गुरुवार, 18 जून 2015

मैं, मेरे जाले, और मकड़ी

मैं नियमित रूप से अपने घर पितृ-छाया को महीने में एक बार मकड़ी के जालों से मुक्त किया करता हूँ. वैसे जब से अन्दर, बाहर, सब जगह बर्जर का सफ़ेद वैदर कोट कराया मकड़ियों के लिए अपना घर बनाने की गुंजाईश कम हो गयी है. फिर भी गाहे बगाहे छोटी छोटी मकड़ियां लाईट के आसपास, रोशनदानों के कोनों में, बाथरूम के एक्सॉस्ट फैन के किनारों पर अपना जाला बनाकर मच्छरों या कीटों का इन्तजार करते देखा जा सकता है. कहने को मकड़ियां मनुष्यों की, खासकर किसानों की, दोस्त भी कही जाती है क्योंकि ये फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को चट करती रहती हैं.

घरेलू मकड़ियों को अवांछित समझा जाता है. फिल्मों में भुतहा घरों में मकड़ों  के जालों का अम्बार लगा दिखाया जाता है. पश्चिमी देशों में हेलोवीन के अवसर पर लोग घर के अन्दर-बाहर नकली जाले लगाकर भुतहा वातावरण बनाया करते हैं. मैं इन घरेलू मकड़ियों से बहुत ज्यादा भयभीत कभी नहीं रहा. इस बार गर्मियों की छुट्टियों में जब बच्चे आये तो मेरी पौत्री संजना ने भयभीत होकर बताया कि बाथरूम में पॉट के पीछे  तथा एक्सॉस्ट के पास मकड़ियां अपने जाले समेत मौजूद हैं. संजना उसके छुटपन से ही कुत्ते, बिल्ली, कॉकरोच, मकड़ी, व कीटों से बहुत डरती आई है. मैं मक्खीमार हथियार लेकर गया और इन बहुत छोटी सी मकड़ियों के एक-एक इंच दायरे वाले जालों को नेस्तनाबूद कर आया. बात कोई उल्लेखनीय नहीं थी, लेकिन जब प्रद्युम्न का परिवार कमरे को खाली करके गाजियाबाद को लौट गया तो कमरे को ठीक करने के चक्कर में ड्रेसिंग टेबल पर रखी हुयी एक गत्ते की छोटी सी दवा की डिबिया को उठाया तो उसके अन्दर से काले सर वाली एक छोटी मकड़ी ने तुरंत मेरे अंगूठे पर ऐसा डंक मारा कि मैं तिलमिला उठा. मैंने डिबिया सहित मकड़ी को फर्श पर गिरा दिया अपने अंगूठे को मुंह में डालकर चूसना शुरू किया ताकि जहर खींच कर थूका जा सके. मेरे पास जले में लगाने की एक मरहम ट्यूब पड़ी थी, जो काम में ली. ततैया के डंक की तरह का अनुभव था. मैं ४-५ घंटे तक इससे परेशान रहा.

मकड़ी/माकड़े से मेरा ‘अनबोंडेड’ रिश्ता रहा है. मैंने अपनी प्रारम्भिक रचनाओं (कविताओं) को मकड़ियों की जालों तरह बुना सोच कर जाले नामक अपनी पुस्तिका को बड़ी उमंग के साथ संन १९६७ में छपवाया था, और मित्रों में बांटा भी. बाद में ये रचनाएँ बुकसेल्फ़ में धूल खाती रही. संन  २०११ में अपनी बेटी की आग्रह पर मैं इन रचनाओं को अपने साथ अमेरिका ले गया. गिरिबाला के कहने पर ही एक ब्लाग बनाकर इसे इंटरनेट में डालने के शुरुआत की गयी. मुझे तब इंटरनेट संबंधी कोई जानकारी भी नहीं थी. अत: सब काम गिरिबाला खुद ही कर रही थी. उसी ने जाले का लोगो बना कर प्रकाशित कर दिया. उसके बाद मैं हिन्दी टाईपिंग करते हुए आगे पीछे की नईपुरानी स्वरचित कथा-कहानियों, संस्मरणों, चुटकुलों तथा सामयिक विषयों पर लेख इसमें सहेजता गया. जो मेरे फेसबुक पर स्वत: शेयर होकर मित्रों को पढ़ने को मिलते रहे हैं.

अब जब मुझे जहरीली मकड़ी ने काटा तो मैंने इस विषय पर गहराई से सोचा कि अच्छा हुआ कि मेरे बच्चों को नहीं काटा, और वे सुरक्षित चले गए. मैंने अलमारियों, ड्रेसिंग टेबल, पलंगों के नीचे, स्थाई दृश्यों वाले फ्रेमों के पीछे, सभी जगहों पर ढूंढ ढूंढ कर मकड़ी की जमात को ख़तम करने के लिए हिट और झाडू का इस्तेमाल किया. पर मैंने कहीं पढ़ा था कि मक्खी, मच्छर, मूसक, और मकड़ी, ये चारों मकार मनुष्य का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे.

रोमांच की दुनिया में स्पाइडरमैन और फ्रांसीसी योद्धा नेपोलियन की कहानी में सात बार प्रयास करने के बाद जीतने की प्रेरणा देने वाली मकड़ी का विवरण किताबों में और बच्चों की कहानियों में मजेदार शब्दों में दुनिया की अनेक भाषाओं में वर्णित है. इस बारे में अध्ययन करने के बाद मकड़ियों के बारे में अनेक तथ्य सामने आये हैं. मकड़ी बहुत चतुर बुद्धिमान प्राणियों में से एक है. इसकी कई आँखें होती हैं, जो एक ही समय में कई दिशाओं में देख सकती है. अपने शिकार को पकड़ने के लिए जाल बिछाती हैं, और खुद छुप कर बैठी रहती है. शिकार के फसते ही उसे जहरीला डंक मार कर निर्जीव करके खाती है. कई बार तो मकड़ी अपने पार्टनर को ही खा जाती है. मकड़ी के दर्जनों बच्चे होते हैं. छोटे बच्चे अपनी माँ की पीठ पर सुरक्षित महसूस करते हैं. डिस्कवरी चैनल वाले ने इस बारे में बड़ी खूबसूरत तस्वीरें-वीडिओ दिखाते रहते हैं. छोटी से छोटी मकड़ी तिल के बराबर होती है, पर बड़ी जात की मकड़ी का वजन २५० ग्राम तक पाया गया है. ये बड़ी मकड़ियां चिड़ियों व अन्य जंगली प्राणियों को अपना शिकार बनाती हैं. रेगिस्तानी मकड़ी ज्यादा जहरीली बताई जाती है. एक अनुमान के अनुसार दुनिया में मकड़ियों की संख्या मनुष्यों की संख्या से अधिक है. और भी अनेक रहस्यमय तथ्य इसके बारे में अवश्य होंगे. मुझे डंक मारने वाली मकड़ी के विषय में मेरा अंदाजा है कि हो सकता है कि उसकी टाँगे मेरी पकड़ में आने से उसे हमला करना पड़ा हो. बहरहाल ये जंतु दोस्ती के काबिल कतई नहीं है.
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2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (20-06-2015) को "समय के इस दौर में रमज़ान मुबारक हो" {चर्चा - 2012} पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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