रविवार, 7 अक्टूबर 2012

हमारा एम.एल.ए.

रामपुर जिले के खेड़ा गाँव के हरिपाल सिंह एक छोटे काश्तकार थे. उनके दो बेटे थे. बड़ा ओमपाल सिंह बहुत तीव्रबुद्धि और मेहनती था. एम.एससी.करने के बाद मुरादाबाद के एक कॉलेज में लेक्चरर हो गया और छोटा बेटा गगनपाल सिंह उम्र में बड़े से १५ साल छोटा था, पढ़ाई लिखाई से मन चुराता था, बहुत कोशिश करके हाईस्कूल तक पहुँचा लेकिन दसवीं में तीन बार फेल हो जाने से पढ़ाई का रास्ता छोड़ना पड़ा. तब अल्मोड़ा शहर के कोतवाल उसके जीजा जी थे, उनके पास रह कर आख़िरी बार दसवीं की परीक्षा प्राइवेट शिक्षार्थी के रूप में जी.आई.सी. अल्मोड़ा से दिलवाई गयी, पर गगन का दिमाग तो ठस था सभी विषयों में फेल रहा.

वैसे तो गगन का दिमाग शरारतों या बदमाशियों में खूब चलता था, पर विद्या की देवी उससे रूठी ही रही. बड़ा भाई भी उसके भविष्य के बारे में चिंता करता था उसने कई बार समझाते हुए कहा, “गगन, तू पढ़ाई के बारे में कोताही मत किया कर अन्यथा जिंदगी में धक्के खाते फिरेगा. बाद में मत कहना कि भाई ने पढ़ाया नहीं.” लेकिन गगन पर इसका कोई असर नहीं हुआ.

अब जब गगन हाईस्कूल ही पास नहीं कर पाया तो औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान से ‘ब्लैक स्मिथ’ ट्रेड में प्रवेश ले लिया, और इसकी ट्रेनिंग करने लगा. उसी दौरान अखबारों में खबर छपी कि "जी.आई.सी. अल्मोड़ा के रिकॉर्ड रूम में भयंकर आग लगी और सम्पूर्ण पिछला रिकॉर्ड जल कर राख हो गया."

गगन ने मौके का फ़ायदा उठाने के लिए अपनी परीक्षा के कुछ सबूत बताकर, जुगाड़ लगाया और वहाँ से हाईस्कूल पास होने की मार्कशीट निकलवा ली. उन दिनों ज्यादा पूछताछ भी नहीं होती थी. मार्कशीट लेकर उसने जीजा जी की मदद से पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज मुरादाबाद में कॉन्स्टेबल बनने के लिए प्रवेश पा लिया. इस तरह गगनपाल सिंह सिपाही बन गया. १० वर्षों के अंतराल में वह पहले मुंशी फिर हैड कॉन्स्टेबल हुआ, फिर कई थानों का अनुभव प्राप्त करते हुए ऋषिकेश थाने में बतौर दरोगा नियुक्त हो गया. जीजा जी रसूख वाले थे. उनकी असीम कृपा थी, वे हमेशा उसके विभागीय हितों को दूर से ही साधते रहते थे. हालाँकि गगनपाल सिंह अपने कामों मे होशियारी नहीं बरतता था और कई बार लाइन हाजिर भी किया गया, पर सब चलता है सभी तरह के लोग सरकारी नौकरी में निभाए जाते हैं. उसके बारे में रिश्वतखोरी व अपराधियों को संरक्षण देने के अनेक आरोप थे. उच्चाधिकारी उसके काम काज से नाखुश रहते थे.

इस बीच जीजाजी रिटायर हो चुके थे इसलिए अब कोई  गॉडफादर भी नहीं था. गगनपाल खुद मुख्त्यार हो चला था. एक शराब तस्कर का अवैध रूप से ले जाया जा रहा ट्रक उसने पकड़ लिया था और ४लाख रूपये रिश्वत लेकर छोड़ भी दिया. रिपोर्ट खुर्दबुर्द कर दी. लेकिन यह मामला तब सुर्ख़ियों में आ गया जब एक स्थानीय अखबार ने पूरी कहानी मुखपृष्ट पर छाप दी. साख बचाने के लिए आला अफसरों ने  गगनपाल सिंह का स्थानांतरण बुंदेलखंड के उस इलाके में कर दिया जो उन दिनों डाकूप्रबल क्षेत्र था और पुलिस वाले जान-जोखिम के कारण वहाँ जाना कतई पसंद नहीं करते थे.

गगनपाल सिंह छुट्टी की दर्ख़्वास्त दे कर घर बैठ गया. प्रशासन ने सख्ती की, और उसे निलंबित कर दिया गया. कई महीनों तक यह स्थिति बरक़रार रही. इन्क्वायरी में उसे दोषी पाया गया तथा नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया.

इस निर्णय के विरुद्ध उसने अदालत में अपील की पर निचली अदालतों ने उसकी सजा को कम नहीं किया इसलिए वह अपील पर अपील करते हुए उच्च न्यायालय में पहुँचा है और अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हो पाया है. उसको उम्मीद है कि एक दिन उसके पक्ष में फैसला आएगा तथा पूरे हर्जे-खर्चे के साथ उसकी वसूली होगी.

वह मजबूरन सपरिवार अपने गाँव लौट आया और एक छोटी सी दूकान खोल कर बैठ गया. जिसमें बीड़ी-सिगरेट, गुटखा-तम्बाकू, चिप्स-नमकीन के पैकेट बेचा करता था. साथ में एक पी.सी.ओ. भी खोल लिया.

अब जब उत्तर प्रदेश का विभाजन करके उत्तराखंड अलग राज्य बना तो बॉर्डर के जिलों में ज्यादा राजनैतिक उथल-पुथल रही. दरोगा जी इसमें सक्रिय हो लिए. पिछले विधान सभा चुनावों में वह वर्तमान रूलिंग पार्टी का टिकट हासिल करने में कामयाब रहे और अच्छे मार्जिन से विजयी भी हो गए. मन्त्री पद तो अभी तक नहीं मिल सका है, हाँ पुलिस डिपार्टमेंट के सीनियर लोग भी वक्त की नजाकत को समझते हुए एम.एल.ए. श्री गगनपाल सिंह जी को सलाम ठोका करते हैं.

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मोटा भाई

मोटा भाई सोलंकी अलग किस्म के इन्सान थे. लोग तो उन्हें ‘लाखों में एक’ की उपाधि भी दिया करते थे. उनका व्यक्तित्व था ही कुछ ऐसा. शक्ल-सूरत से बिलकुल चाइनीज से दिखते थे, गोल थोबड़े पर छोटी-छोटी गोल आँखें देखती कम थी टिमटिमाती ज्यादा थी.

मोटा भाई नवसारी, गुजरात, के मूल निवासी थे. वे एक गरीब परिवार में जन्मे थे, पर उनके जीवन का सफर आम गरीब लोगों से अलग था. वे अकसर अपने लिए ‘सेल्फ-मेड’ शब्द का प्रयोग किया करते थे. रेलवे में एक लोअर डिविजन क्लर्क के बतौर उन्होंने अपना कैरियर शुरू किया था, पेंशन योग्य होने पर २० साल की नौकरी करके किसी प्राइवेट कंपनी में रेलवे मैटर्स के सलाहकार बन गए.

यहाँ उनकी मुलाक़ात एक ‘जीवन बीमा डेवलपमेंट ऑफिसर से हुई, जो उनके जीवन में नया मोड़ ले आया. वे जीवन बीमा एजेंट बन गए. अपनी मेहनत और अध्यवसाय से वे इस क्षेत्र में बहुत सफल एजेंट गिने जाने लगे. चंद वर्षों में उन्होंने बीमा करने का नया रिकार्ड बना डाला. सं १९७० के दशक में वे पहले करोड़पति एजेंट के रूप में प्रसिद्धि पा गए और जीवन बीमा निगम की तरफ से सम्मानित भी किये गए. उन्होंने निकटवर्ती औद्योगिक शहर कोटा, राजस्थान, को अपना स्थाई कार्यक्षेत्र बना लिया वहां पर बीमा धारकों की अपार संभावनाएं थी.

मोटा भाई की विशेषता यह थी कि वे जिस व्यक्ति के पीछे पड़ जाते थे, उसका बीमा किये बगैर नहीं मानते थे. वे रात दिन अपने लक्ष्य का पीछा करते रहते थे. बहुत से लोग तो तंग आकर भी उनसे पॉलिसी ले लेते थे. कभी कभी तो एजेंटों की प्रतिस्पर्धा में वे पहली तीन किश्तें अपनी जेब से देकर ग्राहक पटा लेते थे. जीवन बीमा के लाभ बताने के लिए वे स्टीरियो की तरह चालू हो जाते थे. यद्यपि लंबे समय के बचत की दृष्टि से बीमा में निवेश की जाने वाली राशि बहुत घाटे का सौदा होता है, लेकिन विपदा में सहारा मिलने की संभावना होती है. जिसका खूब प्रचार-प्रसार भी होता है. मोटा भाई अच्छे विक्रेता यानि सेल्समैन साबित हुए. हालाँकि लोग उनके पीठ पीछे उनको जोंक, चिपकू, गोन्द या लेसूड़ा आदि उपनाम से भी पुकारने लगे थे.

निजी जीवन में मोटा भाई महान कंजूस, मक्खीचूस, व कृपण रहे. उन्होंने उस सस्ती अवधि में कोटा के विज्ञान नगर में एक उच्च आयवर्ग नगर परिषद द्वारा निर्मित मकान महज एक लाख रुपयों में खरीदा, पर २५ वर्ष तक रहने पर भी उसमें कोई रंगाई पुताई या मरम्मत नहीं करवाई. मोटा भाई पैसे को पकड़ते थे. वही उनका भगवान होता था. वे अपनी धन-संपत्ति का श्रेय अपनी धर्मपत्नी वीणा बेन को दिया करते थे. उसे वे लक्ष्मी नाम से ही पुकारते थे. उनकी कंजूसी पर जब कोई कटाक्ष करता था तो वे एक मजेदार किस्सा सुनाया करते थे कि –एक आदमी अपने मित्र से बोला, “मेरे पास २० साल पुराना आचार है, जो अनेक रोगों की दवा बन गया है.” तब मित्र ने कहा, "कभी हमको भी तो चखाना.” इस पर वह बोला, “माफ़ कीजिये, ऐसे चखाते रहते तो आचार २० साल तक कहाँ बचता.”

उनका एक बेटा तो बचपन में ही किसी दुर्घटना का शिकार हो गया था, और दूसरा बोरीवली, मुम्बई में अपने नाना-नानी के पास ही पला बड़ा. वह अपने पिता की कंजूसी वाली फितरत के कारण ही उनके पास नहीं रहा. इस प्रकार मोटा भाई का पारिवारिक जीवन बहुत सुखद नहीं रहा. वीणा बेन को उन्होंने अपनी ही आदतों में ढाल कर रखा, जो सब कुछ होते हुए भी उपयुक्त ईलाज के अभाव में १९९० के दशक में उनको अकेला छोड़कर चल बसी.

७० वर्ष की उम्र में विधुर होना बड़ा अभिशाप सा होता है, वह भी उन परिस्थितियों में जब परिवार का कोई अन्य सदस्य पास में ना हो. यद्यपि इस सब के लिए मोटा भाई खुद जिम्मेदार थे क्योंकि अपनी कृपणता के चलते उन्होंने किसी नाते-रिश्तेदार या दोस्त से घनिष्ट सम्बन्ध रखने की जुर्रत नहीं समझी.

उनको जीवन बीमा निगम से नियमानुसार कमीशन से एक लाख से अधिक रुपये आमदनी के रूप में प्राप्य थी. इसके अलावा शेयर बाजार में किये गए निवेश का भी लाभ मिला करता था, पर सन्तोष नहीं होने से तथा धन का उपभोग नहीं होने से उनकी स्थिति खजाने पर कुंडली मार कर बैठे हुए नागराज की तरह हो गयी.

वे अन्तिम दिनों में मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गए थे. अपनी देखभाल के लिए एक के बाद एक कई स्थानीय नौकरानियां भी रखी गयी पर कोई टिकी नहीं क्योंकि नमक से लेकर आटा-चावल तथा मसाले तक अपने हाथों से निकाल कर दिया करते थे, ऐसे में कौन सेवक टिकता है? एकाकी जीवन का बड़ा दुखद अंत हुआ. उनके देहावसान पर उनका पुत्र आया और दो करोड़ रुपयों में मकान व अन्य संपत्ति बेच गया. पिता की अन्य वित्तीय प्रतिभूतियों को उत्तराधिकारी के रूप में विधिवत अपने नाम करके मुम्बई लौट गया.

धन कमाना तो बहुतों को आता है पर उसका उपभोग करना सबके भाग्य में नहीं होता है.
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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

रेबीज - एक मारक रोग

दिनेशसिंह बिष्ट, उम्र ३६ वर्ष, पेशे से अध्यापक, निवासी – ग्राम दौलतपुर जिला नैनीताल. तीन स्कूल जाने वाले बच्चे व शुभांगी पत्नी, सब कुशल मंगल था. वह गर्मियों की छुट्टियों में अपने ससुराल कोटाबाग मिलने गया तो वापसी में एक प्यारा सा देसी कुत्ते का पिल्ला भी साथ ले आया. पिल्ला आ जाने से बच्चे बहुत खुश हुए. उसके साथ खेलते थे, गोद में उठाते थे, उसे छेड़ते भी रहते थे.छेड़छाड़ से वह थोड़ा कटखना भी हो गया था. तीनों बच्चों के पैरों में उसने अपने पैने दांत चुभो दिये थे पर बच्चे तो बच्चे होते हैं, कहाँ परवाह करते हैं?

एक दिन दिनेशसिंह को भी उसने चलते चलते बिना छेड़े ही आकर काट डाला तो उसकी थोड़ी पिटाई कर दी गयी. सोच यों थी कि घर का पला हुआ छोटा बच्चा है. उसके पागल होने अर्थात रेबीज संक्रमित होने की संभावना पर कोई विचार नहीं हुआ. पिल्ला कुछ अनियमित व्यवहार करते हुए तीसरे दिन मर गया तो भी इस जानलेवा विषय को गंभीरता से नहीं लिया गया. हाँ, दिनेशसिंह को कुछ शंका-संदेह जरूर हुआ उसने अपनी पत्नी से इस बारे में चर्चा भी की.

दस दिनों के अंतराल में दिनेशसिंह को रेबीज के लक्षण प्रकट होने लगे, वह प्रलाप करने लगा, आँखों की रोशनी कम हो गयी, हल्का बुखार हो गया तो उसके भाईयों ने आकर उसे सरकारी अस्पताल के डॉक्टर को दिखाया. उसकी जाँच-पड़ताल हुई, पूछताछ की गयी तो यह सिद्ध कर दिया गया कि उसे रेबीज के वायरस ने जकड़ लिया है और ऐसी स्थिति में आ गया था कि उसका बचना मुश्किल जान पडता था. डॉक्टर ने भी असाध्य बता कर आल इंडिया मेडीकल इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली, को रेफर कर दिया. घरवाले चिंतित थे, टैक्सी करके तुरन्त दिल्ली को रवाना हो गए पर वहाँ पहुँचते पहुँचते उसने दम तोड़ दिया.
परिवार पर जो बीती वह अकथनीय पीड़ाजनक है. चिंता इस बात की हो गयी कि पिल्ले ने तीनों बच्चों को भी काटा था. अब एक तरफ दिनेशसिंह के अन्तिम संस्कार की तैयारी चल रही थी दूसरी तरफ तीनों बच्चों को अस्पताल मे ऐंटीरेबीज इंजेक्शन व इम्यूनाइजेशन की दवाएं दी जा रही थी. बहरहाल बच्चों पर अभी तक उस मारक वायरस के कोई लक्षण प्रकट नहीं हुए थे.

यह एक सत्य घटना है. इस प्रस्तुति द्वारा लेखक रेबीज की भयानकता तथा इस बारे में लापरवाहियों व सावधानियों पर चर्चा करना चाहता है. यह बहुत प्राचीन रोग है. हमारे अथर्ववेद में इसका वर्णन मिलता है. पागल जानवरों के काटने से उनके लार में उपस्थित वायरस के कारण यह मनुष्यों या अन्य जानवरों के लिए मारक होता है. वायरस का सीधा असर मस्तिष्क पर होता है जहाँ सूजन आ जाती है.

वाग्भट्ट में इसे ‘अलर्क विष’ कहा गया है. तमाम आयुर्वैदिक ग्रंथों में इसका सन्दर्भ मिलता है.

रेबीज वायरस मुख्यतः संक्रमित कुत्ते की लार में होता है. कुत्तों के अलावा बिल्ली, गीदड़, सियार, नेवले. रेकून, चमगादड़ आदि जानवरों में भी संक्रमण पाया जाता है. इनके काटने से जो घाव बनते हैं या चमड़ी कट जाती है वहीं से वायरस प्रविष्ट होता है. गाय, भैंस घोड़ा आदि पालतू जानवर भी इस वायरस की चपेट में आ जाते हैं.

संक्रमित कुत्ते आदि जानवर पागल होकर जल्दी मर भी जाते हैं. उनके पागलपन को उनके अनियमित व्यवहार से पहचाना जाता है, जिसमें पूंछ आदि शारीरिक अंग शिथिल हो जाते है, मुँह से निरंतर लार टपकती है, और अंधे-बहरे होकर इधर-उधर दौड़ने लगते हैं. इसीलिये पालतू जानवरों को संक्रमण से बचाए रखने के लिए ‘ऐंटीरेबीज वायरस’ के टीके समय समय पर नियमानुसार जरूर लगवा लेना चाहिए.

रेबीज का इनक्यूबेशन पीरियड दस दिनों से लेकर सात साल तक का होता है. अत: सावधानी बरतते हुए तुरन्त ऐंटीवायरस वैक्सीन लगवा लेना चाहिए.

रेबीस से संक्रमित व्यक्ति अनियमित व्यवहार करने लगता है. उसकी मांसपेशियां शिथिल हो जाती है. वह तनावग्रस्त हो जाता है, मारने-काटने का प्रयास करने लगता है, तथा कुत्ते की तरह आवाज भी निकालने लगता है. पानी को देख कर भयभीत हो जाता है, जिसे जल-संत्रास (हाइड्रोफोबिया) कहा जाता है. एक बार ये लक्षण प्रकट हो जाते हैं तो बीमारी असाध्य हो जाती है. जिस स्थान पर पागल कुत्ते ने काटा हो वह सुन्न हो जाता है. आयुर्वेद में ब्रंण साफ़ करके लाल मिर्च का लेप लगाने का निर्देश दिया गया है, इससे सुन्न होने का भी पता चल जाता है. घाव को ऐंटीसेप्टिक से साफ़ करके योग्य डाक्टर से सलाह लेनी आवश्यक है. आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने वैक्सीन व ‘ह्यूमन रेबीज इम्यून ग्लोब्यूलिन' (H R I G) जैसी व्यवस्था विश्व भर में उपलब्ध करवाई है इसका लाभ लेना चाहिए.

कहा जाता है कि ‘खोज करने से पहरा अच्छा’ इसलिए अनजान कुत्तों से संपर्क करने से बचना चाहिए. आवारा कुत्तों के लिए प्रशासन से यथोचित व्यवस्था करवानी चाहिए. दिनेशसिंह बिष्ट के परिवार का सा दुर्भाग्य कहीं भी नहीं दोहराया जाये, यह संकल्प होना चाहिए.

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बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

बैरंग

श्री रामेश्वर प्रसाद सिंह पश्चिम रेलवे के डिविजनल हैडक्वार्टर पर जनरल मैनेजर एच.आर.ए. (ह्यूमन रिसोर्सेज ऐडमिनिस्ट्रेशन) के जिम्मेदार पद पर आसीन हैं. सिंह साहब मूल रूप से बनारस के निकट एक जमींदार खानदान से हैं. पिछले पच्चीस वर्षों से काम करते हुए एक अनुभवी ऑफीसर माने जाते हैं.

सिंह साहब की तारीफ़ यह है कि वे पूरे डिविजन के कर्मचारियों को नाम लेकर पुकारते हैं. वे छोटे से छोटे कर्मचारी को जानते हैं. उनके दुःख-दर्द में शामिल होने से नहीं चूकते हैं पर प्रशासनिक मामलों में वे बहुत कठोर आदमी हैं. अनुशासनहीनता पर वे कतई दया नहीं दिखाते. कुछ लोग पीठ पीछे उनको ‘हेकड़ सिंह’ भी बोलते हैं. इसलिए लोग उनसे भय भी खाते हैं. डी.आर.एम. तक भी सिंह साहब की कलम की ताकत को पहचानते हैं. रेलवे स्टाफ तथा कर्मचारी युनियनों को मानो उन्होंने अपनी जेब में रखा होता है. कहने को वे युनियन वालों से कहते हैं कि उनकी win-win policy ही उनकी सफलता की कुंजी है, जिसके अनुसार वे युनियन वालों की भी फजीहत नहीं होने देते हैं. प्रशासक के तमाम गुण होते हुए भी सिंह साहब की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वे शराब पीने के बड़े शौक़ीन हैं. अदना सा कर्मचारी भी उन्हें दारू पार्टी का निमंत्रण देता है तो वे कभी अस्वीकार नहीं करते. यहाँ तक कि कुलियों के साथ भी उनको शराब पीते हुए देखा गया है. पर उनके प्रशंसक कहते हैं कि यह उनकी उस्तादी है, इस तरीके से वे अपना नेटवर्क चलाते हैं.

होली-दीवाली पर मिठाइयों और मेवे के इतने डिब्बे उनके बंगले पर आते हैं मानो एक बड़ी दूकान सज गयी हो. उनकी विशेषता यह भी है कि उन मिठाई के डिब्बों को दूर दूर के रेलवे स्टेशनों तक बाँटते है. हाँ भेंट में जो स्कॉच, वोदका या ह्विस्की की बोतलें आती हैं, उनको अपने ‘बार’ में जमा कर लेते हैं.

श्रीमती सिंह अच्छी गृहिणी हैं. वे अपने पति के रोजनामचे में कभी भी दखलन्दाजी नहीं करती हैं, पर शराब तो शराब ही है, सभी लोग खराब ही कहते हैं. ठकुराइन शुरू में तो जरूर परेशान रहती होंगी, पर अब आदत में आ गया है. उनका इकलौता बेटा अनमोल प्रसाद सिंह बाल्यकाल से होनहार व बुद्धिमान रहा है, उसको उन्होंने चित्तौड़ के सैनिक स्कूल में शिक्षा-दीक्षा दिलवाई और आगे जाकर वह भारतीय सेना में लेफ्टीनेंट और बाद में मेजर हो गया है. कहते हैं कि ‘तुख्मे तासीर-सोहबते असर’ अवश्य होता है. अनमोल भी पिता की राह पर शराब का शौक़ीन हो गया. वह अब इस स्तर पर पहुँच गया कि किसी के समझाने से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं रहा. सिंह साहब के लिए यह कोई चिंता की बात नहीं थी, लेकिन ठकुराइन को बड़ी तकलीफ थी, वह चाहने लगी कि जल्दी से जल्दी बेटे के पैरों में बेडियाँ डाल दी जाएँ ताकि अपने आप सुधरने की नौबत आ जाये. ऊंचे स्तर पर ही लड़की की तलाश की गयी.

संयोग से राजस्थान स्टेट डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के डायरेक्टर विष्णुप्रताप सिंह I.A.S. की पुत्री सुनंदा सिंह के साथ रिश्ता तय हो गया सुनंदा सिंह जयपुर में भौतिक शास्त्र में PhD कर रही थी. बड़े लोगों की बड़ी बातें, सब कुछ शाही अंदाज में हो रहा था. सगाई की रस्म नाते-रिश्तेदारों की उपस्थिति में धूमधाम से जयपुर में संपन्न हुई. लेनदेन की रकम बाहर नहीं बताई गयी, लेकिन अंदाजा है कि बहुत बड़ी रही होगी क्योंकि विष्णुप्रसाद सिंह की कमाई कम नहीं थी. उनकी कुर्सी ही ऐसी है.

सब कुछ बदस्तूर हुआ. बारात में १५० बाराती लाने की बात हुई थी, पर सिंह साहब तो हरदिल अजीज थे. कुली, मजदूर, टी.टी.ई., ड्राईवर, यूनियनों के कारिंदे, आदि कई लोग बिना निमंत्रण के ही जयपुर पहुँच गए. करीब ४०० बाराती जमा हो गए. वधु पक्ष वाले हक्का-बक्का रह गए. खैर, आनन्-फानन में दो-तीन गेस्ट हाउस व बेन्क्विट हॉल बुक किये गए. आमन्त्रित लोगों के लिए बड़े होटलों में ठहराने की अच्छी व्यवस्था थी. जनवासे के रूप में एक बड़े नामी होटल में व्यवस्था थी, जहाँ बारातियों के लिए भरपूर नाश्ते, चाट, चाय-काफी उपलब्ध थी. साथ ही मदिरा के शौकीनों के लिए बार भी खुला था, जिसमें बीस-बीस लीटर की टैप लगी कांच की बोतलें सुसज्जित थी. सभ्य समाज में मदिरा पीने का भी सलीका होता है, पर यहाँ तो रामद्वारा था, जितना मर्जी पियो. फिर क्या था? शाम होते ही पीने का दौर शुरू हो गया. सब तरफ गहमा-गहमी थी. दूल्हे राजा के साथ उनके आर्मी के एक दर्जन दोस्त भी आये थे, सबने पी और अनमोल भी उनके साथ शुगल में शामिल हो गया.

बाद में जब जयमाला के लिए यह शिव-बारात चली तो बहुत लोग अपने होश में नहीं थे. तोरण मारने की रस्म अदा करते समय खुद दूल्हा खड़ा नहीं हो पा रहा था. जब यह खबर सुनंदा तक पहुँची तो उसने खुले में आकर विद्रोह कर दिया कि वह शराबी व्यक्ति को जयमाला नहीं पहनाएगी. वातावरण में सनसनी व झगड़े की नौबत आ गयी. सयाने लोगों ने बीच बचाव किया. माँ-बाप ने सुनंदा को समझाया और स्थिति बिगड़ने से बचा लिया. बहरहाल सारा मजा किरकिरा तो हो ही गया. दूल्हे का नशा उतारने के लिए नीबू-पानी पिलाया गया. थोड़ा संयत होने के बाद ही रात तीन बजे फेरों की रस्म पूरी हो सकी.

बारात में न पीने वाले तथा सभ्य लोग भी थे. वे चुपचाप भोजन करके अपने ठिकानों पर विश्राम करने चले गए. बहुत से लोग उस दावत का मजा नहीं ले सके. सुबह मालूम हुआ कि कुछ बाराती गेस्ट हाउस में रातभर हुल्लड़ करते रहे. दो तीन ने तो सिगरेट पीते हुए बिस्तर भी जला डाले. पूरे रेलवे डिविजन को नियंत्रण में रखने वाले सिंह साहब यहाँ फेल हो गए. सुबह जो जैसा था अपनी तरह से तैयार हुआ और विदाई से पूर्व बारातियों को छोले-भटूरे और दही का नाश्ता परोसा गया.

दूल्हे को नाश्ता करवाने की विशेष पारंपरिक रस्म इस ठाकुर परिवार में होनी थी, जहाँ दूल्हा कन्या पक्ष से कोई भेंट की मांग कर सकता है. आम बारातियों को यह मालूम नहीं था. बड़ी देर से खुसर-पुसर हो रही थी, और फिर मालूम हुआ कि दूल्हे ने एक बुलेट मोटर साईकिल की मांग रख दी है. जब तक ‘हाँ’ नहीं हो उसने नाश्ते को नहीं छुआ. कन्या पक्ष ने इस तरह की मांग को गलत करार दिया. निकट रिश्तेदारों ने भी इस मांग को नहीं सराहा, पर दूल्हा तो अड़ा हुआ था और ऐसा लगा कि इसमें उसके पूज्य पिता जी की शह थी. उधर ट्रक में दहेज का सामान चढ़ाया जा रहा था, घर की महिलायें विदाई की तैयारी कर रही थी.

अचानक सुनंदा प्रकट हुई. उसने चिल्ला चिल्ला कर कहा, “मैं इस शादी को अस्वीकार कर रही हूँ. मुझे इन शराबी और लालची लोगों से रिश्ता नहीं रखना है.”

सब लोग सन्न रह गए. किसी को कुछ नहीं सूझ रहा था. मामला गंभीर हो गया. स्वयं लड़की के पिता ने आकर हाथ जोड़ते हुए कहा, “सबकी असुविधा के लिए मुझे बेहद अफ़सोस है.”

रामेश्वरप्रसाद सिंह जब तक स्थिति की गंभीरता को समझते खेल पूरी तरह बिगड़ चुका था. उन्होंने विष्णुप्रताप सिंह को समझाने की कोशिश की, पर दूध में खटाई पड़ चुकी थी, वह नहीं माने. और दहेज की मांग पर पुलिस में रिपोर्ट करने की धमकी देने लगे.

बारात बिखरते हुए बिना दुल्हन के बड़ी फजीहत कराके बैरंग लौट गयी. सिंह साहब की सारी हेकड़ी धरी रह गयी. सबको अनुशासन में रखने वाले के लिए यह आत्म अनुशासन का बड़ा भारी सबक था.

इस बीच दोनों पक्षों के शुभचिंतकों ने आपस में मंत्रणाएं की. सबको घटना पर दु:ख था. ‘माफ करो और भूल जाओ’ की बात पर सुनंदा को समझाया गया. सबको सद्बुद्धि आई. १५ दिनों के बाद जयपुर जाकर फिर विदाई की रस्म पूरी हुई.

इस प्रकार कहानी का सुखद अंत हुआ.

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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

चुहुल - ३३

(१)
एक नेता जी अपने चुनाव क्षेत्र के दौरे पर थे, ग्राम सभा की मीटिंग खुले आसमान के नीचे चल रही थी. इसी दौरान एक छोटा विमान ऊपर से उड़ कर जा रहा था.
एक ग्रामीण ने विमान को इंगित करते हुए नेता जी से पूछा, “नेता जी, वो क्या है?”
नेता जी को उसकी अज्ञानता पर बड़ी दया आई, बोले, "यह हवाई जहाज है. इसमें आदमी बैठते हैं और बड़ी तेजी अपने गंतव्य पर पँहुच जाते हैं.”
ग्रामीण ने पुन: कहा, “वो तो ठीक है, मेरा मतलब है कि ये मिग है, या एफ-१६ है?”
नेता जी उसकी तरफ देखते ही रह गए.

(२)
सुरेखा ने गलती से अपने बॉयफ्रेंड को अपने घर का पता दे दिया और वह अगले ही दिन घर पर दस्तक देने आ गया. उसने घंटी बजाई. एक उम्रदार औरत ने दरवाजा खोला. लड़के ने कहा, “सुरेखा घर में है?”
औरत ने आगंतुक से पूछा, “आप कौन?”
बॉयफ्रेंड इस पूछताछ से कुछ घबरा गया और बोला, “मैं सुरेखा का भाई हूँ.”
महिला मुस्कुराई और बोली, "अन्दर आ जाओ, बेटा. मैं सुरेखा की माँ हूँ. तुम्हारे पिता जी भी घर में ही हैं.”

(३)
मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर के दुमंजिले में थे. नीचे राह पर से एक भिखारी ने आवाज दी तो मुल्ला ने खिड़की खोल कर देखा और पूछा, “क्या चाहिए?”
भिखारी ने तुरन्त कहा, “नीचे आओ तो बताऊंगा.”
मुल्ला नीचे आया तो भिखारी ने कहा, “एक सिक्का चाहिए.”
मुल्ला लौट कर ऊपर की मंजिल में गया और खिड़की से बाहर सिर निकाल कर बोला, “ऊपर आ जाओ.”
भिखारी बड़े उत्साह से सीढियां चढ़ गया, पर वहाँ जाने पर मुल्ला ने उससे कहा, “खुला सिक्का नहीं है.”

(४)
एक महिला अपने बच्चों के साथ बस में चढ़ी. कंडक्टर से पूछने लगी “बच्चों का हाफ टिकट लगेगा?”
कंडक्टर ने जवाब दिया, “हाँ, अगर १२ से कम हो.’
महिला बड़ी तसल्ली से बोली, “तब ठीक है, मेरे तो पाँच ही हैं.”

(५)
एक सज्जन अपने मित्र के घर अतिथि बन कर गया. मित्र की पत्नी रात के खाने की तैयारी कर रही थी. अन्य दिनों तो वह अपने पति से रोटी बेलवाने का काम करवा लेती थी, पर आज वह अतिथि के साथ व्यस्त हो गया था. आटा भी थोड़ा ढीला ही बना था. जब रोटियाँ भोजन की टेबल पर आई तो टेड़ी-मेढ़ी, कोने निकली हुई देख कर अतिथि ने बहुत शालीनता से चुटकी ली, “वाह! भाभी जी बहुत बढ़िया! आपने तो सारी समस्या हल कर दी.”
मित्र ने पूछा “वह कैसे?”
अतिथि ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे भाई, मेरी पत्नी तो ऐसी गोल रोटी बना देती है कि कहाँ से तोड़ना हो इसके लिए सोचना पड़ता है. भाभी जी ने तो बढ़िया ढंग से कोने निकाल रखे हैं.”
***