गुरुवार, 31 मई 2012

बदनाम गजरौला


दिल्ली से पूर्व की ओर उत्तर प्रदेश के बीचोंबीच नैशनल हाईवे नम्बर २२, जिसे ग्रांड ट्रंक रोड के नाम से भी जाना जाता है, बादशाह शेरशाह सूरी ने (पेशावर से कोलकत्ता तक) बनवाई थी. कहते हैं कि यह सैकड़ों वर्षों से मुख्य सड़क मार्ग रहा है. इसकी दुर्गति भी पथिकों से छुपी नहीं है, पर अब जब से विश्व बैंक से रुपया उधार लेकर बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर देश के अधिकांश सड़कों का उद्धार हुआ, इस हाईवे का भी नम्बर आया है, और लाक्षणिक सुधार के तहत बढ़िया चौड़ी सड़क बन गयी है, हालाँकि अभी भी बहुत जगहों पर काम अधूरे हैं.

गढ़मुक्तेश्वर और मुरादाबाद के बीच एक स्थान आता है, जो गजरौला के नाम से प्रसिद्ध है. यहाँ बहुत सी खूबियाँ होंगी, पर यात्रियों के लिए यहाँ के ढाबे/खानावल विशिष्ट हैं. पिछले कुछ वर्षों से यहाँ बड़े हाई-फाई रेस्तरां/ढाबे भी खुल चुके हैं, पर पुराने दर्जनों ढाबे आम यात्रियों के लिए लूट के प्रतीक भी बने हुए हैं. विशेष रूप से राज्य परिवहन (स्टेट रोडवेज) की बस से सफर करने वाले यात्रियों को यहाँ बड़ा बुरा अनुभव होता है.

ड्राईवरों तथा कंडक्टरों की अलग अलग ढाबे वालों से मिलीभगत होती है और बस को वहीं पर रोका जाता है. बस खड़ी होते ही ढाबे का कर्मचारी बस का दरवाजा खोलने आ पहुँचता है. दस रूपये में पराँठा, सब्जी फ्री, आइये आइये भोजन कीजिये, कह कर स्वागतकर्ता की तरह ले जाता है. धूल भरे कच्चे फर्श पर मेज कुर्सियों पर बिठा कर तुरन्त पानी, सलाद, आचार, दाल फ्राई की प्लेट लगा दी जाती है. पाँच रोटी/परांठे, इच्छानुसार सब्जी चावल व दही परोसा जाता है. खाना खाने के बाद जब बिल १०० रुपयों के आस पास बताया जाता है तो यात्री को लगता है कि उसे लूट का शिकार होना पड़ा है. वह प्रतिवाद करता है, बहस करने लगता है, तो सामने से एक पुलिसवाला भी बुला लिया जाता है, और अप्रत्यक्ष रूप से ढाबे वाले का समर्थन करते हुए पैसे देने को कहता है. बेचारा यात्री मन मसोस कर भुगतान करता है. इसी तरह सभी भोजनार्थी लुटकर बस में वापस बैठते हैं और बस के कंडक्टर पर गरम होते हैं कि "ऐसी जगह बस को क्यों रोका गया?" पर कंडक्टर की तो पहले से सांठ-गांठ होती है. वह जवाब में कहता है, मैंने थोड़े ही आपसे खाना खाने कि लिए कहा. आप मना कर देते. स्वयं ड्राईवर और कंडक्टर एक विशिष्ट कमरे में मुफ्त का मांसाहारी/शाकाहारी भोजन गड़प कर डकार लेते हुए चलते हैं.

ये रोज की चर्या होती है. रोडवेज के उच्चाधिकारियों को इस बाबत अक्सर शिकायतें भी जाती हैं, और वे सब जानते-समझते हैं, करते कुछ नहीं हैं क्योंकि तर्क है कि ड्राईवर कंडक्टरों की भी युनियन है.

दूसरा सबसे बड़ा ख़तरा गजरौला में ये है कि जहर खुरानों की टोलियां, टोह लेकर विभिन्न बसों में बैठ कर, पहले तो पहाड़ या नेपाल के यात्रियों से दोस्ती गांठते हैं फिर नशीली चीजें खिला कर उनके जेब में रखे रुपयों और सामानों को लेकर चम्पत हो जाते हैं. अकसर अखबारों में समाचार छपते हैं कि बेहोशी की हालत में बस वाले ऐसे यात्रियों को सड़क के किनारे/अस्पताल के गेट के नजदीक उतार दिया गया. ये भी रोजमर्रा की बातें हो गयी हैं. इस तरह की जहर खुरानी के लूट के माल में कौन कौन लोग शामिल होते हैं, स्थानीय पुलिस के पास इसकी कैफियत-कुंडली रहती है. लेकिन बयानबाजी से ज्यादा कार्यवाही शायद ही होती हो. गरीब अनजान लोगों को लूटने वाले तथा उनकी जान से खेलने वाले इन अपराधियों के विरुद्ध क्यों नहीं युद्ध स्तर पर कार्यवाही की जाती है? ये बड़ा विचारणीय प्रश्न है.

ऐसे संवेदनशील जगहों पर सीसी टीवी कैमरे लगाने चाहिए ताकि प्रदेश के इस खूबसूरत भू-भाग पर और बदनुमा दाग न लग सकें.
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मंगलवार, 29 मई 2012

आत्म-बोध

स्थान - एक झाड़ियों वाला हरा-भरा टीला. एक झाड़ी के इर्द-गिर्द एक कबरी बकरी और उसके दो छौने, संयोग से एक सफ़ेद चिट्टा और दूसरा चमकदार काला. पत्तियों को चरने का क्रम चालू था, श्वेत बकरा, श्याम वर्णी के लिए बार बार व्यवधान उपस्थित कर रहा था. फलत: दोनों में ठन गयी और दोनों ही उछल उछल कर सर टकरा कर लड़ाई पर उतर आये.

माँ ने मिमियाते हुए उनको झगड़ा न करने के कई इशारे किये, पर वे नहीं माने. श्वेत बकरे को अपने धवल होने का गुमान था और श्याम को समानाधिकार का ज्ञान. बकरी उसी तरह सर हिला हिला कर मिमियाती रही पर वे कहाँ मानने वाले थे? एकाएक ग्वाला आ गया, उसने हांक लगाई तथा डंडा घुमाया तो फैसला नहीं हो पाया. रास्ते में भी वे तुझे कल देख लूँगा. की मुद्रा में एक दूसरे को चुनौती देते रहे.

कल का दिन फिर उसी तरह से नहीं आया क्योंकि वे दोनों उसी दिन कसाई के हाथों बेच दिये गए.

दूसरा दृश्य:-

स्थान -  कसाई की दूकान. दोनों सहोदर बकरे हलाल कर दिये गए. दोनों की आत्माएं शरीर से निकल कर कसाई की दूकान के दरवाजे पर अटक कर अपने मृत शरीरों की चीर-फाड़ देख रही हैं. श्वेत की आत्मा बोली, मैं देख रही हूँ कि हम दोनों के रक्त-माँस और हड्डियों में कोई अंतर नहीं है.

इस बात पर काले की आत्मा बोली, फिर भी तुझे अपने सफ़ेद होने का बड़ा गुमान था. पर, अब मैं इसमें तुम्हारा भी दोष नहीं मानती हूँ क्योंकि हम तो पशु योनि में थे, लेकिन मनुष्य योनि में जन्मे प्राणियों को कैसे माफ किया जा सकता है, जबकि उन्हें अपार बुद्धि एवँ साधन-शक्तियां परमात्मा ने दे रखी हैं?
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रविवार, 27 मई 2012

कालान्तर

दीर्घजीवी अमीचंद और दुलीचंद दो वयोबृद्ध सगे भाई, उम्र क्रमश: ८८ वर्ष व ८५ वर्ष, नवंबर की गुनगुनी धुप में अपने जुडवाँ घरों की संयुक्त बाल्कनी में गंभीर मुद्रा में बैठे हुए हैं. ये दोनों भाई स्वतंत्रता सेनानी भी रहे हैं, पर इन्होंने अन्य नेताओं की तरह उसकी कीमत भुनाने का प्रयास कभी नहीं किया.

इन्होंने वह जमाना देखा था जब देश गुलाम था और आम आदमी में आजादी पाने का जूनून था, दोनों ने अपनी जवानी उसी जूनून में बिताई थी. बहुत उम्मीदों, महत्वाकाक्षाओं के साथ निरंतर देश सेवा को अवलम्बन बना कर महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए ईमानदारी का जज्बा रखते हुए कार्य किये. आज जब जीवन के अन्तिम सोपान में हैं तो देश के कर्णधारों के राजनैतिक खेल एवँ उहापोह को देख-सुन कर बहुत व्यथित हैं.

जागृत मानस चेतना वाले इन दोनों भाईयों ने अपने पुराने साथियों का देश के हितार्थ बलिदान देखे थे, और आज के बेशर्म होते चरित्रह्रास भी देख रहे हैं. कभी कभी तो यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि क्या यही सब देखने-प्राप्त करने के लिए हमने जेलों में यातनाएं सही थी.

ये दोनों भाई जमींदार हरिचंद के कुलदीपक थे. पढ़ने में कुशाग्र और स्नेहिल पिता के नज़रों में भविष्य के राष्ष्ट्रीय पटल के अभिनेता थे. हरिचंद की सामंती सोच यह थी कि अंग्रेजी हुकूमत स्थाई रहेगी, कॉग्रेस के आन्दोलन व हुल्लड़बाजी को उन्होंने गुंडागर्दी का नाम दे रखा था. वे भविष्य के बारे में बहुत निराशात्मक विश्लेषण किया करते थे. बेटों को सिविल सर्विस में भेजना चाहते थे. उनको अफ़सोस तब हुआ जब दोनों बेटे उस समय की राष्ट्रीय धारा में शामिल होते चले गए और पिता की मर्जी के विरुद्ध नई चेतना का हिस्सा बन गए.

अंग्रेजी हुकूमत का हरिचंद पर बहुत दबाव था. अत: बड़े बेटे अमीचंद को उन्होंने बहुत तरीकों से समझाया भी था लेकिन अमीचंद को उनकी बातें रास नहीं आई. एक दिन गुस्से के उबाल में आकर हरिचंद ने अमीचंद से सम्बन्ध तोड़ने की घोषणा कर दी ताकि प्रशासन की तरफ से उनका अपमान बन्द हो जाये.

छोटा बेटा दुलीचंद को उन्होंने बैरिस्टर बनाने के मकसद से इंग्लेंड भेजा हुआ था. उनको उम्मीद थी के वह कांग्रेसी आन्दोलन से दूर रहेगा, लेकिन उनकी आशाओं के विपरीत जब वह अधूरी पढाई के बीच ही भारत लौटा तो मालूम पड़ा कि उसके संपर्क लाल सलाम वाले कामरेडों से जुड़े हुए थे. अंगरेजी खुफिया एजेंसियों को इसकी पूरी खबर पहले से ही थी.

जमींदार जी का पूरा सपना मानो ध्वस्त हो गया था, साथ ही उनकी अपेक्षाओं के विरुद्ध सन १९४७ को देश बँटवारे के साथ आजाद हो गया. दोनों बेटे दो-दो बार जेल की हवा खाकर बाहर आ गये थे. हरिचंद की सोच में ये सब अनहोनी हो रही थी. नया संविधान बना, तदनुसार व्यवस्थाएं व राष्ट्रीय चुनाव हुए. ये नई परिकल्पना थी अंग्रेजी हुकूमत के समर्थक हरिचंद जमीदार जैसे लोग हतप्रभ थे और कुढ़ कर आजादी के दीवानों को अभी भी अपने बयानों में लुच्चा-लफंगा करार देते थे. पुराने राजसी दिनों को याद करते थे और इसी गम में नई बयार को झेलते हुए एक दिन हरिचन्द असमय ही विदा हो गये.

इन साठ वर्षों में, दोनों भाईयों ने कई प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाई, अपनी अपनी गृहस्थी से भी जुड़े, समाज ने व सरकारों ने उनको यथोचित सम्मान भी दिये, लेकिन दोनों भाई कभी भी विधानसभा या लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं रहे. पिछले कुछ वर्षों से दोनों भाई एक दूसरे के पूरक बन कर आपस में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार किया करते हैं. देश में फैले अराजकता, लूट-खसोट व भ्रष्टाचार पर चर्चा करते हैं तो बहुत दु:खी हो जाते हैं. सोचते है कि क्या ये सब प्राप्त करने के लिए उस वक्त लोगों ने अपनी जवानी दाँव पर लगाई थी? हमारा राष्ट्रीय चरित्र और कितना गिरेगा? आदि आदि.

वे देख रहे हैं कि पिछले कुछ समय से रामदेव योगी और समाजसेवी अन्ना हजारे अपने साथियों सहित केन्द्र सरकार को गलिया रहे हैं. इनके आन्दोलनों को भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता का जोशोखरोश के साथ समर्थन हासिल है, लेकिन यह बिल्कुल संदेहपरक है कि इस प्रकार की हुल्लड़बाजी किसी अंजाम तक पहुँचा सकती है.

अमीचंद कहते हैं कि ये लोग सत्तारूढ़ गठवन्धन पार्टी को पदच्युत कर सकते हैं, लेकिन प्रश्न ये है कि इनके बाद जो लोग सत्तानशीन होंगे वे इन्ही के डुप्लीकेट होंगे, तब क्या होगा?

प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दुलीचंद कहते है, हम को आज भी एक लेलिन, माओत्से तुंग, फिदल कास्त्रो या चे ग्वेरा की दरकार है जो सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए नई राजनैतिक व्यवस्था का जाल फैला सके.

इतने में, कुछ पत्रिकाओं व अखबारों की ताजा प्रतियां लेकर अमीचंद का पौत्र सार्थक, जो एक आई.पी.एस. ऑफिसर है, वहां आता है, हंसते हुए कहता है, दादा जी, अब आप राष्ट्रीय मुद्दों पर बहसबाजी करके अपना दिमाग खराब न करें, ये दुनिया है, ऐसे ही चलती है, चलती रहेगी. प्रकृति अपना सामंजस्य खुद बिठा लेती है
                                              ***.

शुक्रवार, 25 मई 2012

पँखा

एहसान तो कुत्ते पर भी बहुत होते हैं,
      उसको लाड़ भी बहुत मिलता है,
            लेकिन वह दुम हिला देता है,
                    हवा नहीं करता है.

तुझे पैदा ही किया है केवल,
       तेरी जगह पर बहुत ऊपर है,
            बस, बटन दबाने की देर है.
                  चलने या रुकने के लिये.

मगर ऐसे भी इन्सान बहुत हैं,
      जो बड़ी बेहयाई से तोताचश्म बनकर
            पैदा करने वाले की आन को-
                  मिट्टी में मिलाते हैं शान से.

ऐ गुणों के खान
      तू माथे पर ही रहेगा इन्सान के
            चुका ना पायेगा बदला कभी-
                  तेरे एहसान का.
                         ***

बुधवार, 23 मई 2012

पितृ-छाया



मेरे पौत्र चि. सिद्धांत ने जब इस साल बहुत अच्छे नम्बरों से ग्यारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की तो मैंने उसके सामने अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, तुम जरूर मेरा नाम रौशन करोगे. इस पर तुरन्त प्रतिक्रिया देते हुए उसने कहा, दादा जी, ये बात सही नहीं हो सकती. क्योंकि आज तक का इतिहास आप देख लो किसी भी बड़े सेलेब्रिटी के नाम के साथ उसके दादा का नाम कभी नहीं जुड़ा.

मैं इस दलील से हतप्रभ रह गया और सोचने लगा कि सचमुच किसी आविष्कारक, वैज्ञानिक या बुद्धिजीवी के नाम के साथ उसके दादा का परिचय कभी नहीं होता है. हाँ राजाओं-बादशाहों की बात और है. गाँधी जी नेहरू जी को ही लो, उनके दादा का नाम शायद ही कोई जानता हो. इन पुराने बड़े लोगों के स्मृतिचिन्हों को सहेज कर रखना हम आधुनिक पीढ़ी के लोगों का शुगल जरूर है, पर इसकी उपयोगिता क्या है? जरूरत तो इस बात की है कि उनके द्वारा स्थापित आदर्शों पर चला जाये, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़कर हम सब ढोंग करते हैं.

मेरे पास भी अपने स्वर्गीय पिता के स्मृतिचिन्ह है-- एक जेब घड़ी, जो उन्होंने सन १९३८ में अपने मुम्बई प्रवास के दौरान खरीदी थी. ये घड़ी बरसों पहले से ही जीर्णावस्था में है, मरम्मत योग्य भी नहीं है. अन्दर के सभी लोहे के पुर्जों पर जंग लग कर जाम हो गया है, सेकंड की सुई भी गायब है. चूँकि ये पिता की प्यारी घड़ी थी जिसे उन्होंने बरसों अपनी वास्कट की जेब में हिफाजत से सम्हाल कर रखा था, अब मेरा तो एक भावनात्मक लगाव है, जिसे मेरी बाद वाली पीढ़ी कूड़ा ही समझेगी.

तब घड़ियाँ, संभ्रान्ति की द्योतक होती थी. घड़ियाँ आम तौर पर यूरोप के देश स्विट्जरलैंड से बनकर आती थी. मेरे पिता की घड़ी, Railway Timekeeper, भी गुजरे जमाने की ऐतिहासिक आईटम हो गयी है क्योंकि आज के संचार युग में हाथ में घड़ी, मोबाइल में घड़ी, कम्प्युटर-टेलीविजन में घड़ी, आठों दिशाओं में हर कोण पर समय के मानक चिपके हुए हैं, हालाँकि फिर भी राह चलते पूछने वालों की कमी नहीं है कि क्या टाइम हो गया?

समय भाग रहा है या हम भाग रहे हैं? ये दुविधापूर्ण प्रश्न है. बहरहाल तीसरी पीढ़ी के बाद कौन दादा-परदादा की याद कर पाया है? मैंने तो अपने दादा रमापति पाण्डेय को देखा भी नहीं था. पिताश्री प्रेमबल्लभ पाण्डेय के साथ गहरा जुड़ाव रहा इसलिए उनकी स्मृति चिन्ह, इस जेब घड़ी, को बहुमूल्य सामानों के साथ सहेज कर रखा है; हाँ अपने घर का नाम मैंने पितृ-छाया जरूर रखा है.

***  

सोमवार, 21 मई 2012

चुहुल - 23


(१)

एक थे खान साहब. वे बहुत ज्यादा उम्र होने के बावजूद नई दुल्हन पाने के लिए एक दलाल के चक्कर में पड़े, और दलाल ने एक जरूरतमंद महिला के साथ निकाह भी पढ़वा दिया.


खान साहब के मुँह में केवल एक ही दांत बचा था इसलिए नई बेगम के सामने इस बारे में संभलकर ही बात करना चाहते थे. सुहाग की सेज पर बुर्कानशीं बेगम से बात बढ़ाने के मतलब से बोले, बेगम, दूल्हा तो एकदंता ही भला.

इस पर बेगम ने बुर्का उठा कर अपना पोपला मुँह खोलते हुए, हामी भरते हुए कहा, अजी, मुंह में हाड़ का क्या लाड़? उसके मुँह में एक भी दांत नहीं बचा था.
                                            
(२)
दो गदहों की मुलाक़ात होती है. कुम्हार का गदहा दुबला-पतला, लेकिन धोबी का गदहा अच्छा मोटा ताजा था. कुम्हार के गदहे ने अपने मित्र से पूछ ही लिया, यार तेरा मालिक तुझे खाना-खुराक भी अच्छा नहीं देता है, और मारता भी है, पर तू तो फिर भी तगड़ा है, और खुश रहता है?

धोबी का गदहा बोला, मेरी खुशी का राज यह है कि मेरा फ्यूचर बहुत ब्राईट है.

वो कैसे? पहले ने पूछा.

अरे, मेरा मालिक जब भी अपनी जवान बेटी को डांटता है तो कहता है कि तेरी शादी किसी गदहे से करूँगा.
                                            
(३)
एक आदमी का घोड़ा बीमार रहने लगा तो वह उसे वह डॉक्टर के पास ले गया. डॉक्टर ने पूछा क्या शिकायत है?
घोड़े का मालिक बोला, डॉक्टर साहब, इसने दौड़ना बन्द कर दिया है.

डॉक्टर ने घोड़े की जाँच-पडताल की, टेम्परेचर, ब्लड प्रेशर आदि सभी चेक किये और कहा, इसे मैं अभी ठीक कर देता हूँ."

डॉक्टर ने घोड़े को एक दवा की गोली खिला दी. गोली घोड़े के पेट में जाते ही वह जोर से हिनहिनाया और कुलाचे भरते हुए दौड़ पड़ा. घोड़े के मालिक ने काफी दूर तक उसका पीछा किया पर वह हाथ नहीं आया. वापस आकर उसने डाक्टर को धन्यवाद देते हुए फीस दी और दवा की दो गोलिया अतिरिक्त मांगने लगा.

डॉक्टर ने कहा, अब अतिरिक्त दवा देने की कोई जरूरत नहीं है.

घोड़ेवाला बोला, ये गोलियाँ मुझे अपने लिए चाहिए. मैं खाऊँगा तभी घोड़े को पकड़ सकूंगा.
                                            
(४)
एक महिला अपने कुत्ते को वैटेनरी डॉक्टर के पास लाई और उसकी दवा लेकर घर चली गयी. थोड़ी देर बाद वह अपने पति को भी उसी तरह चेन लगा कर खींचती हुई डॉक्टर के पास ले आई. डॉक्टर यह दृश्य देख हैरान हुआ, बोला, इनको इस तरह चेन लगाकर क्यों लाई हो?
वह बोली, डॉक्टर साहब इन्होने गलती से कुत्ते वाली दवा खा ली है.

डॉक्टर बोला, "अरे इसमें इतना परेशान नहीं होना चाहिए. आदमी और कुत्ते की दवा की डोज में ज्यादा फर्क नहीं होता है. आप खांमखां इनको चेन लगा कर खीच रही हो.

वह महिला थोड़ा शरमाते हुए बोली, क्या बताऊँ डाक्टर साहब, घर से लेकर आपके अस्पताल के बीच २० बिजली के खम्भे हैं, और ये हर खम्भे की तरफ कुत्ते की तरह ही लपक रहे थे..
                                              
(५)
एक लम्बे समय से चल रहा बीमार आदमी जब स्वस्थ हो गया तो डॉक्टर साहब को धन्यवाद देकर बोला, डॉक्टर  साहब, कभी मैं भी आपके काम आऊँगा.

डाक्टर साहब ने पूछा, तुम क्या काम करते हो?

वह बोला, मैं कब्र खोदने का काम करता हूँ.
                                               ***

शनिवार, 19 मई 2012

खोया-पाया

अखबारों के विज्ञापनों में एक छोटा सा कॉलम होता है, खोया-पाया. हम बरसों से देखते आ रहे हैं कि लोग अपनी कीमती वास्तु/कागजात खो जाने पर छपवाते हैं, जिसमें गुहार लगाते हैं कि उनको सूचना दी जाये. कभी कभी तो उनमें पारितोषिक देने की बात भी लिखी मिलती है, लेकिन ऐसा बहुत कम देखने को मिला कि जिस किसी को दूसरे की वस्तुएं/कागजात मिले हों उसकी तरफ से सूचनार्थ उसी तरह विज्ञप्ति छपवाई हो. दूसरों के दु:ख-तकलीफों से संवेदना लेते हुए उद्वेलित होने वाले कितने लोग होते हैं? ऐसे मामलों की गंभीरता वही समझ सकता है, जिसकी जिंदगी के तार उन बहुमूल्य वस्तुओं या कागजातों से जुड़े हुए रहे हों.

आदमी, औरतें, बच्चे, लडकियां, या कोई ठग-घपलेबाज गायब हो जाये तो भी आम तौर पर उनको खोजने के विज्ञापन अखबारों में छपाए जाते हैं. यहाँ तक कि कुछ कुत्ता-बिल्ली खो जाने के दारुण समाचार, फोन नम्बर सहित छपते रहते हैं, पर यहाँ बात जिंदगी से जुडी कीमती वस्तुओं/कागजातों के बहाने उस ईमानदारी के जज्बे को खोजने की हो रही है, जिसे हम अंतरात्मा की आवाज कहते हैं क्योंकि अब लगने लगा है कि वह वास्तव में कहीं खो गयी है.

देशी/विदेशी सैलानी बड़े उत्साह व आकांक्षाओं के साथ हमारे होटलों, रेलगाड़ियों या बसों में निश्चिन्त होकर चलते हैं. यद्यपि उनको यात्रा शुरू करने से पहले ताकीद की जाती है कि मैक्सिको, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अनेक नामी अफ्रीकन देश, तथा भारत में लुटेरे, चोर-उचक्के-ठग बहुत सक्रिय रहते हैं लेकिन पर्यटक यदि इन सूचनाओं को गंभीरता से ना लें तो अनहोनी होती रहती है. बदमाशों के लिए कोई नैतिक उपदेश काम नहीं करते हैं.

इधर उत्तर भारत में रेल/बस की यात्राओं में जहरखुरानों का आतंक बना रहता है. कई गिरोह पकड़े भी जाते हैं, पर लचर क़ानून व हल्की-फुल्की सजा के कारण, वे फिर खुले घूमने लगते हैं, और अपने कारोबार में फिर सक्रिय हो जाते हैं. एक समय था केवल जेबकतरों से सावधान' जैसे निर्देश रेल/बस की टिकट खिड़कियों पर लिखे दीखते थे. जो जेबकतरे पकड़े जाते हैं, उनमें नाबालिग बच्चे व औरतें बहुत शातिर अपराधी होते हैं. यह आज भी व्यवसाय की तरह चलता है.

अब हालत यह है कि हम सब को हर जगह लुटने-ठगे जाने का खतरा है. दूसरी तरफ आम आदमी की सोच इतनी स्वार्थपूर्ण व नैतिकताविहीन हो गयी है कि खोया-पाया के गुच्छे से पाया शब्द गायब हो गया है.  इस संवेदनहीनता की स्थिति पर हर फोरम में, मीडिया में चर्चा होनी चाहिए ताकि सब को सोचने को मजबूर होना पड़े. जर्मनी में हिटलर ने अपने लोगों में राष्ट्रभक्ति का गजब का जूनून पैदा कर दिया था, जिसके लिए वहाँ साहित्य, सिनेमा व सभी जनसंपर्कों में देशभक्ति को लक्ष्य बनाया गया और यह बहुत सफल आयोजन रहा. यह दूसरी बात है कि अंतर्राष्ट्रीय परिपेक्ष में हिटलर हार गया.

हमारा दुर्भाग्य यह है कि हमारा धर्म केवल व्यक्तिगत अथवा राजनैतिक उद्देश्यों से अपना हितलाभ प्राप्त करना रह गया है. जरूरत युद्धस्तर पर नैतिकता जगाने की है ताकि हमारी खोयी हुए भारतीय आत्मा फिर से पाई जा सके. जिसका मूल मन्त्र है, सर्वे सुखिन: सन्तु.
                                                ***

गुरुवार, 17 मई 2012

एक पुजारी की गुहार


हे ईश्वर, 
मैं तेरा अनन्य सेवक, ध्याता, व पुजारी हूँ. नित्य सहस्त्रों बार तेरे नाम का जाप व गुणगान करता रहता हूँ. तूने मुझे बहुत कुछ दे रखा है. कर्म स्थली के रूप में विराट मंदिर दिया है, रहने के लिए सुविधा पूर्ण घर दिया है तथा भोजन की व्यवस्था दी है. छोटा सा सुखी परिवार दिया है. यजमानों के रूप में स्वनामधन्य बिरला जी सहित उनके छोटे-बड़े कर्मचारी दिये हैं. वट, पीपल, कदम्ब, मौलिश्री, अमलतास, तथा नागचम्पा आदि वनोच्छादित निवास दिया है. तेरी मुझ पर बड़ी अनुकम्पा है.
हे दीनदयाल,
फिर भी मेरा मन कभी कभी अशांत  हो जाता है क्योंकि मैं मनुष्य हूँ और सभी सांसारिक सुखों के प्रति लालायित रहता हूँ. जब मैं देखता हूँ कि जो लोग कारखाने में मजदूर के रूप में भर्ती हुए थे वे फोरमैन हो गए हैं, जो जूनियर इंजीनियर आये थे वे सीनियर मैनेजर या प्लांट हेड तक हो गए हैं, पर तूने मेरे लिए कोई प्रमोशन की गुंजाइश नहीं रखी है. फैक्ट्री  के कार्यरत कर्मचारी के लिए कानूनन प्रो.फंड, ग्रेच्यूइटी, आदि सुविधाओं की व्यवस्था है, पर में तेरा एक मात्र कर्मचारी बचा हूँ जो केवल हरिनाम के सहारे अपने भविष्य की रूपरेखा बनाए हुए हूँ.
हे बांके विहारी,
तुमने गीता में कहा है कि कर्मण्ये वाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन मुझे सन्तोष है कि नित्य तेरे नाम की आरती गाता हूँ, तेरे नाम की घंटी बजाता हूँ, परसुखचिंतन व आशीर्वचन में व्यस्त रहता हूँ. और ये भी सोचता हूँ कि सुदामा की ही तरह एक दिन तेरी कृपादृष्टि मुझ पर पड़ेगी.
हे देव,
इस महंगाई में मेरे यजमान समृद्ध होते हुए भी मेरी दक्षिणा के प्रति उदासीन रहते हैं. उसमें बढोत्तरी नहीं हो पा रही है. मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि इस बिरला उद्योग को और भी दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति व समृद्धि दे. कर्मचारियों को भी मालामाल कर दे ताकि सबका ध्यान मेरी चिंताओं की तरफ भी बना रहे.
विनम्र,
आपका पुजारी.

मंगलवार, 15 मई 2012

अभिशप्त

अविभाजित अल्मोड़ा जिले में अब से साठ साल पहले मोटर मार्ग बागेश्वर कस्वे तक ही बन पाई थी. बागेश्वर इलाके का तीर्थ तथा व्यापारिक केन्द्र भी रहा है. बागेश्वर नीचे घाटी में स्थित है जहां से जंगलात की चार फुट चौड़ी सड़कें चारों ओर आती जाती थी. उत्तर में कपकोट-पिण्डारी ग्लेशियर वाला रास्ता सरयू नदी के किनारे किनारे जाता था, ऊबड़-खाबड़ था पर इतना दुर्गम नहीं था जितना कि पूर्व दिशा के लिए बनी राह थी. जो ठेठ कांडा, बेरीनाग-पिथोरागढ़ को जोड़ती थी.

बागेश्वर से कांडा का रास्ता लगभग नौ मील, चढ़ाई-उतराई ढलानों पर लकड़ीथल, जड़ियागाड़/मनकोट, बूढ़ाघुना-घिन्गार्तोला होकर जाता था. कांडा, कम्स्यार पट्टी में आता है. इस इलाके की आबादी बहुत घनी रही है. कांडा कॉलेज से चारों ओर खुला विहँगम परिदृश्य दर्शनीय होता है. कांडा पिछली शताब्दी के प्रारम्भ से ही शिक्षा का केन्द्र भी रहा है. इसलिए यहाँ जन जागृति भी रही है. केन्द्र में होने के कारण रोजमर्रा की जरूरतों के लिए आम लोगों का भी आना जाना खूब होता था. उपभोक्ता सामानों की कुछ दूकानें बहुत अच्छी चलती थी. बागेश्वर के आढ़ती लोग माल भेजा करते थे.

नैनसिंह धपोला अपने मामा की दूकान पर बागेश्वर, दुग बाजार में काम करता था. थोड़ा सयाना हुआ तो मामा ने उसको बागेश्वर से कांडा सामान ढोने के काम पर लगा दिया. एक लददू घोड़ा भी खरीद कर दे दिया. नैनसिंह ने एक-दो वर्षों के अंतराल में ही अपनी कमाई से दो घोड़े और खरीद लिए. वह अपने घोड़ों को सप्ताह में तीन बार लाद कर कांडा मुकाम करते हुए बागेश्वर लौट आता था. बड़ी मेहनत और लगन से उसने अपने रोजगार को बनाए रखा. व्यापारियों का भी उस पर पूरा भरोसा होता था घोड़ों के लिए भी बढ़िया दाना-पानी की व्यवस्था करके हिफाजत की हुई थी. वह इलाके में नैनसिंह घोड़िया के नाम से पहचाना जाने लगा था.

उसकी शादी हो गयी और कुछ वर्षों के अंतर में उसके तीन बेटे भी पैदा हो गए. १०-१२ साल का होते ही उसने बड़े लडके पानसिंह को भी अपने साथ ट्रेनी-सहायक के रूप में ले जाना शुरू कर दिया. मझला लड़का दानसिंह कुछ स्थानीय लडकों के साथ घर से भागकर हल्द्वानी चला गया. वहां किसी होटल में काम करने लग गया. छोटा हीरासिंह था, जिसको सब ने मिलकर स्कूल पढ़ने के लिए प्रेरित किया और वह काफी कुशाग्र निकला. बागेश्वर से हायरसेकेण्ड्री पास करके उसे अल्मोड़ा जाना पड़ा क्योंकि बागेश्वर में तब विज्ञान विषयों की पढ़ाई नहीं थी.

हीरासिंह की रूचि और लगन को देखते हुए, आगे की पढ़ाई के लिए नैनसिंह ने अध्यापकों की सलाह पर उसे आगे पढ़ने के लिए लखनऊ भेज दिया, जहां उसने बी.एससी. तथा बाद में धातु विज्ञान (मैटीरिओलोजी) में एम.एससी. किया. पर बेटे को पढ़ाने के चक्कर में नैनसिंह का ट्रांसपोर्ट का धन्धा मंदा हो गया. धीरे धीरे तीनों घोड़े बेचने पड़ गए. बड़े लड़के के लिए बागेश्वर में चाय-पकोड़ी का एक खोमचा लगा दिया ताकि घर का खर्चा चल सके. खुद नैनसिंह की उम्र भी हो गयी थी कि अब सामान लादने-उतारने का वजनी काम उससे नहीं हो पा रहा था.

उम्मीद थी कि हीरासिंह कहीं बड़ी नौकरी में लग जाएगा और मोटी कमाई करेगा, घर की ग़ुरबत दूर हो जायेगी. हीरासिंह बहुत महत्वाकांक्षी था. एम.एससी. करने के बाद उसका दायरा बहुत बड़ा हो गया. उसने जुगाड़ करके मुम्बई के एक नामी स्टील कंपनी कैमिस्ट की नौकरी पा ली, जहाँ उसने दो चार वर्षों में स्टील की फाउंड्री से लेकर मार्केटिंग की वृहद जानकारी हासिल कर ली और जल्दी ही अन्य सहयोगियों की मदद से अपना निजी इलेक्ट्रोप्लेटिंग का कारोबार शुरू कर दिया. वह खूब रूपये कमा रहा था, पर उसने अपने घर-परिवार को भुला दिया. वह घरवालों के संपर्क में ही नहीं रहा. वह भूल गया कि उसे बड़ा आदमी बनाने के चक्कर में माता-पिता व अन्य परिवारजनों ने अभाव व कष्ट झेले हैं.

अब जब वह बड़ा आदमी हो ही गया तो उसके संपर्क भी बड़े हो गए. उसने एक गुजराती उद्योगपति की लड़की से शादी कर ली जिसकी सूचना तक माता-पिता को नहीं दी. गरीब अनपढ़ घरवालों को बुलाना ठीक नहीं समझा. मुम्बई में उसने अपना फ़्लैट खरीद लिया, तदन्तर वह बड़े व्यावसायिक करार में हैदराबाद शिफ्ट हो गया. कंसल्टेंसी भी करने लगा. इस तरह वह दूसरी दुनिया का प्राणी बन गया. इधर इन अनमोल वर्षों में माता-पिता सभी मायूस और अभावग्रस्त रहे, चाहते हुए भी वे बेटे के संपर्क में नहीं आ सके. जब कोई नैनसिंह की दुखती रग को छेड़ देता तो वह निराशा पूर्वक कह देता कि "हीरा के लिए तो हम मर चुके हैं. आम तौर पर कोई माता-पिता अपनी औलाद को बददुआ नहीं देते हैं, चाहे वह कितने भी नालायक हों, पर उनकी अंतरात्मा तो अवश्य दुखती है.

हैदराबाद में भी उसने अपने लिए एक आलीशान बँगला खरीद लिया, जहाँ सभी आधुनिक सुविधाओं व साजो सामान उपलब्ध थे. उसके पास नौकर-चाकर और ड्राईवर भी थे. शादी के पाँच साल बाद उसको एक पुत्र रत्न की प्राप्ति भी हो गयी.

कभी कभी इतिहास खुद को दोहराता है. बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ तो पापा से घुड़सवारी के लिए जिद करने लगा. रईस हीरासिंह ने उसके लिए चेन्नई से एक बढ़िया नस्ल का घोड़ा खरीद कर मंगवाया. अब उसके ठाठ निराले थे.

बच्चे के साथ मौज मस्ती में एक दिन जब हीरासिंह खुद घोड़े पर सवार हुआ तो ना जाने क्यों घोड़ा बिगड़ गया. उसने उसको उछाल कर जमीन पर गिरा दिया. उसकी रीढ़ की हड्डी+स्पाइनल कॉर्ड टूट गयी, और शरीर का निचला हिस्सा पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गया.

हीरासिंह पिछले दो वर्षों से बड़े बड़े अस्पतालों में ईलाज कराते हुए बिस्तर पर अपाहिज पड़ा हुआ है. अब पड़े पड़े उसे अपना बचपन, अपने माँ-बाप व भाई याद आ रहे हैं. उनकी उपेक्षा का जो अपराध उसने किया था वह उसे कचोट रहा था.

हीरासिंह अपने माता-पिता व भाइयों से मिलना चाहता था, पर स्वास्थ्य के कारण इस स्थिति में नहीं है कि पहाड़ लौट सके. उसे बड़ा सदमा तब लगा जब उसे मालूम हुआ कि उसके बूढ़े माता-पिता तो कुछ साल पहले ही दुनिया छोड़ चुके हैं. अब वह अपना अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर है.
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रविवार, 13 मई 2012

माँ के नाम

घुटनों घुटनों चलते चलते
      जाने मैं  कब  दौड़  पड़ा
पीछे मुड़कर ठिठक निहारूं
     याद करूँ माँ मैं खडा खडा. 

तेरे आँचल का दूध था अमृत
      जिसको पीकर बड़ा हुआ
तेरी मृदुल मधुमय मुस्कानों से
      मेरा  हर पल  जुड़ा  हुआ. 

कोलाहल से भरी ये दुनिया
      जब भी मुझको नीद न आती
संगीत-सुरों की सरगम जैसी
      लोरी  तेरी  आन   सुलाती. 

जाने क्या क्या रिश्ते होते?
      ये  जग रिश्तों की  है छाया
तेरा मेरा रिश्ता केवल
      तू जननी, मैं  तेरा  जाया. 

बूडा तेरे स्नेह में अविरल
      याद करू नित जागे-सोवे
मैं पूत तुम्हारा अंश मात्र हूँ
      हे मातु, तुम्हारी जय होवे. 
   
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शुक्रवार, 11 मई 2012

अश्व-गाथा

अश्व यानि घोड़ा, प्रागैतिहासिक काल से ही मनुष्य का पालतू-मित्र पशु रहा है. यह एक बुद्धिमान व बलशाली स्तनपायी जानवर है. मनुष्य ने अपनी सवारी के लिए इसे पालतू बनाया होगा. प्राचीन गुफाओं में अनेक भित्तिचित्र इसके सबूत हैं. घोड़े का वैज्ञानिक नाम ईक्वस कैबैलस है, इसी का अपभ्रंश होकर अंगरेजी में होर्स और संस्कृत में अश्व हो गया लगता है. मूल रूप से अन्य जानवरों की ही भाँति यह भी जंगली था. आज भी मंगोलिया, तुर्किस्तान तथा दक्षिण अफ्रीका के घास के मैदानों में जंगली घोड़े, झुण्ड बना कर रहते हैं. झुण्ड का लीडर नर घोड़ा, अपने हरम की पूरी निगरानी करके रखता है.

रामायण में अश्वमेध यज्ञों तथा महाभारत में घुड़सेना का विस्तार से वर्णन आता है. आदि विद्याओं में घोड़ों के बारे में शालिहोत्र शास्त्र का नाम आता है. महाभारत में राजा नल और नकुल को इस शास्त्र का पंडित बताया गया है.

घोड़ा प्रजाति में खच्चर, टट्टू.जेबरा, भोट, और गदहा कई नाम व आकार के जानवर हैं, जिनकी अलग अलग विशेषताएं हैं. घोड़ों की भी देश काल के अंतर के कारण कई नस्लें हैं. अरबी नस्ल का घोड़ा सर्वोत्तम कहा गया है. कहते हैं कि अरबी घोड़ा कभी भी नीचे जमीन पर नहीं बैठता है, जीवन भर खड़ा ही रहता है.

मध्य युग में घोड़ा राजशाही व संभ्रान्ति की सवारी रहा. युद्ध के मैदानों में शूरवीर घोड़ों पर सवार होकर ही अपना शौर्य दिखाते थे. आज भी सवारी के रूप में घोड़ा/घोड़ी का चरित्र सबसे अलग है. यद्यपि पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों में मोटर-साइकिलें, मोटर-कारें व ऑटो इन्जन वाली सवारियां सडकों पर दौड़ती हैं, पर घुड़ सवारी के शौक़ीन आज भी
प्राचीन विधा अपनाये हुए हैं. यूरोप व अमेरिका में घोड़े पालने व उनका वंश बढ़ाने के अनेक आधुनिक फार्म कई छोटे-बड़े स्तरों पर मौजूद हैं.

हमारे देश में तांगे, बग्घी, रेहड़ी चलाने के अतिरिक्त दुर्गम स्थानों में सामान पहुंचाने के लिए घोड़ों का इस्तेमाल किया जाता है. बारातों में दूल्हे के लिए घोड़ी को शुभ और शान की सवारी माना जाता है. सिख धर्म में घुड़सवार निहंगों की अलग पहचान है.

गणतन्त्र दिवस तथा संसद के उदघाटन के अवसर पर राष्ट्रपति के घुड़सवार अंगरक्षक अंग्रेजी राज्य की परम्परा को आज भी जीवित रखे हुए हैं. मिलिट्री व पुलिस बल के साथ उनकी घोड़ेवाली टुकड़ी चुस्त=दुरस्त रहती है, जिनको नियमित व्यायाम व करतब करना सिखाया जाता है. इनकी देखभाल खाना-खुराक भी विशेष होती है. प्रशिक्षित सईस इनकी खैरख्वाही में नियुक्त रहते हैं. अंग्रेजों के जमाने में जब किसी घोड़े को फ़ौज से रिटायरमेंट दिया जाता था तो  उसे गोली मार दी जाती थी ताकि उसे सिविल में आकर किसी प्रकार का कष्ट व आभाव झेलने की नौबत ही न आए.

घोड़ा व गदहा के बीच की शंकर प्रजाति खच्चर/खेचर होती है, जिसकी प्रवृत्ति चँचल व थोड़ी छिछोर होती है, पर दुर्गम स्थानों तक सामान पहुंचाने के लिए सेना व सिविल दोनों के लिए इन्ही की सेवा ज्यादा ली जाती है.

बड़े शहरों में अब जबकि इंसानों के लिए ही जगह सिमटती जा रही है तो घोड़े जैसे जानवरों के लिए कहाँ ठौर मिलेगी? दूर देहात में इनके बसेरे होते हैं. कुछ पुरानी फिल्मों में जैसे भाभी, विक्टोरिया नम्बर २०३ शोले आदि डाकुओं पर आधारित कथानकों अथवा धार्मिक धारावाहिकों में घोड़ों की टॉप सुनाई देती है. कुछ राष्ट्रनायकों में जैसे  शिवाजी महाराज, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई व महाराणा प्रताप के साथ उनके यादगार घोड़ों के स्मारक बसे हुए हैं. यहाँ कुमायूं में प्राचीन मूमिदेव गोल्ल ज्यू की मूर्तियां श्वेत घोड़े पर सवार, सुसज्जित  मिलती है. अब महानगरों के बच्चों को तो डर्वी रेस के घोड़े या विज्ञापनों में अथवा कार्टूनों में पंख लगे, उड़ते हुए घोड़े मात्र दिखाई देंगे या कभी मुम्बई-गोवा के समुद्रतट पर घुड़सवारी का जायका बताया जा सकेगा. ऐसा ना हो कि शहरी लोगों की  आने वाली पीढ़ियों के लिए घोड़ों को म्यूजियम या चिड़ियाघर में रखने की नौबत आ जाये.
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बुधवार, 9 मई 2012

परमार्थ

जैन मुनि तरुण सागर जी महराज अपने प्रवचनों में खरी खरी बातें, एक अलग ही अंदाज में कहा करते हैं. वे स्वयं त्याग और तपस्या की मूर्ति हैं. समकालीन उपदेशकों में वे सीधे सीधे समाज को संबोधित करते हैं तथा सद्मार्ग दिखाते रहते हैं. एक प्रवचन में वे कह रहे थे कि धनवान लोगों को अपनी कमाई का उपयोग एक ट्रस्टी की तरह करना चाहिए. सुपात्रों, गरीबों, व भूखों को दान देना चाहिए और दान देकर भूल जाना चाहिए क्योंकि सारी संपदा भगवान की है. सँसार में आपका हिस्सा तो बस उतना ही है, जितना आप खुद खा पाते हैं अथवा दूसरों को खिलाते हैं. इसी तरह महात्मा गाँधी जी ने भी धनवानों-कारखानेदारों को कहा कि वे अपनी सम्पति को एक ट्रस्टी के रूप में देखें और उपभोग करें.

मध्य एशिया के मुस्लिम इतिहास में संत इब्राहीम का नाम कई सन्दर्भों में आया है. वे बादशाह हुआ करते थे, बड़े अल्लाह वाले थे. देव प्रेरणा से उन्होंने त्याग और वैराग्य प्राप्त किया. एक स्मरणीय दृष्टान्त, उनके बारे में ये है कि वे नित्य एक भूखे व्यक्ति को भोजन करवाते थे, पर एक बार उनको दूर दूर तक कोई भूखा व्यक्ति नहीं मिला. अंत में खोजते खोजते एक भूखा वृद्ध उनको मिल ही गया, जिसे भोजन कराने के लिए वे अपने साथ लिवा लाये. भोजन परोसने पर जब आगंतुक खाने के लिए तत्पर हुआ तो संत ने उससे कहा, तुमने खाने से पूर्व की नमाज नहीं पढ़ी? वह बोला, मैं तुम्हारे मजहब का नहीं हूँ, अग्नि-पूजक हूँ जिसे मैंने मन ही मन नमन कर लिया है. संत इब्राहीम को काफिर (खुदा को न मानने वाला) को भोजन कराना अच्छा नहीं लगा और कुछ कह डाला. आगंतुक बिना भोजन किये ही उठ कर चल दिया. संत को अपने व्यवहार पर बड़ा अफ़सोस हुआ क्योंकि भूखे व्यक्ति की जाति-धर्म नहीं देखनी चाहिए थी. ताउम्र उन्होंने अपने प्रवचनों में इसका उल्लेख किया.

आजकल जो देखने में आता है उसके अनुसार जो लोग सामाजिक या धार्मिक कार्यों के लिए धन देते हैं, उसका वे पहले माइक पर घोषणा कराते हैं या शिलापट्टों पर अपने धर्मात्मा होने का लेख लिखवाते हैं. यद्यपि ऐसे मनीषी भी हैं, जो हमेशा गुप्त दान या गुप्त मदद दिया करते हैं. इन्ही लोगों के परमार्थ व धर्म से ये पृथ्वी शून्य में टिकी हुई है.

हमारे शास्त्रों में, आप्तोपदेशों में परोपकार पर बहुत कुछ कहा गया है. एक नीतिपरक श्लोक में लिखा है:
          परोपकाराय फलन्ति वृक्ष:
          परोपकाराय बहन्ती नद्य:
          परोपकाराय दुहन्ति गाव:
          परोपकारार्थ  इदं शरीरम  

मृत्युपरांत हमारा भौतिक शरीर मिट्टी हो जाता है, तो इसके नष्ट होने से पहले इसके अवयव कहीं परोपकारी कार्यों में दान दे दिये जाएँ तो कितना अच्छा हो? आये दिन अखबारों में, इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नेत्रदान/अंगदान की अपीलें छपती हैं, पर कितने लोग प्रेरणा ले पाते हैं? ये विचारणीय विषय है. सभी प्रबुद्ध लोगों को इस बारे में अपने आस-पास समाज को शिक्षित करना चाहिए.
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सोमवार, 7 मई 2012

सूरजमुखी

वह पैदाइशी सूरजमुखी तो नहीं थी, पर उसका दुर्भाग्य ही था कि दस साल की उम्र में ल्यूकोडर्मा नामक चर्म रोग उसकी अँगुलियों के पोरों, कनपटियों, पलकों और पीठ से शुरू होकर धीरे धीरे सारे शरीर पर फैलता गया. २५ की उम्र तक पहुँचते पहुँचते वह पूरी सफ़ेद हो गयी. लोग उसका असली नाम तो भूल गए और सूरजमुखी कहा जाने लगा. सच तो ये है कि सूरजमुखी और ल्यूकोडर्मा में बहुत अंतर होता है, पर आम व्यक्ति इसे कहाँ समझ पाता है?.

पंडित दीनानानाथ शर्मा, एक कर्मकांडी सनाढ्य ब्राह्मण हैं. अभुक्त मूल नक्षत्र में बेटी के पैदा होते ही वे अनेक प्रकार से शंकित तथा चिंतित रहे. बेटी की आँखें हिरनी की तरह बड़ी बड़ी और सुन्दर थी, राशि के अनुसार भी सु शब्द  उनको शुभ लगा, अत: नाम दिया गया सुनयना. सुनयना सभी सामान्य बच्चों की तरह ही चँचल, शोख व स्नेहिल बच्ची थी. पंडित जी ने उसके अशुभ ग्रहों की शान्ति के लिए कुछ टोटके-पूजा भी किये लेकिन भविष्य और भाग्य को कौन जानता है? विधि की लेख पहले से लिखी रहती है.

ल्यूकोडर्मा कोई छूत की कीटाणुजनित या जेनेटिक बीमारी तो है नहीं, पर हमारी पुरानी किताबों व अशिक्षित समाज की मान्यताओं में इसे एक प्रकार का कुष्ट रोग कहा गया है, जो बिलकुल गलत व गैर जरूरी बात है. क्योंकि ये कुष्ट यानि लेप्रोसी कत्तई नहीं है. इस बारे में सबको अपनी सोच बदलनी चाहिए.

मेडीकल साइंस भी अभी तक इसकी जड़ नहीं पकड़ पाया है कि चमड़ी के बाहरी सेल/ऊतक अपना स्वाभाविक रंग छोड़ कर सफ़ेद क्यों हो जाते हैं. इसका सीधा सम्बन्ध लीवर से बताया जाता है. विरुद्ध भोजन जैसे दूध-मछली, दही-करेला, जिनके तत्व-प्रोटीन मेल नहीं खाते है, लीवर में प्रतिक्रया करते हैं और त्वचा पर प्रभाव डालते हैं.

जब ल्यूकोडर्मा उजागर होने लगा तो पंडित दीनानाथ ने पहले वैद्यों की शरण ली, जिन्होंने बावची का तेल और बावची मिश्रित औषधियां दी, पर कोई लाभ नजर नहीं आया. ऐलोपैथिक दवाएं भी विशेषज्ञों की सलाह पर नियमित दी पर ल्यूकोडर्मा का प्रसार रुका नहीं. अपने पूर्वाग्रहों और ज्योतिषीय विश्वासों के तहत वे इसे अभुक्त मूल नक्षत्र का प्रभाव मानते रहे, जो एक खयाल मात्र था.

अखबारों में ल्यूकोडर्मा ठीक करने के सैकड़ों विज्ञापन छपते हैं. मरता क्या नहीं करता वाली बात थी. बेटी का मामला बहुत नाजुक होता है, जिसने जैसी सलाह दी, वैसा किया. बिहार के गया और कतरीसराय से कुछ ठग वैद्यों से भी पार्सल द्वारा दवाएं मगवाई किन्तु सारी दवाईयां और प्रार्थनाएं बेकार गयी.

इन सारी प्रक्रियाओं का मनोवैज्ञानिक प्रभाव सुनयना पर जरूर पड़ा. बेचारी हीनभावनाग्रस्त रहती थी. ये स्वाभाविक भी था. इसी हालत में वह इन्टरमीडिएट तक पढ़ गयी. अब पंडित जी को उसकी शादी की चिंता सताने लगी. वे कहा करते थे, कोई लूला-लंगड़ा, काना कैसा भी सजातीय लडका मिल जाता तो बिटिया के हाथ पीले कर देता. लेकिन उनको एक ऐसा रिश्ता मिल गया जहाँ सब ठीक ठाक लगता था. लड़के में काना, लूला-लंगड़े जैसी बात नहीं थी, हाँ दहेज के लिए गोल-गोल बातें करके अप्रत्यक्ष रूप से मुंह फाड़ा जा रहा था.

पंडित रामस्वरूप शर्मा का बेटा दयानंद शर्मा किसी प्राइमरी स्कूल में अध्यापक था. ल्यूकोडर्मा के बारे में जानते-सुनते उसने हाँ कर दी. दीनानाथ जी ने भी अपनी हैसियत से ज्यादा स्त्रीधन (दहेज) देकर बेटी को विदा किया और सत्यनारायण भगवान की पूजा करके अनेक धन्यवाद अर्पण किये. ये बात बाद में महसूस की जाने लगी कि ये शादी दहेज के लोभ मे की गयी थी. खासकर दयानन्द की कर्कश, जाहिल माँ ने अपना असली रंग बात व्यवहार से बता दिया वह सुनयना के चर्म रोग पर ताने दिया करती थी. सुनयना आहत तो होती थी पर वह इसे भाग्य की विडम्बना समझ कर सह लेती थी. ससुरालियों के इस प्रकार दुर्व्यवहार को उसने अपने माता-पिता तक नहीं पहुचने दिया. वह हर तरह ते परिपक्व तथा धैर्यवान हो गयी थी.

भगवान भी ऊपर से सब देखता ही है. कहा गया है कि "निर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय." हुआ यों कि उसकी सास गंभीर रूप से बीमार हो गयी. ब्लडप्रेशर बढ़ा मिला, हार्ट की आर्टरीज में ९०% ब्लोकेज पाया गया. तुरन्त बाईपास सर्जरी की तैयारी की जाने लगी. इस प्रकरण में भी निर्दोष सुनयना को अशुभ करार करते हुए ना जाने क्या क्या सुनना पड़ा. पर जब सास के लिए ओ निगेटिव खून की जरूरत पड़ी तो इस ब्लड ग्रुप का कोई डोनर नहीं मिला. अत: आपरेशन स्थगित किया जाने लगा. दबे स्वर में सुनयना ने अपने पति को बताया कि स्कूल के दिनों में उसके खून की जाँच हुई थी और ओ निगेटिव बताया गया था. वह रक्तदान को तैयार भी थी. लेकिन परिवार वालों को लग रहा था कि श्वेत कुष्ट का रोग बुढ़िया को भी हो जाएगा, पर जब ये बात आपरेशन करने वाली डाक्टरों की टीम को बताई गयी तो उन्होंने निराकरण किया कि पहली बात तो ये कुष्ट नहीं है, और दूसरी बात रक्त लेने-देने से ल्यूकोडर्मा बुढ़िया को कतई नहीं होगा.

सुनयना ने सहर्ष रक्तदान किया. सास का सफल आपरेशन हुआ और वह धीरे धीरे स्वस्थ हो गयी. इस घटना का परिवार के लोगों पर ऐसा प्रभाव हुआ कि सब का रवैया ही बदल गया. सारे गाँव में इस बात की चर्चा हुई. पंचायत में भी ये मसला लोगों के संज्ञान में आया. पंचायत ने सभी को ताकीद कर दिया कि दयानंद की बहू को कोई भी सूरजमुखी नहीं कहेगा.

जब अच्छा समय आता है तो सब अपने आप सामान्य होता चला जाता है. अगले वर्ष जब ग्राम प्रधान का पद महिला के लिए आरक्षित हुआ तो गाँव वालों ने सर्व सम्मति से सुनयना को ग्राम प्रधान चुन लिया.

पंचायत भवन में जो स्लोगन लिखे गए हैं, उनमें से एक यह भी है, 'ल्यूकोडर्मा कोई अभिशाप नहीं है
इस बीच ये शुभ समाचार आया है कि सुनयना जल्दी माँ भी बनने वाली है.
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