सोमवार, 21 नवंबर 2011

बल्लू


उसका असली नाम बलवंतसिंह है पर यह नाम किसी को मालूम नहीं था. जिस तरह कई लोग कुत्ता या बिल्ली का बच्चा घर ले आते है और उसे घर भर के लोग प्यार से पालते हैं, उसी तरह एक आदमी के बच्चे को विनोद कुमार तिवारी, पिण्डारी ग्लेशियर के नजदीक कपकोट के एक रिमोट गाँव से लेकर अपने निवास हल्द्वानी में ले आये. तिवारी जी स्टेट बैंक में कैशियर थे, कुछ दिनों के लिए लीव वैकेंसी में कपकोट भेजे गए थे.

बल्लू, मासूम सा १० वर्ष का बच्चा, एकदम पहाड़ के किसी गाँव-गधेरे से निकला जंगली हिरन के बच्चे से कम नहीं था. तिवारी जी की दो बेटियाँ हैं नीमा और सीमा. तब उनकी उम्र क्रमशः ८ और ६ वर्ष थी. बल्लू के आ जाने से उनको बहुत अच्छा लग रहा था जैसे एक बड़ा खिलौना मिल गया हो. बल्लू नया नया था तो सहमा-सहमा रहता था, उसने बाहर की दुनिया पहली बार देखी थी. मेरे मोहल्ले के शैतान बच्चे उसे नौकर’, नौकर कहके छेड़ते थे तो वह उदास होकर रह जाता.

बल्लू का बाप तो उसकी याददास्त से पहले ही उसे अनाथ छोड़ कर इस दुनिया से चला गया था, एक माँ थी जो तमाम अभावों में जी रही थी. पहाड़ की कठिन जिंदगी है पर उसके समान बहुत से परिवार एक दूसरे का दु:ख देख कर मन हल्का किया करते थे. बच्चा बड़ा हो जायेगा, कुछ नौकरी करेगा, वीरान बगिया मे फिर बहार आयेगी, इसी आस के साथ दिन कट रहे थे. एक दिन गाँव के सभापति ने बल्लू की माँ को सन्देश भेजा कि बैंक के मैनेजर को एक नौकर चाहिए, अगर वह अपने लड़के को भेजना चाहे तो बात की जा सकती है.

बल्लू की माँ बहुत सोच-विचार में पड़ गयी, वह तो अपने इकलौते बेटे को उस तरह रख रही थी जिस तरह एक मुर्गी अपने चूजों को अपने पंखों से ढक कर रखती है. लेकिन जब उसको बताया गया कि तिवारी जी उसको आगे पढाई भी करायेंगे और परिवार में अपने बच्चे की तरह पालेंगे तो उसने अपने जिगर के टुकड़े को उनके हवाले कर दिया. एक सन्तोष की बात ये भी थी कि तिवारी जी ने कहा कि हर महीने १०० रुपयों का मनीआर्डर बल्लू की माँ के पास पहुँच जाएगा.

बल्लू हल्द्वानी आ गया. धीरे धीरे बच्चों के साथ घुलमिल गया. श्रीमती तिवारी ने उसे घर के छोटे-मोटे कामों में लगा दिया. घर की साफ़-सफाई, झाडू-बुहारा, बर्तन मांजना मुख्य काम था. वह लगन से, कुछ डर से भी नियमित करने लग गया.

तिवारी जी ने पामेरियन नस्ल के दो कुत्ते भी पाल रखे थे. शुरू-शुरू में तो बल्लू उनसे भयभीत रहता था पर धीरे-धीरे दोस्ती हो गयी. कुत्तों को खाना खिलाना उसकी जिम्मेदारी में आ गया. बाउंड्री के अन्दर कुत्तों द्वारा मल-मूत्र विसर्जन करने की स्थिति में उसको अनिच्छा व घृणा पूर्वक सफाई तो करनी ही पड़ती थी क्योंकि वह था तो बेचारा नौकर.

गाहे-बगाहे तिवारी जी और श्रीमती तिवारी की ड़ाट-डपट भी खाता रह्ता था. बच्चा ही तो था, देर तक सोता था, कभी खेल में लग जाता था लेकिन एक खास बात ये रही कि वह तिवारी जी की बेटियों की कापी-किताबों व स्कूल सम्बंधी सभी कार्य कलापों की जानकारी रखने लगा. उसे पढाई के प्रति रूचि रहने लगी. दोनों लडकियां बल्लू भैय्या को पढ़ाने-बताने में होड़ करने लगी.

तिवारी जी अपने वायदे के अनुसार हर महीने १०० रूपये जरिये मनीआर्डर उसकी माँ को अवश्य भेज देते थे. माँ खुश थी. बेटा अभी से कमाने लगा है और अच्छे परिवार के साथ बंधा हुआ है. साल में गर्मियों में तिवारी जी जब एक महीने के लिए अपने पैतृक निवास रानीखेत जाते थे तब बल्लू को उसकी माँ के पास भिजवा देते थे.

इस तरह दस साल तक वह तिवारी परिवार का सेवक बना रहा. उसकी प्रतिभा देख कर तिवारी जी ने उसे हाईस्कूल की परिक्षा दिलवा दी थी. उसके लिए बकायदा ट्यूशन की व्यवस्था भी उन्होंने करवाई थी. परिणाम अच्छा ही आना था. बल्लू प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ. अध्यवसाय व मेहनत कभी बेकार नहीं जाते हैं. फिर क्या था बल्लू घर का सारा काम खुद करने लगा था साथ ही अपनी पढाई में भी व्यस्त रहने लगा. वह अब सयाना हो गया था.

बल्लू को प्रोत्साहित कर आगे पढाई के लिए नियमित दाखिला उन्होंने दिला दिया. अब बल्लू के लिए खर्च करना व उसकी परवरिश करने में तिवारी जी को बहुत आनंद आता था. बल्लू की देखा देखी उनकी दोनों बेटियाँ भी लगन से पढ़ रही थी तथा बढ़िया नम्बरों से उत्तीर्ण होती जा रही थी.

तिवारी जी का प्रमोशन और ट्रांसफर लखनऊ को हो गया तो हल्द्वानी वाले घर की देखरेख और कुत्तों को सम्हालने का जिम्मा बल्लू पर आ गया. तिवारी जी अपनी बीबी-बेटियों के साथ लखनऊ चले गए. वहाँ जो आवास उपलब्ध था उसमें कुत्ते रखने व नौकर रखने की गुंजाइश नहीं थी.

इधर बल्लू के बात व्यवहार और उसकी पढाई की चर्चाओं से वह पूरे मोहल्ले का भी प्रिय बन चुका था. बताए जाने पर वह लोगों के छोटे-मोटे काम भी सहर्ष कर दिया करता था.

बल्लू चार साल में बी.कॉम. करके ग्रेजुएट हो गया तो प्रतियोगी परीक्षाए भी देने लगा. भाग्य प्रबल था और समर्पण भाव से किया गया कार्य उसके लिए आगे से आगे राह बनाते रहा.

एक गरीब बच्चे की सीधी सपाट कहानी में एक और बड़ा ट्विस्ट तब आया जब वह अंतर्राष्ट्रीय सिटी बैक में पी.ओ. के पद  पर नियुक्ति पा गया. उसके हल्द्वानी छोड़ने के बाद तिवारी जी का घर सूना हो गया. अब उनके कुत्तों के भूंकने की आवाजे भी नहीं आती है. शायद उन्हें वे लखनऊ ही ले गए हैं. पूरे मोहल्ले को बल्लू के चले जाने से खालीपन का एहसास जरूर होता है.

बल्लू अब बलवंत सिंह उर्फ बी.एस. गढ़िया के नाम से जाना जाता है. वह अब भारत की राजधानी दिल्ली में रहता है. कुछ महीने पहले वह हल्द्वानी आकर सबसे मिलकर गया. उसका सुन्दर तथा निखरा हुआ व्यक्तित्व बहुत अच्छा लगा.
आज पूरे मोहल्ले में बलवंत की शादी का कार्ड बंट गया है. आम तौर पर पहाड़ के दूर दराज गाँवों में आज भी न्योंता, छपे कार्ड द्वारा भेजने की रीति नहीं है. इस तरह कार्ड पाकर सभी लोग हर्षित हैं, और उसकी खुशी में शामिल होने के लिए कपकोट जाने का प्रोग्राम बना रहे हैं.

निमंत्रण-पत्र श्री व श्रीमती विनोद कुमार तिवारी की तरफ से छापा है. नीमा और सीमा का बुलावा है. हमने जाने की तैयारी शुरू कर दी है.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया कहानी अंकल जो शुरू से अंत तक पाठक को बंधे रहती है। आभार ...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

    सादर
    पल्लवी

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