मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

यादों का झरोखा - ७


पाठक बंधु (स्व. नंदकिशोर एवं स्व.मदनगोपाल)
जिस तरह एक भागती हुयी रेलगाड़ी से पीछे के दृश्य छूटते चले जाते हैं वैसे ही लाखेरी में बिताये दिनों के अनेक सुहृद व्यक्तियों की छवि कई बार मेरे सामने आती है.

अकाउंट्स आफिस में कार्यरत दो पाठक बंधु जो शर्मा उपनाम लिखा करते थे स्व. नंदकिशोर व उनके अनुज स्व. मदनगोपाल; दोनों ही मधुरभाषी और अपने काम में माहिर थे. उन दिनों (१९६० में) कंप्यूटर नहीं होते थे. सारा लेखाजोखा मैनुअल हुआ करता था. अकाउंट्स आफिस एक व्यस्त विभाग होता था. सारे लेजर व वेजेज सीट तैयार करने से लेकर विभागों में जाकर कर्मचारियों को वेतन वितरण करना बाबुओं की ड्यूटी हुआ करती थी. अकाउंटेंट्स सर्वश्री जे.पी. गुप्ता, केशवदत्त अनंत, शरत बाबू (तिवारी), भगवती प्रसाद कुलश्रेष्ठ, प्रभुलाल महेश्वरी, जोबनपुत्रा, मो. इब्राहीम हनीफी आदि अनेक यादगार चेहरों के बीच ये दोनों भाई कम्पनी के अच्छे वर्कर्स में गिने जाते थे.

मूल रूप से झालावाड़ के ताराज गाँव के रहने वाले ये बन्धुद्वय सरकारी स्कूलों का अध्यापन छोड़कर आये थे. उन दिनों ए.सी.सी. का अच्छा वेतन+बोनस व अन्य सुविधाएं सभी को ललचाती थी, और फिर यहीं का होकर रह गए.

सभी पारिवारिक सुख प्राप्त इनके परिवार कालोनी में रहते हुए सभी सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल रहते थे.

नंदकिशोर जी का सुपुत्र प्रदीप पाठक (मैकनिकल इंजीनियर) ए.सी.सी. में ही नियोजित रहे. अब रिटायर होकर कोटा में बस गए हैं. चार पुत्रियाँ अपने अपने घरों में सुखी संपन्न हैं. मैं अपने रिटायरमेंट के बाद एक साल (२००० में) कोटा में अपने पुत्र डॉ. पार्थ के साथ रहा. एक बार नन्दकिशोर जी से मिलने उनके छावनी की घनी बस्ती में बने घर गया तो वे लपक कर गले लग गये, इतना प्यार व अपनापन था.

स्व. मदनगोपाल जी का सुपुत्र अरविन्द, वर्तमान में श्री सीमेंट (ब्यावर) में जनरल मैनेजर, तथा छोटा प्रवीण कोटा के न्यायालय में रीडर के रूप में कार्यरत है. पुत्री अपने सुखी संपन्न ससुराल में है. ये सभी बच्चे मेरे बचपन के दोस्त व मेरे बच्चों के सहपाठी रहे हैं.

स्व. वेदप्रकाश भारद्वाज के अनुज नलिन भारद्वाज (एयर फ़ोर्स) की सुपुत्री अरविन्द की अर्धांगिनी है. इस प्रकार ए.सी.सी. से जुड़े इस परिवार की जड़ें खूब गहरी हैं और वंशबेल बहुत लम्बी व पुष्पित है. मैं अपने इस ग्रुप लाखों के लाखेरियन की तरफ से इनको अनेक शुभ कामनाएं देता हूँ.

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रविवार, 17 दिसंबर 2017

यादों का झरोखा - 6


स्व. श्री गेंदालाल शर्मा
‘लाखेरी दर्शन’ फिल्म बनाने वाले मुख्य किरदार प्रिय पवन शर्मा के नानाजी स्व. गेंदालाल शर्मा एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके बारे में यदि मैं कहूं कि वे सज्जनता की प्रतिमूर्ति थे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. वे मेरे लाखेरी आने के कुछ समय बाद सन १९६१ या ६२ में एक टाइपिस्ट के पद पर ए.सी.सी. में भर्ती हुए थे. मूल रूप से आगरा के रहने वाले थे, पर लाखेरी में किस स्रोत से उनका पदार्पण हुआ मुझे ज्ञात नहीं है. वे अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं की टाइपिंग तथा शार्टहैण्ड लेखन में माहिर थे. उनकी गंभीर कार्यशैली और काम के प्रति समर्पणभाव से जूनियर पद से कई प्रमोशन पाते हुए प्लांट हेड के सेक्रेटरी बने और ९० के दशक में सम्मान पूर्वक रिटायर हुए.

मैंने कोआपरेटिव सोसाइटी के सेक्रेटरी/चेयरमैन के पद पर रहते हुए प्रशासनिक मामलों में हमेशा उनकी सलाह/सेवाएँ ली थी. मेरी एक लघु पुस्तिका ‘माँ के पत्र’ (किशोर बेटियों के ज्ञानार्थ) का उन्होंने टाइपिंग/सम्पादन भी किया था.

पारिवारिक जीवन में उन्होंने अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा का मानदंड रखा. उनका बड़ा बेटा राजेन्द्र माइनिंग इंजीनियर है, जो कि कोल इंडिया में सीनियर अधिकारी के रूप में कार्यरत है. बिचला बेटा मुकेश जयपुर में मेडिकल की तयारी कर रहा था, परन्तु दुर्भाग्यवश, बाद में उसकी खबर नहीं मिली. छोटा बेटा नरेंद्र (मैकेनिकल इंजीनियर) आगरा में अपना खुद का व्यवसाय करता है. बेटी श्रीमती निर्मला शर्मा (अध्यापिका) हैं; इनका ही सुपुत्र पवन शर्मा है जो फिल्ममेकिंग टेक्नोलोजी की डिग्री लेकर इस फील्ड में अच्छा नाम कमा रहा है. इन्होने हाल में ‘लाखेरी दर्शन’ नाम से एक यादगार फिल्म बनाई है, जो यू ट्यूब पर भी उपलब्द्ध है. इसमें लाखेरी से सम्बंधित सामाजिक, सांस्कृतिक, व भौगोलिक जानकारी मिलती है. मुझे विशेष प्रसन्नता इस बात पर है कि इस फिल्म को बनाने की प्रेरणा उन्होंने मेरे लिखी पुस्तक ‘लाखेरी पिछले पन्ने’ से भी ली है. मैंने फिल्म देखकर उनको इस पुस्तक के सफल समायोजन के लिए अनेक शुभ कामनाएं दी हैं.

परिवार के इस सदस्य की इस सफलता के पीछे स्व. गेंदालाल शर्मा जी का अप्रत्यक्ष आशीर्वाद ही है. हम उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते हैं.
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बुधवार, 13 दिसंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - १०

Grapevine: The Christmas Capital of Texas

अभी यहाँ के मुख्य त्यौहार के आने में १०-१५ दिन शेष हैं, पर उसके स्वागत की तैयारी एक महीने पहले से ही बड़े जोर शोर से हो रही है. घरों-बाजारों में अन्दर-बाहर सर्वत्र सान्ताक्लाज छाये हुए हैं. क्रिसमस ट्रीज सितारों से सजे हुए हैं. शाम होते ही नयनाभिराम नज़ारे सामने आते हैं. क्यों ना हो? यहाँ पर ईसा का धर्म मानने वालों की जनसंख्या ७५% से अधिक है. यद्यपि ये लोग भी अन्दुरुनी रूप से बंटे हुए समाज की वजह से उपासना के लिए अपने अपने अलग अलग चर्चों में जाते हैं, पर पैगम्बर क्राइस्ट के प्रति श्रद्धाभाव व अटूट विश्वास सबका एक जैसा है. पवित्र धार्मिक ग्रन्थ, बाइबिल, सबके लिए ‘बाइबिल’ है. उसमें कोई विवाद नहीं है.

ग्रेपवाइन शहर डलास का सबर्ब है, जो एक खूबसूरत विकसित शहर है. उसके डाउन-टाउन (केंद्र) में जो बाजार है, उसे ईस्टर के बाद से ही विशिष्ट ढंग से सजाया जाता है. क्रिसमस पर यहाँ सारे होटल/इन व रिसोर्ट पर्यटकों से भर जाते हैं. दूर दूर से लोग यहाँ छुट्टियां मनाने पहुँच जाते हैं इसीलिये इस शहर को ‘क्रिसमस कैपिटल आफ टेक्सास’ भी कहा जाता है.

अमेरिका में अधिकांश जगह वैसे तो दूर दूर तक कहीं भी आदमजात चलते फिरते नजर नहीं आते हैं, केवल कारों- मोटर गाड़ियों के काफिले सडकों पर चारों दिशाओं में भागते नजर आते हैं, लेकिन हमने देखा कि ग्रेपवाइन के व्यस्त बाजार तथा मनोरंजन पार्क में असंख्य लोग अपने नन्हे-मुन्नों के साथ घूम रहे थे. जिसे देखकर मुझे कोटा का दशहरा मेला याद आ रहा था; फर्क इतना था कि कोटा में आप धूल धक्कड़ से परेशान हो जाते हैं, परन्तु यहाँ कोई प्रदूषण नहीं है. बच्चों के लिए झूलों से लेकर टॉयट्रेन व विविध प्रदर्शनियां, खेल-खिलोने, और लम्बी श्वेत दाढ़ी व लाल नुकीली टोपी वाले बाबा शान्ताक्लाज के जलवे.

इस स्थान का नाम ग्रेपवाइन इसलिए पड़ा था कि यहाँ सब तरफ अंगूरों की लताएँ हुआ करती थी. सन १८४३ में यहाँ एक आर्मी कैम्प लगा तभी इसको यह नाम दिया गया. इस शहर से लगा हुआ एक वृहद आकार का सरोवर है, जो पीने के पानी का स्रोत, मत्स्य-आखेट, तथा जलक्रीडा, व कैंपिंग के लिए प्रसिद्ध है. एक sea-life aquarium (मछली घर) भी पर्यटकों का आकर्षण है.
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बुधवार, 6 दिसंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - 9

Turner Falls  (झरना )
हमारे भारत देश में ६ ऋतुएँ होती हैं और उनका स्वभाव व प्रभाव बहुआयामी होता है. यहाँ अमेरिका में भी साल में चार ऋतुएं- सर्दी, बसंत, गरमी, व पतझड़- होती हैं. आजकल मैं डलास, टेक्सास में हूँ. यहाँ सर्दी और गरमी बहुत ज्यादा होती है. ऐसा लगता है कि यहाँ सर्दी में बेहद ठण्ड और गर्मी में बेहद ऊष्ण होने की वजह से अतीत में बहुत कम बसावट रही होगी. अब भी यहाँ गाड़ी, घर, दूकान-मॉल, या किसी भी रिहायसी जगह का ए.सी. (एयर कन्डीशनर) के बिना होने की कल्पना नहीं की जा सकती है. यहाँ बारिश का अलग से मानसूनी मौसम नहीं होता है. छः महीने wet व छः महीने dry रहता है. मौसम में बहुत उतार चढ़ाव होता है, परन्तु मौसम विभाग की विशेषता यह है कि उसकी भविष्यवाणी  (इतने बजकर इतने मिनट पर आपके इलाके में होगी) सटीक ही होती है.

मैंने देखा है कि यहाँ भी मध्यम दर्जे के पहाड़ तथा झीलों की कमी नहीं है. टेक्सास में बड़ी-बड़ी झीलें भी मानव निर्मित हैं. और जहां भी थोड़ी प्राकृतिक सौन्दर्य वाली या अजूबी जगह होती है, उसे संवार कर दर्शनीय बना कर रखा जाता है.

हमारे देश में भी प्राकृतिक सुन्दरता वाली अनेक जगहें हैं. मैं अपने उत्तराखंड की ही बात करूँ तो वहां सदाबहार जंगल, झरने, ताल-तलैया व अजब-गजब गुफाएं मौजूद हैं, परन्तु अधिकांशतया उनको संवारा नहीं गया है, और ना वहाँ जाने की सड़कें या साधन उपलब्ध हैं.

यहाँ अमेरिका में ऐसी सभी जगहों को पिकनिक स्पॉट बना रखा है. बड़े क्षेत्रफ़ल वाले इलाकों को स्टेट पार्क घोषित करके वहां पर्यटकों के लिए उचित प्रबंध किये गए हैं. इनका प्रचार प्रसार व जानकारी इंटरनेट पर भी उपलब्ध होती है. गत सप्ताह हम इसी तरह के एक आकर्षण, टर्नर फाल्स, को देखने गए थे. यह एक झरना है, जो ओकलाहोमा राज्य के अन्दर डेविस शहर से १५ किलोमीटर दूर आर्वेकल पहाड़ों की गहराई में हनी क्रीक (गधेरा) से बनता है. इस क्रीक की जड़ में ७७ फीट ऊँचाई से गिरते झरने ने एक तलैया (पूल) बनाया है, जिसका निर्मल जल आगे बहता जाता है. पूल के किनारे पुलिया बनी है, और पर्यटकों के लिए अनेक बड़े टेबल-बेंच व अन्य प्रसाधनों की व्यवस्था की गयी है. पहाड़ी के निचली पायदान पर सड़क के ऊपर ब्रिटिश स्टाईल के पत्थरों के छोटे छोटे कैसल (किले) बने हुए हैं.

घाटी के ऊपर एक छोटा रोप-वे देकर इस स्थान को और भी रमणीय बनाया गया है. इस पूरे १५०० एकड़ इलाके को ‘टर्नर पार्क’ नाम दिया गया है, जिसमें सुरक्षा के लिए हर वक्त पुलिस का इंतजाम रहता है. बताया गया कि ऑफ सीजन (सर्दियों) में इसके प्रवेश टिकटों के दाम आधे कर दिए जाते हैं.

भुवन और गिरिबाला के साथ मैंने और मेरी श्रीमती ने इस पार्क में जाकर पिकनिक का पूर्ण आनंद लिया, और आपको भी घर बैठे आँखों देखा हाल बताने पर खुशी हो रही है.
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मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - ८

Winstar casino (जुआघर)
टेक्सास राज्य की उत्तर दिशा में ओकलाहोमा नामक राज्य है, वहाँ के कुछ दर्शनीय स्थलों को देखने लिए जब हम डलास से चले तो सर्वप्रथम बॉर्डर पर ही दुनिया का सबसे बड़ा ‘कैसीनो’ मिला, जिसकी स्थापना सन २००३ में हुई और विस्तार २०१३ में किया गया. कहते हैं कि अमेरिका में हर चीज ‘किंग-साईज’ में होती है. यह बात इस कैसीनो पर भी लागू होती है. इतना बड़ा और विविध है कि आप चलते चलते और देखते देखते ही थक जायेंगे.

भौतिकवाद के भोगों से ऊबकर, बहुत से अमरीकी आध्यात्म की ओर रुझान किये हुए हैं इसलिए भारत देश से आये हुए ‘गुरुओं’ की यहाँ बहुत मान्यता है. लेकिन अधिकाँश अमेरिकावासी "eat drink and be merry"  के आदर्श पर चल रहे हैं. यहाँ रिटायरमेंट की कोई उम्र तय नहीं है. जब तक काम कर सकते हो करते रहो. बुढ़ापे के लिए किसी बचत की फ़िक्र नहीं होती है क्योंकि सोशल सेक्युरिटी के तहत वृद्ध जनों के लिए बेसिक जरूरतों की व्यवस्था है. यह इसलिए कि काम करते हुए इनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा सरकार टैक्स के रूप में वसूलती रहती है. कुल मिलाकर यहाँ के नागरिकों की लाइफ स्टाइल हम हिन्दुस्तानियों से बिलकुल अलग है.

अपने देश में जुआ, सट्टा व मटका पूर्णरूप से प्रतिबंधित है, पर यहाँ अमेरिका में ऐसा नहीं है. लास वेगस एक पूरा बड़ा शहर तो जुआघरों के लिए ही प्रसिद्ध है. दूर दूर से शौक़ीन लोग वहां जाकर अपना भाग्य अजमाया करते हैं. कुछ जीतते भी होंगे, पर जुआ तो जुआ है, सभी जुआरी अंतत: ख्वार हो जाते हैं ऐसा कहा जाता है. यह एक लत भी है, और जिनके पास अकूत संपत्ति है, उनके मनोरंजन का साधन भी है.

महाभारत की कथा के मूल में झगड़े की जड़ जुआ ही बताई गयी है, पर तब वह चौपड़ के नाम से कौड़ियों से खेला जाता था. अब दुनिया भर में जो जुआ होता है, वह ताश से लेकर इलैक्ट्रोनिक मशीनों द्वारा नए नए स्वरूपों में खेला जाता है.

विनस्टार कैसीनो एक बड़ी ऊंची व लम्बी-चौड़ी बिल्डिंग में एक छत के नीचे है जिसमें खेलने के लिए ७४०० मशीनें लगाई गयी हैं. खिलाड़ियों (जुआरियों) के पीने+खाने के लिए बीच बीच में रेस्टोरेंट, डाइनिंग हाल, स्पा व बुटीक दिन रात खुले रहते हैं. आकर्षण के लिए विश्व के विभिन्न बड़े शहरों के नाम से ‘प्लाजा’ अलग अलग अंदाज में उनके प्रतीक चिन्हों व कलाकृतियों से सजाये गए हैं. जैसे न्यूयॉर्क में स्टेचू आफ लिबर्टी, पेरिस में एफिल टावर, पेकिंग में ड्रेगन आदि. इंडिया का यहाँ कोई प्लाजा नहीं है.

ये जुआघर चौबीसों घंटे खुला रहता है. बाहर दोनों तरफ हजारों गाड़ियों की पार्किग के लिए खुले मैदान हैं. बगल में विनस्टार होटल की सत्रह मंजिला इमारत है, जिसमें १३९५ कमरे ग्राहकों के लिए उपलब्ध रहते हैं. पीछे इन्हीं का गोल्फ का मैदान है. हमने देखा अनगिनत लोग मशीनों के इर्द सिगरेट व शराब की चुस्कियां लेते हुए मस्त और व्यस्त थे. यहाँ साप्ताहिक पोकर टूर्नामेंट भी होते रहते हैं.

मेरा विशेष आकर्षण बिल्डिंग के चारों तरफ पैंजी के रंग बिरंगे फूलों की क्यारियाँ भी रही. बाहर भी एक अनुपम नजारा था. मैंने अपनी यादगारी के लिए बाहर फूलों के साथ व अन्दर कैसीनो मशीन पर अपनी फोटो अवश्य खिंचवाई है. मुझे इस खेल के तौर तरीकों की  कोई जानकारी नहीं है; हाँ सन १९७२ में मैंने एक रूपये के लाटरी टिकट पर १० रूपये का इनाम अवश्य पाया था, सनद रहे.
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सोमवार, 4 दिसंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - ७


टेक्सास वूमंस युनिवर्सिटी (TWU)
कहा जाता है कि यूनाइटेड स्टेट्स में भी प्रजातंत्र को पूरी तरह से स्थापित होने में लगभग दो सौ वर्ष लगे थे. अब यहाँ की कई विशेषताओं में से एक ये है कि स्त्री तथा पुरुष के अधिकार व कर्तव्य के क्षेत्रों में कोई लिंग भेद नहीं है. महिलायें हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चला करती हैं, चाहे वह राजनीति हो, शिक्षा हो, या कोई अन्य क्षेत्र; इसका कारण १००% शिक्षित होना है. १२वीं कक्षा तक सबकी पढ़ाई बिना फीस के होती है. कॉपी-किताबें भी स्कूल से मुहय्या की जाती हैं. भारत की तरह स्कूलिंग में कोई व्यापारिक दृष्टिकोण नहीं है, हालाँकि यहाँ पर भी पैसे वालों के लिए प्राइवेट स्कूल होते हैं. जो कोई अपने बच्चों को स्कूल में नहीं भेजता या होम-स्कूल नहीं करता है, उसे सजा मिला करती है.

उच्च शिक्षा के लिए जागरूकता इस बात से जाहिर होती है कि यहाँ हर उम्र के लोग कॉलेजों में पढ़ने जाया करते हैं. कई लोग जो किसी आर्थिक या पारिवारिक विवशता के कारण कम उम्र में पढ़ाई नहीं कर पाते हैं, या अपना फील्ड बदलना चाहते हैं, या स्वयं का विकास करना चाहते हैं, वे किसी भी उम्र में यूनिवर्सिटीज में दाखिला ले सकते हैं, और उन्हें हर तरह का प्रोत्साहन दिया जाता है.  

टेक्सास वूमंस युनिवर्सिटी, अमेरिका की एक नामी संस्थान है, जो डेंटन शहर में २७० एकड़ जमीन में स्थापित है, इसके दो हेल्थ साइन्स वाले ब्रांच भी हैं, जो डेलास व ह्यूस्टन में स्थापित हैं. इस युनिवर्सिटी की स्थापना सन १९०१ में कुछ अग्रणीय महिला संगठनों ने की थी. इसकी प्रसिद्धि नर्सिंग एजुकेशन, हेल्थ केयर प्रोसेसिंग, न्यूट्रीशन के अलावा आर्ट, साइंस, तथा बिजनेस के समस्त विषयों में है. सन १९९३ के बाद इसे को-एजुकेशन के लिए भी खोल दिया गया. वर्तमान में १५,००० स्टूडेंट्स इसमें पढ़ाई कर रहे हैं. डेंटन कैंपस में "Blagg-Huey Library" नामक  विशाल पुस्तकालय है, जिसमें ४२,००० से अधिक पुस्तकें व पढ़ाई के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं.

मुझे इस विश्वविद्यालय में घूमकर देखने का सौभाग्य इसलिए प्राप्त हुआ कि मेरी बेटी गिरिबाला इन दिनों यहाँ अंग्रेजी साहित्य में मास्टर्स की डिग्री के लिए पढ़ रही है, और साथ ही बतौर Graduate Teaching Assistant के यहाँ पढ़ाती भी है. गिरिबाला ने कई वर्ष पहले जयपुर के निकट बनस्थली विश्वविद्यालय से Inorganic Chemistry में प्रथम श्रेणी M.Sc. की डिग्री भी हासिल की थी. गत वर्षों में अमेरिका में रहते हुए उसने अपना लेखन व ज्ञानार्जन का शौक जारी रखा है. 

यूनिवर्सिटी कैम्पस के विहंगम दृश्य, विशेषकर लायब्रेरी की व्यवस्था, देखकर जो अकल्पनीय जानकारियां मिली हैं, उन्हें मैं अपने सुधी पाठकों तक पंहुचाने में खुशी महसूस कर रहा हूँ.
क्रमश:
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गुरुवार, 30 नवंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - ६

टेक्सास राज्य की दक्षिण-पश्चिमी सीमा मैक्सिको से मिलती है. एक समय ऐसा भी था की यूरोपीय देश, स्पेन, का इस बड़े भू-भाग पर उपनिवेशी कब्जा था. टेक्सास का इतिहास बताता है कि गणतंत्र बनने या उससे पहले इस राज्य की राजधानी कम से कम आठ बार बदलती रही थी. ऑस्टिन को स्थाई राजधानी का स्वरुप १८३९ में प्राप्त हुआ. तब इसका नाम रिपब्लिक आफ टेक्सास था. राजनेता स्टीफन फुलर ऑस्टिन (१७९३-१८३६) के नाम पर इसका नया नामकरण किया गया. ऑस्टिन यहाँ के ‘फादर आफ द स्टेट' भी माने जाते हैं. उनकी नागरिकता के विषय में लिखा गया है कि वे अमरीकन+स्पेनिश+मेक्सीकन+टैक्सीयन थे. उनके नाम से आज भी यहाँ अनेक स्कूल, सड़क, और संस्थान मौजूद हैं.

विधान सभा भवन जिसे यहाँ ‘Capitol’ कहा जाता है, ग्रेनाईट से बनी एक विशाल बिल्डिंग है. भारत में हमारे राष्ट्रपति भवन की तरह ही उसका बड़ा गुम्बज है. ये परिसर २२ एकड़ में फैला हुआ है. सुन्दर लैंडस्केप, पेड़, व लॉन बहुत सजावटी हैं. मुख्य बड़ा द्वार पीतल से बना हुआ है, तथा फर्श रंगीन चित्रकारी वाले मार्बल से बना हुआ है. बीच के हॉल में गुम्बज के नीचे चारों  मंजिलों पर कोरीडोर बने हैं, जिन पर चहुँ ओर यहाँ भूतपूर्व माननीयों की सुन्दर मुंहबोलती तस्वीरें टंगी हुई हैं. अंडरग्राउंड में कैफेटेरिया व गिफ्ट शॉप हैं. परिसर में १७ मोन्युमेंट्स भी हैं, जिनमें एक शहीद स्मारक भी है. यहाँ सुरक्षा चाकचौबंद है, पर पर्यटकों को कोई टिकट नहीं लेना पड़ता है.

शहर लाजवाब है, घूमते हुए एक जगह हमें ‘गांधी बाजार’ भी मिला। अन्य सभी बड़े अमरीकी शहरों की तरह, यहाँ पर इन्डियन स्टोर में भारत से मंगवाये गए सभी उपभोक्ता सामान उपलब्ध थे. भोजन के लिए इन्डियन रेस्टोरेंट इंटरनेट पर ढूंढने पर मिल पाया. यहाँ भी हमें बिना जी.पी.एस. के कहीं किसी ठिकाने पर पहुंचना मुश्किल लगा.

मैं अपने दामाद श्री भुवन जोशी व बेटी गिरिबाला का बहुत धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने मुझे और मेरी अर्धांगिनी को गाइड करते हुए अपने वाहन में ये सब दर्शनीय स्थल दिखाए. अन्यथा इस प्रकार घूमना हमारे वश में नहीं था.
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बुधवार, 29 नवंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - ५

मेरिका (USA) का इतिहास बताता है कि उत्तरीय अमेरिका में यूरोपीय लोगों के आने से पूर्व आदिम आदिवासी लोग  (जिन्हे रेड इन्डियन नाम दिया गया) यहाँ रहते थे. ये आधुनिक सभ्यता की दौड़ में बहुत पीछे थे. यूरोपीय लोगों से उन्होंने प्रतिरोधात्मक लड़ाई भी लड़ी, पर वे हार गए, मारे गए अथवा यूरोपीय लोगों के साथ आये बीमारियों के वायरसों से मर गए. अत: बहुत कम संख्या में बच पाए.

इस धरती का यूनान, मिश्र, रोम, आर्यावर्त या चीन की तरह कोई ऐतिहासिक/पौराणिक इतिहास नहीं है, ना ही यहाँ कोई किला या राजमहल है. यूरोपीय देश भी अपने अपने कब्जे के लिए लड़ते रहे, और बाद में समझौते होते रहे. संयुक्त राज्य अमेरिका की संघीय राष्ट्र के रूप में सन १७७६ में स्थापना हुई, जिसमें ५० राज्य हैं. यहाँ अधिकाँश लोग प्रवासी यानि बाहर से आकर बसे हुए लोगों के वंशज हैं. इन्होंने पिछले ४००-५०० वर्षों में इसे दुनिया का श्रेष्ठ राष्ट्र बनाया है, जो अपने आप में एक बड़ी कहानी है. अमरीकियों की विशेषता यह भी रही है की जहां भी प्रकृति के अजूबे मिले, उसे संवार कर दर्शनीय बना डाला है. यहाँ सब कुछ नव निर्मित है. 

मैंने यहाँ प्रवास के दौरान क्षेत्रफल में सबसे बड़े राज्य टेक्सस की राजधानी ऑस्टिन और उसके आस पास के पर्यटन स्थल देखे. सैन अंटोनियो शहर के निकट जंगल में एक प्राकृतिक गुफा देखी जिसे ‘Natural Bridge Cavern' नाम से जाना जाता है.  जंगल में खुरदुरे पथरीले मैदान के नीचे जमीन के अन्दर चूना प्रस्तरों की बड़ी दरार है, जो लगभग ४०० फुट नीचे तक गयी है. उपरी जमीन पर पत्थरों से आर-पार पुल सा बना हुआ है. इस गुफा की खोज सन १८६० में हुई बताई गयी है. गुफा में आवागमन के लिए गहराई तक एक तीन फुट चौड़ा रास्ता रेलिंग के सहारे टेढ़े मेढ़े ले जाकर बनाया गया है, जो दूसरे छोर पर खुलता है. चूने का पानी गुफा की छत से लगातार टपकता रहता है. जिसके जमने से श्वेत रंग के असंख्य स्तम्भ, कलात्मक आकृतियां और लिंग बने हुए हैं. यह प्रॉसेस लाखों बरस से जारी रहा होगा. विद्युत् प्रकाश की उपस्थिति में इनकी मनोहारी दृश्यावली अवर्णनीय है. एक घंटे तक गुफा में गुजरते हुए गाइड बहुत मनोरंजक ढंग से पर्यटकों को उसके बारे में बताता जाता है. पर्यटकों की सुविधा के लिए गुफा के बाहर रेस्टोरेंट व पिकनिक स्पॉट तथा मनोरंजन के लिए ‘रोप-वे’ के खेल की व्यवस्था है. गुफा की देखने का टिकट जरूर २3 डालर प्रति व्यक्ति है.

(२) सैन अंटोनियो शहर (पूर्व में यहाँ स्पेन का राज्य था जो मैक्सिको की सीमा में था; यह शहर स्पेन के ही प्रसिद्ध सेंट एंटोनियो के नाम से है) बहुत खूबसूरती से बसाया गया है, जिसके बीचोंबीच एक नदी बहती है, जिसे ३० फुट के चौड़े बंधन में बांधकर नहर का रूप दे रखा है. इसके दोनों तरफ पदयात्रियों के लिए सपाट १०-१२ फुट चौड़े रास्ते हैं. दोनों तरफ ऊंची ऊंची इमारतें हैं, जिसमें बहुमंजिले होटल हैं, और इसे यहाँ का केंद्र (डाउनटाउन) कहा जाता है.

शाम होते ही चौपाटी की तरह ये ‘रिवर वॉक’ गुलजार हो उठाता है. विद्युत की जगमगाती लड़ियों से सजे हुए पेड़ तथा पुष्प वाटिकाएं देखकर मन रोमांचित होना स्वाभाविक होता है. नदी में नावें चलती हैं. नदी पर आर पार जाने के लिए अनेक पुलियायें बनी हुयी हैं. चौड़े स्थानों में मनोरंजन के लिए आर्केस्ट्रा तथा ऑडियो-वीडियो के अनूठे कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं. इसे कई लोग यहाँ का वेनिस भी बताया करते हैं.

सब मिलाकर यहाँ के लोगों का सौन्दर्य बोध का ये एक अद्भुत नमूना है.

अगले अंक में राजधानी ऑस्टिन के विधान सभा भवन के बारे में पढ़ियेगा.
क्रमश:
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सोमवार, 27 नवंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - ४

अमेरिका में ‘बरसाना- राधा माधव मंदिर’
भारत में विख्यात संत स्व. कृपालु जी महाराज (१९२२-२०१३ ) को सनातन धर्म उपदेशक, राधा-गोविन्द उपासक और वेदान्ती विद्वान् के रूप में पहचाना जाता है. उनको चैतन्य महाप्रभु का अवतार भी कहा जाता है. विलक्षण मेधास्मृति के धनी कृपालु महाराज को काशी विद्वत परिषद् द्वारा महज ३४ वर्ष की उम्र में ‘जगद्गुरु’ की उपाधि से सन १९५७ में विभूषित किया गया था. वे वेद-वेदान्त व भक्तियोग के प्रकाण्ड विद्वान् व प्रवचनकर्ता थे. उन्होंने अपनी आराध्या देवी राधा की असीम भक्ति में आसक्त होकर मथुरा के निकट बरसाना में एक सौ करोड़ रुपयों की लागत से एक भव्य मंदिर बनवाया जो की राधा-कृष्ण की उपासना व आस्था का अनोखा केंद्र है. मंदिर की वास्तुकला द्वारा भी आराध्य के दिव्य प्रेम को साकार किया गया है.

उन्होंने ‘जगद्गुरु कृपालु परिषद्' नाम से वैश्विक संगठन की स्थापना की; उनके करोड़ों फॉलोअर्स हैं. इस समय विश्व में पांच मुख्य आश्रम हैं. जिनका सचालन एक ट्रस्ट द्वारा किया जाता है. ट्रस्ट द्वारा अस्पताल व गुरुकुल भी सचालित किये जाते हैं. विदेश में मुख्य आध्यात्मिक केंद्र ‘द हार्वड प्लूरिश प्रोजेक्ट’ अमेरिका में है. टेक्सास की राजधानी ऑस्टिन से लगभग २४ किलोमीटर दूर पश्चिम की पहाड़ियों के बीच ‘राधा-माधव धाम’ स्थापित है.

यह ‘बरसाना धाम’ कई एकड़ जमीन पर बसाया गया है. यह एक दर्शनीय दिव्य परिसर है, जिसमें राधा कृष्ण का एक विशाल मंदिर है जिसकी देखरेख एक ट्रस्ट द्वारा की जाती है. परिसर में रासलीलाओं के भित्त चित्र व जीवंत मूर्तियों से सजाया गया है. कालिंदी (यमुना), प्रेम सरोवर (कुण्ड) और महारास का मंडप सभी सजीव परिकल्पनाएँ भक्तों/ पर्यटकों को मंत्रमुग्ध करती हैं. मंदिर परिसर में ही सुन्दर आवासीय व दिव्य भोजनालय की व्यवस्था है. मंदिर में व उसके परिसर में कृपालु महाराज की अनेक मुद्राओं में बड़ी बड़ी फोटो लगी हैं, और उनके बारे में वीडियो चलायमान रहते हैं. सुबह शाम पूजा-पाठ और भजन कीर्तन होते हैं कर्मचारियों में अधिकाँश अमरीकी हैं, कुछ भारतीय चेहरे भी हैं, जो हरे रामा हरे कृष्णा की तर्ज पर नाचते गाते हैं. मंदिर परिसर में एक दर्जन से ज्यादा भारतीय मोर और मोरनियां घूमते मिलते हैं जो बरसाना की शोभा बढ़ाते हैं. कुल मिलाकर इस साफ़ सुथरे पवित्र स्थल पर विचरण करने वालों को आत्मिक शान्ति मिलती है.

परिसर में हिन्दू विधि-विधान से विवाह, उपनयन, षष्टि पूजा आदि धार्मिक अनुष्ठानों /समारोहों के लिए उचित  शुल्क देकर आयोजन करने की व्यवस्था भी की जाती है.

सनातन धर्म के बारे में लिखा गया है कि ये एक जीवन पद्धति है जो अपने अन्दर अनेक उपासना पद्धतियों, पंथ, मत, सम्प्रदाय व दर्शन को समेटे हुए है. इसमें सभी प्राकृतिक देवी देवताओं को अलग अलग नामों से पूजा अवश्य जाता है, पर वास्तव में ये एकेश्वरवादी धर्म है. इसके साक्षात अनुभव यहाँ आकर होता है.

अगले पायदान में आप पढेंगे ‘नेचुरल ब्रिज’ नामक गुफा तथा सैन ऐंटोनियो के सुन्दर ‘रिवर वॉक’ का वर्णन.
क्रमश:
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रविवार, 26 नवंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - ३

उत्तरी अमेरिका के दक्षिण-पश्चिम में स्थित टेक्सास राज्य है, और डैलस उसके मैदानी भाग में बसा हुआ एक बड़ा शहर है, जिसका केंद्र (डाउनटाउन) भी खूबसूरत गगनचुम्बी चमकीली इमारतों से भरा हुआ है. सडकों व बहुमार्गी जगहों पर ऊंचे-नीचे फ्लाईओवर्स के अनेक जाल हैं. शहर की बस्तियों में तथा सडकों के किनारों पर पेड़ों की कतारें हैं, पर यहाँ के पेड़ नाटे कद के लगते हैं. यहाँ पर अनेक विशाल सरोवर हैं, और जैसा की यहाँ का शुगल है, उन्हें चारों और से संवार कर दर्शनीय बनाया गया है. विद्युत् प्रकाश की भी अदभुत सजावट है, विशेषकर अब जब ईस्टर के बाद क्रिसमस की सजावट शुरू हो चुकी है. सर्वत्र सुन्दरता बिखरी हुई लगती है. चारों तरफ देखकर यूरोप की यह उक्ति याद आती है कि "Rome was not built in a day."

डलास के चारों और बसी बड़ी बड़ी बस्तियों को suburb कहा जाता है. ये अनेक cities में विभाजित हैं. हम अपने सुहृदों की जिस बस्ती में आये हैं, उसका नाम है Flower Mound, और कालोनी का नाम है Grand Park Estate. इस कालोनी में 90 घर हैं, और मुझे बताया गया है कि लगभग 55 घर भारतीय मूल के लोगों के हैं. जैसा कि परदेस में आम तौर पर होता है एक मुल्क के लोग किसी ना किसी बंधन (formal /informal bond) से आपस में जुड़े रहते हैं. यहाँ आने पर 11 नवम्बर को हम भारतीय समाज के एसोसिएशन द्वारा Marcus High School, Flower Mound के विशाल आडीटोरियम में आयोजित दीपावली मिलन कार्यक्रम में शामिल हुए, जिसमें अनुपम साज-सज्जा के साथ भारतीय नृत्य+संगीत में सरोबर पाकर अतीव आनंदित हुए. इसी कार्यक्रम में भाग लेने वालों के लिए भारतीय व्यंजन भी उपलब्ध थे. इस प्रकार के ‘मिनी हिन्दुस्तान पॉकेट्स’ बरबस अपने घर-गाँव की याद दिलाते हैं. ऐसा लगता है की ये भारतीय मूल के बच्चे जो यहीं पर पल-बढ़ रहे हैं,  अपनी जड़ों से कट जायेंगे, परन्तु आज के विश्वीकरण के युग में, ये बच्चे विश्वनागरिक बन जायेंगे. उन्हें यहाँ अपनी क्षमता के अनुसार पूर्ण विकास के और अपने सपने साकार करने के सभी अवसर मिलेंगे। आशा करता हूँ कि ये बच्चे, देश, काल, और परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल कर मानवीय व तकनीकी विकास में अपना योगदान देंगे. 

मेरे देशाटन के अगले पायदान पर आप पढेंगे टेक्सास की राजधानी ऑस्टिन के निकट स्व. कृपालु जी महाराज द्वारा बसाया गया एक और बरसाना.
क्रमश:
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बुधवार, 22 नवंबर 2017

I Speak to the Nation (U.S.)

I Speak to the Nation (U.S.)   

(Hindi version)
महान राष्ट्र अमेरिका के बाशिंदों !
सर्व प्रथम मैं आपको अपने दिल की गहराईयों से धन्यवाद देता हूँ कि आपने मुझे अपने ‘प्रेसीडेंट’ के रूप में इस प्रेसिडेंटिअल पोडियम से भाषण देने का सुअवसर प्रदान किया है.

इस देश के गौरवपूर्ण इतिहास व उपलब्धियों पर केवल आपको ही नहीं, बल्कि विश्व के अन्य भागों के प्रबुद्ध शक्तिपुन्जों को भी अभिभूत किया है. यद्यपि, मैं एशिया के एक अन्य महान देश भारत में जन्मा और वहां की सनातन संस्कृति में पला-बढ़ा हूँ, मैं इस देश की सम्पन्नता व आदर्शों से अतिरेक प्रभावित हुआ हूँ. यह विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, सबसे बड़ी सैनिक शक्ति और अनेकानेक धार्मिक आस्थाओं का पोषक बन गया है. कला, साहित्य, और व्यक्तिगत अनुशासन के उच्च प्रतिमानों का स्तर इसी तरह निरंतर आगे बढ़ाते रहना चाहिए.

मैं, महामानव राम, कृष्ण, गौतम बुद्ध, महावीर आदि द्वारा स्थापित सामाजिक मर्यादाओं तथा क्राइस्ट द्वारा प्रेम, करुणा व समभाव की प्रेरणा को एवं अन्य धर्मों के आविर्भावक प्रोफेट्स के उपदेशों को एकाकार करके वर्तमान युग की वैज्ञानिक क्रान्ति को मानवता के लिए सम्पूर्ण छत्र बना देना चाहता हूँ, जिसके नीचे कोई कलह, द्वेष, अथवा हिंसाभाव ना हो ताकि समस्त चराचर अपरिमित आनंद का भोग करें.

विश्व में आज तमाम रोग और शोक के लिए जिम्मेदार जो हिंसक-पाशविक दुष्ट शक्तियां पनप रहीं हैं, उनका स्वाभाविक अंत करना मेरा लक्ष्य है. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का स्तोत्र मेरा मन्त्र है, और मैं इस बड़े कुटुंब का अध्यक्ष होकर सबका हितैषी बना रहूँ, यही मेरी कामना है.

आज की विषम अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में आपको लगता होगा कि यह सब मेरी कल्पना मात्र है, पर सच यह है कि मैंने अमेरिका की धरती पर अपने रक्तबीज (जींस) बो दिए हैं, जो कालान्तर में निश्चित रूप से मेरे सपने को साकार करेंगे.

अंत में मैं मैडम तुसाद को धन्यवाद देता हूँ, जिसने अपने ‘वैक्स म्यूजियम’ में अमेरिका के सभी पूर्व व वर्तमान राष्ट्रपतियों के प्रतिरूपों को एक साथ व अन्य सभी क्षेत्रों की महान विभूतियों को भी मेरे सन्मुख कतार में खडा किया है. इनमें कला, साहित्य, विधिविधान, राजनैतिक महामनीषियों के अलावा पोप जॉन पॉल II, मार्टिन लूथर किंग, महात्मा गांधी, मदर टेरेसा, बेंजामिन फ्रेक्लिन, मार्क ट्वेन, वाल्ट ह्विट्मैन आदि महानुभावों के प्रतिरूप भी मेरे श्रोताओं में उपस्थित हैं.

मैं स्वयं बहुत गर्वित और भावुक हो रहा हूँ. मेरा दिल यह सब देखकर भर आ रहा है कि मैं ‘प्रेसीडेंट आफ यूनाईटेड स्टेट्स’ के गरिमामय स्टेज से संबोधन कर रहा हूँ.

सभी श्रोताओं व पाठकों को शुभ कामनाएं. फिर मिलेंगे, मिलते रहेंगे.

Thank you very much! God bless America and the rest of the humanity as well!
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मंगलवार, 21 नवंबर 2017

अटलांटिक के उस पार - 2

31 अक्टूबर 2017 को जब मैं पत्नी व पुत्र प्रद्युम्न के साथ जब अमेरिका की धरती पर पदार्पित हुआ तो वे सारे अहसास फिर से ज़िंदा हुए जो मुझे 2011 में यहाँ आने पर हुए थे, और मैंने दिनांक 28 जुलाई 2011 को अपने ब्लॉग ‘जाले’ में संस्मरण के रूप में प्रकाशित किये थे.

साफ़-सुथरा, पूर्ण विक्सित, व सुन्दर सजाये गए परिदृश्य, हर बस्ती को चौड़ी-चौड़ी सडकों व बगल में पैदल यात्रियों के लिए पथ, हर मोड़ पर पुष्पित रंग-बिरंगे पौधे सब मनमोहक लगते हैं. पर इस बार बड़े पेड़ ‘फॉल’ (पतझड़) की वजह से सर्वत्र लाल अथवा पत्रविहीन मिले, बाकी सब कुछ वैसा ही लगा जैसा पहले था. इस कालखंड में मैं अलबत्ता कुछ बूढ़ा हो चला हूँ; सर पर बालों की सिर्फ सीमा रेखा बची है, और भोंहों पर भी चांदी चमकने लगी है.

इस बार आने का प्रमुख मकसद जॉर्जिया राज्य के अटलांटा शहर में प्रिय हिना के विवाहोत्सव में सम्मिलित होना था. इस विवाहोत्सव में भारतीय व अमरीकी मित्रों का उत्साह व उल्लास देखकर हम लोग आनंदित होते रहे. मेरे दामाद श्री भुवन जोशी व बेटी गिरिबाला का ये एक बढ़िया ढंग से नियोजित कार्यक्रम था. हिना ने भी इस अवसर को गरिमामय बनाने के लिए स्वयं एक मैरिज प्लानर की मदद ली थी. इसमें उसके मेडीकल स्टाफ, सहपाठी मित्रों ने चार चाँद लगा दिए. सारे आयोजन अनुपम थे. पंडित मजमूदार (गुजराती मूल के - पेशे से सर्जन) ने अपनी विद्वता व वाक् पटुता से दो संस्कृतियों का वैदिक मंत्रोचार के साथ कन्यादान - अग्नि को साक्षी रख कर सात फेरे करवाए. इस प्रकार एक अनुपम विवाह हुआ जिसे सबने देखा और सराहा. उल्लेखनीय बात यह थी की वर, चिरंजीव निकोलस (एक कंपनी में वाईस प्रेसिडेंट), व सभी वरपक्ष के लोग भारतीय परिधानों  में थे. तीन दिनों तक चले विवाहोत्सव को देखकर सभी लोगों ने हिना की पसंद और भाग्य की सराहना की. चूंकि भुवन जी नोकिया सीमेंस के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, और पूर्व में कई वर्षों तक अटलांटा में नियुक्त रहे हैं, नोकिया परिवार के सभी भारतीय मूल के मित्रों ( विशेष रूप से महिला मंडल ) ने सभी आयोजनों को सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसा बना दिया.

मेरी श्रीमती, पुत्र प्रद्युम्न, व पौत्र सिद्धांत ( बोस्टन में अध्यनरत), भुवन जी के बड़े भाई डॉ. नित्यानंद जी, उनकी अर्धांगिनी सुधा, पुत्र नितिन का परिवार, तथा कनाडा से गिरिबाला की मौसेरी बहन कमला शर्मा+ उसके पुत्र एवं पुत्रवधू की उपस्थिति ने इस विवाहोत्सव को चिर अविस्मरणीय बना दिया है. गिरिबाला की एक सहेली न्यू जर्सी  से इस समारोह में शामिल होने आई थीं; वह गिरिबाला की खुद की शादी की साक्षी भी थी. हमारे इस पूरे समारोह पर पुरोहित जी कहना था की उन्होंने यहाँ अनेक शादियाँ करवाई हैं, पर इस शादी को ‘ना भूतो ना भविष्यति’ की संज्ञा दी.

आठ दिनों तक अटलांटा के एक घर में रहकर वर-वधु को विधिवत बिदाई देकर हम लोग भुवन जी व गिरिबाला के साथ उनके घर, डलास (टेक्सस राज्य) में आ गए हैं, जो अटलांटा से लगभग 1350 किलोमीटर दूर है.
क्रमश:
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गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

बैठे ठाले - 19

के.बी.सी के इसी सत्र में एक प्रश्न यह था, जिसमे वहां वर्णित चार विकल्पों में से कौन सा ‘दाल’ नहीं है: दाल चना, दाल मसूर, दाल अरहर, या दालचीनी? प्रतिस्पर्धी इसका उत्तर नहीं जानता था.

दालचीनी वास्तव में एक पेड़ की छाल होती है, जिसे मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है बहुत से लोगों को ये भी मालूम होगा कि तेजपत्ता के पेड़ की छाल ही दालचीनी कहलाती है. तेजपत्ता को अंगरेजी में ‘बे लीफ’ कहा जाता है. इंटरनेट खंगालने के बाद मालूम हुआ कि यह औषधीय वनस्पति केवल हिमालयी क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में पाया जाता है.

तेजपत्ता को उसकी प्यारी महक व मिन्ट स्वाद के लिए चाय, सब्जी, दाल, चावल या बिरयानी में पकाया जाता है. आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ ‘भाव प्रकाश’ में इसको अदरक, तुलसी, व हरड़ जैसी गुणकारी त्रिदोषनाशक वनस्पतियों की श्रेणी में रखा गया है. आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, इसमें प्रचुर मात्रा में विभिन्न प्रकार के गुणकारी खनिज पाए जाते हैं, जो कि रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता व रोग निवारण में अति लाभदायी होते हैं.

मेरा बचपन बागेश्वर (उत्तराखंड) के ग्रामीण आँचल में बीता है. कुमाउनी बोली-भाषा में तेजपात को ‘किडकिडिया” नाम से जाना जाता है. यह एक जंगली पेड़ होता था, और हम स्वाद की विशिष्टता लिए हुए इसके लुआबदार हरे पत्तों को चबाया करते थे; वहाँ के लोगों को तब इसके व्यावसायिक उपयोग की कतई जानकारी नहीं होती थी. जंगल के इस प्रकार के कई औषधीय वनस्पतियों का बेदर्दी से दोहन तब शुरू हुआ जब आजादी के बाद मोटर मार्ग बनने लगे. लोग बताते हैं कि लालची लोगों ने पेड़ों की खाल-पत्ते बाजार में पहुंचा कर इस प्रजाति को बड़ा नुकसान पंहुचाया है.

अब से कुछ वर्ष पहले मुझे काठगोदाम की एक नर्सरी से तेजपात का एक छोटा सा पौधा मिला। (इस नर्सरी में बीजों से पौध उगाई जाती है) मैंने इस पौधे को अपने घर-आगन में लगाया है. मुझे आज ये कहते हुए खुशी हो रही है कि इन पांच वर्षों में ये करीब पंद्रह फुट ऊंचा छायादार वृक्ष होकर पल्लवित होता रहता है. मेरे मोहल्ले के गुणी जन भी इसके ताजे पत्तों के लिए लालायित रहते हैं.
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मंगलवार, 26 सितंबर 2017

बैठे ठाले - 18

आप कहेंगे कि "नाम में क्या रखा है? कुछ भी बोल दो," पर जब से उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री योगी जी ने ‘शौचालय’ का नया नामकरण ‘इज्जत घर’ किया है, तब से हमारे इज्जत नगर, बरेली, के मित्र लोग नाखुश नजर आ रहे हैं. उधर ‘गुसलखाने’ को क्या नया नाम दिया जाए, इस बारे में सभी उर्दूदां परेशान हैं और बहस-मुसाहिबा कर रहे हैं. पाश्चात्य देशों में अंग्रेजीदां ने पहले से होशियारी से 'बाथरूम-लैट्रिन' के लिए ‘वॉशरूम’ व 'रेस्टरूम' जैसे शब्द तलाश करके अपनी नफासत उजागर की हुयी है.

जब महाराष्ट्रवादियों ने बंबई को मुम्बई का, तमिलों ने मद्रास को चेन्नई का, कर्नाटकवासियों ने बंगलौर को बंगलुरु का नाम बदल कर रख दिया था, तो ये नए नाम बहुत दिनों तक गले में अटकते रहे थे. इधर हरियाणा में खट्टर सरकार ने प्यारा सा पुराना नाम ‘गुडगाँव’ को ‘गुरुग्राम’ बनाकर अपना संघी ठप्पा लगाया तब भी अजीब सा लगा. इससे पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपाहिजों की वाहवाही लूटते हुए उनको ‘दिव्यांग’ कहा तो प्रचार माध्यमों ने भी प्रकृति के अत्याचार पर एक नई सोच को जन्म दिया. मैंने हाल में एक लूले-लंगड़े विकलांग भिखारी से इस नए नाम के प्रभाव के बारे में उसकी प्रतिक्रया जाननी चाही तो उसने बेलाग होकर कहा, “बाबू जी ये तो आप लोगों की मानसिक विलासता है, हम तो जैसे पहले थे, वैसे ही आज भी भीख मांग कर गुजारा कर रहे हैं.”

‘मुंडे-मुंडे मतिर भिन्ना’ एक पुरानी कहावत है. देश, काल और परिस्थिति के अनुसार व्यक्तियों के सोच-विचार अलग अलग हो सकते हैं, विशेषकर लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनैतिक मामलों में सबकी राय अलग अलग होती है, तथा उनकी ढपली अलग अलग अंदाज में बजती रहती है. लेकिन आज देश में स्वच्छता के प्रति जागरूकता व प्रतिबद्धता के लिए इस सरकार के मिशन की तारीफ़ की जानी चाहिए.

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शनिवार, 16 सितंबर 2017

पेट्रोल - डीजल में लूट-खसोट

पेट्रोल – डीजल की लागत मूल्यों और इनके रीटेल में बिक रही कीमतों का अंतर सरकारी मुनाफाखोरी के कारण इतना बड़ा हो गया है कि अब चमचा चैनल्स भी वास्तविक आंकड़े बताने लग गए हैं.

मेरे इसी स्तम्भ में लिखे गए लेखों में पहले भी कई बार इस विषय पर ध्यान आकर्षित किया गया है. आज भी, जबकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें निचले स्तर पर चल रही हैं, सरकारी और गैरसरकारी तेल कंपनियां धड़ल्ले से मुनाफ़ा कमाकर उपभोक्ताओं का शोषण कर रही हैं. अफसोस इस बात का है कि सरकार के उच्च पदों पर आसीन अफसर व मंत्री बेशर्मी से अपना मुंह छुपाये हुए हैं. आज एक केन्द्रीय मंत्री अलफांसो महाशय ने तो हद कर दी यह कह कर कि “पेट्रोल उपभोक्ता भूखे नहीं मर रहे हैं.”

इस गैर जिम्मेदाराना व संवेदनहीन वक्तव्य की जितनी नंदा की जाए कम है.

पेट्रोल-डीजल के भाव बाजार के तमाम उपभोक्ता सामानों के भाव, ट्रासपोर्ट की लागत, और कृषि उपज पर सीधे सीधे प्रभाव डालते हैं. हमारे पड़ोसी देशों से तुलना की जाए तो पाकिस्तान जैसे पिछड़े देश में पेट्रोल का बाजार मूल्य केवल 21 रुपये चल रहा है जबकि हमारे यहाँ पेट्रोल का भाव लगभग 34 रूपये + 36 रूपये सरकारी टेक्स मिलकर 70 रूपये हो रहा है.

एक आंकड़ा बता रहा है कि सरकार का विदेशी मुद्राकोष सर्वोच्च चल रहा है, जो साबित करता है कि ऐसी कोई मजबूरी भी नहीं है कि तेल को जी.एस. टी. के बाहर रख कर इस तरह से खुली लूट की जाय.

आज के सत्तानशीं नेता एक समय तेल पर केवल 2 रुपया की बढ़ोत्तरी होने पर सड़क पर उतर कर आन्दोलन किया करते थे, पर आज बेशर्मी के साथ चुप हैं, और सच्चाई से मुंह छुपा रहे हैं.
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सोमवार, 28 अगस्त 2017

विद्रूप चेहरे

अनादि काल से ही स्त्री-पुरुष के संबंधों की मर्यादा पर प्रश्नचिन्ह लगते आये हैं. हालाँकि जिम्मेदार वयस्क स्त्री व पुरुषों को निजी संबंधों की पूरी आज़ादी होनी चाहिए, किसी भी तरह की जोर/जबरदस्ती, धमकी, लालच, या हिंसा का प्रयोग करने वाले को कानूनी कार्यवाही के बाद उपयुक्त सजा मिलनी चाहिए. कई साधारण नागरिकों के साथ साथ राजनीति व धार्मिक सगठनों के प्रभावशाली व्यक्तियों के खिलाफ कई ऐसे आरोप चर्चा में या सुर्ख़ियों में आते है, और अनगिनत मामले भय व भावनाओं की वजह से गर्त में चले जाते हैं. बाहुबल तथा धनबल हमेशा ही ऐसे मामलों में प्रभावी रहा है.

‘सच्चा सौदा’ के सभी आस्थावान व्यक्तियों/परिवारों से हमारी हमदर्दी होनी चाहिए कि उन्होंने जिस मनुष्य में ‘देवता’ का स्वरुप जाना था वह एक वहशी जानवर से कम नहीं है. जिस तरह की बातें बाहर निकल कर आ रही हैं, उनसे सिद्ध होता है कि हमारे समाज में अशिक्षा और अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी पेठ बनाए हुयी हैं. अब सजायाफ्ता राम रहीम सिंह की मुहबोली बेटी/प्रेयसी हनीप्रीत ने यह बयान दिया है कि “हमारे साथ धोखा हुआ है, पिछले चुनावों के समय भारतीय जनता पार्टी से एक गुप्त डील हुयी थी कि ‘समर्थन’ के बदले वह ‘बाबा’ पर चल रहे केस समाप्त करवा देंगे.” अगर ये सच है तो अफसोस होता है कि इससे निकृष्ट/घटिया राजनीति क्या हो सकती है? 

ऊपर से चमकीले धार्मिक रंगों से लिपे-पुते सत्तानसीनों के चेहरे भी कितने विद्रूप हैं ? इसका आकलन किया जाना चाहिए.
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शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

राष्ट्रभक्ति

राष्ट्रभक्ति के नाम पर काली कमाई करने वाले बेहिसाब लोग हैं, पर कुछ ऐसे भी दृष्टांत जानकारी में आते हैं, जहाँ आभावों में पलने वाले कई लोगों का देशप्रेम का ज़ज्बा अमीर लोगों की सोच से बहुत ऊपर होता है. ऐसे ही एक वृत्तांत में एक झोपड़पट्टी में पलने वाला 10 वर्षीय बालक व्यस्त शहर की एक लाल बत्ती पर अपने पुराने से वाइपर पर पोचे का गीला कपड़ा बाँध कर खड़ी कारों के शीशों को बिना पूछे ही साफ़ करने लगता है. कुछ दयावान लोग उसे छुट्टे सिक्के दे भी जाते हैं. एक बड़े सेठ जी को अपनी लक्ज़री कार के शीशे पर उसका ये पोचा लगाना हमेशा नागवार गुजरता है. बालक ‘जो दे उसका भी भला, जो ना दे उसका भी भला' के सिद्धांत पर अपना काम करता जाता है.

आज स्वतन्त्रता दिवस है, और जब सेठ जी की गाड़ी लाल बत्ती पर रुकी तो वही बालक आज पोचे के बजाय एक छोटा सा तिरंगा लगाने को दौड़ा आया. सेठ जी ने शीशा गिराते हुए बड़े बेमन से उससे पूछा, “इसके कितने पैसा लेगा?”

बालक ने भोलेपन से उत्तर दिया, “साहब, मैं इसको बेचता नहीं हूँ.”  ऐसा कह कर वह अगली गाड़ी पर झंडा लगाने को चल देता है.

सेठ जी अपने मन की सारी कडुवाहट थूक के साथ निगल गए और श्रद्धाभाव से उस बालक के बारे में सोचते रह गए.
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गुरुवार, 20 जुलाई 2017

यादों का झरोखा - डॉ. कैप्टन के.एस. सोढ़ी

पटेल चेस्ट इन्स्टीट्यूट (दिल्ली विश्वविद्यालय) से ट्रेनिंग लेकर मुझे दिल्ली नगर निगम के कालका जी कॉलोनी हॉस्पीटल में सर्विस मिल गयी थी. उन दिनों मैं अपनी अंग्रेजी सुधारने के लिए The  Hindustan Times अखबार लिया करता था. अंग्रेजी तो ज्यादा नहीं सुधरी, पर 7 अप्रेल 1960 के पेपर में मुझे ए.सी.सी. का एक ऐड जरूर मिल गया, जो मेरे जीवन का एक टर्निनिंग पॉइंट बना. 

मुझे बतौर मेडीकल लेबोरेटरी टैक्नीशियन ए.सी.सी. में नियुक्ति मिल गयी. लाखेरी पहली दृष्टि में मुझे यों भी भा गयी; चारों तरफ नैसर्गिक छटा बिखेरते हुई पहाडियां और लबालब भरे बड़े तालाब, बरसात के दिनों की हरियाली, और सबसे विशिष्ट बात कि पितातुल्य स्नेही बॉस डॉ. कृपालसिंह सोढ़ी.

डॉ. सोढ़ी भव्य व्यक्तित्व के धनी थे -- श्वेत दाढ़ी, कबरी आँखें, श्वेत ही पगड़ी और श्वेताम्बर. स्वभाव से कड़क व अक्खड़. मैंने तो केवल आठ ही महीने उनके नेतृत्व में काम किया, और उसके बाद वे रिटायर हो गए थे. पुराने लोग बताते थे कि उनका डाईग्नोसिस बहुत सटीक व सही हुआ करता था. जिसको भी उन्होंने टी.बी. का रोग बताया, वे बाद में सही साबित हुए. यद्यपि एक वक्त लोग इसे उनका दिमागी फितूर कहा करते थे. झूठ-मूठ का ‘सिक’ बनाने वालों को वे पकड़ लेते थे. उनके सामने बहाने नहीं चलते थे. वैसे वह ज़माना अपनेपन का था. किसी की तबीयत बिगड़ने की खबर सुन कर कर बिना बुलाये ही वे उनके घर पहुँच जाया करते थे.

कारखाने के कैंटीन हॉल में जब उनकी विदाई पार्टी हुयी तो बहुत से कामगारों की आँखें सजल हो आई थी. उस मौके पर मैंने भी अपनी एक हस्तलिखित कहानी संग्रह "विष के बीज" उनको भेट की थी. दुर्भाग्य से मेरी प्रारम्भिक 11 कहानियों का यह संग्रह मेरे पास नहीं रहा. उसकी मूल पांडुलिपि किसी साथी ने पढ़ने के लिए माँगी थी और लौटाई नहीं.

डॉ. सोढ़ी जी के एक पुत्र लेबर ऑफिसर बन कर दो बार लाखेरी कारखाने में थोड़े थोड़े समय के लिए रहे. वे बाद में पोरबंदर/शिवालिया को स्थानांतरित हो गए थे. साथी लोग बताते थे कि पिता की प्रतिमूर्ति डॉ. सोढ़ी जी का एक बड़ा बेटा भी था, जिसकी किसी दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी. पुत्रशोक से बड़ा शोक और कोई नहीं होता है, ऐसा कहा जाता है. संभवतः डॉ. सोढ़ी इसी कारण बहुधा अपसेट रहा करते थे. पर मुझसे तो वे सदा पितृस्वरुप में ही मिला करते थे.

सुनहरे दिनों के वे चांदी के से लोग अब स्मृतिशेष हैं.

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शुक्रवार, 30 जून 2017

उजाड़खंड की व्यथा-गाथा

हिमालय की गोद में बसा हुआ हमारा छोटा सा उत्तराखंड राज्य अनेक प्राकृतिक संपदाओं से हरा भरा रहा है. इसी को देवभूमि नाम भी दिया गया है. राज्य के दो मुख्य संभाग हैं; पश्चिम की तरफ गढ़वाल व पूर्वीय संभाग कुमाऊँ है. दोनों संभागों में हिन्दी की अपभ्रंश बोलियों में थोड़ा सा अंतर भी है, परन्तु सामाजिक व वैचारिक धरातल पर अनेक साम्यतायें हैं. गढ़वाल के दूर-दराज पहाड़ी गांवों की वर्तमान स्थिति भी लगभग वैसी ही होनी चाहिए जैसी हमारी कुमाऊँ क्षेत्र में है.

पिछले 50-60 वर्षों से रोजगार व आधुनिक सुख-सुविधाओं की तलाश में गावों के समर्थ लोग बड़ी संख्या में तराई/भाबर (मैदानी क्षेत्र) की तरफ बसने लगे थे. नौकरी-पेशा लोग बड़े शहरों की रोशनी में गुम होते चले गए. सरकारों ने अनेक लोकलुभावन घोषणाएँ या कार्यक्रम पलायन रोकने के जरूर किये हैं, पर हवा ऐसी चली कि आज गावों में केवल बूढ़े और अशक्त लोग बचे हैं, क्योंकि वे असमर्थ हैं. प्रेस की रिपोर्टों के अनुसार हमारे ये हजारों गाँव जो कभी स्वावलंबी हुआ करते थे, गुलजार थे, अब खंडहरों में तब्दील हो गए हैं. नौकरी-पेशा लोग कोटद्वार, हल्द्वानी, रामनगर, टनकपुर का रुख किया करते हैं, या कहीं रोड साइड पर बसने की जुगत करते हैं. इसी तुफैल में बागेश्वर जैसे शहर के चारों तरफ की कृषि वाली सेरे की पूरी जमीन मकानों की भेंट चढ़ चुकी है.

अब बचे-खुचे गावों में भी लोगों ने खेती करना छोड़ दिया है. उसके पीछे कारण ये बताये जाते हैं कि बंदरों, बाघों, व सूअरों का आतंक इतना बढ़ गया है कि खेती करना दुष्कर हो गया है. हाली-ग्वाल अब पहाड़ों में उपलब्ध नहीं है. सरकार सस्ते में अनाज दे रही है (अधिसंख्य लोग बी.पी.एल. कैटेगरी में हैं). फिर खेती की हाड़तोड़ मेहनत की जहमत क्यों की जाए? लोग अब गाय-भैस भी नहीं पालते हैं. पैकेट का दूध आसपास दूकानों में मिल जाता है.

कुल मिलाकर हालात ये हैं कि ये दूर दराज के गाँव अब बंजर हो गए हैं. हाँ, यहाँ से पलायन किये हुए बुजुर्ग लोग अपने पुराने दिनों को अवश्य याद किया करते हैं. यद्यपि उनके अपने अंधविश्वास आज भी ज़िंदा हैं. वे अपने गाँव से अपने देवी देवताओं के प्रारूप प्रस्तर साथ में लेकर आये हैं और नई बसावट में घन्याली-जागर कराते रहते हैं.
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सोमवार, 1 मई 2017

मेरा जन्मदिन

अपनी खुशियों को न्यौता देने के लिए बहुत से मनमौजी लोग क्या क्या नहीं करते रहते हैं? मेरे एक प्यारे दोस्त हैं जो हर महीने अपना जन्मदिन मनाते हैं, केक काटते हैं, और परिवार के साथ मस्ती करते हैं. लेकिन मेरा जन्मदिन तो फिक्स्ड है – एक मई. यों जीवन के प्रारंभिक वर्षों में, अल्मोड़ा जिले के दूर दराज उस पिछड़े-पहाड़ी गाँव में तब कोई पारंपरिक रिवाज जन्मदिन मनाने का नहीं था. बहुत बाद में मुझे मालूम हुआ कि एक मई की ये तिथि यूरोप व एशिया में श्रमिक जागरण की याद में ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है (अमेरिका में मजदूर दिवस वहाँ के ऐतिहासिक कारणों से १७ जुलाई को नियत है). यह संयोग ही रहा है कि मैं अपनी एसीसी सीमेंट कंपनी में अपनी सर्विस के दौरान एक ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में स्थापित हुआ और उसी जूनून को मैं लम्बे समय तक पालते आ रहा हूँ.

इस संसार के श्रृष्टा ने तमाम प्राणियों का जीवन कई अदृश्य डोरों से बांधा हुआ है. सभी के जीवनकाल (स्पैन) अलग अलग कोष्टकों में डले हुए हैं. काल के सिद्धांत, पृथ्वी द्वारा सूर्य की 365 दिनों की परिक्रमा के हिसाब से गणितज्ञों / खगोलशास्त्रियों (astronomers) ने सटीक ढंग से अनादि काल से स्थापित किये हुए हैं.

इस युग के वे बच्चे बहुत भाग्यशाली हैं, जिनके माता-पिता सभ्य, प्रबुद्ध, और संपन्न हैं. ये अपने बच्चों की खुशियों के लिए जन्मदिनों को यादगार बनाने के लिए समारोहपूर्वक मनाया करते हैं, अन्यथा हमारे समाज में ऐसे भी बच्चे हैं जिनको जन्मदिन से कोई  सरोकार नहीं रहता है. कारण अज्ञानता व गरीबी होती है. जहाँ कुपोषण हो, रोटी तक ठीक से मयस्सर ना हो, वहाँ केक काटने की बात करना भी पाप है.

मेरे एक रिश्तेदार अपने बच्चों के जन्मदिन पर ‘मार्कन्डेय पुराण’ का पाठन व अन्य स्वस्ति वाचन करवाते हैं. मुझे अपने बचपन की जो यादें हैं, उनमें शायद ही कभी सामान्य पूजा-पाठ कराई गयी थी. मैंने भी अपने बच्चों के जन्मदिन समारोहपूर्वक नहीं मनाये. अब जब मेरे ये बच्चे सयाने व संपन्न हैं तो अपने अपने व अपने बच्चों के जन्मदिनों को बढ़िया ढंग से मनाते हैं, तथा हम माता-पिता को भी हमारे जन्मदिन याद दिलाकर जन्मदिन की खुशियाँ देते हैं. यों कोई मित्र या परिचित भी इस अवसर पर ‘बधाई’ दे तो अच्छा लगना स्वाभाविक होता है.

सोशल साईट्स पर सक्रिय रहने पर, खासकर, फेसबुक पर मित्रों के जन्मदिन उजागर होते रहते हैं. इसलिए लगभग सभी सुहृद मित्रगण शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति करके धन्य होते हैं. ये एक शुगल सा भी हो चला है. क्योंकि आज हम लोग इंटरनेट के जमाने में जी रहे है, एक दूजे के बहुत करीब आ गये हैं. ये हमारा सौभाग्य है कि हम मित्रों व रिश्तेदारों से दूर होते हुए भी उनसे संवाद कर सकते हैं.

कहावत है कि “जन्मदिन एक ऐसा दिन होता है, जब हम रोते हैं और हमारी माँ हमारे रोने पर खुश होती है.” आज इस अवसर पर मैं भी अपनी स्वर्गीय माँ को श्रद्धापूर्वक याद करता हूँ, जिसने मेरी खातिर अनेक वेदनाएं खुशी खुशी सही होंगी. साथ ही अपने स्वर्गीय पिता के गरिमामय स्वरुप को अपने अंत:करण में महसूस कर रहा हूँ. 

अंत में, मैं अपनी सहधर्मिणी, अपने सभी भाई-बहनों, पुत्र-पुत्रवधुओं, बेटी-दामाद, पौत्र - पौत्रियों, नातिनी, भतीजे-भतीजियों और इष्ट-मित्रों को उनके स्नेह और शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ, तथा सभी के सुख-सौभाग्य की कामना करता हूँ.
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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

सरकारी बेशर्मी

जस्टिस काटजू अपनी बेबाक व तल्ख़ टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं, फलस्वरूप वे सरकार और स्वयं न्यायपालिका को खटकते हैं.

शराब की दूकानें नेशनल हाईवेज से 500 मीटर दूर करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश इसलिए सामने आया कि आसानी से सडकों पर शराब मिलने पर गाड़ीवान/ड्राईवर//गैरजिम्मेदार लोग सड़क चलते नागरिकों की नशे में जान ले लेते हैं या उनको चोट पहुंचाया करते हैं. कोर्ट का उद्देश्य बहुत साफ तथा लोकहितकारी था. जस्टिस काटजू ने जो कहा वह भी 200% सही है कि “क़ानून बनाने का काम विधायिका का है ना कि न्यायपालिका का.” लेकिन सता पर काबिज सरकारें / उनके नेता/ माफिया/ दलाल सब शराब की अंधाधुंध कमाई से पोषित रहे हैं, इसलिए इस गंभीर समस्या पर उत्तराखंड की नव निर्वाचित सरकार ने जो चोर रास्ता निकाला है वह सुप्रीम कोर्ट पर थूकने जैसा है.

एक तरफ पूरे उत्तराखंड में शराब बंदी की मांग को लेकर आम जन विशेषकर महिलायें संधर्षरत हैं, दूसरी तरफ सरकार द्वारा रातोंरात लगभग सभी हाईवेज का नया नक्शा बनाकर अपनी ‘शराबी नीति’ को उजागर कर दिया है, ताकि ये शराब की दूकानें पूर्ववत सडकों पर बनी रहे. ये बेशर्मी की पराकाष्ठा है.

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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

मीन मेख

आजाद देश के आजाद कलमकार लोग कोई भी,कहीं भी, किसी भी मुद्दे पर मीन मेख निकालते रहते हैं; अब उत्तर प्रदेश की नई योगी सरकार के कृषक-ऋण माफी के मामले को ही लीजिये आलोचक कह रहे हैं कि “ये वोटों पर डाका डालने का एक जुमला था जो ‘हाथी की पाद’ साबित हुई है.” क्योंकि इसके साथ जो शर्तें बताई गयी हैं वे उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती हैं जिसमें अन्नदाता किसान को वास्तविक राहत मिले.

किसानों ने कर्जा जिन उद्देश्यों से भी  लिया उनमें गाय, बैल, भैस या बकरी खरीद के लिया होगा वे सब कृषि कार्यों के सहयोगी आचार से बाहर नहीं थे. स्वजनों के दुःख-बीमारी या बच्चों की पढाई अथवा मकान बनवाने में लिया गया कर्ज पारिवारिक जीवन के लिए अतिशय जरूरी होता है. सहकारी बैंकों या सूचीबद्ध बैंकों की ऋण वितरण की प्रक्रिया में जो अल्पशिक्षित /अनपढ़ काश्तकार पारंगत ना हो और दलालों/कमीशनखोरों के चंगुल से मुक्त ना हो, तो मजबूरन सूदखोर शाहुकारों की शरण में आ पड़ता है, और सरलता से जमीन या जेवर गिरवी रख कर धन पा लेता है, लेकिन मूल से ज्यादा ब्याज चुकाने में जिन्दगी बिता देता है. बहरहाल, मुद्दा कुलमीजान ‘कर्जे’ का है. जिसके कारण वह त्रस्त रहता है. आत्महत्या कोई भी खुशी से नहीं करता है. राजनैतिक दल चुनाव जीतने के लिए गरीब की दुखती नस पर अंगुली रखते हैं. यह देश का दुर्भाग्य है.

ये और भी बुरी परम्परा बनती जा रही है कि चुनावों के समय पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए साड़ियाँ, मोबाईल, लैपटॉप, घी+शक्कर, साइकिल आदि वस्तुएँ बाँटती हैं, या चुनाव के बाद ये सब देने का सच्चा या झूठा वायदा करती हैं. इस बार देश के कर्णधार, सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी जी, ने अपनी रैलियों में खुले आम वायदा किया था कि “किसानों के कर्जे माफ़ करूंगा." अब जब प्रचंड बहुमत मिल गया है तो इस वायदे को पूरा करने के बजाय इसमें शर्तें लगाकर गलियां निकाल दी गयी हैं.

ऋण का जो अल्पांश माफ़ हो रहा है, उसे सही दिशा में एक कदम की संज्ञा दी जा सकती है, पर वायदे की ईमानदारी नहीं कहा जा सकता है. जहां तक धनराशि के आंकड़े हैं, ये बड़े जरूर लग रहे हैं, लेकिन इसी केन्द्रीय सरकार ने पड़ोसी मुल्क नेपाल व बांगला देश को कई गुना धन दिल खोलकर मदद के रूप में दिया है, इसके अलावा तैमूरलंग के देश मंगोलिया जाकर अरबों रूपये देकर वाहवाही लूटी है.

ऐसे में सारे किसान खुद को ठगा सा महसूस करेंगे और कर्ज माफी का मामला उन राज्यों में भी शर्तों के साथ उठेगा, जिनमें काश्तकारों की हालत उत्तर प्रदेश से बेहतर नहीं है.

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शनिवार, 1 अप्रैल 2017

मेरा ड्राइविंग लाइसेन्स

मेरे ‘टू ह्वीलर्स & फ़ोर ह्वीलर्स’ ड्राइविंग लाइसेन्स को पिछले ३५ वर्षों में किसी परिवहन अधिकारी ने सड़क पर चेक नहीं किया क्योंकि मैंने कभी भी ऐसी नौबत नहीं आने दी. पिछली बार, सन 2012 में मेरे गृहनगर हल्द्वानी के रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस (RTO) में 5 वर्षों के लिए नवीनीकरण हुआ था. उस बार मुझे किसी हील-हुज्जत के, या यों कहूं कि बिना लाइन में लगे, बिना सुविधा शुल्क (रिश्वत) दिए ही सफलता मिल गयी थी क्योंकि मेरे एक निकट संबंधी यहीं हल्द्वानी में विजिलेंस विभाग में S.P. थे. उन्होंने मेरी सहायतार्थ एक इन्स्पेक्टर को साथ में भेज दिया था. RTO ऑफिस में चाय पीते हुए सारा काम हो गया था.

इस बार मैं थोड़ा शंकित भी था कि इस कार्य में मेरी उम्र व्यवधान बन सकती है. मैं अब एक महीने बाद ७८ का हो जाऊंगा. हल्द्वानी के बेस अस्पताल (जिसका प्रमाणपत्र उत्तराखंड परिवहन विभाग में मान्य होता है) में मेरी शारीरिक क्षमता तथा ज्ञानेन्द्रियों की तपास करने के बाद सब प्रकार से ‘फिट’ घोषित होने के बाद मैं प्रमाणपत्रादि लेकर RTO ऑफिस चला गया. ये मार्च 31 का दिन था. सरकारी कारोबार में साल का आख़िरी दिन होने से कार्यालय परिसर में बला की भीड़ थी. वाहन एवं वाहन मालिकों का हुजूम होने से मुझे अपनी गाड़ी दूर सड़क पर जाकर पार्क करनी पड़ी. उस मेले जैसे माहौल में अपने अपने काम से आये लोगों के अलावा ‘दलालों’ की टीम भी सक्रिय थी. दलाल की परिभाषा यह है कि वह सम्बंधित कर्मचारियों व अधिकारियों से सेटिंग रखता है, और सुविधा शुल्क लेता है. एक दलाल ने दूर से ही भांप लिया कि मुझे किसी की सहायता की दरकार है. वह मुझ से आकर बोला “खर्चा-पानी लगेगा. मैं करवा दूंगा, आपका लाइसेन्स रिन्युअल."

मुझे वहाँ गाइड करने वाला PRO का कार्यालय भी नहीं मिला. बिल्डिंग की बाहरी खिड़कियों पर दोपहर की चिलचिलाती घूप में वाहन मालिकों, टैक्सी ड्राइवरों, रजिस्ट्रेशन कराने वालों या कागजात ट्रांसफर कराने वालों की लम्बी लम्बी लाईनें, तथा फीस जमा कराने वालों की धक्का-मुक्की देखकर मेरे पास दलाल से ‘हाँ’ कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.  

वर्षों पहले से एक मिथक दिमाग में रहा है कि RTO का मतलब भ्रष्टाचार का बोलबाला. कई बार समाचारों में पढ़ा भी है कि छापामारी में कई लोग पकड़े जाते रहे हैं, पर फार्मूला भी हमेशा रहा है कि "रिश्वत लेते पकड़े गए और रिश्वत देकर पाक साफ़ हो गए."

मुझे सन 2007 के रिन्युअल का दिन भी याद है. मैंने सम्बन्धी क्लर्क को सीधे सुविधा शुल्क देकर ‘मित्रता?’ कर ली थी. बातों ही बातों में मालूम हुआ कि इस ‘मलाईदार’ पोस्ट से उसका ट्रांसफर अल्मोड़ा RTO ऑफिस को हो रहा था. वह बड़े आहत स्वर में मुझे बता रहा था कि “अल्मोड़ा ऑफिस में कोई कमाई नहीं है. अपने वेतन से ही गुजारा करना पड़ेगा.”

मैं यह नहीं कहूंगा की हर सरकारी कर्मचारी बेईमान होता है, सच तो ये है कि हम हिन्दुस्तानियों के जींस में बेईमानी बस गयी है. एक ट्रक के पीछे जुमला लिखा था, "सौ में से नियानाब्बे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान." चुनावों में जीत कर आने वाली सभी पार्टियों के नेता ऊंचे ऊंचे स्वरों में कहा करते हैं, "भृष्टाचार को ख़तम कर देंगे." लेकिन ये जुमले थोड़े दिनों में भुला दिए जाते हैं. लोकतंत्र को सबसे अच्छी शासन व्यवस्था कहा जाता है, पर चुनाव जीतने के लिए अनाप-सनाप खर्चा होता है, जिस पर कानूनी लगाम बेअसर है. राजनीति एक व्यापार बन गयी है; निवेश करके पांच साल में कई गुना वसूली का लक्ष्य रहता है. आंकड़े बताते हैं कि जीतने वालों की परिसंपतियों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो जाती है. दूसरा कारण है, "ठेकेदारी प्रथा." हर ठेके के व्यापार में सिस्टम इतना बिगड़ चुका है कि कमीशन की रेट तय हैं. जिनका बँटवारा संतरी से लेकर मंत्री तक ऑटोमेटिक पहुँचता है. दलाल तो गुड़ की मक्खी की तरह दौड़े चले आते हैं. जब खून मुंह लग जाता है तो लोई उतर जाती है. ये सिर्फ परिवहन विभाग की बात नहीं है, लोक निर्माण विभाग और राजस्व विभाग का और भी बुरा हाल है.

बहरहाल मेरा ड्राइविंग लाइसेन्स अगले पांच सालों के लिए रिन्यू हो गया है, शायद ये आख़िरी रिन्युअल भी हो.
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रविवार, 26 मार्च 2017

ठग्गूराम [किशोर कोना]

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि स्वनामधन्य स्व. काका हाथरसी ने अपनी एक सुन्दर और यथार्थ विरोधाभाषी नामावली कविता के रूप में लिखी है, पर मेरे इस लेख का हीरो ठग्गूराम ठीक इसके उलट ‘मनसा वाचा कर्मणा’ अपने नाम को सार्थक करता है.

यह सही है कि कोई सीधासाधा या बुद्धू व्यक्ति ठगी नहीं कर सकता है. ठग बहुत चालाक व तुरतबुद्धि वाला प्राणी ही हो सकता है. दुनिया भर में अनेक बड़े बड़े कॉनमेन (ठग) लोगों के किस्से लिखे-पढ़े या सुने जाते हैं. हमारे देश में ‘नटवरलाल’ शब्द अब ठगी का पर्याय माना जाने लगा है. ठग शब्द अब आक्सफोर्ड डिक्शनरी में भी स्थान पा चुका है. परंतु अंग्रेजी में thug की परिभाषा कुछ अलग ही है. Thug का मतलब होता है, गुंडा, बदमाश, चोर, या मुजरिम. हम यहाँ पर हिंदी वाले ठग की चर्चा करेंगे.

ठगों की वाणी व बोलने का लहजा इतना प्यारा और मनमोहक होता है कि वह सामने वाले के अंत:करण को छू कर अपने वश में कर लेते हैं. ठगे गए व्यक्ति को ठगी का अहसास बहुत देर से होता है, और उसकी टीस लम्बे समय तक सालती रहती है. ठगों के झंडे व्यापार, साहित्य, या राजनीति में तो गढ़े ही हैं, इनके कारनामे नाटकों और फिल्मों में भी उजागर किये जाते हैं.

हाँ, तो मैं जिस ठग्गूराम के बारे में बता रहा था वह हमारे जिला नैनीताल के एक गाँव ज्योलीकोट का रहनेवाला था. गरीब के घर पैदा हुआ था, पर बचपन से ही इस कला में प्रवीण हो गया था. स्थानीय लोग उसके बारे में बड़े चटखारे लेकर चर्चा किया करते थे. एक घटना कुछ वर्ष पुरानी है. हल्द्वानी नगर निगम से जुड़े काठगोदाम बस्ती में एक मधुशाला (शराब की दूकान) पर एक अनजान सूटेड-बूटेड व्यक्ति ने इस कदर शराब पी कि लड़खड़ाकर वहीं सड़क पर लुढ़क गया. जैसा कि इस प्रकार के दृश्य में अकसर होता है, तमाशाईयों ने खूब मजा लिया. शराबी के हाथ में नोटों की गड्डी और बगल में एक ब्रीफकेस सबको दिख रहा था. शराब तो शराब ही होती है, और जब कोई व्यक्ति ‘नीट’ पिएगा या अपने हाजमे से ज्यादा पी जाएगा तो बेहोश होकर सड़क या नाली में लुढ़केगा ही.

ठग्गूराम भी संयोगवाश शराब की तलब में उधर आ पहुंचा, और उसे देखते ही सारा माजरा समझ गया. खड़े लोगों को धकेलते हुए विलापी स्वर में जोर से बोला, “चचा ! ये क्या हाल बना रखा है, इस तरह बेशर्मों की तरह पड़े हो, उधर चाची का रो रो कर बुरा हाल हो रहा है, बच्चे परेशान हैं.”

ठगगूराम का नाटक सभी को असली लगा और लोगों ने सहयोग करके एक रिक्शा लाकर उसमें उस शराबी को लिटा दिया, जिसे लेकर ठग्गूराम चलता बना. अगले दिन सबको मालूम हुआ कि शराबी का भतीजा बन कर आने वाला कोई ठग था, जो एकांत में ले जाकर उसकी जेब साफ़ करके सामान सहित रफूचक्कर हो गया. शराबी को बड़ा सबक मिल गया, पर सांप के निकल जाने के बाद सड़क पीटने से कुछ नहीं होता है.

ठगी कुछ लोगों का स्वभाव हो जाता है, पर ये बहुत बुरी बात है. अगर कोई ठग पकड़ में आ जाता है तो उसको कड़ी सजा मिलती है.
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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

बैठे ठाले - १७

हर शहर की अपनी अपनी खासियत होती है, पर जो बात लखनऊ में है, वह कहीं और नहीं है.

अयोध्या से महज 40 मील दूर ये शहर राम जी के छोटे भाई लखन जी के नाम से है, ऐसा पौराणिक गल्पों पर विश्वास करने वाले लोग मानते हैं. मध्य काल में जब अवध के नवाबों की तूती बोलती थी तो गोमती नदी के तट पर बसे इस शहर को पूरब का कुस्तवनतुनिया या शिराजे-हिन्द भी कहा जाता था. इतिहास में दर्ज है कि इसे सर्वप्रथम नवाब आसिफुद्दौला ने अवध की राजधानी बनाया था.

इस शहर के विकास व सांस्कृतिक विरासत का विहंगम वर्णन करने बैठेंगे तो एक विराट पुस्तक बन जायेगी. यहाँ के शिया नवाबों ने विनम्र शिष्टाचार तथा व्यवहार में नफासत को नए आयाम दिए, खूबसूरत उद्द्यान बनवाये, उच्च कोटि की शायरी व नृत्य-सगीत को पूर्ण संरक्षण दिया. जिसे आज हम गंगा-जमुनी संस्कृति कहते हैं, उसे पोषित किया. जिसके तहत अनेक साहित्यकार, शायर/कवि, व शास्त्रीय संगीत/गायकी के बड़े नाम लखनऊ के साथ जुड़े हुए हैं. भारतीय सिनेमा पर भी लखनवी छाप यादगार है. अगर आप भी कभी लखनऊ सैर को निकले हों तो आपको शामे-अवध की गजरों की खुशबू, टिक्का कबाब का स्वाद, वहाँ की ऐतिहासिक छोटे-बड़े इमामबाड़े, और रूमी दरवाजा, अवश्य भाये होंगे और आधुनिक उभरते हुए लखनऊ की ऊंची इमारतें, अम्बेडकर स्मारक - मायावती के हाथियों की जमात, रेलवे स्टेशन, अमोसी एरोड्रम आदि सब मिलाकर एक सपना सा अवश्य लगा होगा.

यों आज का लखनऊवासी उत्तरप्रदेश के अन्य शहरों के निवासियों से कतई अलग नहीं लगते हैं क्योंकि ये अब मैट्रोपॉलिटन सिटी बन गया है. पर मुझे यहाँ की पुरानी तहजीब पर ये जुमला/लतीफा बहुत पसंद है:

फन्ने खां बड़े किस्मत वाले थे कि उनको ससुराल लखनऊ में मिला. जब वे पहली बार वहाँ गए तो बड़ी आवभगत हुई. सासू माँ (खाला) बोली, “दामादजी, आपकी पसंद चाहती हूँ. खाने में सब्जी क्या बनाऊँ? आपके लिए बैगन-शरीफ पका लूं या भिन्डी-मुबारक या फिर आप पालक-पाक खाना पसंद करेंगे?”
फन्ने खां ने उसी अंदाज में जवाब दिया, “खाला, मैं तो बेरोजगार आदमी हूँ. इन मुक़द्दस सब्जियों के नाम लेने के काबिल भी नहीं हूँ. आप ऐसा कीजिये कोई बेगैरत-आवारा सा मुर्गा ही पका लीजिये.”

यों ‘पहले आप – पहले आप’ की विनम्रता का अंदाज आज भी लखनऊ वालों में मौजूद है, और ऐसा कहते हैं कि इसी हुजूरी में उनकी अकसर ट्रेन छूट जाती है.

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शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

लाखों सपनों का शहर - कोटा

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के हाड़ौती इलाके में बसा हुआ 900 वर्ष पुराना कोटा शहर पिछले 30 वर्षों के अंतराल में पुरानी राजशाही चौहद्दी से बाहर निकल कर एकाएक ‘एजुकेशन हब’ के रूप में विकसित हो गया है, और अनपेक्षित रूप से फ़ैल भी गया है. यहाँ पर बिजली, पानी, रेल व सड़क यातायात की सुविधा सब इफरात से प्राप्य है. आज एक लाख से अधिक संख्या में लड़के लड़कियां अपने भविष्य के बड़े बड़े सपने संजोकर यहाँ के छोटे-बड़े दर्जनों कोचिंग-इंस्टीट्यूट्स में सुबह-शाम अलग अलग पारियों में फिज़िक्स, कैमिस्ट्री, बायोलजी/ मैथ्स की पढ़ाई करके अपने सपने सच करने के लिए दिन रात व्यस्त रहते हैं. कुछ कोचिंग संस्थान ‘प्राईवेट लिमिटेड’ भी हो गयी हैं. बंसल, ऐलन, रेजोनेंस, मोसन, कैरिअर पोंइट्स, व्हाईब्रेंट आदि अनेक बड़े नाम हैं, जिन्होंने अनुभवी तथा ब्रिलियंट एकेडेमिक कैरियर वाले प्राध्यापक नियुक्त किये हुए हैं. पढ़ाई का स्तर निश्चित रूप से सामान्य से ऊपर होगा. परीक्षापयोगी विषय ‘कैप्स्यूल’  बना कर विद्यार्थियों को परोसे जाते हैं. सफलताओं के बड़े बड़े विज्ञापन अखबारों में व होर्डिंग्स में देखने को मिलते हैं. इसलिए देश के अन्य प्रान्तों से भी बच्चे यहाँ आने को लालायित रहते हैं, तथा बड़ी बड़ी कोचिंग फीस सहन करते हैं.

ये बात भी सही है कि इस संस्थानों का ये एक बड़ा व्यापार बन गया है. सालाना फीस एक लाख से अधिक वसूली जाती है. इनकी आलीशान बिल्डिंगें, तामझाम व आवरण देखकर ही समझ में आता है कि खर्चों से कहीं अधिक आमदनी हो रही है.  फीस पर कोई सरकारी या गैरसरकारी नियंत्रण ना होने से अवश्य मनमानी होती रही है. आलम ये भी है की अधिक कमाई के उद्देश्य से कुछ संस्थानों द्वारा अपनी ब्रांचेज (दूकानें) राजस्थान के अन्य शहरों में खोली जाने लगी हैं. इस ‘ट्यूशनराज’ के बारे में गत वर्षों में बहुत आलोचनाएँ और गंभीर चिंतन होते रहे हैं क्योंकि ग्रामीण अंचलों के विद्यार्थी या आर्थिक विपिन्नता वाले परिवारों के बच्चे इस सुविधा से वंचित रहते हैं. ये भी है कि लाखों में से कुछ प्रतिशत बच्चे अपेक्षित प्रतियोगी परीक्षाओं में बाजी मारते हैं. शेष हताशा के शिकार होते हैं. आकड़े बताते हैं कि नाउम्मीदी के तथा निराशा के कारण हर साल कुछ विद्यार्थी आत्महत्या भी करते हैं. प्रशासन व राजनीतिज्ञ इसलिए चुप हैं कि इस ‘ट्यूशन लॉबी’ का बड़ा दबाव व आर्थिक प्रभाव इन पर है.

इन संस्थानों की कुछ उच्च माध्यमिक स्कूलों से सेटिंग भी चल रही है कि बच्चे 9वीं कक्षा से ही कोचिंग फीस देकर अपने स्कूलों में ना जाकर यहाँ आते हैं और स्कूलों में हाजिरी लगती रहती है.

माता-पिता, सब, चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, सी.ए., या कलेक्टर बन जाएँ, और इसके लिए वे अपना सर्वस्व दाँव पर लगाने को तैयार रहते हैं. कुछ लोग सौभाग्यशाली अवश्य होते हैं, पर ये उपलब्धि कोचिंग के बिना भी संभव रहती थी. अब समय की सुई पीछे को नहीं घूम सकती है अत: इस सिस्टम का कोई विकल्प आम लोगों के पास नहीं है.

कोटा शहर के कुछ विशिष्ठ खण्डों में बहुमंजिली इमारतें बन गयी हैं जिनमें सैकड़ों की संख्या में हॉस्टल व भोजन-मैस का कारोबार हो रहा है. लोगों ने किराए के लालच से अपने घरों में भी छोटे पार्टीशन देकर कमरे किराए पर दे रखे हैं. हर गली/गेट पर ‘to-let’ का बोर्ड लटका हुआ नजर आता है.

फूहड़ सिनेमा-स्कोप को दोष दें या उम्र व संस्कारों का दोष मान कर चलें, यहाँ गार्जियनशिप के अभाव में कुछ लड़के लड़कियां मनमानी करते हैं. इनके माँ-बाप समझते होंगे कि ‘बच्चे पढ़ रहे होंगे’ पर ये यहाँ पार्कों में या एकांत जगहों में प्रेम-लीला में व्यस्त रहते हैं. यदि ये बच्चे अपनी ज़िंदगी को बैलेन्स करके चलें तो ठीक है. नाबालिग़ बच्चों पर प्रशासन तथा शिक्षण संस्थानों को कोई निगरानी तंत्र की तुरंत व्यवस्था करनी चाहिए, अन्यथा बच्चों के हों या माता-पिता के, सपने यों बर्बाद नहीं होने चाहिए.
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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

ऐफिशेन्सी बार

"प्रथम सीमेंट वर्कर्स वेज बोर्ड" के तहत आने वाले समस्त कर्मचारियों के लिए ‘नॉमेंक्लेचर’ व तदनुसार ‘पे-स्केल’ श्री जी.एल. गोविल (तब एसीसी के सीनियर एक्जेक्युटिव) की सदारत में तैयार किये गए थे. मंथली-पेड स्टाफ के पे-स्केल में दस साल की सर्विस के बाद E.B. यानि ऐफिशेन्सी बार का प्रावधान रखा गया था. यदि कर्मचारी अपने काम में सक्षम नहीं हो तो इस प्रावधान के तहत उसकी वेतन वृद्धि पर रोक लगाई जा सकती थी. 

नियुक्ति पत्र के अनुसार मुझे हर साल १० रुपयों की मूल वेतन वृद्धि प्राप्त होती रही. जब ९ वर्षों के बाद E.B. पर पहुंचा तो मुझे वार्षिक वेतन वृद्धि नहीं दी गयी. मैं शिकवा-शिकायत लेकर तत्कालीन पर्सनल ऑफिसर श्री वीरेंद्र सिंह जी से मिला तो उन्होंने रूखा सा जवाब दिया कि “E.B. पर कंपनी कोई कारण बताये बिना वेतन वृद्धि रोक सकती है.” उन वर्षों में मुझे अपनी ड्यूटी के सम्बन्ध में या ड्यूटी के अलावा यूनियन आदि की एक्टिविटीज (खुराफातों) के लिए कोई नोट, वार्निंग या सजा नहीं मिली थी इसलिए मैं अपनी ‘ऐफिशेन्सी’ के बारे में ज्यादा सैन्सिटिव हो गया था. मैं असिस्टेंट मैनेजर (प्रशासन में नंबर २) स्व. धोतीवाला जी से मिला. वे बड़े सरल व सुहृद पारसी जेंटलमैन थे. मुझसे उनकी पूरी हमदर्दी थी, पर ऐसा लगा कि तब मैनेजमेंट में उनकी बात को कोई तवज्जो नहीं मिला करती थी. मेरी बात सुन कर वे बोले, “Why don’t you go to the labour court?”

मैंने अपनी शिकायत एक रजिस्टर्ड पोस्ट से लेबर कोर्ट (तब जयपुर में हुआ करता था) को भेज दी. बाद में तारीख पड़ी तो मैं ढूंढते हुए वहाँ पहुंचा. मैनेजमेंट की तरफ से श्री वीरेंद्र सिंह जी के साथ एक बुजुर्ग+खुर्राट एडवोकेट स्व. माथुर (उनका पूरा नाम अब मुझे याद नहीं है) वहाँ पहुचे थे. जज भी कोई बुजुर्ग व्यक्ति थे, जो हाई कोर्ट से रिटायर्ड थे. मेरे साथ कोई बहस नहीं हुई, पर मैनेजमेंट ने अगली पेशी से पहले मुझे एरियर सहित मेरा रोका गया ऐनुअल इन्क्रीमेंट दे दिया. बाद में मुझे मालूम हुआ कि मेरे उस प्रयास से अन्य 9 कर्मचारियों को भी लाभ मिला, जिनमें श्री बालकृष्ण सेनी (तब स्टोनोग्राफर), श्री गोपाल लाल महेश्वरी ड्राफ्ट्समेन, तथा अन्य थे. सबने मुझे धन्यवाद दिया, लेकिन मैनेजमेंट को अवश्य तकलीफ हुयी होगी. उसके तुरंत बाद सन 1970 में मेरा ट्रांसफर शाहाबाद, कर्नाटक को कर दिया गया. ट्रान्सफर में कई कारक थे, परंतु उनमें इस घटना का भी संयोग रहा था.
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मंगलवार, 17 जनवरी 2017

अच्छाई के तार दूर तक जुड़े रहते हैं (संस्मरण )

मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार श्री महेश चंदोला सन 1981 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके नौकरी की तलाश में मेरे पास लाखेरी आये तो स्वाभाविक रूप से सब तरफ नौकरी की संभावनाओं की तलाश की गयी. मेरे एक पूर्व परिचित श्री पुष्पेन्द्र सिंह जी तब सवाईमाधोपुर स्थित जयपुर उद्योग (साहू जैन का सीमेंट कारखाना) की फलौदी माईन्स में मैनेजर थे. उन दिनों मोबाईल/ टेलीफोन की कोई सुविधा नहीं हुआ करती थी अत: मैंने एक पत्र साधारण डाक से इस सम्बन्ध में लिख भेजा. उन्होंने तुरंत प्रत्युत्तर में महेश जी को इंटरव्यू के लिए बुलावा भेज दिया.

श्री पुष्पेन्द्र सिंह जी सन 1964-65 में लाखेरी की हमारी माइन्स में एक जूनियर ऑफिसर (असिस्टेंट क्वारी मैनेजर) हुआ करते थे. मेरी उनसे कोई घनिष्टता नहीं थी. उन दिनों मैं लाखेरी बहुधंधी सहकारी समिति का अवैतनिक महामंत्री था और वे मात्र 10 रुपयों के एक शेयर के खाताधारक थे. परेशानियां बोल कर नहीं आती हैं. एक रात में अचानक श्रीमती सिंह को ब्रेन हैमरेज हो गया. डॉक्टर मुखर्जी और एक दो अन्य ऑफिसर्स के साथ उन्होंने मेरा दरवाजा खटखटाया. अपनी आपदा बताते हुए तुरंत 1000 रुपयों की व्यवस्था करने की बात कही. एक हजार रूपये उन दिनों बड़े मायने रखते थे. जूनियर ऑफिसर्स को मात्र 250 रूपये वेतन मिला करता था. गंभीर परिस्थिति देख कर मैंने रात को ही समिति की तिजोरी खुलवाई, और अपने नाम से 1000 रुपयों का संड्री एडवांस लेकर उनको दिया. वे श्रीमती सिंह को ईलाज के लिए जयपुर लेकर गए. भगवत कृपा से उनको जल्दी स्वास्थ्य लाभ हो गया. कुछ दिनों के बाद लाखेरी लौटकर उन्होंने ये रकम लौटा दी. "A friend in need is a friend indeed" वाली बात उनके जेहन में अवश्य रही होगी इसलिए उन्होंने तुरंत कारवाही की. मैं स्वयं श्री महेश के साथ फलौदी माईन्स पहुंचा। उन्होंने हमें अपने आवास में ले जाकर श्रीमती सिंह के हाथों से बनाया भोजन कराया. उनका ये सत्कार अविस्मरणीय था. बाद में अपनी जीप में बैठा कर सवाईमाधोपुर प्रशासनिक कार्यालय में ले गये और इंटरव्यू के बाद श्री महेश चंदोला को ड्यूटी जॉइन करने को कह दिया.

पुष्पेन्द्र जी खानदानी व्यक्ति हैं. मैंने उनसे परिचय का लाभ अपनी सहकारी समिति के विधान संशोधन के दौरान उनके ससुर श्री राजा निरंजन सिंह जी से लिया था. वे राजस्थान कोऑपरेटिव सोसाइटीज के रजिस्ट्रार हुआ करते थे.

पुष्पेन्द्र सिंह जी बाद के वर्षों में मंगलम सीमेंट में  उच्चाधिकारी हो गए थे.

महेश चंदोला जी ने फैकट्री में घूमकर बिजली की वायरिंग्स और कनेक्शन की दुर्दशा देखी तो वहां जॉइन ना करने का निश्चय किया. सचमुच सब तरह से मिसमैनेजमेंट के चलते जयपुर उद्योग का भट्टा जल्दी बैठ गया. महेश जी को उसी बीच गुजरात सरकार के जॉइंट वेंचर वाले सीमेंट उद्योग नर्मदा सीमेंट में नौकरी मिल गयी थी, और अब बिरला सीमेंट उद्योग की एक यूनिट में चीफ इलैक्ट्रिकल इंजीनियर के बतौर कार्यरत हैं. उनके संघर्ष के दिनों में पुष्पेन्द्रसिंह जी द्वारा दिखाई सह्रदयता को वे भी नहीं भूले हैं.
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