मंगलवार, 26 अगस्त 2014

चुहुल - ६६

(१)
अपने को बदसूरत समझने वाली एक महिला प्लास्टिक सर्जन के पास आकर अपने चेहरे को बदलवाने के बारे में फीस पूछने लगी. डॉक्टर ने कहा, “पचास हजार रुपयों में आपका चेहरा बिलकुल बदल जायेगा. यहाँ तक की आपके परिचित भी आपको नहीं पहचान पायेंगे.”
वह कुछ सौदेबाजी के लहजे में बोली, “और कोई सस्ता तरीका बताइये?”
डॉक्टर बोला, “सबसे सस्ता तो ये है की आप घूंघट निकाल कर चला करें.”
        
(२)
मुम्बई के एक ब्यूटी पार्लर ने के बाहर लगा साइन बोर्ड:
"यहाँ से बाहर निकलने वाली लड़की को देख कर सीटी मत बजाइए, वो आपकी दादी या नानी भी हो सकती है."

(३)
झूठ बोलने के लिए मशहूर एक आदमी किसी दूसरे शहर में गया. एक बहुत उम्रदराज झुर्रीदार बुढ़िया का मन हुआ कि उस झूठे इंसान को देखना चाहिए. वो उसे देख कर बोली, “सुना है कि तुम दुनिया के सबसे झूठे आदमी हो?”
इस पर वह बोला, “अरे, दुनिया का क्या है अम्मा, कुछ भी कह देते हैं, पर मैं तो आपको देखकर हैरान हूँ कि आप इस उम्र में भी इतनी सुन्दर हसीं और आकर्षक लग रही हो.”  
ये सुनकर वह बूढ़ी औरत थोड़ी शरमाई और फिर कहने लगी,  “या अल्लाह! लोग कितने दुष्ट हैं की एक सच्चे इंसान पर ‘झूठे’ का तमगा लगा रखा है.”

(४)
एक आदमी बड़े मजे से अपने रिश्तेदार को बता रहा था, “मेरे शहर के ज्यादातर लोग बड़े आलसी है. हाल ये है कि ये एक एक महीने तक नहीं नहाते हैं, लेकिन अपन को तो  २५ दिनों के बाद नहाना ही पड़ता है वरना खुजली होने लगती है.”

(५)
डॉ. ओ. पी. जग्गी, छाती के रोगो के विशेषज्ञ के साथ गरीबनवाज भी रहे हैं. एक बार जब वे अस्पताल से बाहर सड़क पर चले जा रहे थे तो एक श्वास रोगी भोले बुजुर्ग ने उनको पहचान लिया. उन्होंने चलते चलते डॉक्टर साहब से कोई दवा लिखने का निवेदन भी कर डाला. डॉक्टर जग्गी ने अपने हाथ के ब्रीफकेस में टटोला तो प्रिस्क्रिप्शन लिखने के पैड में कोई पन्ना नहीं बचा था. उन्होंने उसके गत्ते को तोड़कर उसी पर दवा लिख दी और कहा, "इसके छ: खुराक लेने हैं, दिन में दो बार तीन दिन तक; चौथे दिन मुझे अस्पताल आकर बताना.”
चौथे दिन जब मरीज उनके पास आया तो बहुत खुश था बोला, “डॉक्टर साहब आपकी दवा से बहुत आराम आ गया है.”
डॉक्टर ने जब प्रिस्क्रिप्शन माँगा तो मरीज बोला, “उसके तो छ: टुकड़े करके मैंने खा लिए.”
***   

रविवार, 17 अगस्त 2014

मेरे 'अटल' रिश्ते

सन 1960 में एक 20 वर्ष का नौजवान हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञापन के माध्यम से राजस्थान की एक सीमेंट फैक्ट्री में नौकरी पा जाता है, उसके कोई राजनैतिक संस्कार नहीं होते हैं. मिलनसारी स्वभाव में चुहुलबाजी का तड़का होने से वह वहाँ के समाज में जल्दी ही अपनी पहचान बना लेता है. वह कोई और नहीं मैं ही हूँ.

राह चलते, बिना सोचे समझे फैकट्री से अनुशासनहीनता के आरोप में नौकरी से निकाले गए एक कर्मचारी हरिप्रसाद शर्मा से दोस्ती हो गयी. हरिप्रसाद ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, पर उनके अन्दर आक्रोश और खुराफात भरे हुए थे. वे कंपनी के मैनेजमेंट से खार खाए बैठे थे. अपने राजनैतिक गुरु स्वर्गीय श्री भंवरलाल शर्मा एम.एल.ए.(कांग्रेस) की शागिर्दी में बहुत अनुभव पा चुके थे. सन 1962 के विधानसभा चुनावों में पार्टी टिकट पाने की कसरत में कांग्रेस से लेकर सोशिअलिस्ट पार्टी के दफ्तरों व सिपहसालारों के पीछे बहुत चक्कर काटे, लेकिन किसी ने टिकट नहीं दिया तो भारतीय जनसंघ (जिसका तब उस क्षेत्र में कोई जनाधार नहीं था) ने पार्टी टिकट दे दिया. लोग परिवर्तन चाहते थे और बहुत से लोगों की हमदर्दी भी हरिप्रसाद जी के साथ थी. हालांकि भंवरलाल शर्मा बहुत वजनदार व्यक्तित्व वाले थे, सिटिंग विधायक के अलावा हरिजन सेवक संघ और भारत सेवक समाज आदि अनेक संस्थाओं के प्रधान भी थे पर हरिप्रसाद शर्मा ने अप्रत्याशित रूप से उनको हरा दिया था. मुझे तब पता नहीं था की ‘जनसंघ’ क्या चीज है, उसका सदस्य नहीं होते हुए भी हरिप्रसाद जी की जिताने में भरपूर सहयोगी रहा.

कुछ समय बाद हरिप्रसाद विधायक जी ने एक लकड़ी का ब्लैकबोर्ड बनवाकर मेरे घर भेज दिया, जिस पर मैं चॉक से तत्कालीन कांग्रेस सरकार विरोधी समाचार लिखकर तिराहे पर जगदीश पंजाबी की दूकान के पास रखवा देता था. ये बोर्ड बहुत चर्चित रहा क्योंकि इसमें स्थानीय जायकेदार समाचार भी होते थे और कभी कभी फैक्ट्री मैनेजमेंट पर भी चोट होती थी.

इस बीच मैं चुनाव लड़कर सहकारी समिति के प्रबंधमंडल का अवैतनिक मंत्री भी बन गया. पर कांग्रेसी नेताओं व फैक्ट्री मैनेजमेंट की आँख की किरकिरी भी बनता गया. (मैंने ‘मगर से बैर’ शीर्षक से एक विस्तृत लेख भी पूर्व में अपने ब्लॉग पर डाला है.) आज मैं सोचता हूँ की ये सब मेरी नादानी और नासमझी थी. जिसका परिणाम यह हुआ की सन 1970 के कर्मचारी यूनियन के चुनावों से पूर्व ही मुझे सुदूर दक्षिण के शाहाबाद (मैसूर- तब कर्नाटक नाम नहीं पड़ा था) कारखाने में स्थानांतरित कर दिया गया. मैंने कांग्रेस व यूनियन के नेताओं से स्थानान्तरण रुकवाने के लिए कोई हाथाजोड़ी नहीं की, और जोश जोश में अपने परिवार के साथ शाहाबाद पहुँच गया. वहां जाकर मालूम हुआ कि कंपनी क्षेत्र मे कन्नड़ माध्यम के स्कूल हैं तथा हिन्दी माध्यम के लिए जिला मुख्यालय गुलबर्गा जाना होगा. किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में मैं पत्नी व बच्चों को माता पिता के पास अल्मोड़ा अपने गाँव में छोड़ आया. वापसी में देश की राजधानी दिल्ली गया, जहां मेरे रिश्ते के जीजा जी (तयेरी दीदी के पति श्री मथुरादत्त भट्ट तब उद्योग मंत्रालय में अंडर सेक्रेटरी के पद पर थे) के पास गया. उन्होंने पहले तो मुझे सत्ता के खिलाफ कारगुजारियों के लिए डांटा फिर अगली कार्यवाही की सोचने लगे. भट्ट जी बहुत प्रभावशाली व्यक्ति थे. कुमाऊंनी रामलीला में ‘रावण’ का किरदार भी अदा किया करते थे, एवं कालांतर में संजय गांधी के सहयोगी भी रहे थे. वे मुझे तत्कालीन उद्योगमंत्री स्व. फखरुद्दीन अली अहमद के बंगले पर ले गये, पर उन्ही दिनों उनका कोई ख़ास निजी सचिव किसी रिश्वत काण्ड में फंसा हुआ था, उन परिस्थितियों में उन्होंने कोई मदद करने में असमर्थता बता दी. उसके बाद जीजाश्री मुझे स्व मोरारजी देसाई जी के बंगले पर ले गए, उन्होंने जल्दी से मेरी दास्तान सुनाने को कहा फिर बोले, “ये बहुत छोटा प्रशासनिक मामला है. मैं इसके लिए पालकीवाला (ए.सी.सी. के चेयरमैन) को कहना ठीक नहीं समझता हूँ.” आज इतने वर्षों के बाद मैं खुद समझ रहा हूँ की हमारा वह प्रयास एक बन्दूक से मक्खी मारने के सामान था.

शाहाबाद जाकर भी मैं दिन-रात इस सोच विचार में रहा कि उत्तर भारत के हिन्दी क्षेत्र में किस प्रकार अपनी बदली करवाई जाय, ताकि मेरा परिवार साथ रहे और बच्चों की पढ़ाई बाधित ना हो.

एक दिन मेरे दिमाग में आया कि संसद सदस्य श्री अटलबिहारी बाजपेयी जी को मदद करने को लिखा जाए. मैंने पूरा विवरण लिख कर उनको लिखा कि नानी पालखीवाला जी को कह कर मेरी बदली करवा दें. एक साधारण डाक से मैंने अपना पत्र भेज दिया.

अटल जी से मेरी एक छोटी सी मुलाक़ात तब हुयी थी जब वे सन 1968 में लाखेरी आये थे. मेरे दोस्त स्व. चन्द्रमोहन चतुर्वेदी जी के टू-रूम क्वार्टर में उनके भोजन की व्यवस्था थी, और सिनेमा हॉल के मैदान में उनकी सभा हुयी थी. हरिप्रसाद शर्मा, जो की 1967 के विधान सभा का चुनाव हार चुके थे, कर्ता धर्ता थे. मैं जनसंघ का सदस्य नहीं होते हुए भी इस लॉबी से जुड़ा हुआ था. तब हरिप्रसाद जी ने मेरा परिचय सहकारी समिति के सेक्रेटरी के रूप में कराया था. आज मैं सोचता हूँ कि उनसे, मेरे जैसे लाखों लोग मिलते रहे होंगे. किस किस की याद रख सकते हैं.

मेरे पत्र भेजने के चन्द दिनों के बाद ही अटल जी का एक हस्तलिखित पोस्ट कार्ड मुझे मिला कि “पालखीवाला से मेरे ऐसे सम्बन्ध नहीं हैं. इस बारे में मैं बम्बई के कायकर्ता को लिख रहा हूँ. प्रयास करते रहो, फल ईश्वराधीन है.”

उसी बीच एक अन्य धटनाक्रम में मैं स्व. सुन्दरसिंह भंडारी (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बड़े नेता, जो बाद में गुजरात के राज्यपाल भी रहे हैं) से शाहाबाद के सर्किट हाउस में मिला. मिला क्या, वे सो रहे थे और मैं अर्जुन की तरह उनके पैरों की तरफ कुर्सी लगा कर बैठा रहा. वे जागे तो मेरी बात सुनने के बजाय, बिना इजाजत अन्दर आने की वजह से नाराज हो गए. मुझे उस दिन अहसास हुआ की मैं गलत ट्रैक पर चल रहा था और मैं सीधे श्रीनिवास गुडी जी के पास गया. वे यहाँ एक स्थापित और समर्पित कम्यूनिस्ट लीडर थे. किसान सभा व मजदूर संघों का काम देखते थे. शाहाबाद/वाडी कर्मचारी यूनियन (एटक) के अध्यक्ष थे. उन्होंने मुझे बड़ी दिलासा दी और मदद का आश्वासन दिया. मैंने परिस्थितियों से समझौता करने का निश्चय कर लिया और अपने बच्चों को वापस शाहाबाद ले आया कोचिंग करवाई और यहाँ कॉन्वेंट स्कूल में दो वर्ष पीछे की कक्षाओं में भर्ती करवाया. अंग्रेजी आधार मिलने से बाद में बच्चों को हायर ऐजुकेशन में बहुत लाभ हुआ.

सन 1972 में सीमेंट कामगारों की 13 दिनों तक आर्थिक मांगों को लेकर एक देशव्यापी हड़ताल हुयी थी. मैं माईक पर मुखर हुआ जिसके परिणामस्वरुप मुझे श्रीनिवास गुडी जी ने युनियन का जनरल सेक्रेटरी बना दिया. मैंने अल्पकाल में बहुत से काम मजदूरों के हित में करवाए. मैनेजमेंट थोड़ा परेशान भी था क्योंकि ये ‘पीस जोन ’ डिस्टर्ब हो रहा था. मैनेजमेंट मेरी कमजोरी जानता था. मुझे हैड ऑफिस बम्बई बुलाया गया और मुझे राजी करके वापस लाखेरी स्थानांतरित कर दिया गया.

इस बार मैं ट्रेड युनियन कार्यकर्ता के रूप में वामपंथी संस्कार लेकर वापस आया था. खुद को पुन: संगठन में स्थापित करने के लिए जद्दोजिहद की. यद्यपि बड़ी मुश्किल से सामंजस्य बिठा कर इंटक की युनियन का अग्रणी लीडर बना रहा. लोगों का स्नेह था कि मैं अपने मिशन में सफल रहा.

आज रिटायरमेंट के १५ वर्षों के बाद मुझे पुराने कागजातों में अटल जी का हस्तलिखित पोस्ट कार्ड जीर्ण अवस्था में मिला तो सारे घटनाक्रम सिनेमा की रील की तरह चल पड़े. इसमें बड़ा सन्देश यह है कि, "प्रयास करते रहो, फल ईश्वराधीन है." मैंने इसका चित्र लेकर यहाँ लगाया है. चित्र की ख़राब क्वालिटी के लिए क्षमा चाहता हूँ.                  
अटल जी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड 

रविवार, 10 अगस्त 2014

एक पिकनिक ऐसी भी

दुर्घटनाऐं कभी सूचित करके नहीं आती हैं. टेलीवीजन पर पिछले महीने मध्यप्रदेश के बेतूल में एक दुस्साहसी बाइक-सवार अपनी बाइक सहित उफनती बरसाती नदी में देखते ही देखते बह गया. अभी एक अन्य समाचार में राजस्थान के टोंक जिले में बनास नदी से रेत निकालते समय पंद्रह मजदूर ट्रक सहित बहने वाले थे, परन्तु आसपास गाँव वालों द्वारा रस्सी के सहारे खींच कर बचा लिए गए. इससे पूर्व पिछले महीने में ही आंध्र प्रदेश से टूरिस्ट बन कर आये इन्जीनियरिंग के 24 छात्र हिमांचल में नदी की गोद में समा गए थे. ऐसी अनेक दुर्धटनाएं रोज हुआ करती हैं. इन दुर्घटनाओं में कहीं ना कहीं दुस्साहस या लापरवाही अवश्य रहती है.

आज से ठीक 25 साल पहले, सन 1989 में, मैं अपनी यूनियन (कर्मचारी संगठन) के 35 डेलीगेटों के साथ इसी प्रकार की एक भीषण दुर्घटना से बच निकला था.

लाखेरी (जिला बूंदी, राजस्थान) की ए.सी सी. सीमेंट फैक्ट्री के कर्मचारी संघठन की का मैं लम्बे समय तक प्रेसीडेंट रहा. कर्मचारी लोग अपने अपने समूहों में हर वर्ष बरसात के दिनों में कैम्पस से दूर, किसी रमणीय पिकनिक स्थल पर जाकर एक दिन आनंद पूर्वक छुट्टी मनाते थे. रोजमर्रा की अपाधापी को भुलाते हुए मस्ती में रह कर ताजे हो जाते थे. यूनियन के डेलीगेट एक वर्ष वर्षा की फुहारों व अरावली पर्वत माला की नयनाभिराम दृश्यों के बीच ‘मैनाल’ नामक ऐतिहासिक स्थान को चल पड़े. मैनाल बूंदी शहर और चित्तोरगढ़ के बीच में स्थित है. ये एक छोटा सा ऐतिहासिक स्थल राजमार्ग के बगल में ही है. यहाँ लाल पत्थरों से बने ‘महाबालेश्वर मंदिर’ पर खुदी हुई श्रंगारिक मानव आकृतियाँ व अन्य सुन्दर दर्शनीय कलाकृतियाँ 10-11वीं शताब्दी में चौहान वंश के राजाओं के समय बनी हुई हैं. इन इमारतों की बगल में एक बरसाती नाला बहुत दूर पठारों से पानी समेटते हुए कलकल करते हुए लगभग २५-३० फुट का झरना बन कर नीचे कुंड में गिरता रहता है. झरने के उस पार एक देवी का एक छोटा सा प्राचीन मंदिर है. स्थानीय लोगों की मान्यता है की ये देवी चमत्कारी है. देवी पूजन सामग्री के साथ एक ज़िंदा मुर्गा भी अर्पित किया जाता है. अत: मंदिर के अन्दर बाहर मुर्गों की जमात खाते-खेलते रहती है. यहाँ मुर्गों को पकड़ना या मारना पाप माना जाता है.

सैलानियों की सुविधा के लिए कई रसोइयाँ बनी हुयी हैं, जहाँ घी में तर राजस्थानी व्यंजन दाल-बाटी, कत्थ, चूरमा, गट्टे की सब्जी बनती हैं. पिकनिक के लिए आए लोग अपनी खाद्य सामग्री, उपले व बर्तन सब कुछ अपने साथ लेकर आते हैं. हमारे स्वयंसेवक पहुँचते ही अपने कार्य में जुट गए. बाकी लोग उधम-चौकड़ी मनोरंजन, झरना-स्नान करके आनंद लेते रहे. चूंकि 78 किलोमीटर वापस भी जाना था इसलिए 3 बजे भोजन परोस दिया गया. चिंता का विषय ये रहा की काले बादलों की आवाजाही बढ़ गयी थी. इधर हमारी टीम के दो ख़ास सदस्य सीन से गायब थे. पूछताछ करने पर मालूम हुआ की वे शराब के चक्कर में निकटवर्ती गाँव में गए हुए थे. मेरे अभिन्न साथी जनरल सेक्रेटरी  भाई इब्राहिम हनीफी व सेक्रेटरी रविकांत जी बहुत चिंतित व परेशान हो गए. मैं बहुत गुस्से में था, पर वक्त की नजाकत थी उन शराबियों को छोड़ कर भी नहीं आ सकते थे. इधर-उधर तलाशने पर वे मिल भी गए, पर तब तक नाले में पानी की मात्रा बढ़ गयी थी. बस ड्राइवर ने दुस्साहस किया नाले को पार करने के लिए सभी लोगों को बस में बिठा लिया. सभी की जान सूख रही थी, पर कोई विकल्प नहीं था. अन्धेरा छाने लगा था. कुछ भी अनहोनी हो सकती थी. नाले का पानी 20 फीट पाट तक फ़ैल चुका था. अगर बीच में बस पलट गयी होती तो सीधे झरने में गए होते. हम सबका भाग्य अच्छा था. होशियार ड्राइवर ने धीरे धीरे नाला पार कर लिया. भगवान को अनेक धन्यवाद दिये.

उसके बाद आने वाले 9 सालों में जब तक में प्रेसीडेंट रहा, बहुत सावधानी पूर्वक पर्यटन स्थलों का चयन किया गया तथा डेलीगेटों के लिए आचार संहिता तय की गयी की पिकनिक के दौरान कोई शराब का सेवन नहीं करेगा.

उस पिकनिक में हुए अनुभव को मैं आज भी भुलाए नहीं भूल पाता हूँ.
***

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

चुहुल - ६५

(१)
एक सास ने गुस्से के साथ अपने फ़ौजी दामाद को पत्र लिखा, “मेरी बेटी को तनहा छोड़ कर तुम सरहद पर मौज-मस्ती करते हो, शराफत से घर आ जाओ. कोई बहाना बना कर छुट्टी ले लो.” 
प्रत्युत्तर में फ़ौजी ने पार्सल से एक हैंड ग्रेनेड सासू जी को भेजा और साथ में पत्र में लिखा, "आप अकेले में जाकर इस बाल पर लगी पिन को खींच लेना. मुझे तुरन्त छुट्टी मिल जायेगी."


(२)
एक पत्नी अपने पति से शिकायत कर रही थी, “आप मुझे नाम लेकर पुकारा करते हो इसलिए बच्चे भी नाम लेकर ही पुकारने लगे हैं.”
पति बोला, “अच्छा अब से मैं तुमको ‘मम्मी’ पुकारा करूँगा.”

(३)
नई नवेली बहू सिसकियां भर रही थी, सास ने हमदर्दी भरे अंदाज में पूछा, “क्यों बहू, क्या बात हो गयी?” 
बहू बोली, “क्या मैं चुड़ैल जैसी लगती हूँ?”
सास बोली, “बिलकुल नहीं.”
बहू फिर बोली, “क्या मैं मोटी काली भैंस हूँ?”
सास बोली, “बिलकुल भी नहीं, पर ये तुझसे कहा किसने?”
बहू थोड़ा रुक कर बोली, “ये मोहल्ले की सारी औरतें कह रही हैं कि मैं बिलकुल अपनी सास जैसी दिखती हूँ.”

(४)
बात द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान की है. जर्मनी के एक मुर्गी फ़ार्म में अधिनायक हिटलर आया. मुर्गीबाड़े की तरफ देख कर जोर से बोला, “कल से सभी पक्षी दो-दो अण्डे रोज देंगे.”
अगले दिन सचमुच सभी मुर्गियों ने डर के मारे दो-दो अण्डे दे दिये, लेकिन एक पक्षी के पास केवल एक ही अंडा पड़ा था.  उससे जब हिटलर ने कारण पूछा तो वह बोला, "सर, मैं मुर्गा हूँ.”

(५)
सुबह नौ बजे क्लीनिक खुलते ही महिला मरीजों ने डॉक्टर साहब से शिकायत की, "एक आदमी वेटिंग रूम में हम को घूर रहा है."
डॉक्टर ने तुरन्त उसको बुलाया और घूरने का कारण पूछा. वह बोला, “आपने ही तो बोर्ड पर लिखा है कि ‘महिलाओं को देखने का समय सुबह नौ से ग्यारह बजे तक है.’"
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रविवार, 20 जुलाई 2014

लक्की

उसका नाम लक्की ना जाने किस तुफैल में रख दिया था, अन्यथा वह तो पैदाइशी बदकिस्मत था. माँ लीलावती अपाहिज तथा मानसिक रूप से कमजोर थी. बाप का मुख देखना भी उसे नसीब नहीं हुआ. लक्की के पैदा होने से चार महीने पहले ही एक दुर्घटना का शिकार हो गया था. चाचा-ताऊ सब दकियानूसी व गैरजिम्मेदार निकले. उन्होंने लीलावती व उसके बच्चे को अपशकुनी समझते हुए अपने लिए बोझ बता कर मायके में रहने को मजबूर कर दिया.

यों लक्की अपने नाना-नानी के आश्रय में पला-बढ़ा. ननिहाल में भी लक्की के मामा-मामी ने कोई खैर-खुशी नहीं जताई. ये लोग बरेली जिले के एक दूर दराज गाँव में रहते हैं. नाना देवीदयाल गुप्ता गाँव में ही साहूकारी का धन्धा किया करते हैं, और स्वाभाविक रूप से छोटे सिक्कों को भी दांत से पकड़े रहते हैं. लक्की यहाँ पर अभावों में लावारिस बच्चे की तरह परवरिश पाता रहा. सरकारी स्कूल द्वारा परोसे जाने वाले ‘मिड-डे मील’ का लक्की को शारिरिक बढ़त देने में बड़ा हाथ रहा है.

लक्की गाँव में ही जब अच्छे नंबरों से हाईस्कूल पास कर गया तो रुद्रपुर में रहने वाली उसकी बड़ी मौसी ने आत्मीयता जताते हुए अपने घर में रहने व वहीं आगे की पढ़ाई करने का आग्रह किया तो लक्की को वहा भेज दिया गया. उसकी आगे की पढ़ाई के लिए एडमिशन भी हो गया. मौसी जो की जुबान की बहुत मीठी है, बोली, ‘मेरे तीन बच्चे हैं, ये चौथा आ गया है, बेसहारा है, पल जाएगा. आगे कोई ट्रेनिंग-वेनिंग करेगा तो अपने साथ लीलावती का जीवन भी सुधार लेगा.” पर मौसी का गुप्त एजेंडा यह भी था कि रोटी के बदले लक्की से घर के सारे काम करवाए जाएँ. बेचारा लक्की यहाँ एक नौकर की भूमिका में आ गया. लेकिन वह दीन-दुनिया की ख़बरों के साथ साथ अपनी पढ़ाई में भी बहुत मेहनत करता रहा. अच्छे नंबरों से पास होते हुए बी.काम. फाइनल तक पहुँच गया.

इस बीच जो उसने भोगा-झेला वह उसकी अंखियों से छलके हुए मोटे मोटे आंसू बयान करते रहे. मौसेरी बहनें व भाई उसके साथ भरपूर दुर्व्यवहार करते थे. मौसा-मौसी जानते सुनते भी अनजान बने रहते थे. कुटिल व स्वार्थी लोगों की दुनिया में बहुत से लक्की जैसे बेबस चुपचाप अपना समय निकालते हैं, उफ भी करने से डरते हैं. मगर प्रकृति अपना काम करती रहती है. जहाँ लक्की बी.काम. की परीक्षा में रैंकिंग स्टूडेंट रहा, वहीं उसका मौसेरा भाई लगातार तीन वर्षों से हाईस्कूल में फेल होता रहा.

खुसखबरी ये है कि स्थानीय महेश्वरी समाज ने अपनी जाति के इस होनहार लड़के के परीक्षा रिजल्ट व आर्थिक विपिन्नता की स्थिति का संज्ञान लेते हुए लक्की को बड़ी स्कॉलरशिप देने की घोषणा कर दी है. अब लक्की को मौसी के घर जूठे बर्तन साफ़ नहीं करने पड़ेंगे. वह वह लखनऊ जाकर आगे की पढ़ाई जारी रखेगा. वहीं महेश्वरी हास्टल में रहने-खाने की व्यवस्था रहेगी.

यह सच है कि प्रतिभा किसी की धरोहर नहीं होती है. लक्की के लिए अब बहुत बड़ा खुला आसमान होगा और अनन्त संभावनाएं भी.

शर्मीला भोला-भाला, बुद्धू सा दीखने वाले लक्की के बारे में अड़ोस-पड़ोस के अल्प परिचित लोगों की धारणा उसके बारे में एकदम बदल गयी है. पण्डित रमाशंकर शास्त्री जी ने उत्सुकतावश जब लक्की का आईक्यू जांचना चाहा तो वे तआज्जुब कर गए कि लक्की तमाम समसामयिक विषयों की गहरी जानकारी रखता है. देश की सामाजिक राजनैतिक व्यवस्थाओं पर अपने बेबाक विचार रखता है. चाचा-ताऊ, मामा-मामी व मौसी के परिवार के लोगों का अपने प्रति रवैये को वह परिस्थितिजन्य बताता है और किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखता है. शास्त्री जी सबको बताते फिरते हैं कि “एक दिन यह लड़का अवश्य ही समाज का आदर्श बनेगा.
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