मंगलवार, 22 जुलाई 2014

चुहुल - ६५

(१)
एक सास ने गुस्से के साथ अपने फ़ौजी दामाद को पत्र लिखा, मेरी बेटी को तनहा छोड़ कर तुम सरहद पर मौज-मस्ती करते हो, शराफत से घर आ जाओ. कोई बहाना बना कर छुट्टी ले लो. 
प्रत्युत्तर में फ़ौजी ने पार्सल से एक हैंड ग्रेनेड सासू जी को भेजा और साथ में पत्र में लिखा, "आप अकेले में जाकर इस बाल पर लगी पिन को खींच लेना. मुझे तुरन्त छुट्टी मिल जायेगी."


(२)
एक पत्नी अपने पति से शिकायत कर रही थी, आप मुझे नाम लेकर पुकारा करते हो इसलिए बच्चे भी नाम लेकर ही पुकारने लगे हैं.
पति बोला, अच्छा अब से मैं तुमको मम्मी पुकारा करूँगा.

(३)
नई नवेली बहू सिसकियां भर रही थी, सास ने हमदर्दी भरे अंदाज में पूछा, क्यों बहू, क्या बात हो गयी? 
बहू बोली, क्या मैं चुड़ैल जैसी लगती हूँ?
सास बोली, बिलकुल नहीं.
बहू फिर बोली, क्या मैं मोटी काली भैंस हूँ?
सास बोली, बिलकुल भी नहीं, पर ये तुझसे कहा किसने?
बहू थोड़ा रुक कर बोली, ये मोहल्ले की सारी औरतें कह रही हैं कि मैं बिलकुल अपनी सास जैसी दिखती हूँ.

(४)
बात द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान की है. जर्मनी के एक मुर्गी फ़ार्म में अधिनायक हिटलर आया. मुर्गीबाड़े की तरफ देख कर जोर से बोला, कल से सभी पक्षी दो-दो अण्डे रोज देंगे.
अगले दिन सचमुच सभी मुर्गियों ने डर के मारे दो-दो अण्डे दे दिये, लेकिन एक पक्षी के पास केवल एक ही अंडा पड़ा था.  उससे जब हिटलर ने कारण पूछा तो वह बोला, "सर, मैं मुर्गा हूँ.

(५)
सुबह नौ बजे क्लीनिक खुलते ही महिला मरीजों ने डॉक्टर साहब से शिकायत की, "एक आदमी वेटिंग रूम में हम को घूर रहा है."
डॉक्टर ने तुरन्त उसको बुलाया और घूरने का कारण पूछा. वह बोला, आपने ही तो बोर्ड पर लिखा है कि महिलाओं को देखने का समय सुबह नौ से ग्यारह बजे तक है.’"
***

रविवार, 20 जुलाई 2014

लक्की

उसका नाम लक्की ना जाने किस तुफैल में रख दिया था, अन्यथा वह तो पैदाइशी बदकिस्मत था. माँ लीलावती अपाहिज तथा मानसिक रूप से कमजोर थी. बाप का मुख देखना भी उसे नसीब नहीं हुआ. लक्की के पैदा होने से चार महीने पहले ही एक दुर्घटना का शिकार हो गया था. चाचा-ताऊ सब दकियानूसी व गैरजिम्मेदार निकले. उन्होंने लीलावती व उसके बच्चे को अपशकुनी समझते हुए अपने लिए बोझ बता कर मायके में रहने को मजबूर कर दिया.

यों लक्की अपने नाना-नानी के आश्रय में पला-बढ़ा. ननिहाल में भी लक्की के मामा-मामी ने कोई खैर-खुशी नहीं जताई. ये लोग बरेली जिले के एक दूर दराज गाँव में रहते हैं. नाना देवीदयाल गुप्ता गाँव में ही साहूकारी का धन्धा किया करते हैं, और स्वाभाविक रूप से छोटे सिक्कों को भी दांत से पकड़े रहते हैं. लक्की यहाँ पर अभावों में लावारिस बच्चे की तरह परवरिश पाता रहा. सरकारी स्कूल द्वारा परोसे जाने वाले मिड-डे मील का लक्की को शारिरिक बढ़त देने में बड़ा हाथ रहा है.

लक्की गाँव में ही जब अच्छे नंबरों से हाईस्कूल पास कर गया तो रुद्रपुर में रहने वाली उसकी बड़ी मौसी ने आत्मीयता जताते हुए अपने घर में रहने व वहीं आगे की पढ़ाई करने का आग्रह किया तो लक्की को वहा भेज दिया गया. उसकी आगे की पढ़ाई के लिए एडमिशन भी हो गया. मौसी जो की जुबान की बहुत मीठी है, बोली, मेरे तीन बच्चे हैं, ये चौथा आ गया है, बेसहारा है, पल जाएगा. आगे कोई ट्रेनिंग-वेनिंग करेगा तो अपने साथ लीलावती का जीवन भी सुधार लेगा. पर मौसी का गुप्त एजेंडा यह भी था कि रोटी के बदले लक्की से घर के सारे काम करवाए जाएँ. बेचारा लक्की यहाँ एक नौकर की भूमिका में आ गया. लेकिन वह दीन-दुनिया की ख़बरों के साथ साथ अपनी पढ़ाई में भी बहुत मेहनत करता रहा. अच्छे नंबरों से पास होते हुए बी.काम. फाइनल तक पहुँच गया.

इस बीच जो उसने भोगा-झेला वह उसकी अंखियों से छलके हुए मोटे मोटे आंसू बयान करते रहे. मौसेरी बहनें व भाई उसके साथ भरपूर दुर्व्यवहार करते थे. मौसा-मौसी जानते सुनते भी अनजान बने रहते थे. कुटिल व स्वार्थी लोगों की दुनिया में बहुत से लक्की जैसे बेबस चुपचाप अपना समय निकालते हैं, उफ भी करने से डरते हैं. मगर प्रकृति अपना काम करती रहती है. जहाँ लक्की बी.काम. की परीक्षा में रैंकिंग स्टूडेंट रहा, वहीं उसका मौसेरा भाई लगातार तीन वर्षों से हाईस्कूल में फेल होता रहा.

खुसखबरी ये है कि स्थानीय महेश्वरी समाज ने अपनी जाति के इस होनहार लड़के के परीक्षा रिजल्ट व आर्थिक विपिन्नता की स्थिति का संज्ञान लेते हुए लक्की को बड़ी स्कॉलरशिप देने की घोषणा कर दी है. अब लक्की को मौसी के घर जूठे बर्तन साफ़ नहीं करने पड़ेंगे. वह वह लखनऊ जाकर आगे की पढ़ाई जारी रखेगा. वहीं महेश्वरी हास्टल में रहने-खाने की व्यवस्था रहेगी.

यह सच है कि प्रतिभा किसी की धरोहर नहीं होती है. लक्की के लिए अब बहुत बड़ा खुला आसमान होगा और अनन्त संभावनाएं भी.

शर्मीला भोला-भाला, बुद्धू सा दीखने वाले लक्की के बारे में अड़ोस-पड़ोस के अल्प परिचित लोगों की धारणा उसके बारे में एकदम बदल गयी है. पण्डित रमाशंकर शास्त्री जी ने उत्सुकतावश जब लक्की का आईक्यू जांचना चाहा तो वे तआज्जुब कर गए कि लक्की तमाम समसामयिक विषयों की गहरी जानकारी रखता है. देश की सामाजिक राजनैतिक व्यवस्थाओं पर अपने बेबाक विचार रखता है. चाचा-ताऊ, मामा-मामी व मौसी के परिवार के लोगों का अपने प्रति रवैये को वह परिस्थितिजन्य बताता है और किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखता है. शास्त्री जी सबको बताते फिरते हैं कि एक दिन यह लड़का अवश्य ही समाज का आदर्श बनेगा.
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मंगलवार, 10 जून 2014

आत्मग्लानि

पुराने लोगों ने कहा है, "माया तेरे तीन नाम - परसा, परसू, परसराम," और हमने अपने जमाने में देखा-सुना है, "सत्ता तेरे तीन नाम - पनिया, पन्ना, पनीराम."

हमारे कूर्मांचल प्रदेश का सामाजिक ताना-बाना मैदानी देश से कुछ अलग ज्यादा ही वैदिक रहा है. देश की आजादी के बाद इसमें सुधार व नवचेतना जागृत हुई है. यहाँ शुरू में राजनैतिक रूप से लोग केवल काँग्रेस पार्टी को ही जानते थे. चुनावों के समय केवल रामराज्य परिषद या सोशलिस्ट/प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के झंडे-टोपी से उनका परिचय पाते थे. पूरे अविभाजित अल्मोड़ा जिले (अल्मोड़ा + बागेश्वर + पिथोरागढ़ + चंपावत) का एक सांसद होता था, और इलाका पट्टियों में विधायकी क्षेत्र होते थे. जिनके बड़े-बूढ़े स्वतंत्रता सेनानी थे या जिनको सत्ता की सीढ़ियों का ज्ञान हो गया था, वे क्षेत्रीय प्रतिनिधि बन कर राज करने लगे या यों कहना चाहिए सत्तासुख भोगने लगे. लगभग सभी नेताओं की अगली पीढियाँ शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक दृष्टि में ऊपर उठती चली गयी जो कई बार आपसी ईर्ष्या व प्रतिद्वन्दता का कारण भी बनता रहा है.

संवैधानिक व्यवस्था के तहत कुछ क्षेत्रों में पिछड़े वर्गों/दलितों/आदिवासियों को आरक्षण मिला तो वोट बैंक की राजनीति के साथ पुरानी सामाजिक मान्यताओं को तोड़ती हुई नई सोच पैदा हो गयी कि नौकर मालिक की तरह व्यवहार करने लगे और मालिक सेवक हो गए.

कत्यूर घाटी में छोटी गोमती नदी के किनारे बसे सुरडा गाँव में अधिकतर घर जोशी पंडितों के हैं. जिनका पुस्तैनी काम आसपास के गाँवों में जजमानी/पंडिताई करना रहा है. गाँव में कुछ ठाकुरों के घरों के अलावा लोहार, बढ़ई, ओढ़ (राज मिस्त्री) ढोली जातियों के शिल्पकारों के भी हैं. सैकड़ों वर्षों से ये गरीब शिल्पकार अपने गुसाईयों की सेवा करते रहे हैं. और आपस में अपनेपन का पारिवारिक रिश्ता रहा है. ये एक दूसरे पर पूरी तरह निर्भर भी रहते आये हैं. आजादी की रोशनी में गाँव गाँव में जब स्कूल खोल दिये गए हैं तो पंडितों, ठाकुरों के बच्चों के साथ शिल्पकारों के बच्चे भी स्कूल जाने लगे तथा बाहरी दुनिया से साक्षात्कार करने लगे.

पण्डित ईश्वरीदत्त का लड़का जीवनचन्द्र और उनके हाली बचीराम का बेटा पनीराम कौसानी से हाईस्कूल करने तक साथ साथ पढ़े. जीवनचन्द्र फार्मसिस्ट की ट्रेनिंग लेकर घाटी के सरकारी अस्पताल में कार्यरत हो गया और पनीराम तत्कालीन विधायक मोहनसिंह मेहता जी की व्यक्तिगत सेवा में लखनऊ चला गया. मेहता जी की छत्रछाया में पनीराम नौकर से कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. उसे नेतागिरी की मौजूदा कार्यप्रणालियों का अच्छा ज्ञान भी होता गया. कालान्तर में कुछ वर्षों के बाद जब ये विधान सभा क्षेत्र पिछड़ी जाति के लिए सुरक्षित घोषित हो गया तो पनीराम ने विधायक बनने की जुगत शुरू कर दी. अपने परिवार के पीढ़ियों से अन्नदाता रहे ईश्वरीदत्त जोशी के पुत्र जीवनचन्द्र की उपयोगिता का ख़याल आया. सहपाठी होने के कारण भी जीवन को पनीराम में अनेक संभावनाएं नजर आने लगी. पनीराम के आग्रह के अनुसार जीवनचन्द्र गाँव गाँव जाकर पनीराम के समर्थन में ग्राम प्रधानों, सभापतियों व अन्य जनप्रतिनिधियों से विधायकी टिकट देने की सिफारशी आवेदन लिखवाकर कांग्रेस के प्रांतीय कार्यालय लखनऊ तथा केन्द्रीय कार्यालय नई दिल्ली को डाक द्वारा मुस्तैदी से भिजवाता रहा. नतीजन पनीराम को कॉग्रेस का टिकट मिल भी गया. कांग्रेस के टिकट मिलने का मतलब जीत की गारंटी हुआ करती थी.

जीवनचन्द्र खुश था. खुद को किंगमेकर समझने लगा. बचपन का पनिया अब पनीराम आर्या राज्यमंत्री बन गया. शास्त्रों में भी लिखा है कि पद का मद चढ़ता ही है. एक बार राज्यमंत्री पनीराम  आर्या जब जीवनचन्द्र जोशी वाले अस्पताल का निरीक्षण करने आया तो जीवनचन्द्र की अपेक्षाओं के विरुद्ध उसके मिजाज बिगड़े हुए थे. उसने  स्टाफ से अनावश्यक रूप से अपशब्द कह डाले. जीवनचन्द्र बहुत आहत हो गया और पनीराम से बोला, आपसे अकेले में कुछ बात करनी है. कमरे में ले जाकर जीवनचन्द्र ने आव देखा ना ताव पनीराम को थप्पड़ जड़ दिया और उसके बाप दादा की औकात तक याद दिला दी.

राज्यमन्त्री महोदय अपमान का घूँट पीकर जब लखनऊ लौटे तो अस्पताल के पूरे स्टाफ का दूर दूर स्थानांतरण करवा दिया. सबसे ज्यादा सजा जीवनचन्द्र को पीलीभीत स्थानांतरित करके दी गयी. गुप्त रिपोर्ट में मन्त्री महोदय ने लिखा कि "जीवनचन्द्र उत्तराखण्ड क्रान्तिदल का खतरनाक कायकर्ता है. इसे उत्तराखण्ड की सीमा से दूर भेजा जाये."

कुछ सालों तक पीलीभीत में नौकरी करने के बाद जीवनचन्द्र अपने जुगाड़ से नैनीताल के भीमताल अस्पताल में बदली करवाकर आ गया जहाँ एक दिन अब भूतपूर्व हो गए राज्यमंत्री पनीराम ने एक आदमी के हाथों अपना मार्मिक पत्र लिख कर जीवनचन्द्र को लखनऊ बुलाया. पनीराम लीवर सिरोसिस की बीमारी से गंभीर रूप से बीमार था. पत्र इस प्रकार लिखा था:

"आदरणीय पण्डित जी,
सादर नमन. मैं बहुत बीमार हूँ. मुझे लग रहा है कि मेरी जीवन यात्रा समाप्त होने जा रही है. जाने से पूर्व मैं आपसे अपने व्यवहार के लिए दिल से क्षमा याचना करना चाहता हूँ. कृपया दर्शन देकर मुझे मुक्ति दें.
आपका ही,
पनीराम."

जीवनचन्द्र जोशी बड़े बेमन से उससे मिलने के लिए लखनऊ के लिए चल पड़े, पर उनके वहाँ पहुँचने से पहले ही पनीराम शरीर छोड़ चुका था.
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रविवार, 8 जून 2014

बैठे ठाले - 12

वर्तमान समय में हमारे देश, समाज अथवा प्रशासन/सरकार में केवल वही लोग ईमानदार रह गए हैं जिनको बेईमानी का मौक़ा नहीं मिला है. जब पैसा ही ईमान हो जाये तो कहाँ धर्म? कहाँ रिश्ते नाते? कहाँ देश-प्रेम? सब पोथी के बैगन होकर रह गए हैं. पर हमारी याददाश्त में अब से पचास-साठ साल पहले तक ऐसी अंधेरगर्दी नहीं थी. लोगों की आँखों में शरम-लिहाज हुआ करता था, जो अनैतिक लेनदेन /रिश्वत पर उजागर होता था, पाप समझा जाता था. हराम से लोग डरते थे.

आजादी के कई वर्षों के बाद तक भी ईमानदारी की गरिमा बड़े लोगों के व्यवहार में झलकती थी. यद्यपि सरकारी कर्मचारियों को बहुत कम वेतन मिलता था, पर उसी में संतुष्टि होती थी. अगर कोई व्यक्ति गजेटेड ऑफिसर हो गया होता था तो उसके मायने होता था कि वह ईमानदार, न्यायप्रिय और आदर्श व्यक्ति है. ये चारित्रिक अवमूल्यन तो धीरे धीरे शुरू हुआ. समाज के कर्णधारों ने जब खुलेआम दो नम्बर की कमाई करनी शुरू की तो पूरे तन्त्र को ही ज्यों दीमक खाने लगी हो. स्थिति इतनी गंभीर है कि एक बार देश की शीर्ष अदालत को दुखी होकर कहना पड़ा कि सुविधा शुल्क यानि रिश्वत को कानूनी मान्यता दे देनी चाहिए."

अब भ्रष्टाचार की जड़ें कैन्सर की तरह मजबूत हो गयी हैं और हर तरफ लोग इसमें लिप्त हैं और इससे त्रस्त भी हैं. हमारे नए प्रधानमंत्री जी ने चुनाव पूर्व लोगों की इसी दुखती रग पर अंगुली रखकर जन भावना का पूर्ण दोहन किया. व्यवस्था परिवर्तन अवश्यम्भावी हो गया था और परिणामों में परिलक्षित भी हुआ. लेकिन क्या इस भयंकर बीमारी से आसानी से निजात पाई जा सकती है? ये एक बड़ा 'यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर शायद नकार में ही मिलेगा. हाँ, अपवाद अवश्य मिलेंगे.

मेरे एक मित्र श्री त्रिलोचन त्रिवेदी बताते हैं कि सन १९६० के दशक में एक बहुचर्चित और आदरणीय डॉक्टर, दामोदर भट्ट, DMO के पद पर हुआ करते थे. उनको उनके पवित्र चरित्र और गुणों के कारण संपर्क मे आने वाले मरीज व अन्य लोग भगवान तुल्य माना करते थे. देश में जनसंख्या नियंत्रण के बारे में उन दिनों नसबंदी की मुहिम चली हुई थी. नसबंदी कराने वाले को २५ रूपये प्रोत्साहन राशि भी दी जाती थी, पर आम लोगों में इसके बारे में अनेक भ्रांतियां फैलाई गयी थी. इसे धर्म के साथ जोड़ कर प्रकृति के साथ खिलवाड़ कहा जाता था. लोगों में एक अनावश्यक डर बैठा हुआ था. ऐसे में दीवानगिरी नाम का एक गरीब छोटा काश्तकार स्वेच्छा से आकर अपनी नसबंदी करवाने आ गया. दीवानगिरी जनसंख्या नियंत्रण के सरकारी कार्यक्रम से बहुत प्रभावित था. डॉ. भट्ट को दीवानगिरी के इस प्रकार अगुआ बनने पर बहुत खुशी हुई उन्होंने दीवानगिरी से कहा, मैं तुमसे बहुत खुश हूँ तुम आज जो भी वरदान माँगना चाहो माँग लो, मैं सुलभ करवा दूंगा.

दीवानगिरी ने हाथ जोड़ कर कहा, मेरे एक बेटे को आप नौकरी पर लगवा दीजिए. बस.

डॉक्टर भट्ट समर्थ थे. दीवानगिरी के बेटे को अगले ही दिन से अस्पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में रख लिया गया. एक सप्ताह बाद अहसानमंद दीवानगिरी अपने घर का बना हुआ दो किलो शुद्ध घी और एक पोटली में लगभग पाँच किलो चावल  भेंट स्वरुप लेकर डॉ. भट्ट के निवास पर पहुँच गया. डॉक्टर साहब को उसकी ये हरकत बहुत बुरी लगी, बोले, तुम मुझे रिश्वत दे कर पाप का भागीदार बनाना चाहते हो. मैं तुम्हारे बेटे को अभी नौकरी से हटाने का आदेश करता हूँ.

दीवान गिरी रोने लगा और अपना अपराध स्वीकार करके माफी मांगने लगा. डॉक्टर साहब पसीज गए. उसके सामान की बाजार भाव से कीमत निकाल कर उसे पकड़ा दी और बोले, तुम अपने कान पकड़ कर तीन बार उठक-बैठक करो तथा कसम खाओ कि भविष्य में कभी किसी को रिश्वत नहीं दोगे.

ये सच्चे किस्से आज पौराणिक गल्प से लगने लगे हैं क्योंकि कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकाँश डॉक्टर मरीज की जेब पर नजर रखते हैं. रेवन्यू विभाग या अन्य पब्लिक डीलिंग्स वाले विभागों में अपना सादा काम निकलवाने की एवज में भी सुविधा शुल्क देना ही पड़ता है.

उपसंहार: ये जो हमें नजर आते हैं, भ्रष्टाचार-अनाचार के बिन्दु भर हैं. महासागर शोधन के संकल्प का क्या हश्र होगा? भविष्य बताएगा. 
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शनिवार, 17 मई 2014

अमिया

चतुरसिंह ठिठोला ने अपनी पत्नी मंजरी को हिकारत भरे स्वर में डांटा, तुम्हें क्या जरूरत थी उसको अमियाँ देने की? मैंने तुमसे कई बार कहा है कि इन छोटे लोगों से व्यवहार रखने की जरूरत नहीं है, पर तुम्हें मेरी बेइज्जती करानी थी. हमारे मुँह पर थप्पड़ सा मार गया वो दो कौड़ी का हवलदार.

मंजरी पति के स्वभाव को जानती है. बेचारी रूआंसी होकर रह गयी, आँखें सजल हो आई.

गाँव की बसावट कुछ ऐसी है कि एक पंक्ति में आठ-दस घर उत्तरमुखी हैं. इसे गाँव वाले ‘बिष्ट बाखली के नाम से पुकारते हैं. इस बाखली (मकानों की पंक्ति) में काश्तकार, ड्राइवर, टीचर, व रिटायर्ड फ़ौजी रहते हैं. सभी बिष्ट बिरादरी के हैं. इस बाखली के ठीक पीछे वकील साहब का पाँच बीघे का खेत है और एक पक्का मकान भी. वकील साहब को गुजरे दस साल हो गए हैं, अब इस घर में उनका बेटा चतुरसिंह ठिठोला व उसकी पत्नी मंजरी रहते है. चतुरसिंह को वकील साहब ने नैनीताल के एक नामी कान्वेंट स्कूल में पढ़ाया-लिखाया और ग्रेजुएशन के लिए लखनऊ भेजा. चतुरसिंह को बचपन से ही ये अहसास भी कराया कि वह आम ग्रामीणों से अलग है, सुपीरियर है. अत: स्वाभाविक तौर पर वह इस ग्रामीण समाज से बिलकुल कटा रहा, और अब जब वह स्थानीय दूर-संचार विभाग में एस.डी.ओ. बन गया तो उसके भाव और भी ऊँचे हो गए. उसकी पत्नी मंजरी जरूर सामाजिक रहना चाहती है, लेकिन पति के स्वभाव व मकान का अलग-थलग पड़ना उसके लिए बाधक रहा है. वह अकेलेपन के कारण बतियाने वालों की तलाश में रहती है. उसके आँगन में गोविन्दसिंह हवलदार के घर की पिछवाड़े की खिड़की खुलती है, जहाँ पर मौक़ा पाते ही वह गोविन्दसिंह की पत्नी मीनाक्षी से सुख-दुःख व ग्राम समाचार बाँटती रहती है.

चतुरसिंह की चहारदीवारी में एक आम का बहुत पुराना बड़ा पेड़ है. ये कभी किसी की फेंकी हुई गुठली से उगा होगा. इस पर फल बहुत छोटा आता है, जिसमें भी गुठली बड़ी और रेशे वाली होती हैं. हाँ, मिठास तो अवश्य रहती है. फल भी हर साल नहीं आते, पर जब आते हैं तो मंजरी मीनाक्षी को आवाज देती है और थैला भर कर पकड़ा देती है. इस प्रकार आमों से दोस्ती का रिश्ता बना रहता है.

चतुरसिंह और गोविन्दसिंह में भी रस्मी दुआ-सलाम होती है. ये भी तब, जब गोविन्दसिंह आगे होकर बोले. गोविन्दसिंह को एक बड़ी शिकायत रहती है कि पतझड़ के मौसम में आम के तमाम सूखे पत्ते उसकी छत-आँगन में भर जाते हैं, जिन्हे साफ़ करने की कवायद करनी पड़ती है. गोविन्दसिंह ने कई बार चतुरसिंह से कहा भी था कि उसकी छत की तरफ लटकी हुई बड़ी डाल को छाँट कर छोटा करवा दें, पर चतुरसिंह ने उसके आग्रह पर कोई ध्यान नहीं दिया. इस बार गोविन्दसिंह को ना जाने क्या सूझी सारे पत्ते समेट कर चतुरसिंह के आँगन में फेंक दिये.

शीतयुद्ध की शुरुआत हो गयी. पत्नियों में भी आपस में बोल-चाल बन्द हो गई. गत वर्ष जून में खूब आम पके. झड़े भी और तोड़े भी गए. गोविन्दसिंह और उसकी पत्नी पूरे आमों के मौसम में देखते रहे, पर मंजरी ने उनसे नजर तक नहीं मिलाई, बल्कि उनको चिढ़ाने-जलाने के लिए ढेर सारी पीली गुठलियाँ व छिलके उनकी खिड़की की सीध में जमा करके रख छोड़े.

वैसे इस इलाके में आम बहुतायत में पैदा होता है. बाजार में स्थानीय आम बहुत सस्ती दरों में बिकने आता है, पर लिए-दिये की बात और होती है. अब इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि पत्ते आँगन में फेंकने से चतुरसिंह खफा हैं. हालांकि उनसे आमों की कोई अपेक्षा गोविन्दसिंह और उसकी पत्नी कर भी नहीं रहे थे. केवल अहं का सवाल था.

कुछ महीने पहले एक दिन शाम को राह में घूमते हुए मंजरी और मीनाक्षी की मुलाक़ात हो गयी. मंजरी ने मुस्कुराते हुए बातों से उसे बहुत अपनापन जताया, आप तो दिखती ही नहीं हो, “खिड़की भी बन्द रखती हो, मै तो आपसे बातें करने को तरसती हूँ. यूँ फिर से दोनों महिलाओं में खिड़की पर आकर संपर्क साधना शुरू हो गया. महरियों के बारे में, दूध-पानी के बारे में लम्बी वार्ता होने लगी. मंजरी ने मसाला कूटने के लिए इमाम दस्ता माँगा, इस प्रकार अमिया-आम-गुठलियों-छिलकों की बात को पटाक्षेप दे दिया, उस बारे में चर्चा तक नहीं की.

अगले वर्ष फिर से पेड़ पर खूब अमिया आई, लेकिन एक दिन ऐसा अंधड़ आया कि ज्यादातर कच्चे फल जमीन पर आ गिरे. अगली सुबह एक पॉलीथीन की थैली में बहुत सी अमिया समेट कर मंजरी ने मीनाक्षी को आवाज देते हुए खिड़की के पास रख दिये. मीनाक्षी तब स्नान कर रही थी, गोविन्दसिंह ने अमिया देख कर बड़ी तल्खी आवाज में मंजरी से कहा हटाइये, हटाइये, ये बीमारी की जड़, हमको नहीं चाहिए.

खिसियानी सी होकर मंजरी बोली, भाई साहब इसकी चटनी बनाइएगा.

गोविन्दसिंह बोला, नहीं खानी है हमको तुम्हारे आम-अमिया की चटनी. आपको ही मुबारक हो.

मंजरी अपनी अमिया उठा कर ले गयी. मीनाक्षी ने पति से कहा, आपको ये सब कहने की क्या जरूरत थी, रख लेते, नहीं खानी थी तो फेंक देते.

गोविन्दसिंह बोला, बात आम-अमिया की नहीं है, व्यवहार की है, अगर चतुरसिंह बड़ा आदमी है तो हम भी किसी से कम नहीं है. किसी का दिया नहीं खाते है. तू देखना अगले साल अपने पेड़ पर भी अमिया आ जायेंगी.
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