शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

बैठे ठाले - १७

हर शहर की अपनी अपनी खासियत होती है, पर जो बात लखनऊ में है, वह कहीं और नहीं है.

अयोध्या से महज 40 मील दूर ये शहर राम जी के छोटे भाई लखन जी के नाम से है, ऐसा पौराणिक गल्पों पर विश्वास करने वाले लोग मानते हैं. मध्य काल में जब अवध के नवाबों की तूती बोलती थी तो गोमती नदी के तट पर बसे इस शहर को पूरब का कुस्तवनतुनिया या शिराजे-हिन्द भी कहा जाता था. इतिहास में दर्ज है कि इसे सर्वप्रथम नवाब आसिफुद्दौला ने अवध की राजधानी बनाया था.

इस शहर के विकास व सांस्कृतिक विरासत का विहंगम वर्णन करने बैठेंगे तो एक विराट पुस्तक बन जायेगी. यहाँ के शिया नवाबों ने विनम्र शिष्टाचार तथा व्यवहार में नफासत को नए आयाम दिए, खूबसूरत उद्द्यान बनवाये, उच्च कोटि की शायरी व नृत्य-सगीत को पूर्ण संरक्षण दिया. जिसे आज हम गंगा-जमुनी संस्कृति कहते हैं, उसे पोषित किया. जिसके तहत अनेक साहित्यकार, शायर/कवि, व शास्त्रीय संगीत/गायकी के बड़े नाम लखनऊ के साथ जुड़े हुए हैं. भारतीय सिनेमा पर भी लखनवी छाप यादगार है. अगर आप भी कभी लखनऊ सैर को निकले हों तो आपको शामे-अवध की गजरों की खुशबू, टिक्का कबाब का स्वाद, वहाँ की ऐतिहासिक छोटे-बड़े इमामबाड़े, और रूमी दरवाजा, अवश्य भाये होंगे और आधुनिक उभरते हुए लखनऊ की ऊंची इमारतें, अम्बेडकर स्मारक - मायावती के हाथियों की जमात, रेलवे स्टेशन, अमोसी एरोड्रम आदि सब मिलाकर एक सपना सा अवश्य लगा होगा.

यों आज का लखनऊवासी उत्तरप्रदेश के अन्य शहरों के निवासियों से कतई अलग नहीं लगते हैं क्योंकि ये अब मैट्रोपॉलिटन सिटी बन गया है. पर मुझे यहाँ की पुरानी तहजीब पर ये जुमला/लतीफा बहुत पसंद है:

फन्ने खां बड़े किस्मत वाले थे कि उनको ससुराल लखनऊ में मिला. जब वे पहली बार वहाँ गए तो बड़ी आवभगत हुई. सासू माँ (खाला) बोली, “दामादजी, आपकी पसंद चाहती हूँ. खाने में सब्जी क्या बनाऊँ? आपके लिए बैगन-शरीफ पका लूं या भिन्डी-मुबारक या फिर आप पालक-पाक खाना पसंद करेंगे?”
फन्ने खां ने उसी अंदाज में जवाब दिया, “खाला, मैं तो बेरोजगार आदमी हूँ. इन मुक़द्दस सब्जियों के नाम लेने के काबिल भी नहीं हूँ. आप ऐसा कीजिये कोई बेगैरत-आवारा सा मुर्गा ही पका लीजिये.”

यों ‘पहले आप – पहले आप’ की विनम्रता का अंदाज आज भी लखनऊ वालों में मौजूद है, और ऐसा कहते हैं कि इसी हुजूरी में उनकी अकसर ट्रेन छूट जाती है.

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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-02-2017) को
    "गधों का गधा संसार" (चर्चा अंक-2598)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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