्ग पर बरमाना एक छोटा सा गाँव किसी समय मात्र १०-२० घरों की बस्ती रही होगी. बिलासपुर से आगे घाघस पार कर जहां पंजगाई-बैरी तक हम आते हैं तो घाटी के गोद में बसे हुए इस बड़े सीमेंट उद्योग की कल्पना नहीं करते हैं, लेकिन जब पूरा परिदृश्य सामने होता है तो कंपनी के उन कर्णधारों को साधुवाद कहने का मन होता है जिन्होंने इसकी स्थापना की परिकल्पना की होगी. जहां इस कारखाने के उत्पादन से राष्ट्रनिर्माण हो रहा है वहीं इस पूरे इलाके के वैभव में अपार वृद्धि हुई है.

कारखाने और रिहायसी कालोनी के आसपास जो सघन वृक्षारोपण हुआ है, उससे ये क्षेत्र अनुपम हो गया है. इसके साथ ही जो जो पुष्पवाटिका सतलुज उद्यान के आसपास पल्लवित और पुष्पित की गयी है, उससे इसे जंगल में मंगल की संज्ञा दी जा सकती है. खदान और कारखाने के बीच में एक फलोद्यान भी बनाया गया है, जहाँ हर आने जाने वाले विशिष्ठ व्यक्ति द्वारा एक पौधा लगाया जाता रहा है. मैंने भी एक आम का पौधा यहाँ लगाया था. तब इस कारखाने के प्लांट हेड सूरी जी व माईन्स मैनेजर चावला जी थे, जिनके द्वारा किया गया स्वागत-सत्कार की यादें इतने वर्षों के बाद भी जेहन में ताजा हैं.

ये संयोग रहा कि मेरा कनिष्ठ पुत्र प्रद्युम्न सन २००६ में इसी कारखाने में एच. आर. हेड स्थानान्तरित होकर आया. और मैं अगले तीन वर्षों तक उसकी पोस्टिंग के दौरान यहाँ रहा आता जाता रहा. श्री वासुदेव ठाकुर का जिक्र करना भी मैं नहीं भूलूंगा, जिन्होंने गागल को खूबसूरत बनाने में ही अपने सुनहरे दिन बिता दिए. वे अब रिटायर हो चुके हैं. इसके अलावा डॉ. पुष्पेन्द्र हांडा, जो वर्षों तक गागल के प्राण रहे, अब मुम्बई की वादियों में रह कर जरूर पुराने घरौंदे को याद करते होंगे. गागल में लाखेरी मूल के अनेक कर्मचारी आज भी कार्यरत हैं. ए.सी.सी. का पुराना कर्मचारी होने के नाते मुझे ये जानकर आनंद व सुख का अनुभव होता है कि ये कारखाना बहुत अच्छी स्थिति में चल रहा है. सब को शुभ कामनाएं.
***   

शनिवार, 30 जनवरी 2016

पछ्पन साल

55th Wedding Anniversary
जब हम जवान थे तब एक हिन्दी फिल्म, "कल आज और कल" का ये सदाबहार गीत "जब हम होंगे साठ साल के, और तुम होगी पछ्पन की..." बहुत प्यारा लगता था. प्यारा तो आज भी लगता है, पर अब हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं. मैं हो गया हूँ 77 का और अर्धांगिनी 72 पार कर चुकी हैं. संयोग ऐसा कि आज तीस जनवरी को हमारे विवाहोत्सव की 55वीं जयन्ती है. वैवाहिक जीवन का ये लंबा सफ़र मेरी श्रीमती की कुछ शारिरिक व्याधियों के रहते बहुत सपाट तो नहीं रहा, पर बहुत ज्यादा ऊबड़ खाबड़ भी नहीं रहा है. अब हम इस मुकाम पर आ पहुंचे हैं कि एक दूसरे के बिना एक दिन भी अकेले रहना मुश्किल लगता है. बेटे पार्थ व प्रद्युम्न, तथा बेटी गिरिबाला सभी अपने अपने परिवारों के साथ सुखी और संपन्न हैं. हम अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से बहुत पहले मुक्त हो चुके हैं. ये सब भगवदकृपा है, स्वर्गीय माता-पिता का आशीर्वाद है, छोटे भाई-बहनों का प्यार व मित्रों की शुभ कामनाओं का प्रताप है.
***     

शनिवार, 2 जनवरी 2016

वाडी सीमेंट प्लांट

वाडी सीमेंट प्लांट कर्नाटक राज्य के धुर उत्तर में स्थित है. यह इलाका कभी तेलंगाना, यानि हैदराबाद निजाम के साम्राज्य का हिस्सा था. परिसीमन के बाद इसे कर्नाटक में ले लिया गया था. यहाँ के निवासियों की बोलचाल की भाषा कन्नड़ तथा उर्दू है. हैदराबादी, यानि दखिनी उर्दू-मिश्रित खड़ीबोली, सुनने में बहुत प्यारी लगती है. इस इलाके में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत अधिक बताया जाता है.

१९६६/६७ में लाखेरी से हमारे जनरल मैनेजर स्व. एस. के. मूर्ति को इस कारखाने का प्रॉजेक्ट मैनेजर बनाकर भेजा गया था स्व. मूर्ति ने लाखेरी कॉलोनी के क्वार्टर्स में बाउण्ड्रीज बनवाई, कोऑपरेटिव सोसाईटी के पीछे झाड़ियों को साफ़ करवाकर एक छोटा सा पार्क भी बनवाया. हमने उनकी याद में इस पार्क का नाम बाद में मूर्तिपार्क रख लिया था, जिसमें हर साल होलिकोत्सव के कार्यक्रम हुआ करते थे. वाडी में मूर्ति साहब के वानकी प्रेम व नगर संयोजन की खूबसूरत झलक आज भी चारों तरफ विद्यमान है. सन १९७२/७३ में जब मैं शाहाबाद से स्व. कामरेड श्रीनिवास गुडी के साथ एक ट्रेड यूनियन एक्टीविस्ट के रूप में यहाँ पहली बार आया तब कंपनी एरिया/ फैक्ट्री गेट के आसपास उजाड़ बियावान सा लगता था, पर आज यहाँ हराभरा नखलिस्तान दूर तक फैला हुआ है.

स्व. श्रीनिवास गुडी
फैक्ट्री गेट के आगे मेन रोड के पास पर स्व. श्रीनिवास गुडी की उर्ध्वांग मूर्ति सुनहरे रंग में स्थापित की गयी है, जो यहाँ के निवासियों/ कामगारों और एसीसी मैनेजमेंट की विनम्र श्रद्धांजलि के रूप में नजर आती है.

कारखाने के प्रबंधन कार्यालय के अन्दर एक शिलापट्ट लगा है, जिसमें लिखा गया है कि दूसरे फेज का उद्घाटन श्री नारायणदत्त तिवारी, तत्कालीन वित्तमंत्री भारत सरकार, के हाथों सन १९८४ में किया गया था. मुझे अब बताया गया कि पुराने प्लांट की उत्पादन क्षमता ३५०० टन प्रतिदिन व नए प्लांट की क्षमता १२५०० टन प्रतिदिन है. रॉ मैटीरियल की यहाँ उपलब्धता व क्वॉलिटी की कोई समस्या नहीं रही है. ये पूरा इलाका लाईम स्टोन का खजाना है. हाँ, इन वर्षों में वर्षा नहीं होने से पानी की प्राप्ति एक चिंता का विषय बना हुआ है. कगीना नदी का पूरी तरह दोहन हो रहा है, जिससे व्यवस्था बनी हुयी है. बगल में पुरानी बस्ती में सप्ताह में केवल दो बार जल निगन द्वारा समयबद्ध जल वितरण किया जा रहा है. वाडी रेलवे जंक्शन के आसपास बहुत घनी आबादी है जिसकी गलियां व नालियां गन्दगी से अटी पड़ी हैं. मैंने एक राहगीर से जब इस विषय की बात की तो वह व्यंग्यात्मक तरीके से बोला, यहाँ के लोग गन्दगी के आदी हैं, अगर सफाई हो जायेगी तो ये लोग बीमार हो जायेंगे.

फैक्ट्री की कालोनी आर्मी केंटनमेंट की तरह साफ़ सुथरी, रंगों से पुती हुयी हैं. बहुत बड़ा इलाका जंगल बना कर संरक्षित किया हुआ है. कॉलोनी में जिमखाना-क्लब, डी. ए. वी. स्कूल, अस्पताल, गेस्ट हाउस, बैंक, कृषि नर्सरी/ फ़ार्म सभी कुछ है. कॉलोनी के एक हिस्से में पुराने क्वार्टर्स बंजर अवस्था में खाली पड़े हुए हैं, जिनमें झाड़ियाँ उग आई हैं, खिड़की-दरवाजे टूट चुके हैं. शायद कर्मचारियों की संख्या कम होते जाना इसका कारण हो.  प्लांट हेड डॉ. समर बहादुर सिंह जो साउथ की अन्य कारखानों के क्लस्टर हेड भी हैं, कुछ वर्ष पहले लाखेरी में भी प्लांट हेड रह चुके हैं अत: उनसे मेरा परिचय पहले से रहा है, नए प्लांट के प्रोडक्शन हेड श्री सुमित चड्डा मेरे पुत्र प्रद्युम्न के साथ यानबू सीमेंट प्लांट में पोस्टेड थे. पुराने प्लांट के प्रोडक्शन हेड श्री सुरेश दुबे मेरे भानजे हैं. माईन्स मैनेजर श्री कुंजबिहारी वर्मा हैं, जो लाखेरी में एक समय मेरे पड़ोसी रहे श्री देवलाल जी (स्व. नंदलाल बैरवा, एम. एल. ए., के भाई) के पुत्र है. इन सब लोगों के बारे में जानकार/मिलकर इस उद्योग से अपने प्रगाढ़ रिश्तों को पुन: ताजा कर लिया है.

४०-४२ साल पुराने कामगारों या परिचितों में से अभी तक यहाँ कोई नहीं मिला है अत: मुझे कोई नहीं पहचानता है. अजनबी होकर घूमना भी तो एक नियामत ही है.
***

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

सलाम शाहाबाद - २

हमारे देश में कई कस्बों व शहरों का नाम शाहाबाद है. मैं जिस शाहाबाद के बारे में लिखने जा रहा हूँ वह कर्नाटक राज्य के उत्तरी जिले गुलबर्गा में स्थित है. ये पत्थरों का शहर है, जिसमें अंदरुनी सड़कों का पटांन पत्थरों का है. पुराने सभी मकान पत्थरों से बने हैं. पहले इन सभी की छतें भी पतले पत्थरों की स्लेटों से ही ढकी रहती थी. अब नए भवन जरूर सीमेंट-आर.सी.सी. के बने नजर आते हैं. मैं पूरे ४१ साल बाद यहाँ आया हूँ. हमारा एसीसी सीमेंट प्लांट २५ साल पहले किसी अन्य पार्टी को बेच दिया गया था फिर इसके कई मालिक बदलते रहे हैं. वर्तमान में इस पर जे.पी. सीमेंट का बोर्ड लगा हुआ है.

मेरे साथ मेरी पत्नी भी थी. उसकी तीव्र इच्छा थी कि कॉलोनी के उस घर को देखा जाए जिसमें सन १९७० से १९७४ तक चार साल हमने अपने सुनहरे दिन बिताये थे. लेकिन यहाँ की हालत देखकर बड़ा सदमा सा लगा. ये सुन्दर कॉलोनी देखरेख के अभाव में पूरी तरह उजड़ गयी है. बहुत से क्वार्टर्स ध्वस्त हो गए हैं. सर्वत्र कटीली झाड़ियाँ उग आई हैं. हमारे उस क्वार्टर के पास जो कैथोलिक चर्च की बिल्डिंग है, वह उदास खड़ी है. उसका बड़ा सा घंटा जरूर आज भी बजने का इन्तजार कर रहा है. अब जब क्रिसमस के मात्र दस दिन शेष हैं, यहाँ कोई चहल पहल नहीं है. कॉलोनी के बिजली पानी के कनेक्शन बरसों पहले कट चुके हैं. सर्वत्र उदासी है.

नए मालिकों ने अपनी आवश्यकता के अनुसार फैक्ट्री की नई चहारदीवारी बना ली है. उसके बाहर कुछ पुराने पीपल, नीम या जामुन के पेड़ जरूर हमें पहचान रहे होंगे, पर नि:शब्द थे. बीच में राम मंदिर है. अब शायद ही वहां आरती होती होगी. मडडी की तरफ जो मस्जिद है, उसमें जरूर ताजा रंग-रोगन दीख रहा था. जो इक्के दुक्के लोग मिले, वे सभी अपरिचित थे. मैंने अपने उस क्वार्टर के सामने फोटो ली. चर्च का फोटो यादगार के लिए खींची ताकि हमारे बच्चे भी अपने बचपन के दिनों को इस बहाने याद कर सकें. यद्यपि इस नज़ारे को देख कर मन भर आया क्योंकि एक जीवंत बस्ती का पराभव हो चुका है.

एक दिन पहले, मैं घूमते हुए वाडी सीमेंट फैक्ट्री की कॉलोनी के गेट पर स्थित कर्मचारी यूनियन (एटक) के कार्यालय में गया, जहाँ स्व. श्रीनिवास गुडी जी की आदमकद फोटो लगी थी. मुझे लगा कि वे एकटक मुझे देख रहे हैं और कुछ कहना चाहते हैं. वे एक समर्पित किसान नेता तथा मजदूर हितैषी गांधीवादी कम्युनिस्ट नेता थे. मैं दो साल तक शाहाबाद में उनका जनरल सेक्रेटरी रहा था. वे मेरे लाखेरी लौटने के बाद एक बार लाखेरी भी पधारे थे. वे एक महान आत्मा थे. कार्यालय में बैठे एक बुजुर्ग ने बताया कि पूर्व नेता आईजय्या भी स्वर्ग सिधार चुके हैं, जिनकी मूर्ति वाडी के लोगों ने कालोनी के बाहर स्थापित कर रखी है.

शाहाबाद में मेरे साथ यूनियन में जोईंट सेक्रेटरी रहे श्री गुरुनाथ बाद में विधायक और स्टेट लेबर मिनिस्टर रहे, उनका फोन नंबर पाकर मैंने उनसे संपर्क साधा, वे आजकल विधान परिषद् के चुनाव में गुलबर्गा/बीदर में व्यस्त हैं इसलिए अभी तक मुलाक़ात नहीं हो पाई है.

इस पूरे क्षेत्र में कई महीनों से वर्षा नहीं हुई है. सर्वत्र सूखा है. खेतों में कपास व ज्वार की फसल खराब हो रही है. लोग कहते हैं कि अकाल की स्थिति बनती जा रही है. यहाँ कगीना नदी (भीमा नदी की ट्रिब्युटरी) अब सूखने लगी है. जगह जगह पानी रोक कर खींचा जा रहा है. वाडी फैक्ट्री का प्रबंधन पानी की कमी से चिंतित है, ऐसा मैंने सुना है.

हैदराबाद से वाडी तक नेशनल हाईवे बहुत शानदार है, पर वाडी और शाहाबाद के बीच हाईवे बहुत खराब स्थिति में है, बदहाल है, हर गाड़ी के पीछे कच्ची सड़क का सा धूल का बवंडर दिखाई देता है. सड़क के दोनों तरफ पट्टी-पत्थर निकालने की अनेक खदानें हैं, जिनमें आज भी मैनुअली कार्य होता है. इस पूरे इलाके में थोड़ी थोड़ी दूरी पर अनेक सीमेंट के बड़े कारखाने उद्योगपतियों ने लगा लिए हैं, पर इस क्षेत्र का सबसे पुराना शाहाबाद का कारखाना अपनी बर्बादी को रोता हुआ नजर आता है.
***       

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल लाखेरी, बूंदी, राजस्थान

डी.ए.वी. का फुल फॉर्म है, ‘दयानंद एंग्लो वैदिक.’ स्वामी दयानंद सरस्वती (१८२४-१८८३) एक महान समाज सुधारक, चिन्तक, देशभक्त सन्यासी हुए हैं. उन्होंने अंध विश्वासों और समाज में फैले पाखंडों के विरुद्ध जन जागरण किया. आर्यसमाज की स्थापना की और सर्वप्रथम स्वराज का सन्देश दिया. हरिद्वार में गुरुकुल कागडी की स्थापना उन्होंने ही की. उनकी मृत्यु अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा एक जघन्य षडयंत्र के तहत जहर देकर कराई गयी थी. मृत्युपरांत उनके अनुयाईयों में एक लाला हंसराज ने सन १८८६ में सर्वप्रथम ‘एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना लाहौर में की  उन्ही दिनों जालंधर (पंजाब) में डी.ए.वी. विश्वविद्यालय की स्थापना भी हुयी थी इसे आधुनिक भारत का नालदा कहा गया है. धीरे धीरे डी.ए.वी. स्कूलों की श्रंखला पूरे देश में फैलती चली गयी. २०१० में जब इसकी १२५ वीं जयन्ती मनाई गयी थी, तो उस वक्त के आंकड़े के अनुसार ५६० पब्लिक स्कूल व ८५ सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल थे. इसके अलावा ७० सस्थान ऐसे हैं जिनमें आर्ट, साईंस, क़ानून, कृषि, आयुर्वेद, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, नर्सिंग, डेंटल, फीजियोथेरेपी, और वैदिक रिसर्च का अध्ययन एवं अध्यापन किया जाता है.

लाखेरी में सन १९७० तक कोई अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं था. उन दिनों उत्तर भारत के सभी शहरों में बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने प्रचलन शुरू हुआ था. यह एक तरह से आवश्यकता भी हो गयी थी क्योंकि बंगाल एवं दक्षिण भारत के बच्चे अंग्रेजी की वजह से प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर रहे थे. नेता लोग जरूर अंग्रेजी का विरोध सार्वजनिक स्तर पर कर रहे थे, पर अपने खुद के बच्चों को इंग्लिस मीडियम स्कूलों में पढ़ाते थे.

शिक्षा के क्षेत्र में क्रिश्चियन मिशनरीज ने बहुत काम किया है. हालाँकि कट्टरपंथी लोग इसे ईसाई धर्म प्रचार का एक तरीका मानते रहे हैं. देश भर में ईसाई नन्स द्वारा यह पुनीत कार्य बहुत गौरवशाली ढंग से अनवरत किया जाता रहा है. चूंकि पब्लिक स्कूल खोलना व चलाना अब एक कमाऊ व्यवसाय भी बन गया है इसलिए आज देश भर में गली-गली, मोहल्ला-मोहल्ला में पब्लिक स्कूल के बोर्ड लगे हुए दिखाई देते हैं.

हमारी लाखेरी में १९७० के आसपास जब कोटा से इमैनुअल मिशनरी स्कूल वाले एसीसी मैनेजमेंट से अपना स्कूल खोलने के सम्बन्ध में मिले तो मैनेजमेंट ने सहर्ष ईश्वर नगर में क्लब के पीछे वाले नए जेएसक्यू (जूनियर स्टाफ क्वार्टर) उनको दे दिया. ये कुछ सालों तक चला, लेकिन आमदनी कम और खर्चा ज्यादा होने से गाड़ी आगे रुक गयी. मैनेजमेंट ने अजमेर के एक रिटायर्ड प्रिंसिपल श्रीवास्तव जी से संपर्क करके नई व्यवस्था ‘प्रोग्रेसिव इंग्लिश मीडियम स्कूल’ खुलवाया, जो सन १९८० तक चला. कंपनी ने उनके स्कूल को आर्थिक सहायता के साथ एक रिहायसी टीआरटी क्वार्टर भी आवंटित किया. इस समय तक एसीसी के कई अन्य कारखानों में पहले से ही डी.ए.वी द्वारा स्कूल संचालित हो रहे थे. दिल्ली मुख्यालय से लिखा-पढ़ी करके यहाँ भी पब्लिक स्कूल की शुरुआत की. छात्रों की संख्या बढ़ने पर एक और जेएसक्यू दिया गया. यहाँ के पहले प्रिंसिपल श्री जे.एन. ऋषि थे. धीरे धीरे स्कूल को अच्छी मान्यता मिलती गयी. छात्र संख्या बढ़ती रही तो कंपनी ने नीचे जींद की बावडी के पास बिल्डिंग बनाकर दी. इसको बनाने में आर्थिक योगदान डी.ए.वी. मैनेजमेंट का भी था या नहीं, मुझे मालूम नहीं है. बाद में नया स्टाफ व नए प्रिंसिपल आते रहे, लेकिन विस्तार का कार्य मुख्यत: मोहनलाल गोयल जी ने किया. उनकी एसीसी मैनेजमेंट से अच्छे सम्बन्ध थे. वे बाद में जयपुर में रीजनल डाईरेक्टर बने.

डी.ए.वी. में भी तब सारा टीचिंग स्टाफ अच्छा नहीं था. पैसा बचाने के लिए ग्रीष्मावकाश के बाद नए चेहरे (अनट्रेंड भी) रखे जाते थे. मैंने एक बार श्री गोयल जी से इस बाबत जब चर्चा की तो वे बोले “आमदनी से खर्चा बड़ा है, ३००० रुपयों में तो ‘GIRL गिर्ल’ ही मिल सकती है.” पर बाद में ये स्थिति नहीं रही थी. आज श्री ए.के. लाल यहाँ प्रिंसिपल हैं. पुराने अध्यापकों में सर्वश्री आर.के. यादव, आर.एस.एल.शर्मा, गिरिराज जायसवाल, व आर.के. गोचर मौजूद हैं. स्टाफ पूरा प्रशिक्षित है. अच्छा स्कूल होना लाखेरीवासियों का सौभाग्य है. यहाँ से पढ़ कर निकले हुए बच्चे अपने जीवन की ऊंचाईयों को राष्ट्रीय स्तर पर छू रहे हैं. इस स्कूल का नाम बूंदी जिले में ही नहीं, पूरे राजस्थान प्रदेश के अग्रिम पब्लिक स्कूलों में गिना जाता है. यहाँ से पढ़ कर निकले हुए बच्चे विदेशों में भी परचम लहरा रहे हैं. स्कूल को इस ऊँचाई तक पहुँचाने का श्रेय जरूर स्कूल प्रबंधन को है, पर एसीसी मैनेजमेंट ने भी भरपूर सहयोग दिया है, विशेषकर पूर्व जनरल मैनेजर श्री पी.के.काकू की व्यक्तिगत शुभचिन्ता नहीं भुलाई जा सकती है. मैं समझता हूँ कि कंपनी अपने कर्मचारियों के बच्चों के अनुपात में आज भी आर्थिक सहायता स्कूल को देती होगी. स्कूल प्रबंधन बताता है कि अब दूर दराज के इलाकों से भी बच्चे यहाँ पढ़ने आने लगे हैं.

अंत में, जैसा कि डी.ए.वी, के नाम से ही जाहिर है, इसमें अंग्रेजी के अलावा संस्कृत व हिन्दी में भी बच्चों को ज्ञान दिया जाता है. उनके चरित्र निर्माण पर विशेष ध्यान रखा जाता है. जय हो.
***

शनिवार, 26 सितंबर 2015

एक कड़वी याद

गर्मियों का मौसम था (सन 1994 या 95). रात को करीब डेढ़ बजे फैक्ट्री के जनरल मैनेजर श्री पी. के. काकू का मेरे आवास पर फोन आया कि “टाप क्रशर पर एक आदमी कंपनी के डम्फर के टायर के नीचे दब गया है. वहां हंगामा हो रहा है. आप प्लीज मदद कीजिये. मॉब को समझाइये. लाश को वहां से पोस्टमॉर्टम के लिए अस्पताल शिफ्ट करना होगा.”

उन्होंने ये बात सहज में कह दी, पर उनकी आवाज में घबराहट जरूर थी. वैसे तो उग्र भीड़ के बीच जाना खतरे से खाली नहीं होता है, पर ऐसे मामलों में मैं हमेशा दुस्साहसी रहा हूँ. मैं युनियन अध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारी समझ कर घर से चल पड़ा. 15 मिनट में धटनास्थल पर पहुँच गया. वहां लोगों का जमावड़ा था. मृतक नजदीक में गरमपुरा का रहने वाला था इसलिए भी भीड़ होती जा रही थी. तरह तरह की बातें हो रही थी जैसे “लाश तभी उठेगी जब मुआवजा तय हो जाएगा,” “कंपनी को इसके बच्चे को नौकरी देनी पड़ेगी”. उस भीड़ में मेरे भी मित्र मौजूद थे. उन्होंने मुझे घेर लिया और घटना की पूरी जानकारी दी कि मृतक रूपलाल पारेता (नाम अब मुझे शायद सही याद ना भी हो) ड्राईवर था. एक प्राईवेट पार्टी के पत्थर ढोता था. डम्फर के नीचे सोया हुआ था. डम्फर का ड्राईवर श्री गुलाबचंद भी पारेता बिरादरी का था इसलिए ‘मारो-पीटो’ वाली बात नहीं थी. लेकिन कोई भी यह कहने को तैयार नहीं था कि ‘गलती रूपलाल की थी.’ मैंने वक्त की नजाकत देखते हुए कहा कि "लाश उठाने व मुआवजे में कोई सम्बन्ध नहीं है. मुआवजा कानूनन कंपनी को देना होगा. उसके लिए पोस्टमोरटम रिपोर्ट तो जरूरी है. हम परिवार की जितनी मदद हो सकेगी करेंगे. लोगों की समझ में बात आ गयी. रोते हुए परिवार के लोगों को घर भेजा गया और लाश को मुर्दाघर शिफ्ट किया गया. अगले दिन पुलिस भी बुला ली गयी और मैनेजमेंट द्वारा विधिवत सब कार्यवाही की गयी. पुलिस ने जो रिपोर्ट बनाई उसमें मुझे भी चश्मदीद लिखा गया.

उक्त घटना ने मुझे भी झकझोर कर रख दिया था क्योंकि 17-18 साल पहले यही रूपलाल ड्राईवर नशे में धुत्त होकर अपने ट्रक से मुझे मारने के लिए पीछे पड़ा था. मामला यों था कि सन 1974 में चार साल शाहाबाद में वनवास काटकर जब में वापस लाखेरी लौटा तो यूनियन की सत्ता में काबिज भाई इब्राहीम हनीफी व शिवनारायण गोचर की टीम ने मेरी उपस्थिति पर खुशी नहीं जताई थी. मुझे चुनाव न लड़ने देने के लिए प्रस्ताव पास कर लिया. (हमारी दोस्ती बाद में हुई) चुनाव में उनकी पूरी टीम हार गयी रामा जी अध्यक्ष और मैं जनरल सेक्रेटरी नियुक्त हो गया. अगले ही वर्ष हमने सीमेंट फैडरेशन का अधिवेशन लाखेरी में आयोजित भी कर लिया. मुख्य अथिति मुख्यमंत्री हीरालाल देवपुरा जी थे. भंवरलाल शर्मा जी के अलावा अनेक गणमान्य नेता थे. पूरे देश से प्रतिनिधि आये थे. कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए अध्यक्ष एच. एन. त्रिवेदी व दूधिया जी ने बहुत खुशी जताई थी.

जब मैं कुछ बाहरी प्रतिनिधियों को रात की देहरादून एक्सप्रेस में बिठाने के लिए रेलवे स्टेशन ले जा रहा था तो एक ट्रक हमारी जीप को बार बार टक्कर मारने के लिए पीछा कर रहा था. हम बच निकले थे, पर मालूम हुआ कि मेरे खिलाफ एक बड़ी साजिश चल रही थी. इस साजिश में शराबियों की गैंग थी, जिसका सरगना कामगार संघ के पूर्व अध्यक्ष का निकट संबंधी था. उनको कामगार संघ में मेरा उदय तथा अधिवेशन की सफलता से चिढ़ हो रही थी. मालूम करने पर पता चला की रूपलाल उसका ही मुलाजिम था. पुलिस में रिपोर्ट की गयी. थानेदार जी होशियार निकले. ऍफ़.आई.आर. नहीं लिखी, पर रूपलाल को मेरे सामने बुलाकर डाटा-फटकारा और छोड़ दिया. बाद में ये मालूम हुआ कि थानेदार जी ने आरोपी पार्टी की मोटर साईकिल अपने कब्जे में ले ली थी. उसी में घूमा करते थे. इसके बाद उन लोगों ने कोई वारदात नहीं की. इधर मेरे अभिन्न साथियों ने, जिनमें स्व. सुवालाल व्यास, स्व.अब्दुल हबीब पठान व स्व. कांतिप्रसाद गौड़ थे, मेरी सुरक्षा चाक चौबंद कर रखी थी.

कुदरत के इस खेल को देखिये कि रूपलाल स्वयं टायर के नीचे आकर इस संसार से विदा हुआ और मुझे चश्मदीद बना गया.
***

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

लाखेरी नगरपालिका

अरावली पर्वतमाला की गोद में बसा हुआ लाखेरी नगर, बूंदी जिले का दूसरा बड़ा नगर है. 2011 की जनगणना के अनुसार इसकी कुल आबादी 29572 थी. पर्वतीय उपत्यकाओं के बीच हरा भरा नखलिस्तान सा लगने वाला ये नगर कैनवस पर उकेरा गया प्राकृतिक सौन्दर्य का एक विहंगम चित्र सा नजर आता है, जिसमें नीम, शीशम, आम, जामुन, पीपल, तथा बबूल के वृक्षों की भरमार है. जंगली प्लान्टेशन के फलस्वरूप सर्वत्र कांटेदार कीकर (अंगरेजी बबूल) की झाडियां फ़ैली हुई हैं.

निकाय क्षेत्र में बड़े बरसाती सरोवर व मीठे पानी के कुंवे-बावडियों की भरमार है. हर रविवार को मुख्य बाजार के आगे हाट लगता है, जो आसपास ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है. क्षेत्र में अब अनेक स्कूल, कॉलेज, अस्पताल हैं, और सीमेंट का एक कारखाना है, जो गत एक सौ वर्षों से राष्ट्र निर्माण में सहभागी है तथा इस क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि का जीवंत प्रमाण है.

सन 1976 तक गरमपुरा पंचायत क्षेत्र नगरपालिका सीमा के बाहर था. विस्तार होने पर ए.सी.सी. के लीज एरिया सहित उसका विलय नगरपालिका में कर दिया गया. विस्तार होने पर लाखेरी रेलवे स्टेशन से इंदरगढ़ रोड पर भावपुरा तक, बूंदी रोड पर शंकरपुरा+सुभाष नगर  से लेकर प्राचीन बसावट ब्रह्मपुरी व तमोलखाना तक सीमाएं फ़ैल गयी हैं. परिसीमन करके कुल 25 वार्ड्स बनाए गए हैं.

किसी स्वनामधन्य ‘लाखा गूजर के नाम पर इस गाँव का नाम लाखेरी पड़ा, ऐसा कहा जाता है. ये गाँव कब बसा, और इसमें लाल पत्थरों से बने सुन्दर मंदिर और बावडियां बूंदी के राजाओं ने या किसी और ने बनाए, इस बारे में मुझे कहीं से प्रामाणिक तथ्य नहीं मिल पाये. यों तो लाखेरी नगर निकाय का अभ्युदय सन 1937-38 से बताया जाता है. नागरिक सुविधाओं की देखरेख के लिए किन किन लोगों ने इसकी शुरुआत की इसका भी कोई विवरण नहीं मिल सका है. राजस्थान राज्य के पुनर्गठन के बाद दिनांक 5-12-1951 के सरकारी नोटिफिकेशन द्वारा लाखेरी नगरपालिका को लोकल सेल्फ गवर्नमेंट की मान्यता मिली, ऐसा विकीपीडिया के इतिहास में दर्ज है.

पिछली सदी के पांचवे दशक में ए.सी.सी. ने जब गाँव के बीच से चमावली की तरफ अपनी रेल लाइन डालनी चाही तो उसके विरुद्ध एक जन आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था, जिसका समाधान एक समझौते के तहत हुआ कि कंपनी ने गाँव में ब्रह्मपुरी के आख़िरी छोर तक पक्की सीमेंट की सड़कें बनवाई, अस्पताल की सुविधा दी, सार्वजनिक स्थलों पर निशुल्क बिजली की व्यवस्था दी. अनेक सार्वजनिक हितों में आर्थिक योगदान दिया और स्थाई रूप से हर महीने कुछ निश्चित राशि अनुदान के रूप में देना स्वीकार किया. इस आन्दोलन का नेतृत्व स्व. गजानंद जी पुरोहित और भू. पू. विधायक स्व. भंवरलाल शर्मा द्वारा किया गया था, जिनको बूंदी के वकील (बाद में अनेक विभागों के मंत्री रहे), पंडित बृजसुन्दर शर्मा का वरदहस्त प्राप्त था. विजयद्वार उसी जीत का प्रतीक माना जाता है. इस द्वार के ऊपर से रेल लाइन आज भी गुजरती है. उस आन्दोलन में स्व. हरिप्रसाद शर्मा (भू.पू.विधायक), नंदकिशोर दीक्षित (डब्लू) आदि अनेक नौजवानों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. इस आन्दोलन को लाखेरी में एक बड़ी राजनैतिक चेतना के रूप में देखा गया क्योंकि इसके बाद अनेक समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम उभर कर सामने आई थी, जिनमें प्रमुख नाम जो लेखक की जानकारी में हैं, वे हैं, सर्वश्री जडावचंद शर्मा, मानकचंद जैन, दुर्गालाल शर्मा, मदनलाल शर्मा (खेवरिया) नेमीचंद जैन, दीनानाथ शर्मा, छीतरलाल जैन, किशनचंद शर्मा, श्रीकृष्ण शर्मा, गोबरीलाल राठोर, दौलतराम शर्मा, बाबूलाल शर्मा, नरसिंहलाल शर्मा आदि. (जिन नामों को मैं स्मरण नहीं कर पाया हूँ, सुधी पाठक कृपया टिप्पणी द्वारा जोड़ने का कष्ट करें.)

प्रारम्भिक वर्षों में स्व. गजानंद जी पुरोहित इसके संरक्षक/ चेयरमैन, सब कुछ थे. उनकी टीम में कौन कौन सक्रिय थे, ये भी पुरानी बात है. हाँ, ये भी सुना था कि कारखाने में बतौर कैशियर कार्यरत स्व. केशवलाल दीक्षित भी म्युनिसपैलिटी का कार्य देखते थे. 1951 के बाद विधिवत चुने हुए चेयरमैनों की क्रमबद्ध सूची इस प्रकार है: सर्वश्री मानकचंद जैन, हरिप्रसाद शर्मा, नंदकिशोर दीक्षित, मदनलाल शर्मा, रामनारायण शर्मा, दौलतराम शर्मा, राधेश्याम शर्मा, इब्राहीम गांघी, मोडूलाल महावर, महावीर गोयल, चौथमल नागर, और राकेश सेनी.

राजनैतिक उठापटक के दौरान बीच बीच में सरकारों द्वारा बोर्ड भंग करके प्रशासक भी नियुक्त किये जाते रहे हैं. ताजा सामाचार यह है इस बार हुए चुनावों के फलस्वरूप जो नया बोर्ड आया है वह अभी अच्छा काम कर रहा है.
***

रविवार, 16 अगस्त 2015

रोमांच

रोमांच में भी एक तरह की आनन्दानुभूति होती है. हमारे जीवन में कई ऐसे अवसर आते हैं, जब कुछ नया होने को होता है और हम अनेक कल्पनाओं के साथ उस क्षण की प्रतीक्षा किया करते हैं.

मेरे इस दीर्घ जीवन में भी कई क्षण रोमांचित करते रहे हैं, नवीनतम ये है कि मैंने पहली बार दिल्ली की मैट्रो रेल से यात्रा की है. मैं नियमितरुप से पुस्तकें व समाचार पत्रों का पाठक  रहा हूँ और समसामयिक विषयों पर अपनी जानकारी अपडेट करता रहता हूँ. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मदनलाल खुराना जी के समय से मैट्रो रेल का निर्माण प्रारम्भ हुआ था, और शीला दीक्षित जी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में मैट्रो रेल का ये बड़ा प्रोजेक्ट कार्यरूप में परीणित हुआ. गत वर्षों में भी बीच बीच में कई बार दिल्ली आना जाना हुआ. तब इस रेल के लिए जगह जगह सडकों की खुदाई तथा ऊंचे ऊंचे सीमेंट के स्तम्भ बनते देखे थे. सचमुच ये बहुत बड़ी परियोजना थी विशेषकर अंडरग्राउण्ड ट्रैक डालना बड़ा दुरूह कार्य था ऊपर बड़ी बड़ी इमारतें और उनके नीचे खुदाई करके रेलवे स्टेशन बनाए गए हैं.

परिवहन के लिए निजी साधन होने के कारण मेरे पुत्र प्रद्युम्न ने मुझे मैट्रो रेल में सफ़र करने का कोई मौक़ा नहीं दिया।. परन्तु इस बार मैं हल्द्वानी से ही ठान कर आया था कि मैट्रो रेल के सफ़र का अनुभव जरूर करूंगा.

ठेठ एसियाड के समय (इंदिरा गांधी का युग) से ही दिल्ली ने विकास की गति पकड़ी थी, अन्यथा उससे पहले दिल्ली के किसी सड़क या चौराहे पर सिगनल लाईटें तक नहीं लगी हुयी थी. तब दिल्ली थी भी बहुत छोटी. मैं सन 1957-58 में दिल्ली की सड़कों पर साईकिल से खूब घूमा था. सरकारी बसों में सफ़र करना भी बहुत सस्ता और सरल हुआ करता था. सन 1958-59  में एक नई स्कीम निकाली गयी थी कि छुट्टी के दिनों में महज एक रूपये का टिकट लेकर दिन भर कहीं भी घूमा जा सक़ता था. बसें भी सीमित थी. कुल 31 रूट थे. 21 नंबर यूनिवर्सिटी आती जाती थी. आख़िरी 30 नम्बर रेलवे स्टेशन से कालकाजी और 31 नंबर मालवीय नगर जाती थी. ये दोनों रिमोट रिफ्यूजी बस्तियां थी.

गत चालीस-पचास सालों में ना जाने इतनी जनता कहाँ से दिल्ली में आ जुटी है. दिल्ली के चारों तरफ दूर दूर तक बहुमंजिली इमारतों का जंगल खड़ा हो गया है. और ये अभी भी अपना क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है. तब जमुना पार कुछ भी नहीं था, गांधी नगर, शहादरा व गाजियाबाद को आने जाने के लिए केवल लालकिले के पिछवाड़े वाला यामुनापुल था, जिसमें ऊपर रेल लाइन व नीचे मोटर+पैदल मार्ग होता था. कनॉटप्लेस, जिसे अब राजीव चौक नाम दिया गया है, तब भी सुन्दर था. दोहरे चक्र में गोल खम्भों वाली एक सी धवल इमारतें अंग्रेजों के समय की बनी हुयी हैं. उनकी ही स्थापत्यकला का नमूना हैं. अब आसपास जो ऊंची बिल्डिंग्स दिखती हैं, वे तब नहीं थी. दिल्ली विश्वविद्यालय, किंग्सवे कैम्प, तीमारपुर, पुराना विधान सभा भवन, कश्मीरी गेट, दरियागंज, इंडिया गेट, रेसकोर्स.सफदरजंग, लालकिले के सामने जैन मंदिर,  गुरुद्वारा, फुव्वारा, चांदनी चौक, सदर बाजार, पहाड़ गंज, बिड़ला मंदिर, करोलबाग, झंडेवालान, सब्जीमंडी, सब सिनेमा रील की तरह घूम रहे हैं. पुरानी दिल्ली की सड़क के बीचोंबीच एक ट्राम धीमी गति से घंटी बजाते हुए चलती थी.  कुतुबमीनार को रेलवे स्टेशन से 17 नंबर बस जाती थी. रास्ते में युसूफ सराय से आगे जंगल पड़ता था. 

आयुर्विज्ञान संस्थान तब बनने लग गया था. पुराने किले की बगल में नया चिड़िया घर बनाया जा रहा था. सन 1958 में प्रगति मैदान में एक प्रदर्शनी लगी थी, जहां अमेरिकी स्टाल पर मैंने पहली बार टेलीवीजन चलता देखा था. तब मेरी समझ में इसके बारे में कुछ नहीं आया था. चूंकि मैं दूर दराज उत्तरांचल के एक अति पिछड़े गाँव से आया था, मेरे लिए दिल्ली एक दूसरी ही दुनिया थी जिसके अनुभव बहुत रोमांचित करने वाले होते थे. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पैथोलाजी की ट्रेनिंग लेकर कुछ महीने दिल्ली म्युनिसिपल चिकित्सालय में काम करने के बाद बड़ी वेतन+सुविधाओं के लालच में 10 अगस्त 1960 को दिल्ली छोड़कर लाखेरी राजस्थान चला गया.

दुनिया गोल है. आज फिर से घूम फिर कर दिल्ली आ गया हूँ. वर्तमान विहंगम दिल्ली को युग परिवर्तन की अनुभूति के साथ देख रहा हूँ. रोमांचित हूँ. मेरा पौत्र सिद्धांत बॉस्टन (अमेरिका) में फिजिक्स इंजीनियरिंग पढ़ रहा है. इन दिनों भारत आया हुआ है. मैंने उसको अपनी इच्छा बताई कि मुझे मैट्रो ट्रेन के सफ़र का अनुभव करना है तो उसने मुझको बताया कि शाम-सुबह बिजी आवर्स में तो बहुत भीड़भाड़ रहती है. दोपहर के समय जाना चाहिए. ठीक 55 साल बाद 11 अगस्त 1915 को उमस भरी दोपहरी में जब हम वैशाली मैट्रो ट्रेन में दाखिल हुए तो ए.सी. की ठंडक से बहुत राहत महसूस हुई. भीड़ तो तब भी, थी लेकिन एक नौजवान ने तुरंत सीट छोड़ कर मुझे बैठने का आमंत्रण दे दिया.  कुछ देर बाद मुझे मालूम हुआ की दरवाजे के पास वाली छोटी सीटें बुजुर्गों/विकलांगों के लिए नामांकित की गई है. ये सूचना सीट के पीछे लिखी गयी है. मैं यद्यपि अभी भी दिल से जवान हूँ, पर ये घटना मुझे बूढ़ा होने का अहसास जरूर करा गयी.

मैंने कई बार मुम्बई की लोकल ट्रेन में सफ़र किया है, जहाँ लोग धक्का मुक्की करके भागते रहते हैं. बिजी आवर्स में तो हम जैसे लोगों का चढ़ना उतरना बहुत मुश्किल काम है. अपनी विदेश यात्राओं के दौरान जर्मनी में फ्रेंकफर्ट, थाईलैंड में बैंकाक, तथा अमेरिका के अटलांटा एयरपोर्ट पर मैट्रो की ही तरह ट्रेन के डिब्बे यात्रियों को उनके निर्धारित गेट तक लाती- ले जाती है. वहां मैंने देखा कि लोग बहुत अनुशासित होते हैं. उसकी थोड़ी झलक मुझे अपनी मैट्रो में अवश्य मिली क्यू में लगने का एटिकेट दिल्ली वालों में आया है अन्यथा मैंने यहाँ बसों में चढ़ने उतरने वालों को धक्का मुक्की करते व जेबकतरों के शिकार होते हुए भी देखा है.

वैशाली से आनंद विहार, प्रीत विहार, निर्माण विहार, कड़कड़दूमा, यमुना विहार, प्रगति मैदान, इन्द्रप्रस्थ व बाराखम्भा, इसके बाद धरती के अन्दर गुफा से गुजरते हुए राजीव चौक जंक्शन पहुंचे. वहां सिद्धांत ने मुझे ब्लू लाइन, व अन्य रूट पर यलो लाइन या परपल लाइन ट्रेन के बारे में बताया. ट्रेन में हर स्टेशन आने पर यात्रियों को सूचना देते हुए सावधान किया जाता रहा. मैट्रो रेल में सस्ते में सफ़र होता है, और समय की बचत भी बहुत होती है. कुल मिलाकर राजीव चौक पहुँचने के बाद हमने अंडरग्राउंड पालिका बाजार का भी एक छोटा चक्कर लगाया और उसी रोमांच के साथ घर लौट आये. मैं मन ही मन एक पुरानी फिल्म का गाना दुहरा रहा था, "ये जिन्दगी के मेले कभी ख़तम ना होंगे, अफसोस हम ना होंगे."
*** 

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

जिग-जैग डैम

लाखेरी सीमेंट प्लांट तथा इसकी रिहायसी कालोनी के लिए अंग्रेजों के समय में ही पानी की व्यवस्था के कई विकल्प रखे गए थे. नानादेवी का नलकूप, गाँव का बड़ा तालाब, जिसमें बरसाती पानी जमा होता है, और सखावादा में पम्पिंग स्टेशन, जो पहाड़ी के ऊपर से पाईप लाइन लेते हुए नयापुरा स्थित रिजरवॉयर में पानी लाता है, जहां पानी फ़िल्टर होता है, और उसका ट्रीटमेंट किया जाता है. पिछली सदी के चौथे दसक में चमावली की पहाड़ियों से आने वाले  बरसाती पानी को रोक कर जमा करने के लिए एक बांध बनाया गया. और उसी के पूर्व में बूंदी रोड के किनारे भरान करके एक और मजबूत डैम बनाया गया, जिसे जिग-जैग डैम या बन्दा भी लोग कहा करते हैं. इसको मजबूत सीमेंट की दीवार देकर बनाया गया है. पानी के दबाव या लहरों के जोर को रोकने के लिए डैम के किनारे को आड़े-तिरछे कोण देकर ऐसी बनावट दी गयी है कि ये बहुत सुन्दर दीखता है. खासतौर पर जब पानी ऊपर से छलकता जाता है बरसात में यहाँ एक बड़ी झील बन जाती है. चूंकि इसमें पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं है, पानी गर्मियों तक धीरे धीरे सूख जाता है. इसलिए आवश्यकतानुसार पानी जमा रखने के लिए दक्षिण में रेलवे स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर आगे नयागाँव के पास मेज नदी पर एक छोटा पम्पिंग स्टेशन बनाया गया, जहां से पाईप लाइन द्वारा सीधे जिग-जैग डैम में पानी आता था और एक पम्प द्वारा पाईप के माध्यम से फ़िल्टर प्लांट से जोड़ा गया था.

जिग-जैग डैम मानसून के दिनों में छलकने लगता है. यह स्थान बहुत रमणीक व दर्शनीय हो जाता है. कई बार गर्मियों में पानी सूखने के बाद इसमें जमा सिल्ट हटाना भी जरूरी होता था.

गौरतलब है कि कंपनी की सारी जमीन पहले बूंदी रियासत से तथा बाद में रियासतों के विलय के बाद राज्य सरकार से लीज पर ली हुयी है. बूंदी के राजा इस कंपनी के स्थानीय डाईरेक्टर हुआ करते थे.

आठवें-नवें दशक में फैक्ट्री लम्बे समय तक घाटे के दौर से गुजर रही थी. वैट प्रोसेस  तथा पुरानी टेकनोलाजी होने के कारण उत्पादन कम और लागत ज्यादा आ रही थी. तब खर्चे घटाने के क्रम में जिग-जैग डैम की उपयोगिता के बारे में भी सोचा गया होगा क्योंकि इसकी मैनटेनैंस पर बड़ा खर्चा आ रहा होगा. उसी बीच ये भी देखा गया की डैम की नींव में से बहुत पानी का रिसाव होने लगा था. डर ये भी था कि कभी अगर डैम टूट गया या फूट पड़ा तो आगे बजरंगनगर व शिवनगर की नई बसावट डूबत में आ जायेगी. ये सारी संभावनाएं हैड आफिस को भेजी गयी तो वहाँ से आदेश हुआ की डैम को जिला प्रशासन को दे दिया जाये. जांच- पड़ताल के इस प्रोसेस में कई साल लग गए. इस बीच कुछ लोगों ने जमीन पर अवैध कब्जा करके गेहूं तथा सरसों की खेती करना भी शुरू कर दिया था.

मुझे याद है कि जब सं १९६० में मैं लाखेरी आया था तो वह अगस्त का ही हरियाला मौसम था आगे वर्षों में इस डैम की पाल पर लोग परिवार सहित पिकनिक मनाने आते थे. बन्दा मंदिर की तरफ तालाब के किनारे नाव के लिए एक टिन शेड बना हुआ था. लोग नौकायन का आनन्द लिया करते थे. किनारे की सीढ़ियों पर नहाना-धोना भी करते थे, लेकिन ये भी सच है कि यहाँ पर जानलेवा दुर्घटनाएं भी बहुत होती थी.

अब मुझे लाखेरी छोड़े हुए लगभग सोलह साल हो गए हैं इसलिए वर्तमान व्यवस्था के बारे में मुझे पूरी जानकारी नहीं है. फेसबुक पर हमारे मित्रों द्वारों डाली गयी चित्रावली से मालूम हो रहा है कि ये स्थान आज भी गुलजार है. गुलजार रहना चाहिए. सभी मित्रों को शुभ कामनाएं.

पुन:श्च : मेरे इस लेख पर एक मित्र ने टिप्पणी करके बताया है कि जिला प्रशासन ने इस डैम को लाखेरी नगर पालिका को जीर्णोद्धार के लिए सौंप दिया था. तत्कालीन चेयरमैन स्वनामधन्य श्री महावीर गोयल ने इस कार्य योजना में व्यक्तिगत रूचि लेकर तत्कालीन  सांसद श्री रामनारायण मीणा से एक लाख रुपयों की आर्थिक अनुदान लेकर संपन्न कराया. श्री गोयल ने ये भी बताया कि तत्कालीन विधायक श्री घासीलाल मेघवाल जी ने भी इस प्रोजेक्ट में रूचि लेकर आर्थिक मदद की थी.
***   

सोमवार, 3 अगस्त 2015

अंतरद्वंद

जिस तरह से आज हमारे देश में एक आतंकवादी की सजा-ऐ-मौत पर सर्वव्यापी वैचारिक द्वन्द उभर कर सामने आया है, उसमें राजनीति करने वाले नेताओं के निहित स्वार्थ हो सकते हैं, पर मेरे मन-मष्तिष्क में जो द्वन्द परेशान कर रहा है, वह मेरे घर के आँगन में घुस आये एक कोबरा सांप के बारे में है, जिसे कि मैंने अपने हाथों से मारा था.

मैं पहले साँपों से बहुत डरा करता था, लेकिन अपनी लम्बी सर्विस के दौरान राजस्थान के बूंदी जिले में स्थित ए.सी.सी. कालोनी में अकसर साँपों से पाला पड़ता रहता था. वहां सांप घरों में भी घुस आया करते थे. उनको पकड़वाना या मार देना दो ही विकल्प होते थे. धीरे धीरे मेरा सर्पभय कम हो गया. बाद में डिस्कवरी चैनल पर कई बार साँपों/स्नेक पार्कों  के बारे में अनेक जानकारियाँ भी मिली. मुझे इन खतरनाक जंतुओं के व्यवहार जानना व देखना दिलचस्प लगता है. सारे सांप जहरीले नहीं होते हैं, सर्पों के विष से ही उसके बचाव की दवा एंटीवेनम बनाई जाती है. पर्यावरण के लिए भी सांपो का होना जरूरी है. फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले चूहों-कीटों को वे अपना भोजन बनाते रहते हैं.

संस्कृत भाषा में सर्प शब्द का शाब्दिक अर्थ तेज यानि द्रुत है. जिन लोगों ने नहुष राजा की पौराणिक कथा सुनी-पढ़ी है, उनको मालूम है कि इन्द्राणी के प्यार में पागल राजा नहुष को इन्द्राणी ने ऋषियों-मुनियों द्वारा उठाई गयी पालकी में बैठ कर आने को कहा तो उसने डोली उठा कर ले जा रहे लोगों की गति बढाने के लिए उन्हें सर्प-सर्प कह  करके दौड़ाया. परेशान होकर ऋषियों ने उसे श्राप दे दिया कि जा तू सर्प हो जा. इस तरह के अनेक गल्प हमारे प्राचीन साहित्य व धार्मिक पुस्तकों में हैं. शेषनाग की कल्पना, जिस पर धरती टिकी हुयी है, भगवान विष्णु के कमलासन के पीछे बहुमुखी सर्प का छत्र, देवों में महादेव शिव का नागेन्द्रहाराय होना, सर्पराज जन्मेजय तथा भगवतगीता में भगवान कृष्ण का कहना कि शेषनाग भी मैं ही हूँ”,  भागवत की कथा में शापित राजा परीक्षित को सर्प द्वारा काटने का सन्दर्भ, आदि बातें मेरे सनातनी मन पर पूज्य भाव रखती हैं, पर दरवाजे पर आये हुए इस कोबरा सांप को देख कर हिंसक हो जाना बिलकुल नया अनुभव था.

घटनाक्रम इस प्रकार है कि मैं वर्तमान में उत्तराखंड के भाबर क्षेत्र में स्थित  हल्द्वानी शहर के बाहरी इलाके में निवास करता हूँ. कहते हैं कि अनादिकाल से ही ये इलाका बिलकुल जंगल था. मच्छरों, शेरों व जहरीले सापों का अभयारण्य हुआ करता था. आज मच्छरों के विरुद्ध राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध जारी है, एवं शेरों को शिकारियों ने कम करके चिड़ियाघरों या पार्कों तक सीमित कर दिया है. अब बचे रह गए सांप हैं, जो अपने गहरे बिलों में छुपे रहते हैं. अभी भी घोड़ापछाड़, कोबरा, से लेकर अजगर तक यहाँ खूब पाए जाते हैं. जब बारिश का पानी इनके बिलों में भर जाता है, या गर्मी उमस बढ़ जाती है तो राहत के लिए ये बाहर निकल आते हैं. आमतौर पर अस्पतालों में जितने भी सर्पदंश के केस आते हैं, उनसे सिद्ध होता है कि टकराव की स्थिति में ही सांप डंक मारते हैं. अन्यथा वह बहुत डरपोक प्राणी होता है. कोबरा की पहचान उसके चपटे फन से होती है. ये बहुत जहरीला और लड़ाकू प्रवृति का होता है, पीछा भी करता है. यहाँ भाबर में ढाई फुट की लम्बाई वाली कोबरा सांप की प्रजाति को अढ़ाइया सांप भी कहते हैं.

अपने घर में मेरी सेवाओं में, दिन ढलने के बाद, रसोईघर के कूड़ेदान को बाहर आंगन के कोने में रखना भी शामिल है. मैंने बहार की लाईट जलाकर पीछे का दरवाजा खोला तो देखा नीचे साक्षात् सर्पराज फन उठाये हुए मेरे स्वागत के लिए तैयार बैठे थे. एक सिहरन सी बदन में उठी. मैं उसे अपनी नज़रों में रखना चाहता था इसलिए अपनी श्रीमती को आवाज देकर कोई डंडा लाने को कहा, पर मेरे घर में एक लोहे के पाईप के टुकड़े के अलावा कोई लंबा हथियार नहीं था. अत: श्रीमती ने बगल में पश्चिम की तरफ रहने वाले जोशी परिवार को आवाज दी. पंडित चंद्रबल्लभ जोशी एक पांच फुट लम्बे चार इंच चौड़े पतले पट्टे को लेकर आये. मैंने उनको वाकये से अवगत  कराकर दीवार के दूसरी तरफ जाकर प्रहार करने को कहा. वे बहादुरी के साथ गए भी, लेकिन सांप को देखकर बोले, मैंने कभी साप नहीं मारा है, मुझसे ये नहीं होगा।. (बाद में उनकी श्रीमती ने बताया की जोशी जी सापों से बहुत डरते हैं.) तब मैं स्वयं उनसे डंडा लेकर उस तरफ गया और पहले ही प्रहार में खड़े डंडे से उसकी कमर तोड़ दी, उसके बाद वह बहुत गुस्से में व्याकुल होकर अपना फन पटकता रहा. एकाएक उसका फन लकड़ी के नीचे आ गया, जिसे मैंने कुचल डाला. हल्लागुला सुनकर रात में सड़क पर घूमने वाले लोग, पड़ोसी, तमाशबीन जमा हो गए. मैंने अपनी बहादुरी को रंग देते हुए मृत सर्प को पूंछ से पकड़कर उठा लिया और सबके बीच होता हुआ सड़क मार्ग से जाकर नहर के पार फेंक आया.

मेरे ससुराल वालों के इष्ट देव धौलनाग (धवल नाग) हैं उनका भव्य मन्दिर विजयपुर,( कांडा ) में बना हुआ है. धपोलासेरा के धपोला लोग वहाँ के स्थाई पुजारी होते हैं. कूर्मांचल के इस क्षेत्र को नागभूमि के नाम से भी जाना जाता है. नागपंचमी पर समस्त क्षेत्रवासी बड़ी श्रद्धा से पूजा अर्चना भी किया करते हैं. ऐसे मैं, मेरे द्वारा एक नाग का मारा जाना वैचारिक द्वन्द पैदा कर गया कि क्या उसे मारना जरूरी था? उसका अपराध यही था कि वह गलती से या जानबूझ कर मेरे आंगन में आ गया था. भाग इसलिए नहीं पा रहा था कि चिकने फर्श पर उसकी सरपटता काम नहीं कर पा रही थी. परन्तु यह सत्य है कि अनजाने में अगर उस पर पैर पड़ जाता तो वह विषधर मेरा काम तमाम  कर सकता था. मैं पहले अकसर बिना लाईट जलाए भी भोजन के बाद रात्रि में आंगन में घूम लिया करता था, पर अब बहुत सावधान हो गया हूँ. लेकिन उसकी हत्या के अपराधबोध का अंतरद्वन्द मुझे नींद में भी परेशान कर रहा है.
***

गुरुवार, 18 जून 2015

मैं, मेरे जाले, और मकड़ी

मैं नियमित रूप से अपने घर पितृ-छाया को महीने में एक बार मकड़ी के जालों से मुक्त किया करता हूँ. वैसे जब से अन्दर, बाहर, सब जगह बर्जर का सफ़ेद वैदर कोट कराया मकड़ियों के लिए अपना घर बनाने की गुंजाईश कम हो गयी है. फिर भी गाहे बगाहे छोटी छोटी मकड़ियां लाईट के आसपास, रोशनदानों के कोनों में, बाथरूम के एक्सॉस्ट फैन के किनारों पर अपना जाला बनाकर मच्छरों या कीटों का इन्तजार करते देखा जा सकता है. कहने को मकड़ियां मनुष्यों की, खासकर किसानों की, दोस्त भी कही जाती है क्योंकि ये फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को चट करती रहती हैं.

घरेलू मकड़ियों को अवांछित समझा जाता है. फिल्मों में भुतहा घरों में मकड़ों  के जालों का अम्बार लगा दिखाया जाता है. पश्चिमी देशों में हेलोवीन के अवसर पर लोग घर के अन्दर-बाहर नकली जाले लगाकर भुतहा वातावरण बनाया करते हैं. मैं इन घरेलू मकड़ियों से बहुत ज्यादा भयभीत कभी नहीं रहा. इस बार गर्मियों की छुट्टियों में जब बच्चे आये तो मेरी पौत्री संजना ने भयभीत होकर बताया कि बाथरूम में पॉट के पीछे  तथा एक्सॉस्ट के पास मकड़ियां अपने जाले समेत मौजूद हैं. संजना उसके छुटपन से ही कुत्ते, बिल्ली, कॉकरोच, मकड़ी, व कीटों से बहुत डरती आई है. मैं मक्खीमार हथियार लेकर गया और इन बहुत छोटी सी मकड़ियों के एक-एक इंच दायरे वाले जालों को नेस्तनाबूद कर आया. बात कोई उल्लेखनीय नहीं थी, लेकिन जब प्रद्युम्न का परिवार कमरे को खाली करके गाजियाबाद को लौट गया तो कमरे को ठीक करने के चक्कर में ड्रेसिंग टेबल पर रखी हुयी एक गत्ते की छोटी सी दवा की डिबिया को उठाया तो उसके अन्दर से काले सर वाली एक छोटी मकड़ी ने तुरंत मेरे अंगूठे पर ऐसा डंक मारा कि मैं तिलमिला उठा. मैंने डिबिया सहित मकड़ी को फर्श पर गिरा दिया अपने अंगूठे को मुंह में डालकर चूसना शुरू किया ताकि जहर खींच कर थूका जा सके. मेरे पास जले में लगाने की एक मरहम ट्यूब पड़ी थी, जो काम में ली. ततैया के डंक की तरह का अनुभव था. मैं ४-५ घंटे तक इससे परेशान रहा.

मकड़ी/माकड़े से मेरा ‘अनबोंडेड’ रिश्ता रहा है. मैंने अपनी प्रारम्भिक रचनाओं (कविताओं) को मकड़ियों की जालों तरह बुना सोच कर जाले नामक अपनी पुस्तिका को बड़ी उमंग के साथ संन १९६७ में छपवाया था, और मित्रों में बांटा भी. बाद में ये रचनाएँ बुकसेल्फ़ में धूल खाती रही. संन  २०११ में अपनी बेटी की आग्रह पर मैं इन रचनाओं को अपने साथ अमेरिका ले गया. गिरिबाला के कहने पर ही एक ब्लाग बनाकर इसे इंटरनेट में डालने के शुरुआत की गयी. मुझे तब इंटरनेट संबंधी कोई जानकारी भी नहीं थी. अत: सब काम गिरिबाला खुद ही कर रही थी. उसी ने जाले का लोगो बना कर प्रकाशित कर दिया. उसके बाद मैं हिन्दी टाईपिंग करते हुए आगे पीछे की नईपुरानी स्वरचित कथा-कहानियों, संस्मरणों, चुटकुलों तथा सामयिक विषयों पर लेख इसमें सहेजता गया. जो मेरे फेसबुक पर स्वत: शेयर होकर मित्रों को पढ़ने को मिलते रहे हैं.

अब जब मुझे जहरीली मकड़ी ने काटा तो मैंने इस विषय पर गहराई से सोचा कि अच्छा हुआ कि मेरे बच्चों को नहीं काटा, और वे सुरक्षित चले गए. मैंने अलमारियों, ड्रेसिंग टेबल, पलंगों के नीचे, स्थाई दृश्यों वाले फ्रेमों के पीछे, सभी जगहों पर ढूंढ ढूंढ कर मकड़ी की जमात को ख़तम करने के लिए हिट और झाडू का इस्तेमाल किया. पर मैंने कहीं पढ़ा था कि मक्खी, मच्छर, मूसक, और मकड़ी, ये चारों मकार मनुष्य का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे.

रोमांच की दुनिया में स्पाइडरमैन और फ्रांसीसी योद्धा नेपोलियन की कहानी में सात बार प्रयास करने के बाद जीतने की प्रेरणा देने वाली मकड़ी का विवरण किताबों में और बच्चों की कहानियों में मजेदार शब्दों में दुनिया की अनेक भाषाओं में वर्णित है. इस बारे में अध्ययन करने के बाद मकड़ियों के बारे में अनेक तथ्य सामने आये हैं. मकड़ी बहुत चतुर बुद्धिमान प्राणियों में से एक है. इसकी कई आँखें होती हैं, जो एक ही समय में कई दिशाओं में देख सकती है. अपने शिकार को पकड़ने के लिए जाल बिछाती हैं, और खुद छुप कर बैठी रहती है. शिकार के फसते ही उसे जहरीला डंक मार कर निर्जीव करके खाती है. कई बार तो मकड़ी अपने पार्टनर को ही खा जाती है. मकड़ी के दर्जनों बच्चे होते हैं. छोटे बच्चे अपनी माँ की पीठ पर सुरक्षित महसूस करते हैं. डिस्कवरी चैनल वाले ने इस बारे में बड़ी खूबसूरत तस्वीरें-वीडिओ दिखाते रहते हैं. छोटी से छोटी मकड़ी तिल के बराबर होती है, पर बड़ी जात की मकड़ी का वजन २५० ग्राम तक पाया गया है. ये बड़ी मकड़ियां चिड़ियों व अन्य जंगली प्राणियों को अपना शिकार बनाती हैं. रेगिस्तानी मकड़ी ज्यादा जहरीली बताई जाती है. एक अनुमान के अनुसार दुनिया में मकड़ियों की संख्या मनुष्यों की संख्या से अधिक है. और भी अनेक रहस्यमय तथ्य इसके बारे में अवश्य होंगे. मुझे डंक मारने वाली मकड़ी के विषय में मेरा अंदाजा है कि हो सकता है कि उसकी टाँगे मेरी पकड़ में आने से उसे हमला करना पड़ा हो. बहरहाल ये जंतु दोस्ती के काबिल कतई नहीं है.
***  

सोमवार, 3 नवंबर 2014

टापू

महावीर नगर (प्रथम), कोटा, राजस्थान में बजरंगबली का मंदिर तथा बजरंग व्यायामशाला एक अच्छे बड़े दूबाच्छादित पार्क में स्थित हैं. इसमें बड़े छायादार पेड़ हैं. पार्क के किनारे पर जगह जगह बैठने के लिए बैंच लगाई गयी हैं. बच्चों के लिए झूले डाले गए हैं. चौहद्दी में अन्दर की तरफ घूमने के लिए चौकोर पथ बनाया गया है, जिसमें पक्की टाईल्स बिछाई गयी हैं. इस पार्क की नगर निगम कोटा द्वारा देखरेख की जाती है. मंदिर में भजन कीर्तन होते रहते हैं, घन्टियां बजती हैं, जीवन की आपाधापी के बीच ये सुन्दर मनभावन परिदृश्य बहुत सुकून देता है. मैं पिछले दस-बारह सालों से जाड़ों में जब भी कोटा अपने बच्चों के पास आता रहा हूँ तो आधा-एक घंटा इस पार्क में घूमने व विश्राम करने में बिताया करता हूँ.

इस बार घूमते हुए मैंने देखा कि एक अफ्रीकी नस्ल का सा व्यक्ति रोज नियमित रूप से आकर एक बैंच पर निर्विकार बैठा रहता है और घूमने वाले लोगों को बड़े गौर से घूरता रहता है. पिछले सप्ताह वह नित्य मुझसे हर राउंड पर आँखें चार करता रहा. कल वह गैरहाजिर था. थकान मिटाने के लिए मैं उसकी वाली बैंच पर पत्नी सहित बैठ गया, और खेलते हुए बच्चों का तमाशा देखने लगा. थोड़ी देर बाद वह अजनबी भी आकर उसी बैंच पर बैठने के लिए हमारे सामने खड़ा हो गया. मैंने खिसक कर उसके लिए जगह बनाई और अपने स्वभाव के अनुसार उससे परिचय प्राप्त करने की पहल गुड ईवनिंग कह कर की. इसके जवाब में उसने भी गुड ईवनिंग कहा और मुस्कुराते हुए मेरी तरफ मुंह किया तो मैंने देखा उसने राख का दक्षिण भारतीय स्टाईल का लिंगायाती टीका माथे पर लगाया हुआ था. मुझे अपनी गलती का तुरंत अहसास हो गया कि ये सज्जन अफ्रीकी कदापि नहीं हैं. मैंने मेलजोल बढ़ाने के लिए उससे हिन्दी में बातचीत शुरू की तो पाया उसकी हिन्दी में हल्का दक्षिण भारतीय लहजा जरूर था, पर वह साफ़ साफ़ हिन्दी बोल रहा था. मैंने खोद खोद कर उससे उसके बारे में पूछ डाला और वह एक अच्छे अनुशासित बच्चे की अपनी राम कहानी सुनाता रहा. उसने जो भी कहा मैं अपने शब्दों में लिख रहा हूँ.   

मेरा नाम टापूमुत्थूकृष्णन है. आप मुझे सिर्फ टापू कह सकते हैं. मैं तमिलनाडु का रहने वाला हूँ. यहाँ राजस्थान विद्युत निगम में मैं सुपरवाईजर था. अब रिटायर हो चुका हूँ. मैंने यहाँ महावीर नगर प्रथम में बीस साल पहले एक जमीन का प्लॉट खरीदा और मकान बना लिया था. मैं विद्युत निगम में काम करने के लिए अपने गाँव के आसपास से 25 और आदमियों को भी साथ लेकर आया था, लेकिन वे सब धीरे धीरे सबके सब यहाँ से चले गए हैं. कोटा में मेरे अलावा तमिल लोग बहुत से होंगे लेकिन मेरा किसी से संपर्क नहीं है. मैं किसी तमिल सोसाइटी या संगठन से भी जुड़ा हुआ नहीं हूँ. यहाँ मेरे परिवार में हम तीन लोग हैं, मैं, मेरी पत्नी और हमारा एक बेटा. हमारा बेटा एक फैक्ट्री में इंजीनियर है. मैं साल-दो साल में तमिलनाडु अपने सगे लोगों से मिलाने जाया करता हूँ. रास्ता बड़ा लंबा है, पूरे ३० घंटे लगते हैं. इस बार मैं काफी दिनों तक साउथ में रहा. बेटे के लिए बहू की तलाश करता रहा. उसकी उम्र ३५ से ऊपर हो चुकी है. मैं उसकी शादी नहीं करा सका क्योंकि अपनी जाति में कहीं रिश्ता बन ही नहीं पाया. जहां भी बात होती है, बाद में बिगड़ जाती है क्योंकि कोई भी अपनी लड़की को इतनी दूर नहीं भेजना चाहता. मैं बहुत दु:खी हूँ. आज मैं सोचता हूँ कि मैंने इतनी दूर आकर नौकरी की और यहीं घर बना लिया, ये बड़ी गलती थी. मुझे यहाँ से चले जाना चाहिए था. कहते हुए उसकी आँखें डबाडब भर आई.

मैंने उसे सांत्वना देते हुए बात बदलने की कोशिश की. मैंने उसको बताया कि मैं उसे नाईजीरियन समझ रहा था. मुझे कन्नड़ भाषा के लगभग एक सौ शब्द आते हैं (जो कि मैंने पिछले सत्तर के दशक में अपने कर्नाटक प्रवास में सीखे थे) टापू को भी मामूली कन्नड़ समझ में आती है. वह बात करते हुए मेरे और निकट खिसक आया. उसने बताया कि उसकी रसोई में दाल, रोटी. सब्जी ही बनती है, इडली, डोसा, साम्भर आदि साउथ-इन्डियन खाना कभी कभी बन पाता है. "अड़ोस-पड़ोस में पंजाबी या जैन लोगों के घर हैं. हम लोग उनमें मिक्स नहीं हो पाए हैं. उसने बड़ी मासूमियत से बताया कि वह ज्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं है और जिन्दगी के इस मुकाम पर बिलकुल अलग थलग पड़ा हुआ है. त्रिची वापस जाना चाहता है, जहाँ गोदावरी नदी के किनारे उसका गाँव है, लेकिन बेटा वहां जाना पसंद नहीं करता है. उसका बचपन राजस्थान में बीता और यहीं पढ़ाई-लिखाई हुई तथा यहीं नौकरी भी लग गयी. उसको यहीं अच्छा लगता है. मैंने टापू को सलाह दी कि बेटे की शादी यहीं किसी उत्तर भारतीय लड़की से करा दे, आजकल अंतरजातीय विवाह बहुतायत में हो रहे हैं. समय बदल गया है. इसके अनुसार चलने की कोशिश करो. अखबार में मैट्रीमोनियल द्वारा बहुत रिश्ते आ जायेंगे. तुम्हारे घर में किलकारियां और खुशियाँ अपनेआप आ जायेंगी. वह बोला, मेरा बेटा भी मेरी तरह पक्के रंग का है, इसलिए यहाँ की लड़किया उसे पसंद नहीं करेंगी. मैंने उसे बताया कि दुनिया की एक तिहाई आबादी पक्के रंग की है. तुम इस काले-गोरे वाली मानसिकता से बाहर निकलो. ये रंगरूप तो भगवान ने दिया है. इसके बारे में ज्यादा मत सोचा करो. तुम लम्बी छुट्टी दिलवाकर बेटे को तमिलनाडु ले जाओ कोई ना कोई रिश्ता सजातीय भी मिल जाएगा. मेरी बातों से उसे जरूर सांत्वना मिली होगी. वह बोला, मैं कल अपने बेटे को भी आपसे मिलाने के लिए लाऊंगा। आप उसे समझा देना.

ये नौकरीपेशा लोगों की दूर निर्वासन की पीड़ा सिर्फ इस अकेले की नहीं होगी. ऐसे बहुत से परिवार होंगे, जो ऐसी ही त्रासदी से जूझ रहे होंगे. यहाँ टापू अपने नाम को पूर्णतया सार्थक कर रहा है.
***

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

स्टोन माउन्टेन

हमारी ये दुनिया अनेक अजूबों से भरी पड़ी है. अमेरिका (यूनाइटेड स्टेट्स) के जॉर्जिया प्रांत में अटलांटा शहर के बगल में डीकाल्ब काउंटी में एक एक ही पत्थर से बना एक विशाल पहाड़ है, जो स्टोन माउन्टेन के नाम से प्रसिद्ध है. सन 1996 के ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक खेल इसके नजदीक ही हुए थे.
स्टोन माउन्टेन (सौजन्य विकीमीडिआ ) 
किसी विशिष्ट जगह को सँवार कर दर्शनीय बनाने की कला में अमेरीकी लोग माहिर हैं. ये पहाड़ पांच मील के घेरे में 1668 फीट ऊंचा है. स्टोन माउन्टेन (इसे पहले रॉक माउन्टेन भी कहा जाता था) की बस्ती को स्टोन माउन्टेन सिटी' के नाम से जाना जाता है, जो की अटलांटा-अगस्टा के पुराने मार्ग पर स्थित है. इस बस्ती की वर्तमान आबादी लगभग 6000 बताई जाती है. इसका पुराना इतिहास बताता है कि आदिवासियों का ये गाँव 1864 के युद्ध में पूरी तरह उजड़ गया था. बाद में सन 1915 में इसे पुन: बसाया गया.

हर सप्ताहांत स्टोन माउन्टेन के सामने बनी हुयी लम्बी-चौड़ी दीर्घा पर सैलानियों, दर्शकों, विशेषकर बच्चों की भारी भीड़ रहती है. ग्रेनाईट के इस पहाड़ पर काट कर एक बड़ा सा चौकोर स्क्रीन बनाया गया है जिस पर तीन घुड़सवार योद्धाओं की आकृतियां नायाब कारीगरी से बनाई गयी हैं. शाम होते ही इस स्क्रीन पर डेढ़ घटे का लेजर शो होता है. हजारों की संख्या में लोग हरी दूब पर बैठकर या लेटकर इसका आनंद लिया करते हैं. इससे पहले, दिन में हाइकिंग करके या रोप-वे द्वारा पहाड़ के शीर्ष पर जाकर चारों ओर के मनोहारी दृश्य देखे जाते हैं. शीर्ष पर रेस्टोरेंट व अन्य सुविधाएं मौजूद रहती हैं. वहाँ पर एक ब्रॉडकास्टिंग पॉइंट भी बना हुआ है.

नीचे शहर में क्लब, थ्री-डी थियेटर, गीत-संगीत गाते-बजाते कलाकारों-युक्त रेस्टोरेंट हैं. दुकानों में कलात्मक वस्तुऐं व बच्चों की मनभावन सभी चीजें उपलब्ध रहती हैं. तलहटी में विशाल पार्क है, ताल है, जहां रिवर-बोटिंग होती है. सबसे मजेदार है यहाँ का सत्रहवीं शताब्दी का रेलवे सिस्टम, जिसमें पुराने डिजाइन के भाप के इंजन एवं लकड़ी के डिब्बे हैं. रेलगाड़ी दर्शकों को लेकर पहाड़ के चारों और चक्कर काटकर मुख्य स्टेशन पर लौट आती है. रेल रूट पर घने जंगल व उनके बीच बीच में छोटे स्टेशनों पर नाचते गाते रंग बिरंगी पोशाकों में यात्रियों का स्वागत करते हुए कलाकारों को देखना अद्भुत अनुभव होता है. मुझे अपनी पत्नी सहित, अपने परम आदरणीय समधी जी (अब स्वर्गीय) एल.एम.जोशी जी, बेटी गिरिबाला, दामाद भुवन जी तथा नातिनी हिना के साथ सितम्बर 2006 में इस स्टोन माउन्टेन को देखने का सौभाग्य मिला था. हमारे साथ एक अन्य भारतीय परिवार भी था. ऐसा लगता है मानो कल ही की बात हो.
***  

रविवार, 17 अगस्त 2014

मेरे 'अटल' रिश्ते

सन 1960 में एक 20 वर्ष का नौजवान हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञापन के माध्यम से राजस्थान की एक सीमेंट फैक्ट्री में नौकरी पा जाता है, उसके कोई राजनैतिक संस्कार नहीं होते हैं. मिलनसारी स्वभाव में चुहुलबाजी का तड़का होने से वह वहाँ के समाज में जल्दी ही अपनी पहचान बना लेता है. वह कोई और नहीं मैं ही हूँ.

राह चलते, बिना सोचे समझे फैकट्री से अनुशासनहीनता के आरोप में नौकरी से निकाले गए एक कर्मचारी हरिप्रसाद शर्मा से दोस्ती हो गयी. हरिप्रसाद ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, पर उनके अन्दर आक्रोश और खुराफात भरे हुए थे. वे कंपनी के मैनेजमेंट से खार खाए बैठे थे. अपने राजनैतिक गुरु स्वर्गीय श्री भंवरलाल शर्मा एम.एल.ए.(कांग्रेस) की शागिर्दी में बहुत अनुभव पा चुके थे. सन 1962 के विधानसभा चुनावों में पार्टी टिकट पाने की कसरत में कांग्रेस से लेकर सोशिअलिस्ट पार्टी के दफ्तरों व सिपहसालारों के पीछे बहुत चक्कर काटे, लेकिन किसी ने टिकट नहीं दिया तो भारतीय जनसंघ (जिसका तब उस क्षेत्र में कोई जनाधार नहीं था) ने पार्टी टिकट दे दिया. लोग परिवर्तन चाहते थे और बहुत से लोगों की हमदर्दी भी हरिप्रसाद जी के साथ थी. हालांकि भंवरलाल शर्मा बहुत वजनदार व्यक्तित्व वाले थे, सिटिंग विधायक के अलावा हरिजन सेवक संघ और भारत सेवक समाज आदि अनेक संस्थाओं के प्रधान भी थे पर हरिप्रसाद शर्मा ने अप्रत्याशित रूप से उनको हरा दिया था. मुझे तब पता नहीं था की जनसंघ क्या चीज है, उसका सदस्य नहीं होते हुए भी हरिप्रसाद जी की जिताने में भरपूर सहयोगी रहा.

कुछ समय बाद हरिप्रसाद विधायक जी ने एक लकड़ी का ब्लैकबोर्ड बनवाकर मेरे घर भेज दिया, जिस पर मैं चॉक से तत्कालीन कांग्रेस सरकार विरोधी समाचार लिखकर तिराहे पर जगदीश पंजाबी की दूकान के पास रखवा देता था. ये बोर्ड बहुत चर्चित रहा क्योंकि इसमें स्थानीय जायकेदार समाचार भी होते थे और कभी कभी फैक्ट्री मैनेजमेंट पर भी चोट होती थी.

इस बीच मैं चुनाव लड़कर सहकारी समिति के प्रबंधमंडल का अवैतनिक मंत्री भी बन गया. पर कांग्रेसी नेताओं व फैक्ट्री मैनेजमेंट की आँख की किरकिरी भी बनता गया. (मैंने मगर से बैर शीर्षक से एक विस्तृत लेख भी पूर्व में अपने ब्लॉग पर डाला है.) आज मैं सोचता हूँ की ये सब मेरी नादानी और नासमझी थी. जिसका परिणाम यह हुआ की सन 1970 के कर्मचारी यूनियन के चुनावों से पूर्व ही मुझे सुदूर दक्षिण के शाहाबाद (मैसूर- तब कर्नाटक नाम नहीं पड़ा था) कारखाने में स्थानांतरित कर दिया गया. मैंने कांग्रेस व यूनियन के नेताओं से स्थानान्तरण रुकवाने के लिए कोई हाथाजोड़ी नहीं की, और जोश जोश में अपने परिवार के साथ शाहाबाद पहुँच गया. वहां जाकर मालूम हुआ कि कंपनी क्षेत्र मे कन्नड़ माध्यम के स्कूल हैं तथा हिन्दी माध्यम के लिए जिला मुख्यालय गुलबर्गा जाना होगा. किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में मैं पत्नी व बच्चों को माता पिता के पास अल्मोड़ा अपने गाँव में छोड़ आया. वापसी में देश की राजधानी दिल्ली गया, जहां मेरे रिश्ते के जीजा जी (तयेरी दीदी के पति श्री मथुरादत्त भट्ट तब उद्योग मंत्रालय में अंडर सेक्रेटरी के पद पर थे) के पास गया. उन्होंने पहले तो मुझे सत्ता के खिलाफ कारगुजारियों के लिए डांटा फिर अगली कार्यवाही की सोचने लगे. भट्ट जी बहुत प्रभावशाली व्यक्ति थे. कुमाऊंनी रामलीला में रावण का किरदार भी अदा किया करते थे, एवं कालांतर में संजय गांधी के सहयोगी भी रहे थे. वे मुझे तत्कालीन उद्योगमंत्री स्व. फखरुद्दीन अली अहमद के बंगले पर ले गये, पर उन्ही दिनों उनका कोई ख़ास निजी सचिव किसी रिश्वत काण्ड में फंसा हुआ था, उन परिस्थितियों में उन्होंने कोई मदद करने में असमर्थता बता दी. उसके बाद जीजाश्री मुझे स्व मोरारजी देसाई जी के बंगले पर ले गए, उन्होंने जल्दी से मेरी दास्तान सुनाने को कहा फिर बोले, ये बहुत छोटा प्रशासनिक मामला है. मैं इसके लिए पालकीवाला (ए.सी.सी. के चेयरमैन) को कहना ठीक नहीं समझता हूँ. आज इतने वर्षों के बाद मैं खुद समझ रहा हूँ की हमारा वह प्रयास एक बन्दूक से मक्खी मारने के सामान था.

शाहाबाद जाकर भी मैं दिन-रात इस सोच विचार में रहा कि उत्तर भारत के हिन्दी क्षेत्र में किस प्रकार अपनी बदली करवाई जाय, ताकि मेरा परिवार साथ रहे और बच्चों की पढ़ाई बाधित ना हो.

एक दिन मेरे दिमाग में आया कि संसद सदस्य श्री अटलबिहारी बाजपेयी जी को मदद करने को लिखा जाए. मैंने पूरा विवरण लिख कर उनको लिखा कि नानी पालखीवाला जी को कह कर मेरी बदली करवा दें. एक साधारण डाक से मैंने अपना पत्र भेज दिया.

अटल जी से मेरी एक छोटी सी मुलाक़ात तब हुयी थी जब वे सन 1968 में लाखेरी आये थे. मेरे दोस्त स्व. चन्द्रमोहन चतुर्वेदी जी के टू-रूम क्वार्टर में उनके भोजन की व्यवस्था थी, और सिनेमा हॉल के मैदान में उनकी सभा हुयी थी. हरिप्रसाद शर्मा, जो की 1967 के विधान सभा का चुनाव हार चुके थे, कर्ता धर्ता थे. मैं जनसंघ का सदस्य नहीं होते हुए भी इस लॉबी से जुड़ा हुआ था. तब हरिप्रसाद जी ने मेरा परिचय सहकारी समिति के सेक्रेटरी के रूप में कराया था. आज मैं सोचता हूँ कि उनसे, मेरे जैसे लाखों लोग मिलते रहे होंगे. किस किस की याद रख सकते हैं.

मेरे पत्र भेजने के चन्द दिनों के बाद ही अटल जी का एक हस्तलिखित पोस्ट कार्ड मुझे मिला कि पालखीवाला से मेरे ऐसे सम्बन्ध नहीं हैं. इस बारे में मैं बम्बई के कायकर्ता को लिख रहा हूँ. प्रयास करते रहो, फल ईश्वराधीन है.

उसी बीच एक अन्य धटनाक्रम में मैं स्व. सुन्दरसिंह भंडारी (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बड़े नेता, जो बाद में गुजरात के राज्यपाल भी रहे हैं) से शाहाबाद के सर्किट हाउस में मिला. मिला क्या, वे सो रहे थे और मैं अर्जुन की तरह उनके पैरों की तरफ कुर्सी लगा कर बैठा रहा. वे जागे तो मेरी बात सुनने के बजाय, बिना इजाजत अन्दर आने की वजह से नाराज हो गए. मुझे उस दिन अहसास हुआ की मैं गलत ट्रैक पर चल रहा था और मैं सीधे श्रीनिवास गुडी जी के पास गया. वे यहाँ एक स्थापित और समर्पित कम्यूनिस्ट लीडर थे. किसान सभा व मजदूर संघों का काम देखते थे. शाहाबाद/वाडी कर्मचारी यूनियन (एटक) के अध्यक्ष थे. उन्होंने मुझे बड़ी दिलासा दी और मदद का आश्वासन दिया. मैंने परिस्थितियों से समझौता करने का निश्चय कर लिया और अपने बच्चों को वापस शाहाबाद ले आया कोचिंग करवाई और यहाँ कॉन्वेंट स्कूल में दो वर्ष पीछे की कक्षाओं में भर्ती करवाया. अंग्रेजी आधार मिलने से बाद में बच्चों को हायर ऐजुकेशन में बहुत लाभ हुआ.

सन 1972 में सीमेंट कामगारों की 13 दिनों तक आर्थिक मांगों को लेकर एक देशव्यापी हड़ताल हुयी थी. मैं माईक पर मुखर हुआ जिसके परिणामस्वरुप मुझे श्रीनिवास गुडी जी ने युनियन का जनरल सेक्रेटरी बना दिया. मैंने अल्पकाल में बहुत से काम मजदूरों के हित में करवाए. मैनेजमेंट थोड़ा परेशान भी था क्योंकि ये पीस जोन डिस्टर्ब हो रहा था. मैनेजमेंट मेरी कमजोरी जानता था. मुझे हैड ऑफिस बम्बई बुलाया गया और मुझे राजी करके वापस लाखेरी स्थानांतरित कर दिया गया.

इस बार मैं ट्रेड युनियन कार्यकर्ता के रूप में वामपंथी संस्कार लेकर वापस आया था. खुद को पुन: संगठन में स्थापित करने के लिए जद्दोजिहद की. यद्यपि बड़ी मुश्किल से सामंजस्य बिठा कर इंटक की युनियन का अग्रणी लीडर बना रहा. लोगों का स्नेह था कि मैं अपने मिशन में सफल रहा.

आज रिटायरमेंट के १५ वर्षों के बाद मुझे पुराने कागजातों में अटल जी का हस्तलिखित पोस्ट कार्ड जीर्ण अवस्था में मिला तो सारे घटनाक्रम सिनेमा की रील की तरह चल पड़े. इसमें बड़ा सन्देश यह है कि, "प्रयास करते रहो, फल ईश्वराधीन है." मैंने इसका चित्र लेकर यहाँ लगाया है. चित्र की ख़राब क्वालिटी के लिए क्षमा चाहता हूँ.                  
अटल जी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड