गुरुवार, 11 जून 2015

मेरा साथ दो

मैं डॉ. परमानंद पांडे एम.डी. एक फिज़ीशियन हूँ. तिकोनिया शहर के मुहाने पर मैंने दस साल पहले अपनी एक क्लीनिक खोली थी, जो भगवत कृपा से तथा मेरे मातहत मेडिकल स्टाफ की मेहनत के कारण शहर का एक नामी अस्पताल कहा जाने लगा है. मैंने क्लीनिक के बाहर उन तमाम बीमारियों के नाम लिखे हैं, जिनके इलाज में मुझे महारत हासिल है. मैंने मुख्य एंट्रेंस पर एक जुमला भी लिख कर लगवाया है, "हे ईश्वर,  मेरी रोजी-रोटी यहाँ आने वाले रोगियों के दुःख-दर्द से निकलती है; चूंकि मेरे कार्य में सेवाभाव भी है इसलिए आप मुझे क्षमा कर देना."

रिसेप्शनिस्ट के काउंटर पर अपनी कन्सल्टेन्सी फीस "दो सौ रुपये" भी लिखवा रखा है, ताकि आगंतुक रोगियों को पेमेंट का अहसास रहे. मुझे ये कहते हुए हर्ष हो रहा है की मैं अपने मिशन में पूरी तरह सफल हूँ. लोगों की दुआओं का असर यह है की मेरा पारिवारिक जीवन सुखमय है. पर पिछले एक साल से मैं एक मानसिक परेशानी झेल रहा हूँ कि मेरे क्लीनिक के ठीक सामने गुड्डू नाम के एक तांत्रिक ने अपनी बड़ी सी दूकान खोल ली है. मेरी ही तर्ज पर उसने अधिक चमकदार अक्षरों में उन तमाम बीमारियों तथा आपदाओं के ईलाज की गारंटी लिखी हुई हैं. उसने फेल विद्यार्थियों को पास करने की, पति-पत्नी के बिगड़े रिश्ते सुधारने की, वशीकरण कराने जैसी अतिरिक्त बातें भी लिखी हुई हैं. मेरी ही तर्ज पर अपनी फीस का बोर्ड "तीन सौ रुपये" लिख कर टांग रखा है, जो हर आने जाने वाले को आकर्षित करता है.

मेरे बचपन से ही कुछ ऐसे संस्कार रहे हैं कि मैं तांत्रिक विद्या को ठग विद्या कहा करता हूँ. अन्धविश्वासी तथा मूर्ख लोग तांत्रिकों के चक्कर में फंसते हैं. रुपया-पैसा व कई बार अपनी आबरू भी खो बैठते हैं. अखबारों में कई बार ऐसे किस्से पढ़ने को मिलते रहते हैं. अब मेरी परेशानी यह है कि मेरे कई मरीज जिनका डायग्नोसिस नहीं हो पाता है, या जिनका ईलाज लंबा होता है, उनमें से कुछ लोग या उनके परिजन गुड्डू तांत्रिक के पास चले जाते हैं. होता ये भी है कि जब किसी मरीज का तांत्रिक से मोहभंग हो जाता है, तब वह मेरे पास आकर अपनी दास्ताँ सुनाता है. मैं गुड्डू तांत्रिक की कारगुजारियों पर कुढ़ता रहता हूँ, लेकिन सीधे सीधे उससे उलझना नहीं चाहता हूँ क्योंकि कीचड़ में पत्थर मारने से छींटे अपने ऊपर ही आते हैं.

गुड्डू तांत्रिक चालाक, चतुर और बहुत बातूनी भी है. अपनी लच्छेदार बातों से जाल में ऐसे उलझाता है कि उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है. मैंने एक दिन उसे सबक सिखाने का मन बनाया और उनकी दूकान पर पहुँच गया. वह मुझे पहचान गया. बनावटी हंसी हंसते हुए बोला, “डॉक्टर साहब, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?

मैंने गंभीर होकर कहा, मेरी जीभ कोई चीज का स्वाद नहीं पहचान रही है.

तांत्रिक ने अपने कारिंदे बल्लू को आवाज देकर कहा, अरे, २२ नंबर के बक्से की दवाई लाओ.  बल्लू एक छोटी बोतल में कुछ तरल पदार्थ लेकर आया, चार-पांच बूँद मेरे मुंह में डाले. मेरा मुंह जलने लगा तो मैंने तुरंत थूक दिया और कहा की ये तो पेट्रोल है.

तांत्रिक बोला, देखा, मेरे २२ नंबर का कमाल? आपको स्वाद पहचानने में आ गया.

मैं अपनी होशियारी में फेल होकर लौट आया. पंद्रह दिनों के बाद मैं एक और समस्या लेकर उसके पास गया. इस बार मैंने उसको कहा, मेरी याददाश्त बिलकुल ख़त्म हो गयी है. तो उसने हमेशा की तरह कुछ मन्त्र बुदबुदाए, मोरपंख घुमाए और बल्लू को आवाज दी, २२ नंबर के बक्से की दवाई लाओ.  इस पर मैंने उसको कहा, २२ नंबर बक्से की दवा तो पट्रोल थी, जो पिछली बार मेरे मुंह में डाली गयी थी?

तांत्रिक बोला, "वाह, वाह, क्या बात है? एक बार के मन्त्र से ही आपको पंद्रह दिन पुरानी  बात याद आ गयी. जाइये, आपकी याददास्त ठीक हो गयी है.

मैं उसकी चालाकी से फिर हार गया था. लेकिन मैं उसे किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहता था. कुछ दिनों के बाद मैंने एक बार फिर से उसके पास जाकर कहा कि मेरी नजर बहुत कमजोर हो गयी है. मेरी हालत ये हो रही है की मैं करेंसी नोटों को नहीं पहचान पा रहा हूँ. इस बार उसने बड़े तिकड़मी अंदाज में हाथ जोड़ते हुए कहा “डॉक्टर साहब आपने दो बार मुझे मेरी फीस दे रखी है. आपने मुझे इस काबिल समझा और सम्मान दिया, मैं अबके आपको सम्मान देते हुए आपकी बीमारी का इलाज करूंगा. मन्त्र बुदबुदाते हुए वह बोला, जैसे आप इलाज करते हो, मैं भी करता हूँ, भाई भाई से लेना जुर्म है. ये लीजिये एक हजार रुपये का नोट. लेकिन जो नोट उसने मेरी ओर बढ़ाया था, वह केवल एक सौ रुपयों का था. मेरे मुंह से निकल पड़ा, "ये नोट तो सौ का है, हजार का नहीं,

वह मक्कार हंसते हुए बोला, मैं जानता था की अब आप नोट की पहचान करने में सक्षम हो गए हैं.

यों दोस्तों, सही इरादा होते हुए भी मैं अभी तक उस ठग तांत्रिक को सबक नहीं दे पाया हूँ. आप भी मानोगे जो गलत है, सो गलत है.  टोना टोटके, अंधविश्वासों की जड़ें हमारे समाज में बहुत गहरी हैं, जिनका लाभ लेने में गुड्डू तांत्रिक जैसे लोग सफल हो जाते हैं. परन्तु इसके खिलाफ लड़ाई तो जारी रखनी होगी. इस लड़ाई में तुमको मेरा साथ देना होगा.
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बुधवार, 13 मई 2015

चुहुल - 73

(1)
पठान अपने बॉस से  सर, 20 दिनों की छुट्टी चाहिए. मेरी कज़न की शादी है.
बॉस  कज़न की शादी में तुमको 20 दिनों की छुट्टी की क्या जरूरत है?
पठान वो बात ये है कि कज़न की शादी मेरे साथ हो रही है.

(2)
एक नेता जी अपने मोबाईल फोन पर बात करते हुए घर के गेट पर खड़े हुए थे. एक प्यासे राहगीर ने हिमाकत करते हुए उनसे कहा, साहब, एक गिलास पानी मिलेगा?
नेता जी ने नकारते हुए इशारा किया और कहा, अभी यहाँ कोई आदमी नहीं है.
प्यासा राहगीर फिर से बोल उठा, साहब बड़ी प्यास लगी है.
नेता जी बोले, कहा ना तुमसे, अभी यहाँ पर कोई आदमी नहीं है.
राहगीर बोला, थोड़ी देर के लिए आप ही आदमी बन जाइए, साहब.

(3)
एक पठान अपनी शादी की दावत देने जा रहा था. उसके दोस्त ने पूछ लिया, पठान भाई, तुम्हारी शादी किससे हुई है.
पठान ने तपाक से उत्तर दिया, “एक औरत से.
दोस्त बोला, अरे बेवक़ूफ़, शादी तो औरत से ही होती है. किसी की शादी मर्द से थोड़ी होती है.
पठान बोला, होती है, जानेमन. मेरी बहन की शादी एक मर्द से हुई है. 
                
(4)
कई महीनों से मायके में रह रही अपनी पत्नी को लेने के लिए जब एक आदमी ससुराल गया तो उसके ससुर जी ने आवभगत करते हुए शिष्टाचार के तहत पूछ लिया, और कुशल बात सुनाइये?
दामाद मायूसी भरे स्वर में बोला, कोई खुश खबरी की कुशल बात कैसे होती? साल भर से तो आपकी बेटी मायके में है."

(5)
चम्पूराम ने अपनी गर्लफ्रेंड से कहा, “वो देखो, सामने नीली साड़ी वाली लड़की मुझे देख कर मुस्कुरा रही है.
इस पर गर्लफ्रेंड बोली, ये लड़की तो सिफ मुस्कुरा भर रही है. मैंने जब पहली बार तुमको देखा था तो मैं तीन दिनों तक हंसी थी.
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गुरुवार, 7 मई 2015

सर्वव्यापी ईश्वर

दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोई,
जो  सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे  को  होई. 

संत कबीर के नीति के दोहों में बहुत गंभीर नीतिगत दार्शनिक उपदेश दिए गए हैं. यहाँ सुमिरन का तात्पर्य ईश्वर को याद करना है. वास्तव में ईश्वर एक आस्था का नाम है, जिस पर भरोसा करने से सांसारिक कष्ट कम व्यापते हैं और सद्मार्ग अपने आप मिलता जाता है. उस अदृश्य  शक्ति की अनुभूति ही परमानंद की प्राप्ति है. वह अनंत है तथा सर्वव्यापी है.

हम मनुष्यों की सामजिक मान्यताएं/व्यवस्थाएं आदि काल से धार्मिक रूप लेती गयी हैं. प्राय: सभी धर्मों के संत, समाज सुधारक, विचारक या मार्गदर्शक जगत कल्याण के उपदेश देते रहे हैं, और परमात्मा की किसी न किसी रूप में उपस्थिति बताते रहे हैं.

एक यहूदी संत अपने सुख के दिनों में जब एक बार समुद्र के किनारे रेत पर चल रहे थे तो उन्होंने पाया कि उनके पीछे जो पदचिन्ह बन रहे हैं वे दो लोगों के थे. संत को अहसास हो गया की दूसरा पदचिन्ह अदृश्य परमात्मा के थे, जो उनके साथ साथ चल रहे थे. संत दार्शनिक भाव से स्वगत बोला, हे ईश्वर! तब तुम मेरे साथ साथ क्यों नहीं आये थे, जब मैं अतिशय रूप से परेशान था? तब मैंने देखा था कि मेरे पदचिन्ह अकेले ही बनते थे.” तभी एक आकाशवाणी हुई कि मैं तो हमेशा ही तुम्हारे साथ रहा हूँ, जब तुम गर्दिश में थे तो मैं तुम्हें सुरक्षा देने के लिए गोद में उठाये रहता था, जो अकेले पदचिन्ह तब तुमने देखे थे वे सिर्फ मेरे ही थे.
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मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

बैरागी बाबा

इस संसार की व्यवस्थाओं और घटनाक्रमों पर गौर करें तो यह विश्वास अडिग होता है कि कोई अदृश्य शक्ति जरूर है जो सारे चराचर/ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करती है. इसी अदृष्ट शक्ति को हम लोग ईश्वर, अल्लाह, गॉड, आदि नाम से याद करते हैं. बहुत से सच्चे योगी, बैरागी/सन्यासी तथा आत्मज्ञानी लोग उस शक्ति से साक्षात्कार भी करते आये हैं.

ईश्वर ने पृथ्वी पर मौजूद समस्त प्राणियों में मनुष्य को श्रेष्ठतम बनाया है, जिसे अनेक सांसारिक सुख भोगने को दिए हैं. सुखों के अनुभव के लिए साथ साथ दु:खों की अनुभूति भी आवश्यक हुई है. दु:खों की कल्पना के इतर इन्द्रियों के सुखों का त्याग करने वाला मनुष्य बैरागी कहलाता है. उसे राग-द्वेष, क्रोध, शोक, माया-ममता, व इच्छा-ऐषणा का कोई कोप नहीं होता है. हमारी सनातनी सामाजिक व्यवस्था में सारे सुख-दुःख भोगने के बाद बैराग्य उत्पन्न होने के अनेक ऐतिहासिक उदाहरण हैं. सामाजिक या पौराणिक कारणों से अहं को चोट लगने पर बैराग्य की उत्पत्ति को एक मुख्य कारण माना जाता है, पर ऐसे भी अनेक दृष्टांत हैं जिनमें मानव मन बाल्यकाल में कलुषविहीन अवस्था में ही बैरागी हो जाता है; आदि शंकराचार्य व स्वामी विवेकानंद इसके अच्छे उदाहरण हैं. ये जरूरी भी नहीं है कि ऐसे मनीषी आत्मप्रचार करते आये हों. अनेक जगत कल्याणी मानव समय समय पर समाज को नई दिशा दे कर अनंत में विलीन हो गए.

यहाँ जिस बैरागी बाबा की चर्चा की जा रही है, वे कौन थे, कहाँ से आये, किसी को याद नहीं. रामगंगा के पावन तट पर एक सुरम्य स्थान को उन्होंने अपनी तपोस्थली बनायी थी. कन्द-मूल, फल या भिक्षा से प्राप्त थोड़े से अन्न से वे अपने शरीर का पालन करते थे. निकटवर्ती गावों में कुछ अटूट श्रद्धा वाले लोग नित्य आकर वेद-पुराणों की ज्ञानवर्धक चर्चाएँ सुनने के लिए उनके आश्रम में आते रहते थे. बाबा के आश्रम ने धीरे धीरे एक छोटे तीर्थ का रूप ले लिया था.

सात गाँव के जमींदार ने श्रद्धापूर्वक एक सफ़ेद रंग का घोड़े का बच्चा बाबा को भेंट कर दिया. वैसे तो बच्चे सभी जानवरों के बड़े प्यारे लगते हैं, पर वह घोड़े का बच्चा ज्यादा ही सुन्दर था. उसे पाकर मानो बाबा का बैराग्य छू-मंतर हो गया. वे उससे प्यार करने लगे. बच्चा साल भर के अन्दर ही पूरा घोड़ा बन गया. अब बैरागी बाबा को घोड़े वाला बाबा के नाम से जानने लगे. एक दिन एक डाकू की नजर उस घोड़े पर पड़ी तो उसने बाबा से मुंहमांगी कीमत पर घोड़े को खरीदना चाहा. बाबा को आभास हो गया कि सामने वाला व्यक्ति डाकू/चोर/लुटेरा है इसलिए उन्होंने अपने प्यारे घोड़े को अशुभ हाथों में देने से इनकार कर दिया. डाकू के मन में घोड़ा प्राप्त करने की तीव्र लालसा थी. उसने थोड़ा समय गुजर जाने के बाद एक दिन अपाहिज का वेष बनाया, और जब बाबा घोड़े पर बैठ कर जा रहे थे तो कराहते हुए मदद के गुहार लगाई. बाबा को उस असहाय अपाहिज पर दया आ गयी और उसे सस्नेह घोड़े पर बिठा कर साथ साथ चलने लगे. तभी ठग डाकू ने अपना असली रूप दिखाया और घोड़े को चाबुक लगाकर दौड़ाने लगा. पीछे से बाबा की आवाज सुनकर घोड़ा रुक गया. बाबा ने डाकू से कहा, अच्छा हुआ तुमने मेरा मोहभंग कर दिया. मैं बैरागी होकर भी घोड़े के प्रेम-बंधन में बंध गया था. तुम घोड़े को ले जा सकते हो लेकिन किसी को ये मत कहना कि बाबा को ठग कर घोड़ा हासिल किया है, अन्यथा दुनिया में मजबूर अपाहिज लोगों के प्रति दयाभाव समाप्त हो जाएगा.

डाकू शर्मिन्दा तो हुआ ही उसे ज्ञान भी प्राप्त हो गया. वह उतर कर बाबा के चरणों में गिर गया, और उसके बाद लूटपाट का धंधा छोड़कर सद्मार्ग पर अपना जीवन बिताने लगा.
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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

बैठे ठाले - १४

पिछले लोकसभा चुनावों के बाद हमारी ठलुआ पंचायत भंग हो गयी थी. कारण था मोदी जी का आक्रामक योजनाबद्ध चुनावी दौर, जो कि अभूतपूर्व था, और उसके अप्रत्याशित परिणाम. जहां मोदी जी के आलोचक खिसिया रहे थे वहीं समर्थक विभोर हो उठे थे. वर्षों से अलसाई हुई जनता, जो कि भ्रष्टाचार से तंग थी, उसमें नया संचार हो गया. लोग परिवर्तन की उमंग में आ गए. इस सूनामी में राजनीति के बड़े बड़े महारथी खेत रहे, बह गए. ये एक ऐतिहासिक युगांतकारी परिवर्तन था.

भारतीय जनता पार्टी की सरकार आते ही एकाएक सभी हिन्दुत्ववादी शक्तियां सब तरफ हावी/प्रभावी हो गयी, जो धार्मिक उन्माद उभरा उसके बारे में कहा जाने लगा कि इससे हिन्दुस्तानी संस्कृति का जो मूल स्वरुप है उसकी चूलें हिलने लगी हैं’. पूर्ववर्ती शासन से अघाए व खार खाए प्रबुद्ध जन इसे भगवत गीता के प्रथम चरण के श्लोक यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति से जोड़ते हुए अकल्पनीय परिवर्तनों के सपने देखने लगे थे.

अब मोदीराज का लगभग एक वर्ष का समय बीत गया है, लेकिन जनसाधारण फिर कसमसाने लगा है. ये सत्य है कि विपक्ष के पास मोदी जी के मुकाबले वाकचतुर, बड़बोला, कर्मठ तथा प्रशासनिक अनुभव वाला कोई नेता नहीं है. कांग्रेसवाले ले दे कर एक अदद राहुल गांधी को धक्का दे देकर सीढ़ियों से ऊपर जाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं; आज भी खूसट कांग्रेसियों की मानसिक स्थिति गांधी परिवार की आड़ में सुरक्षित राजनीति खेलने को प्रतिबद्ध है. कब नौ मन तेल होगा? और कब राधा नाच पायेगी? यक्ष प्रश्न जीवंत है.

इधर मोदी के धुर विरोधी नामनिहाल समाजवादी विचारधारा के वारिस एकजुट होकर आत्मरक्षा की तैयारी में अपने भोंटे हथियार तेज कर रहे हैं क्योंकि अस्तित्व का खतरा आन पड़ा है. मुलायमसिंह यादव जी के भरोसे ये सप्तपदी सेना बिहार और यूपी के आगामी विधान सभा चुनावों में अपना जौहर आजमाएंगे. ये कितने ताकतवर बन कर उभरेंगे या सिमट कर रह जायेंगे? भविष्यवाणी करना जल्दबाजी लग रहा है.

कम्युनिस्ट शासन सिर्फ छोटे से राज्य त्रिपुरा तक सिमट कर रह गया है, हाल में कामरेड सीताराम येचुरी को कमान सौप दी गयी है, जो कट्टर सिद्धान्तवादिता से हटकर समझौतावादी की तरह खंडित वामपंथ के लिए फेविकॉल की तलाश में रहेंगे. राष्ट्रीय स्तर पर विकल्पी बनने का सपना शायद उनको ना आ पाए.

मायावती जी, जयललिता जी ममता बनर्जी जी आदि सभी क्षेत्रीय लड़ोकनियाँ अपने अपने मुकाम के चरम पर रही हैं, पर अब इनका ग्राफ शायद ही ऊपर उठ पाए. इसी तरह अरविन्द केजरीवाल जी का भविष्य दिल्ली विधान सभा में प्रचण्ड बहुमत के बावजूद अनिश्चय के घेरे में यों आ गया कि उनकी पार्टी अन्दुरुनी कलह से त्रस्त है. मीडिया जोर शोर से उनका मजाक बनाने में लगा है. जिसे सुनकर आम लोगों का विश्वास उनके प्रति डगमगाने लगा है. लगता है, जब तक चल सके चलाये चलो का सिद्धांत का अनुसरण कर रहे हैं. प्रशासनिक अनुभव की कमी के कारण केंद्र में काबिज भाजपा इसे स्थिर नहीं होने देगी.

पंजाब में अकाली सरकार पूरी तरह से मोदी जी के भरोसे पर आ टिकी है क्योंकि पंजाब में दल का जनाधार बहुत घट गया है, जिसका नमूना अमृतसर में लोकसभा चुनाव में सबने देखा है, जहां अरुण जेटली जी को हार का मुंह देखना पड़ा है. भाजपा को जिस दिन लगेगा की इसको अब निगला जा सकता है, तो परिणाम अप्रत्याशित ही होगा.

काश्मीर में भाजपा ने मजबूरी व स्वार्थ दोनों की वजह से सत्ता में हिस्सेदारी की, पर अलगाववादियों, कश्मीरी पंडितों, धारा 370 पर विरोधाभासी चरित्रों के कारण न थूकते बन रहा है और ना निगल सकते हैं. चुनावों में अलगाववादियों को नेस्तनाबूद करने की बड़ी बड़ी बड़ी डींग हांकने वालों को अब जवाब देते नहीं बन रहा है.

ये थीसिस बहुत लम्बी हो रही है, क्योंकि आलोचना के कई बिंदु अभी भी अनछुए हैं, जैसे कि, मोदी जी की जन धन योजना के दो करोड़ से ज्यादा खाते निष्क्रिय से हो गए हैं. इनमें नियमानुसार प्रति माह लेनदेन नहीं होने से दो लाख रुपयों का बीमा बेमानी हो गया है. विदेशी काला धन पर कुछ टिप्पणी करना अब हास्य का विषय बन गया है. ये चुनावी जुमला बताया जा रहा है, जो आने वाले चुनावों में भाजपा को चुभता रहेगा.

चूंकि मोदी जी ने अपनी छवि स्वयंभू की बना ली है इसलिए उनको सोचना पडेगा कि सिर्फ कांग्रेस की सात पीढ़ियों को गलियाने से देश की जनता संतोष करने वाली नहीं है. उन्होंने मोदी जी को भरपूर समर्थन इसलिए दिया था कि व्यवस्था परिवर्तन हो. निराशा इसी बात की है कि कमोवेश सब तरफ प्रशासनिक व न्यायिक मामलों में स्थिति में यथावत अनुभव हो रहे हैं. महंगाई के बारे में जो सरकारी आकड़ों का मकड़जाल दिखाया जा रहा है, जो कि जमीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहा है. क्योंकि उपभोक्ता रिटेल बाजार भाव, औषधीय खर्चे, परिवहन व्यय पहले से काफी बढ़ गए हैं. मध्यवर्गीय लोग इसकी मार झेल रहे हैं. केवल अल्प प्रतिशत सरकारी कर्मचारियों, पेंशनरों के महंगाई भत्ते में बढ़ोत्तरी से महंगाई पीड़ित आम लोगों को ज्यादा दिन तक थपकी दे कर शांत नहीं रख सकते हैं. चीन-पाकिस्तान से दोस्ती का नापाक नाटक के बाद अलगाववादी+आतंकवादी तथा नक्सलवादी आक्रमण तेज हो गए हैं. ये कैंसर का रूप बनते जा रहे हैं. ना खाऊ ना खाने दूं भी केवल जुमला बन कर रह गया है. बिना रिश्वत आज भी कोई काम नहीं हो पा रहा है.

ज्वलंत गंभीर मुद्दा मौसम की मार से उत्तर भारत के कई राज्यों के काश्तकारों पर आई आपदा का है. किसान कर्जों के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं. चुनावों के दौरान मोदी जी का एक मुद्दा किसानों की आत्महत्या का रहा था. अब मोदीराज के इसी तिमाही में मौत का आंकड़ा सौ के पार पहुँच चुका है, जो बहुत दुखद व चिंतनीय है.

लेख के अंत में नरेंद्र मोदी जी से यह कहना चाहता हूँ की अब विदेश नीति से ज्यादा देश के अन्दर की नीति पर ध्यान देने की जरूरत है. अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंग्लेंड, फ्रांस, जर्मनी तथा कनाडा में बसे हुए भारतीयों के प्यार का दोहन करना तो ठीक है, पर लोग समझने लगे हैं कि ये आपके खुद के द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम हैं. भारतवंशी तो हर हाल में भारतमाता की जय' बोलेगा

अब आपको ओबामा जी के सर्टीफिकेट या विश्वबैंक की तहरीर पर लोग नहीं मापेंगे. कृपया अपने चुनावी वायदों की फेरहिस्त की एक बार फिर से नजरसानी कीजिये.
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