मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

शुभ आशीषें (माँ के पत्र -7)

                                               सातवाँ पत्र

प्यारी बिटिया,
सदा सुखी रहो.
अत्र कुशलं च तत्रास्तु.

तुम्हारा पत्र मिला. प्रसन्नता हुई कि तुमने खेल- कूदों में पारितोषिक प्राप्त किये हैं. सच तो ये है कि पारितोषिक से ज्यादा महत्व इनमें भाग लेना होता है. जो बच्चे खेलों में भाग लेते हैं, उनमें प्रतिस्प्रर्धा की स्वच्छ प्रबृति स्वत: आ जाती है. इसी को खेल भावना का नाम दिया गया है, बधाई है. आज इस पत्र में मैं कुछ प्रेरक प्रसंगों को लिख रही हूँ, ये मैंने तुम्हारे दादा जी के संकलनों से प्राप्त किये हैं:

यूरोप के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रूसो, जिनकी लिखी अनेक पुस्तकों को आज राजनीति के पंडित पढ़ते हैं, एक समय लायोंस नगर में घरेलू नौकर था. एक बार उसने किसी पौराणिक चित्र की गाथा घर में आये हुए विद्वान मेहमान को प्रभावोत्पादक भाषा में ऐसे समझाई कि सब आश्चर्य में पड़ गए. मेहमान ने रूसो से आदर पूर्वक पूछा, महाशय आपने किस स्कूल में शिक्षा पाई है? इस पर उसने नम्रता पूर्वक उत्तर दिया, मैंने कई स्कूलों में शिक्षा पाई लेकिन मुसीबत के स्कूल में सबसे अधिक समय तक अध्ययन किया है.

एडीसन ने सिर्फ पाँच वर्ष की उम्र में अखबार बेचे. बाद में रसायन शास्त्र पढ़ना शुरू किया. इस महान वैज्ञानिक से किसी ने पूछा,  “आपकी सफलता का राज क्या है?" तब उसने बताया, मैं नशे से दूर रहता हूँ, काम के अलावा सभी बातों में संयमी रहा हूँ.

माइकल फैराडे भी बचपन में अखबार बेच कर गुजारा करते थे. सात साल की उम्र में वे एक दुकान पर जिल्दसाजी करने लगे थे.एन्साइक्लोपीडिया नाम की पुस्तक की जिल्द बाँधते समय उसकी दृष्टि बिजली सम्बन्धी लेख पर पडी. उसने उस लेख को अच्छी तरह पढ़ा और समझा फिर तदनुसार छोटा-मोटा सामान जमा करके परीक्षण करने लगा. एक ग्राहक उस बालक के परिश्रम को देख कर बड़ा प्रसन्न हुआ और वह फैराडे को तत्कालीन प्रसिद्ध विद्वान सर हम्फ्री डेवी का भाषण सुनने ले गया. माइकल ने भाषण नोट कर लिया और उस लेख को डेवी के पास भेज दिया. डेवी इतना खुश हुआ कि उस बालक को उसने अपने यंत्रों की देखभाल के लिए रख लिया. माइकल, डेवी के परीक्षणों को ध्यान से देखा करता था. कुछ समय बाद यही बालक रियल एकेडमी में अध्यापक बना दिया गया और वैज्ञानिक जगत में चमत्कार दिखाने लगा.

इंग्लैण्ड की एलीजाबेथ फ्राय नामक महिला ने अब से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले जेलों में कैदियों की, विशेषकर महिला कैदियों की बुरी हालत देखी. उन दिनों कैदियों के लिए सभ्य सँसार में भी सद्व्यवहार का कायदा नहीं था. उनका जीवन जानवरों से भी बदतर होता था. फ्राय ने इसमें सुधार करने की योजना बनाई. अपना सारा जीवन दु:खी औरतों की स्थिति सुधारने मे लगा दी. इसका जबरदस्त प्रभाव हुआ. वहाँ की सरकार ने तदनुसार सुधार के नियम बनाये और आज सारे विश्व में फ्राय की योजना लागू है.

फर्ग्यूसन नामक गडरिये के लडके ने कांच के टुकड़ों से दूरबीन बना कर तारों की दूरी का पता लगाया था.

हमारे देश के मिसाइल मैन पूर्व राष्टपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का बचपन बहुत गरीबी में बीता.

गैलीलियो का पिता उसे डाक्टर बनाना चाहता था पर वह चुपके से गणित के प्रश्नों में उलझा रहता था. अठारह वर्ष की उम्र में उसने गिरजाघर में पेंडुलम के सिद्धांत को खोज निकाला. उसने सूक्ष्मवीक्षक यंत्रों का आविष्कार करके मनुष्य जाति की महान सेवा की है.

नेपोलियन बोनापार्ट फ़्रांस का शाहंशाह था. एक दिन अपनी पत्नी के साथ पैदल घूमने जा रहा था तो रास्ते में बोझा लाते हुए एक मजदूर को रास्ता देते हुए स्वयं एक तरफ हट गया. उसकी पत्नी को उसके इस व्यवहार पर खुशी नहीं हुई, तब नेपोलियन ने उसके घमंड और शंका का समाधान करते हुए कहा कि श्रम का हमेशा आदर करना चाहिए.

फ्रांस के ही राजा लुई १४ ने अपने मन्त्री कालवर्ट से कहा कि हम इतने विशाल और धनी देश पर शासन करते हैं, लेकिन छोटे से हॉलैंड को नहीं जीत सके. इस पर मन्त्री ने कहा, महराज देश की लम्बाई-चौड़ाई से देश की महानता नहीं होती है, महानता तो देशवासियों के चरित्र से होती है.

इस तरह के सैकड़ों प्रसंग हैं जिन्हें तुम अपनी पुस्तकों में भी पढ़ती होगी. पढ़ना तभी सार्थक होता है, जब हम उनमें उल्लिखित गुणों को धारण भी करें.

दादा, दादी, पापा व भैया का बहुत बहुत प्यार. छुट्टियाँ कब से लगने वाली हैं लिखना.
तुम्हारी माँ.
                                   ***    

4 टिप्‍पणियां:

  1. .

    पत्रों की यह शृंखला रोचक और ज्ञानवर्द्धक है…
    आभार !


    शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. जानकारियों से भरपूर, ज्ञानवर्धक पत्र ...सादर आभार.

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  3. पत्रलेखन शैली में लिखा आलेख बहुत उच्चकोटि का है!

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