बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

ठलुआ पंचायत - १

यों तो मेरी ठलुआ पंचायत में लगभग २५ स्थाई सदस्य हैं, पर इनमें मुखर पञ्च दस-बारह ही हैं, जो प्रतिदिन दूर जंगलात की सड़क पर घूमने जाया करते हैं. बस्ती के बीच चबूतरे-चौपाल पर बैठ कर, गप्प हांकने और देश-दुनिया के गंभीर सामाजिक व राजनैतिक मुद्दों पर बहस/राय प्रकट करना अपना अधिकार समझते हैं. सभी ठलुवे अपने अपने पेशे से रिटायर्ड हैं/ पेंशनर हैं/ पारिवारिक जिम्मेदारियों से लगभग मुक्त हो चुके हैं. ये सभी नियमित रूप से अखबार पढ़ते हैं, टेलीविजन देखते-सुनते हैं, यानि मानसिक तौर पर सक्रिय रहते हैं.

मेरा गाँव, गौजाजाली (गुंजा-झाली का अपभ्रंश है. कभी यहाँ पर ‘गुंजा’ की झाडियाँ हुआ करती थी), हल्द्वानी शहर के दक्षिण में बरेली रोड पर बसा हुआ है, जिसे अब जल्दी ही नगर निगम लील जाने वाला है.

इन सभी वृद्ध सुविधाभोगी लोगों को सक्रिय बनाए रखने की शुरुआत मैंने बारह साल पहले खुद अपने से की थी. मानसिक विलासिता के लिए कला, साहित्य और संगीत तीनों विधाओं का आनन्द लेते हुए रिटायर्ड लाइफ को टायर्ड लाइफ नहीं बनने देने की मेरी सोच व प्रयास काम कर गयी. अब ये मित्र मंडली पंचायत का रूप ले चुकी है और सूत्रधार होने के नाते मैं इसका अघोषित सभापति/अध्यक्ष भी माना जाता हूँ. निस्वार्थ चैरिटेबल कार्य-कलापों की वजह से हमारी ये पंचायत चर्चा में रहती है और हम बहुत आनंदित रहते हैं.

अभी तक सब लोग इसे टाइम-पास साधन भी समझते रहे हैं और कार्यकलापों व चर्चाओं की कोई दैनन्दिनी-रिकार्ड नहीं रखा गया, पर अब यह विचार स्वीकार हो गया कि एक मिनिट्स बुक में हर बैठक की कार्यवाही दर्ज की जाये.

इन ठलुआ साथियों का मैं सर्वप्रथम मुक्तसर में परिचय कराना चाहता हूँ.ताकि आगे कार्यवाही रजिस्टर में हर बार लम्बे नाम ना लिख कर इनका सर्वनाम ठलुआ नम्बर लिखना आसान रहे:

न. १- मैं स्वयं, पुरुषोत्तम पाण्डेय. हिन्दी साहित्य में खद्योत सम, आयुर्वेद रत्न, पूर्व में ट्रेड यूनियन लीडर, अब ब्लॉगर.

न. २- रमेशचन्द्र पाण्डेय. इंटर कॉलेज के रिटायर्ड प्रिंसिपल, कर्मकांडी पण्डित, ब्लॉगर्स की रचनाओं को नियमित खंगालने वाले समदर्शी.

न. ३- गोविन्द तिवारी. रेलवे के सिग्नलिग़ डिपार्टमेंट से रिटायर्ड इंजीनियर, भाजपा के कट्टर समर्थक.

न. ४- यू.एन.सिंह. रिटायर्ड बैंक मैनेजर, राजनैतिक विश्लेषक, कॉग्रेस पार्टी के निंदक.

न. ५- डी.सी. पन्त. रिटायर्ड बैंक मैनेजर, रामदेव बाबा के कट्टर समर्थक.

न. ६- नवीन पाण्डेय, रिटायर्ड-फिजिक्स लेक्चरर, भगवान नाम की कोई आस्था नहीं, उर्दू की शायरी से लगाव.

न. ७- पूरन तिवारी. रेलवे से रिटायर्ड इंजीनियर, साहित्यिक अभिरुचि.

न. ८- सुरेश भंडारी. फल-सब्जी के बड़े आढ़तिये, भाजपा के आलोचक, कॉग्रेस के पक्के समर्थक.

न. ९- पूरन पांडे. रिटायर्ड हार्टीकल्चर सुपरवाइजर, सभी बहसों में नकारात्मक-निराशात्मक वाणी.

न. १०- भुवन तिवारी. रिटायर्ड आर्मी सूबेदार, एक घंटा पीटी-परेड. खाओ-पीओ और ऐश करो का सन्देश.

न. ११- टीकाराम देवराड़ी. रिटायर्ड आर्मी सूबेदार, हर वक्त व्यस्त, अलमस्त.

न. १२- गोविन्द वल्लभ जोशी. रिटायर्ड अकाउंट्स ऑफिसर, व्यवस्थाओं से सर्वथा असंतुष्ट.

यह लिस्ट इस प्रकार लम्बी है. फिलहाल अब पहली मीटिंग की बहस रिपोर्ट निम्न है:

न. ४- पता नहीं लोग मोदी को क्यों नहीं पचा पा रहे हैं? वे आज देश के सबसे लोकप्रिय नेता उभर कर आये हैं.

न. ८- लोकप्रियता का आपका क्या मापदंड है?

न. ४- अखबारों के सर्वे से पता चलता रहा है. उनको हिन्दू ह्रदय सम्राट कहा जा रहा है, अब तो मुसलमान भी टोपी पहनाने आ रहे हैं.

न. ८- उनका अन्दुरूनी विरोध तो खुद उनकी पार्टी के दिग्गज नेता कर रहे हैं. यह सर्व विदित है कि वह एक निरंकुश फासिस्ट की तरह व्यवहार करते हैं. और अभी तो दिल्ली बहुत दूर है. जूट ना कपास, यों ही लठमलट्ठा किये जा रहे हैं.

न. ९- कोई भी आये-जीते भैया, भेड़ पर ऊन कोई छोड़ने वाला नहीं है.

न. ७- मैं कई समकालीन हिन्दी में लिखे ब्लॉग्स को इंटरनेट पर पढ़ता हूँ. आजकल सभी लेखक वर्तमान सत्ता के खिलाफ लिख रहे हैं. काँग्रेस की छवि तो घोटालों और महंगाई ने खराब कर रखी है. एक ब्लॉगर शर्मा जी जो ‘राम राम भाई’ और 'सेहत नामा' शीर्षक से लिखते हैं, बहुत कटु शब्दों में कॉग्रेस के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए हैं.

न. २- वे तो बाबा रामदेव की तरह विटामिन की गोलियों में राजनीति का पलेथन लगा कर मरीजों को दे रहे हैं.

न. ७- पाण्डेय जी, आपके ‘जाले’ में बैठे-ठाले, कटु सत्य, सामयिकी में आपने भी तो बहुत कटु शब्दबाण छोड़े हैं. आलोचनात्मक भाषा का प्रयोग अतिशय किया है.

न. १- मैं राजनीति पर सीधे सीधे नहीं लिखता हूँ, पर जो महसूस होता है, उस पर कलम अपने आप चल पड़ती  है. मेरा तो ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ वाला हिसाब है.

न. ५- ऐसे कैसे चलेगा, आप निरपेक्ष होकर अन्याय करना चाहते हैं?

न. १- बिलकुल विमुक्त कैसे रहा जा सकता है, पर जब सब तरफ भ्रष्टाचार-अनाचार हो किसी का समर्थन कैसे किया जा सकता है.

न. ६- केजरीवाल के बारे में आपके विचार क्या हैं?

न. १- वो तो नक्कारखाने में तूती के सामान है, पर मैं सिद्धांत रूप से उनकी मुहिम के खिलाफ नहीं हूँ. रही उनकी सफलता की बात, तो वर्तमान संवैधानिक व्यवस्थाओं यह बिलकुल असंभव है. अगले चुनाव के बाद ये अस्त सा हो जाएगा.

न. ४- कांग्रेसी लोग धक्का लगाकर राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ ले जा रहे हैं, क्या आपको नहीं लगता है कि मोदी के व्यक्तित्व के सामने वह बहुत हल्का लगता है?

न. ६- अरे, मोदी से उसको क्यों तोलते हो? राहुल उसके सामने बच्चा लगता है क्योंकि वह धूर्त नहीं है. आज की राजनीति धूर्तता का दूसरा नाम है. इसलिए आगे चल पायेगा इसमें भी संदेह होगा.

न. ८- ये बात आपने बिलकुल सत्य कही है. अब देखिये चुनाव होने तक देश का माहौल क्या बनता है, कौन जानता है. अभी अभी 'द हिन्दू' अखबार में प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष जस्टिस काटजू ने जो बयान व अपील मोदी के खिलाफ दिया है उसमें उनको हिटलर जैसा खतरनाक बताया है: पर मैं कहे देता हूँ कि नए समीकरण बनेंगे, कॉग्रेस समर्थित बहुमत होने पर राहुल को कमान जरूर दे दी जायेगी? ये भी अभी प्रश्नवाचक है.

न. १- हम सब को आशावान रहना चाहिए, देश में भविष्य के बारे में आज जो मन्थन चल रहा है उसका अंजाम सही रहेगा.

आज की बहस का यहीं समापन किया जा रहा है.
***

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

दूध की कीमत

सत्यनारायण शर्मा के दिवंगत होते ही परिवार की सत्ता बड़े बेटे डॉ. रामदत्त शर्मा के पास आ गयी. बेटे की धारणा थी कि पिता जी की पगड़ी उसे पहना दी गयी है इसलिए घर पर सारे आदेश उसी के क्रियान्वित होंगे. उसने बचपन से ही देखा था कि पिता जी किस हेकड़ी के साथ रहते थे और हर बात में अपनी ही चलाते थे, लेकिन उसने कभी यह नहीं देखा कि माँ लाजवंती उनके मनमाने व्यवहार पर कह कुछ नहीं पाती थी, अन्दर ही अन्दर कुढ़ती-उबलती रहती थी. अब बाप के मरते ही बेटा भी उसी अंदाज में आँखें तरेर कर बात करने लगा तो उसके अन्दर छुपी हुई नारीशक्ति विद्रोह करने लगी.

शर्मा परिवार मूल रूप से पुराने आगरा शहर के लोहा मंडी इलाके के रहने वाले थे. वहाँ उनका एक पुश्तैनी मकान भी है, जो अब जर्जर हालत में है. सत्यनारायण अपनी जाति जांगिड ब्राह्मण बताते थे, पर उनका खानदानी पेशा खाती (लकड़ी की कारीगरी) रहा है. राजस्थान के सवाईमाधोपुर में डालमिया सेठ के दामाद का एक बड़ा सीमेंट का कारखाना था तो वहाँ आकर नौकर हो गए. जिंदगी ने एक रफ्तार पकड़ ली. कॉलोनी में एक कमरे वाला क्वार्टर भी मिल गया. इसी घर में लाजवंती ने पहले रामदत्त को जन्म दिया और उसके लगभग पन्द्रह सालों के बाद विजयप्रकाश का जन्म हुआ.

लाजवंती अनपढ़ होने के बावजूद एक संजीदा गृहणी थी, कॉलोनी की महिलाओं में आदरणीय थी क्योंकि उसमें गाना-बजाना, नाचना व कौतुक करने के कई गुण थे. सभी शुभ अवसरों पर उसकी उपस्थिति याद की जाती थी. पति सत्यनारायण स्वभाव से टेढ़ा व रूखा होने के कारण कभी कभी उसे मन मसोस कर रहना पड़ता था, पर इसे भाग्य की विडम्बना समझ कर आम भारतीय स्त्री की तरह सहती जाती थी.

रामदत्त को बड़े प्यार-दुलार व आशाओं के साथ बड़ा किया. वह ठीक ही पढ़ रहा था. इंटर करने के बाद उसे जयपुर के एस.एम.एस. मेडिकल कॉलेज में प्रवेश भी मिल गया. तब पी.एम.टी. की परीक्षा नहीं होती थी. माँ तो माँ होती है, बहुत खुश हो गयी कि बेटा डॉक्टर बनेगा. मिलने जुलने वालों की बधाइयाँ स्वीकार करती और अपने आप पर गौरव करती थी. सत्यनारायण की बात और थी, वह अपने स्वाभव व औकात के अनुसार ओछेपन पर आ गया क्योंकि उसकी बराबरी के कर्मचारियों में से किसी का बेटा अब तक M.B.B.S. डॉक्टर नहीं बन सका था. यह सही था कि एक साधारण परिवार का सपना सच हो रहा था.

पढ़ाई व इंटर्नशिप पूरी होने के बाद, सवाईमाधोपुर के सीमेंट मैनेजमेंट ने डॉ. रामदत्त शर्मा को कारखाने के अस्पताल में बतौर मेडिकल ऑफिसर की नियुक्ति भी दे दी. बड़ा घर मिल गया, अब परिवार बड़े लोगों का परिवार हो गया. डॉक्टर की शादी कर दी गयी. बहू आगरा से ही सजातीय व पढ़ी-लिखी लाई गयी.

सत्यनारायण शर्मा अपने रिटायरमेंट के करीब थे. एक दिन ड्यूटी से घर लौटते समय उनकी साइकिल को एक ट्रैक्टर वाला टक्कर मार गया और उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गयी. इससे परिवार के सभी समीकरण बदल गए. बेटा हाकिमों की तरह व्यवहार करने लगा तो बहू मालकिन की तरह बोलने लगी. नतीजन सास-बहू में तकरार होने लगी.
इसी बीच जब अपने प्रबंधन की कमजोरियों के कारण कारखाना बंदी के कगार पर आ गया तो डॉ.रामदत्त नौकरी छोड़ कर अपनी पत्नी सहित विदेश (ओमान) चला गया. भाई विजय तब पढ़ ही रहा था. लाजवंती विजय को साथ लेकर कोटा शहर में आकर रहने लगी. पति की ग्रेच्युटी-फंड से महावीर नगर में एक जमीन का प्लाट खरीद लिया. उस पर एक छोटा सा घर बनवाने लगी. हिम्मत इस बात से भी थी कि बड़ा बेटा खाड़ी देश में रह कर खूब रूपये कमा रहा था और वक्त-बेवक्त रूपये भेज भी रहा था.

विजयप्रकाश ने जब बी.ए. कर लिया तो कोटा में ही एक कारखाने में स्थाई क्लर्क की नौकरी भी मिल गयी.

आठ साल तक ओमान में काम करने के बाद जब डॉ. रामदत्त शर्मा कोटा लौटा तो अपनी माँ से अपने भेजे रुपयों का हिसाब माँगने लगा. बुढ़िया लाजवंती को उससे ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी उसने एक ही वाक्य में बेटे को निरुत्तर कर दिया, “तू पहले, मेरे उस छाती के दूध की कीमत अदा कर जो मैंने तुझे पिलाया था.” बहरहाल जब आदमी पर स्वार्थ हावी होता है तो सारे तर्क बेमानी हो जाते हैं. बेटा पूरी तरह बहू के कहने पर था. प्रकृति से भी स्वार्थी व उजड्ड था बोला, “दूध तो सभी माएं अपने बच्चों को पिलाती हैं. यह मकान मेरे रुपयों से बना है, इसे खाली कर दो. मैं इसमें अपनी क्लीनिक चलाऊंगा.”
झगड़ा, मनमुटाव बढ़ता गया. ऐसा नहीं था कि डॉक्टर के पास रुपयों की कमी थी या वह दूसरा मकान नहीं खरीद सकता था, पर हेकड़ी और स्वार्थ ने उसे अन्धा बना दिया था. वह माँ तथा भाई प्रति अपने सारे कर्तव्य भूल गया. स्थिति यहाँ तक बिगड़ गयी कि वह अपने छोटे भाई विजय के विवाहोत्सव में भी शामिल नहीं हुआ.

कुछ परिचीतों/मित्रों के बीच में आने के बाद समझौता हुआ कि डॉक्टर निचली मंजिल पर अपनी क्लीनिक की जगह लेगा, शेष में माँ व विजय का परिवार रहेगा. डॉक्टर अपने रिहाइश के लिए घर के ऊपर दूसरी मंजिल बनाएगा. मकान बन भी गया, डॉक्टर अपनी ऐंठ व ठाट-बात से रहता रहा, पर हँसते खेलते रहने वाली बूढ़ी माँ एकदम मानसिक तनाव में रहने लगी. डॉक्टर व उसके परिवार से बात तक नहीं करती थी. बाद बाद में तो उसका मानसिक संतुलन बहुत बिगड़ गया. वह जोर जोर से प्रलाप करती थी. डॉक्टर व उसकी बहू के लिए अपशब्द प्रयोग करने लगी थी. जब उसकी मृत्यु हुई तो उसके निर्देशानुसार डॉक्टर को अपनी माँ को मुखाग्नि नहीं देने दी गयी.

इस धटनाक्रम को बीते ज्यादा समय नहीं हुआ है. अब कहा जा रहा है कि माँ भूतनी बन कर डॉक्टर के परिवार को परेशान किया करती है. डॉक्टर के बच्चे बार बार फेल हो रहे हैं, घर में एक बार बड़ी चोरी भी हो चुकी है, क्लीनिक पर मरीज आने लगभग बन्द हो गए हैं, और डॉक्टर की श्रीमती के शरीर में ल्यूकोडर्मा उभरने लगा है. इस प्रकार मन में आशंकाएं व डर घर कर गयी हैं कि इस सब के पीछे माँ की बददुआएं ही हैं. अत: माँ की आत्मा की शान्ति के लिए तथा प्रेतात्मा के मोक्ष के लिए डॉक्टर रामदत्त शर्मा ज्योतिषियों व पंडितों की सलाह पर एक बड़ा अनुष्ठान करने जा रहे है. उनको याद है कि एक बार माँ ने अपनी छाती के दूध की कीमत चुकाने को कहा था जिसे अब चुकाना एक मजबूरी हो गयी है.
***

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

चुहुल - ४४

(१)
एक व्यक्ति किसी कार्यवश दूसरे शहर गया. उसको बहुत खुशी हुई कि होटल के जिस कमरे में उसे ठहराया गया उसमें कम्प्युटर भी था और इंटरनेट से ई-मेल की सुविधा भी थी. उसने झट अपनी पत्नी को मेल लिख भेजा, पर एड्रेस में मामूली गलती से वह अन्यत्र चला गया.

जिस महिला के पास वह मेल पहुँचा वह अभी अभी अपने दिवंगत पति को कब्रिस्तान में दफ़न करके घर लौटी थी. मित्र-रिश्तेदारों की संवेदनाएं देखने के लिए जब उसने मेल खोल कर पढ़ा तो बेहोश होकर गिर पडी. परिवार वालों ने जब देखा तो पाया कि इनबॉक्स में मैसेज था, "मैं ठीक-ठाक पहुँच गया हूँ. खुशी की बात यह है कि तुम भी कल शाम तक यहाँ पहुँच जाओगी, मैं बेसब्री से इन्तजार करूँगा."

(२)
एक अमीर व्यक्ति अपने घर के सभी समारोहों को बड़ी भव्यता से यानि दिल खोलकर रूपये खर्च करके किया करते थे. वे जब एक दिन मर गए तो उनके परिवार वालों ने उसी अंदाज में शवयात्रा भी भव्यता यानि बैंडबाजे के साथ सिक्के उछालते हुए निकाली.

उनका प्यारा साला भावुक होकर बोला, “आज अगर जीजाजी ज़िंदा होते तो अपनी अन्तिम यात्रा देखकर कितने खुश होते.”

(३)
जियाउद्दीन अपने १५ बच्चों को जिराफ दिखाने के लिए चिड़ियाघर ले गया. उसके बच्चों ने कभी जिराफ नहीं देखा था. चिड़ियाघर के सुपरवाइजर से जियाउद्दीन ने कहा, “भाई, हमें जिराफ देखना है.”

बच्चों की इतनी बड़ी फ़ौज देखकर हैरान होते हुए सुपरवाइजर ने पूछ लिया, “क्या ये सभी बच्चे तुम्हारे ही हैं?”

जियाउद्दीइन ने बड़े गर्व से कहा, “हाँ सभी मेरे ही हैं.”

इस पर सुपरवाइजर बोला, “वाह, तब तो तुम यहीं ठहरो. मैं जिराफ को यहीं बुला लेता हूँ ताकि वह तुमको देख ले.”

(४)
पुलिस इंस्पेक्टर ने एक औरत से पूछा, “जिस गाड़ी ने आपको टक्कर मारी उसका रंग कैसा था और उसका नम्बर क्या था?”

वह औरत बोली, “मैं गाड़ी का रंग और नम्बर तो नहीं बता सकती, पर उसे एक औरत चला रही थी जिसकी साड़ी पर लाल जरी का बोर्डर था, कानों में मोती के झुमके थे और गले में सोने का लाकेट था.”

(५)
एक जगह पार्टी चल रही थी. बहुत से आदमी और औरतें आये हुए थे.

एक आदमी अपने बगल वाले से बोला, “भाई साहब देखिये, वो सामने वाली टेबल पर जो औरत बैठी है, वह गजब है. पहले तो मेरी तरफ मुस्कुराकर देख रही थी और आँखों से इशारे भी कर रही थी, और अब ऐसे देख रही है मानो कच्चा चबाकर खा जायेगी.
बगल वाला बोला, “इसका मिजाज हर मिनट में इसी तरह बदलता रहता है.”

उसने पूछा, “क्या आप उसको जानते हैं?”

बगलवाले ने कहा, “हाँ, खूब अच्छी तरह, वो मेरी बीवी है.”
***

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

सत्य कभी नष्ट नहीं होता

किसी प्राणी के उत्तक से हूबहू दूसरा प्राणी पैदा करने की तकनीक तो कुछ वर्षों पहले वैज्ञानिकों ने खोज निकाली है. जानवरों पर इस विधि का प्रयोग करके क्लोन बनाये गए हैं, पर प्रकृति के नियमों में अनादि काल से एक सी सूरत व गुण वाले कीट-पतंगों से लेकर जानवरों/प्राणियों में यह क्रम चलता आ रहा है. हाँ, बिना बीज के ही केवल उत्तक से ‘नया’ पैदा करना आश्चर्यजनक लगता है. यह भी हॉर्मोन्स का कमाल कहा जाता है कि बिना मुर्गे के संसर्ग के मुर्गियाँ अण्डे दिये जाती हैं. वैसे प्रकृति की बहुत सी अजूबी चीजें अभी तक हमारी समझ से परे हैं.श्रृष्टि के विकास के क्रम को जब हम देखते हैं तो बताया जाता है कि प्राणियों का उद्भव अमीबा से हुआ और अमीबा ऐसा प्राणी है जो विभाजित होकर कई गुणकों में बढ़ता रहता है.

कई लोग मनुष्य का क्लोन बनाने के विरुद्ध हैं. इसके लिए अनेक नैतिक व धार्मिक कारण दिए जाते हैं. लेकिन विज्ञान को इससे क्या मतलब? वह तो निरंतर सत्य की खोज करता रहता है, जो किसी न किसी रूप में फलदाई होती है. अब देखिये जीन्स व डी.एन.ए. के बारे में पहले लोग सोच भी नहीं सकते थे, पर अब पहचान के लिए व्यक्ति विशेष के डी.एन.ए. असाधारण रूप से काम में आ रहे हैं. जैववैज्ञानिक समाचारों में यह भी प्रकाशित हो रहा है कि जीन्स में छेड़छाड़ करके वंशानुगत बीमारियों को दूर किया जा सकता है.

दुनिया की प्राचीन-पौराणिक कथाओं की परिकल्पनाएं भी बहुत मजेदार होती हैं. हमारे धर्म की रामकथा में जब अहिरावण द्वारा राम और लक्ष्मण का अपहरण करके पाताललोक में छुपाया गया, तब ब्रह्मचारी हनुमान जी उनको लेने वहाँ पहुंचे. उनको अपने ही पुत्र से युद्ध करना पड़ा, जो कि वहाँ पर द्वारपाल नियुक्त था. वह हनुमान जी का डुप्लीकेट था. उसकी उत्पत्ति के बारे मे गल्प है कि जब हनुमान जी सीता की खोज में लंका जा रहे थे तो समुद्र लांघते समय उनके शरीर से जो पसीने की बूँद गिरी वह किसी प्राणी द्वारा अपने शरीर में संरक्षित की गयी. इस प्रकार के गल्पों को हम सीधे सीधे नकारना चाहें तो भी इनका उल्लेख कहीं न कहीं मिल जाता है.
अब जीव विज्ञान भी जिस तरह से रोज नए चमत्कार बता रहा है, आगे आने वाले पाँच सौ/हजार वर्षों में क्या गुल खिलाएगा, उसकी कल्पना आज हम नहीं कर सकते हैं.

कुछ लोग यह अंदेशा जाहिर करते हैं कि जिस तरह से दुनिया में आणविक हथियारों के नए नए संस्करण पैदा किये जा रहे हैं, मानव सभ्यता एक दिन अवश्य नष्ट हो जायेगी.

प्रसिद्द वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन से जब यह पूछा गया कि तीसरा विश्वयुद्ध कैसे लड़ा जायेगा तो उन्होंने कहा,"तीसरे का तो पता नहीं, पर चौथा विश्वयुद्ध लकडियों और पत्थरों से लड़ा जाएगा." यानि सब कुछ खत्म हो जाएगा और मनुष्य जाति फिर नए सिरे से मनु-शतरूपा की तरह नई रचना में व्यस्त हो जायेगी.

मैं तो यह मानता हूँ कि यह विषय का नकारात्मक पहलू है. अच्छी बात यह होगी कि हमारी भावी पीढियाँ कई गुना ज्यादा जिम्मेदार व समझदार होंगी. आज से ज्यादा सुविधाओं का उपभोग करेंगी. दूसरे ग्रह-मंडलों में आना जाना सरल होगा. सारा विश्व एक परिवार की तरह रहेगा. आज के इतिहास को पढ़/सुन कर अगली पीढियाँ आनंदित होंगी. खुदानाखास्ता यदि यह सभ्यता नष्ट भी हो गयी तो जगह जगह टाइम-कैप्स्यूल में संरक्षित ‘दृश्य एवँ श्रव्य’ को ढूंढ निकालेंगे. हमारे विषय में अध्ययन करेंगे क्योंकि सत्य कभी नष्ट नहीं होता है.
***

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

कर्मन की गति न्यारी

जिलाधिकारी बी.आर. तेजस्वी साहब की बैठक में कबीर का लिखा तथा अनूप जलोटा का गाया यह भजन अकसर गूंजा करता है:

कबीरा जब पैदा भये, जग हँसे हम रोये;
ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये.

यद्यपि जब तेजस्वी साहब पैदा हुए थे तब कोई हँसा नहीं था क्योंकि प्रसव-पीड़ा न सह पाने की वजह से उनकी माँ रामप्यारी अपने नाम को सार्थक करते हुए सचमुच भगवान को प्यारी हो गयी थी. बाप हरिनाथ इस दुर्घटना से पागल हो गया था और अनियंत्रित होकर कहीं चला गया. कहाँ गया, उसका आज तक पता नहीं चला. ऐसे में अनाथ बच्चे को उसके मामा-मामी ने पाला, पाला क्या, पालना पड़ा. उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी. थोड़ी सी जमीन थी जिससे गुजारा पूरा नहीं हो पाता था. इसलिए दूसरों के खेतों में मजदूरी करके काम चलाते थे.

मामा-मामी के दो जुड़वां बेटे रामू और श्यामू पहले से थे इस बच्चे का कायदे से कोई नामकरण संस्कार तो हो नहीं सका, हाँ, विपत्ति को साथ लेकर आया था इसलिए उसे 'बिपत्तू' पुकारा जाने लगा. बिपत्तू अभावों में पलकर, बड़ा होने लगा. ग्राम सभापति ने जोर देकर कहा कि “इस बच्चे को भी स्कूल भेजा करो,” सो एक दिन मामा जी उसे साथ लेकर नाम लिखाने ले गए. दुर्जनसिंह मास्टर ने बिना अपना दिमाग लगाए ही नाम लिख दिया, बिपत्ति राम. अगर वह चाहते तो उस वक्त कोई प्यारा सा, अच्छा सा नाम किसी राष्ट्र नायक या देवता के नाम पर आधारित लिख सकते थे, पर दुर्जनसिंह को अपने अटपटे नाम की शिकायत नहीं थी तो दूसरों पर करम करने की जुर्रत क्यों समझते. इस प्रकार बालक के भविष्य पर ‘बिपत्ति राम’ नाम की बुनियादी मोहर लगा दी गयी.

यह तो भला हो हाईस्कूल के प्रिंसिपल दयानिधि जी का, जिन्होंने सोचा कि भविष्य में कोई ठीक सा उपनाम पहचानसूचक रिकॉर्ड मे दर्ज कर दिया जाये. लड़का पढ़ने लिखने में बुद्धिमान और कुशाग्र था सो अपने मन से ही उन्होंने उसको ‘तेजस्वी’ बना दिया.

बिपत्ति राम तेजस्वी किसी रेगिस्तान में उगे हुए कैक्टस पर खिले सुन्दर पुष्प की तरह अपनी अलग पहचान बनाते चला गया. हायर सेकेण्डरी की बोर्ड परीक्षा में प्रथम आने पर वह सबकी नज़रों में आ गया. वजीफा भी मिलने लगा. क्षेत्रीय विधायक महोदय ने अपने इलाके के इस होनहार विद्यार्थी को सब प्रकार की सलाह व आर्थिक सहायता देकर आगे बढ़ने के लिए बहुत उत्साहित किया. जब इन्सान के अच्छे दिन आते हैं, तो सब तरफ से मार्ग खुलते चले जाते हैं.

सही सोच व अध्यवसाय की बदौलत नौजवान तेजस्वी भारतीय प्रशासनिक सेवा में भी चयनित हुए. वे अब एक आकर्षक, आदर्श व्यक्तित्व वाले अधिकारी हैं.

आजकल वे अपने मामा-मामी के घर से बहुत दूर जरूर हैं, पर दिल से बहुत नजदीक हैं. अपने पर किये उनके जीवनदायी अहसानों को वे याद करते रहते हैं. खुद को वे उनका तीसरा बेटा कहलाना पसन्द करते हैं और पारिवारिक हितों की पूरी तरह देखरेख करते हैं. उधर रामू और श्यामू दोनों ही पढ़ाई में फिसड्डी रहे. अत: आगे नहीं बढ़ सके. अब मामा जी की पहचान उनके भानजे बी.आर. तेजस्वी के नाम से होने लगी है. उसी की वजह से वे पूरे गाँव-इलाके में सम्माननीय हो गए हैं.

सार्वजनिक जीवन में भी तेजस्वी जी का दृष्टिकोण आम प्रशासनिक अधिकारियों से भिन्न है. फालतू दिखावे से दूर गरीब अनाथों के लिए वे सदैव चिंतित रहते हैं.

जब हम भाग्य और कर्मों के बारे में बात करते हैं तो परमात्मा की अदृश्य व्यवस्थाओं पर विश्वास करना पड़ता है.
***