सोमवार, 28 नवंबर 2011

झगड़े की जड़


दयाराम आर्मी के इन्फेन्ट्री में ड्राईबर हो गया था. जब उसकी घरवाली का पहला बच्चा होने वाला था तो वह लम्बी छुट्टी लेकर घर आ गया था. पत्नी केकयी ने जब बेटे को जन्म दिया तो दयाराम ने आधी रात में ही थाली और शंख बजा कर सारे गाँव को जगा दिया था. तीन दिनों तक गुड़ की भेलियाँ फूटती रही और बच्चे के नामकरण पर पूरे गाँव-बिरादरी व रिश्तेदारों को दाल-भात की दावत खिलाई थी.

समय जाते देर नहीं लगती है. जब वह १५ वर्षों के बाद वह रिटायर हो कर घर आया, वह तीन लड़कों का पिता भी बन चुका था. लड़कों के नाम रखे थे राकेश, राजेश, और रीतेश. तीनों बेटे किशोर वय में थे. बड़े चँचल और होशियार भी थे पर पढ़ने लिखने में ज्यादा रूचि नहीं थी.

दयाराम ने एक टैक्सी खरीद ली और अल्मोडा-नैनीताल के पर्यटकों को घुमाने का काम पकड़ लिया. साथ ही गाँव में एक खंडहर वाली जमीन पर नया मकान बनाने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी. पति-पत्नी व तीनों बच्चे साथ मिलकर जगह को साफ़ करके खुद ही बुनियाद खोदने लगे तो एक छोटी सी ताम्बे की हँडिया में पुराने जमाने के बीस सोने के सिक्के निकल आये. आपस में सलाह मशविरा कर के तय किया कि ये बात गुप्त रखी जाये. बाहर के लोगों को कानों-कान खबर न दी जाये.

मकान बन गया. उसमें रहने भी लग गए, पर ये दहशत हमेशा बनी रही कि सोने के सिक्के कोई चुरा न ले जाये. इसलिए बच्चों को बताए बगैर दयाराम ने एक छोटे से टिन के डब्बे में सिक्के बंद करके घर के पिछवाड़े गहरा खड्डा खोद कर छुपा दिया.

बच्चे जल्दी जल्दी बड़े हो रहे थे, और घर में गाड़ी होने से चलाना भी सीख गए. राकेश के अठारह साल के होते ही ड्राइविंग लाइसेंस बना दिया गया ओर वह दूसरों की गाड़ी चलाने लग गया. वह अब अपने पिता से कहने लग गया कि सोना बेच कर उसके लिए भी एक टैक्सी खरीद दें. इस बात पर राजी नहीं होने पर बाप-बेटे में तकरार होने लगी. इसी कसमकश के बीच राकेश की शादी भी कर दी गयी. अब तो राकेश सोने के सिक्कों के बंटवारे की बात करने लगा. बात बहुत बढ़ गयी तो वह एक दिन नाराज होकर अपनी पत्नी के साथ घर छोड़ कर पास शहर में किराए से कमरा लेकर रहने लगा. उसे एक स्कूल बस चलाने की नौकरी मिल गयी थी.

इधर दयाराम ने एक दिन जब घर के पिछवाड़े खजाना निकालने के लिए खुदाई की तो उसके हाथ-पाँव फूल गए क्योंकि बहुत खोदने के बाद भी उसे वह नहीं मिला. वह हैरान था कि कैसे सोना चोरी चला गया? उसका शक घूम फिर कर राकेश पर जाता था. ज्योतिषियों व पुछ्यारों से पूछ-ताछ की गयी तो उन्होंने भी यही बताया कि घर के ही किसी सदस्य ने ये कारस्तानी की है. फिर क्या था दयाराम को पूरा यकीन हो गया कि ये काम नालायक बेटे राकेश का ही था. एक दिन उसने राकेश को बुला कर कहा कि वह सोने का बँटवारा करने को तैयार है. और फिर राकेश से पूरे सिक्के लौटाने को कहा. राकेश इस प्रकार झूठा इल्जाम लगने पर गुस्से व ताव में आ गया. बात यहाँ तक बढ़ गयी कि बाप-बेटे में हाथापाई हो गयी. आखिर में नौबत यहाँ तक आ गयी कि तू मेरा बाप नहीं, मैं तेरा बेटा नहीं कह कर राकेश घर से चला गया.

एक साल बाद जब राकेश की पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया तो राकेश ने गाँव में आकर घर घर जाकर बच्चे के नामकरण की दावत में शामिल होने का निमंत्रण लोगों को दिया, सभी ने उसको बधाई दी. उसके पड़ोस में रहने वाले पंडित धर्मानन्द ने उससे पूछा, अपने बाप को भी निमंत्रण दिया कि नहीं?

इस पर राकेश तमक कर बोला ताऊ, उसके लिए तो मैं मर गया हूँ. निमंत्रण क्यों दूँ?

पंडित धर्मानन्द बड़े बुजुर्ग और संजीदा पुरुष थे उन्होंने कहा, बेटा, झगड़ा झगड़े की जगह है, पर तेरे ऊपर पित्र-ऋण भी है. तू बड़ा बेटा है. यों ही मर गया कह कर कोई मरता है क्या? तेरे पैदा होने पर तेरे बाप ने सारे गाँव को अपनी खुशी में शामिल किया था. हम तेरा निमंत्रण तभी स्वीकार करेंगे जब तेरा बाप उसमे शामिल होगा.

पंडित धर्मानन्द ने उसके सामने ही दयाराम को बुला कर पूरी बात सुनी और कहा, पुछीयारों की बात पर मत जाओ ये सब अंदाजे से बोलते हैं. पहले तो इस तरह धन गाढ़ना, छुपाना बेवकूफी है, अगर गाढ़ रखा है तो वहीं होगा. ठीक से गहराई तक खोद कर देखो.

बात बन गयी गाँव के चार-पाँच नौजवान इस खुदाई में शामिल हो गए. सचमुच काफी गहराई में टिन के डिब्बे के जंग लगे अवशेष के साथ पूरे सिक्के मिल गए.

दयाराम बहुत खुश हुआ उसको बेटे पर संदेह करने का बड़ा अफ़सोस हो रहा था. गाँव के सभी मातबर लोगों के उपस्थिति में उसने सारे सिक्के मंदिर के जीर्णोद्धार के लिये सभापति को सोंप दिए और बेटे राकेश को दो लाख रुपयों का चेक अपनी पेन्शन में से बचाई रकम में से दे दिया.

झगड़े की जड़ खतम हो गयी. राकेश के बच्चे का नामकरण गाँव में ही पारंपरिक तरीके से दाल-भात खिलाई करके किया गया.
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4 टिप्‍पणियां:

  1. Interesting!! मेंरे ख्याल से यदि दयाराम की पत्नी बीचबचाव करती तो शायद झगडा इतना नहीं बढ़ता!

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  2. सच ही है पैसा ही सारे फ़स्साद कि जड़ बनता है हमेशा यदि उन सोने कि सिक्कों को दया राम ने अपने घर परिवार और बच्चों कि परवरिश पर कर दिया होता तो शायद यह नौबत ही नहीं आती .... बढ़िया रोचक कहानी समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/.

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  3. हाँ ये बात ठीक लगती है पर यहाँ देहात में अभी भी महिलायें बहुत पिछड़ी हुई है.

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  4. 'अधैर्य' से लिए निर्णय- नुक्सान तो होना ही था.-- बढ़िया कहानी.

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