सोमवार, 15 अगस्त 2016

चुहुल - ८०

(१)
अस्पताल के मैटर्निटी वार्ड के बाहर एक आदमी बड़ी बेचैनी से घूम रहा था. किसी मित्र ने पूछ लिया, “क्यों परेशान हो भाई?"
वह बोला, “मेरी पत्नी को चौथा बेटा पैदा हुआ है.”
मित्र ने कहा, “यह तो खुशी की बात है.”
वह बोला, “पर दुःख की बात यह है कि वह चायनीज है.”
मित्र ने पूछा “वह कैसे?”
वह अफसोस के साथ बोला, “मैंने कल ही यू.एन. की रिपोर्ट पढ़ी है कि दुनिया में पैदा होने वाला हर चौथा बच्चा चायनीज होता है.”
 (२)
एक पाकिस्तानी सुन्दरी बनठन कर अपने शौहर से पूछती है, “कैसी लग रही हूँ?”
शौहर बोला “खुदा कसम तुमको हिन्दुस्तान की तरफ फैंकने का मन हो रहा है.”
सुन्दरी बोली, “साफ़ साफ़ क्यों नहीं कह रहे हो कि ‘बम’ लग रही हूँ.

(३)
एक फिल्म डाइरेक्टर एक मोटी सी मॉडल से कहता है, “क्या तुम मेरी नई फिल्म में काम करना चाहोगी?”
मॉडल – किस तरह का कैरेक्टर है?
डाइरेक्टर – बस जलक्रीड़ा करनी है.
मॉडल – फिल्म का नाम क्या है?
डाइरेक्टर – ‘गयी भैंस पानी में.’

(४)
पत्नी – वो आदमी जो दारू पीकर मस्त नाच रहा है, इसे मैंने दस साल पहले रिजेक्ट किया था.
पति – वाह, बड़ा खुशनसीब निकला, अभी तक सेलिब्रेट कर रहा है.


(५)
एक तंदुरुस्त आदमी विकलांग लोगों के लिए रिजर्व सीट में बैठ कर सफ़र करता पाया गया. टी.टी. ने उससे पूछा, “तुम इस सीट पर क्यों बैठे हो?”
आदमी बगल में रखे टोकरी की तरफ इशारा करते हुए बोला, "जी सर, ये मेरे साथ हैं."
टी.टी. – ये तो आम हैं.
आदमी – जी हाँ, ये सभी लंगड़े हैं.
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शनिवार, 23 जुलाई 2016

चुहुल ७९

(१)
नारी मुक्ति आन्दोलन की शिकायत पर पुलिस ने एक आदमी का चालान करके मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया. उस पर आरोप था कि उसने अपनी पढ़ी-लिखी पत्नी को दस वर्षों तक इस तरह कंट्रोल में रखा कि बेचारी सहमी सहमी रहती है.
मजिस्ट्रेट – तो तुमने दस वर्षों से डरा-धमका कर अपनी बीवी को कंट्रोल में रखा हुआ है?
मुलजिम  हुजूर, बात ऐसी है कि ...
मजिस्ट्रेट – सफाई देने की जरूरत नहीं है, तुम बस तरीका बताओ.
  
(२)
एक भद्र महिला ने अदालत में अपने पति से तलाक की गुहार लगाई तो जज साहब ने कारण पूछा.
महिला बोली, “वे मेरे प्रति वफादार नहीं हैं.”
जज  इसका क्या सबूत है तुम्हारे पास?
महिला – मेरे चार बच्चों में से किसी की भी शक्ल उनसे नहीं मिलती है.

(३)
रेल के डिब्बे में एक बुजुर्ग ने अपने सामने की सीट पर बैठे व्यक्ति से कहा, “माफ़ करना भाई, तुम बड़ी देर से कुछ कह रहे हो, लेकिन मैं ऊंचा सुनता हूँ. क्या आप ज़रा जोर से बोलेंगे?”
सामने वाला बोला, “मैं बोल कहाँ रहा हूँ? मैं तो चूइंग-गम चबा रहा हूँ.”.

(४)
डॉक्टर (मरीज से)  आपको कभी न्युमोंनिया से तकलीफ हुई थी क्या?
मरीज – हाँ, एक बार हुई थी.
डॉक्टर – कब हुयी थी?
मरीज – जब मैं स्कूल में पढ़ता था तो मेरी टीचर ने न्युमोंनिया की स्पेलिंग पूछी थी.

(५)
ताऊ झगड़ा करके अपने घर से नाराज होकर कहीं चला गया. जब बहुत दिन हो गए, तो उसका बेटा अपनी महतारी से बोला, “मन्ने तो लागे है कि बापू ने कदी ओर घर बसा लियो है.” इस पर महतारी ने गुस्से में एक थप्पड़ रसीद कर दिया, और बोली, “तू गल्त क्यों बोल रिया, तेरा बापू कदी ट्रक के नीचे भी तो आ सके है.”
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रविवार, 3 जुलाई 2016

चुहुल - ७८

(१)
एक व्यक्ति को जब शराब पीने के जुर्म में जज साहब ने एक महीने की जेल की सजा सुनाई तो दया मांगने के भाव में वह बोल उठा, “जज साहब, मैंने शराब नहीं पी रखी थी...  मैं तो बस पीने जा रहा था.”
जज साहब बोले “तब ठीक है, मैं तुम्हारी सजा एक महीने से कम करके केवल  ३० दिन कर देता हूँ.”

(२)
(स्थान: हरियाणा का एक गाँव)
ताऊ बोल्यो, “अरी ओ भागवान, दरवज्जे पर एक कुत्ता आया सै, रोट्टी ले आ.”
ताई बोली, "रोट्टी तो कोई ना बची सै."
ताऊ बोल्यो, "तब तो तू म्हारो लट्ठ ले आ. इसे खाली नी जाणे देणा है."

(३)
एक पुलिसवाले को एक लड़के के थैले में कुछ संदिग्ध सामान होने का संदेह हुआ. उसने लड़के को रोक कर पूछा, “थैले में क्या है?”
लड़का बड़ी संजीदगी से बोला, “बताते हैं.”
सिपाही ने जोर देकर बोला, “जल्दी बता?”
लड़के ने उसी लहजे में फिर कहा, “कहा ना, बताते हैं.”
पुलिसवाला उसका मुंह देखता रहा, जब वह आगे कुछ नहीं बोला तो गुस्से में आ गया; इतने में उस लड़के का साथी दौड़कर आया और बोला, “ये तुतलाता है. इसके थैले में बताशे हैं.”

(४)
एक ग्रामीण परिवेश की महिला अपने छोटे बच्चे के साथ रेल में सफ़र कर रही थी. बच्चे ने अपना पायजामा गीला कर दिया तो वह उसे बदलने लगी. सामने की सीट पर बैठी शहरी परिवेश वाली महिला बोल उठी, “हगीज नहीं है क्या?”
बच्चे की माँ बोली, “नहीं, बहन जी, हगीज नहीं मुतीज है.”

(५)
एक महिला अपने घरेलू नौकर को हर वक्त डांटा करती थी. कभी कभी तो बेवजह भी. एक बार जब वह जोर जोर से डांट रही थी तो उसके पति ने पूछ लिया, “अब क्या कर दिया जो इतना चिल्ला रही हो?”
महिला शिकायत भरे अंदाज में बोली, “ये आजकल बहुत बेवकूफी करने लगा है. मैंने इसको दो अंडे लाकर दिए थे कि एक को बॉईल करके और दूसरे का ऑमलेट बना लाये, लेकिन ये उलटा करके लाया. जिस अंडे का ऑमलेट बनाना था, उसे बॉईल कर लाया, और जिसको बॉईल करना था, उसका ऑमलेट बना लाया है.”
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मंगलवार, 28 जून 2016

अहसानमंद

हल्द्वानी महानगर के चारों तरफ उभरी हुई नई बस्तियों में कई लोग पहाड़ के अनजाने गांवों से पलायन करके या अपनी नौकरियों से रिटायर होकर बहुतायत में आ बसे हैं, जिससे एक नई सांस्कृतिक रिश्तेदारी बन गयी है. ऐसा ही है मेरा गाँव, गौजाजाली.

एक दिन संयोगवश मैं किसी व्यक्तिगत निमंत्रण पर एक एडवोकेट मित्र के पास बरेली गया था. सुबह सुबह अखबार में छपे एक समाचार ने मेरा ध्यान आकर्षित किया कि मेरे गाँव के एक मातवर व्यक्ति की कार से बरेली में एक दुर्घटना घटी, जिसमे दो लोग चोटिल हुए, नतीजन पुलिस केस बनाकर उनको जेल में डाल दिया गया. इस बात को तीन दिन हो गए थे, और उनको जमानत नहीं मिल पा रही थी.

यद्यपि मेरी उनसे घनिष्टता नहीं रही थी, फिर भी उनकी इस परेशानी की घड़ी में मदद करने का मन हुआ. मैंने उनसे मुलाक़ात की, और अपने एडवोकेट मित्र से संपर्क करके जमानत दिलवाने की तुरंत कार्यवाही करवाई. वे रिहा हो गए और शायद बाद में कुछ ले-दे करके केस रफादफा भी हो  गया था. ये लगभग दो साल पुरानी दास्तान है. इन दो सालों में उनसे यदाकदा मुलाक़ात भी होती रही, पर मैंने उनकी आँखों में कभी भी कृतज्ञता का भाव नहीं पढ़ा. यद्यपि मैंने उनकी अनपेक्षित सहायता का कोई प्रतिदान नहीं चाहा, परन्तु उनका ‘तोताचश्म’ होना अखरता जरूर रहा.

कुछ दिनों बाद, एक ताजी घटना से कृतज्ञता भाव पर नया आयाम उभर कर आया. हुआ यों कि मैं पत्नी सहित हल्द्वानी शहर में अपने एक निकट संबंधी के घर मिलने गया था. अपनी कार मैं स्वयं ड्राइव कर रहा था. जब दोपहर बाद घर लौटा तो घर के गेट पर गली की एक उम्रदराज महिला अपनी बहू के साथ इन्तजार करती हुयी मिली. वह अस्वस्थ थी और अपना ‘ब्लड प्रेशर’ चेक करवाना चाहती थी. मेरे आसपास के लोग आवश्यकता होने पर मेरी मेडीकल चेरीटेबल सेवा का लाभ लेने में संकोच नहीं किया करते हैं.

मैं अपनी गाड़ी गैरेज में डाल कर उनकी सेवा में लग गया. उस दिन बाहर बला की गर्मी व उमस व्याप्त थी. ना जाने कब गेट खुला पाकर एक जानदार ‘रोडस्टर’ कुत्ता ठंडक पाने के लिए मेरे गैरेज में चुपचाप छुप कर बैठ गया. मरीज के जाने के बाद मैंने गैरेज का शटर नीचे खींच कर बंद कर दिया. कुता दो दिन, दो रात भूखा-प्यासा अन्दर बंद रहा. हमारे बेडरूम दूसरी दिशा में होने के कारण तथा टेलीवीजन की गीत-संगीत की आवाज होने के कारण हम कुत्ते की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से अनजान रहे. तीसरे दिन मेरी श्रीमती को शटर के अन्दर कुछ खटपट होने का आभास हुआ. मैंने जैसे ही शटर उठाया वह दुम हिलाता हुआ बाहर दौड़ा आया. उसने गौर से मुझे देखा और गेट खुलने पर तेजी से बाहर निकल गया. मैंने कुत्ते का हुलिया बयान करते हुए अपने ‘ईवनिंग वॉक’ मंडली को बताया तो मालूम हुआ कि ये उन्ही मतावर व्यक्ति का पालतू कुत्ता था, जिनका जिक्र ऊपर बरेली काण्ड में आया है.

कुत्ते की स्थिति का जायजा लेने जब हमारी टीम उनकी गली में पहुंची तो वह कुत्ता मुझे पहचानते हुए मेरे पैरों में लोटपोट हो गया. बहुत देर तक वह मेरे इर्दगिर्द घूम कर लाड़ बताता रहा. शायद इसलिए कि मैंने उसे हिरासत से बाहर निकाला था. इंसान और जानवर के अप्रतिम व्यवहार का अंतर देखकर मेरा मन भर आया.
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गुरुवार, 12 मई 2016

गुबार

मैं लाख कोशीशें करू या कहूं कि मेरी किसी राजनैतिक पार्टी से संबद्धता नहीं है, परन्तु मेरे मन-मस्तिष्क पर जो विचारधारा धरातल बनाकर बैठी है, वह नित्य प्रतिक्रियास्वरूप बाहर आती रहती है, और हो सकता है कि आप इससे सहमत ना भी हों.

वर्तमान में केंद्र में सत्तासीन पार्टी भाजपा के बारे में अब party with difference  वाले जुमले को सुन कर तकलीफ होने लगी है. बहुत वर्षों पहले जब श्री गोविन्दाचार्य जी भाजपा के नीति निर्धारक थिंक टैंक के स्पष्टवादी व कट्टर व्यक्तित्व वाले सिद्धांतवादी व्यक्ति थे और पार्टी नेतृत्व गाइड लाइंस के बाहर जाकर party with difference के जुमले को बार बार चोटिल कर रहे थे तो उस मौजू में एक पत्रकार ने उनसे सीधा प्रश्न किया था कि क्या वे भाजपा को कांग्रेस पार्टी के विकल्प के रूप में तैयार कर रहे हैं. तब उन्होंने बड़े दु:खी मन से पार्टी के कर्णधारों की सोच पर प्रतिक्रया व्यक्त की थी कि ये लोग विकल्प नहीं, दूसरी कांग्रेस बनाने की प्रक्रिया में हैं. जो आज सच साबित हो रही है. यहाँ गौर तलब बात यह है की इन्ही सैद्धांतिक मतभेदों के चलते गोविन्दाचार्य जी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था. यद्यपि वे आज भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैं.

हाल में उत्तराखंड की रावत सरकार को गिराने का जोरदार ड्रामा हुआ उससे भाजपा के नीतिकारों को अवश्य शर्मिन्दगी सता रही होगी, अगर नहीं सता रही होगी तो उनकी party with difference वाली आत्मा मर चुकी होगी. आज भाजपा के नेताओं का ये वक्तव्य इस बात को तस्दीक करती है कि अगर काग्रेस के बागी विधायक भाजपा में आना चाहें तो उनका स्वागत होगा. जब तक वे कांग्रेस में थे, चोर, बेईमान व चरित्रहीन थे, और उनके खिलाफ भाजपा वालों ने आन्दोलन तक किये थे. और अब वे रातों रात आदर्श हो गए हैं.

मेरे बहुत से मित्रगण भाजपा के सक्रिय व समर्पित सदस्य हैं, जो शायद ये नहीं सुनना चाहेंगे कि पिछले दो वर्षों में खाद्य पदार्थों, दवाईयों, तथा अन्य सभी जरूरी वस्तुओं के दाम लगभग दुगुने हो गए हैं. इस सरकार की नीतियों ने अल्प बचतों पर ब्याज की दर कम करके ब्याज पर गुजारा करने वाले मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है. पिछली भ्रष्ट कांग्रेस सरकार को गालियाँ देते रहने से आप अपनी नाकामियों को छिपा नहीं सकते हैं. बड़े पूजीपतियों के हितार्थ जो आर्थिक योंजनाओं का ढिढोरा पीटा जा रहा है, वे आगे जाकर राष्ट्र की अर्थ व्यवस्थाओं पर नकारात्मक परिणाम लायेंगी. रिजर्व बैंक पर अंकुश लगाने तथा न्याय पालिका के पर कतरने की सोच बेहद खतरनाक साबित हो सकती है.

पार्टी अध्यक्ष, जो मोदी जी के अभिन्न और राजदार भी रहे हैं, के अदालती केस में क्लीन चिट देने वाले सुप्रीम कोर्ट के चीफजस्टिस श्री सदाशिवम को रिटायरमेंट के तुरंत बाद केरल का गवर्नर बनाना एक ऐसा उदाहरण है जिसे सुपर भ्रष्टाचार की संज्ञा दी गयी है.   

मोदी जी द्वारा चुनावों में जो जुमले परोसे गए थे, उनकी असलियत सामने आने से आम लोग निराश हैं. ये दीगर बात है कि मीडिया का एक बहुत बड़ा तबका स्वार्थवश उनकी वाह वाही करता आ रहा है. यहाँ तक कि अंध भक्तों को उनकी अपानवायु में भी केवड़े की खुशबू  प्रतीत हो रही है.

धरातल पर पुलिस, पटवारी, तहसीलदार से लेकर सभी जनसंपर्क वाले विभागों में कांग्रेस राज की तरह से ही काम हो रहा है, बिना लिए दिए कोई काम नहीं होते हैं. सभी छोटे बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स जिनमें ठेकेदारी की व्यवस्था है, आकण्ठ भ्रष्टाचार यथावत है. मालूम सबको है.

किसानों की आत्महत्याओं का  मुद्दा, जिसे चुनाव के समय मोदी जी ने विशेष रूप से ऊंचे स्वरों में उछाला था, कहीं नेपथ्य में गुम हो गया है. आत्महत्याएं निरंतर जारी हैं.

विदेश नीति की चर्चा करें तो सभी निकटवर्ती देश ३६ के आंकड़े में हैं. रूस जैसे चिर मित्र के मन में अब हमारे प्रति संदेह हो गये हैं क्योंकि यहाँ पूरी अमरीकापरस्त नीतियों का पालन हो रहा है. विदेशों में स्वयं प्रायोजित कार्यक्रमों में भारतवंशियों का खुश होना स्वाभाविक है, पर ये विदेश नीति की सफलता का मापदंड नहीं हो सकता है.

जहाँ तक पूर्ववर्ती सरकारों का विषय है, सत्ता के लिए जोड़तोड़ व जातिगत/धार्मिक तुष्टीकरण की नीतियों से भाजपा बाहर नहीं निकल पाई है. जनता ने कांग्रेस पार्टी को केंद्र की सत्ता से बाहर का रास्ता इसीलिये दिखाया कि तालाब का पानी सड़ने लगा था, जिसमें ऊब और डूब दोनों होने लगी थी

अंत में आप भी मनन करें कि क्या वाकई party with difference  की भावना का अंत हो चुका है.
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