शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

ये है हमारी हल्द्वानी

उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले में दक्षिण में मैदानी इलाकों से सड़क व रेल मार्ग से जुड़ने वाले हमारे शहर हल्द्वानी को ‘गेटवे ऑफ कुमाऊँ’ भी कहा जाता है.  हल्द्वानी शब्द की व्यत्युत्पति ‘हल्दू’ शब्द से होती है.  हल्दू एक जंगली पेड़ होता है जो अब उजड़ता जा रहा है.

अब से केवल सवा सौ साल पहले हल्द्वानी एक छोटा सा कस्बा हुआ करता था. कस्बाई परिवेश में ही बाजार थे. मात्र १०० मीटर की दूरी पर मन्दिर और मस्जिद बनाए गए थे जो आज भी साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में विद्यमान हैं. यद्यपि हिन्दू और मुसलमानों की बस्ती की अलग अलग पहचान थी, पर आपसी सद्भाव यहाँ हमेशा ही बना रहा है. गत शताब्दी के मध्य में यहाँ पंजाब व पाकिस्तान से सिक्खों का भी आगमन हुआ, जो परिवहन, व्यापार, और कृषि पर अपना वर्चश्व बनाते हुए यहीं के होकर रह गए.

जब पहाड़ों पर मोटर मार्ग नहीं थे तो आवश्यक सामग्रियां घोड़ों, खच्चरों, या भेड़ों पर लाद कर लाया ले जाया जाता था. तिब्बत व नेपाल तक व्यापार का फैलाव हुआ करता था. तिब्बत से ऊन, आलू, सुहागा व गंध्रायण-जम्बू मसाला आता था, और यहाँ से नमक, गुड़ व चावल जैसे खाद्य पदार्थ वापस जाता था. धीरे धीरे ये कस्बा व्यापारिक शहर बनता गया आढत वाले व्यापारी फले फूले, शहर में समृद्धि आई. बाद में हल्द्वानी शहर आसपास के गाँवों को लीलता हुआ विस्तार करता गया. पहाड़ों के संपन्न लोग भी हल्द्वानी में घर बनाने लगे. देश-परदेश से नौकरी से रिटायर होकर आने वाले लोग यहाँ बसने लगे. आज हल्द्वानी महानगर बन गया है. पर योजनाबद्ध तरीके से बसावट न होने से चौड़ी सड़कों व सुन्दर पार्कों की कोई कल्पना साकार नहीं हुई. इस प्रकार सब घिच-पिच होकर रह गया. रही-सही कसर असंख्य ऑटो रिक्शाओं, कारों, व सवारी गाड़ियों ने पूरी कर दी है. फलस्वरूप मुख्य मार्ग पर दिन भर में कई बार जाम लगा रहता है.

अंग्रेजों के जमाने में गौला नदी से तीन दिशाओं में तीन बड़ी नहरें बहुत सुनियोजित ढंग से बनाई गयी थी, जिनसे शहर के बीचों बीच होकर दूर दराज के खेतों को पानी आज भी पहुंचाया जाता है. कहते हैं कि जब यहाँ जलदाय विभाग या नलकूपों का अभ्युदय नहीं हुआ था तो लोग इन्ही नहरों के पानी को पिया भी करते थे. लेकिन आज इन नहरों का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि इनसे बह कर आने वाला कूड़ा-करकट,  प्लास्टिक, पॉलिथीन खेतों को बुरी तरह खराब कर रहा है. बहुत से असामाजिक गैरजिम्मेदार लोगों ने तो अपने गटरों व नालियों के मुहाने नहरों में खोल रखे हैं.

हल्द्वानी में परिवहन की बहुत अच्छी सुविधाएँ हैं. पर्यटन स्थलों के लिए अथवा देश के किसी भी भू-भाग को जाने के लिए ट्रेन, बस, या टैक्सियाँ आसानी से उपलब्द्ध हैं. पहले ऐसा नहीं था. कुछ ही वर्षों पहले तक यहाँ केवल एक सिंगल मीटरगेज रेलवे लाइन थी, जो बरेली, लखनऊ या मथुरा-आगरा को जोड़ती थी. देश की राजधानी दिल्ली को कोई सीधी ट्रेन नहीं होती थी, पर अब ब्रॉडगेज लाइन होने से पूरब में कोलकत्ता तथा पश्चिम में दिल्ली होते हुए जयपुर-जोधपुर तक की सुपरफास्ट गाडियाँ उपलब्ध रहती हैं. इसी तरह रोड ट्रांसपोर्ट भी बहुत सहज में सभी प्रमुख शहरों के लिए नियमित तौर पर उपलब्द्ध रहता है. ये दीगर बात है सड़कें अभी भी कई जगहों पर सँकरी व खराब स्थिति में पाई जाती हैं.

पर्यटन स्थलों का द्वार होने के कारण यहाँ होटल उद्योग खूब फलाफूला है. शहर में अनेक अच्छे होटल हैं.

हल्द्वानी में सरकारी और गैर सरकारी बड़े अस्पताल है. एक सरकारी मेडीकल कॉलेज भी है. यहाँ चिकित्सा की सभी आधुनिक सुविधाएँ उपलब्द्ध रहती हैं.

नैनीताल शहर बहुत पहले से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहा है. अब हल्द्वानी में भी अनेक अच्छे स्कूल, कॉलेज, एकेडेमी व इंस्टीट्यूट मौजूद हैं.

हल्द्वानी की कृषि उपज मंडी इस क्षेत्र की बहुत बड़ी मंडी है, जो काश्तकारों को सारी सुविधाएँ उपलब्द्ध कराती है. सब तरह का अनाज व फल-फूलों की ये मंडी हल्द्वानी की विशेषता है.

गौला एक पौराणिक नदी है. इसे हल्द्वानी की लाइफ लाइन कहा जाता है. गौला नदी से पीने का व सिंचाई के लिए पर्याप्त जल मिलता है. अधिक जल उपलब्धता के लिये इस पर एक जमरानी बाँध बनाने की योजना वर्षों से लम्बित है. गौला हर साल बरसात की बाढ़ में करोड़ों टन रेत-बालू अपने साथ बहा कर लाती है. और खनिज खनन यहाँ का मुख्य व्यवसाय बन गया है. ये अलग बात है कि इस प्रतिस्पर्धी व्यवसाय से जुड़े हुई अपराधिक गतिविधियाँ भी सुर्ख़ियों में रहती हैं.

अब हल्द्वानी और काठगोदाम आपस में मिल चुके हैं. पश्चिम में कालाढूंगी रोड पर दूर तक बाजार व बस्तियां बन गयी हैं. दक्षिण में हल्दूचौड़ तक भी हाईवे के दोनों तरफ दुकानें व आधुनिक ढंग से बनी बिल्डिंगें नजर आती हैं. पूरब में गौला पार में भी जो विशाल कृषि क्षेत्र है, उसमें व्यवसायिक-व्यापारिक गतिविधियां सक्रिय हैं. जहाँ किसी जमाने में साँपों, शेरों या मच्छरों के डर से लोग नहीं बसते थे, वहाँ की जमीन अब सोने के भाव बिक रही है.

अंत में यहाँ की सजीव सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविधियों की चर्चा नहीं की जाये तो हल्द्वानी का स्वरुप अधूरा रह जाएगा.  यहाँ के प्रबुद्धजन निरंतर ‘कुछ न कुछ विशेष’ हर मौकों पर आयोजित करते रहते हैं. जिसमें पर्वतीय अंचलों की संस्कृति के भूले बिसरे पक्षों को भी ज़िंदा रखा जाता है और आधुनिकता से जुड़े रहने के भी सब उपादान होते हैं.
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10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (11-1-2014) "ठीक नहीं" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1489" पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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    1. चर्चा मंच में सम्मिलित करने के लिए आभार.

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  2. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन विश्व हिन्दी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन विश्व हिन्दी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. परम्परा और इतिहास के झरोखे से हल्द्वानी पर निबंधात्मक टिपण्णी है ये खूबसूरत पोस्ट।

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  5. कई विधाओं और विमाओं का स्थान है यह।

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  6. ज्ञानवर्धक और रोचक लेख . आभार .

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