सोमवार, 5 दिसंबर 2011

दु:खों की जड़


देश के लिए प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिकों के परिवारों को सरकार की तरफ से अनेक प्रकार की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया है. पुराने नियम कानूनों में सारी राशि उनकी विधवाओं के नाम पर ही आवंटित की जाती थी किन्तु बृद्ध व लाचार माता-पिता इसमें किसी प्रकार हिस्सेदार न होने के कारण, कई मामलों में दोहरे शोक-कष्ट में पड़ जाते थे. जहाँ बहुएँ सास-ससुर को तिरस्कृत कर देती थीं, वहाँ झगड़े-लफड़े भी होते रहे हैं. ये भी बिडम्बना ही है. बहुत से माता-पिता इसी विषय में अदालत का दरवाजा भी खटखटाते रहे पर न्याय तो क़ानून के खूंटे से बंधा होता है, उनको निराशा ही हाथ आती थी. अत: सरकार ने सारी बातों को ध्यान में रख कर अब ये शेयर आधा आधा कर दिया है ताकि माता पिता मोहताज ना रहें.

लंमगड़ा के स्वर्गीय कैप्टन जगदीश सिंह का केस इस सम्बन्ध में अनोखा है कि उसकी बृद्धा माँ और विधवा पत्नी को जिलाधिकारी ने अपने पास बुला कर सरकार की तरफ से गहरा दु:ख व्यक्त किया और दस लाख रुपये सहायता राशि स्वीकृत होने के सूचना दी. जगदीश के पिता तो पहले ही गुजर चुके थे, माता भगवती देवी को जब बताया गया कि आधी राशि यानि पाँच लाख रुपये उनके खाते में डाले जायेंगे जिसके लिए अलग से व्यक्तिगत खाता किसी बैंक या पोस्ट आफिस में खोलना होगा तो वह अनपढ़ ग्रामीण महिला जिलाधिकारी पर बहुत बिगड़ गयी, बोली, तुम मेरे और बहू के बीच झगड़ा करवाना चाहते हो, मुझे अलग खाता नहीं खोलना है. डी. एम. साहब ने इस विषय में विस्तार से भविष्य की समस्याओं व नियम क़ानून का हवाला दिया, बहुत तरह से समझाया, पर वह नहीं मानी. एस.डी.एम. (जो स्वयं कुमाउनी थे) को समझाने की जिम्मेदारी दी गयी पर वे भी समझाने में विफल रहे. बुढ़िया को बहू पर अति विश्वास था जीवन के शेष दिन उसी के आश्रय में रह कर काटने का इरादा था. अस्तु प्रशासन ने मजबूर होकर सारी राशि जगदीश की विधवा ज्योति के नाम जारी कर दी.

कहा जाता है कि पैसा अपनी रंगत अवश्य दिखाता है. इतनी बड़ी राशि मिलने पर ज्योति को पंख लग गए. कुछ रोजगार तलाशने के चक्कर में उसका नैनीताल शहर में आना-जाना होने लगा. भरी जवानी में विधवा हो जाना भी एक अभिशाप है. जब शरीर को भूख लगती है तो तमाम सामाजिक व धार्मिक मान्यताएं बेमानी लगने लगती हैं. ऐसा ही हुआ एक नौजवान हरमिंदर सिंह से ज्योति की आशनाई हो गयी और दो साल के अंतराल में ही वह अपनी सारी चल सम्पति ले कर उसके साथ फुर्र होकर कहीं पंजाब की तरफ चली गयी. कहाँ गयी, कैसे गयी, भगवती देवी को कुछ भी नहीं मालूम, उसने तो काठगोदाम तक आने वाली रेल भी कभी नहीं देखी थी. इसलिए सब तरफ अन्धकार ही अन्धकार था. परिवार में कोई तीसरा सदस्य भी नहीं था जो भाग दौड़ करता. ग्राम सभा के लोगों ने जिला प्रमुख व डी.एम. साहब के पास समाचार पहुंचाया पर अब कुछ नहीं हो सकता था.

अशिक्षा व अज्ञानता बहुत से दु:खों की जड़ है. बुढ़िया अब भीख मांग कर गुजारा कर रही है.
(इस कहानी में पात्रों व स्थान के नाम काल्पनिक हैं पर प्रकरण सत्य घटना पर आधारित है.)
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रविवार, 4 दिसंबर 2011

विडम्बना


हाथों से ताम्बे के गागर बनाने वाले टम्टा बिरादरी के लोग कई पीढ़ियों से अल्मोडा के खरही गाँव में रहते आये हैं. यह एक शिल्प है, जिसमें बहुत शारीरिक श्रम करना पड़ता है. पहाड़ में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जहाँ पानी लाने अथवा रखने के लिए गागर ना हो. बेटी के कन्यादान में दहेज के बर्तनों के साथ गागर भी देना एक आम परम्परा है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी ताम्बे के बर्तन में रखा गया जल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है. ऐसा कहा जाता है कि ये पानी में जीवाणु संक्रमण को समाप्त करता है.

पिछली शताब्दी में जब सामाजिक व राजनैतिक चेतना जागृत हुई, विशेष रूप से स्वतंन्त्रता प्राप्ति के बाद, नई पीढ़ी को इस पुस्तैनी धन्धे में रूचि कम हो गयी और नौजवान लोग नौकरियों के पीछे लालायित होकर मैदान की तरफ पलायन करने लगे. जो पढ़-लिख गए वे आरक्षण का लाभ लेते हुए सरकारी नौकरियों में फिट हो गये और जो कम पढ़े-लिखे थे वे आम पहाड़ी लड़कों की तरह दिल्ली-लखनऊ में छोटे-मोटे रोजगार तलाश कर जीविका अर्जित करते रहे हैं. आज उस गाँव में स्वर्गीय बहादुर राम टम्टा जी सभी के आदर्श पुरुष हैं, जो अपनी बुद्धि व अध्यवसाय से प्रशासन तथा राजनीति के ऊंचे मुकाम तक पहुंचे थे. उन्होंने अनेक नौजवानों की कई तरह से मदद की और मार्गदर्शन भी किया.

इस कहानी का नायक गोविन्द राम टम्टा, जो अपना उपनाम ताम्रकार लिखने लगा था, आठवीं पास करके फिटर ट्रेड में अल्मोड़ा औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र से ट्रेनिंग लेकर मुरादाबाद आ गया, जहाँ शहाबुद्दीन ठेकेदार ने उसे अपने पास काम पर रख लिया. शहाबुद्दीन पुल बनाने के ठेके लिया करता था. जब अफ़्रीकी देश लीबिया में कर्नल गद्दाफी का सूरज चमक रहा था तो शहाबुद्दीन ने वहाँ पुल बनाने का बड़ा काम ले लिया. अपने दो सौ कर्मचारियों (इंजीनियरों, कारीगरों, व मजदूरों) को लेकर वहाँ निर्माण कार्य करने लगा. गोविन्द राम भी उसकी टीम का एक विश्वसनीय सदस्य बना रहा.

शहाबुद्दीन ने तो सात साल में करोड़ों रूपये कमाए और गोविन्द राम ने भी लाखों कमा कर अपनी पत्नी बिशनुली को भेजे. पहाड़ की ये तासीर है कि यहाँ रूपये में बरकत बहुत कम है. हर महीने करोड़ों के मनीआर्डर अल्मोड़ा मुख्य डाकघर से होकर वितरित होते रहे हैं, पर ग्रामीण अंचलों में लोगों के रहन सहन के स्तर में जैसा सुधार होना चाहिए था नहीं हुआ है.

जब गोविन्दराम लीबिया से लौट कर घर आया तो पहाड़ में उसका मन बिलकुल नहीं लगा. वह हल्द्वानी आकर एक ऑटो खरीद कर चलाने लगा. तब जमीन सस्ती थी, तल्ली हल्द्वानी में तीन बीघा खरीद कर एक छोटा सा घर बनाया तथा बीवी बच्चों को भी हल्द्वानी ले आया. बिशनुली बड़े तेज स्वभाव की थी, थोड़ा कर्कश भी थी लेकिन थी बड़ी मेहनती. उससे निठल्ले बैठा नहीं गया इसलिए एक दुधारू भैंस खरीद कर व्यस्त रहने लगी. बची जमीन पर चारा बोकर भैंस के राशन का भी इन्तजाम कर लिया. दूध ऐसी चीज है कि अड़ोसी-पड़ोसी सभी लाइन लगा कर खरीदने को तैयार रहते हैं. कमाई का एक और जरिया हो गया.

इस बीच बच्चे तो पढाई की धुन में लग गए, गोविन्द राम को नकद कमाई मिल रही थी सो एक पव्वा शराब का रोज ही गटकने लग गया. शराब चीज ही ऐसी है कि मुँह लगने के बाद छूटती ही नहीं. बीवी की डांट तो पड़ती ही थी अत: हर सुबह तौबा करता था और शाम को फिर टुन्न होकर घर लौटता था. ये आम दिनचर्या थी. उसी की नहीं, उसके जैसे तमाम लोग ऐसे ही दिन काट रहे थे.

पिछली सर्दियों मे कुछ ज्यादा ही ठण्ड पड़ी और असावधानी के चलते गोविन्द राम को न्युमोनिया हो गया, मरते-मरते बच पाया. डाक्टर ने ऑटो न चलाने की ताकीद कर दी तो बिशनुली ने गोविन्द राम के न चाहते हुए भी ऑटो बेच दिया. अब गोविन्द राम पैदल हो गया, कोई काम नहीं था और जेब खाली रहने लगी. वह पव्वे के लिए बिशनुली का मोहताज हो गया. बिशनुली दस खरी खोटी सुनाकर बीस रूपये देती थी. अब नतीजा ये हुआ कि इंग्लिश ब्रांड के बजाय देशी ठर्रे से शौक पूरा करने लगा.

गोविन्द राम को कुढ़न तो बहुत होती थी क्योंकि बिशनुली का साम्राज्य उसी की मेहनत व कमाई के बदौलत फल-फूल रहा था. घर में राज बीवी का है तो वो कर भी क्या सकता था? इस तरह कब तक दोस्तों से उधार लेता रहता. एक दिन उसने ठान ली कि अगर बिशानुली रूपये देने में कुन्नट करेगी तो उसकी खैर नहीं होगी.

वह घर आया, उसने बिशनुली से बीस रुपयों की मांग की. बिशनुली भैस का चारा बना रही थी, झिड़क कर बोली, रूपये पेड़ पर थोड़े ही उग रहे हैं? दारू में बर्बाद करने को नहीं हैं मेरे पास रूपये. ये सुन कर गोविन्द राम का स्वाभिमान नकारात्मक रूप से जाग उठा. वह सीधे घर में घुसा, अनाज के ड्रम में डालने के लिए जो सल्फास की गोलियां रखी हुई थी उनमें से ६ गोलियां पानी के साथ निगल ली. वह तो जहर था, थोड़ी देर में असर होने लगा तो बच्चों को बुलाकर कहा  मैंने सल्फास की गोलियाँ खा ली हैं, अब मैं मरने जा रहा हूँ. बच्चों ने माँ को बताया पर उसने इस बात को बहुत हल्के से लिया क्योंकि ऐसे नाटक वह अक्सर देखती रहती थी. पर इस बार गोविन्द राम ने सीमा पार कर दी थी. बड़ी देर में बिशनुली की समझ में आया कि गजब हो गया. गोविन्द राम को जल्दी से जल्दी अस्पताल ले जाया गया पर तब तक पंछी उड़ चुका था.

अब बिशनुली विलाप करती रहती है कि मात्र बीस रुपयों की खातिर उसने अपने प्यारे सुहाग को खो दिया. याद कर कर के उसके आंसू थमने का नाम नहीं लेते है.

ये मुई शराब चीज है ही ऐसी, खेलते-खाते घरों में अन्धेरा कर जाती है.
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शनिवार, 3 दिसंबर 2011

दुलारी


मेरा नाम विश्वबंधु है. घर में मुझे केवल बन्धु नाम से पुकारा जाता है. मैं सरस्वती विद्या-मंदिर के पांचवीं कक्षा का छात्र हूँ.

मेरी बूढ़ी दादी ने पापा से बहुत पीछे पड़ कर घर के अहाते में एक नींबू का पौधा लगवाया. पापा कहीं नर्सरी से खरीद कर इसे लाये थे. ये पौधा खाद-पानी मिलने से बहुत जल्दी बड़ा हो गया पर इसकी बढ़त एक झाड़ी के रूप में हो गयी. दादी इसकी छंटाई भी नहीं करने देती है. पिछ्ले दो सालों से इसमें फल भी आने लगे हैं. दादी बहुत खुश होती है क्योंकि उसको नींबू के स्वास्थ्यकारक गुणों की पूरी जानकारी है उनका कहना है कि नींबू के पेड़ में वैद्य धनवंतरी का निवास होता है. लेकिन मेरी खुशी इस बात से है कि इस झाड़ी में एक बहुत छोटी चिड़िया हमिंग बर्ड (जिसका नाम मैंने दुलारी रखा है) ने पिछली बरसात में छोटा सा गोल घोंसला बना कर तीन अंडे दिए थे. थोड़े दिनों के बाद उसमें से तीन प्यारे-प्यारे कंचे के समान बच्चे निकले और जल्दी बड़े होकर उड़ने लगे थे.

मैं उन दिनों हर वक्त चिड़िया के बच्चों के ही सपने देखा करता था. स्कूल में भी मैंने मैडम की डांट खाई थी क्योंकि मैं अपनी कापी में चिड़िया के बच्चों की खुली चोंच, पतली लाल गर्दन व गुलगुले पेट के चित्र बनाते रहता था. स्कूल से दौड़ कर घर पहुँचने के बाद मैं सबसे पहले चिड़िया के पोथीलों की कुशल लेता था.

नींबू की झाड़ी में बहुत नुकीले कांटे थे इसलिए घोंसले के लिए ये बहुत ही सुरक्षित जगह थी. चिड़िया की इस बुद्धिमानी पर मुझे बड़ा ताज्जुब होता है. एक बिल्ली को मैंने कई बार वहाँ चक्कर काटते हुए व ललचाई नजरों से घोंसले की तरफ आँखें गड़ाये हुए देखा था. मैं उसे भगा देता था. बिल्ली की उपस्थिति की खबर खुद चिड़िया की आर्त श्वर वाली चहचहाहट से मालूम पड़ जाती थी.

चिड़िया के बच्चों को देखकर मुझे ना जाने ऐसा क्यों लगने लगा जैसे हमारे घर छोटे भाई-बहिन आ गए हों. वे हल्के से पंख निकलने के बाद प्यारे-प्यारे फूल जैसे गुदगुदे थे. चिड़िया को झाड़ी के आस-पास मेरी उपस्थिति भी अच्छी नहीं लगती थी. उसे डर रहा होगा कि कहीं मैं उसके बच्चों को चुरा ना लूँ. पर मेरे व्यवहार से धीरे-धीरे उसका डर कम होता गया.

एक बार एक बच्चा घोंसले से नीचे जमीन पर आ गिरा. चिड़िया ऊपर नीचे फुदक कर अपनी परेशानी व्यक्त कर रही थी पर मेरे सामने भी बच्चे को वापस घोसले तक पहुंचाना बड़ी समस्या हो गयी. बच्चे को मैंने हाथों में उठा तो लिया लेकिन काँटों की वजह से कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. मैंने दादी को बताया तो उन्होंने बड़ा आसान तरीका बता कर समस्या का हल कर दिया. रसोई की दाल वाले लंबे डाडू (चमचे) में बच्चे को रख कर सीधे घोंसले में उलट दिया. मुझे दादी की तरकीब बहुत अच्छी लगी. वह बच्चा जरूर जरूरत से ज्यादे चँचल था. कई बार फुदक कर नीचे आ पड़ता था और उसको वापस रखने की कवायद मुझे करनी पड़ती थी. मेरे इस क्रियाकलाप से चिड़िया को मुझ पर अवश्य भरोसा हो गया होगा क्योंकि अब वह मेरी उपस्थिति पर भाग दौड़ नहीं करती थी.

बरसात के बाद अपने बच्चों को लेकर दुलारी गायब हो गयी. घोंसला खाली हो गया. मै जब भी नींबू के पेड़ की तरफ देखता था तो उदास हो जाता था. पर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब इस साल अगस्त में दो अलग अलग घोंसले बनाने की प्रक्रिया नींबू की झाडी में फिर शुरू हो गयी. मेरी दादी ने बताया कि जरूर ये उसी चिड़िया के बच्चे होंगे क्योंकि चिडियाँ अपने जन्मस्थान को नहीं भूलती हैं.

मैंने बिल्ली से बचाव के लिए झाड़ी के नीचे भी अतिरिक्त कांटे लगा दिए हैं. मैं इन्तजार कर रहा हूँ कि दुलारी के नाती-पोते बड़े हों और मैं उनकी सोहबत का आनंद ले सकूं.
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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

औकात में रहा करो


दिनेशचंद्र कांडपाल मूल रूप में हमारे पड़ोसी गाँव, ढोंन का रहने वाला हैं. उसके पिता एक साधारण कास्तकार थे. वह और मैं पहली कक्षा से ही साथ साथ पढ़ते रहे. यद्यपि घमंड करने वाली जैसी कोई बात नहीं थी फिर भी दिनेश शुरू से ही अपने आप को सुपर समझता था. दूसरों से बात-बात में कहता था, औकात में रहा करो.

गाँव के स्कूल के बाद हम दोनों शहर के स्कूल में भी साथ-साथ पढ़े और फिर कॉलेज में भी एक ही साथ नैनीताल आ गए. वह टोटल मार्क्स लाने में कभी भी मुझे पीछे नहीं कर पाया जिसका उसको अफ़सोस तो था लेकिन उसका बड़बोलापन या ओछापन हमेशा मुझ पर हावी रहा क्योंकि मेरे घर की आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं रही जिसके बारे में उसको पूरा मालूम था.

बी.ए. करने के बाद मुझे न्याय विभाग में क्लर्क की नौकरी मिल गयी. मैं तहसील कोर्ट में बतौर पेशकार काम करने लग गया. उधर दिनेश ने इकोनोमिक्स में एम.ए. किया उसके बाद नौकरी की तलाश शुरू की. वह बहुत दिनों तक बेरोजगारी झेलता रहा. उस बीच कई बार वह मेरे आवास पर भी आता रहता था. उसके बड़े बड़े सपने थे. वह ये जानते हुए भी कि में क्लर्क हूँ, बाबू लोगों की औकात पर छींटाकसी करने में नहीं चूकता था.

भगवान ने उसके साथ थोड़ा सा अन्याय जरूर किया था कि वह शक्ल सूरत से अनाकर्षक व बेडौल था पर उसे इस बात का कोई मलाल नहीं था. औरों के सामने वह अपनी पर्सनैलिटी को इस तरह जाहिर करता था कि इसमें उसकी कोई गलती नहीं है, थी भी नहीं.

सन १९६२ में जब हिंद-चीन के लड़ाई लगी तो वह आर्मी में शार्ट-सर्विस कमीशन पाकर भर्ती हो गया और उसके सिविलियन विंग के सप्लाई डिपार्टमेंट में किसी जिम्मेदार पद पर नियुक्त हो गया. करीब सात साल तक उसने वहां काम किया. अब तो उसके ठाट निराले हो गए थे. लोगों से मैं भी सुनता था कि वह अब वी.आई.पी. का सा व्यवहार करने लगा था. अपने निकट रिश्तेदारों को भी तुच्छ समझकर व्यवहार करता था. यहाँ वह वास्तव में अपनी औकात भूल रहा था. ऊपर वाले का निजाम पक्का रहता है. दिनेश खरीद फरोख्त के धन्धे में हेरा-फेरी करते हुए पकड़ा गया और सस्पेंड कर दिया गया. इस बीच उसने बहुत रुपया कमा भी लिया था. सस्पेंड होते ही उसने रामनगर आकर बस स्टेशन के पास एक मुख्य जगह पर आधा एकड़ जमीन खरीद ली. उस पर एक बढ़िया सी दुमंजिला बिल्डिंग बना कर एक बैंक को मोटे किराए पर लीज पर दे दी. खुद एक टैक्सी खरीद कर पर्यटकों की सेवा में लग गया. सस्पेंसन का केस लंबा चला, और जैसा कि आम तौर पर अपने देश में होता है एक दिन सबूतों के अभाव में वह बरी हो गया तथा बैक वेजेज व पेन्शन सहित रिटायर हो गया.

टैक्सी  संचालन के दौरान एक दिन दिनेश ने अखबार में उत्तर प्रदेश सरकार की नायब तहसील के पदों की रिक्तियों को देख कर अपना आवेदन भेज दिया, परीक्षा में बैठा, फलस्वरूप नियुक्ति पा गया. नायब तहसीलदार रहते हुए दो साल बाद उसने सरकार को शार्ट सर्विस कमीशन में की गई सात साल की सेवा काल को भी जोड़ने के लिए प्रतिवेदन भेजा जो स्वीकार कर लिया गया, और वह सीनिओरिटी पाकर तहसीलदार बन गया. गढ़वाल व कुमायूं मंडलों से होता हुआ एक दिन वह मेरे कोर्ट में न्यायिक अधिकारी बन कर आ गया और मैं वहीं का वहीं उसका पेशकार. मुझे उससे कोई जलन नहीं है, पर मैं देख रहा था कि जायज-नाजायज तरीकों से उसने अकूत सम्पति जमा कर ली थी. उसका बेटा नैनीताल में शेरवुड में पढ़ रहा था और मेरा सरकारी स्कूल में. वह अब सामाजिक समारोहों में बहुत कम शामिल होता था क्योंकि वह सचमुच वी.आई.पी. हो चुका था. उसके बेटे मनोज ने जब एन.डी.ए. में एडमिशन पा लिया तब तो उसके घोड़े सातवें आसमान में उड़ने लगे.

वह सीढियां चढता गया, कमिश्नर हो गया. उसका दायरा मेरे पहुँच से काफी दूर हो गया. लोग उसके बारे में चर्चाए जरूर करते थे, और उसके भाग्य को अध्यवसाय व प्रबल भाग्य की देन समझते थे.

कभी कभी आदमी शिखर पर पहुँच कर ओंधे मुँह गिर जाता है. कुछ ऐसा ही हुआ विजिलेंस डिपार्टमेंट ने उसे दो लाख रूपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया. वह तुरन्त प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया. उसके बैंक खाते सीज कर दिए गए. घर खंगाला गया तो करेन्सी नोटों का अम्बार मिला. उसे जेल हो गयी.

समय खराब हो तो बनते काम भी बिगड़ने लगते हैं. दुर्भाग्य अकेले नहीं, अनेक आपदाओं को साथ लेकर आता है. उसका बेटा मनोज मेजर हो गया था जो काश्मीर बोर्डर पर उसी दौरान शहीद हो गया.

सारा पटाक्षेप एक साथ हो गया. उसने सन्देश भेज कर मुझे बुलाया. मैं अपने एडवोकेट बेटे के साथ उससे मिलने जेल में गया. उसके आँखों में पश्चाताप के आंसू थे, बोला, भैया, मैं अपनी औकात भूल गया था. उसी का नतीजा भुगत रहा हूँ.

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उसकी जमानत नहीं हो पाई है.
                                         ***

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

चुहुल - १०


                                   (१)
चिड़ियाघर के गेट पर एक आदमी बड़े जोर-जोर से रो रहा था. रोने का कारण पूछने पर उसने बताया कि चिड़िया घर का बड़ा हाथी मर गया है.
प्रश्न : क्या हाथी तुम्हारा था?
उत्तर : हाथी तो सरकारी था.
प्रश्न : इसमें तुम क्यों रो रहे हो ?
उत्तर (रोते हुए): साहब ने मुझ से कब्र खोदने के लिए कहा है.

                                     (२)
एक महिला गर्भवती थी. संयोग से उसकी कुतिया भी ब्याने वाली थी. महिला ने अपने ५ वर्षीय बेटे को जानकारी देते हुए बताया कि कुतिया जल्दी बच्चे देने वाली है और जब कुतिया ने ६ बच्चों को जन्म दिया तो लड़के ने उत्सुक्ताबस उनको देखा और बहुत खुश हो गया.

कुछ दिनों बाद उसकी मम्मी डिलीवरी के लिए अस्पताल गयी और एक बच्चे को जन्म दिया. जब बड़े बेटे को अस्पताल ले जाया गया तो छोटे मुन्ने को देखने के बाद बोला, बाकी पाँच कहाँ हैं?

                                      (३)
एक रेस्टोरेंट में ग्राहक ने चाय मंगवाई. वेटर चाय लेकर आया. एक सिप लेने के बाद ग्राहक ने वेटर से शिकायत की कि "चाय में घासलेट की बदबू आ रही है."

वेटर बोला, तब तो साहब, ये चाय नहीं है ये काफी है क्योंकि हमारी चाय में तो साबुन की खुशबू आती है. गलती से काफी सर्व हो गयी है.

                                       (४)
विवाहोत्सव के बाद तीसरे नम्बर की बेटी की बिदाई पर कन्या की माँ कुछ जरूरत से ज्यादा ही रो रही थी. ये देख कर खुद दुल्हन परेशान हो गयी. आखिर उसने माँ से पूछ ही डाला, माँ इतना क्यों रो रही हो?
माँ बोली, बेटी, मैंने तेरे पापा से इस रिश्ते के लिए मना किया था क्योंकि मेरे पिछले अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं.
कैसे अनुभव?" बेटी ने पूछा.
माँ ने बताया, तेरी बड़ी दीदी के शादी दोहद में हुई और उसके जुड़वां बच्चे हुए, मझली की शादी त्रिनगर में हुई, उसने बड़े कष्टों के साथ तीन बच्चों को एक साथ जन्म दिया. अब तेरी शादी चौथ के बरवाडा में हो गयी है तेरा क्या हाल होगा यही सोच कर रोना आ रहा है.

                                         (५)
एक आदमी ने बहुत बार्गेनिंग करके मात्र दो सौ रुपयों में एक कमरा किराए पर लिया. उसमें रहने के एक महीने के बाद उसने मकान मालिक से शिकायत की कि कमरे में रात भर चूहे नाचते हैं.
मकान मालिक ने जवाब दिया, दो सौ रुपयों में आप श्रीदेवी को तो नहीं नचा सकते हैं.
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