सोमवार, 1 मई 2017

मेरा जन्मदिन

अपनी खुशियों को न्यौता देने के लिए बहुत से मनमौजी लोग क्या क्या नहीं करते रहते हैं? मेरे एक प्यारे दोस्त हैं जो हर महीने अपना जन्मदिन मनाते हैं, केक काटते हैं, और परिवार के साथ मस्ती करते हैं. लेकिन मेरा जन्मदिन तो फिक्स्ड है – एक मई. यों जीवन के प्रारंभिक वर्षों में, अल्मोड़ा जिले के दूर दराज उस पिछड़े-पहाड़ी गाँव में तब कोई पारंपरिक रिवाज जन्मदिन मनाने का नहीं था. बहुत बाद में मुझे मालूम हुआ कि एक मई की ये तिथि यूरोप व एशिया में श्रमिक जागरण की याद में ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है (अमेरिका में मजदूर दिवस वहाँ के ऐतिहासिक कारणों से १७ जुलाई को नियत है). यह संयोग ही रहा है कि मैं अपनी एसीसी सीमेंट कंपनी में अपनी सर्विस के दौरान एक ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में स्थापित हुआ और उसी जूनून को मैं लम्बे समय तक पालते आ रहा हूँ.

इस संसार के श्रृष्टा ने तमाम प्राणियों का जीवन कई अदृश्य डोरों से बांधा हुआ है. सभी के जीवनकाल (स्पैन) अलग अलग कोष्टकों में डले हुए हैं. काल के सिद्धांत, पृथ्वी द्वारा सूर्य की 365 दिनों की परिक्रमा के हिसाब से गणितज्ञों / खगोलशास्त्रियों (astronomers) ने सटीक ढंग से अनादि काल से स्थापित किये हुए हैं.

इस युग के वे बच्चे बहुत भाग्यशाली हैं, जिनके माता-पिता सभ्य, प्रबुद्ध, और संपन्न हैं. ये अपने बच्चों की खुशियों के लिए जन्मदिनों को यादगार बनाने के लिए समारोहपूर्वक मनाया करते हैं, अन्यथा हमारे समाज में ऐसे भी बच्चे हैं जिनको जन्मदिन से कोई  सरोकार नहीं रहता है. कारण अज्ञानता व गरीबी होती है. जहाँ कुपोषण हो, रोटी तक ठीक से मयस्सर ना हो, वहाँ केक काटने की बात करना भी पाप है.

मेरे एक रिश्तेदार अपने बच्चों के जन्मदिन पर ‘मार्कन्डेय पुराण’ का पाठन व अन्य स्वस्ति वाचन करवाते हैं. मुझे अपने बचपन की जो यादें हैं, उनमें शायद ही कभी सामान्य पूजा-पाठ कराई गयी थी. मैंने भी अपने बच्चों के जन्मदिन समारोहपूर्वक नहीं मनाये. अब जब मेरे ये बच्चे सयाने व संपन्न हैं तो अपने अपने व अपने बच्चों के जन्मदिनों को बढ़िया ढंग से मनाते हैं, तथा हम माता-पिता को भी हमारे जन्मदिन याद दिलाकर जन्मदिन की खुशियाँ देते हैं. यों कोई मित्र या परिचित भी इस अवसर पर ‘बधाई’ दे तो अच्छा लगना स्वाभाविक होता है.

सोशल साईट्स पर सक्रिय रहने पर, खासकर, फेसबुक पर मित्रों के जन्मदिन उजागर होते रहते हैं. इसलिए लगभग सभी सुहृद मित्रगण शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति करके धन्य होते हैं. ये एक शुगल सा भी हो चला है. क्योंकि आज हम लोग इंटरनेट के जमाने में जी रहे है, एक दूजे के बहुत करीब आ गये हैं. ये हमारा सौभाग्य है कि हम मित्रों व रिश्तेदारों से दूर होते हुए भी उनसे संवाद कर सकते हैं.

कहावत है कि “जन्मदिन एक ऐसा दिन होता है, जब हम रोते हैं और हमारी माँ हमारे रोने पर खुश होती है.” आज इस अवसर पर मैं भी अपनी स्वर्गीय माँ को श्रद्धापूर्वक याद करता हूँ, जिसने मेरी खातिर अनेक वेदनाएं खुशी खुशी सही होंगी. साथ ही अपने स्वर्गीय पिता के गरिमामय स्वरुप को अपने अंत:करण में महसूस कर रहा हूँ. 

अंत में, मैं अपनी सहधर्मिणी, अपने सभी भाई-बहनों, पुत्र-पुत्रवधुओं, बेटी-दामाद, पौत्र - पौत्रियों, नातिनी, भतीजे-भतीजियों और इष्ट-मित्रों को उनके स्नेह और शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ, तथा सभी के सुख-सौभाग्य की कामना करता हूँ.
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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

सरकारी बेशर्मी

जस्टिस काटजू अपनी बेबाक व तल्ख़ टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं, फलस्वरूप वे सरकार और स्वयं न्यायपालिका को खटकते हैं.

शराब की दूकानें नेशनल हाईवेज से 500 मीटर दूर करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश इसलिए सामने आया कि आसानी से सडकों पर शराब मिलने पर गाड़ीवान/ड्राईवर//गैरजिम्मेदार लोग सड़क चलते नागरिकों की नशे में जान ले लेते हैं या उनको चोट पहुंचाया करते हैं. कोर्ट का उद्देश्य बहुत साफ तथा लोकहितकारी था. जस्टिस काटजू ने जो कहा वह भी 200% सही है कि “क़ानून बनाने का काम विधायिका का है ना कि न्यायपालिका का.” लेकिन सता पर काबिज सरकारें / उनके नेता/ माफिया/ दलाल सब शराब की अंधाधुंध कमाई से पोषित रहे हैं, इसलिए इस गंभीर समस्या पर उत्तराखंड की नव निर्वाचित सरकार ने जो चोर रास्ता निकाला है वह सुप्रीम कोर्ट पर थूकने जैसा है.

एक तरफ पूरे उत्तराखंड में शराब बंदी की मांग को लेकर आम जन विशेषकर महिलायें संधर्षरत हैं, दूसरी तरफ सरकार द्वारा रातोंरात लगभग सभी हाईवेज का नया नक्शा बनाकर अपनी ‘शराबी नीति’ को उजागर कर दिया है, ताकि ये शराब की दूकानें पूर्ववत सडकों पर बनी रहे. ये बेशर्मी की पराकाष्ठा है.

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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

मीन मेख

आजाद देश के आजाद कलमकार लोग कोई भी,कहीं भी, किसी भी मुद्दे पर मीन मेख निकालते रहते हैं; अब उत्तर प्रदेश की नई योगी सरकार के कृषक-ऋण माफी के मामले को ही लीजिये आलोचक कह रहे हैं कि “ये वोटों पर डाका डालने का एक जुमला था जो ‘हाथी की पाद’ साबित हुई है.” क्योंकि इसके साथ जो शर्तें बताई गयी हैं वे उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती हैं जिसमें अन्नदाता किसान को वास्तविक राहत मिले.

किसानों ने कर्जा जिन उद्देश्यों से भी  लिया उनमें गाय, बैल, भैस या बकरी खरीद के लिया होगा वे सब कृषि कार्यों के सहयोगी आचार से बाहर नहीं थे. स्वजनों के दुःख-बीमारी या बच्चों की पढाई अथवा मकान बनवाने में लिया गया कर्ज पारिवारिक जीवन के लिए अतिशय जरूरी होता है. सहकारी बैंकों या सूचीबद्ध बैंकों की ऋण वितरण की प्रक्रिया में जो अल्पशिक्षित /अनपढ़ काश्तकार पारंगत ना हो और दलालों/कमीशनखोरों के चंगुल से मुक्त ना हो, तो मजबूरन सूदखोर शाहुकारों की शरण में आ पड़ता है, और सरलता से जमीन या जेवर गिरवी रख कर धन पा लेता है, लेकिन मूल से ज्यादा ब्याज चुकाने में जिन्दगी बिता देता है. बहरहाल, मुद्दा कुलमीजान ‘कर्जे’ का है. जिसके कारण वह त्रस्त रहता है. आत्महत्या कोई भी खुशी से नहीं करता है. राजनैतिक दल चुनाव जीतने के लिए गरीब की दुखती नस पर अंगुली रखते हैं. यह देश का दुर्भाग्य है.

ये और भी बुरी परम्परा बनती जा रही है कि चुनावों के समय पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए साड़ियाँ, मोबाईल, लैपटॉप, घी+शक्कर, साइकिल आदि वस्तुएँ बाँटती हैं, या चुनाव के बाद ये सब देने का सच्चा या झूठा वायदा करती हैं. इस बार देश के कर्णधार, सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी जी, ने अपनी रैलियों में खुले आम वायदा किया था कि “किसानों के कर्जे माफ़ करूंगा." अब जब प्रचंड बहुमत मिल गया है तो इस वायदे को पूरा करने के बजाय इसमें शर्तें लगाकर गलियां निकाल दी गयी हैं.

ऋण का जो अल्पांश माफ़ हो रहा है, उसे सही दिशा में एक कदम की संज्ञा दी जा सकती है, पर वायदे की ईमानदारी नहीं कहा जा सकता है. जहां तक धनराशि के आंकड़े हैं, ये बड़े जरूर लग रहे हैं, लेकिन इसी केन्द्रीय सरकार ने पड़ोसी मुल्क नेपाल व बांगला देश को कई गुना धन दिल खोलकर मदद के रूप में दिया है, इसके अलावा तैमूरलंग के देश मंगोलिया जाकर अरबों रूपये देकर वाहवाही लूटी है.

ऐसे में सारे किसान खुद को ठगा सा महसूस करेंगे और कर्ज माफी का मामला उन राज्यों में भी शर्तों के साथ उठेगा, जिनमें काश्तकारों की हालत उत्तर प्रदेश से बेहतर नहीं है.

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शनिवार, 1 अप्रैल 2017

मेरा ड्राइविंग लाइसेन्स

मेरे ‘टू ह्वीलर्स & फ़ोर ह्वीलर्स’ ड्राइविंग लाइसेन्स को पिछले ३५ वर्षों में किसी परिवहन अधिकारी ने सड़क पर चेक नहीं किया क्योंकि मैंने कभी भी ऐसी नौबत नहीं आने दी. पिछली बार, सन 2012 में मेरे गृहनगर हल्द्वानी के रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस (RTO) में 5 वर्षों के लिए नवीनीकरण हुआ था. उस बार मुझे किसी हील-हुज्जत के, या यों कहूं कि बिना लाइन में लगे, बिना सुविधा शुल्क (रिश्वत) दिए ही सफलता मिल गयी थी क्योंकि मेरे एक निकट संबंधी यहीं हल्द्वानी में विजिलेंस विभाग में S.P. थे. उन्होंने मेरी सहायतार्थ एक इन्स्पेक्टर को साथ में भेज दिया था. RTO ऑफिस में चाय पीते हुए सारा काम हो गया था.

इस बार मैं थोड़ा शंकित भी था कि इस कार्य में मेरी उम्र व्यवधान बन सकती है. मैं अब एक महीने बाद ७८ का हो जाऊंगा. हल्द्वानी के बेस अस्पताल (जिसका प्रमाणपत्र उत्तराखंड परिवहन विभाग में मान्य होता है) में मेरी शारीरिक क्षमता तथा ज्ञानेन्द्रियों की तपास करने के बाद सब प्रकार से ‘फिट’ घोषित होने के बाद मैं प्रमाणपत्रादि लेकर RTO ऑफिस चला गया. ये मार्च 31 का दिन था. सरकारी कारोबार में साल का आख़िरी दिन होने से कार्यालय परिसर में बला की भीड़ थी. वाहन एवं वाहन मालिकों का हुजूम होने से मुझे अपनी गाड़ी दूर सड़क पर जाकर पार्क करनी पड़ी. उस मेले जैसे माहौल में अपने अपने काम से आये लोगों के अलावा ‘दलालों’ की टीम भी सक्रिय थी. दलाल की परिभाषा यह है कि वह सम्बंधित कर्मचारियों व अधिकारियों से सेटिंग रखता है, और सुविधा शुल्क लेता है. एक दलाल ने दूर से ही भांप लिया कि मुझे किसी की सहायता की दरकार है. वह मुझ से आकर बोला “खर्चा-पानी लगेगा. मैं करवा दूंगा, आपका लाइसेन्स रिन्युअल."

मुझे वहाँ गाइड करने वाला PRO का कार्यालय भी नहीं मिला. बिल्डिंग की बाहरी खिड़कियों पर दोपहर की चिलचिलाती घूप में वाहन मालिकों, टैक्सी ड्राइवरों, रजिस्ट्रेशन कराने वालों या कागजात ट्रांसफर कराने वालों की लम्बी लम्बी लाईनें, तथा फीस जमा कराने वालों की धक्का-मुक्की देखकर मेरे पास दलाल से ‘हाँ’ कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.  

वर्षों पहले से एक मिथक दिमाग में रहा है कि RTO का मतलब भ्रष्टाचार का बोलबाला. कई बार समाचारों में पढ़ा भी है कि छापामारी में कई लोग पकड़े जाते रहे हैं, पर फार्मूला भी हमेशा रहा है कि "रिश्वत लेते पकड़े गए और रिश्वत देकर पाक साफ़ हो गए."

मुझे सन 2007 के रिन्युअल का दिन भी याद है. मैंने सम्बन्धी क्लर्क को सीधे सुविधा शुल्क देकर ‘मित्रता?’ कर ली थी. बातों ही बातों में मालूम हुआ कि इस ‘मलाईदार’ पोस्ट से उसका ट्रांसफर अल्मोड़ा RTO ऑफिस को हो रहा था. वह बड़े आहत स्वर में मुझे बता रहा था कि “अल्मोड़ा ऑफिस में कोई कमाई नहीं है. अपने वेतन से ही गुजारा करना पड़ेगा.”

मैं यह नहीं कहूंगा की हर सरकारी कर्मचारी बेईमान होता है, सच तो ये है कि हम हिन्दुस्तानियों के जींस में बेईमानी बस गयी है. एक ट्रक के पीछे जुमला लिखा था, "सौ में से नियानाब्बे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान." चुनावों में जीत कर आने वाली सभी पार्टियों के नेता ऊंचे ऊंचे स्वरों में कहा करते हैं, "भृष्टाचार को ख़तम कर देंगे." लेकिन ये जुमले थोड़े दिनों में भुला दिए जाते हैं. लोकतंत्र को सबसे अच्छी शासन व्यवस्था कहा जाता है, पर चुनाव जीतने के लिए अनाप-सनाप खर्चा होता है, जिस पर कानूनी लगाम बेअसर है. राजनीति एक व्यापार बन गयी है; निवेश करके पांच साल में कई गुना वसूली का लक्ष्य रहता है. आंकड़े बताते हैं कि जीतने वालों की परिसंपतियों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो जाती है. दूसरा कारण है, "ठेकेदारी प्रथा." हर ठेके के व्यापार में सिस्टम इतना बिगड़ चुका है कि कमीशन की रेट तय हैं. जिनका बँटवारा संतरी से लेकर मंत्री तक ऑटोमेटिक पहुँचता है. दलाल तो गुड़ की मक्खी की तरह दौड़े चले आते हैं. जब खून मुंह लग जाता है तो लोई उतर जाती है. ये सिर्फ परिवहन विभाग की बात नहीं है, लोक निर्माण विभाग और राजस्व विभाग का और भी बुरा हाल है.

बहरहाल मेरा ड्राइविंग लाइसेन्स अगले पांच सालों के लिए रिन्यू हो गया है, शायद ये आख़िरी रिन्युअल भी हो.
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रविवार, 26 मार्च 2017

ठग्गूराम [किशोर कोना]

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि स्वनामधन्य स्व. काका हाथरसी ने अपनी एक सुन्दर और यथार्थ विरोधाभाषी नामावली कविता के रूप में लिखी है, पर मेरे इस लेख का हीरो ठग्गूराम ठीक इसके उलट ‘मनसा वाचा कर्मणा’ अपने नाम को सार्थक करता है.

यह सही है कि कोई सीधासाधा या बुद्धू व्यक्ति ठगी नहीं कर सकता है. ठग बहुत चालाक व तुरतबुद्धि वाला प्राणी ही हो सकता है. दुनिया भर में अनेक बड़े बड़े कॉनमेन (ठग) लोगों के किस्से लिखे-पढ़े या सुने जाते हैं. हमारे देश में ‘नटवरलाल’ शब्द अब ठगी का पर्याय माना जाने लगा है. ठग शब्द अब आक्सफोर्ड डिक्शनरी में भी स्थान पा चुका है. परंतु अंग्रेजी में thug की परिभाषा कुछ अलग ही है. Thug का मतलब होता है, गुंडा, बदमाश, चोर, या मुजरिम. हम यहाँ पर हिंदी वाले ठग की चर्चा करेंगे.

ठगों की वाणी व बोलने का लहजा इतना प्यारा और मनमोहक होता है कि वह सामने वाले के अंत:करण को छू कर अपने वश में कर लेते हैं. ठगे गए व्यक्ति को ठगी का अहसास बहुत देर से होता है, और उसकी टीस लम्बे समय तक सालती रहती है. ठगों के झंडे व्यापार, साहित्य, या राजनीति में तो गढ़े ही हैं, इनके कारनामे नाटकों और फिल्मों में भी उजागर किये जाते हैं.

हाँ, तो मैं जिस ठग्गूराम के बारे में बता रहा था वह हमारे जिला नैनीताल के एक गाँव ज्योलीकोट का रहनेवाला था. गरीब के घर पैदा हुआ था, पर बचपन से ही इस कला में प्रवीण हो गया था. स्थानीय लोग उसके बारे में बड़े चटखारे लेकर चर्चा किया करते थे. एक घटना कुछ वर्ष पुरानी है. हल्द्वानी नगर निगम से जुड़े काठगोदाम बस्ती में एक मधुशाला (शराब की दूकान) पर एक अनजान सूटेड-बूटेड व्यक्ति ने इस कदर शराब पी कि लड़खड़ाकर वहीं सड़क पर लुढ़क गया. जैसा कि इस प्रकार के दृश्य में अकसर होता है, तमाशाईयों ने खूब मजा लिया. शराबी के हाथ में नोटों की गड्डी और बगल में एक ब्रीफकेस सबको दिख रहा था. शराब तो शराब ही होती है, और जब कोई व्यक्ति ‘नीट’ पिएगा या अपने हाजमे से ज्यादा पी जाएगा तो बेहोश होकर सड़क या नाली में लुढ़केगा ही.

ठग्गूराम भी संयोगवाश शराब की तलब में उधर आ पहुंचा, और उसे देखते ही सारा माजरा समझ गया. खड़े लोगों को धकेलते हुए विलापी स्वर में जोर से बोला, “चचा ! ये क्या हाल बना रखा है, इस तरह बेशर्मों की तरह पड़े हो, उधर चाची का रो रो कर बुरा हाल हो रहा है, बच्चे परेशान हैं.”

ठगगूराम का नाटक सभी को असली लगा और लोगों ने सहयोग करके एक रिक्शा लाकर उसमें उस शराबी को लिटा दिया, जिसे लेकर ठग्गूराम चलता बना. अगले दिन सबको मालूम हुआ कि शराबी का भतीजा बन कर आने वाला कोई ठग था, जो एकांत में ले जाकर उसकी जेब साफ़ करके सामान सहित रफूचक्कर हो गया. शराबी को बड़ा सबक मिल गया, पर सांप के निकल जाने के बाद सड़क पीटने से कुछ नहीं होता है.

ठगी कुछ लोगों का स्वभाव हो जाता है, पर ये बहुत बुरी बात है. अगर कोई ठग पकड़ में आ जाता है तो उसको कड़ी सजा मिलती है.
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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

बैठे ठाले - १७

हर शहर की अपनी अपनी खासियत होती है, पर जो बात लखनऊ में है, वह कहीं और नहीं है.

अयोध्या से महज 40 मील दूर ये शहर राम जी के छोटे भाई लखन जी के नाम से है, ऐसा पौराणिक गल्पों पर विश्वास करने वाले लोग मानते हैं. मध्य काल में जब अवध के नवाबों की तूती बोलती थी तो गोमती नदी के तट पर बसे इस शहर को पूरब का कुस्तवनतुनिया या शिराजे-हिन्द भी कहा जाता था. इतिहास में दर्ज है कि इसे सर्वप्रथम नवाब आसिफुद्दौला ने अवध की राजधानी बनाया था.

इस शहर के विकास व सांस्कृतिक विरासत का विहंगम वर्णन करने बैठेंगे तो एक विराट पुस्तक बन जायेगी. यहाँ के शिया नवाबों ने विनम्र शिष्टाचार तथा व्यवहार में नफासत को नए आयाम दिए, खूबसूरत उद्द्यान बनवाये, उच्च कोटि की शायरी व नृत्य-सगीत को पूर्ण संरक्षण दिया. जिसे आज हम गंगा-जमुनी संस्कृति कहते हैं, उसे पोषित किया. जिसके तहत अनेक साहित्यकार, शायर/कवि, व शास्त्रीय संगीत/गायकी के बड़े नाम लखनऊ के साथ जुड़े हुए हैं. भारतीय सिनेमा पर भी लखनवी छाप यादगार है. अगर आप भी कभी लखनऊ सैर को निकले हों तो आपको शामे-अवध की गजरों की खुशबू, टिक्का कबाब का स्वाद, वहाँ की ऐतिहासिक छोटे-बड़े इमामबाड़े, और रूमी दरवाजा, अवश्य भाये होंगे और आधुनिक उभरते हुए लखनऊ की ऊंची इमारतें, अम्बेडकर स्मारक - मायावती के हाथियों की जमात, रेलवे स्टेशन, अमोसी एरोड्रम आदि सब मिलाकर एक सपना सा अवश्य लगा होगा.

यों आज का लखनऊवासी उत्तरप्रदेश के अन्य शहरों के निवासियों से कतई अलग नहीं लगते हैं क्योंकि ये अब मैट्रोपॉलिटन सिटी बन गया है. पर मुझे यहाँ की पुरानी तहजीब पर ये जुमला/लतीफा बहुत पसंद है:

फन्ने खां बड़े किस्मत वाले थे कि उनको ससुराल लखनऊ में मिला. जब वे पहली बार वहाँ गए तो बड़ी आवभगत हुई. सासू माँ (खाला) बोली, “दामादजी, आपकी पसंद चाहती हूँ. खाने में सब्जी क्या बनाऊँ? आपके लिए बैगन-शरीफ पका लूं या भिन्डी-मुबारक या फिर आप पालक-पाक खाना पसंद करेंगे?”
फन्ने खां ने उसी अंदाज में जवाब दिया, “खाला, मैं तो बेरोजगार आदमी हूँ. इन मुक़द्दस सब्जियों के नाम लेने के काबिल भी नहीं हूँ. आप ऐसा कीजिये कोई बेगैरत-आवारा सा मुर्गा ही पका लीजिये.”

यों ‘पहले आप – पहले आप’ की विनम्रता का अंदाज आज भी लखनऊ वालों में मौजूद है, और ऐसा कहते हैं कि इसी हुजूरी में उनकी अकसर ट्रेन छूट जाती है.

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शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

लाखों सपनों का शहर - कोटा

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के हाड़ौती इलाके में बसा हुआ 900 वर्ष पुराना कोटा शहर पिछले 30 वर्षों के अंतराल में पुरानी राजशाही चौहद्दी से बाहर निकल कर एकाएक ‘एजुकेशन हब’ के रूप में विकसित हो गया है, और अनपेक्षित रूप से फ़ैल भी गया है. यहाँ पर बिजली, पानी, रेल व सड़क यातायात की सुविधा सब इफरात से प्राप्य है. आज एक लाख से अधिक संख्या में लड़के लड़कियां अपने भविष्य के बड़े बड़े सपने संजोकर यहाँ के छोटे-बड़े दर्जनों कोचिंग-इंस्टीट्यूट्स में सुबह-शाम अलग अलग पारियों में फिज़िक्स, कैमिस्ट्री, बायोलजी/ मैथ्स की पढ़ाई करके अपने सपने सच करने के लिए दिन रात व्यस्त रहते हैं. कुछ कोचिंग संस्थान ‘प्राईवेट लिमिटेड’ भी हो गयी हैं. बंसल, ऐलन, रेजोनेंस, मोसन, कैरिअर पोंइट्स, व्हाईब्रेंट आदि अनेक बड़े नाम हैं, जिन्होंने अनुभवी तथा ब्रिलियंट एकेडेमिक कैरियर वाले प्राध्यापक नियुक्त किये हुए हैं. पढ़ाई का स्तर निश्चित रूप से सामान्य से ऊपर होगा. परीक्षापयोगी विषय ‘कैप्स्यूल’  बना कर विद्यार्थियों को परोसे जाते हैं. सफलताओं के बड़े बड़े विज्ञापन अखबारों में व होर्डिंग्स में देखने को मिलते हैं. इसलिए देश के अन्य प्रान्तों से भी बच्चे यहाँ आने को लालायित रहते हैं, तथा बड़ी बड़ी कोचिंग फीस सहन करते हैं.

ये बात भी सही है कि इस संस्थानों का ये एक बड़ा व्यापार बन गया है. सालाना फीस एक लाख से अधिक वसूली जाती है. इनकी आलीशान बिल्डिंगें, तामझाम व आवरण देखकर ही समझ में आता है कि खर्चों से कहीं अधिक आमदनी हो रही है.  फीस पर कोई सरकारी या गैरसरकारी नियंत्रण ना होने से अवश्य मनमानी होती रही है. आलम ये भी है की अधिक कमाई के उद्देश्य से कुछ संस्थानों द्वारा अपनी ब्रांचेज (दूकानें) राजस्थान के अन्य शहरों में खोली जाने लगी हैं. इस ‘ट्यूशनराज’ के बारे में गत वर्षों में बहुत आलोचनाएँ और गंभीर चिंतन होते रहे हैं क्योंकि ग्रामीण अंचलों के विद्यार्थी या आर्थिक विपिन्नता वाले परिवारों के बच्चे इस सुविधा से वंचित रहते हैं. ये भी है कि लाखों में से कुछ प्रतिशत बच्चे अपेक्षित प्रतियोगी परीक्षाओं में बाजी मारते हैं. शेष हताशा के शिकार होते हैं. आकड़े बताते हैं कि नाउम्मीदी के तथा निराशा के कारण हर साल कुछ विद्यार्थी आत्महत्या भी करते हैं. प्रशासन व राजनीतिज्ञ इसलिए चुप हैं कि इस ‘ट्यूशन लॉबी’ का बड़ा दबाव व आर्थिक प्रभाव इन पर है.

इन संस्थानों की कुछ उच्च माध्यमिक स्कूलों से सेटिंग भी चल रही है कि बच्चे 9वीं कक्षा से ही कोचिंग फीस देकर अपने स्कूलों में ना जाकर यहाँ आते हैं और स्कूलों में हाजिरी लगती रहती है.

माता-पिता, सब, चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, सी.ए., या कलेक्टर बन जाएँ, और इसके लिए वे अपना सर्वस्व दाँव पर लगाने को तैयार रहते हैं. कुछ लोग सौभाग्यशाली अवश्य होते हैं, पर ये उपलब्धि कोचिंग के बिना भी संभव रहती थी. अब समय की सुई पीछे को नहीं घूम सकती है अत: इस सिस्टम का कोई विकल्प आम लोगों के पास नहीं है.

कोटा शहर के कुछ विशिष्ठ खण्डों में बहुमंजिली इमारतें बन गयी हैं जिनमें सैकड़ों की संख्या में हॉस्टल व भोजन-मैस का कारोबार हो रहा है. लोगों ने किराए के लालच से अपने घरों में भी छोटे पार्टीशन देकर कमरे किराए पर दे रखे हैं. हर गली/गेट पर ‘to-let’ का बोर्ड लटका हुआ नजर आता है.

फूहड़ सिनेमा-स्कोप को दोष दें या उम्र व संस्कारों का दोष मान कर चलें, यहाँ गार्जियनशिप के अभाव में कुछ लड़के लड़कियां मनमानी करते हैं. इनके माँ-बाप समझते होंगे कि ‘बच्चे पढ़ रहे होंगे’ पर ये यहाँ पार्कों में या एकांत जगहों में प्रेम-लीला में व्यस्त रहते हैं. यदि ये बच्चे अपनी ज़िंदगी को बैलेन्स करके चलें तो ठीक है. नाबालिग़ बच्चों पर प्रशासन तथा शिक्षण संस्थानों को कोई निगरानी तंत्र की तुरंत व्यवस्था करनी चाहिए, अन्यथा बच्चों के हों या माता-पिता के, सपने यों बर्बाद नहीं होने चाहिए.
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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

ऐफिशेन्सी बार

"प्रथम सीमेंट वर्कर्स वेज बोर्ड" के तहत आने वाले समस्त कर्मचारियों के लिए ‘नॉमेंक्लेचर’ व तदनुसार ‘पे-स्केल’ श्री जी.एल. गोविल (तब एसीसी के सीनियर एक्जेक्युटिव) की सदारत में तैयार किये गए थे. मंथली-पेड स्टाफ के पे-स्केल में दस साल की सर्विस के बाद E.B. यानि ऐफिशेन्सी बार का प्रावधान रखा गया था. यदि कर्मचारी अपने काम में सक्षम नहीं हो तो इस प्रावधान के तहत उसकी वेतन वृद्धि पर रोक लगाई जा सकती थी. 

नियुक्ति पत्र के अनुसार मुझे हर साल १० रुपयों की मूल वेतन वृद्धि प्राप्त होती रही. जब ९ वर्षों के बाद E.B. पर पहुंचा तो मुझे वार्षिक वेतन वृद्धि नहीं दी गयी. मैं शिकवा-शिकायत लेकर तत्कालीन पर्सनल ऑफिसर श्री वीरेंद्र सिंह जी से मिला तो उन्होंने रूखा सा जवाब दिया कि “E.B. पर कंपनी कोई कारण बताये बिना वेतन वृद्धि रोक सकती है.” उन वर्षों में मुझे अपनी ड्यूटी के सम्बन्ध में या ड्यूटी के अलावा यूनियन आदि की एक्टिविटीज (खुराफातों) के लिए कोई नोट, वार्निंग या सजा नहीं मिली थी इसलिए मैं अपनी ‘ऐफिशेन्सी’ के बारे में ज्यादा सैन्सिटिव हो गया था. मैं असिस्टेंट मैनेजर (प्रशासन में नंबर २) स्व. धोतीवाला जी से मिला. वे बड़े सरल व सुहृद पारसी जेंटलमैन थे. मुझसे उनकी पूरी हमदर्दी थी, पर ऐसा लगा कि तब मैनेजमेंट में उनकी बात को कोई तवज्जो नहीं मिला करती थी. मेरी बात सुन कर वे बोले, “Why don’t you go to the labour court?”

मैंने अपनी शिकायत एक रजिस्टर्ड पोस्ट से लेबर कोर्ट (तब जयपुर में हुआ करता था) को भेज दी. बाद में तारीख पड़ी तो मैं ढूंढते हुए वहाँ पहुंचा. मैनेजमेंट की तरफ से श्री वीरेंद्र सिंह जी के साथ एक बुजुर्ग+खुर्राट एडवोकेट स्व. माथुर (उनका पूरा नाम अब मुझे याद नहीं है) वहाँ पहुचे थे. जज भी कोई बुजुर्ग व्यक्ति थे, जो हाई कोर्ट से रिटायर्ड थे. मेरे साथ कोई बहस नहीं हुई, पर मैनेजमेंट ने अगली पेशी से पहले मुझे एरियर सहित मेरा रोका गया ऐनुअल इन्क्रीमेंट दे दिया. बाद में मुझे मालूम हुआ कि मेरे उस प्रयास से अन्य 9 कर्मचारियों को भी लाभ मिला, जिनमें श्री बालकृष्ण सेनी (तब स्टोनोग्राफर), श्री गोपाल लाल महेश्वरी ड्राफ्ट्समेन, तथा अन्य थे. सबने मुझे धन्यवाद दिया, लेकिन मैनेजमेंट को अवश्य तकलीफ हुयी होगी. उसके तुरंत बाद सन 1970 में मेरा ट्रांसफर शाहाबाद, कर्नाटक को कर दिया गया. ट्रान्सफर में कई कारक थे, परंतु उनमें इस घटना का भी संयोग रहा था.
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मंगलवार, 17 जनवरी 2017

अच्छाई के तार दूर तक जुड़े रहते हैं (संस्मरण )

मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार श्री महेश चंदोला सन 1981 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके नौकरी की तलाश में मेरे पास लाखेरी आये तो स्वाभाविक रूप से सब तरफ नौकरी की संभावनाओं की तलाश की गयी. मेरे एक पूर्व परिचित श्री पुष्पेन्द्र सिंह जी तब सवाईमाधोपुर स्थित जयपुर उद्योग (साहू जैन का सीमेंट कारखाना) की फलौदी माईन्स में मैनेजर थे. उन दिनों मोबाईल/ टेलीफोन की कोई सुविधा नहीं हुआ करती थी अत: मैंने एक पत्र साधारण डाक से इस सम्बन्ध में लिख भेजा. उन्होंने तुरंत प्रत्युत्तर में महेश जी को इंटरव्यू के लिए बुलावा भेज दिया.

श्री पुष्पेन्द्र सिंह जी सन 1964-65 में लाखेरी की हमारी माइन्स में एक जूनियर ऑफिसर (असिस्टेंट क्वारी मैनेजर) हुआ करते थे. मेरी उनसे कोई घनिष्टता नहीं थी. उन दिनों मैं लाखेरी बहुधंधी सहकारी समिति का अवैतनिक महामंत्री था और वे मात्र 10 रुपयों के एक शेयर के खाताधारक थे. परेशानियां बोल कर नहीं आती हैं. एक रात में अचानक श्रीमती सिंह को ब्रेन हैमरेज हो गया. डॉक्टर मुखर्जी और एक दो अन्य ऑफिसर्स के साथ उन्होंने मेरा दरवाजा खटखटाया. अपनी आपदा बताते हुए तुरंत 1000 रुपयों की व्यवस्था करने की बात कही. एक हजार रूपये उन दिनों बड़े मायने रखते थे. जूनियर ऑफिसर्स को मात्र 250 रूपये वेतन मिला करता था. गंभीर परिस्थिति देख कर मैंने रात को ही समिति की तिजोरी खुलवाई, और अपने नाम से 1000 रुपयों का संड्री एडवांस लेकर उनको दिया. वे श्रीमती सिंह को ईलाज के लिए जयपुर लेकर गए. भगवत कृपा से उनको जल्दी स्वास्थ्य लाभ हो गया. कुछ दिनों के बाद लाखेरी लौटकर उन्होंने ये रकम लौटा दी. "A friend in need is a friend indeed" वाली बात उनके जेहन में अवश्य रही होगी इसलिए उन्होंने तुरंत कारवाही की. मैं स्वयं श्री महेश के साथ फलौदी माईन्स पहुंचा। उन्होंने हमें अपने आवास में ले जाकर श्रीमती सिंह के हाथों से बनाया भोजन कराया. उनका ये सत्कार अविस्मरणीय था. बाद में अपनी जीप में बैठा कर सवाईमाधोपुर प्रशासनिक कार्यालय में ले गये और इंटरव्यू के बाद श्री महेश चंदोला को ड्यूटी जॉइन करने को कह दिया.

पुष्पेन्द्र जी खानदानी व्यक्ति हैं. मैंने उनसे परिचय का लाभ अपनी सहकारी समिति के विधान संशोधन के दौरान उनके ससुर श्री राजा निरंजन सिंह जी से लिया था. वे राजस्थान कोऑपरेटिव सोसाइटीज के रजिस्ट्रार हुआ करते थे.

पुष्पेन्द्र सिंह जी बाद के वर्षों में मंगलम सीमेंट में  उच्चाधिकारी हो गए थे.

महेश चंदोला जी ने फैकट्री में घूमकर बिजली की वायरिंग्स और कनेक्शन की दुर्दशा देखी तो वहां जॉइन ना करने का निश्चय किया. सचमुच सब तरह से मिसमैनेजमेंट के चलते जयपुर उद्योग का भट्टा जल्दी बैठ गया. महेश जी को उसी बीच गुजरात सरकार के जॉइंट वेंचर वाले सीमेंट उद्योग नर्मदा सीमेंट में नौकरी मिल गयी थी, और अब बिरला सीमेंट उद्योग की एक यूनिट में चीफ इलैक्ट्रिकल इंजीनियर के बतौर कार्यरत हैं. उनके संघर्ष के दिनों में पुष्पेन्द्रसिंह जी द्वारा दिखाई सह्रदयता को वे भी नहीं भूले हैं.
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शनिवार, 7 जनवरी 2017

खिचड़ी, मकसूद भाई के घर की

1980s के अंतिम वर्षों में अगस्त का एक दिन हमारे लिए चिंताओं व खुशियों से भरा रहा. उस शाम महावीर नगर तृतीय, कोटा, में रहने वाले मकसूद भाई के घर की बनी खिचड़ी का स्वाद मुझे आज भी अच्छी तरह याद है. दुःख इस बात का भी है कि खिचड़ी बनाने वाली श्रीमती मकसूद अब इस दुनिया में नहीं है. उनको कुछ साल पहले जन्नत नसीब हो गयी है. मैं जब भी कोटा अपने बड़े बेटे के पास आता हूँ, अपने मित्र मकसूद अली से मिलना नहीं भूलता हूँ. घटना कुछ यों है:

मेरी नातिनी हिना जोशी, जो अब अमेरिका में डॉक्टर है, का जन्म होना था. बेटी गिरिबाला लाखेरी आ गयी थी. दामाद श्री भुवन जोशी तब उत्तराखंड में स्थित BEL में इंजीनियर थे. लाखेरी अस्पताल में हमारी लेडी डॉक्टर श्रीमती विमला जैन ने सलाह दी कि सुरक्षित प्रसव के लिए कोटा के किसी अच्छे मैटरनिटी हॉस्पीटल में जाना चाहिए. अच्छे की परिभाषा में उन्होंने झालावाड़ रोड स्थित बाहेती अस्पताल (अब मैत्री अस्पताल) का पता बताया. कोटा मेरा आना जाना कम ही होता था. ऐरोड्रोम सर्किल के आगे मैं कभी आया गया भी नहीं था. नयापुरा गुलाबबाड़ी में मेरे एक पुराने जिगरी दोस्त स्व. अरुण उपाध्याय का घर था/है. जब गिरिबाला जे.डी.बी. कॉलेज से बी.एस.सी. कर रही थी, तब स्व. श्रीमती शकुन्तला उपाध्याय उसकी लोकल गार्जियन थी. डॉ. शकुन्तला उपाध्याय वहीं पर हिन्दी की प्रोफ़ेसर हुआ करती थी. मगर इनका घर बाहेती अस्पताल से बहुत दूर था.

बाहेती अस्पताल के संथापक डॉ. बाहेती अनुभवी सर्जन थे और श्रीमती नीला बाहेती मानी हुई गानिकोलालिस्ट थी. उन्होंने सुरक्षित प्रसव के लिए सर्जरी की सलाह दी. तदनुसार जब एक गुड़िया का जन्म हुआ तो हम लोग तनाव व चिंताओं से मुक्त हुए.

उन दिनों बाहेती अस्पताल के आसपास बियावान था. कहीं चाय का खोमचा तक नहीं था. विज्ञान नगर के अन्दर जरूर बाजार/दुकानें होंगी, पर मुझे कोई ज्ञान इस सम्बन्ध में नहीं था. विज्ञान नगर में झालावाड़ रोड साइड पर लाखेरी के मेरे एक पूर्व परिचित भगवान सिंह राठोर (हेडमास्टर हरिसिंह जी के सुपुत्र) का घर था, जो पहले हमारी माईन्स में फोरमैन / असिस्टेंट क्वारी मैनेजर थे, और तब मंगलम सीमेंट में कार्यरत थे. कुछ समय पहले जामुल कारखाने में रहते हुए उन्होंने एक व्यक्तिगत संकट में मेरी मदद चाही थी, सो अपना समझ कर पूछते पूछते मैं उनके घर पहुँच गया. मुझे आज भी इस बात का दर्द है की उन्होंने घर में होते हुए भी मिलना उचित नहीं समझा. मैं निराश लौट आया था.

एरोड्रोम चौराहा काफी दूर था. तब आने जाने के साधन भी इस रूट पर नहीं के बराबर थे. सुबह मेरे दामाद कहीं दूर जाकर नाश्ते का सामान जरूर लेकर आये थे. शाम के लिए भोजन के इंतजाम की मुझे चिंता थी. मेरी श्रीमती व दामाद जी अस्पताल में थे, और मैं शाम होने पर पैदल पैदल महावीर नगर तृतीय की तरफ किसी लाखेरी वाले की तलाश में चल पड़ा. जिस चौराहे पर आज हर वक्त मेला सा रहता है, वहाँ एक साईकल रिपेयर वाली दूकान थी. मैंने उससे पूछा “यहाँ आसपास कोई लाखेरी वाला रहता है क्या?” उसने बताया “लाखेरी वाला एक मुसलमान रहता है.” और वह मुझे उसके घर तक ले गया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि वह और कोई नहीं मकसूद अली का घर था जो शाहाबाद, कर्नाटक में 'लाखेरी बंधु सहकार’ के मेरे साथी थे. वे अब कोटा आई.एल. में आ गए थे. उन्होंने मेरी आवभगत की. मैंने उनको वहां आने का मकसद बताया तो उनकी बेगम (लाखेरी के स्व. पीरमोहम्मद कुरैशी की बेटी) ने तुरंत बढ़िया खिचड़ी बनाई और मकसूद भाई ने अस्पताल तक पहुंचाई.
मकसूद भाई के घर की खिचड़ी हमारे लिए केवल एक भोजन ही नहीं, प्यार भरा तोहफा जैसा था. 

उसके बाद मैं पत्नी सहित लाखेरी लौट गया, परंतु बेटी व दामाद जब तक अस्पताल में रहे, करीब 8-10 दिन तक, मक़सूद भाई रोज उनके लिये खाना ले जाते रहे. उनके इस सौहार्दपूर्ण व्यवहार के लिए हमारे बेटी व दामाद भी उनके शुक्रगुजार है.
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