शनिवार, 7 जनवरी 2017

खिचड़ी, मकसूद भाई के घर की

1980s के अंतिम वर्षों में अगस्त का एक दिन हमारे लिए चिंताओं व खुशियों से भरा रहा. उस शाम महावीर नगर तृतीय, कोटा, में रहने वाले मकसूद भाई के घर की बनी खिचड़ी का स्वाद मुझे आज भी अच्छी तरह याद है. दुःख इस बात का भी है कि खिचड़ी बनाने वाली श्रीमती मकसूद अब इस दुनिया में नहीं है. उनको कुछ साल पहले जन्नत नसीब हो गयी है. मैं जब भी कोटा अपने बड़े बेटे के पास आता हूँ, अपने मित्र मकसूद अली से मिलना नहीं भूलता हूँ. घटना कुछ यों है:

मेरी नातिनी हिना जोशी, जो अब अमेरिका में डॉक्टर है, का जन्म होना था. बेटी गिरिबाला लाखेरी आ गयी थी. दामाद श्री भुवन जोशी तब उत्तराखंड में स्थित BEL में इंजीनियर थे. लाखेरी अस्पताल में हमारी लेडी डॉक्टर श्रीमती विमला जैन ने सलाह दी कि सुरक्षित प्रसव के लिए कोटा के किसी अच्छे मैटरनिटी हॉस्पीटल में जाना चाहिए. अच्छे की परिभाषा में उन्होंने झालावाड़ रोड स्थित बाहेती अस्पताल (अब मैत्री अस्पताल) का पता बताया. कोटा मेरा आना जाना कम ही होता था. ऐरोड्रोम सर्किल के आगे मैं कभी आया गया भी नहीं था. नयापुरा गुलाबबाड़ी में मेरे एक पुराने जिगरी दोस्त स्व. अरुण उपाध्याय का घर था/है. जब गिरिबाला जे.डी.बी. कॉलेज से बी.एस.सी. कर रही थी, तब स्व. श्रीमती शकुन्तला उपाध्याय उसकी लोकल गार्जियन थी. डॉ. शकुन्तला उपाध्याय वहीं पर हिन्दी की प्रोफ़ेसर हुआ करती थी. मगर इनका घर बाहेती अस्पताल से बहुत दूर था.

बाहेती अस्पताल के संथापक डॉ. बाहेती अनुभवी सर्जन थे और श्रीमती नीला बाहेती मानी हुई गानिकोलालिस्ट थी. उन्होंने सुरक्षित प्रसव के लिए सर्जरी की सलाह दी. तदनुसार जब एक गुड़िया का जन्म हुआ तो हम लोग तनाव व चिंताओं से मुक्त हुए.

उन दिनों बाहेती अस्पताल के आसपास बियावान था. कहीं चाय का खोमचा तक नहीं था. विज्ञान नगर के अन्दर जरूर बाजार/दुकानें होंगी, पर मुझे कोई ज्ञान इस सम्बन्ध में नहीं था. विज्ञान नगर में झालावाड़ रोड साइड पर लाखेरी के मेरे एक पूर्व परिचित भगवान सिंह राठोर (हेडमास्टर हरिसिंह जी के सुपुत्र) का घर था, जो पहले हमारी माईन्स में फोरमैन / असिस्टेंट क्वारी मैनेजर थे, और तब मंगलम सीमेंट में कार्यरत थे. कुछ समय पहले जामुल कारखाने में रहते हुए उन्होंने एक व्यक्तिगत संकट में मेरी मदद चाही थी, सो अपना समझ कर पूछते पूछते मैं उनके घर पहुँच गया. मुझे आज भी इस बात का दर्द है की उन्होंने घर में होते हुए भी मिलना उचित नहीं समझा. मैं निराश लौट आया था.

एरोड्रोम चौराहा काफी दूर था. तब आने जाने के साधन भी इस रूट पर नहीं के बराबर थे. सुबह मेरे दामाद कहीं दूर जाकर नाश्ते का सामान जरूर लेकर आये थे. शाम के लिए भोजन के इंतजाम की मुझे चिंता थी. मेरी श्रीमती व दामाद जी अस्पताल में थे, और मैं शाम होने पर पैदल पैदल महावीर नगर तृतीय की तरफ किसी लाखेरी वाले की तलाश में चल पड़ा. जिस चौराहे पर आज हर वक्त मेला सा रहता है, वहाँ एक साईकल रिपेयर वाली दूकान थी. मैंने उससे पूछा “यहाँ आसपास कोई लाखेरी वाला रहता है क्या?” उसने बताया “लाखेरी वाला एक मुसलमान रहता है.” और वह मुझे उसके घर तक ले गया तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि वह और कोई नहीं मकसूद अली का घर था जो शाहाबाद, कर्नाटक में 'लाखेरी बंधु सहकार’ के मेरे साथी थे. वे अब कोटा आई.एल. में आ गए थे. उन्होंने मेरी आवभगत की. मैंने उनको वहां आने का मकसद बताया तो उनकी बेगम (लाखेरी के स्व. पीरमोहम्मद कुरैशी की बेटी) ने तुरंत बढ़िया खिचड़ी बनाई और मकसूद भाई ने अस्पताल तक पहुंचाई.
मकसूद भाई के घर की खिचड़ी हमारे लिए केवल एक भोजन ही नहीं, प्यार भरा तोहफा जैसा था. 

उसके बाद मैं पत्नी सहित लाखेरी लौट गया, परंतु बेटी व दामाद जब तक अस्पताल में रहे, करीब 8-10 दिन तक, मक़सूद भाई रोज उनके लिये खाना ले जाते रहे. उनके इस सौहार्दपूर्ण व्यवहार के लिए हमारे बेटी व दामाद भी उनके शुक्रगुजार है.
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2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-01-2017) को "पढ़ना-लिखना मजबूरी है" (चर्चा अंक-2577) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    नववर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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