शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

शुभ आशीषें (माँ के पत्र - 5)

                                                पाँचवां पत्र

प्यारी बिटिया,
सुखी रहो, दीर्घायु पाओ.
इस बार तुम्हारे दोनों पत्र मुझे एक साथ मिले और पढ़ कर बहुत सन्तोष हुआ कि तुम्हारा अध्ययन ठीक चल रहा है. हम लोग सब प्रकार से कुशल पूर्वक हैं और तुम्हारे लिए शुभ कामनाएं करते रहते हैं.

तुमने शिकायत लिखी है कि मैं अब पत्र भेजने में देरी करने लगी हूँ, असल बात ये है कि तुम्हारे पापा तुमको नियमित रूप से पत्र लिखा ही करते हैं, जिनमें लगभग सभी बातें लिखी होती हैं इसलिए मैं अपने ओर से वही बातें लिख पाती हूँ जो उन्होंने नहीं लिखी होती हैं या वे नहीं लिख पाते हैं. मैं कोशिश करूंगी कि जल्दी जल्दी ही लिखा करूं. तुमको मुझे ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि घर के तमाम रोजमर्रा के छोटे मोटे कामों से लेकर भैया की देख-रेख करने में मैं दिन भर व्यस्त रहती हूँ. गृहस्थी का काम ही ऐसा होता है कि अगले से अगला काम पड़ा रहता है. तुम्हारे पापा तो बड़े सवेरे तैयार होकर आफिस चले जाते हैं और शाम को थके मांदे लौटते हैं. बात ये भी है कि मेरे लेखन की गति भी कम है. जिस दिन पत्र लिखने बैठती हूँ पूरे दो घन्टे का समय लग जाता है और इन दो घंटों में मैं आनंद में सरोबार रहती हूँ.

तुमने लिखा है कि सभी कपड़े छोटे पड़ने लग गए हैं, अगर गुंजाइश छोड़ी हुई हो तो टेलर लम्बाई बढ़ा सकता है अन्यथा मैं तुरन्त दो जोड़े नए कपड़े भेजने का प्रबंध करूंगी. लिख भेजना कि कितने इंच की बढ़ोत्तरी करनी है. और अगर ग्रीष्मावकाश तक चल सकते हो तो चला लेना.

कपड़े छोटे व तंग होने की बात पर मुझे अपनी किशोरावस्था के दिन याद आ रहे हैं. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था. मेरे क्या? सभी किशोरों के साथ ऐसा ही होता आया है. कपड़े तंग हो जाये तो बड़ा अटपटा लगता है शर्म लगती है. इस उम्र में शरीर में एकाएक वृद्धि होने लगती है और मानसिक परिवर्तन भी अपनी दस्तक देने लगते हैं. लडकों में ये स्थिति कुछ देर से आती है. लड़कियों में विशेषकर गर्म प्रदेशों में तुम्हारी उम्र में ये लक्षण प्रकट होने लगते है. इन शारिरिक परिवर्तनों से बहुत सी लडकियां घबराने लगती हैं क्योंकि उनको शरीरक्रिया विज्ञान का बोध नहीं होता है. इसमें घबराने वाली जैसी बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये परिवर्तन प्रकृति का नियम है. परमेश्वर ने लड़कियों को कुछ इस तरह से बनाया है कि कोमलता, भावुकता और लज्जाशीलता ज्यादा दे रखी है. शरीर में दुग्ध ग्रंथियों का विकास बिलकुल स्वाभाविक क्रिया है इसी तरह मासिक धर्म का श्राव मी स्वाभाविक शारीरिक क्रिया है. इसको रजस्वला होना भी कहते हैं. सामजिक पारम्परिक मान्यताओं में मासिक धर्म के दिनों में स्त्री को अशुद्ध कहा जाता है, लेकिन इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. हाँ शरीर की साफ़-सफाई तो अपरिहार्य होती है. आज के युग में जब स्त्रियां नौकरी करती हैं, वे सारा काम करती हैं जो पुरुष करते हैं, तो यह संभव मी नहीं है कि ऋतु काल में वे बन्द होकर बैठी रहें. बाजार में सुरक्षित सेनीटरी पैड उपलब्ध रहते हैं जिनका प्रयोग सुविधाजनक भी होता है.

लड़कियों में अगर बहुत ज्यादा शर्मीलापन हो तो वह भी कभी कभी परेशानी का कारण बन सकता है. लेकिन मुझे ये जान कर खुशी हुई कि तुम्हारे स्कूल की लड़किया खेल-कूद और जिमनास्टिक जैसे कार्य कलापों में हिस्सा लेती हैं. कुछ स्कूलों में तो जापानी जूडो कराटे के अभ्यास भी कराये जाते हैं जो कि आत्मरक्षा के लिए अच्छा उपालंभ है. आज लड़किया सेना व पुलिस की सेवाओं में भी अग्रणी होते जा रही है, ये अच्छा लक्षण है.

शरीर क्रिया विज्ञान की मेरी बात अधूरी रह गयी. भगवान ने हमारी शरीर की मशीन को इस खूबसूरती, कलात्मक तथा जटिल प्रक्रिया से बनाया है कि विज्ञान भी सारी गुत्थियों को नहीं सुलझा पाया हैं. शरीर में हड्डी, माँस, त्वचा, बाल, स्नायु तथा अनेक तंत्रों के अलावा अंत:श्रावी ग्रंथिया हैं, जो नियमित रूप से अपने अपने हारमोन/श्राव छोड़ते रहते हैं. शरीर के बाहर होने वाले श्रावों को हम देख सकते है, अनुभव कर सकते हैं, जैसे आँख में आंसू आना, मुँह में लार आना, पसीना आना, दुग्ध श्राव आदि. इसी तरह अंत:श्रावी ग्रंथियां है, जैसे पीयूश ग्रन्थि, अग्न्याशय (पेंक्रियाज) अदि अनेक ग्रंथियां हैं. बहुत से होर्मोन्स का हमको पता ही नहीं चलता है. बच्चा होने पर माँ की दुग्ध ग्रंथियों में अपने आप दूध पैदा होने लगता है, ये सब परमेश्वर की व्यवस्थाएं हैं, इसमें कोई लज्जा जैसी बात नहीं होती है.

लज्जा-शर्म जैसी बात तो वह होती है जहाँ लडकियां फूहड़ता के साथ अंग प्रदर्शन करें, छोटे-बड़ों का ध्यान रखे बगैर व्यवहार करें. तुम देखती होगी आजकल विशेष कर बड़े शहरों में अनेक लडकियां/औरतें पाश्चात्य देशों की नक़ल करके बेहूदे ढंग के छोटे कपड़े पहन कर सार्वजनिक प्रदर्शन करती हैं. जिसकी सभ्य समाज में तारीफ़ नहीं की जा सकती है. हमारे भारतीय परिवेश में लड़की की सुंदरता उसके शील और गरिमामय पहनावे में देखी जाती है. मर्यादा लांघने वाली लडकियों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है.

दूसरी बात, तुमने गृह विज्ञान में जो पाक विद्या सीखी है, उसकी परीक्षा मैं तुम्हारे घर आने पर खुद लूंगी.

दिल्ली भ्रमण का कार्यक्रम कब तक बनने वाला है लिखना.

तुम्हारे पापा व भैया का प्यार.
तुम्हारी माँ
                                           ***

3 टिप्‍पणियां:

  1. सर्वप्रथम बैशाखी की शुभकामनाएँ और जलियाँवाला बाग के शहीदों को नमन!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    सूचनार्थ!

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  2. आपकी सभी प्रस्तुतियां संग्रहणीय हैं। .बेहतरीन पोस्ट .
    मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए के लिए
    अपना कीमती समय निकाल कर मेरी नई पोस्ट मेरा नसीब जरुर आये
    दिनेश पारीक
    http://dineshpareek19.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

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