गुरुवार, 17 मई 2012

एक पुजारी की गुहार


हे ईश्वर, 
मैं तेरा अनन्य सेवक, ध्याता, व पुजारी हूँ. नित्य सहस्त्रों बार तेरे नाम का जाप व गुणगान करता रहता हूँ. तूने मुझे बहुत कुछ दे रखा है. कर्म स्थली के रूप में विराट मंदिर दिया है, रहने के लिए सुविधा पूर्ण घर दिया है तथा भोजन की व्यवस्था दी है. छोटा सा सुखी परिवार दिया है. यजमानों के रूप में स्वनामधन्य बिरला जी सहित उनके छोटे-बड़े कर्मचारी दिये हैं. वट, पीपल, कदम्ब, मौलिश्री, अमलतास, तथा नागचम्पा आदि वनोच्छादित निवास दिया है. तेरी मुझ पर बड़ी अनुकम्पा है.
हे दीनदयाल,
फिर भी मेरा मन कभी कभी अशांत  हो जाता है क्योंकि मैं मनुष्य हूँ और सभी सांसारिक सुखों के प्रति लालायित रहता हूँ. जब मैं देखता हूँ कि जो लोग कारखाने में मजदूर के रूप में भर्ती हुए थे वे फोरमैन हो गए हैं, जो जूनियर इंजीनियर आये थे वे सीनियर मैनेजर या प्लांट हेड तक हो गए हैं, पर तूने मेरे लिए कोई प्रमोशन की गुंजाइश नहीं रखी है. फैक्ट्री  के कार्यरत कर्मचारी के लिए कानूनन प्रो.फंड, ग्रेच्यूइटी, आदि सुविधाओं की व्यवस्था है, पर में तेरा एक मात्र कर्मचारी बचा हूँ जो केवल हरिनाम के सहारे अपने भविष्य की रूपरेखा बनाए हुए हूँ.
हे बांके विहारी,
तुमने गीता में कहा है कि कर्मण्ये वाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन मुझे सन्तोष है कि नित्य तेरे नाम की आरती गाता हूँ, तेरे नाम की घंटी बजाता हूँ, परसुखचिंतन व आशीर्वचन में व्यस्त रहता हूँ. और ये भी सोचता हूँ कि सुदामा की ही तरह एक दिन तेरी कृपादृष्टि मुझ पर पड़ेगी.
हे देव,
इस महंगाई में मेरे यजमान समृद्ध होते हुए भी मेरी दक्षिणा के प्रति उदासीन रहते हैं. उसमें बढोत्तरी नहीं हो पा रही है. मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि इस बिरला उद्योग को और भी दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति व समृद्धि दे. कर्मचारियों को भी मालामाल कर दे ताकि सबका ध्यान मेरी चिंताओं की तरफ भी बना रहे.
विनम्र,
आपका पुजारी.

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