बुधवार, 9 मई 2012

परमार्थ

जैन मुनि तरुण सागर जी महराज अपने प्रवचनों में खरी खरी बातें, एक अलग ही अंदाज में कहा करते हैं. वे स्वयं त्याग और तपस्या की मूर्ति हैं. समकालीन उपदेशकों में वे सीधे सीधे समाज को संबोधित करते हैं तथा सद्मार्ग दिखाते रहते हैं. एक प्रवचन में वे कह रहे थे कि “धनवान लोगों को अपनी कमाई का उपयोग एक ट्रस्टी की तरह करना चाहिए. सुपात्रों, गरीबों, व भूखों को दान देना चाहिए और दान देकर भूल जाना चाहिए क्योंकि सारी संपदा भगवान की है. सँसार में आपका हिस्सा तो बस उतना ही है, जितना आप खुद खा पाते हैं अथवा दूसरों को खिलाते हैं.” इसी तरह महात्मा गाँधी जी ने भी धनवानों-कारखानेदारों को कहा कि वे अपनी सम्पति को एक ट्रस्टी के रूप में देखें और उपभोग करें.

मध्य एशिया के मुस्लिम इतिहास में संत इब्राहीम का नाम कई सन्दर्भों में आया है. वे बादशाह हुआ करते थे, बड़े अल्लाह वाले थे. देव प्रेरणा से उन्होंने त्याग और वैराग्य प्राप्त किया. एक स्मरणीय दृष्टान्त, उनके बारे में ये है कि वे नित्य एक भूखे व्यक्ति को भोजन करवाते थे, पर एक बार उनको दूर दूर तक कोई भूखा व्यक्ति नहीं मिला. अंत में खोजते खोजते एक भूखा वृद्ध उनको मिल ही गया, जिसे भोजन कराने के लिए वे अपने साथ लिवा लाये. भोजन परोसने पर जब आगंतुक खाने के लिए तत्पर हुआ तो संत ने उससे कहा, “तुमने खाने से पूर्व की नमाज नहीं पढ़ी?” वह बोला, “मैं तुम्हारे मजहब का नहीं हूँ, अग्नि-पूजक हूँ जिसे मैंने मन ही मन नमन कर लिया है.” संत इब्राहीम को ‘काफिर’ (खुदा को न मानने वाला) को भोजन कराना अच्छा नहीं लगा और कुछ कह डाला. आगंतुक बिना भोजन किये ही उठ कर चल दिया. संत को अपने व्यवहार पर बड़ा अफ़सोस हुआ क्योंकि भूखे व्यक्ति की जाति-धर्म नहीं देखनी चाहिए थी. ताउम्र उन्होंने अपने प्रवचनों में इसका उल्लेख किया.

आजकल जो देखने में आता है उसके अनुसार जो लोग सामाजिक या धार्मिक कार्यों के लिए धन देते हैं, उसका वे पहले माइक पर घोषणा कराते हैं या शिलापट्टों पर अपने धर्मात्मा होने का लेख लिखवाते हैं. यद्यपि ऐसे मनीषी भी हैं, जो हमेशा गुप्त दान या गुप्त मदद दिया करते हैं. इन्ही लोगों के परमार्थ व धर्म से ये पृथ्वी शून्य में टिकी हुई है.

हमारे शास्त्रों में, आप्तोपदेशों में परोपकार पर बहुत कुछ कहा गया है. एक नीतिपरक श्लोक में लिखा है:
          परोपकाराय फलन्ति वृक्ष:
          परोपकाराय बहन्ती नद्य:
          परोपकाराय दुहन्ति गाव:
          परोपकारार्थ  इदं शरीरम  

मृत्युपरांत हमारा भौतिक शरीर मिट्टी हो जाता है, तो इसके नष्ट होने से पहले इसके अवयव कहीं परोपकारी कार्यों में दान दे दिये जाएँ तो कितना अच्छा हो? आये दिन अखबारों में, इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नेत्रदान/अंगदान की अपीलें छपती हैं, पर कितने लोग प्रेरणा ले पाते हैं? ये विचारणीय विषय है. सभी प्रबुद्ध लोगों को इस बारे में अपने आस-पास समाज को शिक्षित करना चाहिए.
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सोमवार, 7 मई 2012

सूरजमुखी

वह पैदाइशी सूरजमुखी तो नहीं थी, पर उसका दुर्भाग्य ही था कि दस साल की उम्र में ल्यूकोडर्मा नामक चर्म रोग उसकी अँगुलियों के पोरों, कनपटियों, पलकों और पीठ से शुरू होकर धीरे धीरे सारे शरीर पर फैलता गया. २५ की उम्र तक पहुँचते पहुँचते वह पूरी सफ़ेद हो गयी. लोग उसका असली नाम तो भूल गए और सूरजमुखी कहा जाने लगा. सच तो ये है कि सूरजमुखी और ल्यूकोडर्मा में बहुत अंतर होता है, पर आम व्यक्ति इसे कहाँ समझ पाता है?.

पंडित दीनानानाथ शर्मा, एक कर्मकांडी सनाढ्य ब्राह्मण हैं. अभुक्त मूल नक्षत्र में बेटी के पैदा होते ही वे अनेक प्रकार से शंकित तथा चिंतित रहे. बेटी की आँखें हिरनी की तरह बड़ी बड़ी और सुन्दर थी, राशि के अनुसार भी ‘सु’ शब्द  उनको शुभ लगा, अत: नाम दिया गया ‘सुनयना’. सुनयना सभी सामान्य बच्चों की तरह ही चँचल, शोख व स्नेहिल बच्ची थी. पंडित जी ने उसके अशुभ ग्रहों की शान्ति के लिए कुछ टोटके-पूजा भी किये लेकिन भविष्य और भाग्य को कौन जानता है? विधि की लेख पहले से लिखी रहती है.

ल्यूकोडर्मा कोई छूत की कीटाणुजनित या जेनेटिक बीमारी तो है नहीं, पर हमारी पुरानी किताबों व अशिक्षित समाज की मान्यताओं में इसे एक प्रकार का कुष्ट रोग कहा गया है, जो बिलकुल गलत व गैर जरूरी बात है. क्योंकि ये कुष्ट यानि लेप्रोसी कत्तई नहीं है. इस बारे में सबको अपनी सोच बदलनी चाहिए.

मेडीकल साइंस भी अभी तक इसकी जड़ नहीं पकड़ पाया है कि चमड़ी के बाहरी सेल/ऊतक अपना स्वाभाविक रंग छोड़ कर सफ़ेद क्यों हो जाते हैं. इसका सीधा सम्बन्ध लीवर से बताया जाता है. विरुद्ध भोजन जैसे दूध-मछली, दही-करेला, जिनके तत्व-प्रोटीन मेल नहीं खाते है, लीवर में प्रतिक्रया करते हैं और त्वचा पर प्रभाव डालते हैं.

जब ल्यूकोडर्मा उजागर होने लगा तो पंडित दीनानाथ ने पहले वैद्यों की शरण ली, जिन्होंने बावची का तेल और बावची मिश्रित औषधियां दी, पर कोई लाभ नजर नहीं आया. ऐलोपैथिक दवाएं भी विशेषज्ञों की सलाह पर नियमित दी पर ल्यूकोडर्मा का प्रसार रुका नहीं. अपने पूर्वाग्रहों और ज्योतिषीय विश्वासों के तहत वे इसे अभुक्त मूल नक्षत्र का प्रभाव मानते रहे, जो एक खयाल मात्र था.

अखबारों में ल्यूकोडर्मा ठीक करने के सैकड़ों विज्ञापन छपते हैं. ‘मरता क्या नहीं करता’ वाली बात थी. बेटी का मामला बहुत नाजुक होता है, जिसने जैसी सलाह दी, वैसा किया. बिहार के गया और कतरीसराय से कुछ ठग वैद्यों से भी पार्सल द्वारा दवाएं मगवाई किन्तु सारी दवाईयां और प्रार्थनाएं बेकार गयी.

इन सारी प्रक्रियाओं का मनोवैज्ञानिक प्रभाव सुनयना पर जरूर पड़ा. बेचारी हीनभावनाग्रस्त रहती थी. ये स्वाभाविक भी था. इसी हालत में वह इन्टरमीडिएट तक पढ़ गयी. अब पंडित जी को उसकी शादी की चिंता सताने लगी. वे कहा करते थे, “कोई लूला-लंगड़ा, काना कैसा भी सजातीय लडका मिल जाता तो बिटिया के हाथ पीले कर देता.” लेकिन उनको एक ऐसा रिश्ता मिल गया जहाँ सब ठीक ठाक लगता था. लड़के में काना, लूला-लंगड़े जैसी बात नहीं थी, हाँ दहेज के लिए गोल-गोल बातें करके अप्रत्यक्ष रूप से मुंह फाड़ा जा रहा था.

पंडित रामस्वरूप शर्मा का बेटा दयानंद शर्मा किसी प्राइमरी स्कूल में अध्यापक था. ल्यूकोडर्मा के बारे में जानते-सुनते उसने हाँ कर दी. दीनानाथ जी ने भी अपनी हैसियत से ज्यादा स्त्रीधन (दहेज) देकर बेटी को विदा किया और सत्यनारायण भगवान की पूजा करके अनेक धन्यवाद अर्पण किये. ये बात बाद में महसूस की जाने लगी कि ये शादी दहेज के लोभ मे की गयी थी. खासकर दयानन्द की कर्कश, जाहिल माँ ने अपना असली रंग बात व्यवहार से बता दिया वह सुनयना के चर्म रोग पर ताने दिया करती थी. सुनयना आहत तो होती थी पर वह इसे भाग्य की विडम्बना समझ कर सह लेती थी. ससुरालियों के इस प्रकार दुर्व्यवहार को उसने अपने माता-पिता तक नहीं पहुचने दिया. वह हर तरह ते परिपक्व तथा धैर्यवान हो गयी थी.

भगवान भी ऊपर से सब देखता ही है. कहा गया है कि "निर्बल को न सताइए जाकी मोटी हाय." हुआ यों कि उसकी सास गंभीर रूप से बीमार हो गयी. ब्लडप्रेशर बढ़ा मिला, हार्ट की आर्टरीज में ९०% ब्लोकेज पाया गया. तुरन्त बाईपास सर्जरी की तैयारी की जाने लगी. इस प्रकरण में भी निर्दोष सुनयना को अशुभ करार करते हुए ना जाने क्या क्या सुनना पड़ा. पर जब सास के लिए ‘ओ निगेटिव’ खून की जरूरत पड़ी तो इस ब्लड ग्रुप का कोई डोनर नहीं मिला. अत: आपरेशन स्थगित किया जाने लगा. दबे स्वर में सुनयना ने अपने पति को बताया कि स्कूल के दिनों में उसके खून की जाँच हुई थी और ‘ओ निगेटिव’ बताया गया था. वह रक्तदान को तैयार भी थी. लेकिन परिवार वालों को लग रहा था कि श्वेत कुष्ट का रोग बुढ़िया को भी हो जाएगा, पर जब ये बात आपरेशन करने वाली डाक्टरों की टीम को बताई गयी तो उन्होंने निराकरण किया कि पहली बात तो ये कुष्ट नहीं है, और दूसरी बात रक्त लेने-देने से ल्यूकोडर्मा बुढ़िया को कतई नहीं होगा.

सुनयना ने सहर्ष रक्तदान किया. सास का सफल आपरेशन हुआ और वह धीरे धीरे स्वस्थ हो गयी. इस घटना का परिवार के लोगों पर ऐसा प्रभाव हुआ कि सब का रवैया ही बदल गया. सारे गाँव में इस बात की चर्चा हुई. पंचायत में भी ये मसला लोगों के संज्ञान में आया. पंचायत ने सभी को ताकीद कर दिया कि दयानंद की बहू को कोई भी सूरजमुखी नहीं कहेगा.

जब अच्छा समय आता है तो सब अपने आप सामान्य होता चला जाता है. अगले वर्ष जब ग्राम प्रधान का पद महिला के लिए आरक्षित हुआ तो गाँव वालों ने सर्व सम्मति से सुनयना को ग्राम प्रधान चुन लिया.

पंचायत भवन में जो स्लोगन लिखे गए हैं, उनमें से एक यह भी है, 'ल्यूकोडर्मा कोई अभिशाप नहीं है’
इस बीच ये शुभ समाचार आया है कि सुनयना जल्दी माँ भी बनने वाली है.
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शनिवार, 5 मई 2012

चुहुल -२२


(१)
एक ८०+ बुजुर्ग दम्पति अपने घर में रहते थे. उनसे मिलने एक रिश्तेदार आया. पति ने दरवाजा खोला, बहुत कोशिश करके उसे पहचाना, बिठाया, फिर अपनी बुढ़िया को आवाज लगाई, “ओ जानम, देखो कौन आया है?”
बुढ़िया के कान अपनी क्षमता खो बैठे थे, सो उसने नहीं सुना थोड़ी देर में फिर बुड्ढे ने बहुत सोच करके आवाज दी “जानू, प्रेम आया है एक गिलास पानी लाना.”
बुढ़िया ने फिर भी नहीं सुना तो बुड्ढा खुद उठकर अन्दर जाने लगा तब प्रेम बोला, “ताऊ, आप फिजूल में परेशान हो रहे हैं, मुझे प्यास बिलकुल नहीं है. मैं तो इस बात से खुश हूँ कि आप इस उम्र में भी ताई को ‘जानम’, ’जानू’ कहकर पुकार रहे हैं.”
बुड्ढा बोला, ”दरअसल बेटा, बात ये है कि मैं पिछले दस सालों से इसका नाम ही भूल गया हूँ, इसलिए ऐसे ही आवाज देनी पड़ती है.”

(२)
एक आदमी तोता खरीदने के लिए ‘पक्षी बाजार’ में गया. पक्षी बेचने वाला बोला, “आज तो मेरे पास दो ही तोते बचे हैं. इनमें से एक तो गाली-अपशब्द बोलता है, जैसे हरामी, कुत्ता, बेईमान आदि, इसकी कीमत मात्र दस रूपये है. दूसरा अच्छी अच्छी बातें बोलता है जैसे, नमस्कार, प्रणाम, खुश रहो, आपके बच्चे खुश रहें, घर में लक्ष्मी रहे, आदि आदि. इसकी कीमत एक हजार रूपये है. आपको जो पसंद हो ले जाइए.”
ग्राहक ने शुभकामनायें देने वाला तोता पसंद किया और खरीद कर घर ले आया. घर लाकर परिवार के लोगों तथा पड़ोसियों को बात बताई. शुभ कामनायें सुनाने के लिए उसे घर के चौक पर बिठाया. तोते को शुरू करने के लिए एक पतली डंडी से ‘टच’ करना शुरू किया. तोता बोला, “नमस्कार मित्रों” फिर टच करने का क्रम चल पड़ा तोता भी बोलता गया, “स्वस्थ रहो”, “तुम्हारे बच्चे खुश रहे”, ”खूब पढ़े”, “घर में लक्ष्मी रहे”. जब तक टोचते रहे वह अच्छी बातें बोलता गया. लेकिन जब उसका स्टाक खतम हो गया तो वह चुप हो गया. टोचने वाले ने थोड़ा जोर से टोचा लेकिन वह फिर भी नहीं बोला. और जब पूरे जोर से डंडा चुभाया तो वह बोल पड़ा, “अबे, साले, हरामी, कुत्ते, कमीने क्या मुझे जान से मारेगा?”

(३)
बात पुरानी है, इंग्लेंड में क्रिकेट मैच के दौरान सचिन जब भी बाजार की तरफ जाता था तो फैन्स की वजह से चलना फिरना, खरीददारी करना दूभर हो जाता था. इसलिए वह एक लड़की के गेटअप में फ्राक पहन कर, लिपस्टिक लगाकर, लेडीज बैग लटका कर निकला. रास्ते में एक अफ्रीकन महिला ने रोक कर कहा, “हाय सचिन, बड़े क्यूट लग रहे हो”
सचिन ने बड़े आश्चर्य से पूछा, “आपने मुझे पहचाना कैसे?"
वह महिला अपना विग हटा कर बोली, “अबे, मैं काम्बली हूँ.”

(४)
एक लड़के ने अच्छी हिन्दी पढ़ ली. विशेषणों का ज्ञान प्राप्त किया कि ‘कु’ माने बुरा जैसे कुसंगति, कुरीति, कुमति आदि और ‘सु’ माने अच्छा जैसे सुमति, सुअवसर, सुसंगति आदि. संयोग से उसकी शादी राजस्थान में हो गयी, जहाँ जवांई जी को ‘कुंवर सा’ कहा जाता है.
जब वह ससुराल गया तो स्वागत में कहा गया, “आइये, कुंवर सा” जिसे सुन कर वह नाराज हो गया. बोला, "वर के आगे ‘कु’ के बजाए ‘सु’ लगाइए.”
                            
(५)
एक स्त्री अपने पति से बोली, “तुम्हारा दोस्त सुन्दर, जिस लड़की से शादी करने जा रहा है, वह बहुत खराब है. तुमको जाकर उसे मना करना चाहिए.”
पति बोला, "मैं हरगिज नहीं जाऊंगा. क्योंकि जब मेरी शादी तुम्हारे साथ हो रही थी, उसने भी तो मुझे मना नहीं किया.".
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गुरुवार, 3 मई 2012

नई राह


अरेबियन नाइट्स की कहानियों में जादुई पाउडर खाकर, दूसरों के निजी जीवन में झाँकने के खेल में एक बादशाह और उसका वजीर सारस बन जाते हैं. लेकिन वापस इन्सान बनने का मन्त्र भूल जाते हैं क्योंकि इस बीच उनको हंसी आ गयी थी, जो नहीं आनी चाहिए थी. इसी अवस्था में रोती हुई एक अन्य स्त्री पक्षी (उल्लू) से पेड़ पर उनकी मुलाक़ात होती है. वह स्त्री पक्षी शापित होती है. उनसे कहती है कि अगर उसी स्वरुप में कोई उससे शादी कर ले तो वह वापस राजकुमारी बन जायेगी. सारस बने राजा ने भी अपनी व्यथा उसको बताई और शादी की रजामंदी होते ही वह सुन्दर राजकुमारी के रूप में बदल जाती है. वह राजकुमारी उन सारसों को उनके राजमहल ले गयी और सबको रहस्य बताते हुए उनके इन्सान बनने के मन्त्र को खोज निकाला. वे फिर से इन्सान बने और जिंदगी की नई शुरुआत की गयी. लेकिन यहाँ इस निर्जन पार्क में पीपल के पेड़ के नीचे गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के लोहे के बेंच पर जो दो महिलायें, प्रेमा देवी और विद्याधरी देवी, बैठी हैं, बतिया रही हैं, बीच बीच में सुबुक सुबुक कर रो रही हैं, आंसू गिरा रही हैं, किसी प्रकार शापित या जादुई पाउडर के प्रभाव में कतई नहीं हैं. ये दोनों रिश्ते में समधन लगती हैं. उम्र दोनों की ६०+ है. पिछले साल दोनों ही थोड़े दिनों के अंतराल में विधवा हुई हैं. ये दोनों मूल रूप से गढवाल के चमोली जिले की रहने वाली हैं और अब गाजियाबाद में रहती हैं. अपनी जड़ों से कटी हुई सी हो गयी हैं.

प्रेमा देवी के पति गोपालसिंह मुम्बई में टाटा कम्पनी में काम करते थे. रिटायरमेंट के बाद दिल्ली में अपने इकलौते बेटे सुशील के पास आ गए थे क्योंकि पहाड़ का पुराना घर टूट गया था, जमीन भी उपराऊ व बिना पानी की थी अत: अब वहाँ जाकर अभाव व कठिनाइयों का जीवन जीने की कैसे सोच सकते थे? मुम्बई में २५-३० साल रह कर महानगरीय जीवन-शैली के आदी इन पति-पत्नी को बेटे के पास आना ही था. बेटा भी माता-पिता से प्रेम व श्रद्धा रखने वाला यथा नाम तथा गुण है. उसने अपनी सहकर्मी विनोदनी से प्रेम विवाह किया है जो विद्याधरी देवी की पुत्री है. विद्याधरी के पति दीवानसिंह दिल्ली विकास प्राधिकरण में सेवारत थे, खूब खाते-पीते ऐश की जिंदगी जी रहे थे, साउथ एक्सटेंशन में अच्छा खासा घर बनाया हुआ है. बेटी के लव मैरेज में माता पिता की पूरी स्वीकृति थी क्योंकि लड़का गढ़वाली होने के साथ साथ योग्य भी था.

परिवार की खुशियाँ बहुत जल्दी लुट गयी क्योंकि एक दिन दीवानसिंह को हार्ट अटैक हो गया. अस्पताल पहुँचने से पहले ही वे शरीर छोड़ गए. उनके स्वर्गवास के कारण दोनों परिवारों के समीकरण भी बिगड गए. दीवानसिंह की मौत का सदमा गोपालसिंह को इतना गहरा लगा कि तीन महीनों के अंतराल में वे भी मामूली अस्वस्थता से ही गुजर गए.

जाने वाले तो बेफिक्र चले गए लेकिन इन दोनों समधनों के लिए मरुथल जैसा जीवन जीने के लिए छोड़ गए. विद्याधरी देवी का तो अब आगे पीछे कोई नहीं था इसलिए सुशील और विनोदनी ने आग्रह किया कि वह उनके परिवार के साथ ही रहने को आ जाये. पर ना जाने क्या सोच कर उसने उनका आग्रह स्वीकार नहीं किया. वह एक आध दिन छोड़ कर गाजियाबाद में उनके फ़्लैट पर जरूर आती रहती है.

जब जोड़ा बिछुड जाता है तब पुरानी बातें याद आती है, ‘वे होते तो ऐसा होता.’ ‘वे होते तो ऐसा नहीं होता’ ‘वे ऐसा कहा करते थे’ आदि आदि संस्मरणों में भीगती दोनों महिलायें अपने गुजरे वक्त को कुरेद कुरेद कर उदास हो लेती.

उस शापित राजकुमारी या सारसों की तरह भविष्य के लिए कोई कल्पित किरण होती तो शायद वे इतना विलाप नहीं करती. आर्थिक सम्पन्नता या सुविधायें प्रिय जनों के विछोह का घाव भरने के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं. ऐसे में विद्याधरी देवी ने प्रेमा देवी से कहा कि आजकल टेलीविजन चेनलों पर लगातार संतों व कथावाचकों के प्रवचन आते हैं जिनमें मोह, भय, और क्लेश को कम करने के लिए बहुत अच्छे वचन व दृष्टांत कहे जाते हैं. अपने दुखड़ों को कम करने के लिए हमे ये सुनने चाहिए.

दोनों महिलाओं ने नियमित आप्त वचन सुनना शुरू किया इससे उनके मन को बहुत शान्ति मिली. कुछ दिनों बाद महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानंद के प्रवचन सुनने के लिए वे दोनों सात दिनों तक उनके कैम्प परिसर में जाती रही. अपनी अमृतवाणी में उन्होंने बताया कि ये सँसार एक माया है और जो लोग परमेश्वर में ध्यान लगाते हैं, वे मोह-माया के दु:ख से बाहर निकल जाते हैं. जीवात्मा के विषय में भगवतगीता के दूसरे अध्याय के बाईसवें श्लोक पर विस्तार से बोलते हुए स्वामी जी ने उनको नई प्रेरणा दी. श्लोक में लिखा है:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानी गृह्न्याति नरो पराणी
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाती नवानी देही.
अर्थात जिस प्रकार कपड़ों के जीर्ण होने पर हम अपने कपड़े बदल लेते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी नए शरीर में चली जाती है.  

इस सँसार की व्यवस्थाएँ, जीव-जंतु सब नश्वर हैं, इनकी मृत्यु अवश्यम्भावी है. कोई आगे आगे चला जाता है, और कोई पीछे. श्रीमद्भागवत महापुराण को मृत्यु का ग्रन्थ भी कहते हैं. राजा परीक्षित को मृत्यु भय हो गया था. सात दिनों तक भगवत चरित्र सुनकर वह भयमुक्त होकर इस सँसार से विदा हुआ. अत: मनुष्य को सद्कर्म करते हुए जीवन यापन करना चाहिए.

इस प्रकार सत्संग व धार्मिक प्रवचनों को सुनने से दोनों महिलाओं का दु:ख हरण हुआ औए जीने की नई राह मिल गयी.
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मंगलवार, 1 मई 2012

मेरी माँ - रेवती देवी

श्रीमती रेवती देवी (1910-1998)
आज एक मई है, मेरा ७३वाँ जन्म दिन है. मेरी श्रीमती, मेरे बेटे-बहुएँ, पोते-पोतियां, बेटी-दामाद, भाई, भतीजे, भानजे व मित्रगण सब उत्साहित रहते हैं कि मेरा ‘हैप्पी बर्थडे’ है. अपने अपने तरीके से ‘बधाई’ प्रेषित करते हैं. प्रद्युम्न तो इस मौके पर कुछ न कुछ सरप्राइज भी दिया करता है. पर इस खुशी के बीच मैं अपनी दिवंगत माँ के अमूर्त स्वरुप को अपने आसपास महसूस करता हूँ.

मैं अपने माता-पिता की पहली संतान, वह भी बड़ी मिन्नतों के बाद पैदा हुआ था. उनकी शादी के १८ सालों के बाद मेरा अभ्युदय हुआ था. खुशी भी परम्परागत रूप से अवश्य मनाई गयी होगी. लेकिन मैं ये सोचकर दु:खी भी हूँ कि मेरे पैदा होने पर आज ही के दिन, माँ को अतिशय कष्ट व प्रसव वेदना सहनी पड़ी होगी. तदन्तर रात-दिन मेरी देखभाल व पालन-पोषण में व्यस्त रहना पड़ा होगा. उस बीच माँ ने हजारों बार मुझे चूमा भी होगा, अपनी छाती से लगा कर दूध पिलाया होगा.

मुझे याद है मेरी माँ बहुत सुन्दर दिखती थी. कुमायूं के सुदूर पहाड़ी गाँव में ही उन्होंने अपना आधे से ज्यादा जीवन बिताया. मेरे पिता अध्यापक थे इसलिए गृहस्थी की सारी जिम्मेदारी भी माँ पर थी, पर ये सौभाग्य था कि बूढ़ी दादी का साया बहुत वर्षों तक उनके ऊपर रहा. खेती-पाती के रोजमर्रा कामों के साथ साथ दूध के लिए एक गाय/भैंस भी हमेशा पालती रही.

मुझे बिलकुल याद नहीं है कि बचपन में कभी माँ ने मुझे डांटा या पीटा हो. वे स्वयं पैदा होते ही मातृहीन हो गयी थी, कहते हैं कि मेरी नानी प्रसव के दौरान ही चल बसी थी. इस प्रकार उनका बचपन बहुत अभावों में गुजरा होगा और फिर अल्पायु में ही उनकी शादी करके ससुराल भेज दिया गया.

मैं जब भी घर-गाँव से अपने रोजगार पर लौटता था तो विदाई पर माँ की डबडबाई आँखों को देखता था. वह जब भी अपने दोनों हथेलियों से मेरे सर-माथे को स्नेह्स्पर्श देती थी तो मैं भी अपने आंसू नहीं रोक पाता था. मेरी बहनों की विदाई पर भी मैंने उन्हें बहुत भावुक होकर आंसूं गिराते हुए देखा था. पिता के देहावसान पर तो वह बहुत रोई थी, लेकिन उसके बाद जिन सत्रह वर्षों तक वह जीवित रही, उनके आंसू बिलकुल सूखे रहे.

माँ बताती थी कि उसे बहुत सपने आते हैं, अक्सर वह सपनों में पिता जी से संबाद किया करती थी. जिस दिन सपने में पिता जी आते थे, सुबह गो-ग्रास दिया करती थी, तथा चिड़ियों-गिलहरियों को आटे के पिंड बना कर छत में डाल देती थी.

वह ठेठ ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी थी लेकिन पिता के मृत्युपरांत जब वह मेरे अथवा छोटे भाई बसंत के परिवारों के साथ रहने मैदानी हिस्सों में आई तो उन्होंने नए वातावरण को बहुत जल्दी आत्मसात कर लिया. वह टेलीविजन देखती थी, उसके संवादों को समझ पाती थी अथवा नहीं, पर उस विषय में पूछ-ताछ अवश्य करती थी.

पिता जी, जीते जी उनकी बड़ी चिंता करते थे कि “मेरे बाद इसका क्या होगा?” पर वे हमारे परिवारों के साथ आसानी से व्यवस्थित हो गयी थी. वे अच्छे भोजन खाने-पीने की शौक़ीन थी, बनाती भी स्वादिष्ट भोजन थी. उनके स्वर्गवास के दो साल पहले सन १९९५ में मैंने उनका एक इन्टरव्यू रिकार्ड किया था, जिसमें पूछा कि “देहावसान के बाद उनका श्राद्ध किया जाये अथवा नहीं?” तो उन्होंने तुरन्त उत्तर दिया, "जरूर करना. खीर-पूड़ी बनाना-खाना और मुझे याद करना.”

नाती-पोतों से उनको बहुत स्नेह था. मेरे बेटों के विवाहोत्सव के अवसर पर उनको महिलाओं के बीच नाचते देखकर जो आनंदानुभूति हुई, उसका में वर्णन नहीं कर पा रहा हूँ.

८७ वर्ष की उम्र में धीरे धीरे उन्होंने अन्न, फिर दूध, अंत में जल का त्याग किया माघ के महीने में ठीक बसंत पंचमी का दिन उन्होंने अपने निर्वाण के लिए चुना. हम पाँचों भाई-बहन उनके सामने थे और बहुत सात्विक ढंग से, बिना किसी को ज्यादा तकलीफ दिये वह हमसे विदा हुई. उनके अन्तिम समय में छोटे भाई बसन्त तथा उसकी श्रीमती ने माँ की खूब सेवा की. सभी को ढेरों आशीर्वाद देकर गईं.

मैं अपने जन्म दिन पर श्रद्धा पूर्वक उनको याद करता हूँ. समय कभी पीछे को नहीं चलता है, वरना अपनी माँ से कौन बिछुड़ना चाहता है? 

सत्य कहा गया है: "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी."
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