मंगलवार, 24 सितंबर 2013

Indian Spinal Injuries Centre, Vasant Kunj, New Delhi

"Indian Spinal Injuries Centre, the brainchild of Major HPS Ahluwalia was conceived in 1983 and was finally materialized in the year of 1997. A Major in the army, he found himself spinally injured in the Indo-Pak war of September 1965, after his successful climb to Mt. Everest earlier that year in May. Despite the tragedy that confined him to a wheelchair for the rest of his life, hope and courage did not falter as he was shunted from one hospital to another due to lacking spinal injury services in India. He went to the Stoke Mandeville Hospital in the United Kingdom for rehabilitation determined to rebuild his life. It was an experience that totally transformed him. He realized that though he himself had been lucky to get expert care, millions of Indians were not so fortunate and were forced to lead marginalized lives. It became his life's mission to help others like him and he determined to set up a similar hospital in India.
A dream that began to realize in the 1990s soon found its motivation to serve its countrymen by catering to spinal injured patients making it a one of a kind institution in the country. To guarantee highest standards of excellence and expertise, Major Ahluwalia sought collaboration with leading institutes around the world. Among many, impressed with his vision, the Government of Italy through San Raffaelle Hospital, Milan invested 10 million American dollars in the project proving to be the largest ever Italian collaboration with any country in the health care sector.
The evidence of this thriving endeavor can be seen in the form of Indian Spinal Injuries Centre, a 145 bedded hospital sprawled across 15 acres of lush green lawns and citrus fruit trees in the heart of South Delhi, successfully running for the past 10 years. It is perhaps, the only hospital designed by a patient for a patient, providing everything that a spinal injured patient would need under one roof. It is the only hospital in India that is completely barrier free since the architects had a unique insight into the possible impediments that a spinal injured patient can face, therefore endowing a homely and easier to relate to atmosphere. The Indian Spinal Injuries Centre (ISIC) was a true landmark, not only in India, but in the whole of Asia."

उपरोक्त परिचय संस्थान की वेब साईट पर अंकित है, यह पौधा अब विशाल वृक्ष बन चुका है. रीढ़ की चोटों व अन्य अस्थि रोगों के सर्वोत्तम ईलाज के अलावा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की लगभग सभी विधाओं, जैसे दन्त चिकित्सा से लेकर हृदय रोगों तक सभी का ईलाज यहाँ होता है, फिजियोथैरेपी तथा विकलांगों के लिए रिहैबिलिटेशन की भी विशिष्ठ व्यवस्था है.

चूकि यह एक प्राइवेट संस्थान है, इसका अब व्यावसायिक दृष्टिकोण भी स्पष्ट झलकता है. सब मिलाकर ये उन लोगों के लिए बहुत बड़ी सुविधा है जो रूपये खर्च करने में समर्थ हैं.
                                                                ***

रविवार, 22 सितंबर 2013

फैसला सुरक्षित है

न्यायमूर्ति दत्तात्रेय देवदत्त दहाणूकर को सब लोग ‘थ्री-डी जज साहब’ नाम से ज्यादा जानते हैं. वे कई अदालतों में जज रहे, और अंत में हाईकोर्ट के जज बन कर रिटायर हुए. अब पूना में बुधवारपेठ में अपने पुस्तैनी घर में रहते हैं. न्यायाधीशों के बारे में आम लोग सोचते हैं कि वे एकांतप्रिय व असामाजिक लोगों जैसे होते हैं, लेकिन ये उनके व्यवसाय की मजबूरी है क्योंकि उन्हें सुरक्षा कवच में रहना पड़ता है. वे आम लोगों की तरह ही संवेदनशील होते हैं, पर नित्यप्रति के सीमित सम्पर्कों व कानूनी जिंदगी होने के कारण कभी कभी अपने बेटे- बेटियों के अनुचित व्यवहार पर भी प्रतिक्रया कर सकते हैं.

जज साहब का नवी मुम्बई में भी एक शानदार फ़्लैट है, जहाँ उनका बेटा करुणासागर अपनी पत्नी व बेटे के साथ रहता है. करुणासागर मुम्बई के शेयर बाजार का एक बड़ा कारोबारी है. उसे यथा नाम तथा गुण नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह अपनी सम्पति तथा लेनदेन में कभी भी नरमी नहीं दिखाता. सच तो यह है कि वह छुटपन से ही रुपयों-पैसों के गणित में प्रवीण है. स्वाभाविक रूप से लालची है. उसको मालूम है कि पिता की जायदाद का पूरा वारिस वही है, फिर भी शंकित रहता है कि कहीं पिताश्री उसमें से हिस्सा निकाल कर बहिनों में न बाँट दें क्योंकि पिता का दिल बेटियों के बहुत नजदीक रहा करता है.

जज साहब की दो बेटियाँ भी हैं. दोनों विवाहित हैं. एक कोल्हापुर में और दूसरी सांगली अपने अपने परिवारों के साथ रहती हैं. दोनों ही बेटियाँ वहीं स्थानीय कालेजों में पढ़ाती भी हैं. भगवत कृपा से दोनों ही सद्बुद्धि वाली हैं, संपन्न और सुखी हैं.

करुणासागर की शंकाएं निराधार भी नहीं हैं क्योंकि गाहे बगाहे माता-पिता दोनों ही खूब सारा रुपया व कीमती सामान बहिनों को दिया करते हैं. इस बाबत करुणासागर कई बार ऐतराज व तकरार कर चुका है. उसका ये व्यवहार जज साहब को बहुत नागवार गुजरता रहा है.

जज साहब ने अपने कार्यकाल में सैकड़ों दीवानी मुकद्दमों के फैसलों में पारिवारिक बंटवारों के झगडों में स्त्रियों के पक्ष में बहुत बढ़िया निर्णय दिये थे. बेटियों के प्रति उनके आत्मिक सत्यभावना उनकी डायरी के मुखपृष्ट पर एक कवयित्री मलिक परवीन की लिखी निम्न कविता की पंक्तिया बहुत खूबसूरती से उजागर करती हैं:

मानव सभ्यता की नींव हैं बेटियाँ,
भगवान की अद्भुत रचना हैं बेटियाँ,
खुश नसीबों के घर जन्म लेती हैं बेटियाँ,
जिंदगी के कर्ज से मुक्त कराती हैं बेटियाँ,
एक पिता का गरूर होती हैं बेटियाँ,
एक माँ की प्रतिरूप होती हैं बेटियाँ,
प्यार और ममता का नाम है बेटियाँ,
किसी के भी घर की शान हैं बेटियाँ,
हर रिश्ते का आधार हैं बेटियाँ ,
घर को खुशियों से महकाती हैं बेटियाँ.

जज साहब सोचते हैं कि ‘अगर आम के पेड़ पर बबूल की फलियाँ उग आयें तो क्या किया जाये?’ बेटे के आये दिन की किचकिच से वे बहुत दु:खी रहते हैं. एक दिन जब ज्यादा ही बहसबाजी हो गयी तो उन्होंने बेटे से कह डाला, “तुम नवी मुम्बई वाले घर को खाली कर दो, अपने रहने का अलग इन्तजाम कर लो.” धीरे धीरे आपसी रिश्ते में इतनी खटास आ गयी कि जज साहब को लगने लगा कि करुणासागर जायदाद के लिए उनके खिलाफ किसी हद तक जा सकता है. उसके हथकंडे व धमकी भरे तेवर देखकर उन्होंने हाईकोर्ट में अर्जी दे कर खुद के लिए सुरक्षा की गुहार लगा दी और हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश देकर उनको चौबीसों घन्टे गार्ड मुहय्या करा दिया तथा करुणासागर को पाबन्द कर दिया.

अब देखिये, दौलत की कमी ना इधर है और ना उधर, लेकिन सोच में भारी फर्क होने से बेटा, बहू और पोता सभी दुश्मनों की तरह व्यवहार करने लगे हैं. ये मामला जब स्थानीय/राष्ट्रीय अखबारों की सुर्ख़ियों में आया तो दोनों बेटियाँ दौड़ी दौड़ी पूना आ गयी और भाई को भी बुला लिया. माता-पिता दोनों के सामने दोनों बहिनों ने कहा, “क़ानून में पिता की जायदाद में बेटियों के हक का प्रावधान जरूर है, पर हमें इसमें से कुछ नहीं चाहिए, हमें केवल स्नेह और प्यार चाहिए.”

थ्री-डी अभी भी अपने बेटे से बहुत नाराज थे. वे बोले, “अदालत ने आप लोगों के बयान सुन लिए है, इसका फैसला समय आने पर सुना दिया जाएगा.”
***

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

चुहुल - ५९

(१)
एक राजनैतिक पार्टी के बड़े नेता इन दिनों बहुत परेशान हैं कि ये कल के छोकरे उनको धक्का देकर आगे बढ़ रहे हैं.
उनको टॉयलेट में घुसे हुए बहुत देर हो गयी तो पत्नी को चिंता होने लगी, दरवाजा खटखटाते हुए उनको आवाज दी, “अजी, फ्रेश होने में देर हो रही है या रूठ कर बैठे हो?” (फेसबुक से)

(२)
गाँधी जी जब बैरिस्टर थे तो उन्होंने एक मुवक्किल की पैरवी करके मदद की थी. बाद में जब गाँधी जी स्वर्ग चले गए तो एक बार फिर वही आदमी किसी केस में फंस गया. उसने अपने सपने में गाँधी जी से मुलाक़ात की और कहा, “आप जब ज़िंदा थे तो आपने मुझे बचाया, अब मुझे कौन बचायेगा?”
गाँधी जी ने भारत के करेन्सी नोटों की तरफ इशारा करते हुए कहा, “इनमें मेरी फोटो लगी है, यही तुझे बचायेंगे.

(३) 
ये बात उन दिनों की है जब कट्टर+आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा हमारे पंजाब में बहुत सक्रिय था. उनको ऐसा लगाने लगा था कि अलग से खालिस्तान राज्य बनने ही वाला है.
उन अतिवादियों के कमांडरों की किसी गुप्त स्थान पर एक मीटिंग हो रही थी. एक कमांडर बोला, “बस अब हमारी जीत एक कदम दूर है.” दूसरा बोला, “ये तो ठीक है कि हमारा नया राष्ट्र बन जाएगा, लेकिन हम उसका विकास कैसे करेंगे?” तीसरा बोला, “बड़ा सरल है, हम अमरीका पर हमला कर देंगे. हमारी हार होने पर हम अमरीका के अधीन हो जायेंगे और खालिस्तान भी अमेरिका का एक राज्य हो जाएगा. अपने आप विकास करने लगेगा.”
इतने में एक बूढ़ा कमांडर बोल उठा, “अगर हम अमेरिका से जीत गए तो फिर क्या होगा?”

(४)
छोटा पप्पू दादी के पास सो रहा था. दादी ने प्यार जताते हुए कहा, “घर में हम पाँच लोग हैं, मैं हूँ, तू है, तेरे पापा हैं, तेरी मम्मी है और तेरी बहन है. जब तेरी बहन की शादी करेंगे तो चार रह जायेंगे, तेरी शादी करेंगे तो फिर से पाँच हो जायेंगे.”
पप्पू बोला “दादी, आप मर जाओगी तो हम फिर से चार ही रह जायेंगे.”
दादी गुस्सा करते हुए बोली, “चुपकर, अभी से मेरे मरने की बाट जोह रहा है, सो जा.”

(५)
एक कम आई क्यू के लिए बदनाम परिवार में पिता पुत्र के बीच संवाद हों रहा था.
बेटे ने बाप से पूछा, “अगर रास्ते में आपको एक सौ रुपयों का नोट और एक पाँच सौ रुपयों का नोट पड़े हुए मिलें तो आप कौन सा नोट उठाएंगे?”
बाप ने कहा, “मैं पाँच सौ रुपयों का नोट उठाऊँगा.”
बेटा बोला, “मैं समझ गया कि क्यों लोग हमको ‘लो आई क्यू वाले' क्यों बोलते है.”
बाप ने पूछा, ‘क्या मतलब?”
बेटा ने कहा, “आप दोनों नोट क्यों नहीं उठाएंगे?”
***

बुधवार, 18 सितंबर 2013

बैठे ठाले - ८

मेरे एक मित्र मनीष दयाल ने हाल में फेसबुक पर एक विचारणीय स्टेटस अपडेट डाला था कि "शाहरुख खां की पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ ने पहले ही दिन सात करोड़ का कलेक्शन किया, ऐसी जनता के लिए यदि प्याज का भाव आठ सौ रुपय्र प्रति किलो भी हो जाये तो कम है."

वास्तव में महंगाई की जब चर्चा होती है तो आम लोगों से लेकर मीडिया तक बड़े तल्ख़ शब्दों में सरकार को कोसने में कसर नहीं रखते हैं क्योंकि सभी उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें पिछले वर्षों में बेतहाशा बढ़ी हैं. मुझे याद है सन १०६० में जब मैं नया नया नौकरी पर लगा था तो एक रूपये का ढाई सेर दूध और एक रूपये का चार सेर गेहूं आटा था. ये दीगर बात थी कि वेतन एक सौ बीस रूपये ही होता था. और भी बहुत पीछे जाएँ तो बताते हैं कि दिल्ली का लालकिला बादशाह शाहजहां ने कुल साठ लाख में बनवाया था. आज छतीसगढ़ में मोदी जी के लिए डॉ. रमन ने नकली लालकिले का जो छोटा सा बुर्ज बनवाया उसकी लागत दो करोड़ रुपयों से ज्यादा बताई जा रही है.

सन १९६० में हमारी पूरी बस्ती में केवल एक मोटरसाइकिल जीवन बीमा के विकास अधिकारी के पास थी, जो कि उसने दो हजार रुपये विभागीय लोन लेकर खरीदी थी. आज हर गली में महंगी से महंगी गाडियां खरीदने की होड़ लगी हुई है. पार्किंग की जगह नहीं मिल पा रही है. सभी छोटे बड़े शहरों का हाल ये है कि दिन भर जाम की स्थिति बनी रहती है. देश की आर्थिक स्थिति का बंटाधार करने में इस तरह के लक्जरी + अनुत्पादक खर्चों का भी बड़ा योगदान है. जितनी गाडियां उतना ज्यादा पेट्रो-डीजल भी चाहिए.

तब कुल जनसंख्या ४० करोड़ होती थी. अब शायद इतने लोग तो सवा करोड़ के आंकड़ों के साथ अनरजिस्टर्ड होंगे. इस पर देश में वोटों की राजनीति से सब लफड़े झगड़े शुरू है. जहाँ जहाँ आर्थिक सब्सिडी है, वहाँ से सीधे सीधे राष्ट्रीय घाटे में बढ़ोत्तरी हो रही है. अर्थशास्त्री इसे घटाने का उपक्रम करते हैं तो ततैय्या के छत्ते छेड़ने जैसा हो जाता है. आज जो लैपटॉप, साइकिल या मुफ्त अनाज बाँट कर वोटरों को लुभाने का प्रयास किया जा रहा है, ये आगे जाकर कैंसर की बीमारी बनने वाली है. पहाड़ी इलाकों में गाँवों के बीपीएल मे नामित छोटे किसानों ने खेती करने के पारंपरिक काम को कम कर दिया है या छोड़ ही दिया है क्योंकि सरकारी सस्ते गल्ले की सरकारी व्यवस्था उनको आलसी बना रही है. कश्मीर में केन्द्र सरकार ने वर्षों से खाद्यान्न पर ७५% से ज्यादा सब्सिडी देकर वहाँ के लोगों की मानसिकता बिगाड़ चुकी है.जब तक सत्ता की राजनीति है ये लोग खायेंगे भी और गुर्रायेंगे भी.

अब फिर से बड़े चुनाव आने वाले है इसलिए राजनैतिक दलों ने जातीय तथा साम्प्रदायिक झगड़े/दंगे करवा कर अपनी अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है. बाद में मृतकों के परिजनों को मुआवजे का ऐलान ऐसे होता है, जैसे ये अपने घर से दे रहे हों. भड़काने वाले भाषणों से आग लगा कर हमे ईराक और सीरिया की राह पर ले जाया जा रहा है. यदि अतिवादियों के हाथों में सत्ता आ गई तो हम आज आगे आने वाले समय की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं.

अब आप पूछेंगे कि इसका हल क्या है? मेरा उत्तर है कि इसका कोई फौरी हल नहीं है, और ये ऐसे ही चलेगा क्योंकि अपवादों को छोड़कर हम सब स्वार्थी और बेईमान हो चुके हैं. हमारे एक बड़े गांधीवादी ट्रेड युनियन के नेता स्व. रामानुजम कहा करते थे, “जैसे फूल होंगे वैसी ही माला बनेगी.” हाल में संसद ने देखिये दागियों के बारे में सर्वमत से बेशर्मी वाला निर्णय लेकर सर्वोच्च न्यायालय को लात लगाई है. सांसदों या विधायकों के वेतन+सुविधाओं पर बिना किसी बहस या संशोधन के बिल पास हो जाते हैं और कहते हैं कि ये गरीबों के नुमायंदे हैं.

अंत में मैं ये कहने में भी परहेज नहीं करूँगा कि हम भारतीय लोग लोकतंत्र में जीने के काबिल नहीं हैं. धनबल, बाहुबल और जातिबल सब चलेगा, फिर ऐसी ही नयी व्यवस्था होगी, जिसमें आपको भी महसूस होगा कि सिर्फ सड़े बिस्तर पलट दिये गए है.
***

रविवार, 15 सितंबर 2013

परोपकार

परोपकार का संधिविग्रह, पर+उपकार, यानि दूसरों पर कृपा करना होता है.

कभी कभी हमको अखबारों या अन्य सचार माध्यमों से मालूम होता है कि आज भी बहुत से अच्छे लोग सँसार में इस महान संकल्प के साथ जी रहे हैं. दुःख में दुखी लोगों की निस्वार्थ भाव से मदद करना, विपन्नता में आर्थिक मदद करना और सामाजिक परिवेश में रक्तदान, नेत्रदान, या अंगदान जैसे परमार्थ के काम कर जाते हैं. जो लोग स्वार्थी होते हैं, वे कभी भी परमार्थ के काम नहीं कर सकते हैं.

हमारी नैतिक शिक्षा में परोपकार सम्बन्धी बहुत से दृष्टान्तों तथा सत्य घटनाओं का जिक्र होता है, जिनको पढ़ कर, समझ कर, जीवन में बहुत खुशियाँ पाई जा सकती हैं.

कहानीकार जोसेफ जैकब ने ‘शेर और ऐन्द्रक्ल्स’ की एक बहुत मार्मिक कहानी लिखी है, जिसमें प्राचीन समय में रोम में ऐन्द्रक्ल्स नाम का एक गुलाम अपने दुष्ट मालिक के चंगुल से भाग कर जंगल की तरफ चला जाता है, जहाँ उसे एक घायल शेर मिलता है. उसके अगले पंजे में काँटा गढ़ा हुआ था और वह बुरी तरह कराह रहा था. ऐन्द्रकल्स ने हिम्मत करके उसके पंजे से काँटा खींच कर निकाल दिया. शेर ने उसे खाया नहीं. इस प्रकार ऐन्द्रक्ल्स ने उस पर उपकार किया. बाद में एक दिन ऐन्द्रक्ल्स सिपाहियों द्वारा फिर पकड़ लिया गया. सम्राट ने उसे भागने के जुर्म में भूखे शेर के बाड़े में डलवा दिया. तमाशबीन लोग देख रहे थे, पर उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उस भूखे शेर ने उसको खाने के बजाय दुम हिलाकर प्यार करना शुरू कर दिया. दरअसल ये वही शेर था, जिसके पंजे में से ऐन्द्रक्ल्स ने काँटा निकाला था. सम्राट ने वास्तविकता जानने के बाद दोनों को प्राणदान दिया. शेर को भी जंगल में छोड़ कर आजाद कर दिया. इस कहानी का आदर्श यही है कि परोपकार करना चाहिए और कोई आपके साथ परोपकार करता है तो उसे भूलना नहीं चाहिए.

संस्कृत साहित्य जो हमारी सभी भारतीय भाषाओं की जननी है, उसमें एक सुन्दर प्रेरणादायक श्लोक इस प्रकार लिखा है:

परोपकाराय फलन्ति वृक्ष:
परोपकाराय दुहन्ति गाव:
परोपकाराय बहन्ति नद्य:
परोपकाराय इदं शरीरम.

इसे कोरी किताबी बात ना समझा जाये और जीवन के जिस मोड़ पर भी मौक़ा मिले परोपकार करके आनंदित होना चाहिए. आज के जमाने में यदि हम किसी पर कोई मेहरबानी नहीं सकते हैं, तो किसी का बुरा भी ना करें, पीड़ा ना पहुचाएँ, ये भी परमार्थ ही समझा जाएगा.
***