रविवार, 10 फ़रवरी 2013

नैनो हाइड्रो -३-मॉडल २११०

कभी कभी हम सपनों में अपने बचपन या अतीत में पहुँच जाते हैं. वही घर-गाँव, माता-पिता की छाँव एवं वे घटनाएं, जो अतीत में घटित हो चुकी हो, हमारे मन-मस्तिष्क में अमूर्त दृश्य सिनेमा की रील की तरह चलने लगती है. सपने के सक्रिय होते ही हम स्वप्न लोक में बहुत तेजी से विचरने लगते हैं. यह सब व्यक्ति की अपनी मानसिक स्थिति तथा परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है.

यहाँ मैं पीछे के समय के सपनों की नहीं बल्कि आगे आने वाले एक सौ वर्षों के बाद की एक कल्पना/स्वप्न के बारे में जो कि एक चार पहिये वाली गाड़ी को बेचने के वर्गीकृत विज्ञापन के रूप में है, उससे रूबरू कराना चाहता हूँ. कैसा होगा यह विज्ञापन? इसका स्वरूप देखिये:

दिनाँक १० फरवरी २११३.
इन्टरनेशनल परमिट, १० हजार किलोमीटर सड़क मार्ग से चली हुई, ६० हजार हवाई किलोमीटर उड़ी हुए तथा ५ हजार किलोमीटर जलयात्रा की हुई फोल्डिंग गाड़ी (पार्किंग स्पेस ६”x६”) सभी आधुनिक  उपकरणों व प्रणालियों युक्त, सोलर पावर के साथ हाइड्रोजन फ्यूल युक्त (दो रिजर्व टैंक) बिकाऊ है. कीमत केवल १५ करोड़ इंडियन रूपये. इच्छुक ग्राहक संपर्क करें. कांटेक्ट न० ००११...............

यह विज्ञापन पढ़ कर एक वंशज बोलेगा, “अरे यह विज्ञापन तो मेरे दादा के दादा ने अब से सौ वर्ष पूर्व ड्राफ्ट बना कर रख छोड़ा था, तब पुरानी गाडियाँ मात्र पचास हजार रुपयों में मिल जाया करती थी. पर वे उडती नहीं थी.”
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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

निरुद्देश्य

सुरेन्द्रनाथ झा गुडगाँव में ३०० गज के एक प्लाट में बंगला बनाकर रह रहे हैं. वे देश के एक नामी कपड़ा उद्योग के स्पेशल डाइरेक्टर के पद से करीब दस साल पहले रिटायर हो चुके थे. उनकी उम्र अब लगभग ७८ वर्ष की है. उन्होंने जवानी में शादी नहीं की. अधेड़ उम्र में आस्ट्रेलिया गए थे, वहाँ पर एक अंग्रेज महिला मिस ग्रेफीना से दोस्ती हुई और साथ ले आये. वह पहले से तलाकशुदा थी. उसकी वफादारी तो ऐसी थी कि वह नाम की पत्नी बनी रही. करीब १४ साल साथ रह कर वह झा साहब से सारे रिश्ते तोड़ कर वापस आस्ट्रेलिया चली गयी. झा साहब अब सोचते हैं कि पता नहीं किस मनहूस घड़ी में ग्रेफीना उनसे मिली, तब वे अपनी औकात भूलकर खुद भी अंग्रेज बनने की हिमाकत करने लगे थे.

झा साहब को जब तक दम था, ९ महीने विदेशों में बिता आते थे, पर अब मधुमेह व अस्थमा के प्रकोप से ग्रसित हो गए हैं. फैमिली डॉक्टर रोज ही आता है. अपनी ड्यूटी पूरी कर जाता है. घर में ड्राईवर समेत पाँच नौकर हैं, जो उनकी देखभाल करते हैं, पर नौकरों का रिश्ता तो शुद्ध व्यवसायिक होता है. कुछ समय पहले तक ड्राईवर से कभी कभी कहा करते थे, “चलो आज नई दिल्ली घुमाकर लाओ,” पर अब दिल्ली घूमने लायक नहीं रही है, भीड़-भाड, वाहनों का जाम व प्रदूषण की सोच कर उस तरफ जाने का मन नहीं होता है.

पिछले महीने अलीगढ़ जरूर गए थे, जो कि उनका जन्म स्थान है. झा साहब का बचपन वहीं बीता था इसलिए उन गली मुहल्लों के प्रति वे अभी भी संवेदनशील हैं. वहाँ अब उनका कोई परिचित नहीं बचा है, चाचा, ताऊ के परिवार वाले थे, वे भी एक एक करके अन्यत्र बस गए हैं. सब अपने अपने सांसारिक धंधों-उलझनों में व्यस्त होंगे. झा साहब ने पिछले ५० वर्षों में उनकी कभी कोई खोज खबर भी नहीं रखी है. अलीगढ़ शहर का भी बाहरी फैलाव बहुत हो गया है. पुरानी पहचान वाली जगहें सब नैपथ्य में चली गयी हैं. उनके पुराने घर के पास जो शिव मंदिर था, वह वैसा का वैसा है. छुटपन में कई बार सुरेन्द्र माँ-बाप के साथ यहाँ आये थे, पर सयाने होने के बाद उन्होंने देवालयों मे जाकर दर्शन करना छोड़ दिया. वे सचमुच धार्मिक नहीं रहे हैं. कारण उन्होंने कभी भगवान की जरूरत महसूस नहीं की.

सुरेन्द्रनाथ झा के पिता जानकीनाथ झा तालों के कारोबार से जुड़े हुए थे. यह उनका खानदानी काम था, पर जानकीनाथ झा सपरिवार कानपुर आकर बस गए थे. अलीगढ़ से ताले ला कर यहाँ बेचा करते थे.

सुरेन्द्रनाथ झा की माता जी भी खाली बैठना पसन्द नहीं करती थी. फिरोजाबाद से चूडियों की खेप लाकर मोहल्ले मोहल्ले जाकर चूड़ियाँ बेच आती थी. झा साहब को यह सब कल की सी बात लगती है. सुरेन्द्रनाथ ने कानपुर से मैट्रिक पास करके वहीं से मैकेनिकल इन्जीनियरिंग में डिप्लोमा ले लिया. कुछ महीनों तक एल्गिन मिल में अप्रेंटिसशिप करने के बाद सिंघानिया कम्पनी के नए कपड़ा मिल में नौकरी पा गए. ये वे दिन थे, जब न्युयोर्क और लन्दन दोनों जगहों पर एक साथ पेट्रोलियम पदार्थों पर आधारित कृत्रिम धागे का आविष्कार हुआ था और उनसे NY+LON (नाइलोन) नाम दिया गया था. यह कपड़ा उद्योग का एक क्रांतिकारी समय था. शुद्ध कृत्रिम रेशे से या इसकी मिलावट से टेरेलिन, टेरीकॉट व पॉलिएस्टर जैसे नए प्रयोग हुए, जिसने कपड़ा उद्योग का सारा नक्शा ही बदल दिया.

सिंघानिया कम्पनी इस नई तकनीक का विवरण व माइक्रोप्रोसेसर बहुत महंगे दामों में खरीद कर लाई, जिस पर काम करने का जिम्मा जापान में कुछ ट्रेनिंग  दिलाने के बाद सुरेन्द्रनाथ झा को दिया गया.

देश के अन्य प्रतिस्पर्धी कपड़ा उद्योगों की भी नजर इस नई टेक्नोलॉजी पर थी. अहमदाबाद के एक नव उद्योगपति ने सिंघानिया के गर्भगृह में सेंध लगा कर एक स्पेयर माइक्रोप्रोसेसर सहित सुरेन्द्रनाथ झा को चीफ इंजीनियर के पद लालच देकर गुपचुप अपने यहाँ बुला लिया. हड़कम्प मचा, सुरेन्द्रनाथ झा पर मुकदमा दर्ज हुआ, पर नए मालिक दम्ब्वानी ने परदे के पीछे से पूरी मदद की. लेनदेन/समझौता हुआ और कुछ वर्षों के बाद मुकदमा रफा दफा भी हो गया. दम्ब्वानी मैनेजमेंट ने सुरेन्द्रनाथ झा को विशेष दर्जा दिया. विदेश यात्राओं की हर साल सौगातें दी और आर्थिक रूप से मालामाल भी कर दिया क्योंकि सुरेन्द्रनाथ झा की कृत्य से कम्पनी को लाखों का नहीं, कई करोड़ों का लाभ हो रहा था.
सुरेन्द्रनाथ झा कम्पनी में उच्च पदों पर नियुक्त रहे. उन्होंने पाश्चात्य शैली की ऐश भरी जिंदगी जी, पर अब दौलत तो ढेरों है, लेकिन शरीर की मजबूरियों के रहते खुद को लाचार महसूस करते हैं.

आज उन्होंने अपने वकील को बंगले पर बुलाया है और चाहते हैं कि अपनी वसीयत लिखवा डालें. वे पिछले कई दिनों से इसी उलझन में हैं कि इतनी सारी चल सम्पति का वारिस किसको बनाया जाये? वे उलझन में हैं, निरुद्देश्य हैं, हिसाब भी लगा रहे हैं कि जीवन में क्या पाया और क्या खोया!
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बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

बूढ़ा सेमल और बसंत

बागन में आम, जंगलन में नीम बौरायो है,
खेतन में धान्य, बेल-लतान में बसंत बगुरायो है,
भौरन-कीट-पतंगन को पराग-गंध अकुलायो है,
अरे, बूढ़े सेमल, हाय, तू काहे फगुनायो है?

कोयल पंछी कुहुक पड़े हैं, ज्यों नवसंदेसो आयो है,
निम्ब-जमीर नवांकुर लेकर नवचेतन हर्षायो है,
धरती सारी है इठलाती, यौवन खूब सजायो है,
अरे, बूढ़े सेमल ! हाय, तू काहे फगुनायो है?

बातन में मस्ती, खेलन में होरी को रंग बरसायो है,
कोई कहे राधा, कोई कहे कन्हैया आयो है,
रति-रंग तरंग चहुँ ओर चौपायों तक में छायो है,
अरे, बूढ़े सेमल, हाय, तू काहे फगुनायो है?

नहि कलरव- संगीत सगुन, ऐसो कैसो भायो है,
मन ही मन तू हर्षाय रह्यो, कौन मीत बनायो है?
पत्र-विहीनं, पलितं-मुंडम, जर्जर वेष बनायो है,
अरे, बूढ़े सेमल, हाय, तू काहे फगुनायो है?
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सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

हकीम परसादी खां

परसादी खां के दादा लड्डू खां कभी रामपुर रियासत  के खिदमतगारों में शामिल थे. उन्होंने वहीं हकीम हाशिम अली से जर्राही का काम सीख लिया और अधेड़ उम्र में आगरा के ताज इलाके में आकर रहने लगे. घर के बरामदे में बैठक कर ली. दो चार नुस्खे भी याद थे सो गरीब-गुरबा आकर मामूली सी फीस देकर चोट पटक पर पट्टी या फोड़ा-फुंसी पर पुलटिस बंधवा कर अपना ईलाज करवा लेते थे. लड्डू खां ने अपने साहबजादे बाबू खां को दिल्ली के नामी हकीम अजमल खां की खिदमत में यह कह कर भेजा कि “बेटा, उस्ताद से तालीम हासिल करके आओ. आगे ज़माना कीमियागिरी का आने वाला है.”

हकीम अजमल खां साहब का उस जमाने में बड़ा नाम था. उनके पास बीसियों आदमी तो दवाएँ कूटने पीसने का काम करते रहते थे. बाबू खां जितना देख सके सीखते रहे. पाँच साल बाद आगरा लौटे और कायदे से अपनी हिकमत की दुकान खोल ली.

दिल्ली में रहते हुए उन्होंने एक खास बात जो सीखी वह थी कि अपने फन का व्यापारिक प्रचार होना चाहिए. उन्होंने खानदानी दवाखाने वालों के पूरे कारोबारी रहस्यों के बारे में देखा-सुना भी था. अपने ‘हाशमी दवाखाने’ के प्रचार के लिए चार पेन्टरों को चार दिशाओं में खूब पैसा देकर दीवारों पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखने को भेज दिया. इसका व्यापक असर होना ही था. देखते ही देखते दवाखाने की जगह कम पड़ने लगी. उन्होंने बड़े मन से नई जमीन पर बड़ा सा दवाखाना बनवा लिया. अल्लाह के करम से हाथ में शफा था और खूब दौलत बरसने लगी. उनके पाँच बेटे थे जो छुटपन से ही अब्बा के काम में हाथ बँटाते बँटाते काम भी सीखते गए. बड़े बेटे परसादी खां को तिब्बी-यूनानी चिकित्सा पद्धति की पढ़ाई के लिए दक्षिण हैदराबाद भेज दिया, जो बाद में अब्बा के कारोबार के खास वारिस बन कर उभरे. उनके दो छोटे भाई तो अलग कारोबार करने के लिए आगरा से बाहर निकल गए. हकीम इस्माइल खां टूंडला में बस गए और हकीम जफर खां अपने ससुराल अमरोहा में जाकर कारोबार करने लगे.

यों दादा से पोतों तक आते आते परिवार के कुल सदस्यों की तादाद बढ़ते बढ़ते एक सौ के पार हो चुकी है. बड़े बुजुर्ग इंतकाल भी फरमाते रहे, पर परसादी खां १०५ की पकी उम्र में भी बिना लाठी के सहारे सीधे सीधे चल लेते थे. लम्बी सफ़ेद दाढ़ी, सफ़ेद ही पगड़ी, गोल मोटा चश्मा, और रौबीली आवाज उनकी अलग ही पहचान थी. हाँ, अब उनको सुनाए नहीं देता था क्योंकि कान जवाब दे गए थे.

अल्लाह के फजल से परसादी खान के बेटे, पोते, परपोते सब खुशहाल हो गए थे. भाइयों की औलादें भी बहुत आगे बढ़ गयी. खानदान के बच्चे अलीगढ़ युनिवर्सिटी से पढ़ाई करके बड़े सरकारी ओहदों में पहुँच गए हैं. सभी छोटे-बड़े, बड़े दादा का खूब अदब मी करते रहे हैं.

अब इस उम्र में हकीम साहब शारीरिक रूप से लगभग स्वस्थ होने के बावजूद मानसिक रूप से बीमार से हो गए थे. कारण दोनों बेगमें बरसों पहले गुजर गयी थी, दो बेटे भी एक एक करके हार्ट अटैक से जाते रहे, उन्होंने ईलाज का वक्त ही नहीं दिया. दुनिया को कभी केवल राख या चूल्हे की मिट्टी से शफा देने वाले भरोसेमंद हकीम साहब अपने अजीज बेटों को बचाने में बहुत लाचार रहे. अब अल्लाह के नाम के मनके फेरते रहते थे और दिन में कई बार कह उठाते थे, “या परवरदिगार, अब तो मुझे भी उठा ले,” पर अल्लाह को सुनने की फुर्सत कहाँ थी. परसादी खां पड़े पड़े बचपन से आज तक की तमाम घटनाओं को सिनेमा की चालू रील की तरह आँखें बन्द करके देखा करते थे. दादा-दादियों, बीबियों-बेटों, चाचा-चाचियों, भतीजों, व परिवार के जो लोग इंतकाल फरमाते गए सबको अपने हाथों मिट्टी देते रहे. उनके लिए फातिहा पढ़ते रहे. यह सोच कर कि यही इस संसार का दस्तूर है, गमगीन होते थे. उनसे कम उम्र के भाई-बंधु व उनके बच्चे भी एक एक करके चले गए. उनके खुद के चौदह बच्चों में से अब केवल पाँच ही ज़िंदा बचे हैं. अपने दोनों अजीज बेटों को याद करके उनकी गुफा सी बन गयी, आँखें डबडबा कर भर आती थी.

आज सुबह हकीम साहब ने अपने परपोते डॉक्टर अजीम को बुलाकर कहा, “गाड़ी में कब्रिस्तान तक घुमा कर ले आ बेटे, मुझे अपने अजीजों का आरामगाह देखने को मन हो रहा है.” डाक्टर अजीम ने अपनी होंडा सिटी निकाली, परदादा को धीरे धीरे हाथ थाम कर गाड़ी तक ले गया. वे आज बड़ी मुश्किल से गाड़ी तक चल पाए. पिछली सीट पर दादा को बिठा कर उसने गाड़ी शुरू की. सारे रास्ते बहुत भीड़भाड़ थी. जब वह कब्रिस्तान के गेट पर पहुँचा तो चौकीदार हॉर्न सुनकर भी नहीं पहुँचा तो डॉ. अजीम खुद बाहर निकला. गेट की तरफ बढ़ने से पहले उसने दादा को निहारा तो पाया वे निढाल पड़े हुए थे. उसने उन्हें हिलाया दुलाया पर वे तो निष्प्राण से लुढ़क गए. डॉ. अजीम उनको सीधे मेडिकल कॉलेज ले गया, जहाँ जाँच करने पर घोषित कर दिया गया कि हकीम साहब खुदा को प्यारे हो चुके हैं. इस तरह एक युग का अंत हो गया.
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शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

चुहुल - ४३

(१)
एक वकील साहब ने अपना नया कार्यालय खोला. वैसे उनका धन्धा ठीक चल नहीं रहा था. एक दिन जब वे फुरसत में अपने कार्यालय में बैठे थे तो उनको एक आदमी अपनी तरफ आते हुए दिखाई दिया. उसके नजदीक आते ही उन्होंने उसको प्रभावित करने के लिए टेलीफोन उठाया और झूठ-मूठ बतियाने लगे, “हाँ भई, तुम अपने पिता जी को बोल दो कि आपके केस में जीत हो गयी है. मैं आज तक कोई केस हारा ही नहीं हूँ.”
उसके बाद रिसीवर रख कर उस आदमी से बोले, “मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?”
आगंतुक बोला, “मैं बी.एस.एन.एल. का लाइनमैन हूँ. आपका फोन कनेक्ट करने आया हूँ.”

(२)
एक बड़े परिवार में बर्तन साफ़ करने वाली महरी का पहला दिन था. घंटा भर प्लेटें साफ़ करती रही फिर भी जूठी प्लेटें अन्दर से आती रही तो उसने अपने हाथ धो कर मालकिन से कहा, “मैं आपके यहाँ का काम नहीं कर सकती क्योंकि यहाँ जूठी प्लेटें पड़ी पड़ी बच्चे दिये जा रही हैं.”

(३)
एक पत्नी अपने पति से कहती है, “बेटी जवान हो गयी है, पर आपको उसकी शादी की कोई चिंता ही नहीं है.”
पति बोला “चिंता क्यों नहीं है, सब तरफ ढूंढ रहा हूँ पर कोई कायदे का लड़का मिले तब ना. जो मिलते हैं सब गधे हैं.”
पत्नी असंतोषी स्वर में बोली, “मेरे पिता जी भी ऐसा ही सोचते तो मैं अभी तक कुंवारी ही रह जाती.”

(४)
एक बस में किसी स्टॉप पर पुलिस के एस.पी. साहब चढ़े. अन्दर सामने सीट पर एक पुलिस का सिपाही पहले से बैठा था. साहब को आते देखकर खड़ा हो गया. एस.पी. साहब ने उसे बैठ जाने को कहा. खुद खड़े ही रहे. अगले स्टॉप पर जब सिपाही फिर खड़ा होने लगा तो उन्होंने जोर से कहा, “तुम बैठे रहो भाई.” तीसरे स्टॉप पर सिपाही नहीं माना और खड़ा हो ही गया तो साहब ने इशारे से बैठने को कहा. इस पर सिपाही बोला, “सर, मेरा घर दो स्टॉप पीछे छूट गया है, अब तो मुझे उतरने दीजिए.”

(५) 
नैनो तकनीक पर अपने देश की उपलब्धियों पर चर्चा कर रहे अमेरिका, रूस, और चीन देशों के तीन वैज्ञानिक बैठे थे.
अमरीकी बोला, “हमने बाल से भी बारीक सुई बनाने का कमाल हासिल कर लिया है.”
रशियन बोला, “हमको उसमें भी छेद करना आ गया है.”
चीनी बोला, “हमने उस पर ‘मेड इन चाइना’ लिख दिया है.
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