रविवार, 15 अप्रैल 2012

शुभ आशीषें (माँ के पत्र - 6)

                        छठा पत्र

प्यारी बिटिया,
सदा सुखी रहो.
तुम्हारा दिल्ली से लौटकर लिखा गया पत्र मुझे मिल गया है. तुमने दिल्ली प्रवास में दर्शनीय स्थल एवं ऐतिहासिक महत्व की  इमारतें देखी, उन सबके बारे में तुमको अवश्य ही जानकारी भी दी गयी होगी. दिल्ली हमारे देश का दिल है. पौराणिक काल में इनका नाम इन्द्रप्रस्थ था, महाभारत में इसका उल्लेख आता है. मैंने बहुत वर्ष पहले दिल्ली को देखा था, तब दिल्ली छोटी हुआ करती थी. अब आबादी बढ़ने से तथा नगर के विस्तार होने से इसकी काया पलट हो गयी है. कहा जाता है कि Rome was not built in a day. उसी तरह दिल्ली भी एक ही दिन में ऐसी नहीं बनी है. इतिहास गवाह है इसने बहुत विलासिता और बड़ी बड़ी लड़ाईयां व उथल-पुथल भी झेली हैं. आज इनका जो स्वरुप है, उसमें जहाँ कुतुबमीनार, लालकिला, जामा मस्जिद जैसी मुगलकालीन इमारतें है, वहीं ब्रिटिश काल में बनी संसद भवन, इंडिया गेट और राष्ट्रपति भवन जैसी शानदार इमारतें हैं. वहीं स्वतंत्र भारत में राजघाट पर बनी महात्मा गांधी जी, नेहरू जी, इंदिरा जी, शास्त्री जी तथा अन्य राष्ट्र नायकों के स्मारक हैं.

चिड़ियाघर, गुड़ियाघर, बिरला मंदिर, बहाई मंदिर और अक्षरधाम मंदिर आदि अनेकों दर्शनीय स्थल हम सबके आकर्षण के केन्द्र बन गए हैं. तुमने नेहरू प्लेनेटोरियम देखा, अंतरिक्ष की सैर जैसा आनंद लिया, यह जानकार बहुत अच्छा लगा. जंतर-मंतर के बारे में तुमने जो संदेह व्यक्त किये हैं, उनका समाधान जरूरी है. यह एक वेधशाला है, जिसे अठारहवीं शताब्दी में जयपुर के महाराजा सवाईसिंह द्वितीय ने बनवाया था, जैसा कि तुमने देखा होगा, यह चार भागों में विभक्त है-- सम्राट यंत्र, राम यंत्र, जयप्रकाश यंत्र और मिश्र यंत्र. इन पत्थरों पर खींची गयी रेखाओं एवं बनाए गए चिन्हों से सूर्य की गति तथा नक्षत्रों की स्थिति के बारे में सही जानकारी मिलती है. सम्पूर्ण नक्षत्र विज्ञान को एक स्थान पर स्थाई रूप दिया गया है.

इसकी उपयोगिता के विषय में जानने से पहले तुमको ये मालूम होना चाहिए कि ज्योतिष विद्या क्या है? प्राचीन काल से ही मनुष्य ग्रहों-नक्षत्रों की स्थतियों पर अपने अनुमान लगाता आ रहा है. अभी कुछ समय पहले तक  चंद्रग्रहण, सूर्यग्रहण पुच्छल तारा आदि के विषय में अनेक धार्मिक मान्यताएं थी जो कि हजारों वर्षों से चली आ रही थी, पर अब मनुष्य चाँद पर घूम कर आ गया है और मंगल, बृहस्पति, व शुक्र ग्रह तक में वैज्ञानिक यंत्र उतार कर जानकारी ली जा रही है. जब विज्ञान इतना उन्नत नहीं था तो ज्योतिष का जन्म हुआ था. यह केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि विश्व की सभी सभ्यताओं में अपने अपने तरीके से आगे बढ़ा चाहे वह यूनान, बेबीलोन या मिश्र की सभ्यता रही हो.

प्रायोगिक दृष्टि से ज्योतिष के दो भाग हैं, एक फलित ज्योतिष जो अनुमानों पर या संयोगवश घटी घटनाओं पर कल्पित है और दूसरा गणित ज्योतिष जो पूरी तरह वैज्ञानिक है तथा शत्-प्रतिशत सही परिणाम बताता है. इसी के आधार पर पंचांग-कलैंडर तैयार किये जाते हैं. फलित ज्योतिष पर बहुत से लोग विश्वास भी करते हैं लेकिन इसके नतीजे वैज्ञानिक नहीं होने से खरे नहीं उतरते हैं. इसी आधार पर बड़ी बड़ी भविष्य वाणियां भी होती हैं जो गलत साबित होती हैं. अभी कुछ वर्ष पहले अष्टगृह-योग पर सम्पूर्ण पृथ्वी के नष्ट होने की बात ज्योतिषियों ने बहुत जोर शोर से कही थी जो कोरी गप सिद्ध हुई.

ज्योतिष का गणित विज्ञान पक्ष सर्व मान्य है ये इंसान की फितरत है कि वह अपने आने वाले समय के बारे में पहले ही जानने को उत्सुक रहता है, इसी कमजोरी का फ़ायदा उठा कर नकली ज्योतिषी, लोगों को ठग लेते हैं. अब ज्यों ज्यों शिक्षा का प्रसार हो रहा है ये अंधविश्वास कम होते जा रहे हैं.

भारत ने अपना जो पहला उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा उसका नाम ‘आर्य भट्ट’ रखा था. प्राचीन काल में आर्य भट्ट तथा उनकी पत्नी महान गणितज्ञ और खगोलविद हुए हैं, जिन्होंने हजारों वर्ष पहले जो सिद्धांत बताए वे आज भी सही बैठ रहे हैं. इसी तरह विश्व में जो महान लोग इस क्षेत्र में हुए उनके बारे में तुम्हें अपनी पाठ्य पुस्तकों में भी विस्तार से अवश्य मिलेगा.

इस दुनिया में कुछ ‘अजूबे’ जरूर हैं, जो मनोविज्ञान/ परामनोविज्ञान की बातें है, जैसे कई बार बहुत सी बातों का पूर्वाभास हो जाता है, लेकिन इनका कोई वैज्ञानिक आधार अभी तक नहीं मिला है.

महत्वाकांक्षी लोग हस्त रेखा पर नहीं, हस्त कौशल पर भरोसा करते हैं. अर्थात भाग्य भरोसे न बैठ कर कर्म पर ध्यान देना चाहिए. मेहनत और अध्यवसाय कभी व्यर्थ नहीं जाते है. पुरुषार्थ करने पर ही अनुकूल फल प्राप्त होता है.

तुम्हारे दादा- दादी जी शीघ्र यहाँ आने वाले हैं. इस बार भी छुट्टियों में तुमको उनका सानिध्य मिलेगा.

भैया का प्यार. इसके लिए तुमने जो खिलोना दिल्ली से खरीदा है, उसे किसी के मार्फ़त मत भिजवाना, तुम्ही साथ लाना.
पापा की आशीषें.
तुम्हारी माँ
                                      ***

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

शुभ आशीषें (माँ के पत्र - 5)

                                                पाँचवां पत्र

प्यारी बिटिया,
सुखी रहो, दीर्घायु पाओ.
इस बार तुम्हारे दोनों पत्र मुझे एक साथ मिले और पढ़ कर बहुत सन्तोष हुआ कि तुम्हारा अध्ययन ठीक चल रहा है. हम लोग सब प्रकार से कुशल पूर्वक हैं और तुम्हारे लिए शुभ कामनाएं करते रहते हैं.

तुमने शिकायत लिखी है कि मैं अब पत्र भेजने में देरी करने लगी हूँ, असल बात ये है कि तुम्हारे पापा तुमको नियमित रूप से पत्र लिखा ही करते हैं, जिनमें लगभग सभी बातें लिखी होती हैं इसलिए मैं अपने ओर से वही बातें लिख पाती हूँ जो उन्होंने नहीं लिखी होती हैं या वे नहीं लिख पाते हैं. मैं कोशिश करूंगी कि जल्दी जल्दी ही लिखा करूं. तुमको मुझे ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि घर के तमाम रोजमर्रा के छोटे मोटे कामों से लेकर भैया की देख-रेख करने में मैं दिन भर व्यस्त रहती हूँ. गृहस्थी का काम ही ऐसा होता है कि अगले से अगला काम पड़ा रहता है. तुम्हारे पापा तो बड़े सवेरे तैयार होकर आफिस चले जाते हैं और शाम को थके मांदे लौटते हैं. बात ये भी है कि मेरे लेखन की गति भी कम है. जिस दिन पत्र लिखने बैठती हूँ पूरे दो घन्टे का समय लग जाता है और इन दो घंटों में मैं आनंद में सरोबार रहती हूँ.

तुमने लिखा है कि सभी कपड़े छोटे पड़ने लग गए हैं, अगर गुंजाइश छोड़ी हुई हो तो टेलर लम्बाई बढ़ा सकता है अन्यथा मैं तुरन्त दो जोड़े नए कपड़े भेजने का प्रबंध करूंगी. लिख भेजना कि कितने इंच की बढ़ोत्तरी करनी है. और अगर ग्रीष्मावकाश तक चल सकते हो तो चला लेना.

कपड़े छोटे व तंग होने की बात पर मुझे अपनी किशोरावस्था के दिन याद आ रहे हैं. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था. मेरे क्या? सभी किशोरों के साथ ऐसा ही होता आया है. कपड़े तंग हो जाये तो बड़ा अटपटा लगता है शर्म लगती है. इस उम्र में शरीर में एकाएक वृद्धि होने लगती है और मानसिक परिवर्तन भी अपनी दस्तक देने लगते हैं. लडकों में ये स्थिति कुछ देर से आती है. लड़कियों में विशेषकर गर्म प्रदेशों में तुम्हारी उम्र में ये लक्षण प्रकट होने लगते है. इन शारिरिक परिवर्तनों से बहुत सी लडकियां घबराने लगती हैं क्योंकि उनको शरीरक्रिया विज्ञान का बोध नहीं होता है. इसमें घबराने वाली जैसी बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये परिवर्तन प्रकृति का नियम है. परमेश्वर ने लड़कियों को कुछ इस तरह से बनाया है कि कोमलता, भावुकता और लज्जाशीलता ज्यादा दे रखी है. शरीर में दुग्ध ग्रंथियों का विकास बिलकुल स्वाभाविक क्रिया है इसी तरह मासिक धर्म का श्राव मी स्वाभाविक शारीरिक क्रिया है. इसको रजस्वला होना भी कहते हैं. सामजिक पारम्परिक मान्यताओं में मासिक धर्म के दिनों में स्त्री को अशुद्ध कहा जाता है, लेकिन इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. हाँ शरीर की साफ़-सफाई तो अपरिहार्य होती है. आज के युग में जब स्त्रियां नौकरी करती हैं, वे सारा काम करती हैं जो पुरुष करते हैं, तो यह संभव मी नहीं है कि ऋतु काल में वे बन्द होकर बैठी रहें. बाजार में सुरक्षित सेनीटरी पैड उपलब्ध रहते हैं जिनका प्रयोग सुविधाजनक भी होता है.

लड़कियों में अगर बहुत ज्यादा शर्मीलापन हो तो वह भी कभी कभी परेशानी का कारण बन सकता है. लेकिन मुझे ये जान कर खुशी हुई कि तुम्हारे स्कूल की लड़किया खेल-कूद और जिमनास्टिक जैसे कार्य कलापों में हिस्सा लेती हैं. कुछ स्कूलों में तो जापानी जूडो कराटे के अभ्यास भी कराये जाते हैं जो कि आत्मरक्षा के लिए अच्छा उपालंभ है. आज लड़किया सेना व पुलिस की सेवाओं में भी अग्रणी होते जा रही है, ये अच्छा लक्षण है.

शरीर क्रिया विज्ञान की मेरी बात अधूरी रह गयी. भगवान ने हमारी शरीर की मशीन को इस खूबसूरती, कलात्मक तथा जटिल प्रक्रिया से बनाया है कि विज्ञान भी सारी गुत्थियों को नहीं सुलझा पाया हैं. शरीर में हड्डी, माँस, त्वचा, बाल, स्नायु तथा अनेक तंत्रों के अलावा अंत:श्रावी ग्रंथिया हैं, जो नियमित रूप से अपने अपने हारमोन/श्राव छोड़ते रहते हैं. शरीर के बाहर होने वाले श्रावों को हम देख सकते है, अनुभव कर सकते हैं, जैसे आँख में आंसू आना, मुँह में लार आना, पसीना आना, दुग्ध श्राव आदि. इसी तरह अंत:श्रावी ग्रंथियां है, जैसे पीयूश ग्रन्थि, अग्न्याशय (पेंक्रियाज) अदि अनेक ग्रंथियां हैं. बहुत से होर्मोन्स का हमको पता ही नहीं चलता है. बच्चा होने पर माँ की दुग्ध ग्रंथियों में अपने आप दूध पैदा होने लगता है, ये सब परमेश्वर की व्यवस्थाएं हैं, इसमें कोई लज्जा जैसी बात नहीं होती है.

लज्जा-शर्म जैसी बात तो वह होती है जहाँ लडकियां फूहड़ता के साथ अंग प्रदर्शन करें, छोटे-बड़ों का ध्यान रखे बगैर व्यवहार करें. तुम देखती होगी आजकल विशेष कर बड़े शहरों में अनेक लडकियां/औरतें पाश्चात्य देशों की नक़ल करके बेहूदे ढंग के छोटे कपड़े पहन कर सार्वजनिक प्रदर्शन करती हैं. जिसकी सभ्य समाज में तारीफ़ नहीं की जा सकती है. हमारे भारतीय परिवेश में लड़की की सुंदरता उसके शील और गरिमामय पहनावे में देखी जाती है. मर्यादा लांघने वाली लडकियों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है.

दूसरी बात, तुमने गृह विज्ञान में जो पाक विद्या सीखी है, उसकी परीक्षा मैं तुम्हारे घर आने पर खुद लूंगी.

दिल्ली भ्रमण का कार्यक्रम कब तक बनने वाला है लिखना.

तुम्हारे पापा व भैया का प्यार.
तुम्हारी माँ
                                           ***

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

शुभ आशीषें (माँ के पत्र - 4)

                        चौथा पत्र

प्यारी बिटिया,
शुभ आशीषें.
तुम पुन: व्यवस्थित हो गयी होगी. तुम्हारी छुट्टियाँ यों ही सहज में बीत गईं, मालूम ही नहीं पड़ा. ये कालक्रम ऐसे ही चलता जाता है किसी की प्रतीक्षा नहीं करता है. इसी तरह सम्पूर्ण जीवन निकल जाता है. इस सँसार में वे ही लोग महान बन पाए, जिन्होंने अपने समय का सदुपयोग किया. सदुपयोग और महानता परिस्थितियों के एक ही पहलू में रहते हैं क्योंकि जन्म से कोई महान नहीं होता है.

हमारे समय में स्कूलों में एक आदर्श वाक्य लिखा रहता था, ‘चरित्र ही जीवन की कुन्जी है’. बहुत से विद्यार्थी इसका शायद तब अर्थ ही नहीं समझ पाते होंगे, लेकिन इसमें कितना गहरा उपदेश व सार है यह बाद में समझ में आता है. जो लोग महानता प्राप्त करते हैं उनके चरित्र में कई विशिष्टताएं होती हैं.

कथा-कहानियों, पौराणिक आख्यानों में स्वर्ग व नरक का वर्णन आता है, लेकिन ये सब काल्पनिक बातें है. सुखी जीवन ही स्वर्गीय आनंद है और दु:खी जीवन नारकीय कष्ट. सुख-दु:ख की भी लम्बी चौड़ी दार्शनिक परिभाषा है. संक्षेप में सुख वह है जिससे मन को सन्तोष तथा आनंद मिले और क्लेश पैदा ना हो. बहुत सारी धन-सम्पति होना ही सुख नहीं है. इसी सन्दर्भ में एक सत्य कथन मैंने पढ़ा था कि अमेरिका के फोर्ड मोटर कंपनी का मालिक अपने समय में दुनिया का सबसे अमीर आदमी माना जाता था, पर वह संग्रहिणी रोग से पीड़ित था, इसमें भोजन का पाचन हुए बिना ही तुरन्त दस्त हो जाता है. जब वह अपने वर्कशॉप से गुजर रहा था तो उसने एक मजदूर को सूखी ब्रेड आनंद से खाते हुए देखा तो कहा कि ‘वह मजदूर कितना सुखी है’. यों तो सुख का सम्बन्ध शरीर से कम तथा मन से ज्यादा होता है. हर माता पिता अपने बच्चों को आशीर्वाद देते हैं कि ‘सुखी रहो’ ये मंगल कामनाएं तभी फलित होती हैं जब बच्चे सुपात्र यानि अच्छे चरित्रवान होते हैं.  

‘सत्यम वद, घर्मं चर’ जैसी अनेक नैतिक उपदेशात्मक बाते तुम अपनी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ती रही हो लेकिन इस पत्र द्वारा में तुमको कुछ व्यावहारिक बातें कहना चाहती हूँ कि अप्रिय सत्य यदि ना बोला जाये तो अच्छा ही है. इसी प्रकार लोभ रूपी दुर्गुण पर भी संयम रखने से बहुत सुकून मिलता है. कुछ बच्चे शौकिया या शरारतन दूसरों का सामान चुरा लेते हैं, बात जाहिर होने पर शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. अनैतिक कार्यों को करने के बाद अवश्य ही आत्मग्लानि होती है. परमेश्वर हमारे हर कार्य कलाप को देखते रहते हैं. यह सोचना चाहिए.

मैं ये बातें इसलिए भी लिख रही हूँ कि तुम्हारे छात्रावास में सभी तरह की लडकियां होंगी, बात व्यवहार से तुमको गुणवान अच्छी लड़कियों की पहचान अपनेआप होती होगी. ऐसी लड़कियों से ही मित्रता होनी चाहिए. क्योंकि सोहबत का बड़ा असर होता है.

तुमने मुझे बताया था कि तुम मेरे पत्रों को अपनी सहेलियों को भी पढ़ने को देती हो सो मुझे बहुत खुशी है कि मेरी ये बातें कालजयी हैं, और सभी को लाभान्वित करेंगी.

आज के युग में जब स्त्री और पुरुष की सामाजिक मान्यतायें, अवधारणायें लगभग बराबरी पर आ गयी हैं तो नारी का दायित्व पहले से बहुत ज्यादा बढ़ गया है. इसलिए भी सुसंकृत और ज्ञानवान नारी ही सारे सँसार में परिवर्तन ला सकती है. हर देश में नारियां सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं. हमको गर्व है कि लडकियों में स्वाभाविक प्रतिभा अधिक होती है, आवश्यकता है कि उनको सही दिशा में चलाया जाये.

नारियों का भूतकाल में सामाजिक कुरितियों, अंधविश्वासों, और अशिक्षा के कारण शोषण होता रहा है, पर अब जागरण का समय है, हमको बहुत काम करना होगा.

मैंने बड़ी बड़ी बातें लिख डाली है लेकिन असल बात अभी नहीं लिख पाई हूँ कि स्वच्छ मन के लिए स्वच्छ व स्वस्थ शरीर का होना अति आवश्यक है इसलिए जरूरी है कि अपने आप को स्वस्थ रखना. अब बरसात का मौसम है, मच्छर पैदा हो गए हैं, मच्छरदानी का नियमित उपयोग करती रहना.

इस बार भैया बहुत उदास रहा पर अब धीरे धीरे भूलता जा रहा है. तुम्हारी फोटो के पास आकर कई बार खड़ा हो जाता है. तुम पत्रोत्तर जल्दी भेजा करना, मैं बाट देखती रहती हूँ.

भैया व तुम्हारे पापा का प्यार.
तुम्हारी माँ
                                           ***

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

शुभ आशीषें (माँ के पत्र - 3)


                       तीसरा पत्र.

प्यारी बिटिया,
शत्-शत् आशीषे.
तुम्हारा पत्र मिला. मैं बहुत चिंतित थी क्योंकि इस बार तुमने बहुत विलम्ब से पत्र डाला. तुम परीक्षा की तैयारी कर रही होगी, लेकिन चौबीसों घन्टे पढाई में गुंथे रहने से शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य में हानि पहुँच सकती है. पढ़ने के समय पढ़ो और खेलने के समय खेलना भी चाहिए.

बहुत से बच्चे पूरे वर्ष भर पढाई को टालते रहते हैं और परीक्षा के समय रात-रात भर पढ़ने का कार्यक्रम बनाते हैं, जो बिलकुल ही अनुचित है. जो बच्चे अपना पाठ हमेशा तैयार करके रखते है, उन्हें परीक्षा के समय केवल सन्दर्भ देखने की जरूरत पडती है, शेष समय वे अपने चिन्तन के लिए ताजगी बनाए रखते हैं.

तुम्हारी सहपाठिन मार्था जेकब ने तुमसे जो अपने धर्म और जीवन दर्शन की बातें कही हैं और तुमसे तुम्हारे धर्म व जीवन दर्शन के बारे में प्रश्न पूछे है, वे बहुत गहरे विषय है, जिनका सही उत्तर देने के लिए सभी धर्मों के शास्त्रों का सांगोपांग अध्ययन होना चाहिए, तभी तुलना की जा सकती है. फिर भी तुम्हारी जिज्ञासा पर मैं थोड़ी बहुत जानकारी देना जरूरी समझती हूँ. कि धर्म शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘धारण करना’ जिन नियमों और विश्वासों को हम धारण करते हैं या पालन करते हैं वही हमारा धर्म होता है.

आम बोलचाल में धर्म और अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ शब्द को एक ही अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है, लेकिन इसमें बड़ा मौलिक भेद है. हम, हमारा धर्म हिन्दू कहते हैं, परन्तु सच तो ये है कि हिन्दू नाम का कोई धर्म बना ही नहीं है. हिन्दू शब्द, सिंधु के अपभ्रंश से बना है ये नाम कुछ हजार वर्ष पहले ही सामने आया, जब इस देश में पश्चिम की तरफ से नए कबीलों का आगमन हुआ. मूल मे वैदिक धर्म था जो सनातनी या प्राकृत था. वैदिक इसलिए था कि यहाँ के लोग वेदों के अनुसार आचरण करते थे. वेद सँसार के सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ हैं, ये तत्कालीन विद्वानों, ऋषियों-मुनियों के अनेक अनुभवों और व्यवस्थाओं के परिणाम हैं. इनमें जो ऐतिहासिक वृतांत है, वे लगभग ५००० वर्ष पुराने लगते हैं. उस काल में ये सभ्यता समृद्ध अवस्था में थी, वह अनेक थपेडों के वावजूद ज़िंदा रही और आध्यात्मिक विचारों को संजोते हुए प्रवाहित होती चली आ रही है. इसमें अनेक विशिष्टताएँ भी हैं, हालाँकि बहुत सी बातों का समावेश बाद में भी होता गया, विसगतियाँ भी पनपती रही. कुछ तो भौगोलिक कारणों से भी एक ही मत-मतान्तर में भेद पैदा हो गए. इतना विशाल देश जिसमें विरोधी रक्त-वर्ण, भाषा, पोशाक, सम्प्रदाय, कबीले होते हुए भी भावनात्मक रूप से एक सांस्कृतिक इकाई की तरह हिन्दू धर्म बना रहा. समय समय पर समाज सुधारकों का भी अविर्भाव होता रहा.

आशय यह है कि अन्य धर्म किसी घटना विशेष या व्यक्ति विशेष के अविर्भाव से जुड़े हुए हैं लेकिन हिन्दू धर्म एक प्राकृत धर्म है, जिस पर अनेक बार आक्रमण भी हुए, पर सनातनी विश्वास अमर है.

मैं किसी धर्म की आलोचना नहीं करती हूँ क्योंकि सभी धर्मों का सार होता है, असत्य पर सत्य की विजय, पर-सुख चिन्तन और ईश्वर में श्रद्धा. देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार कई आधुनिक धर्मों का प्रादुर्भाव दो-ढाई हजार साल पहले ही हुआ है, चाहे वह बौद्ध, जैन, मुस्लिम या ईसाई धर्म हों. प्राय: अध्ययन करने से ये मालूम होता है कि व्यवहारिक नियमों को छोड़ कर मूलभूत सभी सिद्धांत वैदिक धर्म से ही प्राप्त किये गए हैं.

धर्म कोई भी हो, मनुष्य को बुराइयों से बचने और सद्मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है. इसलिए धर्म के नाम पर लड़ने वाले लोग धार्मिक नहीं कहे जा सकते. एक समय था जब राजकीय क़ानून नहीं थे, तब धर्मों द्वारा ही समाज का नियंत्रण हुआ करता था.

जहां तक कर्म-कांड व पूजा के तरीकों का प्रश्न है, मैं बहुत विस्तार में ना जाकर मैं तुमको ये बताना चाहूंगी कि जिस काल में कोई केन्द्रीय शक्ति या प्रचार प्रसार के माध्यम नहीं थे, लोगों ने अपनी अपनी सोच व सुविधा के अनुसार परम्पराएं बना दी ओर कालान्तर में इनमें अन्धविश्वास व अनावश्यक आस्थाएं पैदा होती गयी. जैसे देवताओं के नाम पर नरबलि या पशुबलि आदि. इसी तरह सामाजिक व्यवस्थाओं में भी विकृतियां घुस आई जैसे सती प्रथा. इसीलिये इन विकृतियों के विरुद्ध  समय समय पर क्रांतियां हुई. गौतम बुद्ध और महावीर जी के द्वारा नए धर्म के उपदेश तत्कालीन धार्मिक क्रान्ति ही थी.

इन सभी घटनाओं से जुड़े इतिहास को पढ़ने से मालूम होता है कि कई हमलों व क्रांतियों के बावजूद हमारा सनातन या हिन्दू धर्म नष्ट नहीं हुआ जबकि रोम, यूनान, और नील घाटी की सभ्यताएं अपने आदि स्वरूपों के साथ लुप्त हो गयी.

तुम मार्था को बताना कि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जो महान दार्शनिक थे और हमारे देश के राष्टपति रह चुके हैं, उन्होंने ‘हिंदुओं के जीवन दर्शन’ पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं, जो तुम्हारे पुस्तकालय में जरूर होंगी. उन्हें छुट्टियों में अवश्य पढ़ना.

एक प्रश्न किसी के मन में आ सकता है कि ‘क्या धर्म के बिना काम नहीं चल सकता है? इसका उत्तर है जब धर्म नहीं होगा तो हम समाज के रूप में नहीं रह पायेंगे. हमारे रिश्ते, हमारा दैनिक रोजगार सभी धर्म के हिस्से होते हैं. विद्यार्थी का धर्म होता है, ‘विद्याध्ययन, मनन, तदनुसार जीवन में अनुपालन करना. एक श्रमिक का धर्म है, श्रम व मेहनत से जीविकोपार्जन करना.’ इस प्रकार धर्म की व्याख्या बहुत बृहद है.

आज के पत्र का विषय बहुत गंभीर हो गया है. यह बड़ा जटिल भी है. तुमने पूछा था इसलिए स्पष्ट करना जरूरी हो गया था. अगर स्कूलों में धार्मिक शिक्षा सही ढंग से दी जाये तो बच्चों का दृष्टिकोण व्यापक हो सकता है. लेकिन अफ़सोस की बात तो ये है कि आज के राजनेता, धर्म माने साम्प्रदायिकता समझते हैं.

तुम नित्य प्रात: एवं सायं देव-स्तुति करना मत भूलना. श्रद्धा व भक्ति से आत्मबल और आत्म सन्तोष मिलता है. जीवन के लंबे रास्ते में जिसके पास आत्मबल और आत्मसन्तोष होता है उसे हमेशा सही दिशा मिल जाती है और वह कठिनाइयों में भी हिम्मत नहीं हारता है.

तुम अब शीघ्र घर लौट आओगी. तुम्हें लेने तुम्हारे पापा आयेंगे. अपने सभी पुराने कपड़े लेती आना, किसी के काम आयेंगे.
अपनी सभी सहेलियों को मेरी शुभकामनाएं देना.

तुम्हारी माँ
                                   ***

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

शुभ आशीषें (माँ के पत्र - 2)


                        दूसरा पत्र

प्यारी बिटिया,
चिरंजीवी रहो और प्रसन्न रहो.
तुम्हारा पत्र मिला और ये जान कर खुशी हुई कि तुम्हारी अर्धवार्षिक परीक्षाएं अच्छी हुई हैं. जो भी व्यक्ति मेहनत करता है उसका सुफल उसे अवश्य मिलता ही है. तुम अपनी पढाई का वर्तमान स्तर बनाए रखना. बहुत से बच्चे अच्छा रिजल्ट पाने के बाद लापरवाही बरतने लगते हैं और अगली पढाई में पिछड़ जाते हैं. पढाई व ज्ञान प्राप्त करने में थोड़ा बहुत कष्ट तो होता ही है, लेकिन बाद में इससे जीवन सुखमय होता है. तुमने अनेक महान पुरुषों की जीवनियाँ पढ़ी हैं, जिन्होंने अपना बचपन अभावों में बिताया और बाद में अपनी लगन व मेहनत से वे समाज के पथ प्रदर्शक बने.

तुम्हारा पत्र मैंने कई बार पढ़ा और ऐसा लगता था कि तुम सामने बैठ कर मुझ से बतिया रही हो. तुम्हारी गुड़िया पूरी तरह सुरक्षित है. तुम इसकी चिंता मत करना. अपने स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना क्योंकि अब ठण्ड का मौसम है.

जब तुम इस सँसार में आई थी तो हमारे घर में एक आनंद का वातावरण बन गया था और मैंने तुम्हारी देख-भाल में रातों की नींद त्याग दी थी, यही सोचती थी कि कि मेरी बिटिया थोड़ी बड़ी हो जायेगी तो मेरे सभी कष्ट अपनेआप दूर हो जायेंगे. ये सँसार एक माया है. हर नया दिन नई संवेदनाए लेकर आता है. तुम थोड़ी बड़ी हुई तो स्कूल भेजी जाने लगी, और अब अच्छी पढाई की खातिर इतनी दूर भेज दी गयी हो.

ड्राईंग रूम में दादा जी के फोटो के पीछे गौरेय्या ने ना जाने कब घोंसला बना डाला. तीन चार दिनों से उसके शावकों की 'चीं-चीं’ सुन रही हूँ. मैं यह सब देख सुन कर प्रकृति के चक्र को याद करती हूँ कि मुझे भी मेरी माँ ने उसी तरह मातृत्व की छाया दी थी जिस तरह आज मैं तुम्हारे लिए मह्सूस करती हूँ. प्रकृति का ये अनवरत क्रम अनादि काल से चला आ रहा है और इसी तरह चलता रहेगा. हम लोग तो मानव है. तुमने पेड़ों पर बंदरियों को देखा है वे अपने बच्चों को छाती से चिपटाए हुए चलते हैं, उछलते कूदते हैं. प्रकृति ने प्राणी मात्र को सबसे पहला बोध ही मातृत्व का कराया है. इसीलिए इसमें महानता मानी गयी है.

आज मनुष्य बहुत सभ्य हो चुका है. सभ्य से तात्पर्य है कि उसे ज्ञान और विज्ञान की पकड़ हो गयी है, जिसके सहारे उसने अनेक संसाधनों का आविष्कार करके नई व्यवस्थाओं को जन्म दे दिया है. आज से लाखों साल पहले हमारा रहन-सहन, खान-पान व बोली-भाषा इस तरह का नहीं थी. डार्विन एक प्रसिद्द विचारक हुए हैं, उन्होंने एक जगतमान्य सिद्धांत प्रतिपादित किया कि मनुष्य बन्दर के वंश का प्राणी है, और धीरे धीरे लाखों करोड़ों वर्षों में विकसित होकर वर्तमान स्थिति को प्राप्त हुआ है. उस जंगली व असभ्यता की अवस्था में भी माताएँ अपने बच्चों की चिंता करती ही होगी. तुम जब इतिहास पढ़ोगी तो पाओगी कि आदिकाल में कई कबीले मातृप्रधान थे. आज भी अफ्रीका व चीन में कई क्षेत्रों में मातृप्रधान समाज मौजूद हैं. अनेक शारिरिक कमियों के वावजूद मातृत्व में जो नैसर्गिक शक्ति व प्रेम के गुण हैं, उसी के फलस्वरूप हमारे समाज का निर्माण हुआ है.

ये तमाम इतिहास लिखते हुए मैं ये लिखना तो भूल ही रही हूँ कि तुम सर के बालों की सफाई करते रहना. शैम्पू खतम हो रहा हो तो नया खरीद लेना ज्यादा दिनों तक बाल नहीं धुलेंगे तो जुएँ पड़ने का ख़तरा हो जाता है. बाजार में जो तेज खुशबू वाले हेयर आयल मिलते हैं, उनको भी हानिकर बताया जाता है इसलिए सादा नारियल का तेल ही प्रयोग करना.

तुमने लिखा है कि तुम्हारी वार्डन सिनेमा देखने की इजाजत नहीं देती है. सत्य बात तो यह है कि सिनेमा ज्ञान प्रसार का एक बहुत अच्छा साधन है, लेकिन हमारे देश में अधिकाश ऐसी फ़िल्में बनने लगी हैं, जिनमें मार-धाड़, हिंसा, चोरी-डाका बलात्कार के फूहड़ दृश्य ज्यादा होते हैं. कला और ज्ञान का पक्ष गौण हो जाने के कारण दर्शकों में अपराध भावना पैदा होती है. अगर ये ऐसा ही चलता रहा तो  वास्तव में तुम्हारे जैसे किशोर बच्चों के लिए ये फिल्मे ना देखने लायक ही होंगी. इसीलिये तुम्हारी समझदार वार्डन मना करती होंगी, पर मुझे विश्वास है कि जब कभी अच्छी फ़िल्में आयेंगी तो वह खुद तुमको देखने की सलाह देंगी.

हमारी फिल्मों में जो ग्लैमर और फैशन दिखाया जाता है उसके प्रति बच्चों में आकर्षण होता है, लेकिन हम जो परदे पर देखते हैं वह वास्तविकता से दूर एक बिलकुल झूठी कहानी होती है. कई बेवकूफ लड़किया ग्लैमर के चक्कर में घर से भाग कर मुम्बई की तरफ हीरोइन बनने के झूठे सपने लेकर जाती रही हैं. उनको बाद में अपनी गलती का अहसास होता है. कई लड़कियों का जीवन इस चक्कर में बर्बाद हुआ है.

हमारा यह सभ्य समाज आज भी लाखों विसंगतियों और दुर्गुणों से भरा पड़ा है. एक लड़की को अपनी आबरू ओर कौमार्य बचाए रखने के लिए बहुत सी सीमाओं में रहना होता है. तुम ज्यों-ज्यों सयानी होती जाओगी सब कुछ खुद अनुभव करती रहोगी.

तुम्हारा भैया आजकल घुटनों के बल चलने लगा है. बहुत नटखट भी हो गया है.

तुम्हारे पापा और मैं अक्सर तुम्हारी बातें करते हैं. अपनी सहेलियों को विशेषकर अपनी रूममेट को हमारी शुभ कामनाएं देना.

तुम्हारी माँ
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