सोमवार, 29 अप्रैल 2013

मशक पुराण

इस्लाम धर्म में वर्ण व्यवस्था या जाति प्रथा तो नहीं है, पर जो आदमी जैसा पेशा करता है या जिसका जो खानदानी धन्धा होता है, उसी के अनुसार उसकी जाति बन गयी है. कुछ देश-काल का भी प्रभाव रहा है क्योंकि मुग़ल काल में बहुत से हिन्दुओं का धर्मांतरण हुआ था और उनके बहुत सी रीति रिवाज व आस्थाएं छूट नहीं पाए.

चाचा जलेब खां अब तो अस्सी साल की उमर पार कर गए हैं. वे हमारी म्युनिसिपैलिटी में भिश्ती के पद पर तैनात थे, उनके अलावा और पाँच लोग थे जो चमड़े के मशकों में कुँवे, बावडी, तालाब, या नदी से पानी भर के पीठ-कंधे में लाद कर लाते और घरों में पानी भर जाते थे. वे मेहतर को साथ लेकर गली की नालियों को धुलवाया भी करते थे. कारण यह था कि तब घरों में नल नहीं होते थे, पम्पों का इस्तेमाल भी नहीं हो सकता था क्योंकि बिजली केवल बड़े शहरों में या बरसात में आकाश में दिखाई देती थी. जेनरेटर नाम के यंत्र को भी लोग नहीं जानते थे.

इन ६०-७० वर्षों में दुनिया बहुत बदल गयी है. म्युनिसिपैलिटी में भिश्ती के पद खतम कर दिये गए हैं. भिश्तियों की आज की पीढ़ी, भिश्ती कहने पर नाखुश होती है. वे अपने नाम के आगे अब्बासी लगाते हैं. कहते हैं कि पैगम्बर साहब के चाचा अब्बास साहब को इनके पूर्वज पानी पिलाते थे और इसी आधार पर अब्बासी कहा जाता है.

चलो, भिश्ती शब्द अब म्यूजियम में चला गया है, पर हिन्दी, उर्दू और फारसी की पुरानी परी कथाओं में भिश्ती शब्द हमेशा ज़िंदा रहेगा. इसकी कुछ मीठी यादें भी अभी ताजी हैं.

बकरी की चमड़ी की बनी मशक ही भिश्ती की पहचान होती थी. इतिहास गवाह है कि मशक द्वारा नदी पार करा ने की  मदद के बदले में  बादशाह हुमायूँ ने  निजाम भिश्ती को एक दिन का सुलतान बनाया था.

कहीं कोई चोरी हो जाये तो ‘पुछ्यारा’ (नजूमी) बुलाया जाता था. उसके पास एक ‘हाजरात’ की डिब्बी होती थी, जो काले जूता-पालिश की तरह दिखती थी. ’पुछ्यारा’ मोहल्ले के किसी मासूम/निष्पाप बच्चे को बिठा कर उस काली डिब्बी को खोल कर उसकी आँखों के निकट ले जाकर हिप्नोटाइज सा कर देता था और क्रमवार बोलते हुए निम्न प्रक्रिया अपनाता था:

झाड़ूवाले को बुलाओ.
बच्चे को झाड़ूवाला दिखने लगता था.
भिश्ती को बुलाओ.
बच्चे को मशक से पानी छिड़कने वाला गली का भिश्ती दिखने लगता था.
जाजम बिछानेवाले को बुलाओ.
बच्चे को दरी बिछानेवाला एक आदमी दरी बिछाते हुए नजर आता है.
चोर को बुलाओ.

बच्चे को वह आदमी नजर आने लगता था, जिसके चोर होने की चर्चा उसके घर परिवार या साथियों के बीच सुनी होती थी.

बस चोर का नाम घोषित हो जाता था, यह सब एक टोटका जैसा भी होता था, आसपास किसी कच्चे चोर ने चोरी की हुई होती थी तो वह डर के मारे पहले ही चोरी की हुई चीज को घर में चुपके से कहीं फेंक जाता था. इस टोटके की कोई विश्वसनीयता नहीं होनी चाहिए, लेकिन अनपढ़-श्रद्धानवत लोग तो इसे मानते ही थे. इस प्रकरण में भिश्ती का पात्र भी नाटक में होने से चर्चा में रहता था.

एक आम कहावत भी है कि घर के सारे काम करने में व्यस्त रहने वाले व्यक्ति को लोग ‘पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर’ की उपाधि से नवाजा करते हैं. इसमें भिश्ती जो चरित्र है वह मुग़ल काल से ही शहरी मुलाजिमों में होता था. जलेब खां तो भिश्ती शब्द की उत्पत्ति ‘बहिश्त’ यानि स्वर्ग से सम्बंधित बताते हैं.

बहरहाल ‘भिश्ती’ शब्द अब ऐतिहासिक हो चला है उसकी जो मशक थी, वह किसी छोटे चौपाये जानवर की साबुत खाल से बनी होती थी. जानवर की खाल को रेगर-चर्मकार इस तरह से बनाते थे कि वह एक बड़ा थैला होता था उसका एक मुँह होता था जिसे भिश्ती अपनी मुट्ठी से भींचे रहता था. उस चमड़े को पूरी तरह से अनुकूलित यानि कंडीशन्ड किया जाता था. मशक के पानी में चमड़े की गन्ध या रस मिश्रित नहीं रहता  था.
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शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ठलुआ पंचायत - ४

आज की बैठक देश में बढ़ते हुए यौन अपराधों व उन पर काबू पाने में असहाय प्रशासन पर विचार करने के लिए बुलाई गयी थी. उपस्थिति २१ सदस्यों की रही.

न. १ - जैसा कि आप सभी सज्जनों को मीडिया के जरिये मालूम हो रहा है कि पिछले दिसम्बर माह में ‘दामिनी-काण्ड’ के बाद देश के सभी तबकों में इसके विरोध की ज्वाला जलने लगी थी. संसद में कड़े क़ानून की पैरवी हो रही थी, लेकिन अभी भी लगता है कि स्थिति में कोई सुधार के लक्षण नहीं हैं. न्यूज चैनलों की सुर्ख़ियों में हर रोज नए नए यौन अपराधों की चर्चा व दुराचार की खबरें बुरी तरह परोसी जा रही हैं. इन जघन्य समाचारों की आड़ में राजनीतिज्ञ लोग कुर्सी वालों की कुर्सियां खिसकाने की बात पर अड़े हुए हैं तथा आम धारणा बनाई जा रही है कि इन सब के लिए पुलिस वाले भी दोषी हैं. कहा जा रहा है कि ‘उनकी सोच आज भी ब्रिटिशकालीन है. उनके तौर तरीके ठीक नहीं हैं, पुलिस अपराधियों को संरक्षण देती है.’ आप सभी अनुभवी, वरिष्ठ नागरिक हैं, अपने अनुभवों से इसके निदान और समाधान बतावें.

न. ४ - ये पूरी तरह सत्तानशीं लोगों की नाकामी व अयोग्यता का नतीजा है. दिसम्बर काण्ड से कोई बड़ा सबक नहीं लिया गया. अब तक घर घर, गली गली इसका सन्देश पंहुचाया जाना चाहिए था. अपराधजन्य भय आम लोगों की सोच में आ जाना चाहिए था.

न. ११ – पर क्या ये सच नहीं है कि महिलाओं या छोटी बच्चियों के साथ दुराचार करने वाले अधिकतर मामलों में उनके नजदीकी लोग पाए जाते हैं? ऐसे में ये कहना कि केवल सरकार दोषी है ये बात हजम नहीं होती है. पुलिस की कार्यपद्धति अवश्य विचारणीय मुद्दा है.

न. २५ – (जनार्दन जोशी- रिटायर्ड प्रिंसिपल) देश के सामाजिक ढांचे में आज के सिनेमा का अहम रोल रहा है. सेंसर बोर्ड के लोग अपनी पाश्चात्य दृष्टि से देखते हैं, जिसका कुप्रभाव हमारे छोटे छोटे बच्चों में देखा जा सकता है. यौन अपराधों के दृश्य जब बेड-रूम तक में दिखाए जा रहे हों तो अवश्य ये एक सांस्कृतिक हमला है जिसका नतीजा आप देख रहे हैं.

न. ५ – ये तो सही है कि सिनेमा से बच्चे अपराध, गुंडागिरी आदि सीखते हैं, लेकिन पुलिस भी अपराध और अपराधियों को छिपाने में बड़ा रोल अदा करती है. बड़े बड़े अपराधी अदालतों से छूट जाते हैं, क़ानून का भय रहा ही नहीं. केजरीवाल तो कहते हैं कि “संसद व विधान सभाओं में आधे से ज्यादा अपराधी बैठे हैं.” ऐसे में आप लोग सुधार की बातें कर रहे हैं.

न., ४- हमको स्वीकारना होगा कि वर्तमान पीढ़ी संस्कारविहीन हो चली है. नौजवान बच्चे चरित्र को समझते ही नहीं. जब माता-पिता सभी भोगवादी हो चले हैं तो बच्चों से क्यों उम्मीद की जा रही है? नैतिक शिक्षा घर से शुरू होती है और स्कूलों में भी आदर्श जीवन मूल्यों के बारे में बच्चों को घोट घोट कर पिलाया जाना चाहिए.

न. ८ – कोई भी सरकार आये, जब तक ‘ग्रास रूट’ से इस दिशा में काम नहीं होगा, स्थिति और बिगड़ती जायेगी. जहाँ तक पुलिस वालों की बात है पुलिस वाले भी तो हमारे ही परिवारों से आते हैं. जरूरत है कि इनको ट्रेनिंग में लाठी-गोली चलाने के बजाय सेवा और सहायता करने के पाठ ज्यादा पढ़ाए जाएँ. इनके प्रति समाज का नजरिया अपने आप बदलने लगेगा.

न. ६ - यौन अपराध अनंतकाल से होते रहे हैं. पहले उजागर करने में पीड़ित पक्ष भी डरता था, अब मीडिया बहुत सक्रिय हो गया है चटखारे ले कर एक ही समाचार को कई दिनों तक घसीटता है. अब कठोर क़ानून बनते ही उस पर अमल होना चाहिए. दो चार को मृत्युदंड मिलेगा तब भय पैदा होगा.

न. १८ – (गोविन्द भट्ट, रिटायर्ड फार्मासिस्ट) आजकल नगर पचायतों के चुनाव हो रहे हैं. चुनाव लड़ने वाले युद्ध स्तर पर अपनी बात कह रहे हैं. इसी तरह की मुहिम पूरे देश में चलाई जानी चाहिए.

न. १० – तुलसी दास ने रामायण में लिखा है, ‘भय बिन होय न प्रीत’ जब तक अपराधियों को सरेआम सजा नहीं दी जायेगी, इस पर कंट्रोल होने वाला नहीं है. कई अरब देशों में देखिये वहाँ अपराध करने पर तुरतदान सजा मिलती है और अपराधों का ग्राफ बहुत नीचे रहता है.

न. ४ - लेकिन अपना देश लोकतांत्रिक है. यहाँ ना तो राजशाही और ना ही तानाशाही है. कोई भी सजा पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बिना नहीं दी जा सकती है.

न. १- मासूम बच्चों पर यौन अत्याचार करने वाले मामलों में स्पेशल अदालतें अधिक से अधिक एक साल में अपना फैसला दें. जजों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए.

न. २२ (आर.एस.राणा, रिटायर्ड आर्मी कर्नल) हर बात के लिए पुलिस को दोष देना ठीक नहीं है. राजनैतिक दबावों में जिस तरफ पुलिस को काम करना पड़ता है, उससे सही व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती है. होना ये चाहिए कि चौकियों तथा थानों में स्थाई नागरिक कमेटियां बनाई जाएँ, इन कमेटियों को कानूनी मान्यता दी जाये.

न. १- ये जानकार अच्छा लगा कि आप सभी सदस्य इस ज्वलंत समस्या पर चिंतित हैं, हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम जिस समाज में रहते हैं, अपनी हद तक स्वस्थ व निष्कलंक रखने का पूरा प्रयास करें. आज की मीटिंग की पूरी रिपोर्ट सभी जन प्रतिनिधियों और प्रेस को भेजी जायेगी.

धन्यवाद के साथ बैठक समाप्त की गयी.
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गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

चित्तवृति

पाप-पुण्य से परे
 अप्रभाषित-
  और अपरिमित,
   विकारी भी है
    ये चित्तवृति  है.

अदृश्य अनाहत सी
 अठखेलियां करती है
  किसी को सन्मार्ग –
   किसी को भटकाती है
    ये चित्तवृति है.

ये मन की चितवन है
 बहुत चँचल है
  कोई भूल नहीं-
   चाहे लगे नहीं अनुकूल कभी,
    ये चित्तवृति है.

जीवन को गति मिलती है
 तन-मन में स्पंदन से
  चाहे-अनचाहे भी
   स्पंदन देती है
    ये चित्तवृति है.

ये तो सुरताल-
 बिना बजाये जो बजती है
  ये राग नि:शब्द-
   यदाकदा जो छा जाती है.
    ये चित्तवृति है.
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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

खुली खिड़की

इतिहासकार कहते हैं कि ‘हिंदू’ शब्द ‘सिंधु’ का अपभ्रंश है. हिन्दू नाम का कोई धर्म नहीं है. यह तो सनातन धर्म है जो प्राकृतिक रूप से विकसित हुआ है. इसमें वर्ण व्यवस्था के पक्ष या विपक्ष में अनेक प्रकार के तर्क किये जा सकते हैं, पर निष्पक्ष रूप से देखें तो ऐसा लगता है कि सनातन व्यवस्था में बहुत विकृतिया भी प्रवेश करती रही. चार वर्ण--ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, सभी कार्य तथा व्यक्ति के चरित्र पर आधारित होते थे, पर धीरे धीरे ये जातियां बन गई और उनमें भी उपजातियां, उपजातियों के पीछे गोत्र की पूंछ, गोत्र की पहचान में गाँव-प्रदेश का इतिहास, इस प्रकार सब उलझता चला गया. गोत्र से अपने को वैदिककालीन पौराणिक ऋषियों-मुनियों की संतान बताया जाता है. इतिहास यह भी बताता है कि आर्य लोग उत्तर-पश्चिम यानि ईरान-अफगानिस्तान की दिशा से आर्यावर्त में आये थे. उत्तर में मंगोलिया व चीन की तरफ से शक और हूँण भी इस देश में आये. यहाँ के आदिवासी द्रविड जातियों से लड़ते-खपते यहीं के होकर रह गए. बाद में मुस्लिम आक्रमणकारियों/ शासकों के तलवार के जोर पर व दबाव में बड़े स्तर पर धर्म परिवर्तन हुए. अंत में यूरोप से व्यापारियों के साथ ईसाईयत आई जिन्होंने धर्म प्रचार को भी अपने मिशन में रखा था. सेवा-सुश्रुषा और लालच देकर देश के पूर्वी व दक्षिणी इलाकों तथा गरीब आदिवासियों में अपनी जगह बना ली.

सनातन धर्म तो बहुत पहले खतम हो गया होता अगर जगतगुरु आदि शंकराचार्य इसे नवजीवन देने के लिए चारों ओर मर्यादाओं के खूंटे ना बाँधते.

मध्यकाल से बहुत पहले ही सातवीं शताब्दी में बौद्ध व जैन धर्मों का प्रादुर्भाव इसलिए हुआ कि सनातन धर्म में बहुत पाखण्ड घुस आया था. यह दीगर बात है कि मूर्तिपूजा जैसे विश्वासों का विरोध करने वाले ये धर्मावलंबी भी अपने नए देवताओं की मूर्तियां बनाकर पूजा करने लगे. इसी तरह बाद में सिख पंथ को भी गुरुओं ने बहुत पवित्रता में ढालते हुए हिंदुओं के रक्षार्थ खड़ा किया. लेकिन अब वे हिन्दू धर्म से अपना कोई सीधा नाता नहीं मानते है. उनका अलग धर्म हो गया है. आज हमारे सभी धर्मों में कट्टरता आ जाने से आपस में द्वेष भावना और अविश्वास रहता है. कहने को सर्व धर्म समभाव का सिद्धांत है, पर असल में ऐसा है नहीं. रही सही कसर वर्तमान राजनीति ने पूरी कर दी है.

इस्लाम में कोई वर्ण व्यवस्था नहीं है, लेकिन हम देख रहे हैं कि भारत के सारे मुसलमान भी जातियों में बंटे हुए हैं. अपनी पहचान बताने के लिए कोई शेख, पठान, अंसारी, हनीफी, अब्बासी, कुरैशी, फारुखी, या नकवी आदि जातिसूचक सरनेम लगाते हैं.

शिया सुन्नी फिरके हैं, अहमदियों को तो मुसलमान माना ही नहीं जा रहा है, यहाँ तक कि मुसलमान बुद्धिजीवी देवबंदी अथवा बरेलवी के नाम से अलग अलग राग अलापते हैं. कुल मिलाकर ऐसा लगता है जिस प्रकार भारतीय समाज का गठन हुआ है, उसमें मुसलमानों पर हिंदुओं की जाति संरचना का गहरा प्रभाव है. स्वाभाविक भी लगता है क्योंकि अधिकतर मुसलमानों के वंश हिंदुओं से ही परिवर्तित हैं. हमारे एक प्राध्यापक का नाम शफीउल्ला तिवारी था. ऐसे कई उदाहरण और भी हैं. इस प्रकार देश, काल या समाज की छाया जा नहीं सकती है.

यहाँ किसी धर्म को अच्छा या बुरा बताने के लिए समालोचना नहीं हो रही है, पर यह जरूरी है कि सामाजिक सुधार लाने के उद्देश्य से सभी को अपनी खिड़की खुली रखनी चाहिए, अन्यथा जो प्रतिगामी व कट्टरपंथी बने रहेंगे वे हर क्षेत्र में पिछड़ते चले जायेंगे.
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रविवार, 21 अप्रैल 2013

जब मैं चीफ गेस्ट बना

जिस तरह श्राद्ध पक्ष में श्राद्धकर्मी पंडितों तथा काले कौवों की मांग व क़द्र एकाएक बढ़ जाती है, उसी तरह स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर नेताओं की भी बहुत पूछ होती है क्योंकि गली-गली, गाँव-गाँव में अब स्कूल हो गए हैं. सभी स्कूल वाले राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत होकर अपने स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया करते हैं. समारोह को चार चाँद लगाने के लिए एक मुख्य अतिथि यानि चीफ गेस्ट की तलाश भी की जाती है.

ये सन १९९२ या ९३ की बात है. मैं तब लाखेरी सीमेंट उद्योग के कर्मचारियों की युनियन का अध्यक्ष हुआ करता था. स्थानीय अखबारों में कभी कभी मेरा नाम भी छप जाया करता था, लेकिन मेरा कार्यक्षेत्र अपनी सीमेंट कम्पनी के कर्मचारियों व मैनेजमेंट से सम्बन्धों तक ही सीमित होता था. मैं कोशिश करता था कि राजनैतिक दलों के कार्यकलापों से दूरी बना कर रखी जाये. फिर भी विशिष्ट मौकों के लिए एक जोड़ी खादी का लंबा कुर्ता-पायजामा सिलवा रखा था (जो अभी तक अच्छी अवस्था में सुरक्षित है.)

१५ अगस्त से कुछ दिन पूर्व एक सुहानी सुबह मेरे घर पर एक जीप रुकी, जिसमें से एक संभ्रांत सज्जन राजस्थानी वेशभूषा में उतरे. उनके साथ आये व्यक्ति ने उनका परिचय दिया के वे ‘बड़ा खेड़ा’ के जागीरदार- ‘बड़े बना’ हैं (राजपुत्रों को ‘बना’ कहा जाता है). नाम मुझे अब याद नहीं आ रहा है क्योंकि मेरी स्मरणशक्ति अब जवाब देने लगी है. मैं कम्पनी के कैम्पस में निवास करता था उनका चाय-पानी से स्वागत किया. बातों बातों में उन्होंने अपने गाँव के मिडिल स्कूल के स्वतन्त्रता दिवस समारोह के लिए मुझसे इस ढंग से ‘चीफ गेस्ट’ बनने का अनुरोध किया कि मैं मना नहीं कर सका. वे अपनी सफल वार्ता करके चले गए, पर मैं चिंता में पड़ गया क्योंकि बड़ा खेडा १०-१२ किलोमीटर दूर था और ऊंचा नीचा धूल-भरा रास्ता था. उस बार बहुत दिनों से बारिश भी नहीं हुयी थी. मैं अपनी साइकिल या स्कूटर से वहाँ नहीं पहुँच सकता था (तब मेरे पास चौपहिया वाहन नहीं हुआ करता था) क्योंकि रास्ता बैलगाड़ी वाला था.

मैंने अपनी समस्या फैक्ट्री के तत्कालीन जनरल मैनेजर स्वनामधन्य श्री प्रेम कुमार काकू जी को बताई और कहा, “जिंदगी में पहली बार ‘चीफ गेस्ट’ बनने का मौक़ा मिल रहा है,” तो उन्होंने सहर्ष उस दिन कम्पनी की जीप ले जाने की स्वीकृति दे दी. मेरी बाछें खिल गयी और मैं इस राष्ट्रीय दिवस पर अपने भाषण की तैयारी में लग गया.

जब पूरी जीप ही मिल गई तो मैंने अपनी श्रीमती से कहा, “तुम भी चलो, राजस्थान के गाँव भी देख आओगी और चीफ गेस्ट के सत्कार का भी अनुभव करोगी.” वह उत्सुकता पूर्वक तैयार हो गयी. अवसर के अनुकूल सफ़ेद सूती साड़ी पहन कर मेरे साथ जीप में बैठ गयी. मैं समझता हूँ कि चीफ गेस्ट बनने का जितना रोमांच मुझे था उससे ज्यादा ‘चीफ गेस्ट की पत्नी’ होने का रोमांच मेरी श्रीमती को हो रहा था. रास्ते में इतनी धूल उड़ती चली कि बड़ा खेड़ा पहुँचने तक हम और हमारे कपड़ों का हुलिया बिगड़ गया.

बड़ा खेड़ा, बूंदी रियासत के हाड़ा राजा-राजपूतों के वंशजों/रिश्तेदारों का बहुत पुराना ठिकाना है. पहले समय में इस इलाके में पानी की बड़ी किल्लत थी. बड़ा खेड़ा के पास एक गाँव है, ‘लबान’ जिसके बारे में कहा जाता है कि वहाँ लोग पानी नहीं पिलाते थे इसलिए धरती शापित हो गयी थी. किवदंती है कि पौराणिक काल में जब श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ करवाने इस रास्ते से गुजर रहा था तो उसने उनसे बोझ उठाने का पारिश्रमिक माँगा था, पर यह सब पुरानी बातें हैं अब तो चम्बल नदी का पानी यहाँ नहरों से आता है. काली मिट्टी में खूब गेहूं, धान, सरसों व अन्य फसलें उगती हैं किसान समृद्ध और खुशहाल हैं.

बड़ा खेड़ा बड़ा गाँव है. यहाँ मेरे परम मित्र भूतपूर्व कांग्रेसी एम.एल.ए. स्वर्गीय नंदलाल बैरवा का ससुराल भी है तथा उनके बाद हुए भाजपा के वर्तमान एम.एल.ए. श्री बाबूलाल वर्मा का ननिहाल भी है. बाबूलाल वर्मा के पिता स्व. मांगीलाल भी फैक्ट्री के कर्मचारी थे और ये दोनों परिवार मेरे नजदीकी रहे हैं. बाबूलाल वर्मा आज भी मुझे ‘चाचा जी’ कह कर संबोधित करते हैं. बड़ा खेड़ा से हमारे कारखाने में बहुत से कामगार भी आते थे इसलिए मैं बहुत खुशी अनुभव कर रहा था.

जब हमारी जीप बड़ा खेड़ा स्कूल पर पहुँची तो देखा, लगभग ३०० बच्चे व दो सौ के करीब ग्रामीण नर-नारियों की भीड़ खुले खेल के मैदान में उपस्थित थे. बच्चे धूल भरे मैदान में लाइन से बैठे थे. हमारे जाते ही उठ खड़े हुए और एक मास्टर जी माइक पर से ‘भारत माता की जय, महात्मा गाँधी की जय और चीफ गेस्ट-जिंदाबाद’ के नारे लगवा रहे थे.

कार्यक्रम के संयोजक ‘छोटे बना’ (नाम उनका भी याद नहीं रहा, वे पंचायत के सरपंच भी थे) तथा अन्य विशिष्ट जन पूरी राजपूती आन-बान और शान से शोभा बढ़ा रहे थे. स्कूल के प्रधानाध्यापक, बड़े बना, छोटे बना और कुछ अन्य बुजुर्गों व बालक बालिकाओं ने मुझे और मेरी श्रीमती को मालाएं पहनाई, दिल गदगद हो गया.

चिलचिलाती धूप में खुले मैदान में कार्यक्रम, ध्वजारोहण व राष्ट्रीय गान से शुरू हुए, और बच्चों द्वारा कविता गीत और नाटक प्रस्तुत किये जाने लगे. उपस्थित जन समूह खूब आनंद लेते हुए तालियाँ बजा रहे थे. पर गर्मी के मारे मैं और मेरी पत्नी बेहाल हुए जा रहे थे. मैंने एक अध्यापक जी को पास बुला कर कहा, “मेरी श्रीमती को कहीं छाया में बिठा कर आइये,” मैदान के एक कोने में एक छोटा सा नीम का घना छायादार पेड़ था. वह अध्यापक एक कुर्सी उठाकर ले गया और उसे वहाँ बिठा आया. मैं भी छाया को तरस रहा था क्योंकि मेरे सर की खिड़की बाल न होने से ऊपर से खुली हुई थी. मैंने रुमाल से ढकने का प्रयास जरूर किया, लेकिन बहुत बेचैनी होती रही, पानी पीते रहा.

सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद शुरू हुआ भाषणों का दौर, पहले छोटे बना, फिर बड़े बना और प्रधानाध्यापक बारी बारी से बोलते रहे. बड़ी मुश्किल से माइक छोड़ पा रहे थे. उन सबके भाषणों में एक बात बार बार दोहराई जा रही थी कि बच्चों के लिए स्कूल में कमरे कम पड़ते हैं. अंत में बड़े बना ने कहा, “अब चीफ गेस्ट पाण्डेय जी स्कूल को अपनी फैक्ट्री की तरफ से आर्थिक अनुदान की घोषणा करेंगे. हमें आशा है कि इतनी राशि जरूर स्वीकृत करके जायेंगे जिससे स्कूल में कम से कम एक कमरा अवश्य बन सके.”

यह सुन कर मैं सकते में आ गया, पर स्थिति को सँभालते हुए मैंने बिना ज्यादा लागलपेट के सभी को स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा, “बड़े बना जी ने पहले इशारा किया होता तो मैं अपनी चेक बुक साथ लेकर आता. मैं चाहता हूँ कि यहाँ के सभी विद्यार्थियों को एक एक अलग कमरा मिले, इसके लिए जो भी अंशदान की जरूरत होगी स्वीकृत कर दी जायेगी.” बच्चों ने जोर से ताली बजाई , देखा देखी बात का अर्थ न समझते हुए भी उपस्थित जन समूह की हथेलियाँ भी बजने लगी. मैंने सभी को धन्यवाद देते हुए समारोह समापन की घोषणा भी कर दी. कार्यक्रम समाप्ति के बाद हमें ऊंचे टीले पर बनाजी की हवेली पर ले जाकर नमकीन सेवड़े, जलेबी और चाय का अल्पाहार कराया गया.

उनसे विदा लेकर करीब तीन बजे लाखेरी वापस आ सके. सपने संजोकर गए थे कि ठाकुर साहब के यहाँ दावत उड़ायेंगे, पर घर आकर खिचड़ी बनाई गयी, ठन्डे पानी से नहाकर शीतोपचार किया और पस्त होकर पड़ गए.

इसलिए उसके बाद से मैं कहीं भी ‘चीफ गेस्ट’ बनने से सीधे सीधे इनकार करता रहा हूँ..
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