मंगलवार, 11 जून 2013

चक्की का आटा

गोपू उर्फ गोपालकृष्ण सेंट जेवियर में सेवन्थ स्टेंडर्ड में पढ़ता है. आज जब वह स्कूल बस से उतर कर घर की तरफ चला तो पीछे से एक औरत ने अपने साथ चलने वाली दूसरी औरत से कहा, “ये मोटू किस चक्की का आटा खाता होगा?”

गोपू ने मुड़ कर उस औरत की तरफ देखा तो वे दोनों उसके डील-डौल पर हँस रही थी. गोपू को बहुत गुस्सा आया. अगर आस पास कोई डंडा होता तो वह इन चिढ़ाने वालों पर मार ही देता, पर मन मसोस कर रह गया.

दरअसल गोपू खाते-पीते घर का बच्चा है. छुटपन से ही दादी और मम्मी दोनों उसके पीछे पड़ी रहती थी कि “और खा... और खा” वजन बढ़ाने के तमाम लज़ीज़ खाने, फास्ट फूड और मिठाइयाँ बड़े प्यार व अनुग्रह के साथ परोसती थी.

जब आठ साल में ही गोपू का साइज उसके उम्र के हिसाब से दुगुना-ड्योढ़ा और वजन ७० किलोग्राम तक पहुँच गया, तब सबको उसकी चिंता सताने लगी. पापा उसे बॉम्बे हॉस्पिटल के बालरोग विशेषज्ञ डॉक्टर गोविल के पास ले गए डॉक्टर ने बताया कि गोपू के शरीर में कुछ हॉर्मोन्स के असंतुलन से मोटापा बढ़ रहा है. उन्होंने थायराइड सहित अनेक खून के जांच भी करवाए. बाद में कुछ महंगी महंगी गोलियाँ खाने को लिख दी. साथ ही उन्होंने खाने पर नियंत्रण करने की हिदायतें भी दी. इस प्रकार गोपू के भोजन पर पूरी निगरानी रखी जाने लगी. उसे भरपेट तसल्ली पूर्वक खाने को नहीं दिया जाने लगा, लेकिन गोपू भी क्या करता, भूख तो मोटे व्यक्ति को ज्यादा ही सताती है. वह चोरी छुपे अपनी तृप्ति कर लेता था .खास तौर पर डॉक्टर ने आइसक्रीम खाने को मना किया था, लेकिन आइसक्रीम में गोपू की जान बसती थी, मौक़ा मिलते ही आइसक्रीम भी खा लेता था.

मोटापे का क्या है, दुनिया की एक चौथाई आबादी मोटापे से ग्रस्त है. "सब टी.वी." पर "मेहता जी का उल्टा चश्मा" धारावाहिक में डॉ. हाथी और उनके बेटे छोटे हाथी के पात्रों को देख कर गोपू को बड़ी तसल्ली मिलती थी कि वह अकेला नहीं है. जापानी सूमो पहलवान तो अच्छी खासी कुश्ती लड़ लेते हैं. वह सोचता था, "पता नहीं दुनिया के लोगों को क्या तकलीफ है उसके ऊपर राह चलते फब्ती कस कर जाते हैं. जैसे कि उनके बाप का माल खाया हो." गोपू ने इंगलैंड के भूतपूर्व लोकप्रिय प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल के विषय में पढ़ा था. उनकी स्थूल काया की फोटो भी देखी थी. इतने बड़े महापुरुष गोलगप्पा हो सकते हैं, तो क्यों चिंता की जाये? 

पर इस मोटापे से उसे कभी कभी बहुत तकलीफ होती थी. थकान जल्दी होती थी, दम फूलने लगता था, और भूख भी बहुत लगती थी. और चौड़े चौड़े कपड़े पहनने पड़ते थे. सबसे बड़ा दुःख यह था कि देखने वाले अजूबे की तरह देखते थे, जैसे कि वह चिड़ियाघर का कोई प्राणी हो.

आज इस औरत के ‘बोल’ पर और उनकी खी-खी की हंसी ने गोपू के अन्दर तक चोट पहुंचा दी. वह घर पहुँचते ही धम्म से सोफे पर पसर गया. पापा ने उसे देखा तो पूछा, “क्या बात है बेटा, ज्यादा थकान हो गयी है क्या?”

गोपू ने गंभीरता से पापा से कहा, "पापा, ये चक्की का आटा क्या होता है? एक औरत अभी रास्ते में मेरी मजाक बना रही थी कि 'कौन सी चक्की का आटा खाता है'?"

मुम्बई महानगर के पैडर रोड इलाके में रहने वाले बच्चे ने कभी आटा चक्की देखी भी नहीं थी, और न उसे चक्की के बारे में कोई जानकारी थी. पापा गोपू की बात का मतलब समझ गए और उसको सान्त्वना देने के लिए उन्होंने एक मजेदार भाषण दे डाला, “क्या तुमको मालूम है कि आग के आविष्कार के बाद आदि मानव ने जो बड़ा महत्वपूर्ण आविष्कार किया वह ‘ह्वील’ यानि पहिया था जिसके आधार पर दूसरे तमाम छोटे-बड़े यंत्र बने और सुधरते रहे. अगर पहिये का आविष्कार नहीं होता तो आज की मशीनें कहाँ चल पाती? 

"उस जमाने में बिजली नहीं होती थी. सब काम हाथों से करना पड़ता था. अनाज पीसने के लिए पत्थरों का चाक बना जिसमें कठोर सैंडस्टोन के दो गोल पाट होते हैं. ऊपर वाले पाट के बीच में एक छेद द्वारा अनाज डाला जाता है और ऊपर की पाट को एक हैंडल से गोल घुमाया जाता है. तब आटा बाहर निकलता है. अब तो बिजली से चलने वाली चक्कियों में अनाज पीसा जाता है. हमारे देश के दूर दराज गाँवों में आज भी हाथ से घुमाई जाने वाली चक्कियां चलती हैं. पहाड़ों में पानी की धारा से फिरकनी घुमाकर ‘घराट’ चक्कियां अनाज पीसा करती थी, अब ये सिर्फ इतिहास की बातें होती जा रही हैं. आजकल बड़ी बड़ी मिलों में स्वचालित मशीनें अनाज को साफ़ करती हैं, धोती हैं, सुखाती हैं, और फिर पीस कर पैक करती हैं. वह आटा बाजार में आने के बाद हम खाया करते हैं.

"'कौन सी चक्की का आटा खाते हो?' यह तो एक मुहावरा है, जो लोग मोटे व्यक्ति को देख कर अकसर बोला करते हैं. इसमें इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है. तुम अपनी डाईट पर खुद कंट्रोल रखो. हाई कैलोरी और फैट्स वाले फास्ट फूड से बचो. खूब सलाद खाया करो, जरूरी व्यायाम किया करो. स्वस्थ रहने की दिनचर्या खुद तय करो.”

पापा ने आगे यह भी कहा, “तनाव में बिलकुल नहीं आना चाहिए. बहुत से मोटे थुलथुल लोग खुद पर ही हँस लेते है. हंसना बहुत बदी नियामत है, जिससे उनका स्नायुमंडल दुरुस्त रहता है.”

गोपू ने पापा के बातों का खूब मजा लिया और उसकी सारी परेशानी दूर हो गयी. खाने के मामले में आत्मसंयम करने की ठान कर हँसते हुए डाइनिंग टेबल पर परिवार के साथ बैठ गया, जहाँ सब लोग एक ही चक्की का आटा खा रहे थे.
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शनिवार, 8 जून 2013

रिन्कू

रिन्कू नाम है उसका. उसको अपनी जाति का पता नहीं है. उसकी माँ ने केवल यह बताया था कि उसका बाप उसके पैदा होने से पहले कहीं गायब हो गया था. 

कहानी की शुरुआत यों होती है कि बाईस साल पहले आगरा के मोहनपुरा इलाके में एक मजदूर जोड़ा, बाबू और उसकी पत्नी नट्टी, कहीं राजस्थान के देहात से आकर झोपड़ी बना कर रहने लगे. इधर उधर खुली मजदूरी करके पेट् पालते थे. बाबू को नशे की लत थी. एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन पड़ोस के एक छोकरे द्वारा चिढ़ाये जाने पर बाबू ने उसे एक जोरदार थप्पड़ दे मारा. होनहार कि वह छोकरा वहीं पर मर गया. किसी ने देखा नहीं फिर भी डर के मारे बाबू भाग खड़ा हुआ. बाद में जब लाश को लोगों ने देखा तो हो हल्ला हो गया, हुजूम इकट्ठा हो गया, पुलिस आई शक में नट्टी को पकड़ कर ले गयी. वह बेचारी ये नहीं बता सकी कि लड़के को उसने नहीं उसके पति ने थप्पड़ मारा था. सारा इल्जाम उस पर आ गया. उसे जेल भेज दिया गया. बाबू तो उसे तलाशने भी नहीं आया.

नट्टी तब सात महीने के गर्भ से थी. कुपोषण की शिकार भी थी. जब उसे अदालत मे पेश किया गया तो उसने हां या ना कुछ कहे बिना केवल सर हिलाकर अपना गुनाह कबूल कर लिया. नट्टी के लिए ये सब नया अनुभव था उसने पहली बार जाना वकील, जज और अदालत क्या होता है. उसको मन ही मन खुशी थी कि बाबू पुलिस की मार से बच गया था.

उसकी गर्भावस्था और रुग्णता को देख कर पीठासीन महिला जज महज ५००० रुपयों के जमानत-मुचलके पर छोड़ देना चाहती थी, पर जमानत देने वाला कोई नहीं था, उसे जेल भेज दिया गया. बहुत दिनों तक तक वह बाबू का इन्तजार करती रही पर वह नहीं आया ना ही उसकी कोई खोज खबर आई. लाता भी कौन? उसका इस शहर में कोई अपना नहीं था. चूँकि वह गर्भवती थी, जेल के डॉक्टर ने उसको आवश्यक दवाएं व विटामिन दिये जो शायद बाहर रहने पर उसे उपलब्ध नहीं होते.

जेल में उसकी बैरक में बहुत सी सजायाफ्ता औरतें थी. नट्टी ने जब एक हमदर्द औरत को बताया कि कुसूर तो उसके पति से हुआ था, उसे बचाने के लिए जेल में आना पड़ा तो ये बात सब तरफ फ़ैल गयी. सभी महिलाओं की हमदर्दी उसको मिलने लगी. कुछ तेज तर्रार औरतें तो उस पर दबाव बनाने लगी कि सच सच बोल कर खुद आजाद हो जाये, पर नहीं, वह सोचती है कि आज या कल उसे जेल से छोड़ दिया जाएगा वह अपने बाबू को फिर से ढूंढ लेगी. उसे ज्यादा चिंता ये लगी रहती थी कि बाबू किस हालत में होगा, अपने खाने का क्या जुगाड़ करता होगा. नट्टी बाबू को याद कर कर के रोती थी.

जेल के अस्पताल में ही नट्टी ने बेटे को जन्म दिया. जाने-अनजाने सबने उसको नाम दे डाला ‘‘रिन्कू’. और रिन्कू अपनी माँ के दुर्भाग्य के साथ बंधा ही रहा. तीन साल की उम्र होने तक वह बैरक की महिलाओं के बीच पलता रहा, उसके बाद उसे समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित अनाथालय में भेज दिया गया.

माँ का प्यार, माँ का आँचल, और माँ की गोद मे हर बच्चे की अपनी अनोखी दुनिया होती है. रिन्कू आम बच्चों से अलग छुटपन में ही सयाना हो गया. वह लोगों की बातें गौर से सुनता था और नित्य बेक़सूर माँ को जेल से बाहर लाने के सपने देखा करता था.

अपने एक अध्यापक को उसने अपनी पूरी रामकहानी सुनाई. उन्होंने उसे बहुत सी सांसारिक और अदालती बातें बताई. उन्होंने कहा कि “रूपये पास में हो तो सारे काम सरल हो जाते हैं. तुम कुछ काम करो, रूपये कमाओ, और किसी वकील के मार्फ़त अदालत में अपील करो.” गुरुमंत्र मिलने के बाद रिन्कू काम की तलाश में रहा और उसे एक हाउसिंग प्रोजेक्ट में काम मिल भी गया. उसकी जमा पूंजी दो हजार होते ही वह शहर के एक नामी वकील कुमार साहब के पास गया. उसने एक ही वाक्य में वकील साहब का दिल छू लिया, “आप मेरी बेक़सूर माँ को जेल से छुड़वा दीजिए, हम दोनों माँ-बेटा जिंदगी भर आपकी सेवा करते रहेंगे.”

वकील कुमार साहब ने अपनी माँ बचपन में खो दी थी, और वे हमेशा अपनी माँ को श्रद्धापूर्वक याद किया करते थे. इस लड़के की अपनी माँ के प्रति आसक्ति देखकर वे द्रवित हो गए. जब रिन्कू ने अपनी पूरी जमापूंजी २००० रूपये वकील साहब के चरणों मे रख दी तो कुमार साहब ने गंभीरता से सोचा कि रूपये तो जिंदगी भर कमाता रहा हूँ, यह पुण्य कमाने का अवसर इस प्रकार पहली बार मिला है. वे बोले, "ठीक है, मैं तुम्हारी माँ को रिहा करवाने की पूरी कोशिश करूँगा, पर ये रूपये तुम अपने पास ही रखो, मेरी तरफ से मदद समझ लो.”

अदालत में इस केस को दुबारा खोलने व नए सिरे से बहस करके परिणाम तक पहुँचाने मे ६ महीने लगा गए, और नट्टी रिहा हो गयी. रिन्कू ने मातृऋण चुका दिया. वकील साहब को अनेक प्रकार से धन्यवाद दिये क्योंकि उन्होंने इस केस की पैरवी करने लिए कोई फीस नहीं ली और न कोई अपेक्षा इन माँ-बेटे से की. 

२२ बर्षों के बाद नट्टी अपने बेटे रिन्कू के साथ ईदगाह स्टेशन पर राजस्थान की ओर जाने वाली रेल गाड़ी की प्रतीक्षा में बैठी है. उसकी नजरें फिर भी बाबू की तलाश में इधर उधर भटक रही हैं, कि क्या पता वह यहीं कहीं घूम रहा हो!
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गुरुवार, 6 जून 2013

खयाली विकास प्राधिकरण

उत्तरांचल के लीलाधर भट्ट अपनी जवानी में ही लखनऊ आ गए थे. एक सरकारी अस्पताल में बतौर वार्ड-बॉय नियुक्ति पा गए थे. ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे इसलिए साठ साला रिटायरमेंट तक ‘बॉय’ ही रहे.

लीलाधर भट्ट बड़े सज्जन, सरल व आस्थावान व्यक्ति हैं, गरीबों, निराश्रितों की सेवा सुश्रुषा में उनको बहुत आत्म सन्तोष व सुख की अनुभूति होती है. वे अपनी नित्यचर्या मे कुछ समय निकाल कर चोटिल-बीमार जानवरों की मरहम पट्टी भी करते रहते हैं. उनके मृदुल स्वभाव के अनुकूल लोग उनको ‘दयालु’ उपनाम से अधिक जानते हैं.

अस्पताल की सेवा काल की उनकी विशिष्ठ उपलब्धि यह रही कि अपने तीनों बेटों को उन्होंने कॉलेज तक की शिक्षा दिला दी. वे इसे अपने इष्टदेव ‘गोल्ज्यू का आशीर्वाद मानते है. 

बड़ा बेटा गजाधर बी.कॉम है. उसकी एक शेड्यूल्ड बैंक में स्थाई नौकरी है. मझला दयाधर उत्तर रेलवे में टी.टी.ई. की नौकरी पाकर खुशहाल है. छोटा खयाली बचपन से ही बहुत शैतान स्वभाव वाला है. हमेशा उल्टे सीधे तरीकों से रूपये कमाने के चक्कर में रहता आया है. उसकी उड़ान के अनुसार उसे कोई स्थाई नौकरी नहीं मिल सकी तो उसने अपने जैसे ही यार-दोस्तों के साथ मिलकर सड़क परिवहन विभाग (आर.टी.ओ.) के कार्यालय में दलाली का काम शुरू कर दिया. इसमें वह लोगों के ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने, रिन्यू करवाने, गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन-ट्रान्सफर आदि करवाने में कार्यालय कर्मियों से मिलीभगत करके अच्छा पैसा कमाने लग गया. जब धन्धा चल निकला तो उसने गोमती नगर में अपना एक कार्यालय खोल लिया जहाँ से सेवा विस्तार करते हुए रेल रिजर्वेशन, हवाई टिकट आदि बुकिंग का काम भी शुरू कर दिया, और बाद में धीरे धीरे सट्टेबाजी तथा हवाला कारोबार के नेटवर्क से भी जुड़ गया. इस काम के लिए उसने अपने दो सहायक भी रख लिए. दयालु अपने इस बेटे के बौद्धिक अध्यवसाय व समृद्धि से खुश थे, पर वे उसकी कारगुजारियों से अनभिज्ञ थे.

नौकरी से रिटायर होने के बाद वे अपनी पत्नी सहित पैतृक गाँव ताम्बाखाणी लौट आये. रिटायरमेंट से पहले ही उन्होंने तीनो लडकों की शादी करके अपनी बड़ी जिम्मेदारियां भी पूरी कर ली थी. इस पहाड़ी गाँव में उनका एक खुटकूण (पत्थरों से चिनी हुई बाहरी सीढ़ी) वाला दुमंजिला छोटा सा घर तथा थोड़ी ऊसर जमीन है, जो बरसों से बंजर पड़ी हुई है. चूंकि इस घर से बचपन की बहुत सी यादें जुड़ी हुयी हैं, वे बेसब्री से अपने रिटायरमेंट का इन्तजार कर रहे थे. घर के पास ही पानी का एक पुराना नैसर्गिक जल श्रोत है, जिसके बगल में गोल्ज्यू का मन्दिर भी स्थापित है. गाँव लौट कर दयालु ने नए सिरे से व्यवस्थित होने के तमाम उपाय किये यद्यपि बिछड़े वर्षों में बहुत कुछ बदल चुका है.

ताम्बाखाणी गाँव में बिरादरी के २५ परिवार हुआ करते थे, पर अब गिनती के १० रह गए हैं. सब दिल्ली-लखनऊ या तराई-भाबर की तरफ पलायन करके चले गए हैं. इस कारण गाँव में सुनसानी है. उनके बचपन में गाँव सरसब्ज था, गुलजार रहता था, दूध-दही व अनाज-सब्जियों की बहार हुआ करती थी, लेकिन अब तो लोगों ने जंगली सूअरों, बंदरों व अन्य जानवरों द्वारा नुकसान किये जाने के भय से सारे उद्यम करने छोड़ दिये है. दयालु गाँव की ऐसी हालत देख कर बहुत दुखी हुए. गोल्ज्यू के मन्दिर के प्रांगण मे बैठ कर घंटों जप-तप और ध्यान करने की कोशिश करते, पर मन केंद्रित नहीं हो पा रहा था.

पिछले सप्ताह एक अप्रत्याशित घटना घटी कि इंग्लैण्ड से एक पाँच सदस्यीय खोजी दल पूछते पूछते उनके गाँव में आ पहुँचा. यह दल अपने साथ दिल्ली से दुभाषिया भी लाया था. दल के मुखिया स्टूअर्ट ह्यूम ने लीलाधर भट्ट को बताया कि उनके बेटे खयाली ने एक वेबसाईट ‘ताम्बाखाणी डेवलपमेंट प्रोजेक्ट’ के माध्यम से दुनिया भर से अपने एन.जी.ओ. के लिए कई लोगों व संगठनों से लाखों डॉलर्स प्राप्त किये हैं. मिस्टर ह्यूम ने बताया कि वेबसाईट पर लिखा है कि इस प्रोजेक्ट के तहत ताम्बाखाणी डिविजन में इन्फ्रास्ट्रक्चर- रोड, आवासीय कालोनियाँ, मल्टीपरपज ऐज्युकेशनल इंस्टीट्यूट और एक डैम का नक्शा खींचा गया है, जबकि यहाँ ऐसी कोई संभावना दूर दूर तक नहीं है. उन्होंने बड़े दु:ख के साथ कहा कि “आपके बेटे ने हम लोगों को ठगा है.”

यह टीम उसी दिन लौट गयी. बात सारे गाँव के लोगों तक पहुँच गयी. दयालु अपने बेटे की करतूत पर बहुत शर्मिन्दा हुए. दुखी मन से घर को ताला लगा कर चुपके से बड़े बेटे गजाधर के पास चंडीगढ़ चले गए. उनको लग रहा है कि उनकी जिंदगी भर की नेक नियति की कमाई खयाली ने गंदी नाली में डाल दी है.
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मंगलवार, 4 जून 2013

चिन्तन

इस देश का कुछ नहीं होने वाला. ये यों ही घिसट कर चलेगा क्योंकि पूरे कुँवे में ही भांग पडी है. पूरे तन्त्र में भ्रष्टाचार अब कैंसर रोग की तरह अपनी जड़ें जमा चुका है.

हमारे संविधान के तहत दी गयी राजनैतिक व्यवस्था भ्रमित होकर फेल हो गयी है. कोई सिद्धान्त नहीं रहा, सब तरह कुर्सियों व पैसों का खेल बेशर्मी से खेला जा रहा है. नेता व जिम्मेदार लोग ढीठ व बेशर्म हो चुके हैं. रूपये का इतना अवमूल्यन होने का कारण यह है कि उनका हिसाब-किताब रखना मुश्किल है क्योंकि बेहिसाब नोट छाप दिये गए हैं, ऊपर से नकली नोटों का चलन, बिलकुल हूबहू, शक ये भी है कि नोटों की तिजारत उन्हीं छापेखानों से हो रही है जहाँ भारत सरकार छपवाती है.

खिलाड़ी बिके हुए हैं. उन पर बोली लगती है. खरीदने वाले धन्ना सेठ, उद्योगपति, सिने कलाकार, घाघ नेता या सटोरियों के ग्रुप हैं, जो बिना हींग-फिटकरी लगाए ही करोड़ों-अरबों की काली कमाई कर रहे हैं और बंदरबांट हो रही है. बदगुमानी की हद ये है कि आवाज उठाई जा रही है कि सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता दे दी जाये.

तमाम संवेदनशील मुद्दों पर मीडिया ऐसी हवा बना देता है कि आम लोग हिप्नोटाइज से हो जाते हैं. मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा खम्बा कहा जाता है, वह भी धन बटोरने का बड़ा जरिया बन गया है.

जो लोग बढ़-चढ़ कर भ्रष्टाचार-अनाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, उनमें से कुछ ही गिने चुनी हस्तियों को छोड़ कर शेष अपनी गोटी फिट करने में मशगूल हैं.

लाख कोशिशें की जाएँ, पर विधान सभा या लोकसभा के चुनावों में धनबल व बाहुबल के खेल के साथ जाति तथा धर्म ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं. चूंकि अब क्षेत्रीय दल पूरे देश में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं, एकदलीय शासन का अंत हो गया है. इसलिए राजनैतिक पार्टियां अपनी गैंग बना कर सत्ता में काबिज हो रही हैं. विचारधारा या सिद्धांतों से दूर केवल व्यक्तिगत  फायदे वाला सामंजस्य किया जा रहा है.

सम्पूर्ण राष्ट्र का चरित्र-ह्रास सा लगाने लगा है. अब इन परिस्थितियों में किसी चमत्कार की आशा करना भी व्यर्थ लगता है. घोर निराशाजनक स्थिति है.
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रविवार, 2 जून 2013

चुहुल - 51

(१)
एक दुबले-पतले साहब की पत्नी कुछ ज्यादा ही मोटी-भारी थी. स्वभाव से अति आलसी भी. एक दिन बिस्तर पर पड़े पड़े दार्शनिक अंदाज में पति से बोली, “अजी, मौत कौन सी अच्छी रहती है, जो धीरे धीरे अपने आगोश में ले ले या चटपट आ जाये?”
पति बड़ी देर से परेशान था क्योंकि पत्नी ने अपनी एक टांग उसके ऊपर रखी हुयी थी, बोला, “तुम अपनी दूसरी टांग भी मेरे ऊपर रख दो, मैं चटपट ही मरना चाहता हूँ. अब और नहीं सहा जाता है.”

(२)
अकबर बादशाह कई बार ऊलजलूल सवाल पूछ कर अपने नवरत्न वजीर बीरबल की परीक्षा लिया करते थे. एक बार उन्होंने बीरबल से पूछा, “बीरबल, रमजानों में खायें भी, पियें भी और रोजा भी न टूटे ऐसी कोई तरकीब बताओ?”
बीरबल ने तुरन्त जवाब दिया, “हुजूर, किसी की लात खाइए और अपना गुस्सा पी जाइए, इससे आपका रोजा भी बचा रहेगा.”

(३)
पति-पत्नी में जोरदार झगड़ा हो रहा था. आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे थे.
पत्नी: काश! मैंने अपनी माँ का कहा माना होता और तुमसे शादी के लिए मना कर देती.
पति: क्या तुम्हारी माँ तुम्हारा ब्याह मुझसे करने को मना कर रही थी?
पत्नी: और नहीं तो क्या?
पति: हे भगवान! मैं आज तक उस औरत को बहुत बुरा समझता रहा जो मुझे इस नर्क से बचाना चाहती थी.

(४)
संस्कृत के अध्यापक ने पढ़ाते पढ़ाते बीच में किसी सन्दर्भ में वेदान्त की बातें बताई, और एक विद्यार्थी से पूछा, “वेदान्ती का मतलब जानते हो?”
लड़का बोला, “आदरणीय, वेदान्ती उस व्यक्ति को कहते हैं, जिसके दाँत नहीं होते है.”

(५)
एक फैशनेबल महिला जूतों की दूकान में अन्दर गयी. सेल्समैन से बोली, “शूज दिखाइए.”
सेल्समैन ने पूछा ”कितने साइज का?”
महिला ने जवाब दिया, “छत्तीस.”
सेल्समैन कुछ देर संशय में रहा फिर बोला, “मैडम घर से ठीक से सोच कर निकला करो कि क्या खरीदना है?”
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