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रविवार, 29 अगस्त 2021

वे सुनहरे दिन

 साठ साल पहले की बात है, मैं लाखेरी में नवांगुतक था , मुझे एसीसी कालोनी में L - १६ क्वाटर  आवंटित था, अविवाहित दिनों में मैंने अपने ही जैसे कुंवारे लोगों से जल्दी ही दोस्ती कर ली थी. इनमें स्व विष्णु बिहारी दीक्षित भी थे जो कि तब उदयपुर से MSW करके एसीसी में जॉब की तलाश में थे, उनके साथ ही एक लड़का शर्मा (नाम मुझे याद नहीं रहा) जिनके पिता उन दिनों लाखेरी स्थित  सेंट्रल एक्साइज के डिपुटी सुपरिंटेंडेंट हुआ करते थे भी उदयपुर स्कूल आफ सोसियल वर्क से ही  MSW कर के आये थे, इनके अलावा सेंट्रल एक्साइज के दो सब इंस्पेक्टर्स  सरदार गुरनामसिंह और प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव तथा जीवन बीमा के फील्ड आफीसर वोहरा भी चौकड़ी के सदस्य बन गए थे. मेरा क्वाटर बैठक का अड्डा हो गया था और दोस्ताना गतविधियां चला करती थी. कभी कभी विशेष पकवान / खाना बनाने के लिए एक मि. खन्ना को भी बुलाया जाता था वे नौशेरवाँ टाकीज के सिनेमा के एजेण्ट होते थे , ता हम लोग फ्री में सिनेमा देखने का बी मजा लेते थे हालांकि फर्स्ट क्लास का टिकट मात्र सवा रुपया ही हुआ करता था.

ये सब केवल एक ही साल चला उसके बाद सब अच्छ गच्छ गच्छामि हो गया. मैं भी शादी शुदा लोगों की लिस्ट में जुड़ गया था.

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मंगलवार, 23 अगस्त 2016

अँधेरे में तीर

कश्मीर समस्या के लिए मोदी सरकार की नीति शुरू से ही अँधेरे में तीर मारने जैसी रही है. इन्होंने वहां की सत्ता में हिस्सेदारी लेने के लिए मुफ्ती की पार्टी, पीडीपी, से जुगाड़ करके एक अपवित्र गठबंधन किया, जबकि चुनाव के समय स्वयं मोदी जी ने ‘बाप-बेटी की सरकार’ के विरुद्ध खुले मंच से हिकारतपूर्ण हुंकार भरे थे. यह भाजपा की अदूरदर्शिता थी, जिसका खामियाजा अब पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है, और आगे आने वाले समय में भी भुगतना पड़ सकता है.

अपनी मुस्लिम विरोधी छवि को धोने के लिए तमाम टोटके मोदी जी ने किये हैं. उनका ‘नवाज़-प्रेम’ इसका एक खुला दस्तावेज है, जबकि पाकिस्तान एक मार खाये हुए जहरीला सांप की तरह है, जो कभी भी भारत का सगा नहीं हो सकता है. उसकी बुनियाद ही भारत के प्रति घृणा और दुश्मनी पर आधारित है. इंदिरा जी के समय के शिमला समझौते से लेकर अटल जी के समय तक जितनी बार भी द्विपक्षीय ‘मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग' साइन हुए, हर बार पाकिस्तान की तरफ से धोखेबाजी हुई है. सच तो यह है कि वहाँ सेना या नामनिहाल लोकतांत्रिक राजनैतिक पार्टी, सबकी रोटी कश्मीर नाम के गरम तवे पर ही सिकती है.

हाल ही में इस्लामाबाद में 74 मुस्लिम राष्ट्रों ने एक स्वर में कश्मीर का राग पाकिस्तान के साथ मिलकर अलापा है. जबकि दुनिया यह मान चुकी है कि आतंकवाद की जड़ें पाकिस्तान में ही हैं और फंडिंग से लेकर ट्रेनिंग तक वहां की सरकार/ सेना/ खुफिया एजेंसीज करती रही हैं. यह हमारी विदेश नीति की कमजोरी दर्शाता है.

मुफ्ती एंड कंपनी की पूरी हमदर्दी अलगाववादियों के साथ रही है इसलिए आज जिस अंधे मोड़ पर कश्मीर की समस्या पहुँच गयी है, वहाँ से भाजपा के लिए भी सुरक्षित लौटना संभव नहीं लगता है.

हमारे सुरक्षा कर्मियों पर पत्थरबाजी/ ग्रेनेड हमले निरंतर जारी हैं, कई इलाकों में पिछले 45 दिनों से कर्फ्यू जारी है, जनजीवन अस्त व्यस्त है; सरकार की इससे बड़ी विफलता और क्या हो सकती है?
हाँ, अपनी पीठ खुद थपथपाते रहिये.
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गुरुवार, 12 मई 2016

गुबार

मैं लाख कोशीशें करू या कहूं कि मेरी किसी राजनैतिक पार्टी से संबद्धता नहीं है, परन्तु मेरे मन-मस्तिष्क पर जो विचारधारा धरातल बनाकर बैठी है, वह नित्य प्रतिक्रियास्वरूप बाहर आती रहती है, और हो सकता है कि आप इससे सहमत ना भी हों.

वर्तमान में केंद्र में सत्तासीन पार्टी भाजपा के बारे में अब party with difference  वाले जुमले को सुन कर तकलीफ होने लगी है. बहुत वर्षों पहले जब श्री गोविन्दाचार्य जी भाजपा के नीति निर्धारक ‘थिंक टैंक’ के स्पष्टवादी व कट्टर व्यक्तित्व वाले सिद्धांतवादी व्यक्ति थे और पार्टी नेतृत्व गाइड लाइंस के बाहर जाकर party with difference के जुमले को बार बार चोटिल कर रहे थे तो उस मौजू में एक पत्रकार ने उनसे सीधा प्रश्न किया था कि क्या वे भाजपा को कांग्रेस पार्टी के विकल्प के रूप में तैयार कर रहे हैं. तब उन्होंने बड़े दु:खी मन से पार्टी के कर्णधारों की सोच पर प्रतिक्रया व्यक्त की थी कि “ये लोग विकल्प नहीं, दूसरी कांग्रेस बनाने की प्रक्रिया में हैं.” जो आज सच साबित हो रही है. यहाँ गौर तलब बात यह है की इन्ही सैद्धांतिक मतभेदों के चलते गोविन्दाचार्य जी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था. यद्यपि वे आज भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैं.

हाल में उत्तराखंड की रावत सरकार को गिराने का जोरदार ड्रामा हुआ उससे भाजपा के नीतिकारों को अवश्य शर्मिन्दगी सता रही होगी, अगर नहीं सता रही होगी तो उनकी party with difference वाली आत्मा मर चुकी होगी. आज भाजपा के नेताओं का ये वक्तव्य इस बात को तस्दीक करती है कि “अगर काग्रेस के बागी विधायक भाजपा में आना चाहें तो उनका स्वागत होगा.” जब तक वे कांग्रेस में थे, चोर, बेईमान व चरित्रहीन थे, और उनके खिलाफ भाजपा वालों ने आन्दोलन तक किये थे. और अब वे रातों रात आदर्श हो गए हैं.

मेरे बहुत से मित्रगण भाजपा के सक्रिय व समर्पित सदस्य हैं, जो शायद ये नहीं सुनना चाहेंगे कि पिछले दो वर्षों में खाद्य पदार्थों, दवाईयों, तथा अन्य सभी जरूरी वस्तुओं के दाम लगभग दुगुने हो गए हैं. इस सरकार की नीतियों ने अल्प बचतों पर ब्याज की दर कम करके ब्याज पर गुजारा करने वाले मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है. पिछली भ्रष्ट कांग्रेस सरकार को गालियाँ देते रहने से आप अपनी नाकामियों को छिपा नहीं सकते हैं. बड़े पूजीपतियों के हितार्थ जो आर्थिक योंजनाओं का ढिढोरा पीटा जा रहा है, वे आगे जाकर राष्ट्र की अर्थ व्यवस्थाओं पर नकारात्मक परिणाम लायेंगी. रिजर्व बैंक पर अंकुश लगाने तथा न्याय पालिका के पर कतरने की सोच बेहद खतरनाक साबित हो सकती है.

पार्टी अध्यक्ष, जो मोदी जी के अभिन्न और राजदार भी रहे हैं, के अदालती केस में क्लीन चिट देने वाले सुप्रीम कोर्ट के चीफजस्टिस श्री सदाशिवम को रिटायरमेंट के तुरंत बाद केरल का गवर्नर बनाना एक ऐसा उदाहरण है जिसे ‘सुपर भ्रष्टाचार’ की संज्ञा दी गयी है.   

मोदी जी द्वारा चुनावों में जो जुमले परोसे गए थे, उनकी असलियत सामने आने से आम लोग निराश हैं. ये दीगर बात है कि मीडिया का एक बहुत बड़ा तबका स्वार्थवश उनकी वाह वाही करता आ रहा है. यहाँ तक कि अंध भक्तों को उनकी अपानवायु में भी केवड़े की खुशबू  प्रतीत हो रही है.

धरातल पर पुलिस, पटवारी, तहसीलदार से लेकर सभी जनसंपर्क वाले विभागों में कांग्रेस राज की तरह से ही काम हो रहा है, बिना लिए दिए कोई काम नहीं होते हैं. सभी छोटे बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स जिनमें ठेकेदारी की व्यवस्था है, आकण्ठ भ्रष्टाचार यथावत है. मालूम सबको है.

किसानों की आत्महत्याओं का  मुद्दा, जिसे चुनाव के समय मोदी जी ने विशेष रूप से ऊंचे स्वरों में उछाला था, कहीं नेपथ्य में गुम हो गया है. आत्महत्याएं निरंतर जारी हैं.

विदेश नीति की चर्चा करें तो सभी निकटवर्ती देश ३६ के आंकड़े में हैं. रूस जैसे चिर मित्र के मन में अब हमारे प्रति संदेह हो गये हैं क्योंकि यहाँ पूरी अमरीकापरस्त नीतियों का पालन हो रहा है. विदेशों में स्वयं प्रायोजित कार्यक्रमों में भारतवंशियों का खुश होना स्वाभाविक है, पर ये विदेश नीति की सफलता का मापदंड नहीं हो सकता है.

जहाँ तक पूर्ववर्ती सरकारों का विषय है, सत्ता के लिए जोड़तोड़ व जातिगत/धार्मिक तुष्टीकरण की नीतियों से भाजपा बाहर नहीं निकल पाई है. जनता ने कांग्रेस पार्टी को केंद्र की सत्ता से बाहर का रास्ता इसीलिये दिखाया कि तालाब का पानी सड़ने लगा था, जिसमें ऊब और डूब दोनों होने लगी थी

अंत में आप भी मनन करें कि क्या वाकई party with difference  की भावना का अंत हो चुका है.
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शुक्रवार, 6 मई 2016

बैठे ठाले-१६ : ईमान का दिया

मेरे शहर हल्द्वानी में अनगिनत फेरीवाले कबाड़ी हैं. ये साईकिल पर सवार होकर गली-गली बस्ती-बस्ती आवाज लगाते जाते हैं. लोहा, पीतल, अल्म्युनियम आदि धातुओं से लेकर कांच के बोतल, प्लास्टिक का टूटा-फूटा सामान, तथा रद्दी अखबार, गत्ते, पुरानी कॉपी किताबें, सब कुछ ओने-पौने भाव में खरीद कर ले जाते हैं, और उसे कबाड़ के बड़े व्यापारियों तक पंहुचाते हैं. इन बेकार समझी जाने वाली चीजों की रीसाईक्लिंग होती है. ये धंधा कब शुरू हुआ इसका कोई निश्चित इतिहास नहीं है. मैं सोचता हूँ कि अगर ये कबाड़ यों ही घरों में पड़ा रहता है तो बदसूरत ढेर सा लगता है, पर अपने सही मुकाम पर पहुंचकर रूप बदल लेता है. ये जहाँ एक तरफ से सफाई है, दूसरी तरफ कुछ लोगों की आजीविका है. धूप हो, गर्मी हो, बारिश हो, या ठंड का मौसम हो, ये निरंतर फेरी लगाने वाले गरीब लोग अपने परिवारों का पेट पालने के लिए कसरत करने पर मजबूर रहते हैं. हल्द्वानी में अधिकांश कबाड़ी मुस्लिम हैं. किताबों व अखबारों को उठा कर तो ले जाते हैं, पर शायद ही पढ़-लिख पाते हों. यदि पढ़ना आता भी होगा तो उन्हें पढ़ने की फुर्सत नहीं होती होगी. 

कबाडियों का ये माजरा केवल हल्द्वानी तक ही सीमित नहीं है. देश के सभी छोटे बड़े शहरों-कस्बों में ये डंडीमार तराजू लेकर दर दर आवाज देते हैं. बहुत से लोग मजबूर व मजलूम भी होते होंगे, लेकिन कुछ शातिर भी होते हैं. आखिर हैं तो हमारे ही समाज से, जिसमें अनेक अन्दुरुनी विकृतियां हैं. यह पेशा ही ऐसा है कि अगर तोल में नहीं मारेंगे तो कमाई बहुत कम हो जायेगी. ठगते भी इस बखूबी से हैं कि आप देखते ही रह जाएंगे. इस कूड़े कबाड़ को बेचने वाले भी कम चिकचिक नहीं करते हैं. आप लाख कमाते हों, पर कबाड़ बेचते समय ऐसा मोल-भाव करेंगे, मानो हीरे बेच रहे हों. 

पुलिस वाले या सुरक्षा प्रहरी इनको चोर व उठाईगीर समझा करते हैं. कुछ अपवाद हो सकते हैं, क्योंकि यह सच है कि कबाड़ी के वेश में चोरी डकैती करने वाले कभी कभी रेकी भी करते हैं, और पकडे भी जाते हैं. कई बार इस विषय पर गम्भीरता से चर्चा होती है कि कबाडियों को लाईसेंस या परिचय पत्र देने चाहिए, पर यह कार्यान्वित नहीं हो पाता है.

मेरे घर में पुराने अखबारों के अलावा कोई अन्य प्रकार का कबाड़ा नहीं होता है. जब कुछ महीनों में जमा हो जाते हैं तो एक बुजुर्ग, इकराम कबाड़ी, आकर ले जाता है. वह अपने हिसाब से पैसे भी दे जाता है. कोई बहस हुज्जत नहीं होती है. कई वर्षों से ऐसा चलता आ रहा है. इकराम बड़ा सीधा और सरल आदमी है. मैंने जब उसको बताया कि “अमरीका देश में घरों में क्विंटलों के हिसाब से अखबार आते हैं, और वहां कोई कबाड़ी नहीं घूमता है, म्युनिसिपैलिटी कूड़े के साथ उठाकर ले जाती है, तो वह वहाँ का रास्ता पूछने लगा था. इस बार सर्दियों में करीब दो माह मैं हल्द्वानी से बाहर रहा और वापस आकर तीन महीनों में इकराम के दर्शन भी नहीं हुए. इसलिए मैंने एक अन्य नौजवान कबाड़ी को रोक कर पूछा, “अखबार किस भाव लेते हो?” तो वह बोला, “दस रूपये.” जब मैंने कहा, “इकराम चाचा तो बारह के भाव ले जाते हैं?” तो ये नया आदमी जिसने बाद में अपना नाम जाकिर बताया बोला, “ठीक है, मैं भी बारह दे दूंगा.” उसने रद्दी अपने ढंग से तोली और वजन दस किलो बताया. जब १२० रूपये देने की बारी आई तो रुपयों के बजाय अपना तराजू मुझको पेश करके बोला, “अभी आप इसको रख लीजिये. मैं बाद में रकम दे जाऊंगा.” मैंने पूछा, “क्यों रूपये नहीं हैं क्या?” वह रुआंसे स्वर में बोला, “मैं बीमार चल रहा था. बड़े दिनों के बाद आज ही काम पर आया हूँ.” मुझे स्वाभाविक रूप से उसकी बात पर हमदर्दी हो आई. मैंने कहा, “कोई बात नहीं, बाद में दे जाना. तुम्हारा तराजू रख कर मैं क्या करूगा?” उसने जल्दी जल्दी सामान समेटा और “सलाम साहब” कह कर चलता बना. मुझको अपने मन में बड़ा संतोष सा हो रहा था कि उसकी मजबूरी पर मैंने कोई शर्त नहीं लगाई. सोचा, वह ना जाने किस मजबूरी में होगा.

बात आई-गयी हो गयी. मैं उस धटना को भूल सा गया था. सचमुच, मैं उसकी शक्ल भी भूल गया था. इस बीच हमारी सीनियर सीटीजंस की बैठक में किसी बात पर मैंने इसका जिक्र किया तो साथियों ने मेरी दानवीरी का मजाक बनाया. एक सज्जन बोले,  “मियाँ, सतयुग को गुजरे तीन युग हो चुके हैं, तुम कहाँ जी रहे हो?”

आज सुबह मुझे सुखद आश्चर्य तब हुआ जब जाकिर घंटी बजाकर रूपये देने के लिए घर के गेट पर खड़ा मिला. इस युग में बड़े बड़े लोग बेशक बेईमानी करते हैं, लाखों-करोड़ों डकार जाते हैं, पर जाकिर जैसे गरीब लोगों ने इस अंधेरे में ईमान का दिया जलाए रखा है.
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शनिवार, 9 जनवरी 2016

जीवेत शरद: शतम्

एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में प्रतिदिन २०,००० लोग साठ वर्ष की उम्र पार करते जा रहे हैं. औसत आयु बढ़ने से वृद्ध जनों की संख्या में लगातार इजाफा होना स्वाभाविक है. 

ग्रामीण या शहरी क्षेत्रों में रहने वाले वृद्ध जनों के बारे में लोगों की सोच अलग अलग तरह की होती है. गांवों में जहां भी सभ्य लोग रहते हैं, बुजुर्गों के प्रति सम्मान दर्शाते हैं, लेकिन अधिकाँश निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों में बुड्ढों को बूढ़ा बैल सा समझ कर रखा/पाला जाता है. (अपवाद बहुत से हो सकते हैं) वहाँ बुढ़ापा ‘दिन काटना’ या ‘मृत्यु का इंतज़ार करने’ जैसा होता है. ये बहुत गंभीर सामाजिक समस्या है. सरकार के समाज कल्याण विभाग का ध्यान शायद इस पर बहुत कम रहता आया है. शहरों में आर्थिक रूप से संपन्न लोगों की स्थिति जरूर भिन्न है. वहां वृद्ध लोगों की देखभाल उनके परिजन अच्छी तरह किया करते हैं. भारत में पश्चिमी देशों की तरह वृद्धाश्रमों की संकल्पना नगण्य है. क्योंकि ये हमारी संस्कृति में ये कभी था ही नहीं. पश्चिम की देखादेखी बड़े शहरों में जो वृद्धाश्रम रूपये लेकर चलाये जाते हैं, उनके निवासी मध्य वर्ग के वे लोग हैं जिनकी औलादें आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हैं, पर व्यस्तता व खुशामद करने की इल्लत से बचना चाहते हैं. सरकार द्वारा संचालित वृद्धाश्रमों में लाचार व त्यक्त बुजुर्गों की हालत अधिक सोचनीय होती है. प्राय: सुना जाता है कि इन ठिकानों में अधिकाँश वृद्धजन मानसिक रूप से बीमार यानि डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. अफसोस ये है कि जीवन की आपाधापी में उनकी अपनी औलादें उनको सँभालने की सुध नहीं लेती है.

सरकार ने वृद्धजन हिताय अनेक क़ानून बना रखे हैं, पर वे सब कलह और झगड़े की जड़ साबित होते है. परिवरिश के लिए खर्चा माँगना हक तो है, पर सभी लोग इतने खुशकिस्मत नहीं होते हैं कि उनकी अपनी संतानें उनके दर्द को समझ पायें. प्राय: आज के जिम्मेदार लोग अपनी अगली पीढ़ी के हितों पर केन्द्रित होकर रह जाते हैं. उनको माता-पिता की इस त्रासदी का अहसास तब होता होगा जब वे खुद वृद्धावस्था की सीमा में आने लगते हैं.

बुजुर्ग चाहते हैं उनके बच्चे, जिनके लिए वे ताउम्र खटते रहे थे, अब उनको सम्मान के साथ रखें और उनके स्वास्थ्य की चिंता की जाए. सच तो ये भी है कि नाती-पोते पोतियों के सानिध्य और प्यार-दुलार से अभिभूत होकर ही वे बुढ़ापे की बैतरणी पार कर सकते हैं, पर साइबर युग के बच्चे अपने बुजुर्गों को कहाँ समझ पाते हैं. ये जनरेशन गैप शायद कभी नहीं भर पायेगा. इसलिए हर औलाद की जिम्मेदारी बनती है कि अपने माता-पिता या खानदान में रह रहे बुजुर्गों की देखभाल अवश्य करे. उनके सम्मान का ध्यान रखा जाए.
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मंगलवार, 5 जनवरी 2016

बौद्ध तीर्थ: कलबुर्गी

कर्नाटक का कलबुर्गी शहर, जिसका पुराना नाम गुलबर्गा है, में प्रसिद्ध शरण विश्वेश्वर का प्राचीन मंदिर है, तथा इसी मंदिर के नजदीक एक बड़े गुम्बज वाली भव्य मस्जिद भी है. अब शहर के बाहर ६ किलीमीटर दूरी पर ‘सिद्धार्थ बौद्ध विहार’ की स्थापना से इस प्राचीन नगर को बौद्ध तीर्थ के रूप में पहचाना जाने लगा है.

यह बौद्ध विहार ७० एकड़ से भी ज्यादा जमीन पर बहुत सुन्दरता के साथ ऐतिहासिक सारनाथ शैली के स्तूपों तथा अशोक महान की लाटो व चक्रों को सुशोभित करते हुए ६० फुट ऊंचे बनाए गए टीले पर स्थापित किया गया है, जो इस देश में अपनी तरह का एक ही है.

प्रथम दृष्टया बाहर से देखने पर ये विशाल गुम्बज अदभुत व आकर्षक है. मुख्य गेट के अन्दर बाईं और ऊँचाई पर भगवा रंग में रंगी बड़ी मानव आकृतियाँ हैं, जिनको गौर से देखने पर मालूम हुआ कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर अपने अनुनायियों सहित भगवान् बुद्ध की ओर चले जा रहे हैं. डॉ. अम्बेडकर के हाथ में बड़ी सी लाठी ठीक उसी तरह थमाई गयी है, जिस तरह दिल्ली में महात्मा गांधी जी की दांडी यात्रा की मूर्ती में प्रदर्शित किया गया है. स्तूप की पूरी परिक्रमा में पत्थर बिछाए गए हैं. मंदिर में गुम्बज के अन्दर भगवान बुद्ध की स्वर्णिम मूर्ति शान्ति, अहिंसा और समानता का सन्देश देती हुयी विराजमान है. नीचे की मंजिल पर गुरु पद्मसंभव उपदेशात्मक मुद्रा में स्थापित हैं, जिनके सामने पूरे हॉल में बैठने के लिए आसन रखे हुए हैं. यहाँ आकर मुझे ‘हरे कृष्ण’ मंदिरों के वातावरण वाली गहन शान्ति का अनुभव हुआ. यहाँ की दिव्यता से ही श्रद्धावान भक्त आह्लादित होकर बाहर आता है. ‘बुद्धम् शरणम् गच्छामि’ का वास्तविक आभास यहीं होता है.

वैसे तो ‘सिद्धार्थ गौतम बुद्ध विहार ट्रस्ट गुलबर्गा’ की स्थापना सन १९९४ में हो गयी थी लेकिन इस भव्य निर्माण को मूर्तरूप २००९ में श्री मल्लिकार्जुन खरगे  ने दिया. वे इस वक्त इस इलाके के सांसद व लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं. पूर्व में विधायक और केन्द्रीय मंत्री भी रहे थे. स्थानीय लोग उनको दूसरा अम्बेडकर भी माना करते हैं क्योंकि वे हमेशा दलित समाज के प्रति समर्पित व सुधारक रहे हैं. वे इस ट्रस्ट के चेयरमैन हैं.

इस बुद्ध विहार का लोकार्पण सन २००९ में तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल द्वारा किया गया था. चारों ओर खुली जगह को आज भी पेड़ पौधों व दूर्वा से संवारा जा रहा है. भक्तों व तपस्वियों के लिए पीछे की तरफ आवासीय परिसर सुन्दर ढंग से बनाया गया है. बौद्ध साहित्य का पुस्तकालय भी है. चूंकि देश के इस इलाके में सैकड़ों वर्षों से बुद्ध के अनुनायियों का वास रहा है इसलिए यहाँ की शिक्षण संस्थाओं में भी उनका प्रभाव रहा है. जिनमें संस्कृत भाषा भी पढ़ाई जाती है.

इस क्षेत्र का सौभाग्य रहा है कि अब से ५० साल पहले यहाँ के प्रतिनिधित्व करने वाले विधायक+मुख्यमंत्री स्व. वीरेन्द्र पाटिल थे, जिन्होंने यहाँ मेडिकल कॉलेज, एग्रीकल्चर कॉलेज व इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना करवा दी थी. इनके अलावा स्व. इनामदार स्मारक, अनेक विधाओं के कालेज/शिक्षापीठ यहाँ पर मौजूद हैं.
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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

गपशप

ए.सी.सी. को 2006 में स्विस कंपनी होलसिम ने अधिग्रहित कर लिया था. उससे पहले अम्बुजा सीमेंट कंपनी को भी खरीद लिया था और अब फ्रैंच कंपनी लाफार्ज ने होलसिम को खरीद लिया है. अब ये ‘लाफार्ज होलसिम’ हो गयी है. इन बड़ी विदेशी कंपनियों का भारत में व्यापार करने का उद्देश्य मात्र मुनाफ़ा कमाना होता है. वैसे भी पाश्चात्य देशों के कल्चर में लोग ‘आज’ के लिए जीते हैं. अत: कल परसों यानि भविष्य को केवल व्यापारिक नजरिये से सोचते हैं. जबकि हम लोग सोचा करते हैं, ‘ये मेरी अपनी/ पुश्तैनी कंपनी है’, ‘इससे मेरी पहचान है’, या ‘ये हमारी कंपनी माता है’.

समय हमेशा परिवर्तनशील होता है. इतिहास में कई बार अनपेक्षित घटनाएं घटती रहती हैं. मैंने हाल में अपने लाखेरी (बूंदी,राजस्थान) सीमेंट कारखाने के पिछले लगभग १०० वर्षों का देखा-सुना इतिहास फेसबुक पर LAKHON K LAKHERIAN ग्रुप में शब्दबद्ध किया है. बहुत सी बातें मेरे लेखन में छूट भी गयी होंगी, पर पूरे प्रकरण में एक ईमानदार भावनात्मक अपनापन है इसलिए पाठकों व सम्बंधित मित्रों ने इसकी बहुत सराहना की है. मेरे एक मित्र ने लिखा है कि “पिछले पन्ने व इसके परिशिष्ट पढ़कर ऐसा लगा जैसे नानी-दादी ने दंतकथाएं सुनाई हैं.”

अब जब मैं आज की स्थिति का विश्लेषण कर रहा हूँ तो पा रहा हूँ कि कंपनी की ‘ऊपर की व्यवस्था’ में भारतीयता वाला संस्कार जिसे ‘चैरिटेबल थिंकिंग’ नाम दिया जा सकता है, लगभग गायब सा होता जा रहा है. कंपनी के विदेशी मालिकों को अब शायद ‘सीमेंट हाउस’ की भी दरकार नहीं होगी. अम्बुजा का कॉर्पोरेट ऑफिस जो मुम्बई में अंधेरी में है, उनका मुख्यालय हो जाएगा. भूपेंद्रा की जमीन जायदाद तीन सौ करोड़ में किसी बिल्डर को बेची जा चुकी है. दिल्ली में ओखला वाली जमीन जायदाद भी बेच कर टके कर लिए हैं. मुम्बई-थाणे स्थित रिसर्च इंस्टीच्यूट व सम्बंधित कार्यालय का भविष्य/आवश्यकता अधर में है. वहां ए.सी.सी. द्वारा बसी-बसाई कॉलोनी डिमोलिश करके बहुमंजिला इमारतें बनाये जाने की चर्चाएँ जोरों पर है. और भी बहुत सी बातें हैं, जिन पर फैसले नए मालिक अपने प्रॉफिट वाले चश्मे से लेने वाले हैं. आगे आगे देखिये होता है क्या!  पर निराश होने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये दुनिया ऐसे ही चलती आई है, चलती रहेगी.
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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

बैठे ठाले - १५

मित्रो!
दिल पर हाथ रख कर बोलिए, क्या आज देश में धार्मिक असहिष्णुता फ़ैली हुई नहीं है? सत्तानशीं लोग कहते हैं कि ये काग्रेसियों की साजिश मात्र है, बदनाम करने की मुहिम है, पर यह पूरा सच नहीं है.

मैं हल्द्वानी शहर से सटे हुए एक आधुनिक गाँव में निवास कर रहा हूँ, जहाँ 99.9% आबादी हिन्दू है. अधिकाँश बुजुर्ग सरकारी या गैरसरकारी सेवाओं से रिटायर्ड हैं, जहां कहीं भी उठते बैठते या साथ घूमते हैं तो देश की सियासत पर चर्चा होने लगती है. समाचार चैनल्स की ख़बरों पर तप्सरा होने लगता है. केंद्र की पिछली सरकार में हुए घोटालों को भाजपा ने अपने लोकसभा चुनावों में खूब भुनाया अत: अधिकांश लोग परिवर्तन चाहते थे, और आज भी ‘मोदी’, ‘मोदी’ की आवाजों से खुश नजर आते हैं. परन्तु मैं अनुभव कर रहा हूँ कि लोग दूसरे धर्मों, विशेषकर मुस्लिम धर्म के प्रति गैर जरूरी रूप से असहिष्णु हो रहे हैं. उनको ये हिन्दुस्तानी मानने को तैयार नहीं है. मैं समझता हूँ की ये ध्रुवीकरण बरास्ता असहिष्णुता ही है.

प्रधानमंत्री जी ने आज जिन शब्दों में संविधान दिवस पर लोकसभा में भाषण दिया वे बहुत ‘पावन’ नज़र आ रहे थे, पर खाली बोल देने से क्या होता है? सच्चे मन से उन पर अमल भी होना चाहिए. उनके अनुयायियों को मनमाना बोलने की छूट है, और नसीहत की बात तब होती है, जब सारा जहर फ़ैल चुका होता है. कई मामलों में प्रधानमंत्री जी की लम्बी चुप्पी संदेह के घेरे में रही है. और आलोचाना का कारण भी बनी है. छिद्रान्वेषी जन कहते हैं कि राजनीति में कई मुखौटे होते हैं.

आज राज्य सभा में विरोध पक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद जी का भाषण मैंने आद्योपांत सुना, उसमें उन्होंने सही कहा कि संविधान बनाने की भूमिका में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को नकारने जैसी प्रक्रिया सदन और सदन के बाहर हो रही है. इससे बड़ी असहिष्णुता क्या हो सकती है. जिन्होंने आजादी के आगे-पीछे नेहरू जी के त्याग और देशभक्ति का इतिहास नहीं पढ़ा सुना है, वे उनकी कुछ व्यक्तिगत कमजोरियों को मुद्दा बनाकर उछाल रहे हैं, ये शर्मनाक असहिष्णुता ही है.

हो ये रहा है की जहां कहीं असहमति या विरोध के स्वर उठते हैं, सत्ता पक्ष द्वारा तीखी प्रक्रिया देकर दुत्कारने के अनेक प्रमाण सामने आ जाते हैं. इसी को असहिष्णुता कहा जा रहा है, जो सत्य है.

जब कुछ मान्य कलाकार, साहित्यकार, व बुद्धिजीवी देश के वातावरण में असहिष्णुता की गंध महसूस करके अपना विरोध प्रकट कर रहे हैं, तो उनका मजाक बनाने या उनको गालियां देने के बजाय इस समस्या को गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

बापू हम शर्मिन्दा हैं

बापू, हम शर्मिन्दा हैं!
नाथूराम गोडसे किसी व्यक्ति का नाम नहीं रहा है. यह एक विचारधारा है, जिसने हमारी सहिष्णुता की चूलें हिला दी हैं. जिस हिंसा और घृणा के विरुद्ध आपने अपनी जान गँवाई थी, आज उसका मखौल बनाया जा रहा है. आपकी जय गाने वाले सभी राजनेता सिर्फ सत्ता सुख चाहते हैं. किस किस का नाम लूं, सबने कई कई मुखोटे पहन रखे हैं.

शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर एक नामधारी ‘स्टेज कवि’ ने चटखारेदार अकविता सुनाई जो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुयी कि :

“अच्छा हुआ करेंसी नोट पर तुम्हारा फोटो नहीं छपा
तुम बच गए बाबू
वरना तुम भी गांघी की तरह ही-
वेश्याओं के कोठों पर बेचे जाते”.

हम तो बचपन से सुनते आये हैं, ‘पोरबंदर गुजरात देश में एक ऋषि ने जन्म लिया..., दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल.’ लेकिन आज आपके गुजरात में सताधारी लोगों के खिलाफ आवाज उठाने वालों की बोलती बंद कर दी गयी है. मूल मन्त्र वही है, ‘आजादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’, केवल उसके मायने बदल गए हैं.

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की फाईलें खोलने वाले खुले आम आरोप लगा रहे हैं कि उनके अदृश्य होने में आपका और आपके चेले नेहरू का हाथ था. अग्रगण्य लोग आसमान की तरफ थूक रहे हैं, और आम आदमी ताली बजा रहा है. देश के अधिकांश अखबार और टी.वी. चेनल्स पूरी तरह व्यवसायिक हो गए हैं / बिक चुके हैं. सभी को पद्मश्री, पद्मभूषण की दरकार लगती है. मैंने भी ये दुर्दशा देखकर एक तुक्तक लिखा है. अग्रिम क्षमा भी चाहता हूँ.


गांधी को गुजरे अब बरस हो गए
देश में उनके अनेक वरिस हो गए हैं
नॅशनल पार्क में मैं देख रहा हूँ गांधी को कैद
एक चील आकर उनपर सवार हो गयी.
कहते थे गांधी ने जमाने को ‘बीट’ कर दिया
मैं देख रहा हूँ चील ने गांधी पर बीट कर दिया.
गांधी से चील बड़ी है
तभी तो माथे पर खडी है.
अब गांधी के ताबूत को हटा दो
इसकी जगह चील का ताबूत जड़ा दो.

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बुधवार, 26 अगस्त 2015

सीमेंट

भवन निर्माण के विकास पर नजर डाली जाए तो मालूम होता है कि कभी गुफाओं में और कभी ऊंचे पेड़ों पर घर बनाने वाले मनुष्य ने पहले झोपड़ा-कच्चा मकान फिर पत्थर-ईटों वाले पक्के मकान बनाए, जिनमें लकड़ी का भी भरपूर इस्तेमाल होता था, लेकिन लकड़ी का दुश्मन कीड़ा दीमक उसको हमेशा परेशान करता रहा होगा. बाद में मिट्टी के गारे के बजाय चूने का गारा लगाया जाने लगा. उस जमाने में पोजलाना को सुर्खी नाम से भी जाना जाता था. चूने को मजबूती देने के लिए उसमें उरद की दाल, गुड़ आदि मसाले भी मिलाये जाते थे. किलेबंदी को मजबूत दीवार देने के लिए राजे-रजवाड़े ऐसी तकनीक ज्यादा प्रयोग किया करते थे. कहीं कहीं पुराने किलों की दीवारें इतनी मजबूत पाई गयी हैं कि ब्लास्टिंग से भी मुश्किल से टूट पाती हैं.

आधुनिक सीमेंट बनाने की प्रक्रिया में लाईम स्टोन (चूना पत्थर) को काली मिट्टी, बॉक्साईट और आयरन ओर को सही मात्रा में या सही अनुपात में मिलाकर, बारीक पीसकर, उच्च ताप पर पकाया जाता है, सीमेंट कारखानों के किल्न (bhatta) इसमें सक्षम होते हैं. इसको पकाने में पिसा हुआ कोयला साथ में जलाया जाता है, जिसकी सम्पूर्ण राख भी उसमें समाहित हो जाती है. (अरब देशों में जहाँ क्रूड ऑइल खूब और सस्ता भी है वहाँ उसी से पकाया जाता है).

किल्न से निकलने के बाद जो पका हुआ माल निकलता है उसे क्लिंकर नाम से जाना जता है. इसमें जिप्सम और पावर प्लांट का रिजेक्ट माल फ्लाई ऐश, राख, मिलाकर फिर से सीमेंट मिलों में पीसा जाता है. उस पाउडर को कन्वेयर बेल्ट्स या प्रेशर पंप्स के जरिये साइलोज (भण्डार) में भरा जाता है. इस तरह से पिसे हुए सीमेंट को ब्लेंडेड/कंपोजिट सीमेंट या पोजलाना सीमेंट के नाम से जाना जाता है. इस सीमेंट को स्वचालित पैकिंग मशीन द्वारा कट्टों में पैक करके अपने निश्चित वजन के बाद स्वत: आगे फिसलते हुए मार्केटिंग के लिए ट्रकों या रेल वैगंस में पहुँचाया जाता है. कारखानों में कई स्तरों पर दिन-रात क्वॉलिटी कंट्रोल की जाती है.

सीमेंट में प्रयुक्त होनेवाली कैमिकल सामग्री में कैल्शियम ऑक्साईड, एल्युमीनियम ऑक्साईड और आईरन ऑक्साइड के मिश्रण होते है. जिन पत्थरों को पीसा जाता है, उनमें 88% चूने की अपेक्षा होती है. अगर इससे घटिया पत्थर हो तो उसमें हाई ग्रेड स्वीटनर मिलाना होता है. संगमरमर का श्वेत पत्थर १००% लाईम स्टोन होता है इसलिए इसका चूरा बहुत काम आता है.

सामान्य उपयोग में आने वाला भूरा सीमेंट पोर्टलैंड सीमेंट होता है, जिसमें फ्लाई ऐश की मात्रा शून्य होती है और यह पोर्टलैंड सीमेंट, पोजलाना सीमेंट की अपेक्षा बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करता है. किसी भी प्रकार के सीमेंट को कंक्रीट में परिवर्तित करने के लिए सही अनुपात में महीन रेत, मोटी रेत तथा पानी का इस्तेमाल करना अनिवार्य होता है. ये बात भी ध्यान देने योग्य है कि सीमेंट तैयार होने से पहले उसे भौतिक तथा रासायनिक प्रक्रिया से अच्छी तरह गुजारा जाता है तभी उसमें विशेष गुणवता आती है.

अलग अलग कार्यों में प्रयुक्त करने के लिए रेत का प्रतिशत तय होता है. समुद्र में आयल वेल के प्रेशर से बनने वाले पाइप्स के लिये बनाया जाने वाले सीमेंट कुछ विशिष्ट होता है, जो चन्द मिनटों में जम कर पक्का भी हो जाता है.

सामान्यतया औसत से ज्यादा रेत मिलाने से सीमेंट की गुणवत्ता कम हो जाती है नतीजन निर्माण जल्दी धराशाही हो जाते हैं. निर्माण में प्रयुक्त लोहे की छड़ों की गुणवत्ता भी बहुत मायने रखती है. सभी सीमेंट उत्पादक कम्पनियां भारत सरकार द्वारा निश्चित किये गए मापदंडों के अनुसार गुणवता बनाए रखती हैं. सीमेंट के बारे में बहुत से अच्छे जानकार लोग हैं, जो निर्माण कार्यों के लिए सही सीमेंट के चुनाव की सलाह दे सकते हैं क्योंकि हर प्रकार के सीमेंट में कुछ खासियत होती है, जिसका सम्बन्ध निर्माण के टिकाऊपन (durability) से होता है. विकास की इस दौड़ में ठेकेदारों और इंजीनियरों की ईमानदारी हमारी बुनियाद में है. ऐसा मान कर चलना चाहिए.

सीमेंट के बारे में कुछ तथ्य ये भी हैं कि हमारे जैसे विकासशील देशों में सीमेंट की प्रति व्यक्ति वार्षिक खपत मात्र 5 किलो बताई गयी है, जबकि विकसित देशों में 95 किलो प्रति व्यक्ति है. हमारे तमिलनाडु राज्य में अन्य प्रान्तों के मुकाबले ज्यादा सीमेंट उत्पादन किया जाता है. वर्तमान में करीब 36 कंपनियां सीमेंट उत्पादन से जुड़ी हुयी हैं. ए.सी.सी, अम्बुजा, और लाफार्ज नाम की बड़ी कंपनियों को स्विस कंपनी होलसिम ने अधिगृहित कर लिया है.
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शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

मिष्टान्न

आजकल जब दूध ही नकली बिकता है तो दूध से बनी मिठाईयों की शुद्धता की भी कोई गारंटी नहीं है. इसलिए लोग मावा (खोया) से बनी मिठाईयों से परहेज करने लगे हैं. वार-त्यौहारों पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भूले-भटके छापा मारकर नकली मावे को पकड़ कर अखबारों की सुर्ख़ियों में लाते रहते हैं, बाकी साल भर सोते रहते हैं. जो लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं, वे वसायुक्त मिठाईयों से दूर रहते हैं क्योंकि ये कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाने के मुख्य स्रोत हैं. वैसे तो ‘मीठा’ हमारी रसना की पहली पसंद रहती है, और अनादि काल से हमारे देश में शुभ कार्यों में मिठाई शगुनी मानी जाती है. अभी भी हम लोग रिश्तेदारी में मिठाई के डिब्बों का आदान-प्रदान करना जरूरी व्यवहार मानते हैं. इसलिए कोशिश यह रहती है कि मिठाई विश्वसनीय हलवाईयों/स्वीट-मार्ट्स से ही खरीदी जाए. बेसन के लड्डू, पेठे की मिठाई आदि कई मिठाईयां ऐसी होती हैं, जिनमें मिलावट की संभावनाएं बहुत कम होती हैं. हमारे पड़ोस में रहने वाले गुप्ता जी तो शगुन में गुड़ की डली देना उत्तम मानते हैं.

मिठाई को मिष्टान्न भी कहा जाता है. बड़े हलवाईयों की दूकानों को जब ‘स्वीट्स’ या ‘स्वीट-मार्ट’ नाम नहीं थे, तब बड़े बड़े अक्षरों में ‘मिष्टान्न भण्डार’ लिखा रहता था. मिष्टान्न में चीनी, दूध, मावा, मैदा, सूजी, गेहूं का रस, चावल का आटा, दालों का चूर्ण, गोंद, आरारोट, कोक, साबूदाना आदि पदार्थ मिलाये जाते हैं. खुले बाजार में उपलब्ध टॉफ़ी-चाकलेट भी बच्चों के पसंदीदा मिठाईयां होती हैं. बचपन में संतरे के स्वाद+रंग वाले चीनी से बनी ‘विलायती मिठाई’ की गोलियां चूसने का आनंद कैसे भूला जा सकता है. गेहूं की बोवाई के बाद गांव में जो गन्ने की पेराई होती थी और गुड़ बनता था, उसकी खुशबू व स्वाद आज तक जेहन में बसे हुए हैं.   

आज से बीस-पच्चीस साल पहले हम लोग डिटर्जेंट वाले दूध की कल्पना भी नहीं करते थे. हमारे दूध की नदियों वाले देश को बेईमान मिलावटखोरों ने दाग लगा कर बदनाम कर रखा है. लेकिन ये भी सच है कि ईमानदारी और नेकी अभी पूरी तरह मरी नहीं है. सब लोग ऐसे नहीं हैं. आगरा का बेहतरीन पेठा, मथुरा के स्वादिष्ट पेड़े, अल्मोड़ा की बाल मिठाई और सिंगोड़े, मेरठ की रस मलाई, जयपुर के घेवर, बीकानेर के रसगुल्ले, कोलकता की बंगाली मिठाईयां, मुम्बई का कराची हलवा, दिल्ली का सोहन हलवा, गुलाब जामुन+कालाजाम, हैदराबाद का मैसूर पाक, हरियाणा की कुल्फी, कलाकंद (मिल्क केक) और भी बहुतेरी देसी मिठाईयां हैं; खाने वालों का दिल हो गुलगुल वारे वारे वाह वाह.

अब ‘हलवाई’ तो सिर्फ छोटे-मोटे शहर कस्बों के नुक्कड़-गलियों-बाजारों में पाए जाते हैं, जो जलेबी, बर्फी, इमरती, कचोरियों, समोसों आदि चटपटे पकवानों से लोगों को तृप्त करते रहते हैं, बाकी बड़े शहरों में एयरकंडीशन्ड शोरूम्स में ‘स्वीट्स’ या 'स्वीटमार्ट’ बन गए हैं. जहाँ देसी-विदेशी नाम या ब्रांड के लेबल से सजी रहती हैं. खूब बिकती भी हैं. भाव पूछने की जरूरत नहीं होती है क्योंकि हर थाल पर कीमत का तमगा लगा होता है. जो चीनी बाजार में 30 से 40 रुपयों में प्रति किलो बिकती है वह मिठाई बन कर 600-700 तक की ऊंची कीमत में मिलती है. क्योंकि इसमें पिस्ते, काजू आदि मेवे यानि ड्राई फ्रूट्स का तड़का  लगा होता है. अब तो बड़ी दूकानों में "शुगर-फ्री मिठाईयां" भी मिलती हैं.  

जहां तक मुझे जानकारी है, हमारे देश में मिठाईयां, मैनुअल, यानि कारीगरों के अपने हाथों से बनायी जाती है, जबकि विकसित देशों में ये काम स्वचालित, साफ़-सुथरी मशीनों से होता है. मिठाई खाने वाले यदि हमारे कारीगरों की वर्कशाप नहीं देखें तो ज्यादा अच्छा है, ऐसा लोग कहते हैं. जो मिठाई चांदी के वर्क में थालों में सजी रहती है, उसके खाद्य रंगों व रसायनों के मिलावट के बारे में भी सजगता की आवश्यकता है.

अंत में शुभ कामना है, ‘बनी रहे ये शहद की दुनिया, खाते रहें रबडी के मालपुवे’.  हाँ, मधुमेह वाले डॉक्टरी सलाह के बिना बदपरहेजी ना करें.
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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

बैठे ठाले - 15

दर्द दिल-ओ-दिमाग का एक ऐसा अहसास है जो प्राणीमात्र को तड़पा देता है. कहा गया है कि "जाके पैर फटे ना बिवाई सो क्या जाने पीर पराई" सच में, दर्द चाहे शारीरिक हो या मानसिक उसका अहसास तभी होता है, जब खुद पर आ पड़ती है.

दर्द को दुनिया के तमाम भाषाओं में कोई भी नाम दिया गया हो, पर अहसास सबका वही पीड़ा ही है. अंग्रेजी में "pain" व अन्य यूरोपीय भाषाओं में कहीं पीन, कहीं पाईंन, कहीं पैन उच्चारित किया जाता है, पर टीस या पीड़ा सभी की एक है. हमारे शायरों/आशिकों ने दर्द-ऐ-दिल का प्रयोग अपनी अभिव्यक्तियों में बहुतायत से किया हुआ है. भावनात्मक दर्द-ऐ-दिल के बारे में कहा जाता है कि इसकी कोई कीमियाई दवा भी नहीं है. हाँ शारीरिक दर्दों के लिए मेडिकल साइन्स इतना आगे बढ़ चुका है, कि दर्दरोधक या दर्दनाशक औषधियां  चोट-घाव, टूटफूट व ऑप्रेशन के समय तंत्रिका को सुन्न करके असहनीय दर्द से बचाते हैं.

दर्द चाहे सर में हो, पेट में हो, कान-नाक-गले या दांत में हो, चैन नहीं लेने देता है. एक छोटा सा काँटा पैर में चुभ जाए अथवा धूल का कण आँख में घुस जाए तो बहुत बेचैनी हो जाती है. दुर्घटनाओं में शरीर की अंदरूनी चोट या कैंसर जैसे असाध्य रोग में दर्द से कराहते लोगों को देखने भर से संताप होता है. जो लोग अनियमित भोजन या नशीली चीजों का सेवन करके अपने लीवर को खराब कर लेते हैं, और असाध्य दर्द को निमंत्रण देते हैं, उनको इसकी बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ती है. इसलिए आप्तोपदेश में बार बार कहा गया है कि सदाचारी जीवन जीने से डॉक्टर-वैद्य की जरूरत नहीं पड़ती है. शरीर तो सबके नश्वर होते हैं. आयु सीमा भी सीमित होती है. जीवन यात्रा समापन से पहले कई तरह के दर्द बुढ़ापे में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने लगते हैं. ये प्रकृति की प्रक्रिया है. जो लोग ज्ञानी या योगी होते हैं, वे अपने संकल्पबल या योगबल से कम से कम दर्दों का अहसास करते हुए संसार त्यागते हैं.
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सोमवार, 22 जून 2015

प्रार्थना का असर

एक कथावाचक प्रवचन कर रहे थे कि “तुम ईश्वर पर आस्था या विश्वास करो या मत करो, इससे उसकी व्यवस्था में कोई फर्क नहीं पड़ता है. वह तो इतना दयालु है कि गाली देने वाले के लिए भी भोजन पानी का बंदोबस्त करता है. जो लोग सच्चे मन से उसको याद करते हैं, उनकी मनोकामना जरूर पूरा करता है.”

इसी सम्बन्ध में मेरी एक शुभाकांक्षी डॉ. शरद खरे सिन्हा ने वॉट्सअप पर एक मार्मिक कहानी मुझे फॉरवर्ड की है, जो परमात्मा की असीम कृपा को दर्शाती है, मैं चाहता हूँ कि मेरे पाठकगण भी इसे पढ़ कर देवकृपा की अनुभूति करें. दृष्टान्त इस प्रकार है:

एक यूरोपीय देश में डॉ. अहमद बच्चों को होने वाले एक विशिष्ट प्रकार के कैंसर रोग के इकलौते विशेषज्ञ हैं. उनकी महारत की चर्चा देश की सीमाओं के अन्दर व बाहर तक होती है. एक बार उनको अपने ही देश के दूरस्थ नगर में कैंसर के सम्बन्ध में आयोजित डॉक्टरों की मीटिंग में पहुचना था. वे अपने चार्टेड विमान से चल पड़े, लेकिन एक घंटा ऊपर उड़ने के बाद उनके प्लेन के इंजन में खराबी आने के कारण इमरजेंसी लैंडिंग करनी पडी. जहां से वे खुद एक कार लेकर चल पड़े. काफी आगे जाने पर एकाएक मौसम खराब हो गया. आंधी, अंधड़ व बरसात में उनको इतना परेशान होना पड़ा कि वे अपना सही मार्ग भी भूल गए और एक अनजान राह पर किसी गाँव में शरण लेने को मजबूर हो गए. एक मकान का दरवाजा खटखटाने पर एक सुन्दर किन्तु उदास गृहिणी ने उनको आश्रय दिया. उनका रस्मी स्वागत करने के बाद वह लगातार अपने आराध्य ईश्वर से प्रार्थना करने में व्यस्त हो गयी. बाद में जब डॉ. अहमद ने उससे पूछा कि “तुम किसलिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही हो?” तो महिला ने बताया कि उसका छोटा बच्चा एक विशिष्ट प्रकार के कैंसर रोग से पीड़ित है. उसकी सलामती के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ.” उस औरत ने अपनी मजबूरी बयान करते हुए बताया कि “इस बीमारी के ईलाज के लिए देश में सिर्फ एक विशेषज्ञ डॉक्टर है डा.अहमद, जो यहाँ से बहुत दूर शहर में रहते हैं, उनकी फीस इतनी ज्यादा है कि हम दे नहीं सकते हैं.”

गृहिणी की बाते सुन कर डॉक्टर खुद द्रवित होकर सुबकने लगे, फिर बोले, “मैं ही डॉ. अहमद हूँ.” फिर बच्चे का ईलाज करने का भरोसा देकर कृतार्थ किया.

इस प्रकार इस कथा में हवाई जहाज का इंजन खराब होना, सड़क मार्ग में बाधा आ जाना, डॉ. अहमद का राह भटकना, और ठीक उसी घर में पहुँच जाना जहां बीमार बच्चा था, मात्र संयोग नहीं हो सकता है. ये बच्चे की माँ की प्रार्थनाओं का असर था.
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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

बैठे ठाले - १४

पिछले लोकसभा चुनावों के बाद हमारी ‘ठलुआ पंचायत’ भंग हो गयी थी. कारण था मोदी जी का आक्रामक योजनाबद्ध चुनावी दौर, जो कि अभूतपूर्व था, और उसके अप्रत्याशित परिणाम. जहां मोदी जी के आलोचक खिसिया रहे थे वहीं समर्थक विभोर हो उठे थे. वर्षों से अलसाई हुई जनता, जो कि भ्रष्टाचार से तंग थी, उसमें नया संचार हो गया. लोग परिवर्तन की उमंग में आ गए. इस सूनामी में राजनीति के बड़े बड़े महारथी खेत रहे, बह गए. ये एक ऐतिहासिक युगांतकारी परिवर्तन था.

भारतीय जनता पार्टी की सरकार आते ही एकाएक सभी हिन्दुत्ववादी शक्तियां सब तरफ हावी/प्रभावी हो गयी, जो धार्मिक उन्माद उभरा उसके बारे में कहा जाने लगा कि ‘इससे हिन्दुस्तानी संस्कृति का जो मूल स्वरुप है उसकी चूलें हिलने लगी हैं’. पूर्ववर्ती शासन से अघाए व खार खाए प्रबुद्ध जन इसे भगवत गीता के प्रथम चरण के श्लोक ‘यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति’ से जोड़ते हुए अकल्पनीय परिवर्तनों के सपने देखने लगे थे.

अब मोदीराज का लगभग एक वर्ष का समय बीत गया है, लेकिन जनसाधारण फिर कसमसाने लगा है. ये सत्य है कि विपक्ष के पास मोदी जी के मुकाबले वाकचतुर, बड़बोला, कर्मठ तथा प्रशासनिक अनुभव वाला कोई नेता नहीं है. कांग्रेसवाले ले दे कर एक अदद राहुल गांधी को धक्का दे देकर सीढ़ियों से ऊपर जाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं; आज भी खूसट कांग्रेसियों की मानसिक स्थिति गांधी परिवार की आड़ में सुरक्षित राजनीति खेलने को प्रतिबद्ध है. कब नौ मन तेल होगा? और कब राधा नाच पायेगी? यक्ष प्रश्न जीवंत है.

इधर मोदी के धुर विरोधी नामनिहाल समाजवादी विचारधारा के वारिस एकजुट होकर आत्मरक्षा की तैयारी में अपने भोंटे हथियार तेज कर रहे हैं क्योंकि अस्तित्व का खतरा आन पड़ा है. मुलायमसिंह यादव जी के भरोसे ये सप्तपदी सेना बिहार और यूपी के आगामी विधान सभा चुनावों में अपना जौहर आजमाएंगे. ये कितने ताकतवर बन कर उभरेंगे या सिमट कर रह जायेंगे? भविष्यवाणी करना जल्दबाजी लग रहा है.

कम्युनिस्ट शासन सिर्फ छोटे से राज्य त्रिपुरा तक सिमट कर रह गया है, हाल में कामरेड सीताराम येचुरी को कमान सौप दी गयी है, जो कट्टर सिद्धान्तवादिता से हटकर समझौतावादी की तरह खंडित वामपंथ के लिए ‘फेविकॉल’ की तलाश में रहेंगे. राष्ट्रीय स्तर पर विकल्पी बनने का सपना शायद उनको ना आ पाए.

मायावती जी, जयललिता जी ममता बनर्जी जी आदि सभी क्षेत्रीय ‘लड़ोकनियाँ’ अपने अपने मुकाम के चरम पर रही हैं, पर अब इनका ग्राफ शायद ही ऊपर उठ पाए. इसी तरह अरविन्द केजरीवाल जी का भविष्य दिल्ली विधान सभा में प्रचण्ड बहुमत के बावजूद अनिश्चय के घेरे में यों आ गया कि उनकी पार्टी अन्दुरुनी कलह से त्रस्त है. मीडिया जोर शोर से उनका मजाक बनाने में लगा है. जिसे सुनकर आम लोगों का विश्वास उनके प्रति डगमगाने लगा है. लगता है, ‘जब तक चल सके चलाये चलो’ का सिद्धांत का अनुसरण कर रहे हैं. प्रशासनिक अनुभव की कमी के कारण केंद्र में काबिज भाजपा इसे स्थिर नहीं होने देगी.

पंजाब में अकाली सरकार पूरी तरह से मोदी जी के भरोसे पर आ टिकी है क्योंकि पंजाब में दल का जनाधार बहुत घट गया है, जिसका नमूना अमृतसर में लोकसभा चुनाव में सबने देखा है, जहां अरुण जेटली जी को हार का मुंह देखना पड़ा है. भाजपा को जिस दिन लगेगा की इसको अब निगला जा सकता है, तो परिणाम अप्रत्याशित ही होगा.

काश्मीर में भाजपा ने मजबूरी व स्वार्थ दोनों की वजह से सत्ता में हिस्सेदारी की, पर अलगाववादियों, कश्मीरी पंडितों, धारा 370 पर विरोधाभासी चरित्रों के कारण न थूकते बन रहा है और ना निगल सकते हैं. चुनावों में अलगाववादियों को नेस्तनाबूद करने की बड़ी बड़ी बड़ी डींग हांकने वालों को अब जवाब देते नहीं बन रहा है.

ये थीसिस बहुत लम्बी हो रही है, क्योंकि आलोचना के कई बिंदु अभी भी अनछुए हैं, जैसे कि, मोदी जी की जन धन योजना के दो करोड़ से ज्यादा खाते निष्क्रिय से हो गए हैं. इनमें नियमानुसार प्रति माह लेनदेन नहीं होने से दो लाख रुपयों का बीमा बेमानी हो गया है. विदेशी काला धन पर कुछ टिप्पणी करना अब हास्य का विषय बन गया है. ये चुनावी जुमला बताया जा रहा है, जो आने वाले चुनावों में भाजपा को चुभता रहेगा.

चूंकि मोदी जी ने अपनी छवि ‘स्वयंभू’ की बना ली है इसलिए उनको सोचना पडेगा कि सिर्फ कांग्रेस की सात पीढ़ियों को गलियाने से देश की जनता संतोष करने वाली नहीं है. उन्होंने मोदी जी को भरपूर समर्थन इसलिए दिया था कि व्यवस्था परिवर्तन हो. निराशा इसी बात की है कि कमोवेश सब तरफ प्रशासनिक व न्यायिक मामलों में स्थिति में यथावत अनुभव हो रहे हैं. महंगाई के बारे में जो सरकारी आकड़ों का मकड़जाल दिखाया जा रहा है, जो कि जमीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहा है. क्योंकि उपभोक्ता रिटेल बाजार भाव, औषधीय खर्चे, परिवहन व्यय पहले से काफी बढ़ गए हैं. मध्यवर्गीय लोग इसकी मार झेल रहे हैं. केवल अल्प प्रतिशत सरकारी कर्मचारियों, पेंशनरों के महंगाई भत्ते में बढ़ोत्तरी से महंगाई पीड़ित आम लोगों को ज्यादा दिन तक थपकी दे कर शांत नहीं रख सकते हैं. चीन-पाकिस्तान से दोस्ती का नापाक नाटक के बाद अलगाववादी+आतंकवादी तथा नक्सलवादी आक्रमण तेज हो गए हैं. ये कैंसर का रूप बनते जा रहे हैं. ‘ना खाऊ ना खाने दूं’ भी केवल जुमला बन कर रह गया है. बिना रिश्वत आज भी कोई काम नहीं हो पा रहा है.

ज्वलंत गंभीर मुद्दा मौसम की मार से उत्तर भारत के कई राज्यों के काश्तकारों पर आई आपदा का है. किसान कर्जों के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं. चुनावों के दौरान मोदी जी का एक मुद्दा ‘किसानों की आत्महत्या’ का रहा था. अब मोदीराज के इसी तिमाही में मौत का आंकड़ा सौ के पार पहुँच चुका है, जो बहुत दुखद व चिंतनीय है.

लेख के अंत में नरेंद्र मोदी जी से यह कहना चाहता हूँ की अब विदेश नीति से ज्यादा देश के अन्दर की नीति पर ध्यान देने की जरूरत है. अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंग्लेंड, फ्रांस, जर्मनी तथा कनाडा में बसे हुए भारतीयों के प्यार का दोहन करना तो ठीक है, पर लोग समझने लगे हैं कि ये आपके खुद के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम हैं. भारतवंशी तो हर हाल में ‘भारतमाता की जय' बोलेगा. 

अब आपको ओबामा जी के सर्टीफिकेट या विश्वबैंक की तहरीर पर लोग नहीं मापेंगे. कृपया अपने चुनावी वायदों की फेरहिस्त की एक बार फिर से नजरसानी कीजिये.
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मंगलवार, 3 मार्च 2015

बैठे ठाले - १३

आज ३ मार्च, अंतर्राष्ट्रीय ‘ईयर-केयर डे’ यानी कर्ण दिवस (संयुक्त राष्ट्र के स्वास्थ्य संगठन WHO द्वारा प्रेरित) है. कान हमारे शरीर के पांच महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियों में से एक है. परमात्मा ने सर के दोनों तरफ एक एक कान इस तरह फिट किये हैं कि दोनों तरफ के ध्वनि संकेत मिल सकें और देखने में भी खूबसूरत लगें. मनुष्य ही नहीं अधिकांश प्राणीमात्र को ये ज्ञानेन्द्रिय प्राप्त है. बाहरी कान ‘एंटीना’ की तरह होता है जो संवेदनाओं को अन्दर श्रवण यंत्र तक पंहुचाता है, जिसका सीधा कनेक्शन मस्तिष्क से होता है.

मनुष्यों में बाहरी कान की बनावट तथा आकार देश, काल, व वंश के अनुसार थोड़े अंतर के भी पाए जाते हैं, पर भीतरी श्रवण यंत्र सबका सामान होता है. कुछ ज्योतिषियों की मान्यता है कि बड़े कान वाले सौभाग्यशाली तथा बहुत छोटे कान वाले आल्पायु होते है. पर ये सब गप लगती है क्योंकि खर व खरगोश (खर माने गदहा, गोश माने कान) के कान बड़े होते हैं.

कुछ लोग पैदा तो बाहरी कानों सहित होते हैं, पर उनका श्रवन यंत्र बंद होता है. उनको ‘बहरा’ कहा जाता है. ये लोग अच्छा मार्गदर्शन मिलने पर सफल जीवन व्यतीत करते है. कभी कभी ऐसा भी होता है कि बाद में कान के अन्दर इन्फेक्शन होने से अथवा चोट लग जाने से श्रवण यंत्र खराब हो जाता है. बुढ़ापे में ऊतक कमजोर हो जाने से अंदरूनी यंत्र की क्षमता कम होती जाती है. हाँ, बहुत से भाग्यवान वृद्धजन  ऐसे भी पाए जाते हैं, जिनके कान अंतिम समय तक सकुशल रहते हैं. उन्हें अक्सर ये सुनने को मिल जाता है, “अरे, इनके कान तो कांसे के बने है.”

कहते हैं कि साँपों के कान नहीं होते हैं वे अपने स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) से ही संवेदनाएं ग्रहण कर लेते हैं.

आज के शहरी/ सामाजिक परिवेश में तेज ध्वनि (ध्वनि-प्रदूषण) से भी श्रवण यंत्रों की कार्यक्षमता कम हो जाती है. यही नहीं, टेलीफोन या मोबाईल फोन के ज्यादा समय तक कान पर ध्वनि आक्रमण से बहुत क्षति होती है. मेरा अपना अनुभव है कि हमेशा बायें कान से फोन सुनने की वजह से उस कान की सुनने की क्षमता दाहिने के मुकाबले आधी रह गयी है. बायीं तरफ से आने वाली आवाज की पकड़ धीमी होने तथा उसके समझने में होने वाली देरी के कारण मेरे अर्धांगिनी ने मुझे ‘बहरा’ घोषित करने में कसर नहीं छोड़ी है. वह अपनी सहेलियों तथा मेरे परिचितों/ मित्रों/आगंतुकों से बात बात पर दु:ख जताते हुए कहती है, “ये बेचारे, सुनते नहीं हैं.” सच बात तो ये भी है कि कई बार मैं जानबूझ कर उसके उपदेशों/आदेशों को अनसुना कर देता हूँ.

जर्मनी के तानाशाह हिटलर के साथी गोवेल्स ने कहा था कि ‘एक झूठ को सौ बार बोलने से वह सच लगने लगता है’. ऐसा ही हुआ कि जब मैं कभी सुनता था और कभी अनसुना होता था तो मेरे बड़े बेटे डा.पार्थ ने माँ के आग्रह पर मेरे कान में एक ‘हियरिंग ऐड’ (माईक्रोफोन) फिट करवा दिया. कुछ दिन तो मैं इस जेवर को पहनता रहा, पर जब लगा कि पहले से ज्यादा असुविधा होने लगी तो निकालकर रख दिया है ताकि भविष्य में  वक्त जरूरत काम आ सके.

इस सम्बन्ध में एक मजेदार संस्मरण भी लिखना चाहता हूँ कि नौकरी के दिनों में जब मैं यूनियन के विषयों को लेकर लेबर कोर्ट जाता था तो मैंने देखा कि माननीय जज काटजू जी (पूरा नाम अब विस्मृत हो गया है), जो कि हियरिंग ऐड इस्तेमाल करते थे, कभी कभी जब मैनेजमेंट का वकील बहस पर आता था तो हियरिंग ऐड निकाल कर रख देते थे; शायद वे समझते थे कि ‘workers are the weaker section of the society’.  ताकतवर मैनेजमेंट  मोटी फीस वाले नामी गिरामी वकीलों की बड़ी बड़ी अनावश्यक टेक्निकल दलीलें वे सुनना नहीं चाहते थे.

कुछ भुक्तभोगी कहा करते हैं कि "ना सुनना भी बड़ी नियामत है." गांधी जी ने भी कहा कि “बुरा मत सुनो” अच्छा न सुना तो कोई बात नहीं, बुरा तो बुरा ही है, पर कहाँ तक बचोगे?  आजकल अखबार, रेडियो, टेलीविजन, यानी सारे का सारा मीडिया सबसे पहले ‘गंदी बात’ सुनाते हैं. ये समय की बलिहारी है, परख आपको करनी है. बहरहाल अपने श्रवण यंत्र की हिफाजत जरूर करें और कम सुनने वालों का ठट्टा ना करे.
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शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

बापू को सदमा

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के सिद्धांतों पर अपनी अटूट श्रद्धा रखने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी हाल में भारत की विशिष्ट यात्रा के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “भारत बहुत सुन्दर व बहुधर्मी देश है, लेकिन गत वर्षों में यहाँ के लोगों में धार्मिक असहिष्णुता बहुत बढ़ गयी है. अगर महात्मा गांधी आज मौजूद होते तो हालात देखकर सदमे में आ जाते.”

उनकी इस सटीक व सत्य टिप्पणी / आकलन पर हमारे बहुत से धर्म विचारकों/ठेकेदारों/राजनैतिक खिलाड़ियों को बदहजमी हो रही है. जो कल तक मोदी व ओबामा को सगे भाई बता रहे थे, अब कह रहे हैं कि ओबामा अपने हदों से बाहर जाकर धोखेबाजी कर रहे हैं. सच बात तो यही है कि ये ही ‘नीच राजनीति’ है, जो यथार्थ को पचा नहीं पा रही है.

ह्वाईट हाऊस की तरफ से बाद में ये राजनीतिक स्पष्टीकरण भी आया है ओबामा जी का बयान केवल देश की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी के परिपेक्ष्य में नहीं कही गयी थी, पर धार्मिक उग्रवाद-उन्माद अनेक तरह से उभर कर उठा है, जिससे देश में सद्भाव व सामाजिक विश्वास में भारी गिरावट आ गयी है. दंगे-फसाद, धर्मांतरण की प्रक्रिया, लव जिहाद और उकसाने वाले आपत्तिजनक बयान हम सब देख सुन रहे हैं; लेकिन हम तो पाखंडी हैं, इसे कैसे स्वीकार कर सकते हैं? हमारे एक नामधारी नेता ने यहाँ तक कह दिया है की “ओबामा दुनिया का कोई धरम का ठेकेदार नहीं है जो हमारे देश के बारे में ऐसी बात कह रहा है. हम बहुत धार्मिक सहिष्णु हैं.”

अरे भाई, ओबामा जी, शायद आपको आपके जिगरी दोस्त ने ये नहीं बताया कि हमारे यहाँ ‘गोडसे मंदिर’ बनने वाला है. मोहनदास करमचंद गांधी को निकृष्ट व्यक्ति बताने वाले अनेक सन्देश सोशल मीडिआ पर नित्य प्रकाशित हो रहे हैं. आपने ये बात सौ फीसदी सही कही है कि “महात्मा गांधी यदि आज मौजूद होते हो सदमे में होते.” अफसोस तो इस बात का भी है की गांधी का तमगा लेकर चलने वाले कर्णधार इस पर चुप्पी साधे हुए हैं.
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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

कुमाऊं आँचल का त्यौहार 'घुघुतिया'

हमारा घुघुतिया त्यौहार.
हमारे कुमायू क्षेत्र (उत्तराखंड) में मकर संक्रांति पर ‘घुघुतिया’ नाम का एक अनूठा पारंपरिक त्यौहार मनाया जाता है

सूर्य अपने सौर मंडल के गृह-उपग्रहों के साथ अनंत आकाश में स्वयं भी अबाध गति से चक्कर काटता है, सारा सौर मंडल सूर्य की ऊर्जा, प्रकाश व चुम्बकीय शक्तियों पर निर्भर है. इसलिए अनादि काल से सूर्य को भगवान् कहा जाता है. अनेक अवसरों पर अनेक प्रकार से इसकी पूजा-अर्चना की जाती है. मकर संक्रांति जिसे ज्योतिष गणना तथा खगोलीय परिवर्तन के आधार पर धनु राशि से मकर राशि में संक्रमण होना माना गया  है तो इसे संक्रांति कहा जाता है.स्नान कर्म, दान-पुन्य व सूर्य पूजन का विधान है. पश्चिमी प्रदेश में पतंगबाजी भी अब इस अवसर का शुगल हो गया है. गंगा स्नान, कल्पवास आदि अनेक तरह की तपस्या का प्रावधान सनातन धर्म में किया गया है.

कुमायू क्षेत्र में प्रसिद्ध तीर्थ बागेश्वर का उतरायणी मेला और घुघुतिया त्यौहार की विशेषता यहाँ के निवासियों के लिए जूनून की तरह होता है. लोककथा के अनुसार पन्द्रहवीं शताब्दी में यहाँ चन्द्र राजवंश का राज हुआ करता था .राजा कल्याण चन्द्र को बागनाथ भगवान् से मनौतियों के बाद पुत्र निर्भय चन्द्र प्राप्त हुआ था, माँ ने उस बच्चे को ‘घुघुति’ निकनेम अर्थात फाख्ता रख दिया था (घुघुति निर्दोष, चिकना सा प्यारा पक्षी होता है.) राजकुमार घुघुति कि मोतियों की माला प्रिय थी  जिसमें घुंघुरू भी घुंथे हुए थे.माँ बच्चे की जिद पर अकसर ठिठोली करके डराती थी कि “तेरी माला काले कौवे को दे दूंगी” और ठिठोली में कौवे को बुला कर कुछ खाने को भी दे दिया करती थी. कहते हैं कि इस प्रकार कौवे से उसकी दोस्ती सी हो गयी थी.राजा का मंत्री दुष्ट था उसने एकदिन बच्चे को उठावा लिया और बध करने के इरादे से जंगल में ले गए. उसका इरादा राज्य में खुद कब्जा करने का था पर बच्चे के सौभाग्य से काले कौवे ने बच्चे को पहचान लिया और काँव काँव करके सभी कौवों को इकट्ठा कर लिया मंत्री के लोग डर कर बच्चे को वहीं छोड़कर भाग लिए.बच्चे ने घबराकर अपनी माला पेड़ की साख पर लटका दी जिसे लेकर काला कौवा राजमहल पहुँच गया और आभाष करा दिया कि बच्चा मुशीबत में है. कौवा काँव काँव करते हुए राजा के सैनिकों को जंगल की तरफ राह बताता हुआ उड़ चला. बच्चा सैनिकों को सकुशल मिल गया. इस खुशी में राज महल में आटे में गुड मिलाकर छोटे छोटे चाबीनुमा गुन्थियाँ बनाकर घी में तलकर कौवों को बुला बुलाकर खिलाया गया ये मकर संक्रांति का दिन था. समस्त प्रजा हर्षोल्लासित हो गयी सबने अपने बच्चों के गले में गुन्थियों की मालाएं पहनाई.इन गुन्थियों को ‘घुघूत’ नाम दिया गया. इन मीठे घुघुतों को बच्चे खाते भी रहते हैं कई दिनों तक खराब भी नहीं होते हैं.

मकर संक्रांति शाम को पकवान बनते हैं और सुबह सवेरे घर के छज्जों पर से बच्चे काले कौवों को घुघुते व पकवान खाने के लिए चिल्ला चिला कर आवाज देते हैं, और कौवे आते भी हैं. सरयू नदी के पूर्वी भाग के गांवों में ठीक मकर संक्रांति यानि माघ एक गते को और पश्चिमी तरफ के गावों में अगली सुबह बच्चे बहुत उत्साह से” काली कौवे आजा” बोलते हुए आज भी हर वर्ष कौवों को बुलाया करते हैं सभी गावों में ये उल्लास अनुपम होता है.

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