मंगलवार, 2 अगस्त 2011

यक्ष देव -एजेंटी

            इस कहानी के नायक रामदत्त भट्ट अपनी पूर्ण आयु ९० वर्ष भोगने के बाद स्वर्ग सिधारे थे. मैं लगभग ३० वर्ष पूर्व उनसे मिला था, तब वे काफी बृद्ध व अशक्त हो चुके थे. उनके बारे में मैंने बहुत कुछ सुन रखा था. और उसकी  तस्दीक के लिए मैंने उनसे ही पूछा कि एजेंटी देव (यक्ष) ने किस प्रकार उनकी मदद की थी? उन्हीं द्वारा कही गयी बातों को मैं शब्दांकित करने जा रहा हूँ.

            सर्व प्रथम मैं उस देश-काल की चर्चा विवेचना करना चाहता हूँ जहाँ ये घटना घटी. हिमालय के सानिद्ध्य  में गढ़वाल-कुमायूं की पर्वत श्रंखलायें यों तो देवभूमि कहलाती हैं पर बहुत अन्दर बसे गावों के लोग अब से १०० वर्ष पूर्व तक बाहरी दुनिया से अलग-थलग थे. आवश्यकताएं बहुत सीमित थी. लोग आदिवासी जीवन जीते थे. सभी गरीब थे और कोई अनैतिक स्पर्धा नहीं थी. रामदत्त भट्ट कमस्यार पट्टी में रहते थे.

            वे अनपढ़ थे क्योंकि तब वहाँ आस-पास कोई स्कूल नहीं हुआ करता था. बचपन में ही माँ-बाप मर गए थे अतः चाचा-ताऊ के परिवार के साथ पलते रहे. उनके गाय, भैंस, व बकरी चराते थे. यों बड़े होते रहे. उनकी एक छोटी बहिन भी थी जो इसी तरह सायानी होती रही. १५ वर्ष की होने पर बहिन को दूर कांडा के निकट एक गाँव में ब्याह दिया गया. कुछ वर्षों के बाद रामदत्त का भी विवाह कर दिया गया. कोई बड़ा ताम-झाम नहीं था, पर गरीब का घर बस गया था. काल-चक्र घूमता रहा उन्होंने दो भैंसें पाल ली. खेती ऐसी कि साल भर खाने के लिए मोटा अनाज हो जाता था. जीवन में कोई आपा धापी नहीं, कोई प्रपंच नहीं. पैरों में जूता चप्पल तब वहाँ नहीं होते थे. एक जोड़ा कपड़ा तार-तार हो जाने तक चलता था. दूध खरीदने-बेचने का कोई साधन या रिवाज वहां नहीं था. बड़ी भैस ब्याई तो उनकी श्रीमती ने दही की मलाई से घी बनाना शुरू किया और जब एक कनिस्टर (१४ सेर) भर गया तो रामदत्त उसे बेचने के लिए खुद ढोकर बेरीनाग ले गए. सारा घी तब ३० रुपयों में बिका. वापसी में अपने लिए एक वास्कट, पत्नी के लिए एक घाघरा, तथा एक गुड की भेली और आठ आने का ढेर नमक खरीद लिया.

            रामदत्त को याद आया की चैत्र का महीना आनेवाला है और बहिन को भिटोली देने जाना होगा. इसलिए एक चमकीली जनानी धोती खरीद ली. इतना खर्चा करने के बाद भी उनकी जेब में दस रूपये बच गए. दस रुपया तब बड़ी रकम  होती थी, उसका नोट भी बड़ा ही होता था. उन्होंने उसे बड़ी हिफाजत से वास्कट के अंदरूनी जेब में सम्हालकर रख
 दिया. बड़ा भरोसा देता है धन. घर लौट आये. बहुत खुश थे रामदत्त.

            चंद दिनों के बाद ही चैत आ गया. अपनी-अपनी बहिन-बेटियों को भिटोली देने की चर्चाएँ होने लगी. एक शुभ दिन उनकी श्रीमती ने शुद्ध घी (अशुद्ध तब होता ही नहीं था) की पूडियां व हलवा बनाया और उनके बहिन के ससुराल को रवाना किया. रास्ता ऊंचे-नीचे जंगलों से होकर जाता था. चीड, बांज, बूरूश के घने जंगल एकाकी पथिक   के लिए काफी डरावने रहे होंगे. सड़क नहीं होती थी. बस पतली सी एक पगडण्डी थी. लोगों ने रास्तों में जंगल के देवताओं की जगह जगह पत्थर खड़े करके स्थापना की हुई थी. हर उपत्यका मोड़ पर कठपुडिया (जंगल के देवता के सम्मान में लकड़ी या बुगेट डाले जाते हैं) स्थापित करने के विश्वास और आस्थाएं आज भी मौजूद हैं.

            सभी देवी-देवताओं के असंख्य रूप कल्पनाओं को प्रणाम करते हुए, रामदत्त शाम को बहिन के घर पहुंच गए. सबको बड़ी खुशी हुई थी. भिटोली पारम्परिक रूप से पड़ोस में बाखली में बांटी गयी. रामदत्त थके हुए थे, भोजन करके तुरंत ही सो गए. सुबह उठ कर नित्य कर्म से निबट कर जब उन्होंने वास्कट की जेब में टटोला तो दस का नोट गायब था. उन्होंने बहिन को बताया. पूछताछ हुई पर कोई सुराग नहीं मिला. ख़ुशी एकाएक मातम में बदल गयी. भारी मन लेकर भोजन के बाद वे वहाँ से लौट चले. रूपये खो जाने का अनुभव, सदमे से कम नहीं था.

            चीड के जंगल के बीच गुजरते हुए रामदत्त ने न्याय के लिए प्रसिद्द जंगल के देव एजेंटी को गुहार लगाई "हे ईश्वर, जिसने भी मेरे रुपये चुराए हैं, तू उसे सजा जरूर देना." यों अफ़सोस मनाते हुए वे घर आ गए.

            घटनाक्रम ने नया मोड़ तब लिया जब चार दिनों के बाद ही उनकी बहिन अपने जेठ और जिठानी को साथ लेकर उनके गाँव आ पहुंचे पहुंची. बहिन ने बताया कि उसी रात से जिठानी के घर की छत पर पत्थर गिरते हैं और भयभीत होकर जिठानी ने कबूल किया है कि जेब से रूपये उसी ने निकाले थे. चूंकि पूरे गाँव में बात फ़ैल गयी थी अतः सयाने लोगों की सलाह पर जिठानी माफ़ी मागने और रूपये लौटाने आयी थी.

            ये कथा आज की पीढी को अविश्वसनीय लगेगी पर सत्य व आस्था की  कई मिसालें हैं जिनके नायक रामदत्त भट्ट जैसे सीधे सरल व निष्पाप लोग हैं.
                                                                    * 

1 टिप्पणी:

  1. Papa bhi kuch esi tarah ki misaal diya karte the !
    Bahut khoobsurti se likha hai aapne,specially woh chait ke mahine ki bhitoli, jo mujhe abhi tak milti hai :),bahut sarahniy lekh..

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