सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

शरद-पूर्णिमा

कपोल कल्पनाओं का आधार लेकर
निबन्ध के बन्ध लिखना शैशव में
शरद-पूर्णिमा पर, भावातीत ना भी हो
पितृतुल्य अध्यापक के सन्तोष को
आज मन के बन्धों में निबन्धों की छटा
श्रावण की घटा सी छलकती, ना थमती थामे.
किशलय कपोलों के स्पर्श-बन्धों का अमिय सुख
पर खिंचाव दूरी का चाँद से चकोर को.
प्रिय! प्रतिदिन पूर्णिमा होती शरद की पावन,
तुम पास होते निर्मल निबन्धों के अम्बार होते.      
              ***

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

विद्यावती


विन्ध्य प्रदेश में पिछले तीन वर्षों से ढंग से वर्षा नहीं हुई इसलिए कास्तकार बड़ी विपत्ति में दिन काट रहे थे. उधर साहूकारों की बन आई. वे उनकी मजबूरियों का भरपूर लाभ ले रहे थे. रामकिसन की भी खेती चौपट थी. कैसे भी ऐंचा-पैचा कर के दिन काट रहे थे. उम्मीद कर रहे थे कि इस साल वर्षा अच्छी होगी तो सारे कष्ट दूर हो जायेंगे. राजा गजेन्द्र बहादुर ने इस अकाल की घड़ी में अपने अनाज के सुरक्षित भण्डार प्रजा के लिए खोल दिए थे. एक दो साल तक तो सब को राहत मिलती रही पर जब तीसरे वर्ष भण्डार में भी कमी हो गयी तो सहायता लगभग नाममात्र की रह गयी.  

एक दिन रामकिसन अपनी पत्नी विद्यावती के साथ अपनी चिंताओं पर विमर्श कर रहा था क्योकि अब घर में अनाज आखिर आ चुका था तथा बैलों का चारा भी खतम होने वाला था. विद्यावती ने अपने जेवर निकाले और रामकिसन के हवाले करते हुए कहा, “अगर हम ना रहे और ये बैल ना रहे तो ये जेवर क्या काम आयेंगे? आप इनको बेच आओ. बुरा वक्त कट जायेगा.”

रामकिसान ने जेवरों की पोटली तो ले ली पर उसने स्वयं को पहले इतना असहाय कभी महसूस नहीं किया था. अत: पत्नी के गहने बेचने में उसे कत्तई खुशी नहीं हो रही थी. अचानक उसके दिमाग में एक उपाय सूझा, ‘क्यों ना इनको बेचने के बजाय साहूकार के यहाँ गिरवी रख दिया जाये. फसल आने पर अगले साल छुडा लूंगा. 'विद्यावती को भी ये योजना ठीक लगी क्योंकि ये जेवर उसने शादी के समय से ही सहेज का रखे थे. उसके लिए ये अनमोल थे. पायजेब, झांजर, हँसली व कड़े सब मिला कर करीब आधा किलो चांदी और दो तोला सोना (गलाबंद व कर्ण फूल) कुल मिलाकर महज ५०० रुपयों मे साहुकार गोपीचंद के पास गिरवी रख दिए गए. गोपीचंद बड़ा काईयाँ आदमी था. बीच बाजार में उसका ठीया था. उसने रामकिसन के अंगूठे के निशान बही-खाते में ले लिए और लिखत कर ली कि १५ गते बैशाख तक अगर नहीं छुडाये गए तो जेवर जब्त हो जायेगे. ब्याज में एक मन गेहूं, एक मन बाजरा और दो पंसेरी चने भी देने होंगे.

बहरहाल विद्यावती भी खुश थी कि उसका ओरिजिनल जेवर सुरक्षित मिल जाएगा और रामकिसन खुश था कि पत्नी ने बुरे वक्त में उसका भरपूर साथ दिया. इन्द्रदेव की कृपा से उस साल बारिस भी खूब हुई. सभी कास्तकार निहाल हो गए. जानवरों को भरपूर चारा मिला. सर्वत्र आशा और उम्मीदों से लोग काम करने लगे.

फसल समेटने का समय आ गया लेकिन छिटपुट बारिश होते रहने से अनाज बेचने का काम लेट होता गया. रामकिसन को चिंता थी कि साहूकार से जेवर छुडाने की तारीख नजदीक आ रही थी फिर भी वह तीन दिन लेट हो गया जब वह मूल धन व ब्याज का अनाज लेकर साहूकार के ठीये पर पंहुचा तो गोपीचंद ने बेरुखी से उसको कहा कि “उसके जेवर जब्त हो चुके हैं क्योंकि लिखत के अनुसार वह तीन दिन देरी से आ रहा है.”

रामकिसन को साहूकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी. उसने बहुत अनुनय-विनय की तथा अतिरिक्त ब्याज देने की पेशकश की लेकिन गोपीचंद तो मक्कार था उसने एक नहीं सुनी. आखिर रूपये व अनाज लेकर घर वापस आ गया. छलछलाती आँखों के साथ सारी बात विद्यावती को उसने बताई. उस शाम घर में खाना नहीं बना बच्चे भी बिलबिलाते हुए बासी-तूसी खाकर सो गए. पति-पत्नी को नीद कहाँ आती? यों ही पड़े रहे. आधी रात को विद्यावती ने उठकर रामकिसन को कहा, “आप कल राजा जी के पास जाकर साहूकार की शिकायत करिये मुझे पूरी आशा है कि वे हमारे जेवर अवश्य दिलवा देंगे.” रामकिसन को यह बात सही लगी.

राजमहल ज्यादा दूर नहीं था. अगले ही दिन वह राजा जी के न्याय मंच पर पहुच गया. उसने गुहार लगाने के लिए डोरी खींची. उसको अन्दर बुला लिया गया. रामकिसन ने सारी दास्ताँ राजा जी को सुना दी. राजा जी को उसके भोलेपन व सादगी पर बड़ी दया आई. एक बार तो उन्होंने गोपीचंद को दरबार में बुलाने की सोची पर फिर सोचा कि 'उसने चालाकी से अपनी तरफ से लिखत करवा रखी है. इसलिए मजबूर करना कानूनी रूप से ठीक नहीं होगा.’
राजा जी ने रामकिसन से कहा, “मैं कल शाम के समय जब शहर में घूमने आऊँगा तो तुम साहूकार के ठीये पर रहना और मुझको आवाज देना.”

अगले दिन राजा जी के निर्देशानुसार रामकिसन गोपीचंद साहूकार के ठीये पर समय पर पँहुच गया. जब राजा जी हाथी पर सवार होकर बाजार से गुजरे तो बाजार के सभी लोगों का ध्यान उन पर था. खुद गोपीचंद भी बाहर आ खड़ा हुआ था. ऐसे में रामकिसन ने उनको आवाज दी, “राजा जी की जय हो!”

रामकिसन की आवाज सुन कर राजा जी हाथी पर से नीचे उतरे और सीधे रामकिसन के पास जाकर उसको गले लगा लिया और प्यार से बोले, “तुम कल भोजन करने महल में आना. तुमसे बहुत सी बातें करनी हैं.” ये कह कर वे फिर अपने हाथी पर बैठ कर आगे निकल गए.
रामकिसन राजा जी के इस व्यवहार पर हक्का-बक्का था. उधर साहूकार गोपीचंद जो ये सारा नजारा देख-सुन रहा था भयभीत हो गया कि ‘जिस आदमी को वह मामुली कास्तकार समझ रहा था वह तो राजा जी का खास मित्र है.’

उसने रामकिसन को अपने ठीये पर बुलाया और कहा, “तुम कल आये थे, मैंने तुम्हें जेवर देने से मना कर दिया था पर ऐसी कोई बात नहीं है. तुम अपने जेवर लेकर जाओ. मैं मजाक कर रहा था.” ये कहते हुए उसने अपने तिजोरी में से जेवरों की पोटली निकाल कर लौटा दी. और ये भी कहा, “तुम राजा जी के मित्र हो इसलिए मैं तुमसे ब्याज भी नहीं लूंगा.”

रामकिसन खुशी-खुशी जेवर लेकर घर लौट आया. पत्नी विद्यावती की विद्या बहुत काम आई. आज विद्यावती फूले नहीं समा रही थी. उसने पति से कहा, “पहले राजा जी को धन्यवाद देकर आओ.”
                                    ***

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

चुहल - ६

                                (१)            
चुन्नीलाल की चप्पल इतनी घिस गयी थी और जगह जगह से टूट चुकी थी कि मोची ने कह दिया, “अब साहब इसकी मरम्मत नहीं हो सकती है.”

चुन्नीलाल बोले, “यार नेपोलियन ने कहा है कि असंभव शब्द को डिक्शनरी से निकाल दो.”

मोची ने चप्पल वापस करते हुए कहा, “तो आप नेपोलियन से ही ठीक करवा लीजिए.”
                              (२)                              
किसी सुधारक ने एक बोर्ड लिख कर टांग रखा था:
     धूम्रपान के तीन फायदे
[१]   आपके घर में चोरी नहीं होगी, क्योंकि आप रात भर खांसते रहेंगे.
[२]   आपको कुत्ता नहीं काटेगा, क्योंकि आप इतने कमजोर हो जायेंगे कि लाठी साथ मे रखनी पड़ेगी.
[३]   आपको बुढापा नहीं सताएगा, क्योंकि आप बुढापे तक पहुँच ही नहीं पायेगे.
                                (३)
अध्यापक ने क्लास में पूछा, “एक हवाई जहाज पूरब से पश्चिम को ५०० किलो मीटर प्रति घन्टे की रफ़्तार से जाये तो मेरी उम्र बताओ?”
एक लड़का झट से बोला, “सर आपकी उम्र ४० वर्ष है.”
अध्यापक ने आश्चर्य से कहा, “कमाल कर दिया. ये गणित तुमने कैसे लगाया?”
लडका बोला, “सर मेरा बड़ा भाई आधा पागल है, उसकी उम्र २० वर्ष है.”
                                 (४)
कक्षा में एक लड़की ने अध्यापक से शिकायत की कि "क्लास के लड़के मुझे ‘बुआ जी’ कह कर चिढाते है.”
गुरू जी गरम हो गए और लड़कों से बोले, “सब खड़े हो जाओ.”
पूरी क्लास के लड़के खड़े हो गए पर एक लड़का बैठा ही रहा. अध्यापक ने उससे कहा, “तू क्यों नहीं खडा हुआ?”
लडका बोला “सर, मैं फूफा जी हूँ.”
                                  (५)
एक शरारती लड़के दिनेश ने क्लास में अध्यापक से कहा, “मास्साब, कल आपके पिता जी मेरे सपने में आये थे. कह रहे थे कि मैं अपने बेटे से कह दूंगा कि तुमको पूरे सौ नम्बर देना.”
अध्यापक उसकी बात ताड़ गए. बोले, “वे मेरे सपने में भी आये थे और कह रहे थे कि दिनेश को फेल करना है.”
लड़का भर्राई आवाज में बोला, “बड़े कमीने है आपके पिताजी. मुझ से कुछ कहते है, और आपसे कुछ और.”
                                   ***

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2011

जाति-बाहर


दिल्ली रामलीला मैदान के पास जो जयप्रकाश नारायण अस्पताल है, इसका पुराना नाम इर्विन हॉस्पिटल था. वायसराय लार्ड इरविन के नाम से आज भी पुराने लोगों की जुबान पर आता है. खरसिल गाँव का नन्दाबल्ल्भ तिवारी इसमें बतौर ड्रेसर काम करता था. इस बार वह गाँव गया तो अपने भतीजे हीराबल्लभ को भी साथ ले आया और उसके लिए काम की तलाश करता रहा. हीरा दसवीं फेल था इसलिए कहीं ढंग की नौकरी नहीं लग सकी.

एक दिन सिस्टर ऐन्जिला ने बाईचान्स नन्दाबल्लभ से कहा, “कोई पहाड़ी लड़का खाना बनाने वाला हो तो बताना.”
ऐन्जिला और क्रिस्टीना दोनों नर्सें केरला की रहने वाली थी. यहाँ एक साथ स्टाफ क्वार्टर में रहती थी और बहुत दिनों से एक नौकर की तलाश में थी. सिस्टर ऐन्जिला की बात सुन कर नन्दाबल्लभ ने बताया कि “लड़का तो है पर उसको साउथ इन्डियन खाना बनाना नहीं आता है.”

ऐन्जिला ने कहा, “कोई बात नहीं हम उसे सिखायेगा.”

इस प्रकार हीरा उन दो नर्सों की सेवा में लगा दिया गया. घर की साफ़-सफाई कपडे-बिस्तर साफ़ रखने के अलावा चाय- काफी बनाता था, धीरे धीरे इडली, दोसा व साम्भर बनाना भी सीख रहा था. उसको सेवक रखने से दोनों नर्सों को बहुत सहूलियत हो गयी.

छ: महीनों तक सब ठीक चल रहा था. इस बीच सिस्टर क्रिस्टीना को मुम्बई जे.जे. हॉस्पीटल में स्टाफ नर्स का जॉब मिल गया तो वह मुम्बई चली गयी. ऐन्जिला अकेले रह गयी. अब हीरा केवल उसी की सेवा में रह गया. हीरा सीधा सादा व सिंनसियर लड़का था. क्रिस्टीना के जाने के बाद ऐन्जिला उसकी ओर ज्यादे ध्यान देने लगी, सर्दियाँ आ गयी तो गरम कपडे बनवा दिये..

ये मनुष्य प्रबल कमजोरी होती है कि जब दो अपोजिट सैक्स के लोग साथ साथ रहें तो एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो ही जाते हैं. सच तो ये था कि ऐन्जिला हीरा से प्यार करने लगी थी. हालाँकि वह उससे उम्र में आठ साल छोटा था. ऐन्जिला हीरा को साथ में हर रविवार चर्च ले जाने लगी. हीरा भी साहिबा की बातों में पूरा आसक्त हो चुका था. उसके कहने पर उसने क्रिश्चियन धर्म अपना लिया और कुछ ही दिनों बाद विधिवत शादी कर ली. अब वह हीरा से बदल कर हैरिसन हो गया.

उधर नन्दाबल्लभ को ये बात बहुत देर से मालूम हुई. तब तक गाड़ी बहुत आगे निकल चुकी थी. चर्चाएँ व चटाखेदार बातें स्टाफ में व परिचितों में होती रही पर 'मियाँ बीवी राजी तो क्या करेगा काजी' वाली बात हो गयी.
खरसिल के और कई लोग दिल्ली में नौकरी पर थे. उन्होंने हीरा के ईसाई होने और मद्रासी नर्स से शादी करने की बातें तुरन्त गाँव तक पहुँचा दी. गाँव में बवंडर सा आ गया. आजतक किसी ने ऐसी हिमाकत नहीं की थी.

पंचायत ने हीरा के बाप चंद्रबल्लभ को तलब किया जहां उसने पंचायत की उपेक्षा करते हुए कह दिया, “तुमको जो करना है कर लो मेरी एक ही औलाद है. मैं अपने बेटे को नहीं त्याग सकता हूँ.”

पंचायत ने एक स्वर से चंद्रबल्लभ को जाति से बाहर करने का फरमान जारी कर दिया. इस प्रकार चंद्रबल्लभ को सपरिवार बहिष्कृत कर दिया गया. गाँव में कुछ समय उपेक्षित रहने के बाद चंद्रबल्लभ सब कुछ छोड़-छाड कर
पत्नी नरुली देवी सहित रुद्रपुर के पास दिनेशपुर में अपने ससुरालियों के पास चला आया. जब ऐन्जिला को ये सब मालूम हुआ तो उसने हैरिसन के मा-बाप को भरपूर आर्थिक मदद दे कर उनका दिल जीत लिया. इस बीच हैरिसन को भी सुपर मार्केट में सेल्स मैंन की नौकरी मिल गयी.

चंद्रबल्लभ ने तीन एकड़ जमीन खरीद कर दिनेशपुर में अपनी जिंदगी की ए बी सी फिर से शुरू कर दी.
दिल्ली में बेटे-बहू से उसका संपर्क बना रहा. कालांतर में हैरिसन और ऐन्जिला के दो बेटों का जन्म हुआ. खुशी में दादा-दादी भी शामिल हुए. खरसिल की तरफ उन्होंने कभी जाने की सोची भी नहीं.

ये घटना ३० वर्ष पूर्व की है. इस बीच यमुना में लाखों मन पानी बह चुका है. हैरिसन के दोनों बेटे पढ़ लिख कर बहुत आगे बढ़ गए है बड़ा लड़का स्टीफन तिवारी I.A.S. होकर दिल्ली में ही सेंट्रल सेक्रेट्रीएट में नियुक्त है तथा छोटा लड़का डाक्टर फ्रेंकलिन तिवारी M.S. करके आल इंडिया इंस्टिट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज में कार्यरत है. ऐन्जिला हाल में मैट्रन के पद से रिटायर हो गयी है. उसने पहले ही गुडगाँव में सुशांत लोक में अपना चार बेडरूम वाला घर ले लिया था. अपने सास-ससुर को अपने पास ही रखा है. उनकी खबर रखने वाले बताते हैं कि उनकी बड़ी अच्छी देखभाल होती है.      


  पिछली गर्मियों में स्टीफन और फ्रैकलिन दोनों ही अपने दादा-दादी की इच्छा पर अपनी होंडा सिटी कार में पहाड घुमाने ले गए. खरसिल गाँव जाकर कर चंद्रबल्लभ को आश्चर्य हुआ कि उनकी पीढ़ी का कोई भी व्यक्ति अब वहाँ मौजूद नहीं था. ज्यादातर परिवार भाबर की तरफ निकल गए थे. नई पीढ़ी के लोगों को उन्होंने ज्यादा परिचय देना ठीक नहीं समझा.

यहाँ आ कर चंद्रबल्लभ ने अपने पोतों को बहुत सी पुरानी बातें बताई. गाँव छोड़ने का कारण बताया जिसे सुन कर वे रोमांचित थे.

स्टीफन ने अपनी डायरी में इस पुरानी कहावत को दुहराया ‘Every adversity brings a seed of equivalant advantage with it,’ जिसका अर्थ होता है हर दुर्भाग्य अपने साथ उसी के बराबर अच्छाई के बीज भी लाता है.
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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

हमारी आवश्यकताएं

हम मनुष्यों की इच्छायें, ऐषणायें, व आकांक्षाएं कभी कम नहीं होती है; चाहे वह धन संबंधी हों, जायदाद संबंधी, या अतृप्त इच्छाओं के बारे में हों. ये तभी दूर होती हैं जब मनुष्य अंतर्मन से संन्यास की स्थिति में आता है.

एक मिलाद शरीफ में कुछ इसी आधार की कथा सुनी थी कि हजरत शेख इब्राहीम बड़े अल्लाह्परस्त बादशाह थे. सब तरफ से अल्लाह का फजल भी था, लेकिन वे रहते थे पूरे ऐशोआराम के साथ. एक दिन परवरदीगार ने सोचा कि बिना तपस्या के शेख इब्राहीम को जन्नत कैसे नसीब हो सकती है? इसलिए वे एक किसान का वेश रख कर अचानक शेख इब्राहीम के शयनगार में प्रकट हो गए. तब आखें बंद करके हाथ में अल्लाह के नाम की माला फेर रहे थे. खटपट की आवाज से वे चैतन्य हुए तो पाया कि सामने एक अजनबी किसान खडा है. उन्होंने उससे पूछा, “कौन हो भाई तुम?”
उसने उत्तर दिया, "मैं किसान हूँ.”
बादशाह को बड़ा आश्चर्य हुआ और पूछा, ”यहाँ क्या करने आये हो?”
किसान बोला, “मेरा ऊँट खो गया है. उसे ढूढ़ रहा हूँ.”
बादशाह ने विस्मय पूर्वक कहा, “ये बादशाह का आरामगाह है, और तुम यहाँ ऊँट ढूंढ रहे हो. यहाँ कहाँ मिलेगा ऊँट तुमको?”
इस पर किसान ने बड़ी तसल्ली से कहा, “जब मखमली बिस्तर पर आपको अल्लाह मिल सकता है तो मुझे ऊँट क्यों नहीं मिल सकता है?”
ये कह कर वह किसान रूपी प्रेरणा अंतर्ध्यान हो गया और बादशाह के ज्ञान को उजागर कर गया कि वास्तव में अति ऐशोआराम से उपरवाला खुश नहीं हो सकता है. शेख इब्राहीम को संन्यास भाव प्राप्त हो गया. अत: दूसरे ही दिन उसने राज काज सब छोड़-छाड कर अपने पुत्र को गद्दी सौंप दी और गहन तपस्या हेतु घर से निकल गया. निकलते समय वह अपने साथ एक तकिया, एक लोटा, और एक हाथ का पंखा जरूर ले गया क्योंकि इन तीनो वस्तुओं की उसे हमेशा जरूरत रहेगी, ऐसा सोचा गया.

जब वह अनंत की सोच लेकर चला तो राह में उसने अनेक अनुभव प्राप्त किये. उसने देखा कि एक व्यक्ति सिराहने पर ईंट लगा कर रहा था. शेख ने तकिया तुरन्त फैंक दिया. उसने सोचा उसके बिना भी काम चल सकता है तो फालतू क्यों इसे ढोया जाए.

आगे जब वह एक नखलिस्तान में पहुँचा तो उसने पाया कि एक बन्दा अंजुरी से पानी उठा कर पी रहा था अत: उसने लोटे को भी त्याग दिया क्योंकि उसने पाया कि प्रत्यक्ष रूप से लोटे के बिना भी सरलता से काम चल सकता है.

यों विरक्त भाव से जब वह गर्म प्रदेश में घूम रहा था तो उसने देखा एक व्यक्ति अपने कुर्ते की पाट से ही हवा कर रहा था. शेख इब्राहीम ने खजूर से बने उस हाथ के पंखे को भी फेंक डाला.

इसके बाद हजरत शेख इब्राहीम को अल्लाह दुबारा मिले या नहीं, उनको जन्नत नसीब हुई या नहीं, ये दीगर बात है; लेकिन इस कथानक का सारांश यही है कि हम सांसारिक व्यक्तियों को अपनी आवश्यकताओं व इच्छाओं को कम करते रहना चाहिए. वैसे एक नीति-दोहे में हम पढ़ते आये हैं:
          गो धन, गज धन, बाजि धन और रतन धन खान
          जब  आवे  सन्तोष  धन  सब  धन धूरि सामान.
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