शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

उन्हीं की ज़ुबानी

गृह-प्रवेश का एक सुन्दर व आकर्षक निमंत्रण-पत्र कूरियर के हाथों मुझे मेरे घर पर मिला तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि भेजने वाले सज्जन, गोविन्द जोहारी, को मैं बिलकुल नहीं जानता था. ना इस नाम के किसी व्यक्ति से दूर दूर तक कोई रिश्ता था. कुमायूं में जोहारी उपनाम धुर उत्तर में जोहार ( हिमालयी क्षेत्र ) के आदिवासी जनजाति के लोग लगाया करते हैं.

श्री गोविन्द जोहारी ने अपने पते में नाम के आगे आई.ए.एस. लिखा था, तथा अपने दो मोबाईल नंबर दे रखे थे. गृह-प्रवेश अल्मोड़ा शहर के आउट स्कर्ट में बिनसर मार्ग पर काफी ऊँचाई वाले स्थान पर नए बनाए भवन में होना था. मैं समझ नहीं पाया कि दूर के शहर में रहने वाले मुझ अपरिचित को बुलावा क्यों भेजा गया होगा? कहीं पता लिखने वाले ने गलती से तो मेरा पता लिख दिया? शंकातुर होकर मैंने उनसे फोन से सम्पर्क करके पूछना उचित समझा. फोन पर उनकी आवाज एक बूढ़े आदमी की सी भारी और बोझिल लग रही थी. उन्होंने कहा कि मुझे निमंत्रण कुछ ख़ास प्रयोजन से भेजा गया है. उन्होंने मेरी लिखी किताबें और बहुत से लेख पढ़े थे, और उनकी अपेक्षा थी कि मैं उनकी आत्मकथा लिखूं. बातों बातों में उन्होंने यह भी कह डाला कि वे मुझे मेरा लेखकीय पारिश्रमिक मुंहमांगा देंगे. बहुत सोचविचार करने के बाद मैंने निश्चय किया की उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया जाए. इस प्रकार मैं गृह-प्रवेश से एक दिन पहले ही सड़क मार्ग से उनके परिसर में पहुँच गया.

अल्मोड़ा शहर की ढलानों के ऊपर पूरब दिशा की और से बल खाती हुयी सड़क से जाते हुए मेरी गाड़ी उनके परिसर में पहुँच गयी. जहाँ एकांत में टीला काटकर सुन्दर दुमंजिला महलनुमा घर बनाया गया था. अहाते को मौसमी फूलों से सजाया हुआ था. चारदीवारी को ताजा ताजा रंगबिरंगे बिजली की रोशनियों से संवारा जा रहा था. कुछ कारिंदे अन्दर बाहर जा रहे थे. घर के निकट पहुँचते ही खुद जोहारी जी बाहर निकल कर आ गए. उनके बारे में जैसी मेरी कल्पना थी, वे उतने  भी ज्यादा बूढ़े नहीं थे. उम्र करीब सत्तर वर्ष होगी पर उनकी आवाज और हाथों में कम्पन मुझे स्पष्ट मालूम हो रहा था. उन्होंने मेरे ड्राईवर और अपने एक कारिंदे को मेरे ठहरने की व्यवस्था के बारे में समझाया और बड़ी आत्मीयता से मेरा हाथ थाम कर अपनी बैठक में ले गए. उन्होंने बताया कि गृह-प्रवेश तो उन्होंने महीने भर पहले ही कर लिया था, पर बरसात के चलते विधिवत पूजा अगले दिन के लिए टाल दी गयी थी. उन्होंने मुझ से कहा, आप यहाँ घूमिये, फिरिए, इन वादियों का आनंद लीजिये; पूजा के बाद आपके साथ बैठक करूंगा.

अपने घर से चलते समय तो मैं इसे सिर्फ एक बिजनिस ट्रिप मान कर चला था, पर यहाँ का नैसर्गिक सौन्दर्य और अक्टूबर माह की पुष्पित, सुगन्धित छटा को देखकर भावविभोर हो गया. दूर तक पर्वत श्रंखलाओं का घेरा और बीच में नीचे गहराई में कोसी नदी का सर्पीला मार्ग, सामने की पहाड़ियों पर हंसती हुई दन्तपंक्ति सी श्वेत बस्तियां; कोई प्रदूषण नहीं, शीतल मंद पवन के झोंके, कुल मिला कर एक अद्भुत अनुभूति हो रही थी. जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

जोहारी साहब ने  देवदार की लकड़ी के बहुत महंगे फर्नीचर बनवा रखे थे, जिनकी भीनी भीनी खुशबू हर तरफ महक रही थी. रात काफी ठंडी थी, पर गुदगुदे नरम बिस्तर पर सोते हुए मैं दूसरी दुनिया के सपनों में खोकर सो गया. अगली सुहानी सुबह को तरोताजा होकर अपनी कल्पनाओं को लेखनी से उकेरना शुरू कर दिया. दिन में पूजा पाठ हुआ. उनके आमंत्रित अनेक गणमान्य मेहमान आये, भोज में शामिल हुए. मैंने देखा कि कार्यक्रम में वैभव तथा व्यवस्था की कोई कमी नहीं थी. जब सब कार्यक्रम शालीनता पूर्वक सम्पूर्ण हो गया, तब जोहारी जी ने अपनी रामकहानी सुनाने के लिए मुझे अपने विशेष कमरे में बुलाया. मैं पेन, पेपर, और एक टेप-रेकॉर्डर लेकर पूरी तैयारी के साथ गया. कमरे में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती खेमा (क्षमा) देवी मौजूद थी. उनके चेहरे पर भी बुजुर्गी की सैकड़ों झुर्रियां थी.  नैन-नक्श  बिलकुल पहाड़ी/नेपाली थे. खुद जोहारी जी का चेहरा भी तिब्बतियन सा लग रहा था. मैंने उनकी पृष्ठभूमि पर उनसे पूछना चाहता था, पर वे अपनी निजी जीवन की परतें खुद ही खोलते चले गए.

मेरा नाम गोविन्द जोहारी है. ये मेरी अर्धांगिनी खेमा है. हमारा एक ध्रुव नाम का बेटा है, जो नेदरलैंड में रहता है. हमारा मूल स्थान मुनस्यारी के पास जोहार दारमा में है, जो हिन्दुस्तान व तिब्बत की सीमा पर है. मेरे पिता के पास एक सौ भेड़ें (मेंढे) हुआ करती थी. वे अपने अन्य गांववालों की तरह ही भेड़ों पर नमक, आलू, ऊन, और पहाड़ी मसाले जम्बू-गंध्रायण आदि लाद कर, पैदल मार्गों से हल्द्वानी, नैनीताल के आढ़तियों तक पहुँचाते थे और वहाँ से गुड़, चावल तथा कुछ अन्य खाद्य सामग्री तिब्बत के व्यापारियों तक लेकर जाते थे. बचपन में मैं भी दो बार उनके काफिले के साथ पैदल धारचूला से हल्द्वानी तक आया गया था. जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ तो हमारी भोटिया जनजाति को आदिवासी के रूप में अनुसूचित जनजाति की सूची में रखकर आरक्षण व विशेष सुविधाएं दी गयी. इसके लिए हम लोग स्व.गोविन्द बल्लभ पन्त और पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के शुक्रगुजार हैं.

मुझे पढ़ाई के लिए नैनीताल छात्रावास में रहने का अवसर मिला, जहां मैंने औसत विद्यार्थी की तरह पढ़ाई करके बी.ए. पास किया. सभी आदिवासी छात्रों के लिए मुफ्त भोजन व छात्रवृत्ति की व्यवस्था थी. सच पूछो तो ये हमारे लिए एक क्रान्ति के समान था. सभी लड़कों में पढ़ने और नौकरी करने की होड़ थी.

मैं सन १९७१  में पाकिस्तान  से हुई  लड़ाई के समय शार्ट सर्विस कमीशन के तहत सेना में भरती हो गया था. पांच साल बाद ही एक कैप्टन के बतौर पैंशन लेकर निवृत्त हो गया. सरकार ने मुझे फिर से सिविल में नौकरी दे दी. मैं जल बोर्ड का एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर बन गया. मैं पी.सी.एस. की परीक्षा में सफल रहा तो मुझे राजस्व विभाग का सेक्रेटरी बनाया गया. मैंने आर्मी में की गयी अपनी सेवा को जुड़वाने का आवेदन किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया. वरिष्ठता के हिसाब से कुछ सालों के बाद मुझे आई.ए.एस. का प्रमोशन मिल गया. हर जगह मुझे अनुसूचित जनजाति होने का लाभ भी मिलता रहा. मैं महाराष्ट्र के एक जिले में जिलाधीश के रूप में नियुक्त हुआ, तत्पश्चात अनेक जिलों में स्थांनातरण होता भी रहा. उसी दौरान पूना में मैंने अपना एक घर बनवाया. जिसकी लागत तब करीब पचास लाख रूपये आयी थी. हम लोग उस घर को अपना स्थाई निवास समझने लगे थे. वहीं हमारे बेटे का जन्म भी हुआ. पूना में ही ध्रुव की पढ़ाई-लिखाई हुई. उसने एम.सी.ए. करके एक इन्टरनेशनल कंपनी में नौकरी कर ली. आजकल उसकी नियुक्ति नेदरलेंड में है. मैं तो चाहता था की वह भी भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे, पर उसकी मर्जी नहीं थी."

ऐसा कहते हुए वे बहुत उदास हो गए थे और बहुत देर तक उनके बोल नहीं निकले. खेमा देवी चुपचाप उनका वक्तव्य सुन रही थी. मैं बीच बीच में उनके चेहरे के बदलते भावों को भी देख लेता था. वार्ता के बीच उन्होंने चाय भी मंगवाई। उन दोनों ने फीकी चाय पी क्योंकि दोनों ही मधुमेह से ग्रस्त थे. उन्होंने आगे कहना शुरू किया, ध्रुव ने अपनी इच्छा से अपने साथ काम करने वाली एक यूरोपीय लड़की से शादी कर ली, और अब उनके दो बच्चे हैं. ये लोग हिदुस्तान आने में कई तरह की परेशानियां बता कर टालमटोल करते आये हैं. हम ही कई बार वहां जाकर आये हैं. अब भी जाने को मन तो होता है, पर अब हवाई यात्रा में दिक्कत महसूस करने लगे हैं.

सरकार ने मुझे सेवा के अंतिम वर्षों में प्रांतीय चुनाव आयोग का कमिश्नर बना दिया था. अब मुझे रिटायर हुए भी दस साल हो चुके हैं. पूना में इतने वर्ष बिताने पर भी हम वहाँ परदेस जैसा ही अनुभव कर रहे थे इसलिए यहाँ अपने मूल जिले में रहने का ठिकाना बनाया. यद्यपि हमने ये निर्णय बहुत देर से लिया है. अब तो अल्मोड़ा जिले के  चार टुकड़े हो गए हैं, पर अल्मोड़ा शहर कई मायनों में हमारे लिए सुरक्षित और सुविधाजनक है. मैंने पूना वाला घर तीन करोड़ रुपयों में फर्नीचर व सामान सहित बेच दिया है, और यहाँ अल्मोड़ा में सवा करोड़ में आप देख रहे हैं, ठीक-ठाक घर बन गया है. बड़ी बात ये है कि इस मिट्टी की खुशबू में अपनेपन का एहसास होता है, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर हम दोनों ही थक से गए हैं. बेटा बार बार कहता है कि नेदरलैंड में उनके साथ रहने को आ जाओ पर अब इन पुराने दरख्तों को कब तक नई नई जगह रोपते रहेंगे. ये कहते हुए उनका गला फिर से भर आया. खेमा देवी की आँखें भी छलछला आई.

वे थोड़ा रुकने के बाद बोले, मुझे अस्सी हजार रूपये पैंशन मिलती है. एक लाख से ज्यादा रूपये मेरी जमापूंजी के ब्याज व शेयर्स का रिटर्न आता रहता है. आप देख रहे हैं हम दोनों डाईबिटीज वाले हैं, सब कुछ होते हुए भी खा नहीं सकते हैं. अब ऊपर वाले से शिकायत भी नहीं कर सकते हैं; उसने हमको अपनी तरफ से सब कुछ दिया है.

मैंने इंटरनेट पर आपके ब्लॉग व सारगर्भित प्रसंग पढ़े हैं. आपकी लेखनी द्वारा चुने हुए शब्द विन्यास बहुत प्रिय लगते हैं इसीलिये मैंने आपको बुलाया और आपने भी मेरा मान रखा है. आप मेरी कथा को शब्दबद्ध कर दीजिये. मैं अपनी वसीयत के साथ इस कहानी को भी बांटना चाहता हूँ ताकि मेरे नजदीकी रिश्तेदार, जो अब मेरी जायदाद पर टकटकी लगाये हुए हैं, उनका आपस में कोई विवाद ना हो.  ऐसा कहते हुए वे सोफे पर निढाल हो गए. संध्या समय में मैंने उन्हें आत्मकथा के छूटे हुए अंशों को उजागर करने वाले उनकी निजी जिन्दगी से सम्बंधित अन्य पहलुओं पर एक लम्बी प्रश्नावली बनाकर दी. जिसका जवाब उन्होंने तैयार करके, मेरे द्वारा चाहे गए पारिवारिक चित्रों, तथा बैंक के एक हस्ताक्षरित ब्लैंक चेक सहित उसके अगले दिन मुझे सौंप दिये. मैं अपने घर लौट आया हूँ. अब भी मैं जरूरत महसूस करने पर उनसे फ़ोन पर वार्ता करके उनके जीवन के अनछुए वृत्तांत पूछता रहता हूँ. एक बार पुनः मिलने जाऊंगा. मुझे गोविन्द जोहारी जी की ये आत्मकथा अगले दो माह में सम्पूर्ण करनी है.
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शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल लाखेरी, बूंदी, राजस्थान

डी.ए.वी. का फुल फॉर्म है, ‘दयानंद एंग्लो वैदिक.’ स्वामी दयानंद सरस्वती (१८२४-१८८३) एक महान समाज सुधारक, चिन्तक, देशभक्त सन्यासी हुए हैं. उन्होंने अंध विश्वासों और समाज में फैले पाखंडों के विरुद्ध जन जागरण किया. आर्यसमाज की स्थापना की और सर्वप्रथम स्वराज का सन्देश दिया. हरिद्वार में गुरुकुल कागडी की स्थापना उन्होंने ही की. उनकी मृत्यु अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा एक जघन्य षडयंत्र के तहत जहर देकर कराई गयी थी. मृत्युपरांत उनके अनुयाईयों में एक लाला हंसराज ने सन १८८६ में सर्वप्रथम ‘एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना लाहौर में की  उन्ही दिनों जालंधर (पंजाब) में डी.ए.वी. विश्वविद्यालय की स्थापना भी हुयी थी इसे आधुनिक भारत का नालदा कहा गया है. धीरे धीरे डी.ए.वी. स्कूलों की श्रंखला पूरे देश में फैलती चली गयी. २०१० में जब इसकी १२५ वीं जयन्ती मनाई गयी थी, तो उस वक्त के आंकड़े के अनुसार ५६० पब्लिक स्कूल व ८५ सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल थे. इसके अलावा ७० सस्थान ऐसे हैं जिनमें आर्ट, साईंस, क़ानून, कृषि, आयुर्वेद, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, नर्सिंग, डेंटल, फीजियोथेरेपी, और वैदिक रिसर्च का अध्ययन एवं अध्यापन किया जाता है.

लाखेरी में सन १९७० तक कोई अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं था. उन दिनों उत्तर भारत के सभी शहरों में बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने प्रचलन शुरू हुआ था. यह एक तरह से आवश्यकता भी हो गयी थी क्योंकि बंगाल एवं दक्षिण भारत के बच्चे अंग्रेजी की वजह से प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर रहे थे. नेता लोग जरूर अंग्रेजी का विरोध सार्वजनिक स्तर पर कर रहे थे, पर अपने खुद के बच्चों को इंग्लिस मीडियम स्कूलों में पढ़ाते थे.

शिक्षा के क्षेत्र में क्रिश्चियन मिशनरीज ने बहुत काम किया है. हालाँकि कट्टरपंथी लोग इसे ईसाई धर्म प्रचार का एक तरीका मानते रहे हैं. देश भर में ईसाई नन्स द्वारा यह पुनीत कार्य बहुत गौरवशाली ढंग से अनवरत किया जाता रहा है. चूंकि पब्लिक स्कूल खोलना व चलाना अब एक कमाऊ व्यवसाय भी बन गया है इसलिए आज देश भर में गली-गली, मोहल्ला-मोहल्ला में पब्लिक स्कूल के बोर्ड लगे हुए दिखाई देते हैं.

हमारी लाखेरी में १९७० के आसपास जब कोटा से इमैनुअल मिशनरी स्कूल वाले एसीसी मैनेजमेंट से अपना स्कूल खोलने के सम्बन्ध में मिले तो मैनेजमेंट ने सहर्ष ईश्वर नगर में क्लब के पीछे वाले नए जेएसक्यू (जूनियर स्टाफ क्वार्टर) उनको दे दिया. ये कुछ सालों तक चला, लेकिन आमदनी कम और खर्चा ज्यादा होने से गाड़ी आगे रुक गयी. मैनेजमेंट ने अजमेर के एक रिटायर्ड प्रिंसिपल श्रीवास्तव जी से संपर्क करके नई व्यवस्था ‘प्रोग्रेसिव इंग्लिश मीडियम स्कूल’ खुलवाया, जो सन १९८० तक चला. कंपनी ने उनके स्कूल को आर्थिक सहायता के साथ एक रिहायसी टीआरटी क्वार्टर भी आवंटित किया. इस समय तक एसीसी के कई अन्य कारखानों में पहले से ही डी.ए.वी द्वारा स्कूल संचालित हो रहे थे. दिल्ली मुख्यालय से लिखा-पढ़ी करके यहाँ भी पब्लिक स्कूल की शुरुआत की. छात्रों की संख्या बढ़ने पर एक और जेएसक्यू दिया गया. यहाँ के पहले प्रिंसिपल श्री जे.एन. ऋषि थे. धीरे धीरे स्कूल को अच्छी मान्यता मिलती गयी. छात्र संख्या बढ़ती रही तो कंपनी ने नीचे जींद की बावडी के पास बिल्डिंग बनाकर दी. इसको बनाने में आर्थिक योगदान डी.ए.वी. मैनेजमेंट का भी था या नहीं, मुझे मालूम नहीं है. बाद में नया स्टाफ व नए प्रिंसिपल आते रहे, लेकिन विस्तार का कार्य मुख्यत: मोहनलाल गोयल जी ने किया. उनकी एसीसी मैनेजमेंट से अच्छे सम्बन्ध थे. वे बाद में जयपुर में रीजनल डाईरेक्टर बने.

डी.ए.वी. में भी तब सारा टीचिंग स्टाफ अच्छा नहीं था. पैसा बचाने के लिए ग्रीष्मावकाश के बाद नए चेहरे (अनट्रेंड भी) रखे जाते थे. मैंने एक बार श्री गोयल जी से इस बाबत जब चर्चा की तो वे बोले “आमदनी से खर्चा बड़ा है, ३००० रुपयों में तो ‘GIRL गिर्ल’ ही मिल सकती है.” पर बाद में ये स्थिति नहीं रही थी. आज श्री ए.के. लाल यहाँ प्रिंसिपल हैं. पुराने अध्यापकों में सर्वश्री आर.के. यादव, आर.एस.एल.शर्मा, गिरिराज जायसवाल, व आर.के. गोचर मौजूद हैं. स्टाफ पूरा प्रशिक्षित है. अच्छा स्कूल होना लाखेरीवासियों का सौभाग्य है. यहाँ से पढ़ कर निकले हुए बच्चे अपने जीवन की ऊंचाईयों को राष्ट्रीय स्तर पर छू रहे हैं. इस स्कूल का नाम बूंदी जिले में ही नहीं, पूरे राजस्थान प्रदेश के अग्रिम पब्लिक स्कूलों में गिना जाता है. यहाँ से पढ़ कर निकले हुए बच्चे विदेशों में भी परचम लहरा रहे हैं. स्कूल को इस ऊँचाई तक पहुँचाने का श्रेय जरूर स्कूल प्रबंधन को है, पर एसीसी मैनेजमेंट ने भी भरपूर सहयोग दिया है, विशेषकर पूर्व जनरल मैनेजर श्री पी.के.काकू की व्यक्तिगत शुभचिन्ता नहीं भुलाई जा सकती है. मैं समझता हूँ कि कंपनी अपने कर्मचारियों के बच्चों के अनुपात में आज भी आर्थिक सहायता स्कूल को देती होगी. स्कूल प्रबंधन बताता है कि अब दूर दराज के इलाकों से भी बच्चे यहाँ पढ़ने आने लगे हैं.

अंत में, जैसा कि डी.ए.वी, के नाम से ही जाहिर है, इसमें अंग्रेजी के अलावा संस्कृत व हिन्दी में भी बच्चों को ज्ञान दिया जाता है. उनके चरित्र निर्माण पर विशेष ध्यान रखा जाता है. जय हो.
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शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

बापू हम शर्मिन्दा हैं

बापू, हम शर्मिन्दा हैं!
नाथूराम गोडसे किसी व्यक्ति का नाम नहीं रहा है. यह एक विचारधारा है, जिसने हमारी सहिष्णुता की चूलें हिला दी हैं. जिस हिंसा और घृणा के विरुद्ध आपने अपनी जान गँवाई थी, आज उसका मखौल बनाया जा रहा है. आपकी जय गाने वाले सभी राजनेता सिर्फ सत्ता सुख चाहते हैं. किस किस का नाम लूं, सबने कई कई मुखोटे पहन रखे हैं.

शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर एक नामधारी स्टेज कवि ने चटखारेदार अकविता सुनाई जो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुयी कि :

अच्छा हुआ करेंसी नोट पर तुम्हारा फोटो नहीं छपा
तुम बच गए बाबू
वरना तुम भी गांघी की तरह ही-
वेश्याओं के कोठों पर बेचे जाते.

हम तो बचपन से सुनते आये हैं, पोरबंदर गुजरात देश में एक ऋषि ने जन्म लिया..., दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल. लेकिन आज आपके गुजरात में सताधारी लोगों के खिलाफ आवाज उठाने वालों की बोलती बंद कर दी गयी है. मूल मन्त्र वही है, आजादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’, केवल उसके मायने बदल गए हैं.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की फाईलें खोलने वाले खुले आम आरोप लगा रहे हैं कि उनके अदृश्य होने में आपका और आपके चेले नेहरू का हाथ था. अग्रगण्य लोग आसमान की तरफ थूक रहे हैं, और आम आदमी ताली बजा रहा है. देश के अधिकांश अखबार और टी.वी. चेनल्स पूरी तरह व्यवसायिक हो गए हैं / बिक चुके हैं. सभी को पद्मश्री, पद्मभूषण की दरकार लगती है. मैंने भी ये दुर्दशा देखकर एक तुक्तक लिखा है. अग्रिम क्षमा भी चाहता हूँ.


गांधी को गुजरे अब बरस हो गए
देश में अनेक गांधी हो गए हैं
नॅशनल पार्क में मैं देख रहा हूँ गांधी को कैद
एक चील आकर उनपर सवार हो गयी.
कहते थे गांधी ने जमाने को बीट कर दिया
मैं देख रहा हूँ चील ने गांधी पर बीट कर दिया.
गांधी से चील बड़ी है
तभी तो माथे पर खडी है.
अब गांधी के ताबूत को हटा दो
इसकी जगह चील का ताबूत जड़ा दो.

***