शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

लाखों सपनों का शहर - कोटा

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के हाड़ौती इलाके में बसा हुआ 900 वर्ष पुराना कोटा शहर पिछले 30 वर्षों के अंतराल में पुरानी राजशाही चौहद्दी से बाहर निकल कर एकाएक ‘एजुकेशन हब’ के रूप में विकसित हो गया है, और अनपेक्षित रूप से फ़ैल भी गया है. यहाँ पर बिजली, पानी, रेल व सड़क यातायात की सुविधा सब इफरात से प्राप्य है. आज एक लाख से अधिक संख्या में लड़के लड़कियां अपने भविष्य के बड़े बड़े सपने संजोकर यहाँ के छोटे-बड़े दर्जनों कोचिंग-इंस्टीट्यूट्स में सुबह-शाम अलग अलग पारियों में फिज़िक्स, कैमिस्ट्री, बायोलजी/ मैथ्स की पढ़ाई करके अपने सपने सच करने के लिए दिन रात व्यस्त रहते हैं. कुछ कोचिंग संस्थान ‘प्राईवेट लिमिटेड’ भी हो गयी हैं. बंसल, ऐलन, रेजोनेंस, मोसन, कैरिअर पोंइट्स, व्हाईब्रेंट आदि अनेक बड़े नाम हैं, जिन्होंने अनुभवी तथा ब्रिलियंट एकेडेमिक कैरियर वाले प्राध्यापक नियुक्त किये हुए हैं. पढ़ाई का स्तर निश्चित रूप से सामान्य से ऊपर होगा. परीक्षापयोगी विषय ‘कैप्स्यूल’  बना कर विद्यार्थियों को परोसे जाते हैं. सफलताओं के बड़े बड़े विज्ञापन अखबारों में व होर्डिंग्स में देखने को मिलते हैं. इसलिए देश के अन्य प्रान्तों से भी बच्चे यहाँ आने को लालायित रहते हैं, तथा बड़ी बड़ी कोचिंग फीस सहन करते हैं.

ये बात भी सही है कि इस संस्थानों का ये एक बड़ा व्यापार बन गया है. सालाना फीस एक लाख से अधिक वसूली जाती है. इनकी आलीशान बिल्डिंगें, तामझाम व आवरण देखकर ही समझ में आता है कि खर्चों से कहीं अधिक आमदनी हो रही है.  फीस पर कोई सरकारी या गैरसरकारी नियंत्रण ना होने से अवश्य मनमानी होती रही है. आलम ये भी है की अधिक कमाई के उद्देश्य से कुछ संस्थानों द्वारा अपनी ब्रांचेज (दूकानें) राजस्थान के अन्य शहरों में खोली जाने लगी हैं. इस ‘ट्यूशनराज’ के बारे में गत वर्षों में बहुत आलोचनाएँ और गंभीर चिंतन होते रहे हैं क्योंकि ग्रामीण अंचलों के विद्यार्थी या आर्थिक विपिन्नता वाले परिवारों के बच्चे इस सुविधा से वंचित रहते हैं. ये भी है कि लाखों में से कुछ प्रतिशत बच्चे अपेक्षित प्रतियोगी परीक्षाओं में बाजी मारते हैं. शेष हताशा के शिकार होते हैं. आकड़े बताते हैं कि नाउम्मीदी के तथा निराशा के कारण हर साल कुछ विद्यार्थी आत्महत्या भी करते हैं. प्रशासन व राजनीतिज्ञ इसलिए चुप हैं कि इस ‘ट्यूशन लॉबी’ का बड़ा दबाव व आर्थिक प्रभाव इन पर है.

इन संस्थानों की कुछ उच्च माध्यमिक स्कूलों से सेटिंग भी चल रही है कि बच्चे 9वीं कक्षा से ही कोचिंग फीस देकर अपने स्कूलों में ना जाकर यहाँ आते हैं और स्कूलों में हाजिरी लगती रहती है.

माता-पिता, सब, चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, सी.ए., या कलेक्टर बन जाएँ, और इसके लिए वे अपना सर्वस्व दाँव पर लगाने को तैयार रहते हैं. कुछ लोग सौभाग्यशाली अवश्य होते हैं, पर ये उपलब्धि कोचिंग के बिना भी संभव रहती थी. अब समय की सुई पीछे को नहीं घूम सकती है अत: इस सिस्टम का कोई विकल्प आम लोगों के पास नहीं है.

कोटा शहर के कुछ विशिष्ठ खण्डों में बहुमंजिली इमारतें बन गयी हैं जिनमें सैकड़ों की संख्या में हॉस्टल व भोजन-मैस का कारोबार हो रहा है. लोगों ने किराए के लालच से अपने घरों में भी छोटे पार्टीशन देकर कमरे किराए पर दे रखे हैं. हर गली/गेट पर ‘to-let’ का बोर्ड लटका हुआ नजर आता है.

फूहड़ सिनेमा-स्कोप को दोष दें या उम्र व संस्कारों का दोष मान कर चलें, यहाँ गार्जियनशिप के अभाव में कुछ लड़के लड़कियां मनमानी करते हैं. इनके माँ-बाप समझते होंगे कि ‘बच्चे पढ़ रहे होंगे’ पर ये यहाँ पार्कों में या एकांत जगहों में प्रेम-लीला में व्यस्त रहते हैं. यदि ये बच्चे अपनी ज़िंदगी को बैलेन्स करके चलें तो ठीक है. नाबालिग़ बच्चों पर प्रशासन तथा शिक्षण संस्थानों को कोई निगरानी तंत्र की तुरंत व्यवस्था करनी चाहिए, अन्यथा बच्चों के हों या माता-पिता के, सपने यों बर्बाद नहीं होने चाहिए.
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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (29-01-2017) को "लोग लावारिस हो रहे हैं" (चर्चा अंक-2586) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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