शनिवार, 28 अप्रैल 2012

गवाही


कहाँ से करूँ शुरू,
किस किस को करूँ रूबरू,
एक होता तो हिसाब होता,
लिख लेता तो किताब होता.

      आपको  तो  मालूम है बस एक-एक,
      पर मेरी उम्र गुजर गयी सब देख-देख.

किसी को क्यों बनाते हो, गुनाहों के गवाह,
अपनी  गवाही  मैं  खुद ही देता आया  हूँ.
                     ***

9 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ से करूँ शुरू,
    किस किस को करूँ रूबरू,
    एक होता तो हिसाब होता,
    लिख लेता तो किताब होता.बढ़िया प्रस्तुति साक्षी भाव से जीवन को निहारती 'अपनी गवाही मैं खुद ही देता आया हूँ .
    प्रस्तुति .कृपया यहाँ भी पधारें रक्त तांत्रिक गांधिक आकर्षण है यह ,मामूली नशा नहीं
    शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/04/blog-post_2612.html
    मार -कुटौवल से होती है बच्चों के खानदानी अणुओं में भी टूट फूट
    Posted 26th April by veerubhai
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/2012/04/blog-post_27.html

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  2. वाह...बहुत सुन्दर, सार्थक और सटीक!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. बहुत सुन्दर वाह!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 30-04-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-865 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  4. अपनी गवाही तो खुद ही देनी होगी
    बहुत खूब

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