गुरुवार, 3 मई 2012

नई राह


अरेबियन नाइट्स की कहानियों में जादुई पाउडर खाकर, दूसरों के निजी जीवन में झाँकने के खेल में एक बादशाह और उसका वजीर सारस बन जाते हैं. लेकिन वापस इन्सान बनने का मन्त्र भूल जाते हैं क्योंकि इस बीच उनको हंसी आ गयी थी, जो नहीं आनी चाहिए थी. इसी अवस्था में रोती हुई एक अन्य स्त्री पक्षी (उल्लू) से पेड़ पर उनकी मुलाक़ात होती है. वह स्त्री पक्षी शापित होती है. उनसे कहती है कि अगर उसी स्वरुप में कोई उससे शादी कर ले तो वह वापस राजकुमारी बन जायेगी. सारस बने राजा ने भी अपनी व्यथा उसको बताई और शादी की रजामंदी होते ही वह सुन्दर राजकुमारी के रूप में बदल जाती है. वह राजकुमारी उन सारसों को उनके राजमहल ले गयी और सबको रहस्य बताते हुए उनके इन्सान बनने के मन्त्र को खोज निकाला. वे फिर से इन्सान बने और जिंदगी की नई शुरुआत की गयी. लेकिन यहाँ इस निर्जन पार्क में पीपल के पेड़ के नीचे गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के लोहे के बेंच पर जो दो महिलायें, प्रेमा देवी और विद्याधरी देवी, बैठी हैं, बतिया रही हैं, बीच बीच में सुबुक सुबुक कर रो रही हैं, आंसू गिरा रही हैं, किसी प्रकार शापित या जादुई पाउडर के प्रभाव में कतई नहीं हैं. ये दोनों रिश्ते में समधन लगती हैं. उम्र दोनों की ६०+ है. पिछले साल दोनों ही थोड़े दिनों के अंतराल में विधवा हुई हैं. ये दोनों मूल रूप से गढवाल के चमोली जिले की रहने वाली हैं और अब गाजियाबाद में रहती हैं. अपनी जड़ों से कटी हुई सी हो गयी हैं.

प्रेमा देवी के पति गोपालसिंह मुम्बई में टाटा कम्पनी में काम करते थे. रिटायरमेंट के बाद दिल्ली में अपने इकलौते बेटे सुशील के पास आ गए थे क्योंकि पहाड़ का पुराना घर टूट गया था, जमीन भी उपराऊ व बिना पानी की थी अत: अब वहाँ जाकर अभाव व कठिनाइयों का जीवन जीने की कैसे सोच सकते थे? मुम्बई में २५-३० साल रह कर महानगरीय जीवन-शैली के आदी इन पति-पत्नी को बेटे के पास आना ही था. बेटा भी माता-पिता से प्रेम व श्रद्धा रखने वाला यथा नाम तथा गुण है. उसने अपनी सहकर्मी विनोदनी से प्रेम विवाह किया है जो विद्याधरी देवी की पुत्री है. विद्याधरी के पति दीवानसिंह दिल्ली विकास प्राधिकरण में सेवारत थे, खूब खाते-पीते ऐश की जिंदगी जी रहे थे, साउथ एक्सटेंशन में अच्छा खासा घर बनाया हुआ है. बेटी के लव मैरेज में माता पिता की पूरी स्वीकृति थी क्योंकि लड़का गढ़वाली होने के साथ साथ योग्य भी था.

परिवार की खुशियाँ बहुत जल्दी लुट गयी क्योंकि एक दिन दीवानसिंह को हार्ट अटैक हो गया. अस्पताल पहुँचने से पहले ही वे शरीर छोड़ गए. उनके स्वर्गवास के कारण दोनों परिवारों के समीकरण भी बिगड गए. दीवानसिंह की मौत का सदमा गोपालसिंह को इतना गहरा लगा कि तीन महीनों के अंतराल में वे भी मामूली अस्वस्थता से ही गुजर गए.

जाने वाले तो बेफिक्र चले गए लेकिन इन दोनों समधनों के लिए मरुथल जैसा जीवन जीने के लिए छोड़ गए. विद्याधरी देवी का तो अब आगे पीछे कोई नहीं था इसलिए सुशील और विनोदनी ने आग्रह किया कि वह उनके परिवार के साथ ही रहने को आ जाये. पर ना जाने क्या सोच कर उसने उनका आग्रह स्वीकार नहीं किया. वह एक आध दिन छोड़ कर गाजियाबाद में उनके फ़्लैट पर जरूर आती रहती है.

जब जोड़ा बिछुड जाता है तब पुरानी बातें याद आती है, वे होते तो ऐसा होता. वे होते तो ऐसा नहीं होता वे ऐसा कहा करते थे आदि आदि संस्मरणों में भीगती दोनों महिलायें अपने गुजरे वक्त को कुरेद कुरेद कर उदास हो लेती.

उस शापित राजकुमारी या सारसों की तरह भविष्य के लिए कोई कल्पित किरण होती तो शायद वे इतना विलाप नहीं करती. आर्थिक सम्पन्नता या सुविधायें प्रिय जनों के विछोह का घाव भरने के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं. ऐसे में विद्याधरी देवी ने प्रेमा देवी से कहा कि आजकल टेलीविजन चेनलों पर लगातार संतों व कथावाचकों के प्रवचन आते हैं जिनमें मोह, भय, और क्लेश को कम करने के लिए बहुत अच्छे वचन व दृष्टांत कहे जाते हैं. अपने दुखड़ों को कम करने के लिए हमे ये सुनने चाहिए.

दोनों महिलाओं ने नियमित आप्त वचन सुनना शुरू किया इससे उनके मन को बहुत शान्ति मिली. कुछ दिनों बाद महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानंद के प्रवचन सुनने के लिए वे दोनों सात दिनों तक उनके कैम्प परिसर में जाती रही. अपनी अमृतवाणी में उन्होंने बताया कि ये सँसार एक माया है और जो लोग परमेश्वर में ध्यान लगाते हैं, वे मोह-माया के दु:ख से बाहर निकल जाते हैं. जीवात्मा के विषय में भगवतगीता के दूसरे अध्याय के बाईसवें श्लोक पर विस्तार से बोलते हुए स्वामी जी ने उनको नई प्रेरणा दी. श्लोक में लिखा है:
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानी गृह्न्याति नरो पराणी
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाती नवानी देही.
अर्थात जिस प्रकार कपड़ों के जीर्ण होने पर हम अपने कपड़े बदल लेते हैं, उसी प्रकार आत्मा भी नए शरीर में चली जाती है.  

इस सँसार की व्यवस्थाएँ, जीव-जंतु सब नश्वर हैं, इनकी मृत्यु अवश्यम्भावी है. कोई आगे आगे चला जाता है, और कोई पीछे. श्रीमद्भागवत महापुराण को मृत्यु का ग्रन्थ भी कहते हैं. राजा परीक्षित को मृत्यु भय हो गया था. सात दिनों तक भगवत चरित्र सुनकर वह भयमुक्त होकर इस सँसार से विदा हुआ. अत: मनुष्य को सद्कर्म करते हुए जीवन यापन करना चाहिए.

इस प्रकार सत्संग व धार्मिक प्रवचनों को सुनने से दोनों महिलाओं का दु:ख हरण हुआ औए जीने की नई राह मिल गयी.
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2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

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