शुक्रवार, 31 मई 2013

पचार गाँव की कहानी

(गाँव वालों की जुबानी)
मनोरथ पांडे अंग्रेजों के जमाने में पटवारी थे. पटवारी बहुत बड़े इलाके का हाकिम होता था. तब एकीकृत अल्मोड़ा जिला काफी लंबा चौड़ा था. पिथोरागढ़, चंपावत और बागेश्वर को तहसील का दर्जा भी प्राप्त नहीं था. पटवारी यद्यपि राजस्व विभाग का बड़ा अधिकारी नहीं होता था, उसे मात्र २५ रूपये माहवार वेतन मिला करता था, लेकिन उसकी जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती थी. राजस्व पुलिस व प्रशासनिक कार्यों में भी उसका दखल होता था. पटवारी तो पटवारी, उसका चपरासी जिसे सटवारी कहते थे उसके भी बड़े रुतबे होते थे. आम ग्रामीण उनसे भय खाते थे. ग्राम प्रधान तो इनकी खुट्टेबर्दारी करने को मजबूर होते थे. मालगुजारी वसूलने का कमीशन उनको मिला करता था. फौजदारी मामलों में मुलजिम को हथकड़ी पहनाकर जेल भेजने का अधिकार पटवारियों को होता था.

मनोरथ पांडे मिडिल पास थे. अल्मोड़ा में उनके बुआ-फूफा रहते थे. फूफा जी कर्मकांडी ब्राह्मण थे; जिला कलेक्टर के कर्यालय में उनकी चूल्हे की जड़ तक पहुँच थी. उन्ही के सद्प्रयास से मनोरथ को ये नौकरी मिली थी.

बागेश्वर से धरमघर मार्ग में सनेती एक खास स्थान रहा है, जहाँ तब एक प्राइमरी पाठशाला थी शायद वह टिन की छत वाली बिल्डिंग तथा लंबा चौड़ा खेल का मैदान आज मी वहां मौजूद होगा. पचार गाँव यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है. कुछ किलोमीटर दक्षिण में कांडा है, जो अपने समय में मिडिल तक की शिक्षा का जाना माना केन्द्र था. दूर दूर से लड़के यहाँ आते थे. मिडिल यानी सातवीं कक्षा पास करके अध्यापकी के लिए ट्रेनिंग करके नौकरी पा जाते थे. डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अध्यापकों को शुरुआती वेतन ७ रूपये मासिक मिला करता था. इस लिहाज से भी पटवारी का पद अध्यापकों से काफी ऊपर समझा जाता था.

पचार गाँव के पण्डित अपना पुश्तैनी पुरोहिती का धंधा किया करते थे/आज भी करते हैं. दूर कपकोट, बागेश्वर व उत्त्तर पूर्व के गाँवों में उनके स्थाई जजमान थे. गाँव के निकट हथरसिया में एक संस्कृत की पाठशाला भी थी, जहाँ लड़कों को कर्मकांड सम्बन्धी व्यवहार भी सिखाया जाता था. गाँव बड़ा था जिसमें तब लगभग ७५ घर ब्राह्मणों के तथा ३० घर शिल्पकारों के हुआ करते थे. यों पचार एक पारंपरिक अलसाया हुआ गाँव था. गाँव में एक पटवारी का तब अभ्युदय होना एक महत्वपूर्ण घटना थी. जैसा कि आजकल यदि गाँव का कोई बच्चा आई..ए.एस. की परीक्षा पास कर जाये तो गर्व की बात होती है.

उन दिनों घूसखोरी का बदनाम कारोबार नहीं होता था. छोटे स्तर पर पटवारी-अमीन से कोई काम पड़ जाये तो घी का एक चौथाई कनस्तर (चार किलो का टिन डिब्बा) भेंट स्वरुप पहुंचा देना एक शिष्टाचार सा था अथवा बहुत से लोग जिनके ‘धिनाली’ (दूध-दही का घर में इन्तजाम) नहीं होती थी, तो शाक- सब्जी ही पेश कर देते थे. इस प्रकार ऊपरी कमाई पर कभी कोई चर्चा सुनने को नहीं मिलती थी.

पचार गाँव की बसावट सीढ़ीनुमा जगहों पर तलहटी से काफी ऊपर आम पहाडी गाँवों की तरह ही ‘बाखलियीं’ (मकान की कतारों) में थी. मकान बांज, फल्यांठ और नाशपाती-दाड़िम के झुरमुटों से घिरे नजर आते थे. गाँव का पानी का श्रोत (नैसर्गिक धारा ) मकानों से काफी नीचे था. पानी भर कर ले जाने के लिए महिलाओं को ताम्बे के भरे गागरों को सर में रख कर लाना होता था. कष्टकर तो था, पर ये भी आदत में आता था. तब कोई विकल्प सोचा भी नहीं गया था. वर्तमान में पुरानी बसावट नीचे सुविधाजनक स्थानों में स्थानान्तरित हो गयी है. घरों में जलदाय विभाग की ओर से नल भी लग गए हैं हालाँकि पानी की सप्लाई में अकसर व्यवधान रहता है.

भावनात्मक रूप से पटवारी परिवार कुछ ‘सुपीरियर’ हो गया था. मनोरथ पांडे ने बाखली से भी ऊपर अलग स्थान पर अपना नया खोली वाला घर बना लिया. उनको ‘नकुडिया’ (यानि नए मकान वाले) कहा जाने लगा, लेकिन पानी भर कर लाने की समस्या ड्योढ़ी हो गयी. पटवारी जी ने अपना दिमाग लगाया और खड़िया -कमेट वाली अपने पूरे पहाड़ का सर्वे करके लगभग डेढ़ मील दूर, ऊंचाई पर पानी का एक श्रोत जंगल में खोज लिया. उन दिनों न नल थे, न पम्प थे, और न नाली बनाने के लिए सीमेंट उपलब्ध था. पटवारी जी ने सोमेश्वर से चार ‘ओड़’ (पत्थर तरासने वाले कारीगर) बुलवाए और पानी के स्रोत से लेकर आपने घर के लम्बे टेढ़े-मेढे घुमावदार पहाड पर पत्थरों के धारे बनाकर जोड़ते हुए पानी ले आये. तब ये वास्तव में एक दुष्कर कार्य था. किसी चमत्कार से कम नहीं था. कारीगरों ने ६ महीनों में ये काम पूरा किया. हालांकि रूपये भी खूब खर्च हुए, पर पटवारी जी अपने प्रयोजन से बहुत खुश थे.

इस पहाड़ की मिट्टी कच्ची-चिकनी थी. बरसात आई तो कई जगहों पर धंस गयी या खिसक गयी, तथा पत्थर-धारा भी कई जगहों पर बिखर गयी. साल-दो साल तक तो उन्होंने उसे ठीक करवाने की कोशिश की, पर बार बार मरम्मत नहीं हो पाती थी. जंगल में चरने वाले जानवर भी आये दिन धाराओं को तोड़ जाते थे. पटवारी जी का ये परियोजना एकदम फेल हो गई. आज भी कटे हुए पत्थरों के धारे कहीं कहीं पहाड़ी पर बिखरे मिल जाते हैं.

मनोरथ पटवारी का कुनबा बड़ा था. भाई-भतीजे थे, और उनका एक बेटा भी था, नाम था बंशीधर पांडे. बंशीधर ने अपनी पहली पत्नी को किन्ही कारणों से त्याग दिया और कपकोट से एक ‘नौली’ औरत को लाकर पत्नी के बतौर रख लिया. गाँव बिरादरी वाले दकियानूसी, परम्परावादी और कट्टर धर्मान्ध थे. उन को ये बर्दाश्त नहीं हुआ और पटवारी परिवार को जाति बाहर कर दिया. पटवारी जी सकुटुम्ब नैनीताल आ गए और आधुनिकता की भीड़ में खो गए. बाद में एक बार उनके कुटुम्बी जनो में से दो लोग गाँव के दौरे पर ये जताने के लिए आये कि ‘हम तुम से अच्छी स्थिति में है’. वे घोड़ों पर सवार होकर, सर पर अंग्रेजी टोप, और अंग्रेजों का जैसा लिबास पहन कर अनोखे अंदाज में आये थे.

पचार गाँव आज भी अपनी जगह है. गाँव में अब अनेक विधाओं के पढ़े लिखे लोग, स्नातक-परास्नातक, डॉक्टर, इंजीनियर और अध्यापक हैं. पूरे कुमाऊं की तरह यहाँ के पढ़े लिखे लोग भी मैदानी भाग को पालायन कर गए हैं. गाँव में वही लोग अटके बचे हुए हैं, जो बाहर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं, अथवा जिनका ब्राह्मण वृत्ति से अच्छा गुजारा हो जाता है. उनकी जजमानी आज भी दूर दूर तक फ़ैली है.
***

बुधवार, 29 मई 2013

चींटी ने कहा

मैं भी तुम्हारी तरह ही एक सामाजिक प्राणी हूँ. मैं आकार में बहुत छोटी जरूर हूँ पर मेरा परिवार आपके परिवारों से कई गुना बड़ा होता है. हमारे परिवार की मुखिया एक ‘रानी माँ’ होती है. हम सब चीटियाँ उसकी सेवा में रात-दिन व्यस्त रहती हैं क्योंकि वह हम सब की जननी है. इसके अलावा परिवार के लिए भोजन इकट्ठा करना हमारा एकसूत्री कार्यक्रम होता है. जहाँ कहीं मीठी चीज, पकवान, फल, अनाज के दाने या घी-मक्खन-मिठाई पड़े रहते हैं, हम उसकी तलाश में रहती हैं. भगवान ने हमको ऐसी घ्राण शक्ति दी है कि हम उसे दूर से ही पकड़ लेती हैं और फिर दलबल सहित कतार में पहुँच कर अपनी खाद्य सामग्री को टुकड़े टुकड़े करके अपने घर लेकर आती हैं. अगर सामग्री बड़ी हुई, काटी पीटी नहीं जा सके, तो सब मिलकर उसे उठा कर या घसीट कर खींच लाती हैं.

विश्व भर में हमारी कई प्रजातियां हैं कुछ बड़ी लाल या काली दीखने वाली लड़ाकू, जहरीली प्रजातियां बहुत खतरनाक होती हैं. अधिकांश प्रजातियां मांसाहारी होती हैं. तुमको ये जानकार आश्चर्य होगा कि हमारी विभिन्न प्रजातियों/कुनबों में आपसी दुश्मनी होती है, और मौक़ा मिलते ही सामनेवालों को टुकड़ों में काट कर मार डाला जाता है. यहाँ "माईट इज राईट" वाली बात चलती है.

हमारा घर जमीन की दरारों में बहुत गहरे खोद खोद कर गुफाओं जैसा बनाया जाता है या मोटे मोटे पेड़ों के खोखली जड़-तनों के कोटरों में या बड़े पत्थर-शिलाओं के नीचे अथवा आपके घरों की दीवारों की दरारों में ऐसे स्थान पर होते हैं, जहाँ हमारा परिवार बारिश के पानी से सुरक्षित रह सके. अगर रानी माँ को लगता है कि जगह सुरक्षित नहीं है तो बरसात का पूर्वाभास होते ही स्थान्तरण करना पड़ता है. इस स्थानांतरण में हमें बहुत परेशानी होती है क्योंकि परिवार के सभी अण्डों-बच्चों को को भी उठाकर ले जाना पड़ता है.

अपने बारे में मैं कुछ मजेदार बातें तुमको बताना चाहती हूँ कि हमारे परिवार में केवल मादाएं होती हैं और रानी माँ ‘क्लोनिंग’ के तरीके से हम सब को जन्म देती रहती है. हम चींटियाँ चौबीसों घन्टे जागती रहती हैं. नींद के नाम पर चौबीस घंटों में कई बार चलते चलते झपकी ले लेती हैं. हम जब भी घर के बाहर निकलती हैं तो अपने पीछे एक गन्ध छोडती जाती हैं ताकि वापसी में भटकना नहीं पड़े.

शायद तुमको ये भी ठीक से मालूम नहीं होगा कि हम चीटियाँ ‘द्विज’ होती हैं. द्विज का अर्थ है, दो बार जन्म लेने वाला. हिंदुओं में जिन लोगों को उपनयन संस्कार (जनेऊ) से संस्कारित किया जाता है, वे अपने आपको द्विज कहते हैं. उनका मानना है कि उपनयन संस्कार से उनका ज्ञानार्थी के रूप में दूसरा जन्म होता है. लेकिन मैं तुमको बताना चाहती हूँ कि सचमुच के द्विज तो वे हैं जिनको एक ही जीवन में दो बार यानि पहले अण्डे के रूप में और फिर कीट-प्राणी के रूप में जन्म मिलता है. बहुत से कीट, मच्छर, चिड़िया, कछुआ, मगर मच्छ, सरी-सृप व मछली आदि प्राणी पहले अण्डे में फिर समयांतर पर अण्डे से बाहर निकलते हैं.

इसी सन्दर्भ में प्रकृति की अनोखी माया यह भी है कि कंगारू का भ्रूणशिशु माँ के गर्भ से निकल कर बाहर आने के बाद कई महीनों तक माँ के पेट के बाहर बने थैले में विकसित होता है. असल द्विज तो हम होते हैं.

हमारी जनसंख्या के आंकड़े आज तक कोई इकट्ठे नहीं कर पाया है, लेकिन ये बात पक्की है कि विश्व भर में हमारी संख्या इंसानों से ज्यादा ही होगी.

बहुत से परभक्षी, जैसे कि, चिडिया, मेंढक, छिपकलियाँ व चींटीखोर जानवर हमारे बड़े दुश्मन हैं. वे हमारे कुनबे को चट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं. कहते हैं कि हमारे इस छोटे से शरीर से उनको बहुत सारा प्रोटीन मिल जाता है. मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि मनुष्य समाज में ऐसे बहुत से दयावान लोग हैं, जो हमारे जीवन के बारे में भी सोचते हैं और आटा-अनाज-चीनी के मिश्रण देकर ज़िंदा रहने में मदद करते हैं.

आत्म रक्षा के लिए हमारे पास एक  ही हथियार होता है कि हम दुश्मन को अपने छोटे से जबड़े से पकड़ कर काट लें, या अगर डंक वाली प्रजाति के हों तो डंक मार कर विरोध कर लेते हैं. दुश्मन को डंक से जलन होती है क्योंकि डंक में जहरीला रसायन होता है. बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि चींटी के काटने से हाथी जैसा बड़ा जानवर भी मर जाता है.

जीवन तो नश्वर होता है. जब हमारा अन्तिम समय आता है तो हमारे भी पँख निकल आते हैं और हम उड़कर पञ्च तत्व में विलीन हो जाते है. इति.
***

सोमवार, 27 मई 2013

नेहरू जी की पुण्यतिथि

२७ मई १९६४ के दिन मैं ट्रेन से बड़े सवेरे जयपुर पँहुच गया था. मैं उन दिनों ‘लाखेरी सीमेंट कामगार बहुधंधी सहकारी समिति' का अवैतनिक महामंत्री भी था. सोसाइटीज के रजिस्ट्रार के कार्यालय में अपने विधान में संशोधन कराने के लिए कागजात पेश करने थे. मैं रात की ट्रेन से सवाईमाधोपुर, फिर वहाँ से मीटर गेज ट्रेन से (तब जयपुर को सीधे ब्रॉड-गेज रेलवे लाइन नहीं हुआ करती थी.) मैं सुबह ४ बजे जयपुर रेलवे स्टेशन पहुँच गया था. वहाँ से पैदल ही पुराने विधायक निवास, जहां अब, पास में शहीद स्मारक बना हुआ है, हमारे विधायक स्व. हरिप्रसाद शर्मा का कमरा था, पहुँच गया. वहाँ नहा धो कर मैं ९ बजे बाद मिर्जा इस्माइल रोड की तरफ बढ़ गया. पाँच बत्ती से आगे मेन रोड पर एक कॉफी हाउस हुआ करता था, जहाँ की कॉफी व दक्षिण भारतीय पकवानों का आनन्द लेते हुए साहित्यिक मनीषी बैठ कर घंटों मानसिक विलास किया करते थे. इसी कॉफी हाउस के दुमंजिले में हमारे कोऑपरेटिव सोसाइटीज के रजिस्ट्रार का कार्यालय हुआ करता था. साढ़े दस बजे के बाद मुश्किल से आधे घन्टे में मैं अपना काम खत्म कर पैदल ही जौहरी बाजार की तरफ चल पड़ा.

जौहरी बाजार में ‘हल्दियों के रास्ते’ में मेरे एक सुहृदय मित्र श्री सुभाष जैन (मैनेजर, ई.एस.आई) का पुश्तैनी घर था. उनके पिता स्व. सुगनचंद जैन व माता जी बहुत आत्मीयता रखने वाले लोग थे. मैं उनसे पहले भी मिल चुका था, और उनसे मिलना चाहता था. गर्मी भी उन दिनों बेहद पड़ रही थी अत: ये भी सोच रहा था कि दिन में विश्राम उनके घर पर ही करूँगा. मेरी  वापसी ट्रेन शाम ५ बजे की थी.

ज्यों ही मैं जौहरी बाजार में दाखिल हुआ तो एक जीप से घोषणा होने लगी कि प्रधानमन्त्री जवाहरलाल जी का देहावसान हो गया है. दुकानों के शटर बन्द होने लग गए, सब तरफ मनहूस खामोशी पसरने लगी. लोग अलग अलग समूहों में जमा होने लगे. सभी उदास थे. अधिकाँश आँखें नम थी. मैं भी असहाय सा होकर इस अप्रत्याशित दुखद समाचार से सन्न रह गया था.

मैंने सन १९५८ में नेहरू जी को केवल एक बार दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी के सभागार में बहुत नजदीक से देखा था, उनका उजास आभामंडल मुझे अभी भी याद है. वे तत्कालीन राजनैतिक आकाश के बड़े सितारे थे, हर दिल अजीज थे. ये विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वे मर भी सकते हैं.

मैं जैन परिवार से मिला, वहाँ भी मातम था, उस दिन उनके घर खाना नहीं बना. भूखा रहने का कोई मलाल भी नहीं था क्योंकि हमारे प्रिय नेता नहीं रहे थे. आज बहुत से छुटभय्ये नेता राष्ट्रीय/ अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके द्वारा लिए गए अनेक निर्णयों की आलोचना कर सकते हैं, पर सच्चाई ये है कि वे बेहद मानवीय आचार वाले राष्ट्रभक्त  नेता थे.

शाम वाली गाड़ी से मैं लौट आया, अगले दिन सब लोग रेडियो/ट्रांजिस्टरों पर उनकी अन्तिम यात्रा का हाल सुनने के लिए चिपके रहे. गाँधी जी की ह्त्या के बाद ये दूसरा बड़ा सदमा लगा था. कुछ लोगों का यह भी कहना था कि अगर चीन भारत की पीठ पर दोस्ती की आड़ में छुरा नहीं घोंपता तो नेहरू जी इतनी जल्दी नहीं जाते. पर मौत को तो कोई बहाना चाहिए

वे महामानव थे. आज उनकी पुण्यतिथि पर एक बार पुन: विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित है.
***

शनिवार, 25 मई 2013

रॉबिन रानी

अब शहरों में सीमेंट के पक्के मकानों में चिड़ियों की रिहाइश नहीं रही क्योंकि घरों में उनके लिए कोई ‘कोटर’ नहीं छोड़े जाते हैं. हमारे शहर के कुछ पर्यावरण प्रेमियों ने पिछले ‘गौरैय्या दिवस’ पर कुछ खास किस्म के लटकने वाले लकड़ी के डिब्बे घोसलों के लिए लोगों में बांटे थे, पर ये तो एक दस्तूर जैसा था.

गौरैय्या व कबूतर जैसी घरेलू चिडिया इंसानों के नजदीक रह कर सुरक्षित महसूस करती होंगी क्योंकि उनको बस्तियों में चारा-पानी भी उपलब्ध रहता है. कुछ कचरे में तथा कुछ चारा-पानी दान करने वाली प्रवृत्ति के लोगों द्वारा बिखेरा रहता है. मेरी माँ चिड़ियों तथा गिलहरियों को अपने भोजन में से बचाकर कुछ अन्न जरूर डाला करती थी. उनकी मान्यता थी कि ‘क्या पता अगले जन्म में उनको भी बेजुबान पक्षी की योनि में जाना पड़े?’

मेरे वर्तमान घर से लगभग पन्द्रह किलोमीटर उत्तर में कुमाऊं की शिवालिक पर्वत श्रंखला है. नैनीताल शहर भी इसी पर बसा है. बहुत सी छोटी चिडिया सर्दियों में बर्फीली ठण्ड से बचने के लिए नीचे मैदानी हिस्सों में आ जाती हैं. जहाँ भी उनको आश्रय मिलता है वहीं सर्दियाँ काट कर गर्मियां शुरू होते ही पहाड़ों की तरफ लौट जाती हैं. हल्द्वानी में मई-जून में दिन का पारा चालीस के आसपास हो जाता है.

मेरे आँगन की चौहद्दी में मैंने अपनी पसंद के कुछ पौधे लगाए थे, जो अब पेड़ की शक्ल में आ गए हैं, इनमें एक छायादार दालचीनी, एक नीबू, एक संतरा, एक अमरुद का पेड़ है. एक कोने में रात की रानी और मालती की मिलीजुली झाड़ी सी बन गयी है, दो लाल गुलाब की घनी डालियों वाली झुरमुट व एक गुड़हल की डाली. इन सभी वनस्पतियों में तितलियों की खूब आवक रहती है. ये तितलियाँ विशेषकर बसंत के आगमन पर नई कोपलों व पत्तों पर अपने अण्डे छोड़ जाती हैं, जो धीरे धीरे इल्लियां बनती जाती हैं, और पत्तों को चट करने लगती हैं. ये इल्लियां चिड़ियों को खूब आकर्षित करती हैं, और उनका प्रिय भोजन बन जाती हैं. इसलिए बहुत कम इल्लियां तितली बन पाती हैं.

पिछली चार सर्दियों से मैं देखता आ रहा हूँ कि एक रॉबिन चिड़िया का जोड़ा मेरे आँगन में नियमित रूप से हर साल मेहमान बन कर आता रहा है. ये रॉबिन मटमैली सी गौरैय्या के आकार की होती है, बड़ी फुर्तीली पर लड़ोकनी भी. लड़ोकनी इस परिपेक्ष्य में कि किसी और के अपने अहाते मे घुसपैठ होने पर उस पर टूट पड़ती है, भगा कर ही मानती है. मैं और मेरी श्रीमती इनके लिए चारे तथा मिट्टी के चौड़े बर्तन में साफ़ पानी का इंतजाम करके रखते हैं. जब ये आ जाती हैं तो ऐसा लगता है कि जाड़ों की छुट्टियां बिताने हमारे पास आ गई हों. मैंने देखा है कि रात होने पर ये जोड़ा गैरेज के शटर के ऊपर संकरी सी जगह पर दुबक कर बैठ जाता है; दिनभर आंगन में फुदक फुदक कर लुका-छिपी सी किया करता है. मैंने ये भी देखा कि काले चींटों और मच्छरों को पकड़कर खाने में इनको विशेष आनन्द आता है.

पिछले साल इन्होंने मालती की झाड़ी में अपना घोसला बनाने की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन किसी परभक्षी पक्षी ने उसे तोड़ डाला. कौवे, बाज व मांसाहारी चिडिया दूसरी चिड़ियों का घोसला टटोलती रहती हैं. सांप भी चिड़ियों का बड़ा दुश्मन है. मेरे घर के नजदीक एक खाली प्लॉट पर पुरानी गोशाला है, जिसमें नेवलों का एक भरापूरा परिवार रहता है. नेवले सापों को मार डालते हैं. खाने की खोज में मेरे आँगन में इन नेवलों का भी आवागमन रहता है इसलिए यहाँ साँपों का खतरा कम रहता है.

पिछले महीने अप्रेल की शुरुआत में मैंने एक दर्दनाक हादसा देखा. हमारे तुलसी के गमले की आड़ में एक बिल्ली बैठी थी, जिसने घात लगाकर रॉबिन चिड़े को दबोच लिया और लेकर चम्पत हो गयी. इस तरह रॉबिन रानी के विधवा होने का हमको बड़ा सदमा लगा क्योंकि ये काण्ड नजरों के सामने हुआ था रोबिन रानी भी इस अप्रत्याशित दुखदाई घटना की प्रत्यक्षदर्शी रही थी. अपनी मन:स्थिति को तो मैं शब्दों में बयान कर सकता हूँ, पर बेचारी रॉबिन रानी पर क्या बीत रही थी, यह सोच सोच कर कई दिनों तक बेचैन रहा.

रॉबिन रानी की सारी चपलता खो गयी. वह डरी हुई रहने लगी. उसे चारा करते हुए भी हम नहीं देख पा रहे थे. इस सँसार में बहुत सी ऐसी बातें हैं, जिन पर हम प्राणियों का कोई वश नहीं होता है; हम केवल संवेदनशील होकर दु:ख या अफ़सोस प्रकट कर पाते हैं. मैं रॉबिन रानी पर पूरी निगरानी रख रहा था. वह अकेली सहमी सहमी रहती थी. वातावरण में गर्मी की आहट आ चुकी थी, उसे अब तक हर वर्ष की तरह पहाड़ों की तरफ लौट जाना चाहिए था पर वह गयी नहीं. ठीक एक महीने के बाद वह उसी स्थान पर मृत पड़ी दिखाई दी, जहाँ पर उसका प्रियतम बिल्ली का निवाला बना था. शायद वह उसकी विरह-वेदना नहीं सह पायी थी.
***

गुरुवार, 23 मई 2013

लीची

(चित्र सौजन्य treepicturesonline.com)
हमारी हल्द्वानी में उत्तराखंड की सबसे बड़े कृषि उपज मंडी है. बारहों महीने यहाँ गहमा-गहमी रहती है. अनाज व सब्जियों के साथ ही मौसमी फलों की बहार रहती है. अब आम की फसल आने वाली है, पर स्थानीय लीची बाजार में बहुतायत से आ चुकी है. कहते हैं कि अगर आम फलों का राजा है तो लीची फलों की रानी है.

लीची का सदाबहार पेड़ स्ट्रॉबेरी परिवार का है. बसंत के आगमन के साथ इनमें बौर आ जाता है, फूलों के गुच्छे फलों में परिवर्तित हो जाते हैं. मध्य मई में ये फल लाल होने लगते हैं, यह इनके पकने की सूचना भी होती है. गुठली वाला खुरखुरे छिलके वाला फल मीठे गूदेदार होता है, इसमें हल्की खटास भी रहती है. ये सफ़ेद गूदा शर्करा, विटामिन सी व पोटेशियम तत्वों से भरपूर होता है; तासीर में शीतल होता है.

लीची समशीतोष्ण जलवायु में होती है. भारत, चीन बांग्ला देश, पाकिस्तान, मलेशिया, इण्डोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, ताईवान, फिलीपींस व दक्षिण अफ्रीका में खूब पैदा होती है. इसका मूल दक्षिणी चीन में माना जाता है. दस्तावेजों में दो हजार साल पहले इसकी वहां उपस्थिति दर्ज है.

लीची बहुत गुणकारी फल है. इसमें सेचुरेटेड फैट्स होते हैं; फाईबर की मौजूदगी के कारण मोटापा व वजन कम करने में सहायक बताया गया है. ब्रेस्ट कैंसर से लड़ने के गुण भी इसमें बताए जाते हैं. विटामिन सी रोग प्रतिरोधात्मक शक्तियों को बढ़ाता है.

बहुत से फल अपनी डाल से टूटने के बाद पकते हैं और उनका स्वाद बदल जाता है, लेकिन लीची का फल अगर कच्चा तोड़ा गया तो कच्चा ही रह जाएगा. इसका भंडारण भी ३ डिग्री सेंटीग्रेड के आसपास में करना होता है और ६० दिनों तक कोल्ड स्टोर्स में रखा जा सकता है. आजकल वैज्ञानिक तौर तरीकों से इसके गूदे से बने अनेक उत्पाद लम्बे समय तक सुरक्षित रखे जाते हैं,  जैसे जैम, रस, शरबत, स्क्वैश आदि. बाजार में इसकी आईसक्रीम भी उपलब्ध रहती है.

नैनीताल के आसपास के क्षेत्रों में रामनगर की लीची सर्वश्रेष्ट मानी जाती है, जिसमें गूदा खूब होता है और गुठली बहुत छोटी होती है. लीची की गुठली गहरे भूरे रंग की होती है ये किसी प्रयोग में नहीं आती है, हाँ इससे नए पौधे तैयार किये जाते हैं.

सचमुच लीची प्रकृति द्वारा हमको दी गयी एक अनुपम सौगात है.
***