शुक्रवार, 30 जून 2017

उजाड़खंड की व्यथा-गाथा

हिमालय की गोद में बसा हुआ हमारा छोटा सा उत्तराखंड राज्य अनेक प्राकृतिक संपदाओं से हरा भरा रहा है. इसी को देवभूमि नाम भी दिया गया है. राज्य के दो मुख्य संभाग हैं; पश्चिम की तरफ गढ़वाल व पूर्वीय संभाग कुमाऊँ है. दोनों संभागों में हिन्दी की अपभ्रंश बोलियों में थोड़ा सा अंतर भी है, परन्तु सामाजिक व वैचारिक धरातल पर अनेक साम्यतायें हैं. गढ़वाल के दूर-दराज पहाड़ी गांवों की वर्तमान स्थिति भी लगभग वैसी ही होनी चाहिए जैसी हमारी कुमाऊँ क्षेत्र में है.

पिछले 50-60 वर्षों से रोजगार व आधुनिक सुख-सुविधाओं की तलाश में गावों के समर्थ लोग बड़ी संख्या में तराई/भाबर (मैदानी क्षेत्र) की तरफ बसने लगे थे. नौकरी-पेशा लोग बड़े शहरों की रोशनी में गुम होते चले गए. सरकारों ने अनेक लोकलुभावन घोषणाएँ या कार्यक्रम पलायन रोकने के जरूर किये हैं, पर हवा ऐसी चली कि आज गावों में केवल बूढ़े और अशक्त लोग बचे हैं, क्योंकि वे असमर्थ हैं. प्रेस की रिपोर्टों के अनुसार हमारे ये हजारों गाँव जो कभी स्वावलंबी हुआ करते थे, गुलजार थे, अब खंडहरों में तब्दील हो गए हैं. नौकरी-पेशा लोग कोटद्वार, हल्द्वानी, रामनगर, टनकपुर का रुख किया करते हैं, या कहीं रोड साइड पर बसने की जुगत करते हैं. इसी तुफैल में बागेश्वर जैसे शहर के चारों तरफ की कृषि वाली सेरे की पूरी जमीन मकानों की भेंट चढ़ चुकी है.

अब बचे-खुचे गावों में भी लोगों ने खेती करना छोड़ दिया है. उसके पीछे कारण ये बताये जाते हैं कि बंदरों, बाघों, व सूअरों का आतंक इतना बढ़ गया है कि खेती करना दुष्कर हो गया है. हाली-ग्वाल अब पहाड़ों में उपलब्ध नहीं है. सरकार सस्ते में अनाज दे रही है (अधिसंख्य लोग बी.पी.एल. कैटेगरी में हैं). फिर खेती की हाड़तोड़ मेहनत की जहमत क्यों की जाए? लोग अब गाय-भैस भी नहीं पालते हैं. पैकेट का दूध आसपास दूकानों में मिल जाता है.

कुल मिलाकर हालात ये हैं कि ये दूर दराज के गाँव अब बंजर हो गए हैं. हाँ, यहाँ से पलायन किये हुए बुजुर्ग लोग अपने पुराने दिनों को अवश्य याद किया करते हैं. यद्यपि उनके अपने अंधविश्वास आज भी ज़िंदा हैं. वे अपने गाँव से अपने देवी देवताओं के प्रारूप प्रस्तर साथ में लेकर आये हैं और नई बसावट में घन्याली-जागर कराते रहते हैं.
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सोमवार, 1 मई 2017

मेरा जन्मदिन

अपनी खुशियों को न्यौता देने के लिए बहुत से मनमौजी लोग क्या क्या नहीं करते रहते हैं? मेरे एक प्यारे दोस्त हैं जो हर महीने अपना जन्मदिन मनाते हैं, केक काटते हैं, और परिवार के साथ मस्ती करते हैं. लेकिन मेरा जन्मदिन तो फिक्स्ड है – एक मई. यों जीवन के प्रारंभिक वर्षों में, अल्मोड़ा जिले के दूर दराज उस पिछड़े-पहाड़ी गाँव में तब कोई पारंपरिक रिवाज जन्मदिन मनाने का नहीं था. बहुत बाद में मुझे मालूम हुआ कि एक मई की ये तिथि यूरोप व एशिया में श्रमिक जागरण की याद में ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है (अमेरिका में मजदूर दिवस वहाँ के ऐतिहासिक कारणों से १७ जुलाई को नियत है). यह संयोग ही रहा है कि मैं अपनी एसीसी सीमेंट कंपनी में अपनी सर्विस के दौरान एक ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में स्थापित हुआ और उसी जूनून को मैं लम्बे समय तक पालते आ रहा हूँ.

इस संसार के श्रृष्टा ने तमाम प्राणियों का जीवन कई अदृश्य डोरों से बांधा हुआ है. सभी के जीवनकाल (स्पैन) अलग अलग कोष्टकों में डले हुए हैं. काल के सिद्धांत, पृथ्वी द्वारा सूर्य की 365 दिनों की परिक्रमा के हिसाब से गणितज्ञों / खगोलशास्त्रियों (astronomers) ने सटीक ढंग से अनादि काल से स्थापित किये हुए हैं.

इस युग के वे बच्चे बहुत भाग्यशाली हैं, जिनके माता-पिता सभ्य, प्रबुद्ध, और संपन्न हैं. ये अपने बच्चों की खुशियों के लिए जन्मदिनों को यादगार बनाने के लिए समारोहपूर्वक मनाया करते हैं, अन्यथा हमारे समाज में ऐसे भी बच्चे हैं जिनको जन्मदिन से कोई  सरोकार नहीं रहता है. कारण अज्ञानता व गरीबी होती है. जहाँ कुपोषण हो, रोटी तक ठीक से मयस्सर ना हो, वहाँ केक काटने की बात करना भी पाप है.

मेरे एक रिश्तेदार अपने बच्चों के जन्मदिन पर ‘मार्कन्डेय पुराण’ का पाठन व अन्य स्वस्ति वाचन करवाते हैं. मुझे अपने बचपन की जो यादें हैं, उनमें शायद ही कभी सामान्य पूजा-पाठ कराई गयी थी. मैंने भी अपने बच्चों के जन्मदिन समारोहपूर्वक नहीं मनाये. अब जब मेरे ये बच्चे सयाने व संपन्न हैं तो अपने अपने व अपने बच्चों के जन्मदिनों को बढ़िया ढंग से मनाते हैं, तथा हम माता-पिता को भी हमारे जन्मदिन याद दिलाकर जन्मदिन की खुशियाँ देते हैं. यों कोई मित्र या परिचित भी इस अवसर पर ‘बधाई’ दे तो अच्छा लगना स्वाभाविक होता है.

सोशल साईट्स पर सक्रिय रहने पर, खासकर, फेसबुक पर मित्रों के जन्मदिन उजागर होते रहते हैं. इसलिए लगभग सभी सुहृद मित्रगण शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति करके धन्य होते हैं. ये एक शुगल सा भी हो चला है. क्योंकि आज हम लोग इंटरनेट के जमाने में जी रहे है, एक दूजे के बहुत करीब आ गये हैं. ये हमारा सौभाग्य है कि हम मित्रों व रिश्तेदारों से दूर होते हुए भी उनसे संवाद कर सकते हैं.

कहावत है कि “जन्मदिन एक ऐसा दिन होता है, जब हम रोते हैं और हमारी माँ हमारे रोने पर खुश होती है.” आज इस अवसर पर मैं भी अपनी स्वर्गीय माँ को श्रद्धापूर्वक याद करता हूँ, जिसने मेरी खातिर अनेक वेदनाएं खुशी खुशी सही होंगी. साथ ही अपने स्वर्गीय पिता के गरिमामय स्वरुप को अपने अंत:करण में महसूस कर रहा हूँ. 

अंत में, मैं अपनी सहधर्मिणी, अपने सभी भाई-बहनों, पुत्र-पुत्रवधुओं, बेटी-दामाद, पौत्र - पौत्रियों, नातिनी, भतीजे-भतीजियों और इष्ट-मित्रों को उनके स्नेह और शुभकामनाओं के लिए ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ, तथा सभी के सुख-सौभाग्य की कामना करता हूँ.
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शनिवार, 8 अप्रैल 2017

सरकारी बेशर्मी

जस्टिस काटजू अपनी बेबाक व तल्ख़ टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं, फलस्वरूप वे सरकार और स्वयं न्यायपालिका को खटकते हैं.

शराब की दूकानें नेशनल हाईवेज से 500 मीटर दूर करने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश इसलिए सामने आया कि आसानी से सडकों पर शराब मिलने पर गाड़ीवान/ड्राईवर//गैरजिम्मेदार लोग सड़क चलते नागरिकों की नशे में जान ले लेते हैं या उनको चोट पहुंचाया करते हैं. कोर्ट का उद्देश्य बहुत साफ तथा लोकहितकारी था. जस्टिस काटजू ने जो कहा वह भी 200% सही है कि “क़ानून बनाने का काम विधायिका का है ना कि न्यायपालिका का.” लेकिन सता पर काबिज सरकारें / उनके नेता/ माफिया/ दलाल सब शराब की अंधाधुंध कमाई से पोषित रहे हैं, इसलिए इस गंभीर समस्या पर उत्तराखंड की नव निर्वाचित सरकार ने जो चोर रास्ता निकाला है वह सुप्रीम कोर्ट पर थूकने जैसा है.

एक तरफ पूरे उत्तराखंड में शराब बंदी की मांग को लेकर आम जन विशेषकर महिलायें संधर्षरत हैं, दूसरी तरफ सरकार द्वारा रातोंरात लगभग सभी हाईवेज का नया नक्शा बनाकर अपनी ‘शराबी नीति’ को उजागर कर दिया है, ताकि ये शराब की दूकानें पूर्ववत सडकों पर बनी रहे. ये बेशर्मी की पराकाष्ठा है.

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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

मीन मेख

आजाद देश के आजाद कलमकार लोग कोई भी,कहीं भी, किसी भी मुद्दे पर मीन मेख निकालते रहते हैं; अब उत्तर प्रदेश की नई योगी सरकार के कृषक-ऋण माफी के मामले को ही लीजिये आलोचक कह रहे हैं कि “ये वोटों पर डाका डालने का एक जुमला था जो ‘हाथी की पाद’ साबित हुई है.” क्योंकि इसके साथ जो शर्तें बताई गयी हैं वे उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करती हैं जिसमें अन्नदाता किसान को वास्तविक राहत मिले.

किसानों ने कर्जा जिन उद्देश्यों से भी  लिया उनमें गाय, बैल, भैस या बकरी खरीद के लिया होगा वे सब कृषि कार्यों के सहयोगी आचार से बाहर नहीं थे. स्वजनों के दुःख-बीमारी या बच्चों की पढाई अथवा मकान बनवाने में लिया गया कर्ज पारिवारिक जीवन के लिए अतिशय जरूरी होता है. सहकारी बैंकों या सूचीबद्ध बैंकों की ऋण वितरण की प्रक्रिया में जो अल्पशिक्षित /अनपढ़ काश्तकार पारंगत ना हो और दलालों/कमीशनखोरों के चंगुल से मुक्त ना हो, तो मजबूरन सूदखोर शाहुकारों की शरण में आ पड़ता है, और सरलता से जमीन या जेवर गिरवी रख कर धन पा लेता है, लेकिन मूल से ज्यादा ब्याज चुकाने में जिन्दगी बिता देता है. बहरहाल, मुद्दा कुलमीजान ‘कर्जे’ का है. जिसके कारण वह त्रस्त रहता है. आत्महत्या कोई भी खुशी से नहीं करता है. राजनैतिक दल चुनाव जीतने के लिए गरीब की दुखती नस पर अंगुली रखते हैं. यह देश का दुर्भाग्य है.

ये और भी बुरी परम्परा बनती जा रही है कि चुनावों के समय पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए साड़ियाँ, मोबाईल, लैपटॉप, घी+शक्कर, साइकिल आदि वस्तुएँ बाँटती हैं, या चुनाव के बाद ये सब देने का सच्चा या झूठा वायदा करती हैं. इस बार देश के कर्णधार, सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी जी, ने अपनी रैलियों में खुले आम वायदा किया था कि “किसानों के कर्जे माफ़ करूंगा." अब जब प्रचंड बहुमत मिल गया है तो इस वायदे को पूरा करने के बजाय इसमें शर्तें लगाकर गलियां निकाल दी गयी हैं.

ऋण का जो अल्पांश माफ़ हो रहा है, उसे सही दिशा में एक कदम की संज्ञा दी जा सकती है, पर वायदे की ईमानदारी नहीं कहा जा सकता है. जहां तक धनराशि के आंकड़े हैं, ये बड़े जरूर लग रहे हैं, लेकिन इसी केन्द्रीय सरकार ने पड़ोसी मुल्क नेपाल व बांगला देश को कई गुना धन दिल खोलकर मदद के रूप में दिया है, इसके अलावा तैमूरलंग के देश मंगोलिया जाकर अरबों रूपये देकर वाहवाही लूटी है.

ऐसे में सारे किसान खुद को ठगा सा महसूस करेंगे और कर्ज माफी का मामला उन राज्यों में भी शर्तों के साथ उठेगा, जिनमें काश्तकारों की हालत उत्तर प्रदेश से बेहतर नहीं है.

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शनिवार, 1 अप्रैल 2017

मेरा ड्राइविंग लाइसेन्स

मेरे ‘टू ह्वीलर्स & फ़ोर ह्वीलर्स’ ड्राइविंग लाइसेन्स को पिछले ३५ वर्षों में किसी परिवहन अधिकारी ने सड़क पर चेक नहीं किया क्योंकि मैंने कभी भी ऐसी नौबत नहीं आने दी. पिछली बार, सन 2012 में मेरे गृहनगर हल्द्वानी के रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस (RTO) में 5 वर्षों के लिए नवीनीकरण हुआ था. उस बार मुझे किसी हील-हुज्जत के, या यों कहूं कि बिना लाइन में लगे, बिना सुविधा शुल्क (रिश्वत) दिए ही सफलता मिल गयी थी क्योंकि मेरे एक निकट संबंधी यहीं हल्द्वानी में विजिलेंस विभाग में S.P. थे. उन्होंने मेरी सहायतार्थ एक इन्स्पेक्टर को साथ में भेज दिया था. RTO ऑफिस में चाय पीते हुए सारा काम हो गया था.

इस बार मैं थोड़ा शंकित भी था कि इस कार्य में मेरी उम्र व्यवधान बन सकती है. मैं अब एक महीने बाद ७८ का हो जाऊंगा. हल्द्वानी के बेस अस्पताल (जिसका प्रमाणपत्र उत्तराखंड परिवहन विभाग में मान्य होता है) में मेरी शारीरिक क्षमता तथा ज्ञानेन्द्रियों की तपास करने के बाद सब प्रकार से ‘फिट’ घोषित होने के बाद मैं प्रमाणपत्रादि लेकर RTO ऑफिस चला गया. ये मार्च 31 का दिन था. सरकारी कारोबार में साल का आख़िरी दिन होने से कार्यालय परिसर में बला की भीड़ थी. वाहन एवं वाहन मालिकों का हुजूम होने से मुझे अपनी गाड़ी दूर सड़क पर जाकर पार्क करनी पड़ी. उस मेले जैसे माहौल में अपने अपने काम से आये लोगों के अलावा ‘दलालों’ की टीम भी सक्रिय थी. दलाल की परिभाषा यह है कि वह सम्बंधित कर्मचारियों व अधिकारियों से सेटिंग रखता है, और सुविधा शुल्क लेता है. एक दलाल ने दूर से ही भांप लिया कि मुझे किसी की सहायता की दरकार है. वह मुझ से आकर बोला “खर्चा-पानी लगेगा. मैं करवा दूंगा, आपका लाइसेन्स रिन्युअल."

मुझे वहाँ गाइड करने वाला PRO का कार्यालय भी नहीं मिला. बिल्डिंग की बाहरी खिड़कियों पर दोपहर की चिलचिलाती घूप में वाहन मालिकों, टैक्सी ड्राइवरों, रजिस्ट्रेशन कराने वालों या कागजात ट्रांसफर कराने वालों की लम्बी लम्बी लाईनें, तथा फीस जमा कराने वालों की धक्का-मुक्की देखकर मेरे पास दलाल से ‘हाँ’ कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.  

वर्षों पहले से एक मिथक दिमाग में रहा है कि RTO का मतलब भ्रष्टाचार का बोलबाला. कई बार समाचारों में पढ़ा भी है कि छापामारी में कई लोग पकड़े जाते रहे हैं, पर फार्मूला भी हमेशा रहा है कि "रिश्वत लेते पकड़े गए और रिश्वत देकर पाक साफ़ हो गए."

मुझे सन 2007 के रिन्युअल का दिन भी याद है. मैंने सम्बन्धी क्लर्क को सीधे सुविधा शुल्क देकर ‘मित्रता?’ कर ली थी. बातों ही बातों में मालूम हुआ कि इस ‘मलाईदार’ पोस्ट से उसका ट्रांसफर अल्मोड़ा RTO ऑफिस को हो रहा था. वह बड़े आहत स्वर में मुझे बता रहा था कि “अल्मोड़ा ऑफिस में कोई कमाई नहीं है. अपने वेतन से ही गुजारा करना पड़ेगा.”

मैं यह नहीं कहूंगा की हर सरकारी कर्मचारी बेईमान होता है, सच तो ये है कि हम हिन्दुस्तानियों के जींस में बेईमानी बस गयी है. एक ट्रक के पीछे जुमला लिखा था, "सौ में से नियानाब्बे बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान." चुनावों में जीत कर आने वाली सभी पार्टियों के नेता ऊंचे ऊंचे स्वरों में कहा करते हैं, "भृष्टाचार को ख़तम कर देंगे." लेकिन ये जुमले थोड़े दिनों में भुला दिए जाते हैं. लोकतंत्र को सबसे अच्छी शासन व्यवस्था कहा जाता है, पर चुनाव जीतने के लिए अनाप-सनाप खर्चा होता है, जिस पर कानूनी लगाम बेअसर है. राजनीति एक व्यापार बन गयी है; निवेश करके पांच साल में कई गुना वसूली का लक्ष्य रहता है. आंकड़े बताते हैं कि जीतने वालों की परिसंपतियों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हो जाती है. दूसरा कारण है, "ठेकेदारी प्रथा." हर ठेके के व्यापार में सिस्टम इतना बिगड़ चुका है कि कमीशन की रेट तय हैं. जिनका बँटवारा संतरी से लेकर मंत्री तक ऑटोमेटिक पहुँचता है. दलाल तो गुड़ की मक्खी की तरह दौड़े चले आते हैं. जब खून मुंह लग जाता है तो लोई उतर जाती है. ये सिर्फ परिवहन विभाग की बात नहीं है, लोक निर्माण विभाग और राजस्व विभाग का और भी बुरा हाल है.

बहरहाल मेरा ड्राइविंग लाइसेन्स अगले पांच सालों के लिए रिन्यू हो गया है, शायद ये आख़िरी रिन्युअल भी हो.
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