सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नव-वर्ष संकल्प

चलो एक साल और चल बसा. जाते जाते बहुत कड़वी यादें छोड़ गया. पूरे साल भर आंदोलनों, अव्यवस्थाओं व अनाचारों का घुन्ध छाया रहा. इसमें इस बेचारे साल का क्या कसूर? कसूर तो हमारा है, जो सालभर बुराइयों के इर्दगिर्द घूमते रहे.

अगर शब्द मूक होते तो शायद ये लफड़े इतने नहीं बढ़ते, और अगर हर मामले में राजनीति नहीं होती तो ये झगड़े भी इतने नहीं फैलते.

यहाँ विदेशों की बात नहीं, अपने ही देश के बारे में सोचना है, जो कि कहने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है, पर दुर्भाग्य यह है कि हम लोकतंत्र के नाम पर भ्रष्टतंत्र तथा भीड़तंत्र में जी रहे हैं.

कोई एक क्षेत्र बीमार होता तो ईलाज आसान होता, लेकिन यहाँ तो पूरे कुँएं में भांग पड़ी है. हम एक दूसरे पर कीचड़ उछाल कर सभी कीचड़ में नहा रहे हैं.

इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्तमान में कमजोर नेतृत्व व कमजोर इच्छाशक्ति के कारण अराजकता की स्थिति बनी हुई है, पर यह बात भी सच है कि "जैसे फूल होंगे वैसी ही माला बनेगी."

राजनैतिक विचारधारा के पूर्वाग्रहों के कारण यदि हम इस सारे गड़बड़झाले का दोष किसी एक या दो व्यक्तियों पर इंगित करते हैं तो उचित नहीं है क्योंकि कहीं न कहीं हम सब स्वार्थी और दोषी हैं. जरूरत है आत्मलोचन किया जाये.

केवल क़ानून के डर से अपराधों पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता है, मूल में अपने घरों से पहले स्वयं, फिर बच्चों को संस्कार देकर चरित्रवान बनाने की कोशिश होनी चाहिए.

देश में नैतिकता, एकता, व राष्ट्रप्रेम का जज्बा जगाने के लिए सभी को मिलकर काम करना पड़ेगा. इसके लिए प्रिंट मीडिया तथा इलैक्ट्रोनिक मीडिया को ज्यादा अनुशासित रखना पड़ेगा. पीतपत्रिकारिता की जो होड़ आज चल पडी है, उस पर अंकुश लगाना होगा. इसमें सिनेमा का रोल भी अहम है, जिसे फूहड़ नचकनिया की तरह खेल नहीं दिखाने चाहिए. इन सब विषयों पर ईमानदारी से राजनीति से ऊपर उठकर चलना पड़ेगा.

अंत में इस साल के ‘सूतक’ को अगले नववर्ष में नहीं ले जाने का संकल्प करना चाहिए.
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शनिवार, 29 दिसंबर 2012

दामिनी के नाम

दामिनी !
तुम नेपथ्य में चली गयी. करोड़ों आँखों को नम कर गयी. देखो, मरना तो एक दिन सभी को है, मगर जिस तरह तुमको जाना पड़ा, उस पर पूरा देश शर्मिन्दा और घायल है. तुम जिस घनीभूत पीड़ा को झेल कर गयी हो, उसकी कसक यहाँ युगों तक महसूस की जाती रहेगी. जब जब आसमान में घनघोर घटाओं के बीच दामिनी दमकेगी, सुजनों के लिए प्रकाश और दरिंदों के लिए चाबुक का भान करायेगी.

तुम्हारे इस बलिदान से माताओं, बहुओं और बेटियों के लिए सुरक्षा की सोच उभर कर सामने आई है. तुम मातृशक्ति की प्रेरणा की मशाल बन गयी हो.

तुम एक सितारा बन गयी हो. दूर क्षितिज में अमर ज्योति बन कर बस गयी हो. हम तुम्हें सजल नेत्रों से निहारते रहेंगे, पर तुम्हारे चले जाने का बहुत दर्द तो है. ये शब्द्पुष्प विनम्र श्रद्धांजलि के रूप में तुम्हें अर्पित हैं.
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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

मातृ देवो भव:

सीकर के नजदीक गाँव में रहने वाली एक गरीब विधवा, रतनी बाई, ने मेहनत मजदूरी करके अपने इकलौते बेटे हरिलाल को हाईस्कूल तक पढ़ाया और रिश्तेदारों की सलाह पर उसे राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में रोजगारपरक ट्रेनिंग के लिए दाखिला दिलाया. वह ‘टर्बाइन आपरेटर’ का कोर्स पूरा करके बेरोजगारों की सूची में आ गया. रोजगार दफ्तर के माध्यम से उसे एक दिन राजस्थान के ही कोटा शहर के एक नामी उद्योग से बुलावा आ गया और वह नौकरी भी पा गया.

माँ बहुत खुश थी. बेटा जल्दी नौकरी पा गया था, पर घर से सैकड़ों कोस दूर भेजने में उसे बड़ी चिंता भी हो रही थी. यह गरीब लोगों मजबूरी रहती है कि रोजगार के सिलसिले में दूर दराज जाना ही पड़ता है. अपने लाड़ले से बिछुड़ने की त्रासदी रतनी बाई जैसी सैकड़ों-हजारों माँओं को झेलनी ही पडती है. हरिलाल भावनात्मक रूप से अपनी माँ से बहुत नजदीक से जुड़ा हुआ था. सोचता था कि रहने की ठीक ठाक व्यवस्था होने पर माँ को भी अपने पास कोटा ही बुला लेगा. यद्यपि माँ तो अभी से कहने लगी थी कि वह घर छोड़ कर कहीं नहीं जायेगी. वह अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहती थी. उसने अगले ही साल हरिलाल का विवाह भी कर दिया.

यह आम मनुष्यों की प्रवृति है कि अपने जीवन की अतृप्त आकाक्षाओं को अपने बच्चों में पूरा होते हुए देखना चाहते हैं. अनपढ़ रतनी बाई चाहती थी कि बेटे के लिए खूब पढ़ी-लिखी सुन्दर बहू मिले, सो संयोग से जाति-रिश्तेदारी में ही उसकी पसन्द पूरी हो गयी. एक ग्रेजुएट लड़की, दमयंती, से उसका रिश्ता हो गया. सभी नाते-रिश्तेदार रतनी बाई के भाग्य को सराहने लगे. उसने इस मुकाम तक पहुँचने में कितने पापड़ बेले, कितने कष्ट उठाये, वे सब लोगों की नजर में नहीं रहे.

बहू दमयंती एक खाते-पीते परिवार से आई थी. उसे सासू जी का कच्चा घर बिलकुल पसन्द नहीं आ रहा था.विवाह के चंद महीनों के बाद ही वह पति के पास कोटा चली आई. हरिलाल अपनी पत्नी पर पूरी तरह मोहित रहता था. उसकी हर बात पर पलक-पावड़े बिछाये रखता था. यह स्वाभाविक भी होता है. माँ से अकसर अपने एक दोस्त के मोबाईल के माध्यम से बात करता रहता था. दमयंती सीकर आने जाने के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ा करती थी. सीकर जाना भी पड़े तो ज्यादा समय झुंझुनू अपने मायके में बिताना पसन्द करती थी. माँ तरसती रहती थी. सोचती थी कि कोई अपने स्तर की बहू लाई गयी होती तो आज यह बात नहीं होती. माँ का मन है सो यह भी सोचती थी कि चलो बेटा खुश है तो सब अच्छा है.

अगले वर्ष दमयंती ने अपने पीहर में ही अपने पुत्र को जन्म दिया और वहीं से कोटा चली गयी. हरिलाल पूरी तरह उसके वश में था. जैसा वह कहती थी, वह वैसा ही करता था, पर हरिलाल के मन में कहीं ना कहीं चोर तो बैठा रहता था, जो उसे नित्य कचोटता रहता था कि माँ का यथोचित ध्यान नहीं रख पा रहा है. खर्चा-पर्चा भी जिस प्रकार माँ को भेजा करता था, वह अनियमित हो गया था. दमयंती का तर्क होता था कि पन्द्रह हजार के वेतन में घर का किराया और रोज का खर्चा बमुश्किल चल रहा है, माँ तो इतना खुद कमा लेती हैं कि गुजारा ठीक चल जाना चाहिए. माँ को साथ में रखने की बात भी कई बात दबे स्वर में हरिलाल ने दमयंती के सामने कही, पर वह नहीं चाहती थी कि माँ की निगरानी में रहे. वह कहती थी, “माँ मेहनत मजदूरी वाली है. यहाँ बैठी नहीं रह सकेगी. यहाँ लाकर क्या करोगे? वे वहीं खुश रहती हैं.” हरिलाल पत्नी की बात पर घुग्घू बन कर चुप हो जाता, पर दिल में दर्द तो छुपा कर रखता ही था.

समय निरंतर भागता रहता है. उनका बेटा नितिन अब तीन वर्ष का होने को आया है. दशहरा मैदान में एक महीने तक चलने वाला मेला चल रहा है, जहाँ अनेक कौतुक व सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं. तरह तरह का सामान बेचने वाली दुकानें-बाजार सजती हैं. कोटा में रहने वालों को मेला घूमने का बड़ा शौक होता है. बेटे को लेकर हरिलाल सपत्नी वहां पहुँचा, बड़ी भीड़ थी. अंगुली पकड़कर चलने वाला बच्चा एकाएक थोड़ी सी नजर चूकने पर भीड़ में कहीं खो गया.

माँ-बाप दोनों परेशान हो उठे. ढूँढते रहे, पर नितिन नहीं मिला. बच्चों के खोने-पाने वाले पांडाल में रिपोर्ट लिखवाई. दमयंती बच्चे के विछोह के कारण बदहवाश हो गयी, रोने चिल्लाने लगी. उसकी हालत देख कर हरिलाल भी घबरा गया.

लगभग एक घन्टे के बाद पांडाल से बच्चे की मिलने की सूचना लाउडस्पीकर पर आई तो जान में जान आई. दमयंती को जब उसका बच्चा मिला तो लिपट-लिपट कर देर तक चूमती रही. हरिलाल इस सारे परिदृश्य में अपनी माँ रतनी बाई व खुद को देखने लगा. उसने तुरन्त सीकर जाकर अपनी माँ के पास जाने का कार्यक्रम बना डाला. दमयंती ने कहा, “इतनी जल्दी बिना प्रयोजन के सीकर क्यों जा रहे हो?”

हरिलाल ने उससे कहा, “बच्चे से एक घन्टे तक बिछुड़ने पर तुम इतनी परेशान रही, विलाप करती रही, मेरे भी होश उड़ा दिये थे, पर मेरी माँ के बारे में तुम कभी नहीं सोचती हो कि उसका बेटा उससे इतने अरसे से दूर है. उसके दिल को क्या बीतती होगी? तुम कितनी स्वार्थी हो?”

इस प्रकार माँ के प्रतिसमार्पित भाव से वह सीकर गया और अपनी माँ को अपने साथ कोटा लेकर आया. अब दमयंती को भी माँ के अंत:करण के प्यार का आभास हो गया है.

माँ तो माँ है. उसको बिना किसी गिला शिकवा के अपने बच्चों के नजदीक रहना स्वर्गीय सुख देता है. हरिलाल का तो मानो बचपन फिर से लौट आया है.
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मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

महामना

आदमी यों ही बड़ा नहीं बनता है, उसके बड़प्पन या महानता के पीछे उसकी लगन, सच्चाई औए अध्यवसाय होता है. दुनिया भर में मानव जाति की सेवा करने वाले मनीषियों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपने चिरंतन कर्मों के द्वारा महत्ता प्राप्त की है.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, जिसे B.H.U. के नाम से भी जाना जाता है, के वर्तमान विराट स्वरुप को देख कर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि इसके संस्थापक पण्डित मदन मोहन मालवीय जी थे, जो एक सनातनी व्यक्ति थे, तथा अंग्रेजी, हिन्दी व संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे. वे अच्छे वकील, समाज सुधारक और शिक्षाशास्त्री भी थे. बड़ी बात यह भी है कि वे स्वतन्त्रता संग्राम के पुरोधा भी रहे. ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लड़ाई में वे कई बार जेल भी गए. इसीलिये उनको ‘महामना’ यानि महान पुरुष की उपाधि मिली.

इस विश्वविद्यालय की विधिवत स्थापना संन १९१५ में हुई, लेकिन इसकी परिकल्पना उन्होंने सन १९०४ में ही कर डाली थी. डॉ.एनी बेसेंट के सेंट्रल हिन्दू कॉलेज का आधार उनको मिला, इतनी बड़ी परियोजना के लिए राजा-रजवाडों व सेठों के द्वारा प्रदत्त धन राशि का सदुपयोग किया गया. महामना मालवीय जी ने लिखा है कि चंदे की शुरुआत एक गरीब औरत द्वारा दिये गए एक पैसे से हुई थी. उनके बारे में प्रेरणास्पद संस्मरणों में दिल को छूने वाली एक धटना इस प्रकार है:

दक्षिण में हैदराबाद रियासत के तत्कालीन ‘निजाम’ अकूत सम्पति के मालिक थे. उनसे भी अपने संस्कृत विश्वविद्यालय के लिए चन्दा माँगने मालवीय जी हैदराबाद गए. निजाम आदतन बेहद कंजूस व अंतर्मुखी व्यक्ति थे. उन्होंने चन्दा देने से इनकार कर दिया. हैदराबाद प्रवास से लौटने से पहले उन्होंने वहाँ पर एक सेठ की शव यात्रा में उसके परिजनों द्वारा शव पर परखे गए चांदी के सिक्कों को अन्य भिखारियों की तरह उठाना शुरू कर दिया. किसी परिचित उनको पहचान लिया और सिक्के उठाने का प्रयोजन पूछा तो उन्होंने बेबाकी से कहा, “कोई ये ना कहे कि मैं हैदराबाद रियासत से खाली हाथ लौटा हूँ, इसलिए ये सिक्के उठा रहा हूँ.” यह बात दूर तक गयी और दान दाताओं की कमी नहीं रही.

इस महान शिक्षण संस्थान की बुनियाद की एक एक ईंट गवाह है कि महामना मदन मोहन मालवीय जी ने अथक प्रयास करके इस आधुनिक नालंदा को स्थापित किया था. आज बनारस तथा मिर्जापुर के दो बड़े अलग अलग परिसरों में यह विश्वविद्यालय फैला हुआ है. इसकी इस विराट परिकल्पना के चितेरे महामना को शत् शत् प्रणाम.
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रविवार, 23 दिसंबर 2012

चुहुल - ४०

(१)
एक दांत का डॉक्टर अपने मरीज के मुँह का मुआयना करके बोला, “आपके लिए एक अच्छी खबर है, पर एक बुरी खबर भी है. बोलिए, पहले कौन सी सुनना चाहते हो?”
मरीज खुशी से उछलते हुए बोला, “डाक’साहब पहले खुशी की खबर सुनना चाहूँगा.”
डॉक्टर बोला, “आपके सब दांत बढ़िया व स्वस्थ हैं. किसी दांत का भी एनेमल कटा हुआ नहीं है."
“और बुरी खबर?” पूछते हुए मरीज व्यग्र हो उठा.
डॉक्टर ने बताया, “आपके पूरे मसूड़े खराब हो चुके हैं. इनमें भयंकर इन्फैक्शन है. इनके ईलाज के लिए आपके सारे दांत निकालने पड़ेंगे.”

(२)
अपने शराबी पति से एक महिला बोली, “मुन्ने के पापा, जब आप अंग्रेज़ी शराब पीकर आते हो तो मुझे ‘परी’ नाम से पुकारते हो, और जब देसी शराब पीकर आते हो तो ‘रानी’ कहते हो. आज ये मुई कौन सी पीकर आये हो, बार बार मुझे ‘चुड़ैल’ कहे जा रहे हो?”

(३)
एक दिलफेंक शायर एक सुन्दरी पर फ़िदा हो गए. जब भी सामना होता तो उसकी खूबसूरती पर कुछ ना कुछ सुनाया करते थे, पर वह सुन्दरी उनके इस व्यवहार से तंग थी. उसके दिल में शायर साहब के लिए कोई प्यार-व्यार नहीं उपजता था.
एक दिन खीझ कर उसने शायर से पूछ ही लिया, "आखिर आप चाहते क्या हैं?”
शायर बोले, “तुम्हारे इन नरम हसीं जुल्फों के साये में रहना चाहता हूँ.”
सुन्दरी ने तुरन्त अपना जूड़ा खोला, विग उतारा, और शायर को पकड़ा कर आगे बढ़ गयी.

(४)
एक आदमी फोटो स्टूडियो में जाकर फोटोग्राफर से बोला, “भाई साहब, क्या आप मेरी पासपोर्ट साइज में ऐसी फोटो खींच सकते हैं, जिसमें सर की टोपी और पैर के जूते भी नजर आयें?”
फोटोग्राफर हँसते हुए बोला, “हाँ क्यों नहीं, जूते उतार कर सर पर रख लीजिए.”

(५)
एक आदमी को सरेआम सड़क पर अपनी पत्नी को पीटने के आरोप में गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ उसने अपना जुर्म भी कबूल कर लिया. जज साहब ने उसे १०० रूपये और ७५ पैसे जुर्माना करके जमाँनत दे दी.
अभियुक्त को जुर्माने की रकम अजीब सी लगी, बोला, “जज साहब, जुर्माना १०० रुपये तो ठीक है, पर ये ७५ पैसों का क्या हिसाब है?”
जज साहब बोले, “वारदात सड़क पर हुई इसलिए यह इंटरटेंनमेंट टैक्स वसूला जा रहा है.”
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