गुरुवार, 4 अगस्त 2011

बुलावा

          घटना कोटा, राजस्थान की है. कन्हैयालाल रावतभाटा रोड पर मस्ती से अपना ट्रैक्टर चलाकर शहर की तरफ बढ़ रहा था. उसके ट्रैक्टर-ट्राली में पत्थर भरे थे, जो शहर में चल रहे निर्माण कार्य में लगने थे. यह उसका नित्यक्रम था. करीब ३ किलीमीटर दूरी पर एक देहाती महिला घाघरा-लूगड़ी पहने, अपने सर में लकड़ी का गठ्ठर लेकर ट्रैक्टर से आगे चल रही थी. उसको भी कोटा ही आना था. ट्रैक्टर की आवाज सुन कर वह मुडी और उसने अपने हाथ से इशारा करके कन्हैयालाल से रुकने का निवेदन किया. बिना हील-हुज्जत के कन्हैयालाल ने उसको लिफ्ट दे दी. वह गठ्ठर सहित ट्राली में पत्थरों पर आ बैठी.

          थोड़ी दूर चलने के बाद उस महिला ने देखा कि एक 'गोहेरा' (छिपकली प्रजाति का एक अति जहरीला रेप्टाइल -जिसकी लम्बाई एक फुट के आसपास होती है. यह भूरे रंग का बड़ा चपल और डरपोक किस्म का प्राणी राजस्थान के रेतीले इलाकों में बहुतायत से पाया जाता है) उसके घाघरे में आ गया. महिला ने बिना समय गवांये उसे कपड़े  सहित गर्दन से पकड़ लिया. गोहेरा इस स्थिति में था कि काट नहीं सकता था. महिला की इस तुरत बुद्धि से वह आपदा से बच तो रही थी पर वह बहुत भयभीत थी और कातर स्वर में ड्राइवर को आवाज दे रही थी, पर ट्रैक्टर की धकधक आवाज में महिला का क्रंदन दबा जा रहा था. काफी देर तक यह स्थिति बनी रही, तभी पीछे से दौलतराम नाम का एक व्यक्ति मोटर साइकिल पर आया और आगे निकल गया. उसने उस महिला को चिल्लाते हुए सुना अवश्य था लेकिन, "दूसरों के झगड़ों में कौन पड़े?" यह सोच कर वह निकल गया. काफी आगे निकलने के बाद उसकी अंतरात्मा ने उसे कचोटा कि उसे वापस जाकर मदद करनी चाहिए. उसने अपनी बाइक मोड़ी और ट्रैक्टर के निकट जाकर उसे रुकवाया. कन्हैयालाल को जब मालूम हुआ कि महिला के पकड़ में गोहेरा है तो उसने उससे कहा कि जल्दी से उछाल कर फैंक दे.

          अब इसे संजोग, होनहार या मौत का बुलावा कुछ भी कहिये गोहेरा उछल कर सीधे दौलतराम के ऊपर जा गिरा और उसने उसके गर्दन में काट दिया. दौलतराम थोड़ी देर छटपटा कर शांत हो गया. मौत का यह अजीब खेल है जिसकी यह दास्तान अखबारों में पढी गयी.
                                                                 ***

बुधवार, 3 अगस्त 2011

थोड़ा मुस्कुरा लें

                 शाम ढले, जब दीप जले  रिमझिम सा मौसम होता है,
                 मैं खाना बनाऊ, जल्दी करूँ उनके आने का सा मालूम होता है.
                 द्वार ढकू फिर खोलूं कभी, दीपक भी मध्यम करती हूँ
                 वो कृष्णबदन परवाने बने, सोच मैं करती रहती हूँ
                 मैं किससे कहूं ये दर्द सखी ? वे उड़कर आ ही जाते हैं. 
                 बास करें ये पदेड़े  सखी, अनचाहे ये आ ही जाते हैं.
                                     

(पदेड़ा एक छोटा सा उड़ने वाला काला कीट है, जो बरसात के मौसम में रौशनी पर आता है और बदबू देता है. पश्चिमी भारत में बहुतायत से अपनी उपस्थिति  बताता है. इस गंभीर विषय पर लिखने की हिम्मत आजतक किसी कवि ने नहीं की है. मैं आपकी दाद चाहूँगा.)
                  

***

 चुटकुला 

      एक घर से अकसर पति-पत्नी के झगड़े  की आवाजें अड़ोस-पड़ोस यहाँ तक कि बाहर सड़क तक आती थी. कुछ दिनों से ये सब बंद हो गया और बड़े जोर-जोर से हँसने की आवाजें आने लगी. एक पड़ोसी ने उत्कंठित होकर एक दिन पूछ डाला, "भाईसाहब आजकल आप और भाभी जी दोनों की बड़ी जोर से हँसने की आवाजें आती हैं. क्या चमत्कार हुआ है?
      भाई साहब बोले, "चमत्कार ये हुआ है कि हमारी बोल-चाल बंद है, अब जब भी मेरी पत्नी नाराज होती है तो मेरी तरफ जूता उछाल कर मारती है. मुझे लग जाए तो वह हँसती है, और जब निशाना चूक जाये तब मैं हँसता
हूँ."
                                       ****

डाक्टर रोजी

           कस्बे में अब तक कई हिन्दू लडकियां मुसलमानों के साथ भाग गई या अगवा कर ली गयी थी. वहाँ हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे जैसी कोई चीज नहीं थी. हर त्योहार या समारोह-जलसे में साम्प्रदायिक तनाव छाया रहता था. मुसलमान लोग स्वभाव से धर्मांध व कट्टरपंथी थे, प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदूवादी संगठनों ने भी समानांतर मुस्लिम-विरोधी वातावरण बनाये रखा. ऐसे में एक हिदू लड़के ने रहमान साहब की लडकी राबिया को प्रेमजाल में फंसा लिया और छू मन्तर हो गया. बवाला तो होना ही था. लेकिन खुलेआम कुछ नहीं हुवा क्योंकि  भगानेवाला लड़का वीरेंद्र उर्फ़ वीरू एक नामी गुण्डा व चाकूबाज था.

           भगवानदास पुलिस में हेड कानिस्टेबुल थे. उनकी तीसरी औलाद वीरू बचपन से ही शरारती था, चोरियाँ करता था और मारपीट से नहीं डरता था. भगवानदास ने भी लड़के को खुली छूट दे रखी थी. लोगों  की शिकायतों को उसने कभी गंभीरता से नहीं लिया. लड़का बिगड़ता चला गया. एक दिन जब बात बहुत बढ़ गयी तो वीरू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और जमकर पिटाई की गयी. नतीजा उलटा ही रहा. सुधरने के बजाय वीरू गुण्डई में पारंगत होता गया. जेल हुई तो वहाँ उसे बड़े बड़े उस्तादों की शागिर्दी करने का अवसर मिला और जब बाहर निकला तो उसका अपराधी नेटवर्क काफी विशाल हो चुका था. डर-खौफ उसे अब कत्तई नहीं था. वह 'दादा' बन गया था. किसी दूकानदार की हिम्मत नहीं होती थी कि वीरू से सामान का पैसा मांग ले. हालाँकि बलवंतसिंह थानेदार ने कई बार उसकी धुनाई की, वह था कि ढीठ होता चला गया.

           रहमान साहब जाति से अंसारी थे. मुस्लिम बिरादरी में अपना आला स्थान रखते थे. कस्वे के बीचों-बीच उनका घर था. बगल में उनके आटे की चक्की चलती थी. वीरू अक्सर वहाँ आता और लम्बी बैठकें अपने यार दोस्तों के साथ करता था. रहमान साहब को लगता था कि वीरू की वजह से उनका धंधा सुरक्षित चल रहा है. रहमान को चाचा-चाचा कह कर उसने कोई न कोई बहाने से घर में भी आना-जाना शुरू कर दिया. मस्जिद में कई लोगों ने रहमान साहब को आगाह भी किया पर उन्होंने उनकी बातों को कोई तवज्जो नहीं दी; नतीजा एक दिन रात के अँधेरे में वह उनकी बेटी को लेकर फुर्र हो गया.

           दो साल तक वीरू का कहीं अता-पता नहीं था. कस्बे में अमन का वातावरण रहा. लोग शकून महसूस कर रहे थे. एक दिन अचानक वीरू का अभ्युदय कस्बे में हो गया. साथ में राबिया और राबिया के गोद में दो महीने की एक बालिका. खूब कानाफूसी हुई पर गुंडों से तो भगवान भी डरते है. कुछ हिन्दू संगठनों के नेताओं ने भगवानदास के परिवार  का सामाजिक बहिष्कार करने की बात चलाई लेकिन वीरू के आतंक से सब दुम दबा कर चुप हो गए.

           वीरू भी कुछ कारोबारी हो गया. उसने एक पुराना ट्रक खरीद लिया और खुद चलाने लग गया. इस बीच राबिया को भगवानदास के परिवार ने स्वीकार तो कर लिया पर राबिया अपने संस्कारों के वशीभूत हिन्दू परिवार  
में समायोजित नहीं हो पाई. वीरू ने एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया. और वहीं बालिका रोजी का लालन-पालन होने लगा. कलावती कन्या की तरह वह जल्दी-जल्दी बड़ी होती रही. स्कूल जाने लायक हो गयी तो एक दिन वीरू उसे सरकारी प्राइमरी स्कूल में भर्ती के लिए ले गया. वहाँ तमाम बच्चों से लेकर अध्यापक-अध्यापिकाओं की शंकित नजर रोजी पर लगी रही. वीरू इस नए अनुभव से बहुत आहत हुआ. उसने सोचा कि उसके द्वारा किये गए पाप कर्मों का फल अवश्य ही बालिका को भुगतने पड़ेंगे. लोगों की नजर में उसे हिकारत साफ दिख रही थी. कैसा भी दुष्ट-पापात्मा हो अपनी औलाद के लिए भला ही सोचता है. ये मानव स्वभाव है.

           उन्हीं दिनों कस्वे में फादर सैम्युअल ने एक मिशन स्कूल खोला था. वीरू ने अपनी बेटी का दाखिला वहाँ करा दिया. फादर सेम्युअल बड़े दयावान व्यक्ति थे. प्यार भरा हाथ रोजी के सिर पर फिराते हुए वीरू से बोले, "तुम इसकी फ़िक्र मत करो, यहाँ और भी बच्चे हैं." फादर की वाणी में जो अपनापन था उससे वीरू के अपराधी मन पर भी ईश्वर के प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न हो आया और वह बेफिक्र हो गया.

           दो वर्ष तक सब सामान्यतया ठीक-ठाक चल रहा था. बेटी अच्छे माहौल में स्कूल जा रही थी. पादरी साहब रोजी की खूब तारीफ़ करते थे. एक दिन वीरू को अपने जेल का साथी गुड्डू मिल गया. गुड्डू ने उसको अपने अफीम के धंधे में शामिल होने का न्योता दिया. अपराधी तो अपराधी ही रहता है. कुछ दिन शांत रहने के बाद उसके दिमाग के कीड़े फिर कुलबुलाने लगते हैं. इस तरह वह फिर से अपराध की दुनिया से जुड़ गया.

           एक दिन वीरू पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. राबिया और रोजी अनाथ हो गए. कोई मदद करने आगे नहीं आया. भयभीत लोगों ने खुशियाँ मनाई. फादर सेम्युअल ने घर जाकर राबिया से कहा, "रोजी की चिंता तुम मत करना हम इसको पढ़ाएंगे. हम इसको अपने साथ रखना चाहते हैं." राबिया ने हाँ कर दी. कुछ दिनों के बाद ही राबिया ने कल्लू मियाँ से निकाह कर लिया. रोजी चर्च की हो कर रह गयी. वहीं बड़ी होती रही, पढ़ती रही. पढने में होशियार थी. समय जाते देर नहीं लगती है. एक दिन उसने मेडिकल कालेज में दाखिला ले लिया. फादर उसको अपनी बेटी की तरह निगरानी में रखते आ रहे थे. एक दिन रोजी एम.बी. बी. एस. की डिग्री लेकर डाक्टर बन गयी. 
फादर ने वहीं रह कर लोगों की सेवा करने के लिए उसके लिए डिस्पेंसरी की व्यवस्था कर दी. डॉक्टर  रोजी गरीब-अमीर सभी तरह के रोगियों का इलाज करके थोड़े ही दिनों में बहुत लोकप्रिय हो गयी.

           फादर भी बहुत खुश थे. वे उसके लिए एक योग्य वर की तलाश करने लगे. संजोग ऐसा हुआ कि उनका एक दोस्त पीटरसन आस्ट्रेलिया में था. जिसका बेटा डाक्टर स्टीफन भारत आया हुआ था. सम्पर्क हुआ और बात बन गयी. फादर ने उनकी शादी करा दी. चर्च में ही विवाहोत्सव हुआ. कस्वे के गण्य-मान्य तथा कई आम लोग शामिल हुए. बाद में डाक्टर जोड़े ने आस्ट्रेलिया जाने का निर्णय लिया. फादर ने भी इसमी अपनी रजामंदी दे दी. यात्रा की सब प्रक्रिया पूरी होने के बाद जाने की तारीख तय हो गयी. समाचार कस्बे में आग की तरह फैला. सभी चाहने वाले उदास थे. बिदाई की बेला में सैकड़ों लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया. सभी को रोजी के जाने का गम था. सभी की आखें नम थी. भीड़ के एक कोने में बुर्के में सिमटी राबिया अपनी बेटी के पास जाने में संकोच कर रही थी. रोजी की आखें भी अपनी माँ को खोज रही थी. उसने देखा पहचाना और पास जा कर राबिया से लिपट गयी. रुपयों का एक बण्डल माँ के आँचल में रखकर वह बिना कुछ बोले लौट कर गाडी में बैठ गयी.

           हाथ से बाय-बाय करते हुए हमेशा के लिए आस्ट्रेलिया चली गयी.
                                                               ***

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

यक्ष देव -एजेंटी

            इस कहानी के नायक रामदत्त भट्ट अपनी पूर्ण आयु ९० वर्ष भोगने के बाद स्वर्ग सिधारे थे. मैं लगभग ३० वर्ष पूर्व उनसे मिला था, तब वे काफी बृद्ध व अशक्त हो चुके थे. उनके बारे में मैंने बहुत कुछ सुन रखा था. और उसकी  तस्दीक के लिए मैंने उनसे ही पूछा कि एजेंटी देव (यक्ष) ने किस प्रकार उनकी मदद की थी? उन्हीं द्वारा कही गयी बातों को मैं शब्दांकित करने जा रहा हूँ.

            सर्व प्रथम मैं उस देश-काल की चर्चा विवेचना करना चाहता हूँ जहाँ ये घटना घटी. हिमालय के सानिद्ध्य  में गढ़वाल-कुमायूं की पर्वत श्रंखलायें यों तो देवभूमि कहलाती हैं पर बहुत अन्दर बसे गावों के लोग अब से १०० वर्ष पूर्व तक बाहरी दुनिया से अलग-थलग थे. आवश्यकताएं बहुत सीमित थी. लोग आदिवासी जीवन जीते थे. सभी गरीब थे और कोई अनैतिक स्पर्धा नहीं थी. रामदत्त भट्ट कमस्यार पट्टी में रहते थे.

            वे अनपढ़ थे क्योंकि तब वहाँ आस-पास कोई स्कूल नहीं हुआ करता था. बचपन में ही माँ-बाप मर गए थे अतः चाचा-ताऊ के परिवार के साथ पलते रहे. उनके गाय, भैंस, व बकरी चराते थे. यों बड़े होते रहे. उनकी एक छोटी बहिन भी थी जो इसी तरह सायानी होती रही. १५ वर्ष की होने पर बहिन को दूर कांडा के निकट एक गाँव में ब्याह दिया गया. कुछ वर्षों के बाद रामदत्त का भी विवाह कर दिया गया. कोई बड़ा ताम-झाम नहीं था, पर गरीब का घर बस गया था. काल-चक्र घूमता रहा उन्होंने दो भैंसें पाल ली. खेती ऐसी कि साल भर खाने के लिए मोटा अनाज हो जाता था. जीवन में कोई आपा धापी नहीं, कोई प्रपंच नहीं. पैरों में जूता चप्पल तब वहाँ नहीं होते थे. एक जोड़ा कपड़ा तार-तार हो जाने तक चलता था. दूध खरीदने-बेचने का कोई साधन या रिवाज वहां नहीं था. बड़ी भैस ब्याई तो उनकी श्रीमती ने दही की मलाई से घी बनाना शुरू किया और जब एक कनिस्टर (१४ सेर) भर गया तो रामदत्त उसे बेचने के लिए खुद ढोकर बेरीनाग ले गए. सारा घी तब ३० रुपयों में बिका. वापसी में अपने लिए एक वास्कट, पत्नी के लिए एक घाघरा, तथा एक गुड की भेली और आठ आने का ढेर नमक खरीद लिया.

            रामदत्त को याद आया की चैत्र का महीना आनेवाला है और बहिन को भिटोली देने जाना होगा. इसलिए एक चमकीली जनानी धोती खरीद ली. इतना खर्चा करने के बाद भी उनकी जेब में दस रूपये बच गए. दस रुपया तब बड़ी रकम  होती थी, उसका नोट भी बड़ा ही होता था. उन्होंने उसे बड़ी हिफाजत से वास्कट के अंदरूनी जेब में सम्हालकर रख
 दिया. बड़ा भरोसा देता है धन. घर लौट आये. बहुत खुश थे रामदत्त.

            चंद दिनों के बाद ही चैत आ गया. अपनी-अपनी बहिन-बेटियों को भिटोली देने की चर्चाएँ होने लगी. एक शुभ दिन उनकी श्रीमती ने शुद्ध घी (अशुद्ध तब होता ही नहीं था) की पूडियां व हलवा बनाया और उनके बहिन के ससुराल को रवाना किया. रास्ता ऊंचे-नीचे जंगलों से होकर जाता था. चीड, बांज, बूरूश के घने जंगल एकाकी पथिक   के लिए काफी डरावने रहे होंगे. सड़क नहीं होती थी. बस पतली सी एक पगडण्डी थी. लोगों ने रास्तों में जंगल के देवताओं की जगह जगह पत्थर खड़े करके स्थापना की हुई थी. हर उपत्यका मोड़ पर कठपुडिया (जंगल के देवता के सम्मान में लकड़ी या बुगेट डाले जाते हैं) स्थापित करने के विश्वास और आस्थाएं आज भी मौजूद हैं.

            सभी देवी-देवताओं के असंख्य रूप कल्पनाओं को प्रणाम करते हुए, रामदत्त शाम को बहिन के घर पहुंच गए. सबको बड़ी खुशी हुई थी. भिटोली पारम्परिक रूप से पड़ोस में बाखली में बांटी गयी. रामदत्त थके हुए थे, भोजन करके तुरंत ही सो गए. सुबह उठ कर नित्य कर्म से निबट कर जब उन्होंने वास्कट की जेब में टटोला तो दस का नोट गायब था. उन्होंने बहिन को बताया. पूछताछ हुई पर कोई सुराग नहीं मिला. ख़ुशी एकाएक मातम में बदल गयी. भारी मन लेकर भोजन के बाद वे वहाँ से लौट चले. रूपये खो जाने का अनुभव, सदमे से कम नहीं था.

            चीड के जंगल के बीच गुजरते हुए रामदत्त ने न्याय के लिए प्रसिद्द जंगल के देव एजेंटी को गुहार लगाई "हे ईश्वर, जिसने भी मेरे रुपये चुराए हैं, तू उसे सजा जरूर देना." यों अफ़सोस मनाते हुए वे घर आ गए.

            घटनाक्रम ने नया मोड़ तब लिया जब चार दिनों के बाद ही उनकी बहिन अपने जेठ और जिठानी को साथ लेकर उनके गाँव आ पहुंचे पहुंची. बहिन ने बताया कि उसी रात से जिठानी के घर की छत पर पत्थर गिरते हैं और भयभीत होकर जिठानी ने कबूल किया है कि जेब से रूपये उसी ने निकाले थे. चूंकि पूरे गाँव में बात फ़ैल गयी थी अतः सयाने लोगों की सलाह पर जिठानी माफ़ी मागने और रूपये लौटाने आयी थी.

            ये कथा आज की पीढी को अविश्वसनीय लगेगी पर सत्य व आस्था की  कई मिसालें हैं जिनके नायक रामदत्त भट्ट जैसे सीधे सरल व निष्पाप लोग हैं.
                                                                    * 

शनिवार, 30 जुलाई 2011

विकल्प का संकल्प (व्यंग)

                           ( मेरी ये रचना १९९१ मे छ्पी थी, आज भी प्रासगिक है.)
जी हाँ! मैं एक प्रबुद्ध काँग्रेसी नेता हूँ.
गांधी का नेहरू का और इंदिरा का वारिस हूँ.
मैं वारिस हूँ १८५७ की क्रान्ति का,
जलियाँवाला का और १९४२ के आन्दोलन का.
             मैंने देश को आजादी दिलाई
              मैंने सामाजिक क्रान्ति कराई
नंगों को टेरीकाट पहनाया
हरिजन और अल्पसंख्यकों को ऊपर उठाया
किसी को मिनिस्टर किसी को गवर्नर बनाया.
कुछ को राष्ट्रपति तक बनाया.
             ये देश समस्याओं का सागर है
              और मैं गुणों का आगर हूँ
               ये तंत्र चलाने का मंत्र सिफ मेरे पास है.
विपक्ष? वाममार्गी-दक्षिणमार्गी?
ओह! ये अब सब मध्य मार्गी हो गये हैं.
मिलकर बार बार मोर्चा बनायेंगे
दूध और निम्बू एक कढाई में पकाएंगे.
             कभी नहीं कभी नहीं!
              ये मेरा विकल्प नहीं बन सकते हैं.
मेरा विकल्प तो मैं स्वयं हूँ
या मेरे घर में है.
मेरा बेटा, मेरी बीवी या बहूरानी.
                       ***
                         
                        (२)
मैं भारतीय संस्कृति का स्वरूप हूँ
हिन्दू-हिंदुत्व, राष्ट्र राष्ट्रीयता  का -
पहरेदार ही नहीं, ठेकेदार भी हूँ
मेरा संकल्प है की मैं-
भृष्ट काँग्रेसी व्यवस्था से मुक्ति दिलाऊँगा
मैं राम मंदिर बनवाऊँगा 
मैं रामराज लाउँगा
                  एक दिन इस देश का हिन्दू जागेगा
                   धर्म की जयकार करेगा
चूंकि पूरी सांस्कृतिक विरासत मेरे पास है
मैं ही कांग्रेस का स्थाई विकल्प हूँ
ये दीगर बात है कि मेरे घर में -
कांग्रेसी संस्कृति के घुसपैठ जारी है.
                            ***
              
                             (३)
मैं समाजवादी हूँ, मैं इंकलाबी हूँ,
मैं आम जनता समर्थित जनमोर्ची हूँ.
मैं देश के समस्त असंतुष्ट बुद्धिजीवियों का प्रतिनिधि हूँ.
मैं लोहिया की आत्मा हूँ
मैं जयप्रकाश के घोषणा हूँ
                    मैं भूखे नंगे व् बेरोजगार लोगों के-
                     दर्द का एहसास हूँ.
मैं मुसलमानों का हमदर्द हूँ.
उनके आरक्षण का हामी हूँ
मैं विरोध, विरोध के लिए करता हूँ.
चूँकि बहुमत बहुत दूर है
इसलिए मैं सत्ता के लिए -
पूरे कल्प तक कल्पना करता रहूँगा.
                       मुझे डर है कि कहीं -
कांग्रेस से निकले-निकाले हुए लोग -
मेरा झंडा न छीन लें.
पर मैं तो विकल्पी हूँ
विकल्प ही मेरा अंत है.
                              ***

                             (४)
साम्यवाद एक विज्ञान है.
जो भारत के उपजाऊ धरती पर
खूब उगेगा, खूब फलेगा.
मैं बहुत समय से तलाशता आ रहा हूँ -
एक लेनिन को,
एक माओत्से-तुंग को
जो नेतृत्व दे सर्वहारा को
                  मैं विकल्प नहीं बनाना चाहता किसी का-
                   क्योंकि मैं स्वयं ओरिजिनल हूँ.
मेरा संकल्प है - मुझे नव निर्माण करना है
एक बराबरी का समाज गढ़ना है.
लोग मुझे साम्यवादी, माओवादी नक्सलवादी-
कुछ भी कहें,मैं पहले तहस-नहस करूंगा.
फिर एकछत्र राज करूगा.
                      लेकिन मैं स्तब्ध हूँ
                       रूस और चीन ने -
                        सुधारवादी विचार लाकर
                        साम्यवाद के दांत तोड़ डाले हैं
इधर प्रतिक्रियावादी ताकतों ने
बंगाल और केरला में हमारी-
सत्ता लूटी है.
इसलिए अब हमको -
किसी गठ्वंदन में घुसकर
फिर से जगह बनानी होगी.
यही मेरा विकल्प है.

                     (५)

(इस रचना में ये बाद में जोड़ा जा रहा है):
                       
मैं विग्रही हूँ,
मेरे अलावा -
इस देश का हर नेता चोर है
भृष्ट है .
मैं युवाओं के आक्रोश का प्रतिनिधि हूँ.
दिल्ली को बदला है,
अब देश को बदलूँगा.
मैं आम आदमी हूँ
मैं झाडू  लेकर चलता हूँ
पर मेरा झाडू अभी किसी और के हाथ में है.
विकल्प मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.
                          ***