शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

अक्षम

माया, ममता, करुणा, राग, द्वेष, लिप्सा, सन्तोष आदि स्वाभाविक गुण-अवगुण परमात्मा ने असीमित ढंग से मनुष्यों में बाँट रखे हैं. स्त्रियों को पुरुषों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील भी बनाया है.

डॉ. चंद्रा लाल शिक्षा विभाग में डिप्युटी डाइरेक्टर थी और उनके पति अम्बा लाल एक कॉलेज में प्राध्यापक थे. दोनों अब अपने पदों से रिटायर हो चुके हैं. नैनीताल जिले के भीमताल में एक सुन्दर सा घर बना कर रह रहे हैं. लाल दम्पति का एक ही बेटा है मुकुल, जो स्टेट बैंक की नजदीकी शाखा में पी.ओ. है. मुकुल देखने में सुन्दर और आकर्षक है, स्वभाव से हँसमुख और मृदुभाषी है. भाग्य की विडम्बना ये रही कि बचपन में मुकुल एक बड़ी दुर्घटना का शिकार हो गया था, जिसमें उसने अपने अण्डकोश खो दिये थे. डॉक्टरों ने उनको तभी बता दिया था कि मुकुल औलाद पैदा करने में सक्षम नहीं रहेगा. ये बात डा.चंद्रा लाल को रात दिन सालती रही, पर ईश्वर की मर्जी के बारे में क्या कहा जा सकता है. मुकुल की जान बच गयी थी ये क्या कम था? इसी विचार से सन्तोष कर लिया करती है.

मुकुल तीस वर्ष का होने को आया तो माँ-बाप ने गहन विचार विमर्श के बाद तय किया कि बेटे की शादी कर देनी चाहिए, पर मुकुल इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था. क्योंकि उसको अपनी कमजोरी मालूम थी. कुछ नजदीकी रिश्तेदारों को छोड़कर मिलने-जुलने वाले, परिचितों, पड़ोसियों को ये सब कहाँ मालूम था? इसलिये, विशेषकर महिलायें, आये दिन डॉ. चंद्रा से राह चलते कहा करती थी, “अब बहू कब ला रही हो?”, “हमारे हाथ ऊपर नीचे कब करवा रही हो?”, या “क्या ढोलक तब बजवाओगी जब बेटे की जवानी निकल जायेगी?” बोलने वालों का क्या है, पर उनके शब्द दिल के अन्दर गहरे तक भेद कर जाया करते थे.

अनेक लोग बेऔलाद भी तो होते ही हैं और ये भी है कि आजकल अच्छे अच्छे फर्टिलिटी सेंटर्स भी हैं.' ये ताने बाने बुनते हुए लाल दम्पति ने बहुत जोर देकर बेटे को शादी के लिए राजी कर लिया और काशीपुर शहर में दूर की रिश्तेदारी में एक कोमल सी, भोली सी, भावना नाम की लड़की ढूंढ ली. भावना के पिता किशनलाल जब घर, वर, व सुसंस्कृत माता-पिता से मिले तो उन्होंने शादी के लिए तुरन्त ‘हाँ’ कर दी.

धूम-धाम व विधि-विधान से विवाहोत्सव हो गया. बधाइयों और उपहारों के ढेर लग गए, लेकिन मुकुल अस्वस्थता का बहाना बनाकर भावना को हनीमून के लिए कहीं नहीं ले गया. कुछ ऐसी बातें होती हैं, जो घर की चाहर दीवारी में घूमती रहती हैं और अन्दर ही अन्दर जहर घोलती रहती हैं. जब से मुकुल ने भावना को अपने शरीर की असलियत बताई तब से वह बुझी बुझी रहने लगी थी. उसे लगा कि ससुराल वालों ने जानबूझ कर उसके साथ धोखा किया है. उसकी सास सब कुछ जानते हुए भी मुख्य विषय पर चुप थी. अभी इतनी जल्दी उसे किसी फर्टीलिटी सेंटर में ले जाने के प्रस्ताव को रखने में संकोच कर रही थी.

इस बार जब भावना अपने मायके गयी तो वहीं से अपनी दीदी के साथ अहमदाबाद चली गयी. लगभग चार महीनों के बाद मुकुल उसे वहां से बुला कर वापस भीमताल लाया. भावना का रूप लावण्य और निखर आया है.

अनुभवी औरतों की पारखी नजरें बहुत जल्दी ताड़ लेती हैं कि नवेली के पैर भारी हैं. धीरे धीरे ये खुशखबरी चर्चा का विषय बन चुकी है. लाल दम्पति मिलने वालों से बधाई भी लेने लग गए हैं, पर मुकुल अपने दिल का हाल बताने में भी खुद को सक्षम महसूस नहीं कर रहा है.
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बुधवार, 11 सितंबर 2013

गुड़ खाया कीजिये

जब तक चीनी बनाने का आविष्कार नहीं हुआ था, लोग गुड़ खाया करते थे. गुड़ का आविष्कार किसने और कब किया, इस बारे में कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है. लेकिन ये बात पक्की है कि प्रकृति ने ‘गन्ना’ या ‘ईख’ की सौगात अनादि काल में ही मनुष्यों को दे दी थी.

मनुष्य अपने ज्ञान के आधार पर प्रकृति का दोहन करता चला आ रहा है. गन्ना के अलावा ताड़, शकरकंद, अंगूर, अनार, केला, आम आदि मीठे फल तथा शहद मिठास के श्रोत हैं, पर जो बात गुड़ में है, वह कहीं नहीं है.

कई सदियों पूर्व गन्ना व्यवसायिक स्तर पर पैदा किया जाने लगा था, लेकिन तब इसके रस को पका कर गुड़ बनाया जाता था. चीनी को लोग नहीं जानते थे.

बहुत पुरानी बात भी नहीं है; मुझे याद है मेरे बचपन में हमारे गाँव में कार्तिक के महीने में जब सब लोग गेहूं बोने से फुर्सत में हो जाते थे तो ‘चरखी-कोल्हू’ जोत लिया जाता था और गाँव के लोग बारी बारी से अपना गन्ना पेराई के लिए लाते थे. रस को बड़ी बड़ी चौड़ी चाशनियों में पकाया जाता था. उसके खौलने पर उसमें अपद्रव (मैला) ऊपर तैरने लगता था, जिसे छलनियों से निकाला जाता था. उसमें दूघ तथा घर का बनाया हुआ साफ़ चूना भी थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता था. इससे गुड़ की रंगत बिलकुल साफ़ - सफेद हो जाती थी. जब रस पकते पकते गाढ़ा हो जाता था तो साफ़ पट्टियों में फैला कर ठंडा किया जाता था. उसके पूरी तरह ठंडा होने से पहले पिण्डलियाँ (भेलियाँ) बना ली जाती थी. कभी कभी जब ज्यादा पक जाता था तो ये बिलकुल चॉकलेट सा हो जाता था, जो दाँतों से मुश्किल कटता था. अगर शीरा बना कर रखना हो तो तरल अवस्था में कनस्तरों में डाल लिया जाता था.

ताजा खाने के लिए गुड़ की गुणवत्ता बढ़ाई जाती थी. उसमें सूखे मेवे, मूंगफली दाना, सौंफ, इलायची भी डाल दी जाती थी. ताजे गुड़ की वह प्यारी खुशबू पूरे पेराई के मौसम में पूरे गाँव में महकती थी. मेरे जेहन में अभी भी वह बसी हुई है. मुझे लगता है ये सब अब गुजरे जमाने की हकीकत बन कर रह गई है. आज गुड़, खांडसारी, व बूरा-शक्कर कई छोटे बड़े उद्योगों में मशीनों से बनाया जाता है. गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में बड़े बड़े चीनी के कारखाने लगे हुए हैं, जो अक्टूबर से अप्रेल तक पेराई करके चीनी, राब तथा इथाइल अल्कोहॉल का उत्पादन करते हैं. अंग्रेजी शासन काल में एक बार चीनी उत्पादन के पक्ष में सरकार ने गुड़ बनाने पर पाबंदी भी लगा दी थी, लेकिन इसका भारी विरोध हुआ.

चीनी और दुग्ध उत्पादों से अनेक प्रकार की मिठाइयाँ बनाई जाती हैं, लेकिन चीनी में वो बात कहाँ जो गुड़ में होती है.

गुड़ में ग्लूकोज, फ्रक्टोज, लौह तत्व तथा पोटेशियम-फोस्फोरस जैसे कई महत्वपूर्ण तत्व होते हैं. गुड़ को गुणों की खान कहा गया है. कोयले व सिलिकॉन की धूल से फेफड़ों को जो नुकसान होता है, उसे गुड़ रोकता है. इसीलिये कोयला, सीमेंट, या सिलिकॉन वाले उद्योगों में काम करने वालों को गुड़ खाना अनिवार्य बताया जाता है.

हमारे उत्तर भारत में मुजफ्फरनगर में गुड़ की सबसे बड़ी मंडी है. दक्षिण भारत में ताड़ से भी गुड़ बनता है, पर गुणों की दृष्टि से ईख का गुड़ श्रेष्ठ होता है. आज भी हमारे भारतीय ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में गुड़ का प्रयोग कई प्रकार से होता है, जैसे गुड़-तिल के लड्डू, गुड़ की रेवड़ी, गुड़ के गजक, मालपुए, गुलगुले, पँजीरी आदि. मराठी लोग गुड़ का बूरा डाल कर मीठी पूरण पूड़ी बनाते हैं. गुजराती लोग दाल में गुड़ डाल कर उसे मीठी बनाते हैं. मैंने अपने बचपन में घी+गुड़ के साथ रोटी खाई है. मक्के या मडुवे की रोटी के साथ गुड़ का स्वाद लेना हो या भुने हुए चनों के साथ गुड़ खाना हो तो उसकी अनुभूति शब्दों में बयान नहीं हो पा रही है.

आज हमारे देश में भी आम लोगों का (विशेष कर शहरों में) जीवन शैली पूरी तरह बदल गयी है. नतीजन करोड़ों लोग मधुमेह के शिकार हैं या होते जा रहे हैं. उन सबको गुड़ अथवा शर्करायुक्त पदार्थों से परहेज करना चाहिए. उनके लिए कम कैलोरी वाले आर्टीफीशियल स्वीटनर बाजार में उपलब्द्ध हैं, जिनसे वे अपनी चाय या भोजन में मिठास ला सकते हैं. 

बहरहाल स्वस्थ लोग तो गुड़ का आनंद ले ही सकते हैं.  
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रविवार, 8 सितंबर 2013

सुहाना सफर

अभी हाल में हल्द्वानी से दिल्ली की रेल-यात्रा (शताब्दी एक्सप्रेस) में मेरी बगल वाली सीट में एक १६-१७ वर्षीय जापानी लड़का भोला सा, मासूम सा, चिकना सा, आकर बैठा. उसकी शक्ल सूरत और पीताभ रंग देखकर मेरी श्रीमती ने कहा, “कोरियाई लगता है.” मैंने पूछने में देर नहीं की, “Hello, from which country are you?” वह बहुत देर तक सोचने के बाद बोला, “निप्पॉन”, यानि जापान. उसको देख कर मुझे अपने पौत्रों की याद आ गयी और उससे बातें करने का मन हो रहा था.

मुझे कभी जापान जाने का मौक़ा नहीं मिला. जापान देश के बारे में मेरी सामान्य सी जानकारी रही है कि जापान कई द्वीप समूहों का देश है, जहां की वर्तमान पीढ़ियाँ उच्च तकनीकी ज्ञान रखती हैं. मोटर वाहन, इलेक्ट्रोनिक्स उत्पाद, वस्त्र व रसायन जैसे महत्वपूर्ण उद्योग वहाँ हैं. आर्थिक दृष्टि से संपन्न राष्ट्र है. आम लोगों का जीवन स्तर काफी ऊंचा है.

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान धुरी देशों के साथ होकर मित्र देशों के विरुद्ध लड़ा था. हमारे प्रिय नेता सुभाषचन्द्र बोस जापान के मित्र थे और अंग्रेजों से देश को मुक्त करवाने के लिए आजाद हिंद फ़ौज बनाकर लड़ रहे थे, पर विश्वयुद्ध में धुरी देशों की हार हो गयी. अमेरिका ने परमाणु बम डाल कर जापान के दो बड़े शहर हिरोशिमा और नागासाकी ध्वस्त कर दिये थे. जापान को तब समर्पण करना पड़ा. सन २००३ में अपनी फिलीपींस यात्रा के दौरान मैंने वहाँ जापानियों द्वारा छोड़े गए युद्ध अवशेष तथा मारे गए जापानियों व अमरीकियों के स्मारक देखे हैं.

जिज्ञासावश कभी मैंने जापान के बारे में कुछ साहित्य अवश्य पढ़ा था. उससे मालूम था कि तीन बड़े द्वीपों सहित छोटे बड़े सब मिलाकर ६८०० द्वीप जापान देश को बनाते हैं. जहाँ अकसर भूकम्प और सूनामी आते रहते हैं. भूकम्प की मार की वजह से मकान लकड़ी के बने होते हैं. कहा जाता है कि जापानियों ने कई विधाओं में चीनी संस्कृति का अनुकरण किया है.

छठी-सातवीं शताब्दी में बौद्ध धर्म चीन होता हुआ यहाँ पहुंचा, और दसवीं शताब्दी तक बहुत लोकप्रिय हो गया था. आज जापान के ८५% लोग बौद्ध तथा शिन्तो (पुराने धार्मिक विश्वास वाले अनेक देवताओं के उपासक शिन्तो कहलाते हैं), शेष ईसाई व अन्य आस्था वाले हैं. 

जापान में राजा होता है, पर सत्ता में उसका कोई दखल नहीं होता है. उसके अधिकार सीमित हैं. ग्यारहवीं शताब्दी से ही तत्कालीन राजा ने खुद को राजकाज से अलग करके रखा था बाकी सब लोकतंत्रीय व्यवस्थाएं हैं. लोग ईमानदार व राष्ट्रप्रेमी हैं.

वर्षों पहले धर्मयुग नाम की हमारी हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका में मैंने किसी भारतीय साहित्यिक यात्री के जापान सम्बन्धी यात्रा संस्मरण पढ़े थे. उसमें उन्होंने लिखा था कि, “टोक्यो में जब ट्रेन में बैठे हुए अपने मित्र से उन्होंने कहा कि “यहाँ केले प्राप्य नहीं हैं,” तो उनकी बातें सुनकर एक जापानी व्यक्ति तुरन्त कहीं जाकर केले लेकर आया और बोला, “ऐसा फिर मत कहना कि जापान में केले नहीं मिलते हैं”.

ये दृष्टान्त बहुत अच्छा लगा कि जापानी लोग अपने देश की अस्मिता के प्रति कितने सावधान रहते हैं. इसके उलट हम यहाँ भारत में रोज सुनते/पढ़ते हैं कि विदेशी यात्रियों का सामान चुरा लिया गया है या उनको लूट लिया गया है.

मेरे बगल में बैठा वो जापानी लड़का कनखियों से मुझे देखता आ रहा था. अपना ब्रीफकेस ऊपर सामान वाले सेल्फ पर रख कर और एक छोटा बैग अपनी गोद में रख कर सहमा-सिमटा सा बैठा रहा. उसके पास एक बढ़िया टच स्क्रीन वाला मोबाईल फोन था, जिस पर हेड-फोन लगा कर कुछ सुन रहा था. मेरा मन उससे बतियाने को हो रहा था. मैंने बार बार उससे कुछ कुछ पूछने का प्रयास भी किया लेकिन लगा कि उसे अंग्रेजी या कोई भारतीय भाषा समझ में नहीं आती थी. इसलिए मैंने इशारों से समझाने की कोशिश भी की पर वह केवल सर हिला कर प्यारी सी मुस्कान के साथ अनमने उत्तर से दे रहा था. मैं और मेरी श्रीमती उसके उस भोलेपन पर मुग्ध थे.

इस गाड़ी में यात्रियों को नाश्ता व खाना भी परोसा जाता है. जब टमाटर के सूप के साथ ब्रेडरोल्स तथा मील्स-ऑन-ह्वील्स वाले भोजन का पैकेट आया तो उसने चारों ओर नजर डाल कर पैकेट खोला और सभी कटोरियों की फोटो खींच ली फिर खाना शुरू किया. वह इस भारतीय शाकाहारी भोजन को चख चख कर अजीब ढंग से खा रहा था. मैंने इशारों से बताने की कोशिश की कि परांठे को तोड़कर सब्जी लगा कर खाए पर शायद वह उस दिन दोपहर बाद तक भूखा ही था. सब्जी, दाल को अलग तथा परांठा, चावल को अलग से दही के साथ खा गया. उसको पेट भरने से मतलब था. हमारा मनोरंजन जरूर हो रहा था. इसी दौरान उसका एक हमउम्र साथी उससे कुछ कहने को आया वह थोड़ी टूटी फूटी अंग्रेज़ी जानता था. मैंने उससे भी जानकारी चाही तो उसने बताया कि वे लोग हिमालय देखने कौसानी तक गए थे.

उन लोगों को यहाँ का खाना कैसा लगता होगा, कहा नहीं जा सकता है क्योंकि जापानी लोग सी-फ़ूड तथा अन्य नॉनवेज के आदी होते हैं. ये भी कहा जाता है कि मीट, जिसे जापानी में ‘नीकू’ कहा जाता है, हरे धनिये की तरह हर नमकीन प्लेट का हिस्सा होता है. ये लोग भारतीय मसालों की बू भी पसन्द नहीं करते हैं.

बहरहाल हमारा ५ घंटों का मजेदार सफर खतम हो गया. उतरने से पहले मैंने उसको अपनी मिनरल वाटर की एक सील्ड बोतल दे दी तो वह बहुत खुश हो गया. उसने अपनी बोतल का सारा पानी पी लिया था. यद्यपि भाषा की समस्या होने के कारण उससे किसी विषय पर बात नहीं हो सकी, पर प्यार की भाषा आँखों से बोली जाती है. अपने बगल में उसकी उपस्थिति से पूरा सफर सुहाना रहा.
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शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

चुहुल - 58

(१) 
पुलिस इंस्पेक्टर सज्जनसिंह से – हमें सूचना मिली है कि आपके घर में विस्फोटक सामग्री है.
सज्जनसिंह – आपकी जानकारी बिलकुल सही है, मगर वह कल ही मायके गयी है.

(२)
हमारे ही एक पडोशी देश में एक जिला अदालत में बलात्कार के जुर्म के केस पर सुनवाई हो रही थी.
बचाव पक्ष का वकील बोला, “मी लॉर्ड, क़ानून की किताब के पेज नम्बर २५ में साफ़ साफ़ लिखा है कि मेरे मुवक्किल पर कोई केस बनता ही नहीं है. इसे तुरन्त बरी किया जाना चाहिए.”
जज साहब गंभीर मुद्रा में बोले, “ये कौन सी किताब है? इसे अदालत में पेश किया जाये.”
किताब पेश की गयी तो पेज नम्बर २५ में एक एक हजार की बीस नोट रखे थे.
जज साहब मुस्कुराते हुए बोले, “बहुत खूब, इस तरह की दो नजीरें और पेश की जाएँ.”

(३)
एक भौंदू लड़के को उसके पिता ने किसी जरूरी काम से शहर भेजा और ताकीद की कि समय का ध्यान रखे ताकि वापसी में रात ना हो जाये.
भौन्दूराम ने दिन में कई बार लोगों से समय पूछा आखिर परेशान होकर सर पकड़ कर बोला, “ये कैसा शहर है, जिससे भी पूछ रहा हूँ अलग अलग टाइम बता कर बेवक़ूफ़ बना रहे हैं.”

(४)
एक लड़की उफनती नदी के पुल पर से कूद कर आत्महत्या करने को तैयार थी. इतने में एक मनचला मोटरसाइकिल पर आया और उससे बोला, “तुम मरने जा रही हो, पर मरने से पहले मुझको एक ‘लम्बा किस’ देकर जाओ.”
लड़की ने उसका सर थाम कर ‘लम्बा किस’ दे दिया.
इसके बाद मनचले ने उससे पूछा, “आखिर तुम मरना क्यों चाहती हो?”
वह बोली, “दरअसल मैं लड़की नहीं, लड़का हूँ. मेरे घर वाले मुझे इस रूप में बिलकुल पसन्द नहीं करते हैं, और डांटते रहते हैं.”
यह सुनकर बेचारा मनचला बेहोश होकर नदी में गिर पड़ा.

(५)
एक व्यक्ति के घर शादी के कई साल बाद, बड़ी मन्नतों से बच्चा पैदा हुआ, लेकिन उसे खुशी नहीं हुई.
किसी मिलने वाले ने बधाई दी तो वह बोला, "बधाई देकर क्यों मेरा मजाक बना रहे हो, यार.”
“क्यों क्या हुआ”? बधाई देने वाले ने पूछा.
तो वह मायूस होकर बोला, “इतने सालों के बाद भगवान ने बच्चा तो दिया, पर क्या बताऊँ, वह बहुत छोटा सा है, और गंजा भी है, ना किसी को पहचानता है और ना बोल सकता है.”
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बुधवार, 4 सितंबर 2013

चिन्तन - २

अनेक विकसित देशों की सरकारों ने अपने नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए बहुत सी योजनाएं व नियम लागू की हुई हैं. जिनमें प्रमुखत: बीमार होने की दशा में ईलाज का पूरा खर्च बीमा कंपनियां/सरकार उठाती हैं. वृद्धावस्था के लिए धन जमा रखने की कोई जरूरत नहीं होती है क्योंकि सरकारी पेन्शन योजनाएं बेफिक्र होकर जीने के लिए भरोसा देती हैं. हाँ इसके लिए पहले अपनी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा अपने अंशदान के रूप में सरकार को देना होता है.

सच तो यह भी है कि उन देशों की जनसंख्या चीन और भारत की तरह अरबों में नहीं है. हमारे देश में गड़बड़झाला ये है कि सब लोगों की ठीक से गिनती भी नहीं की जा सकती है. करोड़ों लोग ऐसे है, जिनका किसी हिसाब में नाम नहीं है. देश की बेढब भौगोलिक सीमाएं भी ऐसी हैं कि पडोसी मुल्कों के लोग लगातार घुसपैठ करते रहते हैं. ऐसे में सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की बात बेमानी हो जाती है.

कुछ औद्योगिक संगठित क्षेत्रों में कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी तथा भविष्य निधि जैसी कानूनी व्यवस्थाएं जरूर लागू है, पर जनसंख्या के अनुपात में ये ऊँट के मुँह में जीरे के सामान है.

पिछले कुछ दशकों में शहरी क्षेत्रों के जागृत लोगों ने मेडीक्लेम जैसी बीमा योजनाओं का महत्व समझा है और बीमार होने की दशा में इसका लाभ लिया जाता है. पर देश के आम आदमी को इसका कोई ज्ञान नहीं है. बीमा कंपनियों पर वैसे भी लोग कम ही भरोसा करते हैं क्योंकि अनुभव बताते हैं कि ‘गारंटी’ और ‘वारंटी’ में बहुत फर्क होता है. कई बार क्लेम लेते वक्त ग्राहक अपने को ठगा सा महसूस करता है.

हाँ, सेना के रिटायर्ड लोगों व उनके परिवार के लोगों के लिए भारत सरकार ने बहुत सी हिफाजती व्यवस्थाएं की हुई हैं. सेना के अपने विभागीय अस्पताल हैं. इसके अलावा दूर-दराज इलाकों में प्राइवेट अथवा राज्य सरकार के अस्पतालों को ‘पैनल हॉस्पिटल’ का दर्जा दिया हुआ है. इन प्राइवेट पैनल अस्पतालों में एक ही छत के नीचे काफी सुविधाएँ मिल जाती है, पर इन संस्थानों के प्रबंधन करने वाले, सैनिक परिवारों के ईलाज के नाम पर केन्द्रीय सरकार से अंधाधुंध पैसा वसूल रहे हैं. इस पर ध्यान देने की किसी को फुर्सत नहीं है. ये अपने तरह का अलग ही फूलप्रूफ रैकेट चल रहा है.

कहने को सरकारें अपने सभी छोटे बड़े अस्पतालों/मेडीकल कॉलेजों/इंस्टीटयुटों में तमाम सुविधाएँ व दवाएं निःशुल्क दे रही है, जिनका बजट लाखों-अरबों में होता है, पर हाल के वर्षों में ऑडिट रिपोर्टों में इस मद की खरीद फरोख्तों में भी बड़े बड़े घोटाले सामने आये हैं.

भ्रष्टाचार के महासागर से कानून की बाल्टी में सरकार के आम सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का ‘गंगाजल’ कैसे लिया जा सकता है, ये अभी तो दूर की कौड़ी लगती है, पर इस बारे में चिन्तन तो किया ही जा सकता है.
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