शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

सलाम शाहाबाद - १

हमारा देश इतनी विविधताओं से भरा है कि हम इनका पूरा अवलोकन नहीं कर सकते हैं, फिर भी जो देख पाते हैं, वह कई बार हमारी कल्पनाओं से परे होता है. मुझे दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के धुर उत्तर जिला गुलबर्गा (स्थानीय लोग उसे कल्बुर्गी भी कहते हैं) के शाहाबाद औद्योगिक परिसर में पूरे चार साल रहने का सुअवसर संन १९७० से १९७४ के बीच मिला. तब मेरी उम्र तीस वर्ष थी. मैं ए.सी.सी. सीमेंट की लाखेरी (राजस्थान) इकाई से शाहाबाद इकाई को स्थानांतरित किया गया था. स्थानांतरण का कारण मेरे ट्रेड युनियन के कार्यकलाप थे, जिसका खुलासा  मैंने पूर्व में इसी ब्लॉग में ‘मगर से बैर’ शीर्षक वाले संस्मरण में किया हुआ है.

शाहाबाद बहुत सुन्दर जगह है. कम्पनी ने सीमेंट फैक्ट्री के बगल में एक बड़ा हैवी इन्जीनियरिंग कारखाना भी लगाया था, जिसमें बड़ी बड़ी मशीनें बनती थी. मुम्बई-चेन्नई में रेल मार्ग के मध्य में शाहाबाद कस्बा लाइम स्टोन यानि चूना पत्थर के चट्टान पर बसा हुआ है. वहाँ मकान भी इन्ही चूना पत्थर से बने थे. कारखाने के लिए कुछ दूरी पर पत्थरों की खदानें खोदी गयी थी. इस पूरे चितापुर तालुके की बेल्ट में हाई ग्रेड लाइम स्टोन भरा पड़ा था, जो सीमेंट बनाने में काम आता है.

बगल में मीठे पानी वाली कगीना नदी (भीमा नदी की ट्रीब्युटरी) बहती थी. जिला मुख्यालय गुलबर्गा शहर भव्य मंदिर व मस्जिद के साथ साथ इन्जीनियरिंग कॉलेज व कृषि विज्ञान कॉलेज वाला खूबसूरत साधन संम्पन्न था/है. पूर्व मुख्य मन्त्री स्व. वीरेंद्र पाटिल का चुनाव क्षेत्र होने से सब प्रकार से आधुनिकता संपन्न भी था. लेकिन जब मैं शाहाबाद गया तो वहाँ पर राजस्थान के ग्रामीण अंचलों के मुकाबले बहुत गरीबी और पिछड़ापन लगा. फैक्ट्री कर्मचारियों के अलावा बाकी आम निवासी बेहद गरीबी और भुखमरी के शिकार लगते थे. कारण यह भी हो सकता है कि उस इलाके में कुछ वर्षों से बिलकुल वर्षा ना होने से अकाल की स्थिति थी. घरों मे काम करने वाली महरी मात्र पन्द्रह रूपये माहवार पर उपलब्ध होती थी.

कस्बे में पुराने जमे हुए मारवाड़ी व्यापारी बहुत थे. बाजार आम देहाती बाजारों की तरह ही सजा रहता था. फैक्ट्री की आवासीय कॉलोनी बहुत बढ़िया ढंग से बसाई गयी थी लेकिन उसके बगल में बहुत बड़ी झोपड़पट्टी वाली बस्ती थी जिसे ‘मड्डी’ कहा जाता था/है. इस बस्ती में तब नागरिक सुविधाएँ नहीं के बराबर थी. बहुत से फैक्ट्री मजदूर भी वहाँ निवास करते थे. सब तरह के लोग खिचड़ी की तरह साथ रहते थे. जिनमें अधिकांश हरिजन, मुस्लिम या लम्बाड़ी जाति के हिन्दू थे जो अपने आपको आज भी महाराणा प्रताप के वंशज मानते हैं. इनकी महिलायें ‘कालबेलिया’ औरतों की तरह पहनावा पहनती हैं. इनकी अलग बोली भी है, पर आम तौर पर सभी लोग कन्नड़ बोलते है.

किसी समय यह इलाका तेलंगाना में था और हैदराबाद राज्य का हिस्सा हुआ करता था. इसलिए यहाँ मुस्लिम आबादी भी बहुत है जो कन्नड़ के साथ साथ उर्दू भी जानते हैं. हाँ, लहजा दखिनी होता है.

इस मड्डी में से ही अनेक राजनेता उभर कर आये हैं. वर्तमान में राज्यसभा सदस्य मेरे मित्र के.बी.शानप्पा (सी.पी.आई) तब हैवी इन्जीनियरिंग फैक्ट्री में काम करते थे. मेरे युनियन में असिस्टेंट गुरुनाथ, जो बाद में कर्नाटक कई संयुक्त सरकार में लेबर मिनिस्टर बने मड्डी में ही निवास करते थे.

मड्डी को बदनाम बस्ती के रूप में भी जाना जाता था, जहाँ जुआ, शराब(सैंदी/ताड़ी), शबाब सब उपलब्ध रहता था. अशिक्षा, बेरोजगारी और गरीबी ने बहुत से नौजवानों में अपराधवृत्ति भी पैदा की हुयी थी. खुले आम चलती मालगाड़ी के डिब्बों को खोलकर सामान गिरा लेना, कोयले के खुले  वैगनों में से कोयला गिरा कर ले जाना तथा कॉलोनी में भी घरवालों की अनुपस्थिति में सामान निकाल लेना बहुत आम बात थी. मुझे युनियन के जनरल सेक्रेटरी के पद पर रहते हुए विधान सभा के चुनावों के दौरान पार्टी उम्मीदवार के साथ इस बस्ती में घूमने का अवसर मिला, जो मेरे लिए अलग किस्म का अनुभव था.

मुझे याद है पिछले एक मुख्यमन्त्री श्री धर्मसिंह राठौर जो चितापुर में रहते थे, मेरे अच्छे मित्र बन गए थे. वे अपना मूल उत्तर भारत ही बताते थे. तात्कालीन विधायक कामरेड रोचय्या भी चीतापुर के निवासी थे. मैं अपने प्रेसीडेंट कामरेड श्रीनिवास गुडी के साथ कई कार्यक्रमों में उनके साथ रहा, पर सब कुछ, यानि पद और आदर, पाने के बावजूद मैं स्वयं को उस वातावरण में आत्मसात नहीं कर पाया. इसलिए मैंने वापस लाखेरी, राजस्थान के लिए स्थानांतरण चाहा और ठीक चार वर्ष वहाँ रह कर लाखेरी आ गया.

सं १९७० में शाहाबाद पंहुचते ही जो मजेदार घटना मेरे साथ घटी, मैं उसका जिक्र जरूर करना चाहूँगा कि मैं अपने परिवार और नौ अदद सामानों के साथ जब रेल से शाहाबाद रेलवे स्टेशन पर उतरा तो मुझे लेने के लिए कम्पनी का एक सिक्योरिटी हवलदार बस लेकर आया था, जो हमें आवासीय कॉलोनी में ले गया. बस ने मेरे भावी निवास के निकटतम स्थान पर अपने नियत स्टाप पर हमें उतार दिया. बस से उतरते ही एक १५-१६ साल का तगड़ा लड़का सामने आया, बोला, “साब, सामान क्वार्टर पर पहुंचाना है?” मैंने पूछा, “कितने रूपये लेगा?” उसने कहा, “सारा सामान ५ रुपयों में पहुंचा दूंगा.” (उन दिनों ५ रुपयों की बहुत कीमत होती थी.) मैंने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?” उसने बताया, “अब्बास”. “ले चलो,” मैंने कहा, तथा हम सबने भी मिलकर सामान उठाया. सिक्योरिटी वाले ने भी मदद की. सामान चर्च के पास एक टी.आर.टी क्वार्टर में पहुच गया. मैंने शुक्रिया कहते हुए उसको ५ रुपये दे दिये और वह चला गया.

हम नए घर में व्यवस्थित होने लगे. एक घंटे बाद मैं अपने कार्यस्थल देखने फैक्ट्री गेट की तरफ गया तो मेरे पीछे से अब्बास ने आकर मेरी पत्नी से हुज्जत करके ५ रूपये मांगे, जो उस वक्त मेरी पत्नी के पास नहीं थे. हल्ला गुल्ला सुन कर पड़ोस से एक सयानी महिला निकल कर आई, उसने मेरी पत्नी को ५ रूपये उधार देकर कृतार्थ किया. मैं जब लौट कर आया तो पत्नी ने नाराजी भरे स्वर में कहा कि “उस लड़के को आपने रूपये दे देने चाहिए थे. उसने बड़ा हुल्लड किया." मैंने बताया कि “रूपये तो मैंने उसको दे दिये थे.” मतलब साफ़ था कि वह लड़का मवाली था. मुझे उसका नाम याद था अत: मैं उसकी तलाश में तुरन्त निकल पड़ा.

कॉलोनी के बीच में कोऑपरेटिव स्टोर के पास एक पान की दूकान पर मैंने अब्बास के बारे में पूछा तो उसने मुझे उस साइकिल की दूकान का सही पता बता दिया जहाँ उसकी बैठक होती थी. पान वाले ने यह भी बताया कि ये लड़के बदमाश हैं, इनसे बच कर रहिये.” मैं सीधे साइकिल की दूकान पर पहुँचा, वहाँ मुझे अब्बास बैठा मिल गया. उसके साथ ४-५ नौजवान और भी थे. मैंने आव देखा ना ताव अब्बास का हाथ पकड़ कर बाहर खींचा और दो थप्पड़ रसीद कर दिये. उसकी हिमायत में एक और उठा तो मैंने उसे भी एक झापड मार दिया. अब्बास कांपने लगा. मैंने कहा”निकाल रूपये.” उसने पांच रूपये निकाल कर मुझे दे दिये. मैंने उससे कहा, “अब बता अपने दोस्तों को मैंने तुझे क्यों मारा?”

मैंने जब सारी बात बताई तो सबको जैसे सांप सूंघ गया हो. मैं अपने क्वार्टर पर लौट आया.

इस घटना ने मुझे फैक्ट्री के अन्दर-बाहर एक चर्चित व्यक्ति बना दिया. मुझे ‘दादा’ के रूप में देखा जाने लगा, जो बाद में वहाँ पर मेरे युनियन नेता बनने में सहायक सिद्ध हुआ और चार सालों तक किसी असामाजिक तत्व ने मुझसे सामना करने की हिमाकत नहीं की.

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बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

कागज़ के पहिये

डोरीलाल ने नया नया प्रॉपर्टी डीलर का काम शुरू किया था. तहसील में अर्जीनवीस ने उससे रजिस्ट्री के कागजातों में 'कागज के पहिये' लगाने को कहा तो पहले वह कुछ समझा नहीं, पर जब उसने साफ़ साफ़ कहा, “इसमें दो प्रतिशत के हिसाब से सुविधा शुल्क देना पड़ता है तो उसकी समझ में आया कि यहाँ की दुनियादारी कैसे चलती है. बाद में तो वह इस काम में माहिर हो गया और बिना झिझक के कागजातों पर कागज के पहिये लगा देता और तुरत-फुरत अपना काम निकाल लेता रहा. अब तो वह बड़ा आदमी हो गया है. उसके नौकर चाकर ही जाकर इस तरह कागज़ के पहिये लगा कर काम करा लेते हैं.

डोरीलाल के बाप होरीलाल ने बकरे-मुर्गे काटते हुए जिंदगी निकाल दी. और करता भी क्या? जाति से खटीक था. यही पुस्तैनी धंधा रहा था. अच्छा गुजारा भी चल जाता था, पर बेटा पढ़ लिख गया और इस काम को बिलकुल पसंद नहीं करता था. वह किसी ऐसे धन्धे की तलाश में रहा जिसमें खून-माँस का काम नहीं हो. ‘जिन खोजा तिन पाइयां,’ एक दिन उसकी मुलाक़ात राधेश्याम पंजाबी से हो गयी और बात बात में उसने उसे अपना पार्टनर बनने को कहा.राधेश्याम छोटी पूंजी वाला आदमी था. छोटी-मोटी प्रॉपर्टी खरीदने बेचने का काम किया करता आ रहा था. अब दोनों में दोस्ती हो गयी. एक और एक ग्यारह होते ही उनकी चल निकली. फाइनैंसर भी बढ़िया मिल गया. कई जगह बड़े भूखण्ड सस्ते में खरीद डाले और बाद में टुकड़ों में बेचना शुरू कर दिया. धन्धे का ‘गुर’ कागज़ के पहियों ने बड़ा काम किया. देखते ही देखते डोरीलाल लखपति से करोड़पति हो गया. जब सारा कारोबार समझ में आ गया तो उसने अपना धन्धा राधेश्याम से अलग कर लिया. और अपने तीनों भाइयों को भी इसी कारोबार में लगा दिया. भाग्य ने भी साथ दिया अचानक जमीन जायदाद के भावों में बढ़ोत्तरी आ गयी.

साइकिल से मोटर साइकिल फिर फिएट कार से होंडा सिटी तक का सफर यों ही तेजी से चलता रहा. कागज़ के पहियों के लगते ही तमाम सरकारी मुलाजिम उसके गुलाम होते चले गए. मात्र बीस वर्षों में डोरीलाल क्रीमी लेयर से बहुत ऊपर आ गया अब उसके नाम का डोरी हिस्सा हट गया वह ‘लाल बाबू ’ कहलाने लगा.

लाल बाबू  ने उत्तराखंड बनते ही भांप लिया था कि यहाँ की जमीन भविष्य में सोने के भाव बिका करेगी. जहाँ भी, जैसी भी, जमीन मिली उसके कारिंदे खरीदते रहे. जहाँ अड़चन या नम्बर दो का काम होता था कागज़ के पहिये लगते रहे. राजधानी देहरादून, कोटद्वार तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिल्ली के निकट नोयडा व गाजियाबाद तक लाल साहब के साम्राज्य की जड़ें फ़ैल गयी. वह कोलोनाईजर से बिल्डर भी बन गया. समृद्धि तो सबको दीखती है पर उसकी बुनियाद को केवल वही जानता है, जिसने अध्यवसाय किया हो.

गुड़ होता है तो मक्खियां भी अपने आप खींची चली आती हैं. समय समय पर राजनैतिक दलों को भी भरपूर चन्दा दिया जाता रहा. एक समय ऐसा आया कि एक नामी क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी पर लाल बाबू  का वर्चस्व हो गया वह स्वयं टिकट बांटने वाला हो गया. अपने भाईयों को भी उसने राजनीति में सक्रिय कर दिया. स्वयं विधान सभा का चुनाव जीत कर देश सेवा के कार्य भी करने लगा है..

अपने बाप की ‘मीट की दूकान’ उसने अपने एक रिश्तेदार को सौंप दी थी, लेकिन उसको हमेशा यह अहसास रहता था कि उसके धन्धे को जो जो कागज़ के पहिये लगे थे, वे इसी दूकान की उपज थे.

होरीलाल अपने बेटों की बढ़त देखते-देखते बूढ़ा हुआ और चल बसा. बेटे पितृ भक्त हैं, उन्होंने उसके नाम से एक आधुनिक सुविधा संपन्न बड़े अस्पताल तथा एक कॉलेज की स्थापना की है जो कालान्तर में बढ़िया ढंग से चलाये जा रहे हैं लेकिन है सब व्यावसायिक स्तर पर.

कभी कभी एकांत में डोरीलाल अपने पिछले जीवन चक्र को निहारता है और सोचता है कि पूरी दुनिया कागज़ के पहियों पर ही दौड़ रही है.

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सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

दुश्मनों के नाम

दुनिया में मैं एक ऐसा प्राणी हूँ जिसका कोई दोस्त नहीं है. सब मुझे मारने की फिराक में रहते हैं. इन्सान तो मेरे वंशनाश के तरीके ईजाद करता रहा है, पर मैं कहता हूँ कि मैं आज भी हूँ और कल भी रहूँगा.

एक डॉक्टर ने अपने अस्पताल के बाहर बड़े बड़े शब्दों में बोर्ड पर लिखा है, ‘मुझे अपने भोजन के लिए बीमार लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है. भगवान मुझे क्षमा करें.’ मुझे उसकी यह बात बहुत पसंद आई क्योंकि मेरा भी हाल कुछ ऐसा है कि जिन लोगों से मुझे भोजन मिलता है वे बाद में बीमार हो जाते हैं.

मैं मच्छर हूँ, अनादिकाल से बदनाम हूँ, और इसी कारण मारा जाता हूँ. मेरा कसूर सिर्फ यह है कि मुझे भगवान ने जन्मजात खून का प्यासा बनाया है. इंसानी बच्चों को उनके स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि वे मुझसे किस प्रकार बचें. कालेजों में रिसर्च की जाती है कि मेरा सर्वनाश कैसे किया जा सकता है. मैं एक बहुत छोटा सा प्राणी जिसे मलेरिया, फाइलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, व मस्तिष्क ज्वर के वाहक के रूप में बदनाम किया जाता है, ज़रा सोचिये, मेरे थूक-लार में अगर पैरासाईट रहते हैं तो इसमें मेरा क्या कसूर? मैं तो जब पापी पेट भरने के लिए किसी का खून चूसने के लिए अपनी नाजुक सी बाल से भी बारीक सूंड प्यार से खुली चमड़ी में अन्दर डालता हूँ मेरी कोशिश यही रहती है कि मेरे मेजबान को मालूम न हो. भला भोजन देने वाले का बुरा कौन सोच सकता है?

पहले समय में मलेरिया के ज्वर को, चाहे वह तिजारा हो, चौथ हो, या रोज ही आता हो, लोग उसे भूत-प्रेत की महिमा मानते थे. माल+एयर यानि ‘बुरी हवा ‘ के रूप में ज्वर का नामकरण ‘मलेरिया’ किया गया. तब तक किसी को यह मालूम नहीं था कि यह ‘एनाफिलीज’ मच्छर के काटने से होता है. सर्व प्रथम सन १८८० में एक डॉक्टर ने लाल रक्त कणों में परजीवी यानि पेरासाईट पाकर यह सिद्ध किया कि यह भूत - पिचाशों से नहीं बल्कि मच्छरों के कारण होता है. यह हिसाब भी लगाया गया कि इस बीमारी से करोड़ों लोग हर वर्ष भगवान को प्यारे होते रहते हैं.

अब सवाल यह है कि जो प्राणी पैदा होगा वह मरेगा भी, लेकिन कसूरवार मुझे ठहराया जाता है. मेरे विरुद्ध तरह तरह की दवाएं, इंजेक्शन तथा मुझे मारने के लिए अगरबत्ती, गैस, फॉग, फयूम, व रसायन ईजाद किये गए हैं. इस धन्धे में भी लाखों-करोड़ों लोगों का रोजगार चल रहा है. पर मैं भी ढीठ हूँ. अपना वंशनाश करने की इजाजत कैसे दे सकता हूँ? मैंने खुद को इन दवाओं से इम्यून कर लिया है, यानि अब ये बेअसर हो रही हैं.

दुनियाभर में मलेरिया उन्मूलन जैसे बड़े कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, पर मैं हूँ कि अपनी छोटी सी जान को बचाए रखने के लिए सीलन वाली जगहों, नालों, घरों के कूलरों मे रुके हुए पानी या सड़े पानी वाले तालाबों में छुपकर अपना परिवार बढ़ाता जाता हूँ.

मैं अपने दुश्मनों  को सावधान कर देना चाहता हूँ. अभी तक तो मैं आपके कान पर आकर संगीत की धुन भी छेड़ता था, अब अगर आप लोग मेरे पीछे ही पड़े रहेंगे तो मैं चुपके से आपके बाथरूम या घर के पर्दों में छिप कर 'गोरिल्ला वॉर' करना शुरू कर दूंगा. मच्छरदानियों और जालियों में घुस जाऊंगा.

इसे सलाह समझिए या चेतावनी, अब जब मलेरिया का वैक्सीन (टीका) बन ही गया है तो मेरा वंशनाश करके मुझे म्यूजियम में रखने की व्यवस्था मत कीजिये.
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शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

विछोह

प्रिय, कलियों ने सी लिए हैं होंठ, तेरे खो जाने पर

गंधहीन खीझे से लगते खिलखिलाते सुरभित प्रसून.

अस्वस्थ से, डरावने लगते मेघों के घटते–बढ़ते बिम्ब,

भयभीत सी, झंकारविहीन बहती है अस्त-व्यस्त बयार

रस–रसना, रस-काव्य, स्वर लहरी, सब हो गए हैं अग्राह्य

तुम लुप्त दिवाकर या बीती बहारों की छटा नहीं हो

तुम बिसरी साँझों की याद नहीं, जो फिर फिर उभरेगी

तुम प्रस्तर हो गयी बिन श्राप, बिन अधर्म, बिन बताए,

सपना सा आकर खोया अपनापन इससे मीठी व्यथा नहीं

प्रिय! सह सकता था मैं, यह सब प्रतीक्षा के होने पर.
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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

चुहुल - ३४

(१)
एक समाजसेवी को उसके चाल-चरित्र से प्रसन्न होकर एक सिद्ध पुरुष ने एक ‘जादुई बोतल’ दी. बाद में जब समाजसेवी ने बोतल का ढक्कन खोला तो उसमें से एक ‘जिन्न’ बाहर आ गया और बोला, “मेरे आका, तुमने मुझे आजाद किया है इसलिए मैं तुम से बहुत खुश हूँ, बोलो तुम को क्या चाहिए? जो मांगोगे सब मिलेगा.”
समाजसेवी देश में चल रहे भ्रष्टाचार से बहुत दु:खी था, बोला, “मेरे देश से भ्रष्टाचार को मिटा दो, बस.”
इस पर आँखें तरेर कर जिन्न बोला, “तुम मुझे इस बोतल के अन्दर दुबारा डाल दो और ढक्कन लगा दो. ये जो काम तुम बता रहे हो बिलकुल असंभव है.”

(२)
एक कवि के पेट में भयंकर दर्द उठा करता था. वह दिन में कई बार बेहोश भी हो जाता था. उसके परिजन उसे एक बड़े डॉक्टर के पास ले गए. डॉक्टर ने उससे बीमारी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसकी रचनाएँ पेट में घूमती हैं, सुननेवाला कोई नहीं है इसलिए यह समस्या पैदा हो रही है.
डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए सहज में कह दिया, “चलो, मुझको सुना दो.”
काफी देर तक डॉक्टर के केबिन से कवि की आवाज आती रही, जब बहुत देर हो गयी तो स्टाफ ने दरवाजा खोल कर देखा तो पाया डॉक्टर साहब बेहोश पड़े हुए थे, और कवि महोदय गाये जा रहे थे.

(३)
एक सज्जन ने बहुत खर्चा करके अपना शानदार दुमंजिला घर बनवाया, जिसमें हर तरह की खूबसूरत बनावटें व सुविधाएँ थी. गृह-प्रवेश पर् सभी सगे-स्नेहियों को बुलाया गया, दावत दी गयी. मकान के बारे में लोग वाह वाह करते रहे. उनमें एक व्यक्ति ऐसा भी था जो हमेशा ही नकारात्मक सोचता था. हर चीज में खोट निकालता था. वह बोला, “और तो सब ठीक है पर ऊपरी मंजिल को जाने वाला जीना संकरा है, अगर ऊपर कोई मर गया तो नीचे उतारने में अड़चन आयेगी.”

(४)
एक आदमी अपने दोस्त से बोला, “यार, मेरी बीवी हर वक्त रुपये मांगती रहती है. परसों उसने १०० रूपये मांगे थे, कल २०० रूपये और आज ३०० सौ रुपये.”
दोस्त ने ताज्जुब करते हुए पूछा, “हद हो गयी, इतने रुपयों से वह करती क्या है?”
“मालूम नहीं भाई, पर मैंने उसे अभी तक दिये नहीं.”

(५)
एक स्त्री शिकायत के स्वर में अपने पति से बोली, “कल रात आप नींद में मुझे और मेरे पीहर वालों को बहुत भद्दी भद्दी गालियाँ दे रहे थे. मैंने साफ़ साफ़ सुना.”
पति बोला, “कल रात किस उल्लू के पट्ठे को नींद आई थी.”

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