बुधवार, 8 सितंबर 2021

सामयिकी

 आप मुझसे सहमत हों या ना हों पर मैं आज के हालात पर देश में चल रहे किसान आन्दोलन का पूरी तरह समर्थन करता हूँ.केंद्र सरकार ने जिस तरह इस बड़ी समस्या के प्रति बेरुखी अपनाई  है वह अत्यंत दुखदाई और निंदनीय है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस सम्बन्ध में जो कमेटी बनाई थी  उसकी रिपोर्ट मार्च महीने में ही आ चुकी थी, उसे सार्वजनिक करके देश को वास्तविकता की जानकारी दी जाए..

इस विषय में तमाम विदेशी मीडिया ने खूब भद्द उड़ाई है, ये  राजनैतिक  कैंसर ना बन जाए इसलिए इसे अब और लंबा थकाऊ  ना करके सम्मानजनक निराकरण आवश्यक है.

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

किसी को भला लगे या बुरा

 मोदी जी के सत्ता में आने के बाद कुछ ऐतिहासिक कार्य अवश्य हुए है जैसे सार्वजनिक सफाई अभियान, जम्मू कश्मीर से धारा ३७० हटाकर लद्दाख को अलग राज्य का दर्जा , बरसों से विवादित राम मंदिर का अहम् मुद्दा, देश की अंतर्राष्टीय छबि  काफी हद तक में सुधार आदि। 

प्रचंड बहुमत के रहते सरकार ने अनेक मनमाने आदेश/क़ानून बनाये, बरसों की मेहनत से बने श्रम कानूनों में उद्योगपतियों के हित निरस्त  किया, किसान आंदोलन का मुद्दा अभी भी मुंह बाए खड़ा है ये अनदेखी भविष्य में क्या गुल कहलाएगी कहा नहीं जा सकता है, रेलवे तथा अन्य कमाई उद्योगों का निजीकरण साफ़ तौर पर दिखाता है की इसके पीछे कुछ गण्यमान्य मित्रों को नवाजा जा रहा है.

मीडिया पर लगाम / लालच की बंदिश साफ़ महसूस की जा रही है,न्यायपालिका कहने को स्वतंत्र है लेकिन हमने अनुभव किया है कि सब गिरफ्त में चल रहे हैं  धार्मिक असहिष्णुता हर तरफ घोल दी गयी है, प्रचार माध्यमों पर करोड़ों अरबों न्यौछावर किये जा रहे हैं, ऐसा लगाने लगा है की सरकार का लक्ष सिर्फ चुनाव जीत रह गया है. नामनिहाल बुद्धिजीवी, विपक्षी नेता सब जैसे अंडरग्राउंड हो चले है क्योंकि सोचते हैं कि  इनसे कौन पंगा ले,जो पंगा लेने की स्थिति  में हैं भी सरकारी छापोपों व यातनाओं के दर के मारे चुप हैं.

अब आप कहते हो की आप मनमानी भी करो और कोई आवाज भी ना उठाये, पेट्रोलियम पदार्थ और रसोई गैस की बेतहाशा बृद्धि क्या मोदी जी को नहीं दिख रही  होगी? कहने इस लूट का पैसा सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में खर्च हो रहा है, पर  कितने लोगों को ये सुलभ है? सच ये भी है कि देश वर्ड बैंक के कर्ज में डूबा हुआ है, ऐसा समय भी आ सकता है की आप व्याज की पूरी क़िस्त भी ना दे पाएं।

आज सोसल मीडिया पर केवल हिन्दू_मुस्लिम के विद्वेष भरे सन्देश प्रसारित किये जा रहे हैं, कट्टरता किसी भी व्यक्ति या राजनैतिक दल द्वारा अपनाई जा रही हो. घोर निंदनीय है. 

ये भी सत्य है कि सीधे तौर पर मोदी जी का को विकल्प नहीं दीख रहा है, पर मित्रो आपको आवाज तो उठानी पड़ेगी।

                                                             ****

                                  

रविवार, 29 अगस्त 2021

वे सुनहरे दिन

 साठ साल पहले की बात है, मैं लाखेरी में नवांगुतक था , मुझे एसीसी कालोनी में L - १६ क्वाटर  आवंटित था, अविवाहित दिनों में मैंने अपने ही जैसे कुंवारे लोगों से जल्दी ही दोस्ती कर ली थी. इनमें स्व विष्णु बिहारी दीक्षित भी थे जो कि तब उदयपुर से MSW करके एसीसी में जॉब की तलाश में थे, उनके साथ ही एक लड़का शर्मा (नाम मुझे याद नहीं रहा) जिनके पिता उन दिनों लाखेरी स्थित  सेंट्रल एक्साइज के डिपुटी सुपरिंटेंडेंट हुआ करते थे भी उदयपुर स्कूल आफ सोसियल वर्क से ही  MSW कर के आये थे, इनके अलावा सेंट्रल एक्साइज के दो सब इंस्पेक्टर्स  सरदार गुरनामसिंह और प्रकाशचंद्र श्रीवास्तव तथा जीवन बीमा के फील्ड आफीसर वोहरा भी चौकड़ी के सदस्य बन गए थे. मेरा क्वाटर बैठक का अड्डा हो गया था और दोस्ताना गतविधियां चला करती थी. कभी कभी विशेष पकवान / खाना बनाने के लिए एक मि. खन्ना को भी बुलाया जाता था वे नौशेरवाँ टाकीज के सिनेमा के एजेण्ट होते थे , ता हम लोग फ्री में सिनेमा देखने का बी मजा लेते थे हालांकि फर्स्ट क्लास का टिकट मात्र सवा रुपया ही हुआ करता था.

ये सब केवल एक ही साल चला उसके बाद सब अच्छ गच्छ गच्छामि हो गया. मैं भी शादी शुदा लोगों की लिस्ट में जुड़ गया था.

                                         ****

शनिवार, 25 जुलाई 2020

न्याय / अन्याय




पुरानी कहावत है कि आप न्याय करते हैं तो वह अन्याय सा नहीं दीखना चाहिए. कहने को तो हम दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र में जी रहे हैं लेकिन हो क्या रहा है कि जिसके हाथ में लाठी आ जाती है वही भैंस को हांके जा रहा है.

अँधेरे कोनों से आवाज उठाती रहती है कि सी बी आई और  न्यायपालिका को पूर्ण स्वायत्तता मिलनी चाहिए, ताकि निष्पक्ष कार्यवाही/ न्याय हो सके. एक बार सुप्रीम कोर्ट को ही सी बी आई के बारे में कहना पडा था कि ‘ये किसका तोता है ?’ प्रबुद्ध लोग जजों के जमीर की बात करते हैं, जज लोग भी तो हमारे ही समाज की पैदावार हैं जिनकी नियुक्ति, प्रमोशन और भविष्य की संभावनाएं जिस तंत्र के अधीन होती हैं उसको नाराज करना घाटे का सौदा हो सकता है. भूतकाल में भी हमने देखा है कि ऐडजस्टमेंट के लाभ बहुत से माननीयों ने खुले आम स्वीकार किये हैं.

इतिहास जरूर निंदा करेगा पर वह जब लिखा जाएगा तब तक सारा परिदृश्य बदल चुका होगा. कहा जा रहा है कि प्यार और राजनीति में सब जायज होता है, चाहे आप bellow the belt मार कर रहे हों. पर ये नहीं भूलना चाहिए कि इन घटनाओं के निष्कर्ष लम्बे समय तक पीछा करते रहेंगे.
                   ***

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

कोरोना का साइड इफेक्ट




आजादी के पश्चात देश में औद्योगिक प्रसार के जोर पकड़ने पर मजदूरों के शोषण व उनके प्रति अन्याय को रोकने के लिए विधायिका ने चिंता जताई तथा मालिकों की निरंकुशता पर लगाम लगाने के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम के अलावा अनेक अध्यादेशों, वेतन आयोगों व द्विपक्षीय समझौतों के तहत सुरक्षा देने के पक्के इंतजाम किये गए. इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानकों का बी ध्यान रखा गया; इसे मेहनतकश लोगों के सच्चे हितैषियों के अनवरत संघर्षों की उपलब्धि भी कहा जा सकता है. मुख्यत: काम के घंटों, न्यूनतम वेतन, मानवीय सुविधाओं तथा सामाजिक सुरक्षा के बारे में एक लक्ष्मण रेखा खींच दी गयी और इसकी निगरानी के लिए श्रम विभाग का पूरा तंत्र स्थापित किया गया जिसमें इंस्पेक्टर से लेकर न्यायालयों तक का एक जाल बना दिया गया.

अब जब दक्षिणपंथी / पूंजीपतियों के पोषक सरकारें सत्ता में आई हैं तो हम देख रहे हैं कि बड़ी बड़ी सरकारी उद्योगों/ कंपनियों का निजीकरण का दौर जारी है . नए ठेकेदारों को खुलाहस्त देने के लिए श्रम कानूनों को सस्पेंड करने की साजिश हुई है; बहाना कोरोना से उत्पन्न परिस्थिति बताई जा रही है. ये दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय है जो अंधेरगर्दी को जन्म देनेवाला है.

अफ़सोस इस बात का है कि देश में श्रमिक आन्दोलन विभाजित तथा निष्क्रिय अवस्था में है, सत्ता से जुड़े हुए मजदूर नेता अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता के कारण या तो चुप हैं या दबी जुबान से बेमन से बोल रहे हैं. अघोषित आपदकाल में विपक्षी नेता भी बिलों में घुसे पड़े हैं.

कुल मीजान ये है कि जो होने जा रहा है उसके दूरगामी दुष्परिणाम होंगे.
                  ***