मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

बैरागी बाबा

इस संसार की व्यवस्थाओं और घटनाक्रमों पर गौर करें तो यह विश्वास अडिग होता है कि कोई अदृश्य शक्ति जरूर है जो सारे चराचर/ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करती है. इसी अदृष्ट शक्ति को हम लोग ईश्वर, अल्लाह, गॉड, आदि नाम से याद करते हैं. बहुत से सच्चे योगी, बैरागी/सन्यासी तथा आत्मज्ञानी लोग उस शक्ति से साक्षात्कार भी करते आये हैं.

ईश्वर ने पृथ्वी पर मौजूद समस्त प्राणियों में मनुष्य को श्रेष्ठतम बनाया है, जिसे अनेक सांसारिक सुख भोगने को दिए हैं. सुखों के अनुभव के लिए साथ साथ दु:खों की अनुभूति भी आवश्यक हुई है. दु:खों की कल्पना के इतर इन्द्रियों के सुखों का त्याग करने वाला मनुष्य बैरागी कहलाता है. उसे राग-द्वेष, क्रोध, शोक, माया-ममता, व इच्छा-ऐषणा का कोई कोप नहीं होता है. हमारी सनातनी सामाजिक व्यवस्था में सारे सुख-दुःख भोगने के बाद बैराग्य उत्पन्न होने के अनेक ऐतिहासिक उदाहरण हैं. सामाजिक या पौराणिक कारणों से अहं को चोट लगने पर बैराग्य की उत्पत्ति को एक मुख्य कारण माना जाता है, पर ऐसे भी अनेक दृष्टांत हैं जिनमें मानव मन बाल्यकाल में कलुषविहीन अवस्था में ही बैरागी हो जाता है; आदि शंकराचार्य व स्वामी विवेकानंद इसके अच्छे उदाहरण हैं. ये जरूरी भी नहीं है कि ऐसे मनीषी आत्मप्रचार करते आये हों. अनेक जगत कल्याणी मानव समय समय पर समाज को नई दिशा दे कर अनंत में विलीन हो गए.

यहाँ जिस बैरागी बाबा की चर्चा की जा रही है, वे कौन थे, कहाँ से आये, किसी को याद नहीं. रामगंगा के पावन तट पर एक सुरम्य स्थान को उन्होंने अपनी तपोस्थली बनायी थी. कन्द-मूल, फल या भिक्षा से प्राप्त थोड़े से अन्न से वे अपने शरीर का पालन करते थे. निकटवर्ती गावों में कुछ अटूट श्रद्धा वाले लोग नित्य आकर वेद-पुराणों की ज्ञानवर्धक चर्चाएँ सुनने के लिए उनके आश्रम में आते रहते थे. बाबा के आश्रम ने धीरे धीरे एक छोटे तीर्थ का रूप ले लिया था.

सात गाँव के जमींदार ने श्रद्धापूर्वक एक सफ़ेद रंग का घोड़े का बच्चा बाबा को भेंट कर दिया. वैसे तो बच्चे सभी जानवरों के बड़े प्यारे लगते हैं, पर वह घोड़े का बच्चा ज्यादा ही सुन्दर था. उसे पाकर मानो बाबा का बैराग्य छू-मंतर हो गया. वे उससे प्यार करने लगे. बच्चा साल भर के अन्दर ही पूरा घोड़ा बन गया. अब बैरागी बाबा को घोड़े वाला बाबा के नाम से जानने लगे. एक दिन एक डाकू की नजर उस घोड़े पर पड़ी तो उसने बाबा से मुंहमांगी कीमत पर घोड़े को खरीदना चाहा. बाबा को आभास हो गया कि सामने वाला व्यक्ति डाकू/चोर/लुटेरा है इसलिए उन्होंने अपने प्यारे घोड़े को अशुभ हाथों में देने से इनकार कर दिया. डाकू के मन में घोड़ा प्राप्त करने की तीव्र लालसा थी. उसने थोड़ा समय गुजर जाने के बाद एक दिन अपाहिज का वेष बनाया, और जब बाबा घोड़े पर बैठ कर जा रहे थे तो कराहते हुए मदद के गुहार लगाई. बाबा को उस असहाय अपाहिज पर दया आ गयी और उसे सस्नेह घोड़े पर बिठा कर साथ साथ चलने लगे. तभी ठग डाकू ने अपना असली रूप दिखाया और घोड़े को चाबुक लगाकर दौड़ाने लगा. पीछे से बाबा की आवाज सुनकर घोड़ा रुक गया. बाबा ने डाकू से कहा, अच्छा हुआ तुमने मेरा मोहभंग कर दिया. मैं बैरागी होकर भी घोड़े के प्रेम-बंधन में बंध गया था. तुम घोड़े को ले जा सकते हो लेकिन किसी को ये मत कहना कि बाबा को ठग कर घोड़ा हासिल किया है, अन्यथा दुनिया में मजबूर अपाहिज लोगों के प्रति दयाभाव समाप्त हो जाएगा.

डाकू शर्मिन्दा तो हुआ ही उसे ज्ञान भी प्राप्त हो गया. वह उतर कर बाबा के चरणों में गिर गया, और उसके बाद लूटपाट का धंधा छोड़कर सद्मार्ग पर अपना जीवन बिताने लगा.
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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

बैठे ठाले - १४

पिछले लोकसभा चुनावों के बाद हमारी ठलुआ पंचायत भंग हो गयी थी. कारण था मोदी जी का आक्रामक योजनाबद्ध चुनावी दौर, जो कि अभूतपूर्व था, और उसके अप्रत्याशित परिणाम. जहां मोदी जी के आलोचक खिसिया रहे थे वहीं समर्थक विभोर हो उठे थे. वर्षों से अलसाई हुई जनता, जो कि भ्रष्टाचार से तंग थी, उसमें नया संचार हो गया. लोग परिवर्तन की उमंग में आ गए. इस सूनामी में राजनीति के बड़े बड़े महारथी खेत रहे, बह गए. ये एक ऐतिहासिक युगांतकारी परिवर्तन था.

भारतीय जनता पार्टी की सरकार आते ही एकाएक सभी हिन्दुत्ववादी शक्तियां सब तरफ हावी/प्रभावी हो गयी, जो धार्मिक उन्माद उभरा उसके बारे में कहा जाने लगा कि इससे हिन्दुस्तानी संस्कृति का जो मूल स्वरुप है उसकी चूलें हिलने लगी हैं’. पूर्ववर्ती शासन से अघाए व खार खाए प्रबुद्ध जन इसे भगवत गीता के प्रथम चरण के श्लोक यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति से जोड़ते हुए अकल्पनीय परिवर्तनों के सपने देखने लगे थे.

अब मोदीराज का लगभग एक वर्ष का समय बीत गया है, लेकिन जनसाधारण फिर कसमसाने लगा है. ये सत्य है कि विपक्ष के पास मोदी जी के मुकाबले वाकचतुर, बड़बोला, कर्मठ तथा प्रशासनिक अनुभव वाला कोई नेता नहीं है. कांग्रेसवाले ले दे कर एक अदद राहुल गांधी को धक्का दे देकर सीढ़ियों से ऊपर जाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं; आज भी खूसट कांग्रेसियों की मानसिक स्थिति गांधी परिवार की आड़ में सुरक्षित राजनीति खेलने को प्रतिबद्ध है. कब नौ मन तेल होगा? और कब राधा नाच पायेगी? यक्ष प्रश्न जीवंत है.

इधर मोदी के धुर विरोधी नामनिहाल समाजवादी विचारधारा के वारिस एकजुट होकर आत्मरक्षा की तैयारी में अपने भोंटे हथियार तेज कर रहे हैं क्योंकि अस्तित्व का खतरा आन पड़ा है. मुलायमसिंह यादव जी के भरोसे ये सप्तपदी सेना बिहार और यूपी के आगामी विधान सभा चुनावों में अपना जौहर आजमाएंगे. ये कितने ताकतवर बन कर उभरेंगे या सिमट कर रह जायेंगे? भविष्यवाणी करना जल्दबाजी लग रहा है.

कम्युनिस्ट शासन सिर्फ छोटे से राज्य त्रिपुरा तक सिमट कर रह गया है, हाल में कामरेड सीताराम येचुरी को कमान सौप दी गयी है, जो कट्टर सिद्धान्तवादिता से हटकर समझौतावादी की तरह खंडित वामपंथ के लिए फेविकॉल की तलाश में रहेंगे. राष्ट्रीय स्तर पर विकल्पी बनने का सपना शायद उनको ना आ पाए.

मायावती जी, जयललिता जी ममता बनर्जी जी आदि सभी क्षेत्रीय लड़ोकनियाँ अपने अपने मुकाम के चरम पर रही हैं, पर अब इनका ग्राफ शायद ही ऊपर उठ पाए. इसी तरह अरविन्द केजरीवाल जी का भविष्य दिल्ली विधान सभा में प्रचण्ड बहुमत के बावजूद अनिश्चय के घेरे में यों आ गया कि उनकी पार्टी अन्दुरुनी कलह से त्रस्त है. मीडिया जोर शोर से उनका मजाक बनाने में लगा है. जिसे सुनकर आम लोगों का विश्वास उनके प्रति डगमगाने लगा है. लगता है, जब तक चल सके चलाये चलो का सिद्धांत का अनुसरण कर रहे हैं. प्रशासनिक अनुभव की कमी के कारण केंद्र में काबिज भाजपा इसे स्थिर नहीं होने देगी.

पंजाब में अकाली सरकार पूरी तरह से मोदी जी के भरोसे पर आ टिकी है क्योंकि पंजाब में दल का जनाधार बहुत घट गया है, जिसका नमूना अमृतसर में लोकसभा चुनाव में सबने देखा है, जहां अरुण जेटली जी को हार का मुंह देखना पड़ा है. भाजपा को जिस दिन लगेगा की इसको अब निगला जा सकता है, तो परिणाम अप्रत्याशित ही होगा.

काश्मीर में भाजपा ने मजबूरी व स्वार्थ दोनों की वजह से सत्ता में हिस्सेदारी की, पर अलगाववादियों, कश्मीरी पंडितों, धारा 370 पर विरोधाभासी चरित्रों के कारण न थूकते बन रहा है और ना निगल सकते हैं. चुनावों में अलगाववादियों को नेस्तनाबूद करने की बड़ी बड़ी बड़ी डींग हांकने वालों को अब जवाब देते नहीं बन रहा है.

ये थीसिस बहुत लम्बी हो रही है, क्योंकि आलोचना के कई बिंदु अभी भी अनछुए हैं, जैसे कि, मोदी जी की जन धन योजना के दो करोड़ से ज्यादा खाते निष्क्रिय से हो गए हैं. इनमें नियमानुसार प्रति माह लेनदेन नहीं होने से दो लाख रुपयों का बीमा बेमानी हो गया है. विदेशी काला धन पर कुछ टिप्पणी करना अब हास्य का विषय बन गया है. ये चुनावी जुमला बताया जा रहा है, जो आने वाले चुनावों में भाजपा को चुभता रहेगा.

चूंकि मोदी जी ने अपनी छवि स्वयंभू की बना ली है इसलिए उनको सोचना पडेगा कि सिर्फ कांग्रेस की सात पीढ़ियों को गलियाने से देश की जनता संतोष करने वाली नहीं है. उन्होंने मोदी जी को भरपूर समर्थन इसलिए दिया था कि व्यवस्था परिवर्तन हो. निराशा इसी बात की है कि कमोवेश सब तरफ प्रशासनिक व न्यायिक मामलों में स्थिति में यथावत अनुभव हो रहे हैं. महंगाई के बारे में जो सरकारी आकड़ों का मकड़जाल दिखाया जा रहा है, जो कि जमीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहा है. क्योंकि उपभोक्ता रिटेल बाजार भाव, औषधीय खर्चे, परिवहन व्यय पहले से काफी बढ़ गए हैं. मध्यवर्गीय लोग इसकी मार झेल रहे हैं. केवल अल्प प्रतिशत सरकारी कर्मचारियों, पेंशनरों के महंगाई भत्ते में बढ़ोत्तरी से महंगाई पीड़ित आम लोगों को ज्यादा दिन तक थपकी दे कर शांत नहीं रख सकते हैं. चीन-पाकिस्तान से दोस्ती का नापाक नाटक के बाद अलगाववादी+आतंकवादी तथा नक्सलवादी आक्रमण तेज हो गए हैं. ये कैंसर का रूप बनते जा रहे हैं. ना खाऊ ना खाने दूं भी केवल जुमला बन कर रह गया है. बिना रिश्वत आज भी कोई काम नहीं हो पा रहा है.

ज्वलंत गंभीर मुद्दा मौसम की मार से उत्तर भारत के कई राज्यों के काश्तकारों पर आई आपदा का है. किसान कर्जों के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं. चुनावों के दौरान मोदी जी का एक मुद्दा किसानों की आत्महत्या का रहा था. अब मोदीराज के इसी तिमाही में मौत का आंकड़ा सौ के पार पहुँच चुका है, जो बहुत दुखद व चिंतनीय है.

लेख के अंत में नरेंद्र मोदी जी से यह कहना चाहता हूँ की अब विदेश नीति से ज्यादा देश के अन्दर की नीति पर ध्यान देने की जरूरत है. अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंग्लेंड, फ्रांस, जर्मनी तथा कनाडा में बसे हुए भारतीयों के प्यार का दोहन करना तो ठीक है, पर लोग समझने लगे हैं कि ये आपके खुद के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम हैं. भारतवंशी तो हर हाल में भारतमाता की जय' बोलेगा

अब आपको ओबामा जी के सर्टीफिकेट या विश्वबैंक की तहरीर पर लोग नहीं मापेंगे. कृपया अपने चुनावी वायदों की फेरहिस्त की एक बार फिर से नजरसानी कीजिये.
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रविवार, 29 मार्च 2015

चुहुल - ७२

(१)
एक आदमी दूधवाली भैंस खरीदने के लिए नजदीक के गाँव में गया. उसने भैंस बेचने वाले किसान से कहा, सबसे बढ़िया भैंस बताओ?
किसान ने एक भैंस की तरफ इशारा करते हुए बताया, ये सबसे ज्यादा दूध देती है. इसकी कीमत भी औरों से ड्योढ़ी है.
खरीदने वाले ने भैंस को आगेपीछे से टटोला तो देखा की भैंस की एक आँख की पलक स्थाई रूप से अधखुली थी. वह बोला, ये तो भेंगी है. इसकी कीमत इतनी नहीं होनी चाहिए.
किसान बोला, तुमको दूध चाहिए या आँख मटक्का करना है?

(२)
पति-पत्नी की एक आकस्मिक दुर्घटना में एक साथ मौत हो गयी. अकाल मृत्यु होने से पति भूत की योनि में आ गया और पत्नी चुड़ैल की योनि में आ गयी.
कुछ समय बाद एक बार जब दोनों की अचानक मुलाक़ात हुयी तो चुड़ैल बोली, भूत बन कर तुम बिलकुल बदल गए हो.
भूत बोला, “लेकिन तुम बिलकुल नहीं बदली हो, वैसी की वैसी हो!

(3)
एक लड़की ने प्यार के सपने देखे थे, पर दुर्भाग्य से उसका ब्वायफ्रेंड बहुत कंजूस व निकम्मा निकला. दु:खी होकर एक दिन वह उससे बोली, तुमसे प्यार करके मैं लुट गयी, बर्बाद हो गयी!
ब्वायफ्रेंड नाक सिकोड़ते हुए बोला, मैं भी कौन सा डॉक्टर या इंजीनियर हुआ हूँ.

(४)
रेल के डिब्बे में चेतावनी लिखी थी बिना टिकट यात्री होशियार, आपको ईनाम में जेल मिल सकती है
एक मन्दबुद्धि ने जब इसे पढ़ा तो सोचने लगा टिकट ना लेने वालों को होशियार बता रहे हैं, साथ में ईनाम भी दिया जा रहा है, हम ही बेवकूफ हैं जो टिकट लेकर जा रहे हैं, वाह रे सरकार, कैसी अंधेरगर्दी चल रही है.

(५)
स्कूल से एक बच्चा रोते हुए घर आया तो मम्मी ने रोने का कारण पूछा, तो वह बोला, टीचर ने मारा.
मम्मी: क्यों मारा उसने तुझे?
बच्चा: मैंने उसको मुर्गी कहा था.
मम्मी: तू मुर्गी क्यों बोला?
बच्चा: वह मुझे रोज अंडा दे रही थी.
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मंगलवार, 3 मार्च 2015

बैठे ठाले - १३

आज ३ मार्च, अंतर्राष्ट्रीय ईयर-केयर डे यानी कर्ण दिवस (संयुक्त राष्ट्र के स्वास्थ्य संगठन WHO द्वारा प्रेरित) है. कान हमारे शरीर के पांच महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियों में से एक है. परमात्मा ने सर के दोनों तरफ एक एक कान इस तरह फिट किये हैं कि दोनों तरफ के ध्वनि संकेत मिल सकें और देखने में भी खूबसूरत लगें. मनुष्य ही नहीं अधिकांश प्राणीमात्र को ये ज्ञानेन्द्रिय प्राप्त है. बाहरी कान एंटीना की तरह होता है जो संवेदनाओं को अन्दर श्रवण यंत्र तक पंहुचाता है, जिसका सीधा कनेक्शन मस्तिष्क से होता है.

मनुष्यों में बाहरी कान की बनावट तथा आकार देश, काल, व वंश के अनुसार थोड़े अंतर के भी पाए जाते हैं, पर भीतरी श्रवण यंत्र सबका सामान होता है. कुछ ज्योतिषियों की मान्यता है कि बड़े कान वाले सौभाग्यशाली तथा बहुत छोटे कान वाले आल्पायु होते है. पर ये सब गप लगती है क्योंकि खर व खरगोश (खर माने गदहा, गोश माने कान) के कान बड़े होते हैं.

कुछ लोग पैदा तो बाहरी कानों सहित होते हैं, पर उनका श्रवन यंत्र बंद होता है. उनको बहरा कहा जाता है. ये लोग अच्छा मार्गदर्शन मिलने पर सफल जीवन व्यतीत करते है. कभी कभी ऐसा भी होता है कि बाद में कान के अन्दर इन्फेक्शन होने से अथवा चोट लग जाने से श्रवण यंत्र खराब हो जाता है. बुढ़ापे में ऊतक कमजोर हो जाने से अंदरूनी यंत्र की क्षमता कम होती जाती है. हाँ, बहुत से भाग्यवान वृद्धजन  ऐसे भी पाए जाते हैं, जिनके कान अंतिम समय तक सकुशल रहते हैं. उन्हें अक्सर ये सुनने को मिल जाता है, अरे, इनके कान तो कांसे के बने है.

कहते हैं कि साँपों के कान नहीं होते हैं वे अपने स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) से ही संवेदनाएं ग्रहण कर लेते हैं.

आज के शहरी/ सामाजिक परिवेश में तेज ध्वनि (ध्वनि-प्रदूषण) से भी श्रवण यंत्रों की कार्यक्षमता कम हो जाती है. यही नहीं, टेलीफोन या मोबाईल फोन के ज्यादा समय तक कान पर ध्वनि आक्रमण से बहुत क्षति होती है. मेरा अपना अनुभव है कि हमेशा बायें कान से फोन सुनने की वजह से उस कान की सुनने की क्षमता दाहिने के मुकाबले आधी रह गयी है. बायीं तरफ से आने वाली आवाज की पकड़ धीमी होने तथा उसके समझने में होने वाली देरी के कारण मेरे अर्धांगिनी ने मुझे बहरा घोषित करने में कसर नहीं छोड़ी है. वह अपनी सहेलियों तथा मेरे परिचितों/ मित्रों/आगंतुकों से बात बात पर दु:ख जताते हुए कहती है, ये बेचारे, सुनते नहीं हैं. सच बात तो ये भी है कि कई बार मैं जानबूझ कर उसके उपदेशों/आदेशों को अनसुना कर देता हूँ.

जर्मनी के तानाशाह हिटलर के साथी गोवेल्स ने कहा था कि एक झूठ को सौ बार बोलने से वह सच लगने लगता है. ऐसा ही हुआ कि जब मैं कभी सुनता था और कभी अनसुना होता था तो मेरे बड़े बेटे डा.पार्थ ने माँ के आग्रह पर मेरे कान में एक हियरिंग ऐड (माईक्रोफोन) फिट करवा दिया. कुछ दिन तो मैं इस जेवर को पहनता रहा, पर जब लगा कि पहले से ज्यादा असुविधा होने लगी तो निकालकर रख दिया है ताकि भविष्य में  वक्त जरूरत काम आ सके.

इस सम्बन्ध में एक मजेदार संस्मरण भी लिखना चाहता हूँ कि नौकरी के दिनों में जब मैं यूनियन के विषयों को लेकर लेबर कोर्ट जाता था तो मैंने देखा कि माननीय जज काटजू जी (पूरा नाम अब विस्मृत हो गया है), जो कि हियरिंग ऐड इस्तेमाल करते थे, कभी कभी जब मैनेजमेंट का वकील बहस पर आता था तो हियरिंग ऐड निकाल कर रख देते थे; शायद वे समझते थे कि ‘workers are the weaker section of the society’.  ताकतवर मैनेजमेंट  मोटी फीस वाले नामी गिरामी वकीलों की बड़ी बड़ी अनावश्यक टेक्निकल दलीलें वे सुनना नहीं चाहते थे.

कुछ भुक्तभोगी कहा करते हैं कि "ना सुनना भी बड़ी नियामत है." गांधी जी ने भी कहा कि बुरा मत सुनो अच्छा न सुना तो कोई बात नहीं, बुरा तो बुरा ही है, पर कहाँ तक बचोगे?  आजकल अखबार, रेडियो, टेलीविजन, यानी सारे का सारा मीडिया सबसे पहले गंदी बात सुनाते हैं. ये समय की बलिहारी है, परख आपको करनी है. बहरहाल अपने श्रवण यंत्र की हिफाजत जरूर करें और कम सुनने वालों का ठट्टा ना करे.
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बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

विदूषक [किशोर कोना]

बच्चो, आज से साठ-सत्तर साल पहले, जब मैं भी तुम्हारी उम्र का था तो मैंने एक मजेदार दन्तकथा सुनी थी या पढ़ी थी, जिसे मैं आज तुम्हें सुनाना चाहता हूँ.

जैसा कि तुमको मालूम है पिछली शताब्दी से पहले विज्ञान की ऐसी उपलब्द्धियाँ नहीं थी जैसी की आज हमें प्राप्त हैं. तब न रेडियो, न टेलीविज़न, न सिनेमा और न ही टेलीफोन-मोबाईल थे. मनोरंजन के लिए लोग नाटक, प्रहसन, संगीत, नृत्य या मसखरों-बहुरूपियों-विदूषकों का सहारा लिया करते थे. तब राजा-रानी भी हुआ करते थे, जो अपने दरबारी नवरत्नों में बुद्धिमान मंत्रियों, आशु कवियों व विदूषकों को अवश्य पाला करते थे. ऐसे ही एक नामी राजा का दरबारी विदूषक जब आर्थिक तंगी में था तो उसको एक उपाय सूझा, उसने अपनी पत्नी को रानी जी के पास भेजा. पत्नी रोनी सूरत बनाकर रानी जी से बोली, मेरा पति मर गया है. अंतिम संस्कार के लिए धन नहीं है. यह सुन कर रानी जी ने अफसोस जताया और एक हजार सिक्के उसे दे दिए. जब पत्नी घर आई तो विदूषक खुद राजा के पास जाकर रोते हुए बोला, हुजूर, मेरी पत्नी का स्वर्गवास हो गया है. उसके अंतिम संस्कार के लिए मेरे पास धन नहीं है. राजा ने उसकी पत्नी की मृत्यु पर शोक जताया और उसे अंतिम संस्कार के लिए एक हजार सिक्के दे दिए.

शाम को जब राजा व रानी की मुलाक़ात हुई तो रानी ने दु:ख जताते हुए राजा को बताया कि "आपका विदूषक मर गया है”.  राजा ने तुरंत कहा, विदूषक नहीं, उसकी पत्नी मरी है. इस बाबत दोनों में बहस हो गयी. तय हुआ कि अगले दिन सच्चाई जानने दोनों ही जने विदूषक के घर जाकर अपनी बात की पुष्टि करेंगे.

विदूषक और उसकी पत्नी ने राजा व रानी को दूर से ही आते हुए देख लिया तो तुरत-फुरत दोनों सफेद चादरें लपेट कर मुर्दासन में घर के बाहर लेट गए. राजा-रानी को आया देख कर आसपास के लोग भी जमा हो गए. राजा व रानी ने देखा मरे तो दोनों ही हैं, पर पहले किसकी मौत हुई, इस बाबत बहस होने लगी. समस्या का हल निकलता न देखकर राजा ने घोषणा की, जो ये बताएगा कि पहले किसकी मौत हुई है, उसे एक हजार सिक्के ईनाम में दिए जायेंगे.

लोग कुछ समझ पाते उससे पहले विदूषक चादर हटाकर खड़ा हो गया और बोला, हुजूर, पहले मैं मरा था." राजा-रानी भी उसकी इस मसखरी पर मुस्कुराए बिना नहीं रह सके.
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