बुधवार, 27 जुलाई 2011

ज़ाले

ज़ाले दिखने लगते हैं 
हर नए के पुराने होने पर 
यद्यपि नए पुराने गत-अनागत 
सबका अस्तित्व निर्भर करता है
जालों के ही अस्तित्व पर .
     हर कोने पर, हर मोड़ पर
      हर दर पर, हर पर्दे पर 
      हर तन पर, हर मन पर 
शीत युद्ध की बुभुक्षा सी 
निष्प्राण, किन्तु प्राणों को-
गृहण करने की जिजीविषा 
महां छद्म ज़ाले,
कब्रगाह से बन 
गहन गम्भीर मरघटी ज्ञान की तरह
प्रतीक्षा करते हैं-
हर आगंतुक की
उसके ज़ाले हो जाने तक .
          ***

1 टिप्पणी:

  1. मंगलवार 18/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी एक नज़र देखें
    धन्यवाद .... आभार ....

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