सोमवार, 30 अप्रैल 2018

मेरा जन्मदिन

मेरे स्कूल सर्टीफिकेट में मेरी जन्म तिथि १ मई १९४० अंकित है, मेरे पिताश्री ने ना जाने कुछ अच्छा ही सोच कर एक साल कम करके १९३९ के बजाय १९४० लिखाया होगा, पर इस एक साल के अंतराल की वजह से मेरे जीवन की दिशा बदल गयी क्योंकि इण्टरमीडिएट पास करते ही मुझे तब ‘ग्राम सेवक’ के पद के लिए कॉल आ गया था, किन्तु उम्र पूरे अठारह नहीं होने से मुझे नौकरी का वह चैनल नहीं मिल सका था.

यह संयोग ही है कि हमारे देश में १ मई ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है और मुझे आगे चलकर सीमेंट इंडस्ट्री में काम करते हुए सीमेंट कामगारों के ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में मान्यता मिली तथा लगातार २५ वर्षों से अधिक समय तक अखिल भारतीय सीमेंट एंड अलाइड वर्कर्स फैडरेशन का पदाधिकारी रहा. उस दौरान मुझे प्रारम्भ में एटक के बड़े नेता स्व. श्रीनिवास गुड़ी (कर्नाटक),  इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्व. जी. रामानुजम, व फेडरेशन के अध्यक्ष स्व. एच.एन. त्रिवेदी, सी. एल.दूधिया, व भाई इब्राहीम हनीफी का सानिध्य प्राप्त हुआ था.

मेरे अध्यापक पिता अपने पांच भाइयों के बड़े परिवार में कनिष्ट थे. मुझे बताया गया था कि मेरे माता-पिता ने अपने विवाह के अनेक वर्षों के बाद अनेक मान्यताओं के बाद मुझे प्राप्त किया था इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि उस बड़े परिवार का अप्रतिम लाड़-दुलार मुझे मिला. दादाजी को अवश्य मैंने नहीं देखा पर दादी की छत्रछाया मेरे १७ साल की उम्र होने तक हम पर रही.  यह एक सही कहावत है कि "यह वह दिन होता है जब माँ अपने बच्चे के रोने पर खुश होती है." यही सबके साथ होता होगा, पर मैं बहुत खुशनसीब रहा हूँ कि १९८० तक पिता का और १९९७ तक माताश्री का वरदछत्र मुझ पर व मेरे परिवार पर रहा. 

मेरी तीन छोटी बहिनें खष्टी, राधिका, सरस्वती, व सबसे छोटा भाई बसंत, सभी का स्नेह-आदर मुझे आज भी बचपन की तरह ही मिल रहा है, जबकि में अपनी उम्र के अस्सीवें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा हूँ.

हमारी तीनों संतानें चि. पार्थ, गिरिबाला और प्रद्युम्न अपने अपने परिवारों के साथ सुव्यवस्थित और खुश हैं; तथा सम्मानपूर्वक जीने की मेरी जीवन पद्धति के सहयोगी हैं.

मेरी अर्धांगिनी श्रीमती कुंती पाण्डेय उम्र में मुझ से लगभग ५ साल छोटी है, पर अक्ल में हमेशा मुझसे आगे रहती हैं, और अभी भी कदम से कदम मिलाकर चल रही है.

मैं पिछले कुछ समय से तमाम राजनैतिक उहापोह व चिंतन से दूर रहकर अपनी स्मृतियों को शब्द देने का काम कर रहा हूँ. लाखेरी, जहां मैंने ३५ वर्षों से अधिक समय तक निवास किया, अथवा लाखेरी के बाहर के असंख्य मित्र मेरी दिनचर्या में मानसिक परिदृश्य बनाकर मौजूद रहते हैं. मुझे मालूम है कि प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मेरे सभी मित्रों की शुभकामनाएं मेरे साथ हैं और मैं भी सभी के सुख और सौभाग्य की निरंतर कामना करता हूँ.
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रविवार, 22 अप्रैल 2018

यादों का झरोखा - १८ - स्व. कुंजबिहारी मिश्रा

स्व. कुंजबिहारी मिश्रा दीक्षित परिवार के भानजे थे. केशवलाल दीक्षित जी और बृजबिहारी दीक्षित के चचेरे भाई मदनलाल दीक्षित उनके सगे मामा होते थे. बहन शारदा (पत्नी शरदकुमार तिवारी) उनसे पहले लाखेरी आ चुकी थी. इसी स्रोत से मिश्रा जी का लाखेरी पदार्पण हुआ था, ऐसा उनकी बेटी पुष्पा मिश्रा ने मुझे बताया है. वे १९५० के दशक में एक क्लर्क के बतौर एसीसी में भर्ती हुए थे, और सन ८२/८३ में चीफ स्टोरकीपर बन कर रिटायर हुए. सन ६८ में कुछ सालों के लिए उनको गुजरात की शिवालिया फैक्ट्री में स्थानांतरित किया गया था. वह एक दौर था जब ए.सी.सी. मैनेजमेंट द्वारा तत्कालीन नेता स्व. लखनलाल जी की खिलाफत करने वाले चुनिन्दा लोगों को लाखेरी से तड़ीपार कर दिया जाता था. उस लिस्ट में नंबर एक थे, ओवरसीअर मि. नायर, दूसरे नंबर पर कुंजबिहारी मिश्रा और तीसरे पर मैं स्वयं.

कुंजबिहारी जी एक विलक्षण व्यक्ति थे. उन्होंने १९६३ में स्वयंभू नेता लखनलाल जी को  कामगार संघ का अध्यक्ष पद और गरमपुरा पंचायत के सरपंच के पद से बेदखल कर दिया था, लेकिन अपनी अक्खड़ व स्पष्टवादी स्वभाव के चलते कामगार संघ के अगले ही चुनाव में वे हार गए. सरपंच पद उन्होंने खुद ही छोड़ दिया था.

कुंजी बाबू अपनी नौकरी के कार्यों में बहुत प्रवीण थे. उनका सामाजिक दायरा भी बहुत बड़ा था पर दूसरों का छिद्रान्वेषण करके सार्वजनिक रूप से ‘चूँकि, चुनांचे, पर’ के साथ मजा लिया करते थे इसलिए बहुत से मित्र उनसे बचते भी नजर आते थे. उनके एक सगे समधी स्व. केशव दत्त ‘अनंत’ (श्री रविकांत शर्मा के पिता) तो बरसों उनसे अबोले रहे.

मिश्रा जी की पांच बेटियों में से पुष्पा मिश्रा गत दो वर्ष पूर्व कंपनी के कैशियर पद से रिटायर हो चुकी हैं. अन्य बेटियों में लता रविकांत शर्मा अध्यापिका, ममता भूटानी पुलिस इंस्पेक्टर, रंजना तथा निरुपमा ने अपने अपने अपने संसार खुद बसाए हैं. और सब प्रकार से सुखी हैं. सुपुत्र सुधीर मिश्रा कैमोर इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट से कोर्स करके आये और वर्तमान में लाखेरी MVD में शायद फोरमैन हैं. उन्होंने अपनी वंशबेल आगे बढ़ाई भी है.

श्रीमती कुंजबिहारी मिश्रा एक समर्पित गृहिणी रही हैं, जिन्होंने बच्चों की परवरिश के साथ साथ शतायु सास की खूब सेवा की, जो कि लकवाग्रस्त होने के कारण बरसों  तक खाट पर जी रही थी.

कुंजबिहारी जी राष्ट्रीय राजनीति में भी सक्रिय रहे थे. एक समय स्थानीय भाजपा के अध्यक्ष भी बनाए गए थे. रिटायरमेंट के बाद वे कोटा में निवास बना कर रहे, और अंतिम समय में बच्चों के पास लाखेरी आ गए थे. जहां कुछ वर्ष पूर्व उनका देहावसान हो गया है.

लाखेरी में कुछ समय तक प्लांट हेड रहे श्री मनोज मिश्रा उनके सगे भतीजे थे.

चूकि मैं उनके समय में लाखेरी की यूनियन व अन्य संस्थाओं से जुड़ा हुआ था, इसलिए उनका सानिध्य मुझे भी मिला था. लाखेरी के इतिहास में उनका नाम अमिट है.
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रविवार, 8 अप्रैल 2018

यादों का झरोखा - १४ लाखेरी रामायण

कुछ भूली बिसरी यादें जब कभी जीवंत हो जाती हैं तो गुदगुदा जाती हैं. उन दिनों जो छोटे बालक हुआ करते थे, वे अब बहुत सयाने हो गए हैं, और जब से फेसबुक-मैसेंजर का चलन आम हुआ है, मुझसे मित्रता करके पुराने दिनों की मस्ती पर कलम चलाने को कहते हैं.

कल एक मित्र सच्चिदानंद शर्मा ने जब मैसेंजर पर मुझे कॉल किया तो मुझे इस विशिष्ठ नामवाले को याद करने में देर नहीं लगी कि ये स्व. राम प्रसाद शर्मा जी (अध्यापक ए.सी.सी. स्कूल) के सुपुत्र हैं. इनको मैंने इनके शैशव दिनों में अपने पिता की साईकिल की बेबी सीट पर भी देखा था. बाद में ९० के दशक में कारखाने में क्लर्क बनते भी देखा था. ये भी याद है कि इन्होने कंपनी की नौकरी छोड़ कर अन्यत्र अध्यापन का कार्य करना शुरू कर दिया था. हाँ तो, सच्चिदानंद शर्मा जी ने बताया कि वे आजकल 'लाखेरी हायर सेकेंडरी स्कूल' के प्रिंसिपल हैं. उन्होंने मेरे पुत्र डॉ. पार्थ के बारे में भी जानकारी चाही ,और कहा कि वे उनके साथ इसी स्कूल में पढ़े थे. उनकी वार्ता सुन कर अतीव खुशी हुई. मैंने दिल से बधाई दी. मुझे उनके पिता का मोटा चश्मा व ब्रह्मपुरी स्थित घर, सब कुछ कल्पना में सामने दिखा, और एक विशिष्ठ घटना भी सिनेमा रील की तरह घूम गई, जो इस प्रकार है. 

सन १९७६ का होलिकोत्सव – हास्य सम्मलेन था. १९७० से ७४ के बीच जब मैं शाहाबाद (कर्नाटक) में रहा तो मेरी अनुपस्थिति में आदरणीय फेरुसिंह रूहेला (बाद में हेडमास्टर बने) ने होली समिति के सेक्रेटरी के रूप में कार्यक्रमों को संचालित किया और मेरे द्वारा निर्धारित पिछली लीक पर इसे मनोरंजक बनाए रखा.  

हास्य सम्मलेन में प्रहसन, गीत-संगीत, नृत्य, चुटकुले, उपाधि वितरण सब स्थानीय हास्य से ओतप्रोत होते थे. नौजवान कलाकार अनिल तिवारी, अब्दुल मालिक, चन्द्र शेखर तिवारी (टीटू), भगवान दलेर, सुखदेव शर्मा, श्री बल्लभ तिवारी, किशन महेश्वरी, अजित जोशी, अब्दुल रशीद पठान, आदि अनेक लोगों का योगदान रहता था और मैं कार्यक्रम सूत्रधार रहता था.

सन १९७६ के हास्य सम्मलेन के लिए मैंने एक ‘लाखेरी रामायण’ लिखी, जिसका श्रोताओं ने भरपूर आनंद लिया. इस रचना में ‘राम’ शब्द वाले तमाम नामों को हास्य रूपक में गूंथा गया था. वह रचना अब मेरे पास नहीं है, पर उसके कुछ मजेदार अंश मेरी स्मृति में हैं. मैं अपने पाठकों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ:

मैं लिखने जा रहा हूँ एक ‘लाखेरी रामायण,’जिसके लिए मुझे तलाश है एक अदद राम की!
मैंने यूनियन प्रेसीडेंट रामाजी से जब पूछा
तो वे बोले “मूँ तो अनपढ़ छूं, चौपाईयां कस्यां बोलूंगो.”इतने में मिल गए बड़ी बड़ी मूछों वाले मौलाराम
उनको प्रस्ताव यों नहीं भाया कि वे अपनी पत्नी का – अपहरण नहीं करवा सकते थे.
टेकडी पर मास्टर राम प्रसाद मिले तो बोले
मैं बन जाऊंगा राम,
पर हेडमास्टर भारद्वाज अडंगा डालेंगे--आपस में खटपट के चलते,जब हेडमास्टर जी से किया जिक्र तो
भिड़ते ही बोले, “अरे मत बनाना इसको राम,
जिन छोरों को इसने पढ़ाया है –हुए हैं वे सब फेल,
तुम्हारी रामायण भी हो जायेगी डीरेल”....

यों तत्कालीन राम नाम वाले सभी राम किसन, राम नारायण, राम जीवन आदि नामों को रचना में घसीटा गया था. बहुत दिनों तक इस रामायण के दोहे चर्चा में रहे थे.

आज जब प्रिय सच्चिदानंद का फोन आया तो मैंने  स्वनामधन्य स्व. राम प्रसाद शर्मा जी के ‘जाए’+ 'पढ़ाये’ प्रधानाचार्य को मैंने हार्दिक बधाई दी. ऐसा लगा कि मेरी लाखेरी रामायण फेल नहीं, बहुत अच्छे अंकों से पास हुई है.
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शनिवार, 24 मार्च 2018

यादों का झरोखा - ११ - स्व. शरद कुमार तिवारी

स्व. शरदकुमार तिवारी का असल नाम चुन्नीलाल तिवारी था (ये मुझे उनके पुत्र अनिल से मालूम हुआ है). वे मूलरूप से होशंगाबाद, मध्य प्रदेश, के रहने वाले थे. स्वभाव से फक्कड़, मुंहफट, व मनमौजी शरदबाबू सन १९३८ में ए.सी.सी. में नौकरी पर लग गए थे. कोटा के पास गोर्धन पुरा (अटरू) में मिश्रा परिवार में उनका ससुराल था. स्व. कुंजबिहारी मिश्रा उनके सगे साले थे. श्रीमती शारदा तिवारी के मामा लोग यानि दीक्षित परिवार की जड़ें तब लाखेरी में जम चुकी थी. उन्हीं के माध्यम से वे यहाँ आये. कई विभागों में काम करते हुए वे जब अकाउंट्स क्लर्क थे तो सर्वप्रथम मेरी उनसे मुलाक़ात एक साहित्यिक मित्र के रूप में हुई थी. वे उर्दूदां व अजीम शायर थे.

उन दिनों लाखेरी सन्देश’ नाम की एक गृहपत्रिका मैनेजमेंट की तरफ से निकाली जाती थी, जिसमें हम स्थानीय रचनाकारों की रचनाएँ भी छपती थी. शरद बाबू की बगल की टेबल पर स्व. केशवदत्त ‘अनंत’ की सीट होती थी. वे पत्रिका के सम्पादक मंडल में थे. मुझे तब भी कुछ लिखने का शौक चर्राता था. इस प्रकार उन लोगों से नजदीकियां हो गयी. वैसे भी शरद बाबू का परिवार मेरे पड़ोस L- 17 में रहता था. उनका इकलौता पुत्र अनिल उर्फ़ सोना तब एक किशोर बालक था. मेरी फितरत थी कि मैं छोटे बच्चों के साथ छोटा बच्चा बन जाता था. बच्चों के साथ खेलना या शरारत करना मेरा शुगल होता था, जो आज भी ये बरकरार है. अनिल बहुत अच्छे स्टेज कलाकार थे. मैंने उनकी प्रतिभा का भरपूर उपयोग होलिकोत्सव पर आयोजित हास्य सम्मेलनों में किया.

शरद बाबू जिमखाना की क्रिकेट टीम में ओपनर खिलाड़ी होते थे. स्व.शिवप्रसाद गौड़, रामचंद्र चारण, प्रेम प्रकाश वर्मा, श्यामसुंदर सेनी, इब्राहीम हनीफी, रक्षपाल शर्मा, अमृतराय आदि पुराने व नयी प्रतिभाएं टीम में होती थी. मैनेजीरियल स्टाफ भी क्रिकेट के खेल को अंग्रेजों के जमाने से ही प्रोत्साहित किया करता था. बहुत से इंजीनियर्स तथा एड्मिनिस्ट्रेशन के ऑफिसर छुट्टी के दिन मैदान में हुआ करते थे. कोटा से रेलवे की टीम बहुधा लाखेरी आया करती थी. हमारी टीम भी प्रदेश में व प्रदेश के बाहर निमंत्रित की जाती थी.

शरद बाबू टेनिस के भी अच्छे खिलाड़ी थे, और इनडोर गेम्स में भी पूरी दखल रखते थे. जिमखाना की कार्य कारिणी में रहते हुए जब वे लाईब्रेरी के इंचार्ज थे तो उन्होंने बहुत सी समकालीन लेखकों की किताबें तथा पाकेट बुक्स मंगवाई थी. वे खुद भी उपन्यास पढने के शौक़ीन थे.

अनिल ने मुझे बताया है की जब लाखेरी में रेडिओ/ ट्रांजिस्टर नहीं होते थे तो उन्होंने मुम्बई वाले दादाबाबू (मशीनिस्ट, आटा चक्की वाले, स्व. विमला भोंसले अध्यापिका के पिता) से एक ट्रांजिस्टर खरीदा था, जो क्रिकेट कमेंट्री सुनने के जुनून का प्रमाण था. उनके नजदीकी मित्र मंडली में स्व. पी.बी. दीक्षित जो तब कैमिस्ट थे व बाद में जी.एम. रिटायर हुए, अमृतराय जी, जो बाद में डी.जी.एम. रिटायर हुए, मथुरा प्रसाद, जोबनपुत्रा जी, रामचंद्र चारण आदि थे, जो उनके हमप्याला भी हुआ करते थे.

१९७५ में रिटायर होने के एक साल बाद ही उनका कैंसर से देहावसान हो गया था. श्रीमती शारदा तिवारी का सन १९८४ में स्वर्गवास हो गया था. शरद बाबू की सुषमा नाम की एक बेटी भी थी, जो सरकारी स्कूल में अध्यापिका बनी और रिटायरमेंट के बाद स्वर्गवासी हो गयी हैं. वे आजीवन स्वावलम्बी व आत्मनिर्भर रही.

सुपुत्र अनिल तिवारी को सन १९७५ में कलाकारों/ खिलाड़ियों के नाम पर की गयी भर्ती में ए.सी.सी. में नियुक्ति दे दी गयी. पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए करीब १६ साल नौकरी करके १९९१ में वालेंट्री स्कीम के तहत रिटायरमेंट ले लिया। अभी पत्नी सहित कोटा महावीर नगर तृतीय में उसी लाइफ स्टाईल से आनंद पूर्वक रहते हैं. उनका पामरेनियन प्रेम आज भी बदस्तूर है.
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गुरुवार, 22 मार्च 2018

यादों का झरोखा - १० -स्वांत:सुखाय

जब हमारे बच्चे नहीं थे या वे बहुत छोटे थे तो मुझे कुत्ता, बिल्ली, व कुछ अनौखे प्राणी पालने का शौक भी रहा था. उसी दौरान की कुछ बातें आज सुनाता हूँ. 


१.  मिस्टर बर्नट, जो कि वर्कशॉप में कार्यरत थे, ने मुझे एक लाल रंग का dachshund ब्रीड का पिल्ला दिया था, जिसके पैर छोटे छोटे और बॉडी लम्बी थी. करीब साल भर वह हमारा लाड़ला रहा. गर्मियों में हम जब अपने गाँव अल्मोड़ा गए तो उसे डॉ सी.एम्.पी.सिंह जी के घर छोड़ गए. उन्होंने उसे संभाला नहीं, और वह आवारा हो गया. हमारे लौटने पर बर्नट जी के सहचर सफिया (किन्नर) ने रिपोर्ट दी कि कुत्ता गन्दगी खाने लगा था. दुखी होकर उसे किशोर जमादार को दे दिया। किशोर के बेटे सन्नूलाल ने बाद में मुझे बताया था कि कुत्ता बहुत बढ़िया था. वह कई बरस उनके साथ रहा था.

२. फैक्ट्री में एकमात्र एन्ग्लोइन्डियन कर्मचारी स्व. V. Farrar  से मेरी मित्रता हो गयी थी. (मि. फरार के ससुर  Mr. Tom Pelly  अंग्रेज थे, और PWI के पद पर कारखाने में कार्यरत रहे थे. उन्होंने ही ACC  में कर्मचारियों के लिए PF और ग्रेच्युटी लागू करवाई थी.) उन्होंने मुझे दो खरगोश के बच्चे दिए. वयस्क होने पर इनका परिवार बढ़ा, पर एक दिन बिल्ली ने आकर मुख्य मादा को मार दिया. बचे हुए खरगोशों के मैंने किसी को दे दिया. बड़े नर खरगोश को पिंजड़े सहित प्यारी दाई ले गयी, जो काफी दिनों तक उनके गरमपुरा स्थित क्वार्टर की शोभा बढ़ाता रहा था.   

३. गांधीपुरा में रहने वाले श्री चंद्रप्रकाश इलेक्ट्रीशियन ने मुझे एक सफ़ेद कबूतरों का जोड़ा दिया, जिनके लिए एक बड़े लकड़ी के खोखे में जाली लगा कर घर बनाया गया. उसे एल टाईप १६ के बरामदे की सीमेंट की जालीदार दीवार पर फिक्स किया गया. सब कुछ ठीक था. एक दिन घात लगाकर बिल्ली ने छापा मारा और एक कबूतर को खा गयी. बाकी तीनों कबूतर डर के मारे मुकाम पर नहीं आये और जंगली हो गए.

४. श्री मिट्ठूलाल से मेरा परिचय तब हुआ जब मैं लाखेरी गाँव में भाई नजर मोहम्मद जी की डिस्पेंसरी की बगल में अपनी पार्ट टाइम क्लीनिकल लैब में बैठता था. वह मेरा अनन्य सेवक व मित्र बना रहा. मैंने उसे अखबारी कागज़ के लिफ़ाफ़े बनाने की कला सिखाई थी तथा उसके द्वारा बनाए लिफाफों को सहकारी समिति में खपाया भी था. एक दिन वह मुझे देने के लिए एक जंगली कांटेदार ‘झाऊ चूहा’ लेकर आया. यह छोटा सा प्राणी L type 16 के दोनों कमरों में लुढ़क लुढ़क कर चलता था, और हमारे पैरों से टकराकर गेंद की तरह छटक कर दूर जा गिरता था. अफ़सोस इस बात का है कि उसके बारे में आज ना मुझे और ना मेरी अर्धांगिनी को कोई याद है कि उसे किसी को दिया था या वह बाहर निकल कर कहीं खो गया था!

५. एक वाचमैन (नाम याद नहीं रहा) क्वारी ड्यूटी से छूटकर मुझे एक नेवले का छोटा बच्चा दे गया. हमने चम्मच से दूध पिला कर उसे बड़ा किया. वह कुछ महीनों में ही बड़ा हो गया और कीड़े मकौड़ों का शिकार करने लगा. क्वार्टर में तार बाड़ की फैंसिंग थी. हमारा नेवला अन्दर घुसने वाले स्व. मकबूल मसीह (सिस्टर शीला त्यागी के पिता) की मुर्गियों के साथ घूमने वाले चूजों को पकड़ कर अपना निवाला बनाने लगा. पड़ोस में स्व. दोजीराम वायरमैन के बच्चों ने देखा तो बात चूजों के मालिक तक चली गयी. नाराजी हुयी. उसी बीच एक बड़ी नेवली ने प्रेमजाल में बांधकर उसे अपने साथ ले गयी; वह फिर वापस नहीं आया.

६. श्रीमती चंदेल (वे सिविल में एक वर्कर थी. उनके पति स्व. देवीलाल चंदेल भी ब्लैकस्मिथ का काम करते थे. उनका एक बेटा डॉक्टर, एक बेटा इंजीनियर तथा एक बेटा एयरलाइन्स में ऑफिसर हुए) ने मुझे ‘मनोहर’ नस्ल की दो लाल मुर्गियां व एक मुर्गा मात्र १५ रुपयों में बेचे। लकड़ी के खोखों का पिंजडा बनाकर कुछ समय तक पाला, ये रोज अंडा देने वाली मुर्गियां थी. कुड़क होने पर एक मुर्गी को चूजे निकालने के लिए बिठाया तो आठ चूजे पैदा हो गए, पर जब मेरी माताश्री जाड़ों में लाखेरी आई तो उनके आने से पहले मुर्गियों का यह परिवार अपने चाहने वाले श्री मिट्ठूलाल तम्बोली (बाद में सेनीटेशन विभाग में अपने पिता की एवज में लगे, और जब सेनीटेशन विभाग ठेके पर दिया गया तो उनको भी ठेकेदारी दी गयी) को सौंप दिए.

७. शुद्ध दूध की चाहत में कांकरा के ठाकुर साहब स्व. धनुर्धारीसिंह हाडा जी के बाड़े से एक देसी नस्ल की बकरी खरीदी, उसके घर आने पर अहसास हुआ कि दूध कम तथा आफत ज्यादा थी. अत: तीसरे दिन ही वापस करने के लिए ले गया.

८. उपरोक्त सभी वृतान्त शाहाबाद स्थानान्तरण के पूर्व के हैं. शाहाबाद से सन १९७४ में लौटने के बाद  १९७६ में श्री अनिल तिवारी उर्फ़ सोना जी ने मुझे मेरे निवेदन पर एक सफ़ेद पामेरियन नस्ल का प्यारा पिल्ला दिया. उसे रोमी नाम दिया गया. वह मेरे परिवार का लाड़ला कुत्ता लगभग दस वर्ष साथ में रहा. एक बार जब तीनों बच्चे अपने अपने कालेजों में थे तो हमें एक विवाहोत्सव में नैनीताल आना हुआ तो रेलवे के स्लीपर डिब्बे में उसने फर्स्ट क्लास के टिकट पर हमारे साथ यात्रा भी की. पर एक बकरा ईद पर मेरे TRT क्वार्टर नम्बर २४ के सामने नफीस भाई (कैंटीन सुपर वाईजर) के आगन से हड्डी का टुकड़ा लेकर आया जो उसके गले में अटक गया. यही उसकी मौत का कारण बना. दुर्योग था कि मैं उस दिन जयपुर गया था. वापस आया तो घर में मातम छाया था.

९. उक्त रोमी नामक पामेरियन कुत्ते के साथ के लिए मैं एक सफेद बिल्ली का बच्चा भी सन १९८२ में आगरा के मोहनपुरा निवासी पूर्व में मेरे पड़ोसी रहे मालबाबू श्री मोहनलाल शर्मा के घर से लेकर आया. आगरा पार्थ और गिरिबाला को एक PMT  कोचिंग प्रोग्राम में लेकर गया था. ये बिल्ली का बच्चा घर परिवार से बहुत अच्छी तरह घुलमिल कर रौनक बनाए हुए था. करीब ६ महीने रहा. ठीक दीपावली के दिन जब वह रोज की तरह सुबह-सवेरे बाहर घूमने निकला तो वापस नहीं लौटा; बहुत खोजबीन की पर वह हमेशा के लिए चला गया. शायद कोई चील उठा कर ले गयी थी.

उसके बाद हमने इस तरह का कोई प्राणी नहीं पाला है, पर प्यारे रोमी को अभी तक हम सभी परिवार के सदस्य याद किया करते हैं.

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